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शुक्रवार, 14 नवंबर 2014

नेहरू की ही सवा-शताब्दी क्यों?

शंकर शरण 
IV/ 44, एन.सी..आर.टी. आवास, श्री अरविंद मार्ग, नई दिल्ली 110 016


जवाहरलाल नेहरू की सवा-शताब्दी मनाने हेतु बनी उच्च-स्तरीय समिति का पुनर्गठन एक अधूरा कदम है। उस के पहले देश को यह बताया जाना चाहिए कि किस आधार पर नेहरू की शताब्दी और सवा-शताब्दी मनाने के लिए मँहगा सरकारी उपक्रम हुआ, जबकि डॉ. राजेंद्र प्रसाद के लिए नहीं?
यदि नेहरू प्रथम प्रधान मंत्री थे, तो प्रसाद भी प्रथम राष्ट्रपति थे। उसी तरह, क्यों गाँधी-जयंती स्थाई अवकाश घोषित हो गया, जबकि ‘राष्ट्र-पितामह’ स्वामी दयानन्द सरस्वती को वह मान नहीं मिला? फिर, किस कारण सरदार वल्लभभाई पटेल को स्वतंत्र भारत के चौवालीस वर्षों तक देश के औपचारिक सर्वोच्च सम्मान के योग्य नहीं समझा गया? उन से पहले इंदिरा गाँधी, राजीव गाँधी ही नहीं, कई क्षेत्रीय नेताओं तक को भारत-रत्न बनाया जा चुका था! अतः अनेक सवाल एवं तथ्य नेहरू और उनके वंश की महानता भारतीय मानस पर जबरन थोपने का संकेत करते हैं।
हरेक देश में किसी दिवंगत की जयंती मनाने या न मनाने के कारण मूलतः समान होते हैं। जिसने देश और समाज की सच्ची सेवा की, उसे याद करते हैं। जिसने ऐसा कुछ विशेष न किया अथवा हानि पहुँचाई, उसे भूल जाया जाता है। अतः तुलनात्मक सवाल यह भी है कि आज रूस में लेनिन और चीन में माओ को किन कारणों से विस्मृत किया जा चुका है?
लेनिन से नेहरू की तुलना भारत में पहले भी होती रही है। तीस-चालीस साल पहले कांग्रेसी नेता और मार्क्सवादी प्रोफेसर इस पर लेख व पुस्तकें प्रकाशित किया करते थे, और सरकार से ईनाम पाते थे। तब रूस में लेनिन और यहाँ नेहरू की अतुलनीय महानता एक स्वयंसिद्धि होती थी। तदनुरूप दोनों को अपने-अपने देश का मुक्ति-योद्धा, प्रथम शासक, मार्गदर्शक, विचारक, नीति-निर्माता, इस प्रकार महामानव, आदि बताने का चलन था।
फिर समय आया कि रूसियों ने वह लेनिन-पूजा बंद कर दी। वही स्थिति चीन में माओ की हुई। इस तरह, आज उन देशों में अपने-अपने उन कथित मार्गदर्शक, महान विचारक लेनिन, माओ की जयंती मनना तक पूरी तरह बंद हो चुका है। रूस और चीन में इस व्यक्ति-पूजा पटाक्षेप के पीछे कोई जोर-जबर्दस्ती नहीं हुई। रूस चीन की जनता ने सर्वसम्मति से उस कथित महानता का अध्याय बंद किया। कारण यह भी था कि वह पूजा उन पर दशकों तक जबरन थोपी हुई थी। क्या नेहरू की स्थिति भिन्न है?
अब यह निर्विवाद है कि लेनिन, माओ की महानता की गाथाएं उनके देशों में राज्यसत्ता की ताकत के बल पर गढ़ी और प्रचारित की जाती रहीं। उन के जीवन के हर काले अध्याय और कदमों पर भारी पर्दा डाल कर रूसी-चीनी जनगण के जीवन के हर पहलू को लेनिन-माओमय बना डाला गया था। इसीलिए, जैसे ही वह जबरन सत्ता दबाव हटा, लोगों ने स्वयं वह लज्जास्पद पूजा बंद कर दी। इस पर सर्वसहमति इतनी स्पष्ट थी कि उनके देशों में कोई मामूली विवाद तक न हुआ। आज रूस और चीन में टॉल्सटॉय और कन्फ्यूशियस ही सर्वोच्च चिंतक माने जाते हैं, लेनिन और माओ तो बिलकुल नहीं।
सच पूछें तो इस प्रसंग में भी नेहरू को लेनिन से तुलनीय बनाने का समय आ गया है। जिस तरह, कम्युनिस्ट राज ने रूस पर लेनिन-पूजा थोपी थी, उसी तरह नेहरूवंश के राज ने भारत में नेहरू-गाँधी पूजा थोपी। दूसरी ओर, नेहरू का राजनीतिक, वैचारिक रिकॉर्ड भी लेनिन से तुलनीय है। अर्थ-नीति, विदेश-नीति, गृह-नीति, शैक्षिक-नीति, दार्शनिक रुख आदि किसी भी बुनियादी बिन्दु पर नेहरू की विरासत गौरवपूर्ण नहीं है।
उलटे, राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश-नीति में नेहरू के निर्णयों, कार्यों, विचारों में एक से एक लज्जास्पद अध्याय हैं। तिब्बत पर स्थापित भारतीय कूटनीतिक संरक्षण अधिकार को स्वतः छोड़कर उस महत्पूर्ण पड़ोसी देश को अपने ‘मित्र’ कम्युनिस्ट चीन के हवाले कर नेहरू ने स्वयं भारत को अरक्षित कर डाला, जबकि सरदार पटेल ने इसके विरुद्ध चेतावनी दी थी। आज अरुणाचल प्रदेश पर चीन का दावा तिब्बत के माध्यम से है, और किसी तरह नहीं। फिर, प्रधान मंत्री रूप में अपनी प्रथम अमेरिका यात्रा में नेहरू ने अमेरिकियों को कम्युनिस्टों वाला साम्राज्यवाद-विरोध का लेक्चर पिलाकर स्तब्ध, क्षुब्ध कर दिया। इस प्रकार, दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण देश से संबंध बिगाड़ने की शुरुआत की। कम्युनिस्ट चीन से दोस्ती निभाने की खातिर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् में भारत को प्रस्तावित स्थाई सीट ठुकराया। यहाँ तक कि जब उसी दोस्त ने चुपके से घुस-पैठ कर कश्मीर के पूर्वी हिस्से का एक भाग दखल कर लिया, तो नेहरू ने संसद में प्रधानमंत्री पद से बयान दिया कि ‘उस हिस्से में तो घास भी नहीं उगती’!
