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रविवार, 11 नवंबर 2012

संस्कृत भाषा और भारत में वैज्ञानिक विकास, भाग-8


यह लेख सुप्रीमकोर्ट के पूर्व न्यायमूर्ति और भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष जस्टिस मार्कंडेय काट्जू के उस अभिभाषण का अनुवाद है, जो उन्होंने 27 नवंबर 2011को काशी हिंदी विश्वविद्यालय, वाराणसी में दिया था। 
खगोलशास्त्र
प्राचीन भारत में, आर्यभट्ट ने अपनी पुस्तक आर्यभट्टीय में एक गणितीय प्रणाली को प्रस्तुत किया, जिसमें संकल्पना की गई कि पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमती है। उन्होंने सूर्य के परिप्रेक्ष्य में ग्रहों की गति के बारे में भी विचार किया (दूसरे शब्दों में, आर्यभट्ट की गणितीय प्रणाली में कॉर्पर्निकस के हेलियोसेंट्रिक सिद्धांत के संकेत थे, हालांकि इस पर विवाद की गुंजाइश है)। दूसरे प्रसिद्ध खगोलशास्त्री थे, ब्रह्मगुप्त, जो उज्जैन के खगोलीय वेधशाला के प्रमुख थे और खगोलशास्र पर एक प्रसिद्ध पुस्तक लिखी, और भास्कराचार्य भी उज्जैन के वैधशाला के प्रमुख थे, वराहमिहिर ने गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत प्रस्तुत किया जो बताया है कि एक बल है जिसके कारण कोई वस्तु पृथ्वी की ओर आकर्षित होती है और जो आकाशीय पिंडों को अपने निश्चित स्थान पर बना रखता है।
मैं यहां इन महान खगोलशास्त्रियों के सिद्धांतों को विस्तार से प्रस्तुत नहीं करने जा रहा हूँ, लेकिन इतना निश्चयपूर्वक कहूंगा कि हजारों साल पहले भारत के महान खगोलशास्त्रियों द्वारा की गई गणना के आधार पर आज भी सूर्य और चंद्र ग्रहणों के समय और तिथि की भविष्यवाणी की जा सकती है। ये गणनाएं उस समय की गई, जब दूरदर्शी जैसे आधुनिक यंत्र नहीं थे और खुली आंखों से निरीक्षण करना होता था।
चिकित्सा
प्राचीन भारतीय चिकित्सा जगत में सुश्रुत और चरक के नाम सबसे प्रसिद्ध हैं। सुश्रुत शल्य चिकित्सा के जनक माने जाते हैं और उन्होंने मोतियाबिंद की सर्जरी और प्लास्टिक सर्जरी आदि की खोज की, ये आधुनिक सर्जरी की खोज से सदियों पहले हुई थी। सुश्रुत की पुस्तक सुश्रुत संहिता में चिकित्सा और सर्जरी के बारे में विस्तार के बताया गया है, इनमें सर्जरी में प्रयोग होने वाले दर्जनों औजार शामिल है, जिन्हें गूगल में इंटरनेटपर आसानी से ढूंढा जा सकता है। सुश्रुत अच्छे सर्जन माने जाते थे, क्योंकि इन्हें शरीर के आंतरिकी का बहुत अच्छा ज्ञान था। चरक ने आंतरिक चिकित्सा पर चरक संहिता नामक आयुर्वेदिक ग्रंथ की रचना की, जो आधुनिक आयुर्वेदिक चिकित्सा का केंद्र है। चरक संहिता और सुश्रुत संहिता दोनों ही ग्रंथ संस्कृत में लिखे गए, जिन्हें गूगल में इंटरनेट पर विस्तारपूर्वक देखा जा सकता है। यह उल्लेखनीय है कि लंदन साइंस म्यूजियम के प्रथम तल पर चिकित्सा से जुड़ी हैं, जहां चिकित्सा के क्षेत्र में सुश्रुत के यंत्रों सहित प्राचीन भारत की उपलब्धियों का भी जिक्र है।
इससे जाहिर है कि प्राचीन काल में भारत चिकित्सा के क्षेत्र में दुनिया के सभी देशों से काफी आगे था।
अभियांत्रिकी
दक्षिण भारत के तंजौर, त्रिची मंदिरों और खजुराहो और ओडीशा के मंदिर इस बात के गवाह है कि अभियांत्रिकी के क्षेत्र में भी हम काफी आगे थे। कहा जाता है कि छठी शताब्दी में कर्नाटक के ऐहोल में एक संस्थान था जहां संरचनागत मैकेनिक्स का विकास हुआ था। इस संस्थान में विकसित ढालुआं छत का उपयोग केरल, पूर्वी आंध्रप्रदेश और तमिलनाडु में संरचनाओं को बनाने में हुआ।
यहां आगे का विषय समझने के लिए थोड़ा और विषयांतर होना पड़ेगा।
भारतीय संस्कृति के प्रति अंग्रेज शासकों का रवैया
भारतीय संस्कृति के प्रति अंग्रेजी शासकों के व्यवहार तीन ऐतिहासिक चरणों से होकर गुजरा। पहला चरण 1600 ईस्वी है, जब अंग्रेज भारत आए थे और व्यापारी के रूप में बांबे, मद्रास और कलकत्ता में अपनी बस्तियां बसाई थी। यह चरण 1757 तक चला जब उन्होंने पलासी की लड़ाई लड़ी। इस काल में भारतीय संस्कृति के प्रति अंग्रेजों का व्यवहार बिल्कुल अगर था क्योंकि वो व्यापारी के रूप में भारत पैसा कमाने के लिए आए थे, इसलिए उन्हें भारतीय संस्कृति में रूचि नहीं थी।
दूसरा चरण 1757 से 1857 ईस्वी यानी भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम, जिसे सिपाही विद्रोह भी कहा जाता है, तक चला। पलासी की लड़ाई 1757 में लड़ी गई और इसके बाद बंगाल की दीवानी मुगल शासकों ने अंग्रेजों को दे दी। उस वक्त बंगाल में बिहार और उड़ीसा भी शामिल था। पूरा बंगाल अंग्रेजों की हुकूमत के अंदर आ गया। 1757 से 1857 तक अंग्रेजों ने भारतीय संस्कृति को गंभीरता से अध्ययन किया और कुछ अहम योगदान भी दिया, खासकर भारतीय सांस्कृतिक ज्ञान को पश्चिमी देशों में फैलाने में।
