गुरुवार, 25 दिसंबर 2008
चर्च को चार सौ साल लगे समझने में
मास्टर साहब, समझने की कोशिश कीजिए। बच्चे हैं समझ जाएंगे धीरे-धीरे। दुनियाभर में ज्ञान के प्रकाश फैलाने का ठेका लेने वालों, परमपिता भगवान ईशु के संदेश को जन-जन तक पहुंचाने का ठेका लेने वालों, दस डॉलर में डकैती के पाप और सौ डॉलर में हत्या के पाप से मुक्ति देने वालों को जब छोटी सी बात समझने में चार सौ साल से ज्यादा लग गए तो बच्चों पर इतना गुस्सा काहे को उतार रहे हैं।
गैलेलियो ने एकबार कह दिया कि सूर्य स्थिर है और धरती इसके चारों ओर धूमती है। चर्च आपे से बाहर हो उठा। आखिर अपनी दुकान पर ताले जड़ने की कोशिश करने वालों को वो कैसे बर्दास्त करते। गैलेलियों को चर्च में बुलाया गया और उसे माफी मांगने के लिए कहा गया।
गैलेलियों ने कहा, उसने कोई गलती की ही नहीं, तो वो भला माफी क्यों मांगे। बस फादरों ने उनको उम्रकैद की सजा सुना दी। बाद में काफी कहा सुनी के बाद उम्रकैद को नजरबंदी में तबदील कर दी गई और गैलेलियो को आठ साल अपने घर में बंद रहना पड़ा।
गैलेलियों ने अपनी बात को साबित करने के लिए टेलीस्कोप(दूरदर्शी) का आविष्कार किया।
ये बात सोलहवी और सतरहवी शताब्दी के संधिकाल है। इस दौरान ब्राहे को भी चर्च ने जिंदा जला दिया था।
इन चार सौ साल में दुनिया कहां से कहां चली गई, लेकिन चर्च को गैलेलियो की बात समझने में चार सौ साल लग गए।
अब जब संयुक्त राष्ट्र ने इस साल को खगोलीय वर्ष घोषित किया है, तब चर्च को इस बात का एहसास हुआ है कि गैलेलियो सही थे और उन्हें नजरबंद रखना गलत था।
ये किसी व्यक्ति की भूल नहीं थी, बल्कि एक संस्थागत भूल है। इस संस्थान ने दुनिया के हरेक व्यक्ति को ईसाई बनाने का ठेका ले रखा है। इस संस्थान और इसके पिता के सामने दुनियाभर के राष्ट्रध्यक्ष माथा टेकते हैं। इस संस्थान ईसाई धर्म प्रचारकों को कथित चमत्कार के नाम पर संत की उपाधि देता है।
पिछले दिनों केरल की सिस्टर एल्फोंसा को संत की उपाधि दी गई। वो भी उनकी मौत के बासठ साल बाद। जब सिस्टर एल्फोंसा जिंदा थी, तब चर्च ये साबित नहीं कर सका कि एल्फोंसा में कोई चमत्कारिक शक्ति है। लेकिन उनकी मौत के बासठ साल बाद कंधमाल दंगों के आग में झुलस के ईसाईयों को खुश करने के लिए एल्फोंसा को संत का दर्जा दिया।
यदि संतियाने का आधार चमत्कार ही है तो हैदराबाद से चलनेवाले मीराकल नेट नामक चैनल पर रोज फादर लोग कई रोगियों का देखते देखते ईलाज कर देते हैं। क्या वेटिकन इन फादरों के चमत्कारों पर ध्यान नहीं देता।
गुरुवार, 27 नवंबर 2008
पचास हजार में बनते हैं ईसाई
मंगलवार, 25 नवंबर 2008
चर्च का झूठ
लेखक-आर एस फ्रांसिस