ऐसी बचकानी समझ और लज्जास्पद योग्यता वाले व्यक्ति को प्रथम प्रधान मंत्री बनाने का अपराध मोहनदास गाँधी ने किया था। पर विगत छः दशकों के झूठे, सरकारी प्रचार के कारण आज देश के लोग जानते भी नहीं कि स्वतंत्रता मिलने के समय कांग्रेस में प्रथम प्रधानमंत्री के रूप में नेहरू पहली तो क्या, दूसरी पसंद भी नहीं थे! सब से ऊपर सरदार पटेल, फिर जे. बी. कृपलानी को कांग्रेसियों ने अपनी पसंद बताया था। उन्हें अमान्य कर गाँधीजी ने नेहरू को थोपा, जिन्होंने स्वतंत्र भारत के नवनिर्माण और नीति-निर्धारण की पूरी मिट्टी पलीद कर दी।
यहाँ तक कि नेहरू का व्यक्तिगत जीवन भी अनुकरणीय नहीं था। स्वयं नेहरू के वरिष्ठतम सहयोगियों समेत अनगिनत समकालीनों ने यह लिखा है। लेडी माउंटबेटन के अंतरंग प्रभाव में नेहरू ने देश का विभाजन, कश्मीर की ऐसी-तैसी तथा कम्युनिस्ट षडयंत्रकारियों की मदद की। कश्मीर को विवादित और पाकिस्तान को सदा के लिए लोलुप बनाने में नेहरू का सबसे बड़ा दोष है। और यह उन्होंने अपने गृहमंत्री सरदार पटेल को अँधेरे में रख कर किया था! यह सब कोई आरोप नहीं, जगजाहिर तथ्य हैं जिनके प्रमाण उतने ही सर्वसुलभ हैं।
तब ऐसे ‘प्रथम’ मार्गदर्शक की सवा-शताब्दी जयंती में हम क्या मनाएं? किस बात की चर्चा करें? क्या वही झूठ और अतिरंजनाएं दुहराएं, जो नेहरूवंशी सत्ता ने जोर-जबरदस्ती और छल-प्रपंच से स्थापित कर दी हैं? क्या समकालीन रूसी और चीनी जनता से इस मामले में कोई तुलनात्मक लाभ न उठाएं?
किसी भ्रम में न रहें। नेहरू के पक्ष में, उनकी विरुदावली और ‘योगदान’ के जितने भी किस्से व तर्क दिए जाते रहे हैं, वे ठीक वैसे ही हैं जैसे सोवियत सत्ता के दिनों में लेनिन के पक्ष में मिलते थे। अतः बिना उन गंभीर दोषों के, जो नेहरू में थे, बावजूद हमारी सरकार ने यदि प्रथम राष्ट्रपति देशरत्न डॉ. राजेंद्र प्रसाद की कोई शताब्दी या सवा-शताब्दी नहीं मनाई – तो कोई कारण नहीं कि अनगिनत लज्जास्पद कार्यों के बावजूद हम नेहरू पर देश का पैसा और समय बर्बाद करते रहें। यह पहले ही बहुत अधिक हो चुका है, कम से कम इस का ध्यान भी रखें।
केंद्रीय कैबिनेट ने सही निर्णय लिया है कि ल्युटन की दिल्ली में मृत नेताओं को आवंटित बंगलों को ‘स्मारक’ यानी उनके वंशजों द्वारा कब्जाने की प्रक्रिया बंद की जाएगी। किन्तु, तब अब तक किए गए कब्जों को बनाए रखने की क्या तुक है? इसकी शुरुआत तो नेहरू से ही हुई थी। तीनमूर्ति भवन प्रधान मंत्री निवास था। उसे नेहरू की मृत्यु के बाद उनका स्मारक बना दिया गया। उस तर्क से राष्ट्रपति भवन को राजेंद्र प्रसाद का स्माकर बना देना चाहिए था!