तीसरा चरण 1857 के सिपाही विद्रोह और इसे ब्रिटिश शासकों द्वारा क्रूरता पूर्वक कुचलने के बाद से शुरू हुआ। 1857 के बाद तो अंग्रजों ने निश्चिय कर लिया कि वो शासन के प्रति ऐसा विद्रोह दोबारा नहीं होने देंगे। इसके लिए उन्होंने दो काम किए-(1) भारत में उन्होंने भारतीय सेना में सैनिकों, खासकर अंग्रेजी सैनिकों की संख्या बढ़ाई, शस्त्र भंडारों को यूरोपीय सैनिकों के हाथों में सौंप दिया। (2) अंग्रेजों ने जानबूझकर भारतीय लोगों को हतोत्साहित और अपमानित करना शुरू कर दिया। इसके लिए उन्होंने इस तरह का दुष्प्रचार फैलाना शुरू कर दिया कि अंग्रेजों के आने से पहले भारतीय लोग सिर्फ मुर्खों और गुलामों की प्रजाति के थे। उनकी संस्कृति मुर्खों और गुलामों की रही है और भारतीय संस्कृति में कुछ भी अच्छा नहीं है। ये सब जानबूझकर किया गया ताकि भारतीय लोगों को लगने लगे कि वो हीनतर प्रजाति से हैं और अंग्रेज उनके स्वामी है। अंग्रेजों के शासन के तीसरे चरण का नतीजा है कि हम अपने महान पूर्वजों के योगदान, खासकर विज्ञान के क्षेत्र में योगदान को भूल गए। दूसरे चरण में तो अंग्रेजों को भारती संस्कृति में थोड़ी रुचि थी और उन्होंने इसका अध्ययन किया।
ऐसे ही अंग्रेजों में सबसे पहले नाम आता है सर विलियम जोन्स का, जो 1783 में कलकत्ता सुप्रीमकोर्ट के जज के रूप में भारत आए। वह बचपन से ही अत्यंत विलक्षण प्रतिभा के धनी थे, जिन्होंने छोटी उम्र में ही, ग्रीक, लैटिन, पर्सियन, अरबी, हिब्रू जैसी भाषाओं पर एकाधिकार हासिल कर लिया। उन्होंने ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में पढ़ाई की और एक वकील बनने के लिहाज से बार परीक्षा पास की। जब वो भारत आए तो उन्होंने सुना कि भारत में भी एक प्राचीन भाषा संस्कृत है, इसमें उनकी रुचि जगी और उन्होंने इसके अध्ययन का फैसला किया। नतीजा हुआ कि वो एक शिक्षक की तलाश में जुट गए। आखिरकार कलकत्ता के भीड़भाड़ वाले इलाके में एक धुप्प अंधेरे कमरे में रहने वाले बंगाली ब्राह्मण रामलोचन कवि भूषण उन्हें शिक्षक के रूप में मिल गए। सर विलियम जोन्स अपने शिक्षक के पास संस्कृत सीखने के लिए व्यक्तिगत रूप से जाने लगे। सर जोन्स ने अपने संस्मरण में लिखा कि जब उनकी पढ़ाई पूरी होती तो वो देखते थे कि उनके शिक्षक रामलोचन उस जगह की सफाई करते, जहां जोन्स बैठते थे, ऐसा इसलिए कि रामलोचन उन्हें मलेच्छ मानते थे। हालाकि सर जोन्स ने इसे अपना अपमान नहीं माना और विचार किया कि उन्हें अपने शिक्षक के रीति-रिवाजों को मानना चाहिए।
संस्कृत भाषा में दक्षता हासिल करने के बाद सर विलियम जो्स ने कलकता में एशियाटिक सोसायटी की स्थापना की और कालिदास के अभिज्ञान शाकुंतलम सहित दूसरे कई संस्कृत ग्रंथों का अंग्रेजी में अनुवाद किया। उनका ये अनुवाद जर्मनी के महान विद्वान गोथे को बेहद अच्छी लगी और उन्होंने इसकी बेहद प्रशंसा की। सर जोन्स ने साबित किया कि संस्कृत भाषा ग्रीक और लैटिन के बेदह करीब है। वास्तव में संस्कृत लैटिन से ज्यादा ग्रीक के करीब है क्योंकि संस्कृत में तीन वचन होते हैं, एकवचन, द्विवचन और बहुवचन। ग्रीक में भी जैसा ही होता है, जबकि लैटिन में दो वचन ही होते हैं जैसा कि अंग्रेजी, हिंदी और दूसरी कई भाषाओं में।
इस प्रकार सर विलियम जोन्स ने बताया कि संस्कृत, ग्रीक और लैटिन समान भाषा से पैदा हुए हैं और वो भाषा के तुलनात्मक अध्ययन के जनक माने जाने लगे।
दूसरे ब्रिटिश विद्वानों ने भी भारतीय संस्कृति पर शोध किया, यहां सबके बारे में विस्तार से बताने की जरूरत नहीं है, क्योंकि इसमें काफी समय लगेगा।
यहां यह उल्लेखनीय है कि भारतीय विद्वानों की महान उपलब्धियों, जिनका जिक्र संस्कृत भाषा में है, से ये पश्चिमी विद्वान हतप्रभ थे।
आधुनिक भारत में विज्ञान की स्थिति-
जैसा कि ऊपर कहा गया है कि एक समय था जब भारत विज्ञान के क्षेत्र में विश्व में अग्रणी था। अरब और चीन के विद्वान छात्र बनकर नालंदा, तक्षशिला, विक्रमशिला, उज्जैन विश्वविद्यालयों में हमसे सीखने के लिए भारत आते थे, लेकिन बड़ा ही दुखद है कि आज हम आधुनिक विज्ञान में पश्चिमी दुनिया से बहुत ही पीछे हैं। इसमें संदेह नहीं है कि हमारी मातृभूमि ने सीवी रमन, चंद्रशेखर, रामानुजन, सतेंद्रनाथ बोस, जगदीशचंद्र बोस, मेघनाद साहा जैसे महान वैज्ञानिकों और गणितज्ञों को पैदा किया, लेकिन ये बीते जमाने की बात है।
