हिंदी शोध संसार
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गुरुवार, 24 जून 2010

सबल बनाएं हिंदी विकी को

SHOT

रविवार, 2 मई 2010

हिंदी विकिपीडिया के बारे में बहुत कुछ

रविवार, 28 फ़रवरी 2010

इस तरह मेरे औकात का पता चल गया

एक मित्र का फोन आया. उसने पूछा, यार कहां हो. मैंने जवाब दिया, घर पर हूं, कहो, क्या बात है.
उसने कहा, नानाजी देशमुख के बारे में थोड़ा विस्तार से बता सकते हो.
मैंने पूछा, कौन नानाजी देशमुख?
उसने कहा, नहीं जानते हो तो जल्दी पता करो, मुझे सिर्फ इतना पता है कि वे एक सांसद और समाजसेवी थे.
मैंने कहा, पता करना पड़ेगा, आधे घंटे बाद फोन करो तो कुछ बता सकूंगा.
उसने कहा, ठीक आधे घंटे में फोन करता हूं.
और फोन कट गया.
मैंने नेट कनेक्ट किया और नानाजी के बारे में खोज शुरू कर दिया. हिंदी विकिपीडिया पर नानाजी देशमुख सर्च मारा. पांच सात पंक्तियों में उनके बारे में जानकारी दी(उतनी ही, जितनी मेरे दोस्त ने दी थी) जो नाकाफी थे. मजबूर होकर अंग्रेजी विकिपीडिया की शरण में गया, वहां उतनी जानकारी थी, जितनी की हमें तत्काल जरूरी थी.
मैंने पूरी शिद्दत से जल्दबादी में ही सही, पूरा लेख पढ़ डाला. आधे घंटे के अंदर मेरे दोस्त का फोन आया और मैंने उसे संक्षेप में बताकर उससे धन्यवाद पाया.
अपने दोस्त का धन्यवाद पाकर भी मैं खुश नहीं था, बहुत शर्मिंदगी महसूस कर रहा था. मेरे उस दोस्त ने अंजाने में ही मुझे मेरी औकात बता दी. दरअसल मैं उस महापुरूष के बारे में नहीं जानता था, जिसके बारे में जानना चाहिए था. एक महापुरूष जिसने स्वतंत्र भारत में भारत को स्वतंत्रता का पाठ पढ़ाया, जिसने अपने सिद्धांतो पर जिया. जब राजनीति के शिखर पर थे, तब उन्होंने राजनीति छोड़ दी. वो सिर्फ इसलिए कि उसे समाज के सबसे निचले और शोषित तबके से संवाद स्थापित करना था. उसके जीवन में रोशनी लानी थी. पृष्ठभूमि से अगर वे आरएसएस के नहीं होते तो वे मीडिया में चर्चा पाते और मुझ जैसा अदना व्यक्ति भी उन्हें जानता. पर ऐसा नहीं हुआ.
अभी एक रोज पहले ही मेरे कुछ साथ चर्चा कर रहे थे कि भारत में ऐसा एक भी व्यक्ति नहीं बचा जो निस्वार्थ भाव से मानवता की सेवा करता हो. मैं यह मानने के लिए तैयार नहीं हुआ. मेरा मानना था कि ये अलग बात है कि हम उनके बारे में नहीं जानते हैं क्योंकि कलाम के अनुसार, हमारी मीडिया निगेटिव ऑब्सेस्ड है. उसे पॉजिटिव खबरों से कोई लेना देना नहीं रहता है. अगर किसी पॉजिटिव खबर की आस रहती है तो वो ईसाई मिशनरियों के पॉप और फादर की पॉजिटिव स्टोरी छपती है कि कैसे उसने फलां भाग का कायाकल्प कर दिया. अगर व्यक्ति आरएसएस से जुड़ा तो उसे अछूत करार दिया जाता है. खैर अभी मीडिया की भूमिका के बारे में ज्यादा चर्चा करना नहीं है.
मैं दिनभर नानाजी पर अंग्रेजी विकिपीडिया से लेख का अनुवाद करता रहा. शाम तक मैंने हिंदी विकिपीडिया के लिए नानाजी  देशमुख के लिए लेख पूरा कर लिया.
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नानाजी देशमुख

नानाजी देशमुख (जन्म- ११ अक्तूबर, सन् १९११- निधन- 27 फरवरी, 2010) भारत के एक प्रसिद्ध समाजसेवी थे। वे पूर्व में भारतीय जनसंघ के नेता थे। वे भारत के ऊपरी सदन राज्यसभा के सदस्य भी थे।