अतः जयंती, स्मारक, संस्थाओं, योजनाओं के नामकरण, आदि प्रक्रियाओं में यह विचित्र भेद-भाव – आगे ही नहीं, पीछे का भी – सदा के लिए खत्म होना चाहिए। पतंजलि, पाणिनि, चाणक्य, कालिदास, तुलसीदास, जैसे शाश्वत मूल्य के अनगिन मणि-मानिकों ही नहीं; स्वामी विवेकानंद, श्रीअरविन्द, जगदीशचंद्र बोस, जदुनाथ सरकार, ध्यानचंद, आदि भारत के कई समकालीन सच्चे महापुरुषों को स्वतंत्र भारत में हमने कितना सरकारी-राष्ट्रीय आदर दिया है? हमारे देश में एक लगभग अशिक्षित नेता के नाम पर बीसियों विश्वविद्यालय खोले गए हैं, और महान इतिहासकार जदुनाथ सरकार, महान कवि निराला या अज्ञेय के नाम पर एक भी नहीं! इस का तर्क उस सोवियत व्यवस्था से तनिक भी भिन्न नहीं, जिसमें पूरी शिक्षा को लेनिन-स्तालिनमय कर दिया गया था, जबकि दॉस्ताएवस्की, सोल्झेनित्सिन जैसे मनीषी पुस्तकालयों से भी बहिष्कृत थे।
ध्यान रहे, आधे-अधूरे सुधार किसी काम के नहीं होते। हमारे नए शासकों को साहस दिखाना चाहिए कि देश का स्वाभिमान हमारा आदर्श हो। चाटुकारिता, भेद-भाव और छिछोरापन इस स्वाभिमान को लज्जित करते हैं। नेहरू की सवा-शताब्दी शाही रूप से मनाई जाएगी, पिछली सरकार का यह निर्णय देश का गौरव बढ़ाने वाला नहीं, बल्कि क्षुद्र कारणों से था।
नई सरकार को इस बिंदु पर सांगोपांग और खुला विचार करना चाहिए। देश के महापुरुषों, मनीषियों की पहचान, सम्मान और उनसे सीखने का स्पष्ट और बुद्धिमत्तापूर्ण मानदंड बनाना ही स्वागत योग्य होगा। तब तक सरकार द्वारा स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री की सवा-शताब्दी ठीक वैसी ही मननी चाहिए, जैसी प्रथम राष्ट्रपति की मनी। न कम, न ज्यादा।
हालाँकि, यदि हम गाँधी-नेहरू को वही स्थान दे सकें, जो रूसी जनता ने लेनिन-स्तालिन को दे दिया है तो सब से अच्छा हो। वैसे भी, समय के साथ होगा वही। सत्ता-प्रायोजित महानता को लोग सदा माथे पर उठाए नहीं रहेंगे। चाहें तो तीन-मूर्ति भवन को सभी दिवंगत नेताओं को श्रद्धांजलि-स्मारक में बदल दें। उन्हें, उनके गुणों का स्मरण करना तो ठीक है। किन्तु उस से पहले हमें यह भी स्मरण करना चाहिए कि भारतवर्ष में अनादिकाल से मरणशील मनुष्यों, चाहे वे कितने ही महान रहे हों, का कोई स्मारक, समारोह, जयंती मनाने की परंपरा नहीं रही है। जहाँ से हमने यह परंपरा नकल कर ली है, वहाँ भी इस की एक लाज रहती है। कम से कम हम इस का भी ख्याल रखें।
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रविवार, 11 नवंबर 2012

संस्कृत भाषा और भारत में वैज्ञानिक विकास, भाग-8


यह लेख सुप्रीमकोर्ट के पूर्व न्यायमूर्ति और भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष जस्टिस मार्कंडेय काट्जू के उस अभिभाषण का अनुवाद है, जो उन्होंने 27 नवंबर 2011को काशी हिंदी विश्वविद्यालय, वाराणसी में दिया था। 
खगोलशास्त्र
प्राचीन भारत में, आर्यभट्ट ने अपनी पुस्तक आर्यभट्टीय में एक गणितीय प्रणाली को प्रस्तुत किया, जिसमें संकल्पना की गई कि पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमती है। उन्होंने सूर्य के परिप्रेक्ष्य में ग्रहों की गति के बारे में भी विचार किया (दूसरे शब्दों में, आर्यभट्ट की गणितीय प्रणाली में कॉर्पर्निकस के हेलियोसेंट्रिक सिद्धांत के संकेत थे, हालांकि इस पर विवाद की गुंजाइश है)। दूसरे प्रसिद्ध खगोलशास्त्री थे, ब्रह्मगुप्त, जो उज्जैन के खगोलीय वेधशाला के प्रमुख थे और खगोलशास्र पर एक प्रसिद्ध पुस्तक लिखी, और भास्कराचार्य भी उज्जैन के वैधशाला के प्रमुख थे, वराहमिहिर ने गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत प्रस्तुत किया जो बताया है कि एक बल है जिसके कारण कोई वस्तु पृथ्वी की ओर आकर्षित होती है और जो आकाशीय पिंडों को अपने निश्चित स्थान पर बना रखता है।