हालांकि ऐसा नहीं है कि हममें वंशानुगत दोष पैदा हो गया है, बल्कि कुछ ऐतिहासिक कारणों के चलते ऐसा हुआ है। वास्तव में कैलिफोर्निया के सिलिकन वैली में भारतीय वैज्ञानिकों का दबदबा है। अमेरिका के ज्यादा विश्वविद्यालयों में विज्ञान और गणित के शिक्षक भारतीय हैं। इसलिए आधुनिक विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में भारत के पिछड़ेपन का कारण वंशानुगत दोष नहीं है, बल्कि कुछ अन्य वजह है। हमारे पास वैज्ञानिक विरासत और ज्ञान की बहुत बड़ी पूंजी है जो आधुनिक युग में विज्ञान के क्षेत्र में झंडा गाड़ने के लिए हमें नैतिक साहस और ताकत दे सकती है।

रविवार, 4 नवंबर 2012

संस्कृत भाषा और भारत में वैज्ञानिक विकास, भाग-7


यह लेख सुप्रीमकोर्ट के पूर्व न्यायमूर्ति और भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष जस्टिस मार्कंडेय काट्जू के उस अभिभाषण का अनुवाद है, जो उन्होंने 27 नवंबर 2011को काशी हिंदी विश्वविद्यालय, वाराणसी में दिया था। 
हालांकि दूसरे प्रमाण भी हैं जैसे अनुमान(हस्तक्षेप), शब्द(विशेषज्ञ या अधिकृत व्यक्ति की उक्ति) आदि। इसलिए अधिकतर वैज्ञानिक ज्ञान अनुमान प्रमाण से संबंध रखता है। उदाहरण के लिए, रदरफोर्ड ने अपनी आंखों से परमाणु को नहीं देखा, लेकिन अल्फा किरणों( धनात्मक हिलियम आयन है) विचलन का अध्ययन कर अनुमान प्रमाण के आधार निर्णय किया कि परमाणु के नाभिक में धनात्मक कण हैं, जिसके चारों ओर ऋणात्मक इलेक्ट्रॉन चक्कर लगाता है। ठीक इसी तरह प्रत्यक्ष प्रमाण के आधार पर ब्लैक होल यानी कृष्ण विवर को भी जाना नहीं जा सकता है(क्योंकि इससे प्रकाश नहीं निकलता), लेकिन आकाशीय पिंडों पर अदृष्य पिंडों के गुरुत्वाकर्षण बल की मौजूदगी के आधार पर हम ब्लैक होल या कृष्ण विवर की मौजूदगी का अनुमान लगाते हैं।
न्याय-मीमांसा के ज्ञान-मीमांसा में तीसरा प्रमाण है शब्द प्रमाण। यह किसी भी खास क्षेत्र में विशेषज्ञ या प्रतिष्ठित या अधिकृत व्यक्ति का वाक्य है। हम इनके प्रमाण को नहीं समझ पाने के बावजूद ऐसे वाक्यों को सत्य मानते हैं, क्योंकि जिसने ऐसा कहा है उसकी उस क्षेत्र में प्रतिष्ठा है।






उदारहण के लिए E=MC2 को बतौर शब्द प्रमाण के रूप में स्वीकार करते हैं क्योंकि यह कथन आइँस्टीन का है, जिन्होंने सैद्धांति भौतिकीविद् के रूप में प्रतिष्ठा पाई है। हालांकि हम अभी ये समझ नहीं पाये हैं कि वो किस तरह इस समीकरण पर पहुंचे(इसके लिए उच्च गणित और भौतिक ज्ञान की आवश्यकता है जो हमारे पास नहीं है)। ठीक इसी तरह हम डॉक्टर की बात को भी स्वीकारते हैं क्योंकि वो रोग विशेषज्ञ है।
न्याय-मीमांसा का अगला प्रमाण उपमा है, लेकिन यहां इसके वर्णन की जरूरत नहीं है।
जैसा कि पहले ही कहा जा चुका है कि न्याय-दर्शन वैज्ञानिक दृष्टिकोण को प्रस्तुत करता है और यह प्रत्यक्ष प्रमाण पर ज्यादा जोर देता है(हालांकि कभी-कभी ये भी भ्रमपूर्ण या मृग-मारीचिका जैसा हो सकता है) यही आधार विज्ञान का भी है क्योंकि विज्ञान में हम निरीक्षण, परीक्षण और तार्किक व्याख्या पर जोर देते हैं।
ये भी कहा जा सकता है कि यह जरूरी नहीं है कि प्रत्यक्ष प्रमाण हर मामले में सत्य का ज्ञान दे। उदाहरण के लिए हम देखते हैं कि सुबह में सूर्य पूर्व से उदित होता है, दोपहर में यह हमारे सिर के ऊपर आ जाता है और शाम में यह पश्चिम में अस्त हो जाता है। अगर हम सिर्फ प्रत्यक्ष प्रमाण पर निर्भर करें तो हमारा निष्कर्ष होगा कि सूर्य पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगाता है, हालांकि महान वैज्ञानिक और खगोलशास्त्री आर्यभट्ट ने अपनी पुस्तक आर्यभट्टियम में लिखा है कि अगर हम माने कि पृथ्वी अपने अक्ष पर धूम रही है तो ऐसा ही दृश्यगत प्रभाव उत्पन्न होगा। दूसरे शब्दों में अगर पृथ्वी अपने अक्ष पर घूर्णन कर रही है तो प्रतीत होगा कि सूर्य पू्र्व उदित होता है और पश्चिम में अस्त होता है। इसलिए प्रत्यक्ष प्रमाण के अलावा हम तर्कबुद्धि का भी इस्तेमाल करते हैं क्योंकि अकेले निरीक्षण हमें सत्य ज्ञान की ओर नहीं ले जाएगा।
यह कहा जा सकता है कि न्याय-दर्शन ने तर्क और विज्ञान के आवश्यक तार्किक चिंतन को अरस्तु और अन्य ग्रीक विचारकों से भी विकसित रूप में प्रस्तुत किया(देखे डीपी चट्टोपाध्यय की पुस्तक)।