आरम्भिक जीवन

नानाजी का जन्म महाराष्ट्र के परभनी जिले के कदोली नामक छोटे से कस्बे में ग्यारह अक्टूबर १९११ में हुआ था। नानाजी का लंबा और घटनापूर्ण जीवन अभाव और संघर्षों में बीता. उन्होंने छोटी उम्र में ही अपने माता-पिता को खो दिया. मामा ने उनका लालन-पालन किया. बचपन अभावों में बीता। उनके पास शुल्क देने और पुस्तकें खरीदने के लिये पैसे नहीं थे किन्तु उनके अन्दर शिक्षा और ज्ञानप्राप्ति की उत्कट अभिलाषा थी। अत: इस कार्य के लिये उन्होने सब्जी बेचकर पढ़ाई के लिए पैसे जुटाते थे. वे मंदिरों में रहे और पिलानी के बिरला इंस्टीट्यूट में उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की. बाद में तीस के दशक में वे आरएसएस में शामिल हो गए. भले ही उनका जन्म महाराष्ट्र में हुआ, लेकिन उनका कार्यक्षेत्र राजस्थान और उत्तरप्रदेश में रहा. उनकी श्रद्धा देखकर आरएसएस सरसंघचालक श्री गुरू जी ने उन्हें प्रचारक के रूप में गोरखपुर भेजा. बाद में वे उत्तरप्रदेश के प्रांत प्रचारक बने.

आरएसएस कार्यकर्ता के रूप में

नानाजी देशमुख लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के राष्ट्रवादी विचारधारा से प्रेरित हुए. तिलक से प्रेरित होकर उन्होंने समाज सेवा और सामाजिक गतिविधियों में रूचि ली. आरएसएस के डॉ केशब बलिराम हेडगेवार से उनके पारिवारिक संबंध थे. हेडगेवार ने नानाजी में छिपी प्रतिभा को पहचान लिया और आरएसएस की शाखा में आने के लिए प्रेरित किया.
1940 में, डॉ केशव बलिराम हेडगेवार के निधन के बाद उन्हें कई युवकों को महाराष्ट्र की आरएसएस शाखा में शामिल होने के लिए प्रेरित किया. नानाजी ऐसे लोगों में से थे जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन राष्ट्र की सेवा में अर्पित करने के लिए आरएसएस से जुड़े. वे प्रचारक के रूप में उत्तरप्रदेश भेजे गए. आगरा में वे पहलीबार डॉ दीनदयाल उपाध्याय से मिले. बाद में नानाजी गोरखपुर गए जहां उन्होंने लोगों को संघ की विचारधारा के बारे में बताया. ये कार्य बिल्कुल ही आसान नहीं था, संघ के पास दैनिक खर्च के लिए भी धन नहीं थे. उन्हें धर्मशालाओं में ठहरना पड़ता था. उन्हें लगातार धर्मशाला बदलना पड़ता था, क्योंकि एक धर्मशाला में लगातार तीन दिनों से ज्यादा समय तक ठहरने नहीं दिया जाता था. अंत में बाबा राघवदास ने उन्हें इस शर्त पर ठहरने दिया कि वे उनके लिए खाना बनाएंगे. तीन साल के अंदर उनकी मेहनत ने रंग लाई और गोरखपुर के आसपास करीब 250 संघ की शाखाएं खुल गई. नानाजी ने हमेशा शिक्षा पर बहुत जोर दिया. उन्होंने 1950 में गोरखपुर में पहले सरस्वती शिशु मंदिर की स्थापना की.
1947 में, आरएसएस ने राष्ट्रधर्म और पांचजन्य नामक दो पत्रिकाओं और स्वदेश नामक पत्र की शुरूआत करने का फैसला किया. श्री अटल बिहारी वाजपेयी को संपादन और दीन दयाल उपाध्याय को मार्गदर्शन, जबकि नानाजी को प्रबंध निदेशक की जिम्मेदारी सौंपी गई. पैसे के अभाव में पत्र और पत्रिकाओं का प्रकाशन संगठन के लिए मुश्किल कार्य था, लेकिन इससे उनके उत्साह में कमी नहीं आई और सुदृढ राष्ट्रवादी सामाग्री के कारण इन प्रकाशनों को लोकप्रियता और पहचान मिली. 1948 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या के बाद आरएसएस पर प्रतिबंध लगा दिया गया, जिससे इन प्रकाशन कार्यों पर असर पड़ा. उन दिनों भूमिगत होकर इनका प्रकाशन कार्य जारी रहा.