मैं यहां इन महान खगोलशास्त्रियों के सिद्धांतों को विस्तार से प्रस्तुत नहीं करने जा रहा हूँ, लेकिन इतना निश्चयपूर्वक कहूंगा कि हजारों साल पहले भारत के महान खगोलशास्त्रियों द्वारा की गई गणना के आधार पर आज भी सूर्य और चंद्र ग्रहणों के समय और तिथि की भविष्यवाणी की जा सकती है। ये गणनाएं उस समय की गई, जब दूरदर्शी जैसे आधुनिक यंत्र नहीं थे और खुली आंखों से निरीक्षण करना होता था।
चिकित्सा
प्राचीन भारतीय चिकित्सा जगत में सुश्रुत और चरक के नाम सबसे प्रसिद्ध हैं। सुश्रुत शल्य चिकित्सा के जनक माने जाते हैं और उन्होंने मोतियाबिंद की सर्जरी और प्लास्टिक सर्जरी आदि की खोज की, ये आधुनिक सर्जरी की खोज से सदियों पहले हुई थी। सुश्रुत की पुस्तक सुश्रुत संहिता में चिकित्सा और सर्जरी के बारे में विस्तार के बताया गया है, इनमें सर्जरी में प्रयोग होने वाले दर्जनों औजार शामिल है, जिन्हें गूगल में इंटरनेटपर आसानी से ढूंढा जा सकता है। सुश्रुत अच्छे सर्जन माने जाते थे, क्योंकि इन्हें शरीर के आंतरिकी का बहुत अच्छा ज्ञान था। चरक ने आंतरिक चिकित्सा पर चरक संहिता नामक आयुर्वेदिक ग्रंथ की रचना की, जो आधुनिक आयुर्वेदिक चिकित्सा का केंद्र है। चरक संहिता और सुश्रुत संहिता दोनों ही ग्रंथ संस्कृत में लिखे गए, जिन्हें गूगल में इंटरनेट पर विस्तारपूर्वक देखा जा सकता है। यह उल्लेखनीय है कि लंदन साइंस म्यूजियम के प्रथम तल पर चिकित्सा से जुड़ी हैं, जहां चिकित्सा के क्षेत्र में सुश्रुत के यंत्रों सहित प्राचीन भारत की उपलब्धियों का भी जिक्र है।
इससे जाहिर है कि प्राचीन काल में भारत चिकित्सा के क्षेत्र में दुनिया के सभी देशों से काफी आगे था।
अभियांत्रिकी
दक्षिण भारत के तंजौर, त्रिची मंदिरों और खजुराहो और ओडीशा के मंदिर इस बात के गवाह है कि अभियांत्रिकी के क्षेत्र में भी हम काफी आगे थे। कहा जाता है कि छठी शताब्दी में कर्नाटक के ऐहोल में एक संस्थान था जहां संरचनागत मैकेनिक्स का विकास हुआ था। इस संस्थान में विकसित ढालुआं छत का उपयोग केरल, पूर्वी आंध्रप्रदेश और तमिलनाडु में संरचनाओं को बनाने में हुआ।
यहां आगे का विषय समझने के लिए थोड़ा और विषयांतर होना पड़ेगा।
भारतीय संस्कृति के प्रति अंग्रेज शासकों का रवैया
भारतीय संस्कृति के प्रति अंग्रेजी शासकों के व्यवहार तीन ऐतिहासिक चरणों से होकर गुजरा। पहला चरण 1600 ईस्वी है, जब अंग्रेज भारत आए थे और व्यापारी के रूप में बांबे, मद्रास और कलकत्ता में अपनी बस्तियां बसाई थी। यह चरण 1757 तक चला जब उन्होंने पलासी की लड़ाई लड़ी। इस काल में भारतीय संस्कृति के प्रति अंग्रेजों का व्यवहार बिल्कुल अगर था क्योंकि वो व्यापारी के रूप में भारत पैसा कमाने के लिए आए थे, इसलिए उन्हें भारतीय संस्कृति में रूचि नहीं थी।
दूसरा चरण 1757 से 1857 ईस्वी यानी भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम, जिसे सिपाही विद्रोह भी कहा जाता है, तक चला। पलासी की लड़ाई 1757 में लड़ी गई और इसके बाद बंगाल की दीवानी मुगल शासकों ने अंग्रेजों को दे दी। उस वक्त बंगाल में बिहार और उड़ीसा भी शामिल था। पूरा बंगाल अंग्रेजों की हुकूमत के अंदर आ गया। 1757 से 1857 तक अंग्रेजों ने भारतीय संस्कृति को गंभीरता से अध्ययन किया और कुछ अहम योगदान भी दिया, खासकर भारतीय सांस्कृतिक ज्ञान को पश्चिमी देशों में फैलाने में।