इसप्रकार, प्राचीन भारत में न्याय दर्शन ने विज्ञान के विकास को अहम समर्थन और प्रोत्साहन दिया। यह उल्लेख किया जा सकता है कि न्याय दर्शन एक सत दर्शन है यानी भारतीय दर्शन के छह परंपरागत दर्शनों में से एक। यह चार्वाक जैसे गैर-परंपरागत दर्शन का हिस्सा नहीं है। यही कारण है कि हमारे महान वैज्ञानिक परंपरावादियों द्वारा तंग या परेशान नहीं किए गए क्योंकि वो कह सकते थे कि वो जो कुछ कर या कह रहे हैं वो परंपरागत दर्शन यानी न्याय-दर्शन पर आधारित है। यह यूरोप के परंपरावादी चिंतन से बिल्कुल अलग है, जहां महान वैज्ञानिक गैलिलियो को चर्चों द्वारा परेशान किया गया क्योंकि उनका चिंतन और काम बाइबिल से अलग था। भारत के साथ ऐसा हादसा नहीं हुआ, यहां की परंपरावादी सोच ही वैज्ञानकि विचार, तर्क या तर्क विज्ञान का समर्थन करती है।
प्राचीन भारत में हर कहीं वाद-विवाद या शास्रार्थ होते थे, जिसमें बड़ी बड़ी सभाओं में विचारों पर तर्क-वितर्क, दूसरे विचारों की आलोचना और विरोध की अनुमति थी। विचारों और अभिव्यक्ति की ऐसी स्वतंत्रता ने विज्ञान के विकास में अहम योगदान दिया क्योंकि विज्ञान के लिए स्वतंत्रता, चिंतन की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वंतत्रता और असहमति की स्वतंत्रता की आवश्यकता होती है। महान वैज्ञानिक चरक ने अपनी पुस्तक चरक संहिता में लिखा है कि विज्ञान के विकास के लिए वाद-विवाद, खासकर समान मानसिक स्तर वालों के बीच वाद-विवाद या शास्रार्थ परम आवश्यक है।
प्राचीन न्याय शास्रों, जिनमें गौतम का न्याय सूत्र में वाद-विदाद के कई तरीकों का वर्णन है जैसे, वद, जल्प, वितंड आदि। गौतम के बाद के न्याय दर्शन के जानकारों ने इसे और परिमार्जित किया।
विज्ञान के प्रगति और विकास को प्रोत्साहित करने वाले दो कारकों के उल्लेख के बाद अब हम अपने महान वैज्ञानिकों द्वारा विज्ञान के विभिन्न विषयों में योगदान की चर्चा करते हैं।
गणित
गणित के क्षेत्र में प्राचीन विश्व की सबसे महान और क्रांतिकारी वैज्ञानिक उपलब्धियों में दाशमिक प्रणाली का नाम सबसे ऊपर है। यूरोपीय लोगों द्वारा दाशमिक अंक प्रणाली को अरबी अंक प्रणाली नाम दिया गया, लेकिन अरबी विद्वान इसे हिंदू अंक प्रणाली मानते हैं। क्या ये अरबी अंक प्रणाली है या हिंदू। इस संदर्भ में यह उल्लेख करना आवश्यक है कि ऊर्दू, फारसी और अरबी भाषाएं दायीं से बायीं ओर लिखी जाती है, लेकिन अगर आप इन भाषायों को बोलने वाले लोगों से कोई संख्या, मान लीजिए 257 लिखने के लिए कहिए तो इस संख्या को बायीं से दायीं ओर ही लिखेंगे। यह दिखाता है कि ये संख्याएं उस भाषा से ली गई है जो बायीं से दायीं ओर लिखी जाती है। अब यह मान्य हो चुका है कि ये संख्याएं भारत से आई हैं और अरबों ने हमसे इसका नकल किया है।
अब मैं दाशमिक प्रणाली के क्रांतिकारी महत्व का जिक्र करूंगा। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि प्राचीन रोम, जार और अगस्तस की सभ्यता निस्संदेह एक महान सभ्यता थी, मगर आप अगर किसी प्राचीन रोमन से एक मिलियन लिखने के लिए कहेंगे तो वो पागल हो जाएगा, क्योंकि एक मिलियन लिखने के लिए उसे एक मिलेनियम या एक हजार(इसका प्रतीक M) उसे एक हजार बार लिखना पड़ेगा। रोमन अंक प्रणाली में एक हजार यानी M से बड़ा अंक नहीं होता है। उसे दो हजार लिखने के लिए दो बार MM लिखना पड़ेगा। तीन हजार लिखने के लिए तीन बार MMM लिखना पड़ेगा। इसी तरह एक मिलियन यानी दस लाख लिखने के लिए एक हजार बार M लिखना पड़ेगा।
दूसरी ओर, हमारी दाशमिक प्रणाली में एक एक मिलियन यानी दस लाख लिखने के लिए एक के बाद छह शून्य 1000000 ळिखना पड़ेगा। रोमन अंक प्रणाली में शून्य नहीं है। शून्य भारत की खोज है और इसकी खोज के बगैर प्रगति संभव नहीं है।
हम यहां अपने महान गणितज्ञों जैसे आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त, भास्कर, बराहमिहिर जैसे अनगिनत वैज्ञानिकों के महान योगदानों की विस्तृत चर्चा नहीं करने जा रहे हैं, इनके बारे में आप गूगल में सर्च कर सकते हैं। हालांकि इस सिलसिले में हम यहां सिर्फ दो उदाहरण देंगे।
भारतीय दाशमिक प्रणाली में संख्या 1,00,000 एक लाख कहते हैं। 100 लाख एक करोड़ कहता है। 100 करोड़ एक अरब, 100 अरब एक खरब, 100 खरब एक नील, 100 नील एक पद्म, 100 पद्म एक शंख और 100 शंख एक महाशंख कहलाता है। इस प्रकार एक महाशंख लिखने के लिए एक पर उन्नीस शून्य लिखा जाता है(ज्यादा जानकारी के लिए गूगल पर मौजूद वीएस आप्टे की संस्कृत-इंगलिश डिक्शनरी देख सकते हैं) दूसरी ओर, प्राचीन रोम के लोग एक हजार से ज्यादा की संख्या एम को बार-बार और बहुत बार दुहराए बगैर नहीं लिख सकते हैं।