राजनीतिक जीवन

जब आरएसएस पर से प्रतिबंध हटा तो फैसला राजनीतिक संगठन भारतीय जन संघ की स्थापना का फैसला हुआ. श्री गुरूजी ने नानाजी को उत्तरप्रदेश में भारतीय जन संघ के महासचिव का प्रभार लेने को कहा. नानाजी का जमीनी कार्य उत्तरप्रदेश में पार्टी को स्थापित करने में अहम भूमिका निभायी. 1957 तक भाजपा ने उत्तरप्रदेश के सभी जिलों में अपनी ईकाई बनाई. इस दौरान नानाजी ने पूरे उत्तरप्रदेश का दौरा किया. जल्द ही भारतीय जनसंघ उत्तरप्रदेश की प्रमुख शक्ति बन गई. 1967 में भारतीय जनसंघ संयुक्त विधायक दल का हिस्सा बन गया और चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व में सरकार में शामिल हो गई. नानाजी के चौधरी चरण सिंह और डॉ राम मनोहर लोहिया से अच्छे संबंध थे, इसलिए गधबंधन में उन्होंने अहम भूमिका निभायी. उत्तरप्रदेश की पहली गैर-कांग्रेसी सरकार के गठन में विभिन्न राजनीतिक दलों को एकजुट करने में नानाजी जी ने अहम भूमिका निभायी. उत्तरप्रदेश की बड़ी राजनीतिक हस्ती चंद्रभानु गुप्ता को नानाजी की वजह से तीन बार कड़ी चुनौती का सामाना करना पड़ा. एकबार, राज्यसभा चुनाव में कांग्रेसी नेता और चंद्रभानु के पसंदीदा उम्मीदवार को हराने के लिए उन्होंने रणनीति बनाई. 1957 में जब गुप्ता स्वयं लखनऊ से चुनाव लड़ रहे थे, तो नानाजी ने समाजवादियों से साथ गठबंधन बनाकर बाबू त्रिलोकी सिंह को बड़ी जीत दिलाई. 1957 में गुप्ता को दूसरी बार हार को मुंह देखना पड़ा. उत्तरप्रदेश में भाजपा ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय की दृष्टि, अटल बिहारी वाजपेयी के वक्तृत्व और नानाजी के संगठनात्मक कार्यों के कारण भारतीय जनसंघ महत्वपूर्ण राजनीतिक शक्ति बन गया. न सिर्फ पार्टी कार्यकर्ताओं से बल्कि विपक्षी दलों के साथ भी नानाजी के संबंध अच्छे थे. श्री चंद्रभानु गुप्ता, जिन्हें नानाजी के कारण कई बार चुनावों में हार का सामना करना पड़ा, नानाजी का खूब सम्मान करते थे और उन्हें प्यार से नाना फड़नवीस कहते थे. डॉ राम मनोहर लोहिया से उनके अच्छे संबंधों ने भारतीय राजनीति की दशा-दिशा बदल दी. एकबार नानाजी ने डॉ लोहिया को भारतीय जनसंघ कार्यकर्ता सम्मेलन में बुलाया, जहां लोहिया की मुलाकात दीन दयाल उपाध्याय से हुई. दोनों के जुड़ाव से भाजस समाजवादियों के करीब आया, दोनों ने कांग्रेस और उसके कुशासन का पर्दाफाश कर दिया. नानाजी विनोबा भावे के भूदान आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल हुए. दो महीनों तक विनोबा के साथ रहे. वे आंदोलन से प्रभावित हुए. जेपी आंदोलन में जब जयप्रकाश पर पुलिस ने लाठियां बरसाई. उस समय नानाजी ने जयप्रकाश को सुरक्षित निकाल लिया. जिसमें नानाजी को चोटें आई और इनका एक हाथ टूट गया. बाद में जयप्रकाश नारायण और पूर्व पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी ने नानाजी के साहस की भूरि-भूरि प्रशंसा की. उन्हें पुरस्कार के तौर पर उन्हें मंत्रिमंडल में बतौर उद्योग मंत्री शामिल होने का न्यौता भी दिया, लेकिन नानाजी ने इनकार कर दिया. आपातकाल हटने के बाद चुनाव हुए, जिसमें बलरामपुर लोकसभा सीट से नानाजी सांसद चुने गए. 1980 में साठ साल की उम्र में उन्होंने सक्रिय राजनीति से संन्यास लेकर आदर्श की स्थापना की. बाद में उन्होंने अपना पूरा जीवन सामाजिक और रचनात्मक कार्यों में लगा दिया. वे आश्रमों में रहे और कभी अपना प्रचार नहीं किया. जय प्रकाश नारायण के आह्वान पर उन्होंने संपूर्ण क्रांति को पूरा समर्थन दिया. जनता पार्टी से संस्थापकों में नानाजी प्रमुख थे. कांग्रेस को सत्ताच्यूत तक जनता पार्टी सत्ता में आई. नानाजी दीनदयाल शोध संस्थान की स्थापना की और उसमें सेवा दी. उन्होंने चित्रकूट में चित्रकूट ग्राम्योदय विश्वविद्यालय की स्थापना की. यह भारत का पहला ग्रामीण विश्वविद्यालय है और वे इसके पहले कुलाधिपति थे. 1999 में एनडीए सरकार ने उन्हें राज्यसभा से सांसद बनाया.
पंडित दीनदयाल उपाध्याय की हत्या उनके लिए बहुत बड़ी क्षति थी. और उन्होंने दिल्ली में अकेले दम पर दीनदयाल शोध संस्थान की स्थापना की और देश में रचनात्मक कार्य आंदोलन को समर्पित कर दिया. उन्होंने गरीबी निरोधक और न्यूनतम आवश्यकता कार्यक्रम चलाया. उन्होंने कृषि, कुटीर उद्योग, ग्रामीण स्वास्थ्य और ग्रामीण शिक्षा पर बल दिया. राजनीति से हटने के बाद उन्होंने संस्थान का अध्यक्ष पद संभाला और संस्थान की बेहतरी में अपना सारा समय अर्पित कर दिया. उन्होंने मंथन पत्रिका प्रकाशित किया जिसका कई वर्षों तक के आर मलकानी ने संपादन किया. नानाजी ने उत्तरप्रदेश और महाराष्ट्र के सबसे पिछड़े जिलों गोंडा और बीड में बहुत से सामाजिक कार्य किए. उनके द्वारा चलाई गई परियोजना का उद्देश्य था- हर हाथ को काम और हर खेत को पानी. 1969 में वे पहली बार चित्रकूट आए और अंतिम रूप से वे चित्रकूट में बस गए. उन्होंने भगवान श्रीराम की कर्मभूमि चित्रकूट की दुर्दशा देखी. वे मंदाकिनी के तट पर बैठ गए और अपने जीवन काल में चित्रकूट को बदलने का फैसला किया. अपने वनवास के काल में राम ने दलित जनों के उत्थान का कार्य किया. इससे प्रेरणा लेकर नानाजी ने चित्रकूट कोअपने सामाजिक कार्यों का केंद्र बनाया. उन्होंने सबसे गरीब व्यक्ति की सेवा शुरू की. वे अक्सर कहा करते थे कि वे राजाराम से वनवासी राम की अधिक प्रशंसा करते हैं, इसलिए वे अपना बचा हुआ जीवन चित्रकूट में बिताएंगे. ये वही स्थान है जहां राम ने अपने वनवास के चौदह में से बारह वर्ष गरीबों की सेवा में बिताए. उन्होंने अपने अंतिम क्षण तक इस प्रण का पालन किया. उनका निधन चित्रकूट में २७ फरवरी २०१० को हो गया।