तीसरा चरण 1857 के सिपाही विद्रोह और इसे ब्रिटिश शासकों द्वारा क्रूरता पूर्वक कुचलने के बाद से शुरू हुआ। 1857 के बाद तो अंग्रजों ने निश्चिय कर लिया कि वो शासन के प्रति ऐसा विद्रोह दोबारा नहीं होने देंगे। इसके लिए उन्होंने दो काम किए-(1) भारत में उन्होंने भारतीय सेना में सैनिकों, खासकर अंग्रेजी सैनिकों की संख्या बढ़ाई, शस्त्र भंडारों को यूरोपीय सैनिकों के हाथों में सौंप दिया। (2) अंग्रेजों ने जानबूझकर भारतीय लोगों को हतोत्साहित और अपमानित करना शुरू कर दिया। इसके लिए उन्होंने इस तरह का दुष्प्रचार फैलाना शुरू कर दिया कि अंग्रेजों के आने से पहले भारतीय लोग सिर्फ मुर्खों और गुलामों की प्रजाति के थे। उनकी संस्कृति मुर्खों और गुलामों की रही है और भारतीय संस्कृति में कुछ भी अच्छा नहीं है। ये सब जानबूझकर किया गया ताकि भारतीय लोगों को लगने लगे कि वो हीनतर प्रजाति से हैं और अंग्रेज उनके स्वामी है। अंग्रेजों के शासन के तीसरे चरण का नतीजा है कि हम अपने महान पूर्वजों के योगदान, खासकर विज्ञान के क्षेत्र में योगदान को भूल गए। दूसरे चरण में तो अंग्रेजों को भारती संस्कृति में थोड़ी रुचि थी और उन्होंने इसका अध्ययन किया।
ऐसे ही अंग्रेजों में सबसे पहले नाम आता है सर विलियम जोन्स का, जो 1783 में कलकत्ता सुप्रीमकोर्ट के जज के रूप में भारत आए। वह बचपन से ही अत्यंत विलक्षण प्रतिभा के धनी थे, जिन्होंने छोटी उम्र में ही, ग्रीक, लैटिन, पर्सियन, अरबी, हिब्रू जैसी भाषाओं पर एकाधिकार हासिल कर लिया। उन्होंने ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में पढ़ाई की और एक वकील बनने के लिहाज से बार परीक्षा पास की। जब वो भारत आए तो उन्होंने सुना कि भारत में भी एक प्राचीन भाषा संस्कृत है, इसमें उनकी रुचि जगी और उन्होंने इसके अध्ययन का फैसला किया। नतीजा हुआ कि वो एक शिक्षक की तलाश में जुट गए। आखिरकार कलकत्ता के भीड़भाड़ वाले इलाके में एक धुप्प अंधेरे कमरे में रहने वाले बंगाली ब्राह्मण रामलोचन कवि भूषण उन्हें शिक्षक के रूप में मिल गए। सर विलियम जोन्स अपने शिक्षक के पास संस्कृत सीखने के लिए व्यक्तिगत रूप से जाने लगे। सर जोन्स ने अपने संस्मरण में लिखा कि जब उनकी पढ़ाई पूरी होती तो वो देखते थे कि उनके शिक्षक रामलोचन उस जगह की सफाई करते, जहां जोन्स बैठते थे, ऐसा इसलिए कि रामलोचन उन्हें मलेच्छ मानते थे। हालाकि सर जोन्स ने इसे अपना अपमान नहीं माना और विचार किया कि उन्हें अपने शिक्षक के रीति-रिवाजों को मानना चाहिए।
संस्कृत भाषा में दक्षता हासिल करने के बाद सर विलियम जो्स ने कलकता में एशियाटिक सोसायटी की स्थापना की और कालिदास के अभिज्ञान शाकुंतलम सहित दूसरे कई संस्कृत ग्रंथों का अंग्रेजी में अनुवाद किया। उनका ये अनुवाद जर्मनी के महान विद्वान गोथे को बेहद अच्छी लगी और उन्होंने इसकी बेहद प्रशंसा की। सर जोन्स ने साबित किया कि संस्कृत भाषा ग्रीक और लैटिन के बेदह करीब है। वास्तव में संस्कृत लैटिन से ज्यादा ग्रीक के करीब है क्योंकि संस्कृत में तीन वचन होते हैं, एकवचन, द्विवचन और बहुवचन। ग्रीक में भी जैसा ही होता है, जबकि लैटिन में दो वचन ही होते हैं जैसा कि अंग्रेजी, हिंदी और दूसरी कई भाषाओं में।
इस प्रकार सर विलियम जोन्स ने बताया कि संस्कृत, ग्रीक और लैटिन समान भाषा से पैदा हुए हैं और वो भाषा के तुलनात्मक अध्ययन के जनक माने जाने लगे।
दूसरे ब्रिटिश विद्वानों ने भी भारतीय संस्कृति पर शोध किया, यहां सबके बारे में विस्तार से बताने की जरूरत नहीं है, क्योंकि इसमें काफी समय लगेगा।
यहां यह उल्लेखनीय है कि भारतीय विद्वानों की महान उपलब्धियों, जिनका जिक्र संस्कृत भाषा में है, से ये पश्चिमी विद्वान हतप्रभ थे।
आधुनिक भारत में विज्ञान की स्थिति-