जी हां यह सच है कि धर्मांतंरण के मामले पर `चर्च झूठ बोलता है। चर्च से तात्पर्य यहां वैटिकन द्वारा संचालित रोमन कैथोलिक चर्च से है जो कि भारत में `कैथोलिक बिशप कांफ्रेस ऑफ इंडिया´ द्वारा शासित है, जिसका मुख्यालय नई दिल्ली में है। विगत माह उड़ीसा के कंधमाल में एक हिन्दू संत की हत्या के बाद भड़की हिंसा में वहां मुख्य कारण मंतातरण है, यह समस्या एक विकराल रुप लेती जा रही है, जिसमें केन्द्र की सरकार से लेकर पश्चिमी देशों की सरकारें तक अपनी-अपनी रोटियां सेंक रही है। उड़ीसा को मुद्दा बना कर `आस्ट्रेलिया, अमेरिका, फ्रांस, इटली आदि देश भारत पर दबाव बना रहे हैं।
वहीं दूसरी तरफ चर्च बड़ी सफाई से यह झूठ बार -बार बोल रहा है कि `हम धर्मांतरण नहीं करते´ "धर्मांतरण कराने वाले गुप्र या चर्च दूसरे है।" स्पष्ट है कि कैथोलिक चर्च धर्मांतरण के आरोप को खारिज करता है। पिछले दिनों कई टी.वी.चैनलों और आंग्रेजी अखबारों को कैथोलिक चर्च के कई अधिकारियों, बिशपों एवं प्रवक्ताओं ने यहीं कहा कि `हम तो निर्दोष हैं´-हम धर्मातरण करते ही नहीं, वे लोग कोई और हैं।कैथोलिक चर्च के अधिकारियों का यह तर्क `चर्च की गतिविधियों की मामूली समझ रखने वाले किसी भी व्यक्ति के गले नही उतर सकता´ क्योंकि एक ओर तो `वैटिकन/ पोप´ विश्व के कोने-कोने में जाकर समस्त पृथ्वी पर `ईसाइयत´ के विस्तार पर जोर दे रहे हैं। खुद `पोप जॉन पॉल द्वितीय´ ने एक दशक पूर्व अपने भारत प्रवास के दौरान यह घोषणा की थी कि इक्कीसवीं शताब्दी दक्षिण एशिया में चर्च की होगी। लेकिन आज उनके तमाम अनुयायी `बिशप, फादर, नन्स जोर देकर कह रहे है है कि किसी को ईसाई बनाने या उसका मत-परिवर्तन करने से हमारा कोई लेना देना नहीं है -`हिन्दुत्वादी कट्टरपंथी हमें बक्शें और जो अन्य ईसाई मिशनरी यह कार्य कर रहे हैं उनसे ही निपटें´।
इनके झूठ से पर्दा उठाता है पोप का 10 नवम्बर 1994 को एशिया के बिशपों के नाम लिखा गया एक पत्र जिसमें स्पष्ट किया गया है कि एशिया के इस भाग में (भारत और चीन) उनके प्राचीन धर्म और संस्कृति के कारण `क्रििष्चयानिटी´ के प्रचार पर दबाव बनता है और टकराव की स्थिति उत्पन होती है। यह ईसाइयत के विस्तार के लिए एक बड़ी चुनौती है क्योंकि हिन्दुइज्म और बुद्धिइज्म को यहां के लोगों ने नशे की सी आदत में अपना रखा है। इस पत्र से पता चलता है कि `पोप और उनके अनुयायियों की मानसिकता कैसी है। उनकी नजर में `हिन्दू और बौद्ध धर्मावलम्बी मात्र अंधविश्वास के नशे में डूबे हुए लोग है।´जिन्हें कैथोलिक चर्च उस नशे से उबार कर स्वस्थ्य मानसिकता देकर ईसाइयत द्वारा मुक्ति का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। यह एक तरह से हिन्दुओं एवं बौद्धों को गाली देने जैसी बात है।