दीनदयाल शोध संस्थान

पंडित दीनदयाल उपाध्याय(1916-1968) प्रणीत एकात्म मानववाद को मूर्त रूप देने के लिए नानाजी देशमुख ने 1972 में नई दिल्ली में दीनदयाल शोध संस्थान की स्थापना की. यह दर्शन समाज के प्रति मानव की समग्र दृष्टि पर आधारित है जो भारत को आत्मनिर्भर बना सकता है. नानाजी देशमुख ने एकात्म मानववाद के आधार पर ग्रामीण भारत के विकास की रूपरेखा रखी. शुरुआती प्रयोगों के बाद उत्तरप्रदेश के गोंडा और महाराष्ट्र के बीड में नानाजी ने गांवों में स्वास्थ्य, सुरक्षा, शिक्षा, कृषि, आय अर्जन, संसाधनों के संरक्षण, सामाजिक विवेक के विकास के लिए एकात्म कार्यक्रम की शुरुआत की. पूर्ण परिवर्तन कार्यक्रम का आधार, लोक सहयोग और सहकार है. चित्रकूट परियोजना या आत्म-निर्भरता के लिए अभियान की शुरूआत 26 जनवरी 2005 में चित्रकूट के आस-पास हुई. जो उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश की सीमा पर स्थित है. इस परियोजना का उद्देश्य 2005 तक इन गांवों में आत्म-निर्भरता हासिल करना था. परियोजना 2010 में पूरी हुई. परियोजना से उम्मीद जगी कि इसके आसपास के पांच सौ गांवों को आत्म-निर्भर बनाया जाए. यह भारत और दुनिया के लिए आदर्श बन सकता है.

