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बुधवार, 17 फ़रवरी 2016

'देश इतना कमजोर नहीं कि कुछ नारों से टूट जाए'

'साला सब पॉलिटिक्स है.. यूपी चुनाव करीब है.. इसलिए सब बीजेपी करवा रही है..'
'नारे लगाने वाले तो साफ साफ दिख रहे हैं.. इसमें बीजेपी वाले कहां है.. अगर बीजेपी वाले हैं तो दूसरे लोग उन्हें चुप करा सकते थे..'
'इससे क्या हो जाएगा..?'
'इससे क्या हो जाएगा..? देश टूट जाएगा'
'देश इतना कमजोर नहीं है कि ये किसी के नारे से टूट जाए'
"हम लोग ज्यादा बुद्धिमान हो गए हैं इसलिए ये बात कह रहे हैं.. अगर सेना का एक जवान पीठ दिखाकर सरहद से भाग आए तो साथी जवान उसे गोली मार देते हैं.. उसका कोर्ट मार्शल हो जाता है.. और हम नारों की स्वतंत्रता की चाहत रखते हैं"

देशभर में ऐसी बहस तेज है.. मुट्ठीभर लोग नारे लगा रहे हैं.. मुट्ठी भर लोग उसे सही ठहरा रहे हैं.. लेकिन ज्यादातर देशवासी देशद्रोहियों की गतिविधियों से आहत हैं.. जिस यूनिवर्सिटी से देश का भविष्य निकलने की उम्मीद पाले हुए हैं.. उस यूनिवर्सिटी में देशद्रोही पल रहे हैं.. देश के टुकड़े करने की बात कर रहे हैं.. हाल एक दो नहीं कई यूनिवर्सिटीज का है.. पहले जेएनयू और अब यादवपुर यूनिवर्सिटी का वीडियो सामने आया है.. संसद पर हमला करने वाले आंतकियों की शहादत को सलाम किया जा रहा है.. उनके कातिलों (ये कातिल कौन हैं.. भारत सरकार, देश की अदालत) से बदला लेने की बात कही जा रही है.. इन देशद्रोहियों ने जो नारे लगाए उनके नमूने तो देखिए-
  • “पाकिस्तान जिंदाबाद”
  • “गो इंडिया गो बैक”
  • “भारत की बर्बादी तक जंग रहेगी जारी”
  • “कश्मीर की आजादी तक जंग रहेगी जारी”
  • “अफ़ज़ल हम शर्मिन्दा है तेरे कातिल ज़िंदा हैं”
  • “तुम कितने अफजल मरोगे, हर घर से अफ़ज़ल निकलेगा”
  • “अफ़ज़ल तेरे खून से इन्कलाब आयेगा”                   इस देश में भगत सिंह के खून से इंकलाब नहीं आया.. सुभाष चंद्रबोस के कून से इंकलाब नहीं आया.. ये देशद्रोही अफजल, मकबूल और याकूब जैसे आंतकियों के खून से इंकलाब लाना चाहते हैं..  देशद्रोही तो देशद्रोही ठहरे हमारे नेता (इन्हें देश के माथे पर कलंक कहिए) अभिव्यक्ति का हवाला देकर इन देश द्रोहियों का बचाव कर रहे हैं.. इनमें एक नहीं, तमाम सेक्युलर पार्टियों के नेता (कम्युनल बीजेपी?) को छोड़ दें तो शामिल हैं.. राहुल गांधी, सीताराम येचुरी, वृंदा करात, नीतीश कुमार, केसी त्यागी, अरविंद केजरीवाल, लालू प्रसाद सब के सब शामिल हैं.. अमित शाह ने राहुल से पूछा--
    इन छात्रों को सही ठहराकर राहुल गांधी किस लोकतांत्रिक व्यवस्था की वकालत कर रहे हैं. क्या राहुल गांधी के लिए राष्ट्रभक्ति की परिभाषा यही है ? देशद्रोह को छात्र क्रान्ति और देशद्रोह के खिलाफ कार्यवाही को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कुठाराघात का नाम देकर उन्होंने राष्ट की अखण्डता के प्रति संवेदनहीनता का परिचय दिया है. मैं उनसे पूछना चाहता हूं कि इन नारों का समर्थन करके क्या उन्होंने देश की अलगाववादी शक्तियों से हांथ मिला लिया है ? क्या वह स्वतंत्रता की अभिवक्ति की आड़ में देश में अलगाववादीयों को छूट देकर देश का एक और बटवारा करवाना चाहते है?
    देश की राजधानी में स्थित एक अग्रणी विश्वविद्यालय के परिसर को आतंकवाद और अलगाववाद को बढ़ावा देने का केंद्र बना कर इस शिक्षा के केंद्र को बदनाम करने की साजिश की गयी. मैं राहुल गांधी से पूंछना चाहता हूं कि क्या केंद्र सरकार का हांथ पर हांथ धरे बैठे रहना राष्ट्रहित में होता ? क्या आप ऐसे राष्ट्रविरोधियों के समर्थन में धरना देकर देशद्रोही शक्तियों को बढ़ावा नहीं दे रहे है ?
    देश की सीमाओं की रक्षा और कश्मीर में अलगाववाद को नियंत्रित करते हुए हमारे असंख्य सैनिक वीरगति को प्राप्त हो चुके है. 2001 में देश की संसद में हुए आतंकवादी हमले में दिल्ली पुलिस के 6 जवान, 2 संसद सुरक्षाकर्मी और और एक माली शहीद हुए थे.
    इसी आतंकी हमले के दोषी अफ़ज़ल गुरू का महिमा मंडल करने वालों और कश्मीर में अलगाववाद के नारे लगाने वालों को समर्थन देकर राहुल गांधी अपनी किस राष्ट्रभक्ति का परिचय दे रहे है? मैं उनसे पूंछना चाहता हूं कि अभी हाल में सियाचिन में देश की सीमा के प्रहरी 9 सैनिकों जिनमे लांस नायक हनुमंथप्पा एक थे के बलिदान को क्या वह इस तरह की श्रद्धांजली देंगे ?
    अमित शाह ने कहा कि मोदी की सफलता से कांग्रेस में घोर हताशा और निराशा है.. इस हताशा में वो देश हित और देश विरोध भूल गए हैं.. 
    अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर कुछ भी कहने की आजादी कैसे दी जा सकती है.. इन देशद्रोहियों को ऐसा सबक सिखाया जाए.. कि वो फिर से देश तोड़ने की बात न करेंगे.. 