जैसा कि ऊपर कहा गया है कि एक समय था जब भारत विज्ञान के क्षेत्र में विश्व में अग्रणी था। अरब और चीन के विद्वान छात्र बनकर नालंदा, तक्षशिला, विक्रमशिला, उज्जैन विश्वविद्यालयों में हमसे सीखने के लिए भारत आते थे, लेकिन बड़ा ही दुखद है कि आज हम आधुनिक विज्ञान में पश्चिमी दुनिया से बहुत ही पीछे हैं। इसमें संदेह नहीं है कि हमारी मातृभूमि ने सीवी रमन, चंद्रशेखर, रामानुजन, सतेंद्रनाथ बोस, जगदीशचंद्र बोस, मेघनाद साहा जैसे महान वैज्ञानिकों और गणितज्ञों को पैदा किया, लेकिन ये बीते जमाने की बात है।
हालांकि ऐसा नहीं है कि हममें वंशानुगत दोष पैदा हो गया है, बल्कि कुछ ऐतिहासिक कारणों के चलते ऐसा हुआ है। वास्तव में कैलिफोर्निया के सिलिकन वैली में भारतीय वैज्ञानिकों का दबदबा है। अमेरिका के ज्यादा विश्वविद्यालयों में विज्ञान और गणित के शिक्षक भारतीय हैं। इसलिए आधुनिक विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में भारत के पिछड़ेपन का कारण वंशानुगत दोष नहीं है, बल्कि कुछ अन्य वजह है। हमारे पास वैज्ञानिक विरासत और ज्ञान की बहुत बड़ी पूंजी है जो आधुनिक युग में विज्ञान के क्षेत्र में झंडा गाड़ने के लिए हमें नैतिक साहस और ताकत दे सकती है।

रविवार, 4 नवंबर 2012

संस्कृत भाषा और भारत में वैज्ञानिक विकास, भाग-7


यह लेख सुप्रीमकोर्ट के पूर्व न्यायमूर्ति और भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष जस्टिस मार्कंडेय काट्जू के उस अभिभाषण का अनुवाद है, जो उन्होंने 27 नवंबर 2011को काशी हिंदी विश्वविद्यालय, वाराणसी में दिया था। 
हालांकि दूसरे प्रमाण भी हैं जैसे अनुमान(हस्तक्षेप), शब्द(विशेषज्ञ या अधिकृत व्यक्ति की उक्ति) आदि। इसलिए अधिकतर वैज्ञानिक ज्ञान अनुमान प्रमाण से संबंध रखता है। उदाहरण के लिए, रदरफोर्ड ने अपनी आंखों से परमाणु को नहीं देखा, लेकिन अल्फा किरणों( धनात्मक हिलियम आयन है) विचलन का अध्ययन कर अनुमान प्रमाण के आधार निर्णय किया कि परमाणु के नाभिक में धनात्मक कण हैं, जिसके चारों ओर ऋणात्मक इलेक्ट्रॉन चक्कर लगाता है। ठीक इसी तरह प्रत्यक्ष प्रमाण के आधार पर ब्लैक होल यानी कृष्ण विवर को भी जाना नहीं जा सकता है(क्योंकि इससे प्रकाश नहीं निकलता), लेकिन आकाशीय पिंडों पर अदृष्य पिंडों के गुरुत्वाकर्षण बल की मौजूदगी के आधार पर हम ब्लैक होल या कृष्ण विवर की मौजूदगी का अनुमान लगाते हैं।
न्याय-मीमांसा के ज्ञान-मीमांसा में तीसरा प्रमाण है शब्द प्रमाण। यह किसी भी खास क्षेत्र में विशेषज्ञ या प्रतिष्ठित या अधिकृत व्यक्ति का वाक्य है। हम इनके प्रमाण को नहीं समझ पाने के बावजूद ऐसे वाक्यों को सत्य मानते हैं, क्योंकि जिसने ऐसा कहा है उसकी उस क्षेत्र में प्रतिष्ठा है।






उदारहण के लिए E=MC2 को बतौर शब्द प्रमाण के रूप में स्वीकार करते हैं क्योंकि यह कथन आइँस्टीन का है, जिन्होंने सैद्धांति भौतिकीविद् के रूप में प्रतिष्ठा पाई है। हालांकि हम अभी ये समझ नहीं पाये हैं कि वो किस तरह इस समीकरण पर पहुंचे(इसके लिए उच्च गणित और भौतिक ज्ञान की आवश्यकता है जो हमारे पास नहीं है)। ठीक इसी तरह हम डॉक्टर की बात को भी स्वीकारते हैं क्योंकि वो रोग विशेषज्ञ है।
न्याय-मीमांसा का अगला प्रमाण उपमा है, लेकिन यहां इसके वर्णन की जरूरत नहीं है।
जैसा कि पहले ही कहा जा चुका है कि न्याय-दर्शन वैज्ञानिक दृष्टिकोण को प्रस्तुत करता है और यह प्रत्यक्ष प्रमाण पर ज्यादा जोर देता है(हालांकि कभी-कभी ये भी भ्रमपूर्ण या मृग-मारीचिका जैसा हो सकता है) यही आधार विज्ञान का भी है क्योंकि विज्ञान में हम निरीक्षण, परीक्षण और तार्किक व्याख्या पर जोर देते हैं।