प्रशंसा और सम्मान

1999 में नानाजी देशमुख को पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया. पूर्व राष्ट्र एपीजे अब्दुल कलाम ने नानाजी देशमुख और उनके संगठन दीनदयाल शोध संस्थान की प्रशंसा की. इस संस्थान की मदद से सैकड़ों गांवों को मुकदमा मुक्त विवाद सुलझाने का आदर्श बनाया गया. अब्दुल कलाम ने कहा
"चित्रकूट में मैंने नानाजी देशमुख और दीनदयाल उपाध्याय के उनके साथियों से मुलाकात की. दीन दयाल शोध संस्थान ग्रामीण विकास के प्रारूप को लागू करने वाला अनुपम संस्थान है यह प्रारूप भारत के लिए उपयुक्त है. विकास कार्यों से अलग दीनदयाल उपाध्याय संस्थान विवाद-मुक्त समाज की स्थापना में मदद करता है. मैं समझता हूं कि चित्रकूट के आसपास अस्सी गांव मुकदमा-मुक्त है. गांव के लोगों ने सर्वसम्मति से फैसला किया कि किसी विवाद का हल करने के लिए वे वे अदालत नहीं जाएंगे. तय हुआ कि विवाद आपसी सहमति से सुलझा लिए जाएंगे. नानाजी देशमुख के मुताबिक अगर लोग लड़ते झगड़ते रहेंगे तो विकास के लिए समय ही नहीं बचेगा." कलाम के मुताबिक, विकास के इस अनुपम प्रारूप को सामाजिक संगठनों, न्यायिक संगठनों और सरकार के माध्यम से देश के विभिन्न भागों में फैलाया जा सकता है. शोषितों और दलितों के उत्थान के लिए समर्पित नानाजी की प्रशंसा करते हुए कलाम ने कहा कि नानाजी चित्रकूट में जो कर रहे हैं वो अन्य लोगों के लिए आंखें खोलने वाला होना चाहिए.

निधन

नाना जी ने 95 साल की उम्र में देश के पहले ग्रामीण विश्वविद्यालय(जिसकी स्थापना उन्होंने खुद की) में 27 फरवरी 2010 को अंतिम सांस ली. वे पिछले कुछ समय से बीमार थे, लेकिन ईलाज के लिए दिल्ली जाने से मना कर दिया. नाना साहब देश के पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने अपना शरीर मेडिकल शोध के लिए दान करने की इच्छा जताई.
अंत में, सुधि जनों से निवेदन है कि वे विकिपीडिया पर इस लेख को भी संवर्धित और पूर्ण बनाने में विकि का सहयोग करें.