    जिस सियाचीन को हमने कभी नहीं देखा.. ना कभी हम देखेंगे.. उस निर्जन शीत रेगिस्तान के लिए हमारे करीब 1000 से ज्यादा जवान अब तक क्यों शहीद हुए.. क्यों लांस नायक हनुमंतथप्पा ने अपने प्राणों की आहूति दे दी.. क्यों एक-एक जवान पर सरकार करोड़ों खर्च कर रही है.. क्यों हमने इतनी बड़ी सेना खड़ी कर रखी है.. इसलिए कि दिल्ली के सीने पर बैठकर देशद्रोदी देश को तोड़ने की कसमें खाएं.. आतंकियों की मौत का बदला देने के लिए तकरीरें दे... 
    अब तक ये कहा जा रहा था कि नारेबाजी करने में जेएनयू छात्र संघ का नेता कन्हैया कुमार शामिल नहीं था.. लेकिन उसका भी नया वीडियो आ गया है.. जेएनयू के इन देशद्रोहियों के बचाव में उतरा है.. जेएनयू टीचर्स एसोसिएशन.. जो टीचर्स एसोसिएशन यूनिवर्सिटी में ऐसी गतिविधियों को बढ़ावा देता हो वो तो बचाव में उतरेगा ही..  
    ऐसा नहीं है कि जेएनयू में सारे टीचर्स एक जैसे हैं.. कई टीचर्स हैं ऐसे भी हैं.. जो पढ़ाना चाहते हैं.. और देशद्रोही छात्र और टीचर्स उन्हें पढ़ाने और छात्रों को पढ़ने नहीं देते हैं.. ऐसे लोगों को एक्सपोज करना और उनपर कड़ी कार्रवाई करना जरूरी है.. ये टीचर्स आतंकियों से मिले हैं.. आइये सुनते हैं एक टीचर का खुलासा..  