एक दूसरा उदारहण लीजिए, अग्नि पुराण के मुताबिक, कलियुग, जिसमें हम रहते हैं, चार लाख बत्तीस हजार वर्षों का का है। इससे पहले का युग द्वापर कलियुग से दुगुने काल का था, द्वापर से पहले का त्रेता युग कलियुग से तीन गुना और इससे पहले का सतयुग कलियुग से चार गुना काल का था। चार युग मिलाकर कुल तैंतालिस लाख बीस हजार वर्षों का है। छप्पन चतुर्युग मिलकर एक मन्वंतर कहलाता है। चौदह मन्वंतर एक कल्प, बारह कल्प एक बह्म कहलाता है। इस तरह ब्रह्म अरबों और खरबों वर्ष का होगा।
भारत के परंपरावादी लोग जब प्रतिदिन संकल्प करते हैं तो उन्हें अपने का युग, कलियुग, द्वापर, त्रेता, सतयुग के साथ चतुर्युगी, मन्वंतर, कल्प, बह्म के ठीक वही दिन, महीना, और साल, जिसमें वो रहते हैं का जिक्र करना होता है। ऐसा कहा जाता है कि हम वर्तमान मन्वंतर के 28वें चतुर्युगी में जी रहे हैं। ये भी कहा जाता है कि कल्प का आधा मन्वंतर समाप्त हो चुका है, जबकि आधा मन्वंतर बाकी है। इस समय हम वैवश्वत मन्वंतर में जी रहे हैं।
भले ही कोई हमारी व्यवस्था में विश्वास नहीं करे, लेकिन हमारे पूर्वजों की संकल्पना की उड़ानों से आश्चर्यचकित हुए बगैर नहीं रह सकता है, जिन्होंने इतिहास के अरबों और खरबों वर्षों की कल्पना की।
आर्यभट्ट ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक आर्यभट्टियम में बीजगणित, अंकगणित, त्रिकोणमिति, द्विघात समीकरण और साइन तालिका के बारे में लिखा। उन्होंने पाई का मान 3.1416 ज्ञात किया जो पाई के वास्तविक मान के अत्यंत निकट है। आर्यभट्ट के कार्यों को पहले ग्रीक और बाद में अरबों ने ग्रहण किया।
हम यहां ब्रह्मगुप्त, भास्कराचार्य, वराहमिहिर के योगदानों की चर्चा नहीं करेंगे, क्योंकि इसमें काफी समय लग जाएगा।
आगे हम खगोलशास्त्र के बारे में चर्चा करेंगे...

रविवार, 14 अक्टूबर 2012

हिंदी कैसे बन सकती है सर्वश्रेष्ठ

डॉ. मधुसूदन उवाच
==>शासकीय मानक शब्दावली
==>मेडिकल टर्मिनॉलॉजी (शब्दावली )
==>संस्कृत छन्द का विशेष गुण,
==>शब्द रचना शास्त्र की झलक
==>दो सौ वर्षों का ग्रहण
अनुरोध: विशेष क्षेत्र से परिचित पाठक टिप्पणी अवश्य करें.
सूचना:तीनों सूचनाए महत्त्वपूर्ण है.
(१) यह आलेख गहराई से, बहुत विचार-मनन-मन्थन-चिन्तन-चर्चा इत्यादि करने के पश्चात ही लिखा गया है. पाठकों से भी वैसी ही अपेक्षा है. ऐसा किए बिना, सांगोपांग समझने में कठिन लग सकता है. आपके समझ में यदि आ जाए, तो मित्रों को भी आमन्त्रित कीजिए. तर्क ही हमें काम आएगा.जितनी जानकारी फैलेगी, जागृति आएगी.
(२)आलेख पर खुलकर प्रश्नों का भी अनुरोध है. यह कुछ विशेषज्ञों के क्षेत्र से संबद्धित भी है. कई दूरभाष (फोन) पर पूछें गये प्रश्नों के उत्तर है.
(३) निरूपित विषय राष्ट्र-भाषा, भाषा-भारती, राज-भाषा, हिन्दी, या प्रादेशिक भाषाएं, सभी को लागू होता है. इसी लिए शीर्षक ”अंग्रेज़ी से (कडी) टक्कर” दो, रखा है. यह लेख हिन्दी सहित सभी भाषाओं के लिए लागू होता है. 
एक : एक प्रश्न
एक प्रश्न बार बार दूरभाष (फोन) पर आता रहा है. प्रश्न है, मेडिकल टर्मिनॉलॉजी (शब्दावली ) कहां से लाओगे? और पहले पाठ्य पुस्तकें तो होनी चाहिए ना ?
शब्द रचना शास्त्र, एक स्वतन्त्र पुस्तक की क्षमता रखता है, इस लिए कुछ ही उदाहरण प्रस्तुत किए जा सकते हैं. कुछ अनुमान हो सके, इस लिए, एक झलक ही दिखाई जा सकती है. पाठ्य पुस्तकों की चर्चा आगे के अलग लेखों में की जाएगी. 
दो : शासकीय मानक शब्दावली पहले परिचित होने के कारण, सहज समझ में आए ऐसी, शासकीय और संविधान एवं समाचार पत्रों में भी प्रयोजी जाती शब्दावली के उदाहरणों से श्री गणेश करते हैं।
आप जानते ही होंगे, कि–
Constitution= संविधान
Law =विधान
Legislation= विधापन
Bill =विधेयक
Illegal =अवैध
Legal= वैध, इत्यादि शब्द अंग्रेजों के साथ ही भारत पहुंचे.
नोट कीजिए, कि, ये सारे अंग्रेजी शब्द एक दूसरे से स्वतंत्र है. Law का अर्थ जानने से Constitution, Legislation, Bill, Illegal, Legal इत्यादि शब्दों का अर्थ जाना नहीं जाता. ये सारे शब्द स्वतंत्र रूप से सीखने पडते हैं, डिक्षनरी में देखने पडते हैं. प्रत्येक का स्पेलिंग और अर्थ रटना पडता है.
किन्तु संस्कृत/हिन्दी पर्याय एक “धा’’ धातु पर “उपसर्ग’’ और “प्रत्यय’’ लगाकर नियमबद्ध रीति से गढे गये हैं. जिसे संस्कृत शब्द सिद्धि की प्रक्रिया की जानकारी है, उसे ये शब्द आप ही आप समझ में आते हैं. यह शब्दावली प्रायः समस्त भारतीय भाषाओं में प्रयुक्त होती है, कोई अपवाद नहीं जानता. यदि आज किसी को, ऐसे शब्द समझ में नहीं आते, तो यह हमारी संस्कृत के प्रति उपेक्षा का ही परिणाम है. 