वास्तविकता यह है कि अब हिन्दुओं के सामने भी अपनी संस्कृति और धर्म के आस्तित्व का प्रश्न खड़ा हो गया है। हिन्दू धर्म और संस्कृति पर सदियों से आक्रान्ताओं ने जुल्म ढाये हैं। कभी उन्हें काफिर कह कर कत्लेआम का ग्रास बनाया गया तो कभी उन्हें मूर्तिपूजक, अंधविश्वासी कहकर गाली दी गई। यह सिलसिला वर्तमान समय तक चल रहा हैं। भूमंडलीकरण के नाम पर चारों दिशाओं - धर्म, संस्कृति, अर्थव्यवस्था, राजनीति - पर अलग अलग तरह के मुलम्मे चढ़ाकर सुनियोजित आक्रमण हो रहे है। ऐसी स्थिति में अस्तित्व की रक्षा के लिए साम,दाम,दण्ड-भेद की नीतिया अपनाई ही जायेगी।
नई दिल्ली में जन्तर मंतर पर धरने पर बैठे `कैथोलिक आर्चडायसिस ऑफ दिल्ली के प्रवक्ता ने सफेद झूठ बोलते हुए मीडिया से कहा कि ``वैटिकन ने हमें स्पष्ट आदेश दिया है कि इंच मात्र या इशारे मात्र से भी किसी को धर्मांतरण के लिए प्रोत्साहित नहीं करें. उक्त चर्च अधिकारी कितना बड़ा झूठ बोल रहा है यह वैटिकन द्वारा जारी इस आदेश से साफ होता है। `एशिया फार ग्लेसिया´ में पोप/ वैटिकन- बिशपों, फादरों, ननों, कार्डीनल, डीकन और लेइटी को साफ निर्देश देता है कि वह एशिया में कैथोलिक चर्च की गतिविधियों को विस्तार देने में जुट जाए। ताकि एशियावासियों को अधिक से अधिक संख्या में `नया जीवन´ अर्थात मतांतरण द्वारा बचाया जा सकें। स्पश्ट है कि एशिया की जनता बगैर चर्च की शरण में गए मृत्प्राय है जिसे `पोप´ द्वारा नियुक्त किये गए बिशप, कार्डीनल, प्रीस्ट, नन्स व अन्य बप्तिस्मा (क्रििष्चयनटी संस्कार) पाये लोग ही नवजीवन दें सकते है।
सोमवार, 8 सितंबर 2008
कंधमाल हिंसा के लिए ईसाई मिशनरियां जिम्मेदार
कंधमाल में स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की नृशंसतापूर्वक हत्या के बाद हिंसा भड़की. निस्संदेह इस हिंसा में दर्जनों निर्दोषों को भी कीमत चुकानी पड़ी. मगर यह हिंसा क्यों भड़की, इस पर लीपा-पोती करने और तुष्टिकरण की नीति अपनाने से ज्यादा जरूरी है कि मसले पर गंभीरता पूर्वक विचार हो.
यह पहलीबार नहीं था जब कि स्वामी जी पर हमले हुए हों, अंतिमबार हुए हमले से पहले स्वामी पर आठ हमले और हुए थे, आठवां हमला आठ माह पहले हुआ था, जिसमें स्वामी से बाल-बाल बच गए. इस हमले के बाद कंधमाल में व्यापक हिंसा भड़क उठी थी. उस हिंसा की आग शांत हुई नहीं कि एकबार फिर स्वामीजी पर हमला हुआ और अंतिमरूप से उनकी हत्या कर दी गई. सरकार ने आनन-फानन में कह दिया कि ये हत्या माओवादी नक्सलियों ने की है. मामले की जांच किए बगैर.
स्वामीजी कंधमाल के आदिवासी बहुल क्षेत्र में शिक्षा और आदिवासियों के समग्र उत्थान की दिशा में कार्य कर रहे थे. स्वामीजी का ये कार्य ईसाई मिशनरियों को अच्छा नहीं लग रहा था. वे मिशनरियों की आंखों की किरकिरी बने हुए थे और मिशनरियां उन्हें अपने रास्ते से हटाना चाहती थी और आखिरकार हटाकर ही दम लिया.