ये भी कहा जा सकता है कि यह जरूरी नहीं है कि प्रत्यक्ष प्रमाण हर मामले में सत्य का ज्ञान दे। उदाहरण के लिए हम देखते हैं कि सुबह में सूर्य पूर्व से उदित होता है, दोपहर में यह हमारे सिर के ऊपर आ जाता है और शाम में यह पश्चिम में अस्त हो जाता है। अगर हम सिर्फ प्रत्यक्ष प्रमाण पर निर्भर करें तो हमारा निष्कर्ष होगा कि सूर्य पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगाता है, हालांकि महान वैज्ञानिक और खगोलशास्त्री आर्यभट्ट ने अपनी पुस्तक आर्यभट्टियम में लिखा है कि अगर हम माने कि पृथ्वी अपने अक्ष पर धूम रही है तो ऐसा ही दृश्यगत प्रभाव उत्पन्न होगा। दूसरे शब्दों में अगर पृथ्वी अपने अक्ष पर घूर्णन कर रही है तो प्रतीत होगा कि सूर्य पू्र्व उदित होता है और पश्चिम में अस्त होता है। इसलिए प्रत्यक्ष प्रमाण के अलावा हम तर्कबुद्धि का भी इस्तेमाल करते हैं क्योंकि अकेले निरीक्षण हमें सत्य ज्ञान की ओर नहीं ले जाएगा।
यह कहा जा सकता है कि न्याय-दर्शन ने तर्क और विज्ञान के आवश्यक तार्किक चिंतन को अरस्तु और अन्य ग्रीक विचारकों से भी विकसित रूप में प्रस्तुत किया(देखे डीपी चट्टोपाध्यय की पुस्तक)
इसप्रकार, प्राचीन भारत में न्याय दर्शन ने विज्ञान के विकास को अहम समर्थन और प्रोत्साहन दिया। यह उल्लेख किया जा सकता है कि न्याय दर्शन एक सत दर्शन है यानी भारतीय दर्शन के छह परंपरागत दर्शनों में से एक। यह चार्वाक जैसे गैर-परंपरागत दर्शन का हिस्सा नहीं है। यही कारण है कि हमारे महान वैज्ञानिक परंपरावादियों द्वारा तंग या परेशान नहीं किए गए क्योंकि वो कह सकते थे कि वो जो कुछ कर या कह रहे हैं वो परंपरागत दर्शन यानी न्याय-दर्शन पर आधारित है। यह यूरोप के परंपरावादी चिंतन से बिल्कुल अलग है, जहां महान वैज्ञानिक गैलिलियो को चर्चों द्वारा परेशान किया गया क्योंकि उनका चिंतन और काम बाइबिल से अलग था। भारत के साथ ऐसा हादसा नहीं हुआ, यहां की परंपरावादी सोच ही वैज्ञानकि विचार, तर्क या तर्क विज्ञान का समर्थन करती है।
प्राचीन भारत में हर कहीं वाद-विवाद या शास्रार्थ होते थे, जिसमें बड़ी बड़ी सभाओं में विचारों पर तर्क-वितर्क, दूसरे विचारों की आलोचना और विरोध की अनुमति थी। विचारों और अभिव्यक्ति की ऐसी स्वतंत्रता ने विज्ञान के विकास में अहम योगदान दिया क्योंकि विज्ञान के लिए स्वतंत्रता, चिंतन की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वंतत्रता और असहमति की स्वतंत्रता की आवश्यकता होती है। महान वैज्ञानिक चरक ने अपनी पुस्तक चरक संहिता में लिखा है कि विज्ञान के विकास के लिए वाद-विवाद, खासकर समान मानसिक स्तर वालों के बीच वाद-विवाद या शास्रार्थ परम आवश्यक है।
प्राचीन न्याय शास्रों, जिनमें गौतम का न्याय सूत्र में वाद-विदाद के कई तरीकों का वर्णन है जैसे, वद, जल्प, वितंड आदि। गौतम के बाद के न्याय दर्शन के जानकारों ने इसे और परिमार्जित किया।
विज्ञान के प्रगति और विकास को प्रोत्साहित करने वाले दो कारकों के उल्लेख के बाद अब हम अपने महान वैज्ञानिकों द्वारा विज्ञान के विभिन्न विषयों में योगदान की चर्चा करते हैं।
गणित
गणित के क्षेत्र में प्राचीन विश्व की सबसे महान और क्रांतिकारी वैज्ञानिक उपलब्धियों में दाशमिक प्रणाली का नाम सबसे ऊपर है। यूरोपीय लोगों द्वारा दाशमिक अंक प्रणाली को अरबी अंक प्रणाली नाम दिया गया, लेकिन अरबी विद्वान इसे हिंदू अंक प्रणाली मानते हैं। क्या ये अरबी अंक प्रणाली है या हिंदू। इस संदर्भ में यह उल्लेख करना आवश्यक है कि ऊर्दू, फारसी और अरबी भाषाएं दायीं से बायीं ओर लिखी जाती है, लेकिन अगर आप इन भाषायों को बोलने वाले लोगों से कोई संख्या, मान लीजिए 257 लिखने के लिए कहिए तो इस संख्या को बायीं से दायीं ओर ही लिखेंगे। यह दिखाता है कि ये संख्याएं उस भाषा से ली गई है जो बायीं से दायीं ओर लिखी जाती है। अब यह मान्य हो चुका है कि ये संख्याएं भारत से आई हैं और अरबों ने हमसे इसका नकल किया है।