शनिवार, 27 फ़रवरी 2010

हिंदी की मदद आप भी कर सकते हैं

आप अंकुर जी को जानते होंगे, नहीं जानते हैं तो कोई बात नहीं, यहां क्लिक करें. अंकुर भाई ने बहुत अच्छा सवाल किया, पढ़े, आपलोग हिंदी यानी अपनी मातृभाषा के लिए क्या कर रहे हैं. अंकुर भाई यानी एक कंप्यूटर गीक और खूबसूरत लड़कियों को और खूबसूरत बनाने वाले(हा..हा..हा) अंकुर भाई को लगा कि हिंदी को बढ़ावा देने या हिंदी के विकास यानी हिंदी के लिए कुछ करने के नाम पर ज्यादातर लोग बकवास ही कर रहे हैं. ऐसा मानने वालों में मैं भी शामिल हूं. हिंदी में इंटरनेट पर लिखा जा रहा है, बहुत लिखा जा रहा है, लेकिन आप किसी ज्वलंत मुद्दे पर पूर्ण अधिकृत लेख का दावा नहीं कर सकते हैं. लोग लिखते तो हैं, लेकिन जिम्मेदारी लेकर नहीं, जिम्मेदारीपूर्वक नहीं. ऐसे में इस सवाल उठना लाजिमी है कि आप हिंदी या अपनी मातृभाषा के विकास के लिए आप क्या कर रहे हैं.
किसी भी हिंदी प्रेमी के मस्तिष्क में ये प्रश्न उठना स्वाभाविक है. लेकिन इस सवाल का जवाब उतना ही मुश्किल. लेकिन कुछ लोग हिंदी के विकास को लेकर अपने कार्य पर सुलझे हुए है जैसे कि अनुनाद सिंह जी, रवि रतलामी जी आदि आदि.
हिंदी के लिए आप अगर कुछ करना चाहते हैं तो इंटरनेट पर हिंदी में ज्यादा से ज्यादा लिखे, यथासंभव पूर्ण और अधिकृत रूप से लिखने का प्रयास करें. अपनी रचना के लिए जिम्मेदारी लें, उसपर दावा करें.
इंटरनेट पर हिंदी की सशक्त उपस्थिति प्रदान करने का सबसे सशक्त माध्यम है हिंदी विकिपीडिया को शक्तिशाली बनाना. हिंदी विकिपीडिया पर ज्ञान-विज्ञान के करीब-करीब तमाम विषयों पर पूर्ण और अधिकृत लेख बनाने की आवश्यकता है(यहां आप न तो लेख की जिम्मेदारी ले सकते हैं और न ही उस पर दावा कर सकते हैं, लेकिन यहां पर लिखा गया हर एक पूर्ण लेख हिंदी विकिपीडिया को सशक्त बनाएगी और इसी से हिंदी सशक्त होगी)
क्या आपको मालूम है कि अंग्रेजी विकिपीडिया अंग्रेजी भाषा में ज्ञान-विज्ञान का अक्षय-भंडार बन रहा है. अंग्रेजी विकि प्रेमियों की योजना है कि मानव सभ्यता और इतिहास ने पिछले पांच हजार सालों जो कुछ जाना और सीखा है उसे अंग्रेजी विकि-पीडिया में पिरो देना है. क्या हिंदी के लिए ऐसा कुछ नहीं किया जा सकता है. किया जा सकता है. और हम सबको करना होगा, अगर हम और आप हिंदी को सशक्त और संबल बनाना चाहते हैं तो. अगर अंग्रेजी से टक्कर लेना चाहते हैं तो. इसके सिवा कोई चारा नहीं है.
हमारे दोस्तों में एक ने कहा, यार इसबार सैलरी बढ़ेगी. दूसरे न जवाब दिया, यार विकिपीडिया में सर्च मार लेना. पता चल जाएगा. मैंने पूछा कितने लेख लिखे हो हिंदी विकिपीडिया पर. उनका मुंह बंद था(दरअसल, वो लोग मुझे हिंदी विकिपीडिया के दीवाने के रूप में जानते हैं और अक्सर मजाक करते हैं). मैंने विभिन्न लॉग-इन से करीब एक हजार लेख को रूपांतरित, पुनर्लेखन, संवर्धन या आरंभन में योगदान दिया है. क्योंकि जहां तक मैं जानता हूं हिंदी के लिए विकिपीडिया लेखन से बड़ा काम नहीं किया जा सकता है. इंटरनेट पर हिंदी की सशक्त उपस्थिति के लिए हिंदी विकिपीडिया को सशक्त करने से बेहतर दूसरा कोई बेहतर तरीका नहीं दिख रहा है. सिर्फ विकिपीडिया पर लिखना ही काफी नहीं है. हिंदी विकीपीडिया को बेहतर बनाने के लिए आप काम करें, अभियान चलायें, हिंदी प्रेमियो, छात्रों से अपील करें, उन्हें जोड़े, विकि संपादन का तरीका बताएं, इंटरनेट पर हिंदी की सेटिंग समझाएं. यानी विकि को मजबूत करें, हिंदी स्वत: मजबूत हो जाएगी.
विकिपीडिया पर या यूं कहें कि कंप्यूटर पर हिंदी लिखने में अब भी कई लोगों को परेशानी आ रही है. इस बात को सिर्फ एक उदाहरण से समझा जा सकता है.
एक बहुत ही उन्नत ब्लॉग पर कंप्यूटर पर हिंदी नहीं लिख पाने की मजबूरी का बयान किया गया था. मैंने अपने एक मित्र को ऑपन-ऑफिस में हिंदी टाइप करके दिखा दिया तो वो आश्चर्यचकित रह गया और जब मैंने उसे भी ये करना सिखा दिया तो वो मेरा कृतज्ञ (अहसानमंद) हो गया. ऑपन-ऑफिस की बात छोड़िए, किसी भी ऑफिस, वर्ड पैड, नोटपैड, इंटरनेट पर किसी भी पेज में हिंदी सीधे लिखी जा सकती है. बस एक बार एक कंप्यूटर में थोड़ी सैटिंग्स बदलने की जरूरत है. बस वो हिंदी का गुलाम बन जाएगा. जब तक आप कहेंगे नहीं, तब तक वो अंग्रेजी में एक शब्द अंग्रेजी लिख ही नहीं सकता है. मैं पिछले दो साल से कंप्यूटर पर हिंदी लिख रहा हूं, कोई परेशानी नहीं है.
मेरी एक भतीजी अन्नामलाई विश्वविद्यालय में इंजीनियरिंग कर रही है. उसने अपने एक मित्र से पूछा कि मेरे लैपटॉप पर हिंदी सेट कर दो, तो उसने कंप्यूटर और हिंदी कहके हंसा. मेरी भतीजी बोली, अरे अंकल तो अपने कंप्यूटर पर हिंदी में लिखते हैं. तो उसने कहा, हिंदी लिखने के लिए चार हजार का सॉफ्टवेयर आता है. मेरी भतीजी ने मुझसे संपर्क किया. मैंने उसे सैटिंग्स बता दी. जब उसका कंप्यूटर हिंदी लिखने लगा तो वह अपने दोस्त पर गुस्साते हुए कहा, कंप्यूटर के बड़े मास्टर बनते हो, लेकिन इतना भी पता नहीं कि कंप्यूटर पर हिंदी कैसे लिखी जाती है.
कहने का मतलब है कंप्यूटर पर हिंदी लिखी जा सकती है. वो भी आसानी से.
हिंदी को विकि के माध्यम से सशक्त बनाए.