वैसे बहुसंख्य भारतीय अंग्रेज़ी भी नहीं जानते, यह सच्चाई है, और सदा के लिए रहेगी ही. आप बहुसंख्य भारत को अंग्रेज़ी पढने-पढाने का कानून नहीं बना सकते, न उन को चिरकाल तक अंधेरे में रहने के लिए बाध्य कर सकते हैं. आप की भाँति वे भी स्वतंत्र हुए हैं. यह अन्याय नहीं किया जा सकता. उन्हें परतंत्रता में कब तक रहना चाहिए?
पर उपरि निर्देशित शब्दों के प्रति-शब्द रचने की, संस्कृत की आश्चर्यकारक क्षमता यदि जान जाएं, तो संस्कृत जैसी भाषा का हमारा गौरव बढे बिना नहीं रहेगा. 
निम्न शब्द समूह देखिये, और उन शब्दों का ध्यान से, निरिक्षण कीजिए. कुछ प्राथमिक संस्कृत की जानकारी ना भी हो, तो बहुतेरे हिंदी के शब्द, संस्कृत के ”धा” धातु पर व्याकरणिक प्रक्रिया से रचे गए हैं. कम से कम ५ आलेखों के बिना इस व्याकरणिक प्रक्रिया को समझाया नहीं जा सकता. पर ध्यान से देखने पर आप जानेंगे कि ये शब्द आपस में अर्थ समझने में भी अवश्य सहायता करते हैं.
जैसे ”धा” के आगे, वि+धा=विधा, फिर उसी से विधान, फिर विधान+सभा=विधान सभा, विधापन, विधायी,विधेय ….. इत्यादि इत्यादि।
शब्दावली ( अर्थ सहित)
यह शब्दावली प्रत्येक भारतीय भाषाओं में, आवश्यकता पडने पर, बनाई गयी थी, जो आज चलन में है. ऐसी संस्कृत जन्य शब्दावली भारत की सभी प्रादेशिक भाषाओं में चल पाती है, यह इसकी विशेषता है.
(१) Lawful, विधिवत,——–(२)Legislation, विधापन,
(३) Legislative,विधायी,——-(४) Legislatable,विधेय
(५) Illegislatable, अविधेय——(६) Lawlessness,विधिहीनता,
(७) Constituition, संविधान,—–(८) Parliament, लोक सभा
(९) Code,संहिता —————-(१०) Law, विधि,
(११) Bill, विधेयक ———–(१२) Lawful, विधिवत,
(१३) Lawless, विधिहीन,——-(१४) Legislative Assembly,विधान सभा
(१५)Act, ——————-(१६) 
इसी प्रकार किसी अन्य विशेष क्षेत्र में भी, ऐसी अर्थ सूचक, और सुसंवादी शब्द रचना, ऐसे ”धातुओं” के आधार पर रची जा सकती है.
नोट कीजिए, कि, अंग्रेज़ी शब्द एक दूसरे से प्रायः स्वतंत्र है. उन के अर्थ आप को डिक्षनरी में देखने पडेंगे हैं. उलटे हिन्दी शब्दावली आप को परस्पर संबद्धित प्रतीत होगी.
यह संस्कृत के शब्द रचना शास्त्र की किमया है. केवल शब्द रचना शास्त्र पर ही कभी विस्तार सहित आलेख डालूंगा. कुछ बिलकुल प्राथमिक जानकारी इस आलेख में उचित अनुक्रम में सम्मिलित की है, देखने-पढने का अनुरोध करता हूँ। 
(तीन) मेडिकल अर्थात चिकित्सा संज्ञाएं
अर्थ सूचक शब्द रचना।
चिकित्सा विषयक शब्द वास्तव में संस्कृत में, अंग्रेज़ी में प्रयुक्त होने वाले शब्दों की अपेक्षा, किसी भी निकषपर कसे जाएं, तो, अत्युत्तम और सरलातिसरल ही है. कुछ मात्रा में ही सरल नहीं बहुत बहुत सरल हैं. कुछ ही उदाहरण देकर स्पष्ट हो जाएगा. ऐसे संक्षिप्त आलेख में क्षमता होते हुए भी अधिक विस्तार करना संभव नहीं.
चिकित्सा की पढाई में सब से कठिन ही नहीं, पर कठिनतम Anatomy के शब्द माने जाते हैं।
आप किसी डॉ. से पूछिए, कि शरीर शास्त्र (Anatomy )एक कठिन(तम) विषय माना जाता है या नहीं? मैं ने छात्रो से पूछकर इसे चुना है. Anatomy के रावण के कपाल पर ही गदा प्रहार कर, सिद्ध कर देंगे तो, अन्य विषयों की शब्दावली सहज स्वीकार होने में कठिनाई नहीं होगी. बस, इसी दृष्टि से मैं ने Anatomy चुना है।
शरीर शास्त्र (Anatomy) उदाहरण:
मुख पेशियों के नाम (अभिनवं शारीरम् से )
(१) भ्रूसंकोचनी या अंग्रेज़ी Corrugator supercilli, क्या सरल है?
पहले Corrugator supercilli को देखिए, मैं एक प्रोफेसर भी, इसका अर्थ भाँप नहीं पाता. आप उस के स्पेलिंग के कूटव्यूह को देखिए, रटना तो पडेगा ही, उसे रटिए, डिक्षनरी में उसका अर्थ देखिए, उसे रटिए, और पाठ्य पुस्तक से व्याख्या रटिए.
पर उसीके लिए प्रयुक्त भ्रूसंकोचनी की व्याख्या, और अर्थ देखते हैं. भ्रू का अर्थ होता हैं भौंह या भौं, और संकोचन का अर्थ है , सिकुडना,अब भौंह सिकुडने में जो पेशियां काम करती है, उन पेशियों को भ्रूसंकोचनी कहा जाता है. बन गया शब्द ”भ्रूसंकोचनी संक्षिप्त और अर्थ सूचक. {इस प्रक्रिया में प्रत्यय का और संधि का उपयोग किया गया मानता हूँ.)
इसी का अंग्रेज़ी प्रति शब्द लीजिए. ”Corrugator supercilli” मेरा अनुमान है, कि यह लातिनी शब्द है, जो अंग्रेज़ी ने उधार लिया है. इस लिए जब तक लातिनी नहीं समझी जाएगी,(जो भाषा हमारी नहीं है ) तब तक उस का शब्दार्थ भारतीय को पता नहीं होगा. वैसे ऐसा शब्दार्थ अंग्रेज़ी भाषी अमरिकन छात्रों को भी पता नहीं है. इंग्लण्ड में भी उनके मेडिकल के छात्र इस विषय को कठिन ही मानते हैं. सुना है, कि उनका लातिनी-युनानी भाषाओं से संबंध तो उतना भी नहीं बचा है, जितनी हमारी भाषाएं संस्कृत से जुडी हुयी है.