अब मैं दाशमिक प्रणाली के क्रांतिकारी महत्व का जिक्र करूंगा। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि प्राचीन रोम, जार और अगस्तस की सभ्यता निस्संदेह एक महान सभ्यता थी, मगर आप अगर किसी प्राचीन रोमन से एक मिलियन लिखने के लिए कहेंगे तो वो पागल हो जाएगा, क्योंकि एक मिलियन लिखने के लिए उसे एक मिलेनियम या एक हजार(इसका प्रतीक M) उसे एक हजार बार लिखना पड़ेगा। रोमन अंक प्रणाली में एक हजार यानी M से बड़ा अंक नहीं होता है। उसे दो हजार लिखने के लिए दो बार MM लिखना पड़ेगा। तीन हजार लिखने के लिए तीन बार MMM लिखना पड़ेगा। इसी तरह एक मिलियन यानी दस लाख लिखने के लिए एक हजार बार M लिखना पड़ेगा।
दूसरी ओर, हमारी दाशमिक प्रणाली में एक एक मिलियन यानी दस लाख लिखने के लिए एक के बाद छह शून्य 1000000 ळिखना पड़ेगा। रोमन अंक प्रणाली में शून्य नहीं है। शून्य भारत की खोज है और इसकी खोज के बगैर प्रगति संभव नहीं है।
हम यहां अपने महान गणितज्ञों जैसे आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त, भास्कर, बराहमिहिर जैसे अनगिनत वैज्ञानिकों के महान योगदानों की विस्तृत चर्चा नहीं करने जा रहे हैं, इनके बारे में आप गूगल में सर्च कर सकते हैं। हालांकि इस सिलसिले में हम यहां सिर्फ दो उदाहरण देंगे।
भारतीय दाशमिक प्रणाली में संख्या 1,00,000 एक लाख कहते हैं। 100 लाख एक करोड़ कहता है। 100 करोड़ एक अरब, 100 अरब एक खरब, 100 खरब एक नील, 100 नील एक पद्म, 100 पद्म एक शंख और 100 शंख एक महाशंख कहलाता है। इस प्रकार एक महाशंख लिखने के लिए एक पर उन्नीस शून्य लिखा जाता है(ज्यादा जानकारी के लिए गूगल पर मौजूद वीएस आप्टे की संस्कृत-इंगलिश डिक्शनरी देख सकते हैं) दूसरी ओर, प्राचीन रोम के लोग एक हजार से ज्यादा की संख्या एम को बार-बार और बहुत बार दुहराए बगैर नहीं लिख सकते हैं।
एक दूसरा उदारहण लीजिए, अग्नि पुराण के मुताबिक, कलियुग, जिसमें हम रहते हैं, चार लाख बत्तीस हजार वर्षों का का है। इससे पहले का युग द्वापर कलियुग से दुगुने काल का था, द्वापर से पहले का त्रेता युग कलियुग से तीन गुना और इससे पहले का सतयुग कलियुग से चार गुना काल का था। चार युग मिलाकर कुल तैंतालिस लाख बीस हजार वर्षों का है। छप्पन चतुर्युग मिलकर एक मन्वंतर कहलाता है। चौदह मन्वंतर एक कल्प, बारह कल्प एक बह्म कहलाता है। इस तरह ब्रह्म अरबों और खरबों वर्ष का होगा।
भारत के परंपरावादी लोग जब प्रतिदिन संकल्प करते हैं तो उन्हें अपने का युग, कलियुग, द्वापर, त्रेता, सतयुग के साथ चतुर्युगी, मन्वंतर, कल्प, बह्म के ठीक वही दिन, महीना, और साल, जिसमें वो रहते हैं का जिक्र करना होता है। ऐसा कहा जाता है कि हम वर्तमान मन्वंतर के 28वें चतुर्युगी में जी रहे हैं। ये भी कहा जाता है कि कल्प का आधा मन्वंतर समाप्त हो चुका है, जबकि आधा मन्वंतर बाकी है। इस समय हम वैवश्वत मन्वंतर में जी रहे हैं।
भले ही कोई हमारी व्यवस्था में विश्वास नहीं करे, लेकिन हमारे पूर्वजों की संकल्पना की उड़ानों से आश्चर्यचकित हुए बगैर नहीं रह सकता है, जिन्होंने इतिहास के अरबों और खरबों वर्षों की कल्पना की।
र्यभट्ट ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक आर्यभट्टियम में बीजगणित, अंकगणित, त्रिकोणमिति, द्विघात समीकरण और साइन तालिका के बारे में लिखा। उन्होंने पाई का मान 3.1416 ज्ञात किया जो पाई के वास्तविक मान के अत्यंत निकट है। आर्यभट्ट के कार्यों को पहले ग्रीक और बाद में अरबों ने ग्रहण किया।
हम यहां ब्रह्मगुप्त, भास्कराचार्य, वराहमिहिर के योगदानों की चर्चा नहीं करेंगे, क्योंकि इसमें काफी समय लग जाएगा।
आगे हम खगोलशास्त्र के बारे में चर्चा करेंगे...