सोमवार, 14 सितंबर 2009

हिंदी दिवस कैसे मनायें

 हिंदी दिवस मनाने के लिए ज्यादा कुछ करने की जरूरत नहीं है,
1. अपने एड्रेसबार पर www.hi.wikipedia.org टाइप करिए. एन्टर करते ही विकिपीडिया का पेज खुलेगा.
2. अपना मनपसंद विषय चुनिए, जिसके बारे में आप जानते हों.
3. उसे विकिपीडिया के खोज विकल्प में खोजिए. वो विषय विकिपीडिया में नहीं है तो लाल रंग से create the page -- on this wiki पर क्लिक करें और उस विषय पर लिख डालें एक लेख.
3. अगर लिखा हुआ है तो दूसरा विषय चुने या उसी को पूर्ण लेख बनाये.
4. आपका हिंदी दिवस उन लोगों से अच्छा होगा, जो हिंदी दिवस पर तथाकथित मठाधीशों और सरकार को गाली देते हैं.
जय हिंदी जय भारत

शनिवार, 24 नवंबर 2007

विकिपीडिया पर संपादन आसान है।

मैंने विकिपीडिया को अपने ब्लोग से जोड़ दिया है। ब्लोग के दायीं और- हिन्दी के गौरव नाम से कुछ संजालों को जोड़ दिया गया है। आप इसमें विकिपीडिया खोजें। क्लिक करते ही आप हिन्दी विकिपीडिया पर चले जायेंगे। करसर नीचे जाएँ-- आपको वर्णमाला के अक्षर दिखेंगे।

मान लीजिये आप लंका-- के बारे में जानकारी रखतें हैं और उस पर लिखना चाहते हैं। ठीक है-- ल अक्षर को क्लिक करिये। आपको शब्दों की एक सूची दिखेगी। उसमें लंका शब्द खोजिये। उसे क्लिक कीजिए। आपको लंका पर एक लेख मिलेगा। इस समय वह लेख पूर्ण नहीं है। आप उसे पूरा करिये।
इसके लिए सबसे ऊपर देखिए-- संपादन करिये लिखा मिलेगा। बस उसे क्लिक करिये। और लिखना शुरू करिये।
एक बात और अपने लेख को सेव करना या सुरक्षित करना न भूलें। आपका लेख सभी हिन्दी भाषी लोगों को मिलेगा। पूरी दुनिया में।
बस हिन्दी को समृद्ध करने में अपना योगदान दीजिए।

हां एक बात जो सबसे जरूरी है-- लेख सबसे लिए उपलब्ध हो इसके लिए विकिपीडिया पर आपका लोग इन होना बहूत जरूरी है। विकिपीडिया के सबसे ऊपर लोग इन करने के बारे में कहा गया है। एक मिनट का काम है।
तो फिर तैयार हो जाएँ।