तो, (१) स्पेलिंग रटो ही रटो, (२) उस शब्द का अर्थ ढूंढो और रटो (३)और, उसकी व्याख्या रटो; ऐसा तिगुना प्रयास हमें करना पडेगा.
युवा छात्र तो Corrugator supercilli का स्पेलिंग रटते रटते, फिर उसका अर्थ डिक्षनरी में देखते देखते, और अंत में उसकी व्याख्या को कंठस्थ करने में हताश हो सकता है. और फिर उस पेशी का रेखाचित्र भी बनाना पडता है, जो हिन्दी या अंग्रेज़ी दोनों के लिए समान है.
(२) नेत्र निमीलनी: या Orbicularis Oculi
नेत्र का अर्थ है आंखे, और निमीलन का अर्थ बंद करना या होना. तो नेत्र निमीलनी का अर्थ हुआ आंखे बंद करने वाली पेशियां. नेत्र निमीलनी बोलते ही आप उसका हिन्दी स्पेलींग,(वर्तनी) जान गये, उसका अर्थ ही उसकी व्याख्या है, उसे भी जान गए. कितना समय बचा आपका? पर Orbicularis Oculi बोलने पर क्या आप स्पेलिंग शब्द सुनकर बना लेंगे? नहीं. अर्थ जानेंगे? नहीं. और व्याख्या? वह भी नहीं. 
संस्कृत शब्द मुझे आयुर्वेद के ”शरीर-शास्त्र” से मिले. शरीर शास्त्र, एलॉपथी और आयुर्वेद, दोनों में समान है. क्यों कि शरीर ही जब मनुष्य का है, तो शास्त्र में भी कोई अंतर कैसे होगा.
एलॉपथी भी हिन्दी में पढाई जाए तो क्या छात्रों के लिए, सरल नहीं होगी?
क्या देशका लाभ नहीं होगा ?
और Orbicularis Oculi के लिए वही, अनावश्यक परिश्रम करना पडेगा जैसा ”Corrugator supercilli का हुआ था।
(१) ले स्पेलिंग रटो (२) रा डिक्षनरी में अर्थ ढूंढो और रटो,(३) फिर व्याख्या रटो।
आपको प्रामाणिकता (इमानदारी ) से मानना होगा, कि नेत्र निमीलनी दो चार बार के रटने से ही, तुरंत, पल्ले पड सकता है। और मैं तो मेडिकल का जानकार भी नहीं हूँ। न शरीर शास्त्र मैं ने पढा है। 
अब बिना विवेचन दो चार और उदाहरण ही देता हूँ।
नासा संकोचनी: Compressor naris
नासा=नाक को सिकुडने वाली पेशियां।
नासा विस्फारणी: Dilator naris
नाक को विस्फारित करने वाली पेशियां।
नासा सेतु: Dorsum of the nose
नासावनमनी: Dopressor septi
आप बताइए कि भ्रू संकोचनी, नेत्र निमीलनी, नासा संकोचनी, नासा विस्फारणी, नासा सेतु, नासावनमनी इत्यादि से शरीर शास्त्र आप शीघ्रता से पढेंगे? या नहीं?
{संस्कृत शब्द अर्थवाही, बिना स्पेलिंग, व्याख्या को अपने में समाए हुए प्रतीत होते हैं, या नहीं ?, कितना समय बचता?या आप अंग्रेजी में शीघ्रता से पढ पाएंगे, स्पेलिंग याद करते करते बरसों व्यर्थ गवांएंगे?}
(पाँच)
ॐ –संस्कृत छन्द का विशेष गुण:
संस्कृत छन्द का विशेष गुण, उपयोग और लाभ यह भी है, कि सरलता से, व्याख्याएं और सिद्धान्त इत्यादि संस्कृत छंद में रचे जा सकते है।यह गुण छात्र को रटने में सरलता प्रदान करेगा। प्रादेशिक भाषाएं, ऐसी संस्कृत की छन्दोबद्ध व्याख्या का तमिल से लेकर नेपाली तक अपनी अपनी भाषा में अर्थ विस्तार करें। ऐसा अर्थ विस्तार विषय को आकलन करने में सहायक होगा। सभी प्रादेशिक भाषाओं में ऐसे व्याख्याकारी श्लोकों का संग्रह समान ही होगा।
केवल उनके अर्थ अलग अलग भाषाओं में प्रत्येक प्रदेश में सिखाए जाएंगे। इस में भी मैं भारत की एकता को दृढ करने का साधन देखता हूँ। संस्कृत परम्परा को टिकाने का अलग लाभ। जैसे, ”योगः कर्मसु कौशलम्‍” — कर्म को कुशलता से करना कर्म योग है.संक्षेप में कर्म योग की व्याख्या कर देता है। ”योगश्चित्तवृत्ति निरोधः” ध्यान योग चित्त में चलने वाले विचारों का निरोध है.
सोचिए, हमारे पुरखें कितनी दूरदृष्टि वाले होंगे? सारी भगवद गीता ७१५ श्लोकों में दे दी। यह परम्परा टिकाने में बडी सहायता है।पाठ करने में कितनी सरलता है। सारे जीवन का तत्त्व ज्ञान केवल ७१५ श्लोकों में होने से पठन पाठन में सहायक है।और फिर छन्द में है।आज तक भ. गीता के श्लोक मैं ने गुजराती, मराठी, तेलुगु, हिन्दी, अंग्रेज़ी इत्यादि भाषाओं में प्रत्यक्ष देखे हैं। कुछ विषय से भटक गया –पर? ठीक है।
इस पद्धति से एक ओर संस्कृत भाषा से छात्र न्यूनाधिक मात्रा में परिचित भी होंगे, और व्याख्या का श्लोक रटने की सरलता होगी, साथ संस्कृत ज्ञान निधि को अनायास सहज प्रोत्साहन प्राप्त होगा।पंथ एक होगा, लाभ अनेक होंगे। सिद्धान्तों और व्याख्याओं के छंदो-बद्ध श्लोक छोटी छोटी गुटकाओं में समस्त भारत के लिए समान ही छापे जाएं। फिर प्रादेशिक भाषाओं में उसपर भाष्य छापे जा सकते हैं।
संस्कृत के पुरस्कर्ता भी हर्षित होंगे, संस्कृत के पण्डितों का विद्वानों का रक्षण होगा। संस्कृति-परम्परा का पालन पोषण निर्वहन होगा। स्वतंत्र भारत में यह अतीव आवश्यक है। जीवन्त परम्परा टिक जाएगी। पाणिनि कोई आर्थिक लोभ के कारण पैदा नहीं होता.