वैसे ईसाई मिशनरियों का दंभ होता है कि वे निस्वार्थ समाज सेवा का काम कर रहे हैं, वे पिछड़े इलाकों में स्कूल, अस्पताल और सामुदायिक विकास केंद्रों का निर्माण करते हैं. मगर समाज सेवा की आड़ में ईसाई मिशनरियां व्यापक तौर पर धर्म परिवर्तन के काम में जुटी हुई हैं.
कंधमाल की ही बात करें तो छह लाख की आबादी वाले कंधमाल में एक लाख से भी ज्यादा ईसाई हैं. इनमें से करीब सत्तर हजार लोग अनुसूचित जाति से धर्मपरिवर्तन कराके ईसाई बनाए गए हैं. ईसाई मिशनरियों का अक्सर दावा होता है कि प्रभु ईशु मसीह तुमसे बहुत प्यार करते हैं, तुम्हें गले लगाना चाहता हैं. तुम्हारे सभी कष्टों और पीड़ाओं को खत्म कर देना चाहते हैं. तुम्हें गरीबी, बेकारी से छुटकारा दिलाना चाहते हैं. सच बात तो ये है कि भगवान राम की तरह स्वयं प्रभु ईशु मसीह ने भी अपने जीवन में अनेक दुख झेले, कष्टों का सामना किया, अंत में तो उन्हें सूली पर चढ़ा दी. वे स्वयं नियति प्रदत्त कष्टों से नहीं बच सके तो वे दूसरों का कष्ट कहां से हर लेंगे. यही वजह है कि ये धर्मांतरित ईसाई, मिशनरियों के लाख दावे के बाद भी गरीब हैं, ये गरीब अनपढ़ ईसाई, अनुसूचित जनजाति के तहत आरक्षण चाहते हैं. कंधमाल के कोंध(अनुसूचित जनजातियों) का मानना है कि उन्हें आरक्षण नहीं दी जा सकती है. संविधान के मुताबिक भी, अनुसूचित जाति(एससी) के जिन लोगों ने धर्मांतरण कर लिया है उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं दिया जा सकता है. कोंध जाति(एसटी) और धर्मांतरित ईसाईयों(पन्ना-एससी) के बीच इसी बात का झगड़ा है.
आरएसएस जैसी संस्थाओं पर अक्सर ये आरोप लगता रहा है कि वे धर्मांतरण तो रोकना चाहते हैं, लेकिन आदिवासियों के उत्थान और उसकी समस्याओं को सुलझाने के लिए उन्होंने कुछ भी नहीं कर रहे है. इसी आरोप के जवाब में आरएसएस की अनुषंगी संस्थाओं ने आदिवासी और पिछड़े इलाकों में व्यापक विकास के काम शुरू किए. मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, झारखंड के आदिवासी इलाकों में संघ के स्कूल, अस्पताल चलाए जा रहे हैं ताकि धर्म परिवर्तन को रोका जा सके. आरएसएस का काम ईसाई मिशनरियों के धर्म-परिवर्तन की राह में रोड़ा साबित हो रहा है, इसलिए वे इन्हें खत्म कर देना चाहते हैं.
उड़ीसा के कंधमाल में स्वामी लक्ष्मणानंद की हत्या इसी बात का उदाहरण है. जस्टिस एंड ट्रायल नामक स्वयंसेवी संगठन ने भी कंधमाल हिंसा के लिए ईसाई मिशनरियों को जिम्मेदार ठहराया. संगठन के अध्यक्ष और पूर्व महाधिवक्ता सरदार जीएस गिल ने एक संवाददाता सम्मेलन में कहा कि धर्म परिवर्तन निरोधक कानून के बावजूद ईसाई मिशनरियां भोले-भाले आदिवासियों का धर्म परिवर्तन करवा रही है, जिससे समय-समय पर तनाव पैदा होता रहता है. मामले की जांच के बाद संगठन के अध्यक्ष ने कहा कि लक्ष्मणानंद सरस्वती पर ईसाई मिशनरियों ने आठ बार हमले कराये और नौवे बार में स्वामी जी की मौत हो गई. समिति ने साफ साफ कहा कि इस बात की कोई ठोस वजह नहीं है कि माओवादियों स्वामी जी की हत्या कर दे. समिति ने ये भी कहा कि क्या ईसाई मिशनरियों ने माओवादियों से उनकी हत्या करायी है, इस बात की भी जांच कराई जानी चाहिए.
राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन के प्रवर्तक और प्रख्यात राष्ट्रवादी चिंतक के एन गोविंदाचार्य ने कंधमाल हिंसा के लिए सरकारों की तुष्टिकरण की नीति को जिम्मेदार ठहराया. उन्होंने कहा कि बार-बार की धमकी के बावजूद सरकार स्वामी जी जैसे महत्वपूर्ण व्यक्ति को सुरक्षा मुहैया कराने में नाकायाब रही है और उनकी हत्या के बाद उसे माओवादी का कारनामा करार दे रही है, जो अनुचित है.देशभर में चल रहे मिशनरी की स्कूलों पर भी सवाल उठ रहा है. कंधमाल की हिंसा के विरोध ईसाई मिशनरी स्कूलों ने बंद की घोषणा कर दी. साफ है कि ईसाई मिशनरियां मुफ्त में शिक्षा नहीं देती. अंग्रेजी शिक्षा के नाम पर भारी लूट-खरोट मचाए हुए है. इसके बावजूद वो स्कूलों में ईसाई धर्म की शिक्षा देती है. ईसाई धर्म से संबंधित किताबें बांटती है या यूं कहें धर्म परिवर्तन के लिए प्रोत्साहित करती हैं. जो ईलाका पिछड़ा है, वहां वह इस काम को अपने बूते करती भी है.
ऐसे में छद्म-निरपेक्षियों का भंडाफोड़ होना स्वाभाविक है, जो हर घटना के लिए सांप्रदायिक शक्तियों को जिम्मेदार ठहराते हैं. सत्य तो ये है कि इन्हीं लोगों की वजह से समाज में जहर घुलता जा रहा है.
शनिवार, 30 अगस्त 2008
क्यों जल रहा है कंधमाल
आठ महीनों बाद कंधमाल एकबार फिर जल उठा है. आठ महीने पहले स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती हमले को लेकर कंधमाल जल उठा है. अब बहाना है उन्हीं स्वामीजी की हत्या का. क्या स्वामी जी की हत्या ही कंधमाल की आग की वजह है या फिर कोई और? स्थानीय लोगों का मानना है कि ये आरक्षण की आग है जिसे हर कोई हर कीमत पर हासिल करना चाहता है. करीब साढ़ छह लाख की आबादी वाले कंधमाल जिले में बाबन प्रतिशत अनुसूचित जनजाति और सत्रह प्रतिशत अनुसूचित जाति के लोग रहते हैं. एक लाख के करीब यहां ईसाईयों की आबादी है. ईसाईयों की आधा से ज्यादा आबादी धर्मांतरित अनुसूचित जाति यानी एससी की है. धर्मांतरित ईसाई, पना ईसाई कहलाते हैं. पना ईसाई खुद को अनुसूचित जनजाति में शामिल किए जाने की मांग कर रहे हैं. जो कंधमाल में लगे आग की जड़ है. कानून के मुताबिक, जो अनुसूचित जनजाति धर्मांतरित होकर क्रिश्चन बन गए है उन्हें एसटी कोटे में आरक्षण का लाभ मिलता है, लेकिन अनुसूचित जाति के लोग, जिन्होंने अपना धर्म बदल लिया है उन्हें यह फायदा नहीं मिलता है. विश्व हिंदू परिषद पन्ना ईसाईयों को आरक्षण दिए जाने के विरोध में है.