गुरुवार, 8 नवंबर 2007

विकिपीडिया के बारे में

हमारे ब्लोग से सीधे विकिपीडिया पर जाएँ-- फिर विकी का सदस्य बनें-- फिर किसी लेख को चुनें जिसे आप बेहतर ढंग से संपादित कर सकते हैं। फिर संपादन करें पर क्लिक करें-- और हिन्दी में लिखना शुरू करें- अंत में प्रोजेक्ट सेव कर लें-- फिर देखिए ये जानकारी सबके लिए उपलब्ध होगी- आपकी अपनी भाषा हिन्दी में। विकिपेडिया के बारे में हमसे विचार बाँट सकते हैं।

विकिपीडिया के बारे में कुछ और

विकिपीडिया हिन्दी में है तो-- मगर इसे नहीं का भाई ही कह सकते हैं। हिन्दी विकिपीडिया में कहने के तो करीब चौदह हजार लेख हैं-- मगर इसमें मात्र तीन लेख-- महादेवी वर्मा, सत्यजीत राय और रामायण-- ही सम्पूर्ण लेख की श्रेणी में आते है। इस दुनिया में एक अरब से ज्यादा हिन्दी जानने वाले लोग रहते हैं। मगर अभी तक हिन्दी विकिपीडिया में मात्र तीन ही लेख लिखे जा सकें हैं। ऐसा क्यों? आपका ज्ञान कोष है विकिपीडिया। आप अपने ज्ञान कोष को खुद बढ़ा सकते हैं। तो बढ़ा लीजिये अपने ज्ञान कोष को। हिन्दी विकिपीडिया को दुरुस्त करना कोई मुश्किल काम नहीं है। आप शुरू करिये- तरीका मैं बताता हूँ। हमारे ब्लोग पर दायीं और-- हिन्दी के गौरव स्थल नाम से-- कुछ नाम हैं आप हिन्दी विकिपीडिया पर जाएँ।

बुधवार, 7 नवंबर 2007

हिन्दीविकिपीडिया के बारे में

इन्सान मैं भी हूँ। इन्सान आप भी है। इन्सान हैं तो भूख भी है। इंसानी भूख जानवरों की भूख से थोडी अलग होती है। इन्सान की भूख महज रोटी से नहीं नहीं मिट सकती है। मिटे भी क्यों। इन्सान महज पेट लेकर ही तो पैदा नहीं हुआ है। इसके पास दिमाग भी है। दिमाग भी जानवरों की तरह पेट के सामानांतर नहीं बल्कि पेट से कम-से-कम दो फ़ीट ऊपर। दिमाग की खुराक है जानकारी। और इस जानकारी का कोई अंत तो है नहीं। ये भी ठीक है कि सबको हर प्रकार की जानकारी से क्या मतलब। तो भी जानकारी के लिए आप क्या करते हैं। वैसे आप कह सकते हैं कि जानकारी के लिए फुट्पाथी किताबों से लेकर बाज़ार में इन्सैक्लोपीडिया तक मौजूद है। मगर कई कारणों से ये किताबें आपकी जानकारी की बहुत बड़ी पिपासा को नहीं मिटा सकती। तो क्या जानकारी की भूख और प्यास से मर जाएँ? हम कहेंगें नहीं। आपके ज्ञान की प्यास को मिटाने के लिए कई लोग निस्वार्थ भाव से काम कर रहे हैं। ऐसे ही कुछ लोगों ने आपके लिए विकिपीडिया तैयार किया है। विकिपीडिया-- ज्ञान-विज्ञान का अद्भुत कोष है। जहाँ तमाम प्रकार की जानकारी मौजूद है। इसकी सबसे बड़ी खासियत है कि हर वक्त इसका संपादन होते रहता है। संपादक बडे विद्वान या ज्ञानी विज्ञानी नहीं होते हैं। बल्कि हम और आप जैसे लोग होते हैं। लेकिन हम हों या आप विकिपीडिया के संपादन के लिए उस विषय की पुख्ता जानकारी तो होनी ही चाहिऐ। साथ ही साथ हमारी भाषा ऐसी होनी चाहिऐ कि कोई भी हमारी बात को पढकर ठीक से समझ जाय। आवश्यक है कि आप जिस विषय को ठीक से जानते हों उसी विषय पर लिखें। हिन्दी में विकिपीडिया की शुरुआत २००३ में हुई थी मगर कुछ समय पहले तक कंप्युटर पर हिन्दी में लिखने की समस्या थी इसलिए हिन्दी में ज्यादा लेख नहीं लिखे जा सके॥ पर अब हिन्दी में लिखना बिल्कुल सरल हो गया है। तो तैयार हो जाइये हिन्दी में विकिपीडिया को समृद्ध करने के के लिए॥ ताकि आपकी भाषा में भी हर जानकारी एक क्लिक की दूरी पर सिमट जाये।