कुछ दो सौ वर्षों से उसे ग्रहण लगा है। जीवन्त परम्पराएं कडियां होती है , जो हमें हमारे पूर्वजों से और वंशजो से जोडनी होती है। ”परदादा -हम-और-प्रपौत्र” जुडे तो परम्परा का अर्थ सार्थक होता है।
ॐ –शब्द रचना की झलक
मॉनियर विलियम्स उनके शब्द कोष की प्रस्तावना में कहते हैं, कि संस्कृत के पास १९०० धातु हैं, प्रत्येक धातु पर ५ प्रकार की प्रक्रियाओं से असंख्य शब्द रचे जा सकते हैं।{ वास्तव में, हमारे धातु २०१२ है–लेखक} 
अकेली संस्कृत की अनुपम और गौरवदायी विशेषता है, यह ”शब्द रचना क्षमता”. उसे एक शास्त्र ही मानता हूँ, मैं. ऐसी परिपूर्ण क्षमता बंधु ओं मेरी जानकारी में किसी और भाषा की नहीं है. कोई मुझे दिखा दे, तब मान जाऊंगा.
देशी भाषाओं में, (जैसे हिन्दी, गुजराती, मराठी, बंगला, उडीया, तेलगु, तमिल…इ.) नये नये शब्द, और पारिभाषित शब्द संस्कृत के आधार पर गढे जाते हैं। 
भारत की प्राय: सारी प्रादेशिक भाषाएं संस्कृतजन्य संज्ञाओं का प्रयोग करती हैं। वैज्ञानिक, औद्योगिक, शास्त्रीय इत्यादि क्षेत्रों में पारिभाषिक शब्दों का प्रयोग सरलता से हो इसलिये और अधिकाधिक शोधकर्ता इस क्षेत्र को जानकर कुछ योगदान देने में समर्थ हो, इसलिये शब्द सिद्धि की प्रक्रिया की विधि इस लेख में संक्षेप में इंगित की जाती है। 
यह लेख उदाहरणसहित उपसर्गोंकाऔर प्रत्ययों के द्वारा मूल धातुओं पर, संस्कार करते हुये किस विधि नये शब्द रचे जाते हैं इस विषय को स्पष्ट करने का प्रयत्न करेगा। 
हिन्दी/ संस्कृत में २२ उपसर्ग हैं। शाला में एक श्लोक सीखा था। 
प्रहार, आहार, संहार, प्रतिहार, विहार वत् 
उपसर्गेण धात्वर्था: बलात् अन्यत्र नीयते।। 
अर्थ: प्रहार, आहार, संहार, प्रतिहार, विहार की भांति उपसर्गो के उपयोग से धातुओं के अर्थ बलपूर्वक अन्यत्र ले जाये जाते हैं। 
उपसर्ग: प्र, परा, अप, सम, अनु, अव. नि: या निऱ्, दु:, या दुर, वि, आ. नि, अधि, अपि, अति, सु, उद. अभि, प्रति, परि और उप- इनके उपयोग से शब्द नीचे की भांति रचे जाते हैं। कुछ उदाहरण: हृ हरति इस धातु से, प्र+हर = प्रहार, सं+हर = संहार, उप+हर = उपहार, वि+हर =विहार, आ+हर = आहार, उद+हर =उद्धार, प्रति+हर =प्रतिहार इत्यादि शब्द सिद्ध होते हैं। 
प्रत्यय: प्रत्ययों का उपयोग, कुछ उदाहरण
(क) योग प्र+योग – प्रयोग, प्रयोग+इक – प्रायोगिक, प्रयोग+शील – प्रयोगशील, प्रयोग+वादी – प्रयोगवादी,
उप+योग – उपयोग+इता – उपयोगिता
उद+योग – उद्योग+इता – औद्योगिकता 
(ख) उसी प्रकार रघु से राघव, पाण्डु – पाण्डव, मनु – मानव, कुरु – कौरव, इसी प्रकार और भी प्रत्यय हमें विदेह – वैदेहि, जनक – जानकी, द्रुपद – द्रौपदी – द्रौपदेय, गंगा – गांगेय, भगीरथ – भागीरथी, इतिहास – ऐतिहासिक, उपनिषद – औपनिषदिक, वेद – वैदिक, शाला – शालेय, 
(ग) संस्कृत के पारिभाषिक शब्द, विशेषण का ही रूप है, इसलिये अर्थ को ध्यान में रखकर रचे जाते हैं। इसलिये शब्दकोष से ही उस अर्थ का शब्द प्राप्त करना पर्याप्त नहीं। हरेक संज्ञा का विशेष अर्थ होने से, परिभाषा को रचने के काम में उन्हीं व्यावसायिकों का योगदान हो, जो एक क्षेत्र के विशेषज्ञ है, साथ में पर्याप्त संस्कृत का भी ज्ञान रखते हैं।
संस्कृत भाषा में २२ उपसर्ग, ८० प्रत्यय और २००० धातु हैं। इनकी ही शब्द रचने की क्षमता २२x८०x२०००=३,५२०,००० – अर्थात ३५ लाख शब्द केवल इसी प्रक्रिया से बनाये जा सकते हैं।
इसके उपरान्त सामासिक शब्द, और सन्धि शब्द को जोडे तो शब्द संख्या अगणित होती है। 
कुछ दो सौ वर्षों से उसे ग्रहण लगा है। जीवन्त परम्पराएं कडियां होती है , जो हमें हमारे पूर्वजों से और वंशजो से जोडनी होती है। परदादा -हम-और प्रपौत्र जुडे तो परम्परा का अर्थ सार्थक होता है।
कवि दुष्यंत कुमार कहते हैं:
मेले में खोए होते, तो, कोई घर पहुंचा देता,
हम तो अपने ही घर में खोए हैं, कैसे, ठौर ठिकाने आएंगे ?