    हर छात्र का हर साल तीन साल की सब्सिडी सिर्फ इसलिए दी जाती है कि यहां आतंकवादियों के नर्सरी तैयार हो.. यह दुर्भाग्यपूर्ण है.. और इससे निपटने बेहद जरूरी है..

     
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मंगलवार, 1 नवंबर 2011

क्या हुआ हिंदू आतंकवाद का... संदर्भ- मालेगांव धमाके के आरोपियों की जमानत का एनआईए नहीं करेगी विरोध

केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम ने एक अहम जानकारी दी है- जिससे हिंदू आतंकवाद के पैरोकारों को सदमा लगे और हिंदू आतंकवाद शब्द का विरोध कर रहे लोगों को थोड़ी शांति मिले। वो जानकारी ये है कि अब एनआईए यानी राष्ट्रीय अन्वेषण ब्यूरो(शायद, जिसका निर्माण सिर्फ और सिर्फ हिंदू आतंकवाद पर नकेल कसने की मकसद से हुआ था), अब मालेगांव धमाके के नौ आरोपियों की जमानत याचिका का विरोध नहीं करेगी।
सवाल उठता है आखिर क्यों, क्या एनआईए थक गया है या यूपीए सरकार थक गई या हिंदू आतंकवाद का राग अलापने वाले कांग्रेसी नेता, चाहे कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी हो या वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी या गृहमंत्री पी चिदंबरम थक गए हैं।
आखिर, एनआईए अब क्यों विरोध नहीं करेगी जमानत याचिका का।
आखिरकार, इन लोगों को तीन सालों तक जेल में रखने के बाद एनआईए अब क्यों पीछे हट रही है। कम से कम जांच पूरी होने तक और आरोप पत्र दाखिल होने तक इन लोगों को जेल में तो रखा ही जा सकता है। मगर, इन तीन सालों में मुंबई एटीएस और एनआईए ने क्या हासिल किया।
इसका सिर्फ एक और एक जवाब है- कुछ नहीं, सिफर, शून्य और कुछ नहीं।
आखिर मुंबई एटीएस और एनआईए इतनी निकम्मा है जो अपने आकाओं की एक हसरत पूरी नहीं कर सका।
गृहमंत्री की इस घोषणा के बाद, महाराष्ट्र एटीएस को बड़ी फजीहत और शर्मींदगी झेलनी पड़ेगी। इतना हीं, इस मामले ने उसकी जांच के तरीकों और बड़े बड़े दावों(अपने राजनीतिक आकाओं की शह पर ही सही) पोल खोलकर रख दी है।
जब चिदंबरम से पूछा गया कि क्या तीन सालों से जेल में बंद ये लोग निर्दोष हैं तो चिदंबरम ने कहा-- नहीं..
और तब तक नहीं, जब इस धमाके में शामिल किसी दूसरे व्यक्ति के बारे में पता नहीं लगा लिया जाता और उसके खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किए जाते।
इतना ही, चिदंबरम ने यहां तक कहा कि जब पुराने आरोप पत्र का संशोधन नहीं हो जाता, तब तक वो किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकते।
हालांकि चिदंबरम को अभी भी स्वामी असीमानंद के कथित स्वीकारोक्ति में हिंदूवादी आतंकवाद की संभावना दिख रही है।
ये सभी तक साफ नहीं हो पाया है कि राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण यानी एनआईए इन नौ लोगों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल करने वाले पुलिस अधिकारियों की भूमिका की जांच करेगी या नहीं। आखिर इन पुलिस अधिकारियों ने किस आधार पर इन लोगों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया।

मंगलवार, 26 जुलाई 2011

क्या ये सिर्फ उपयोगी बेवकूफ हैं?

मूल लेखक- एस गुरुमूर्ति साभार- एक्प्रेसबुज.कॉम अनुवाद- सत्यजीत प्रकाश

उदारवादियों और धर्मनिरपेक्षतावादियों की सूची देखिएः- जस्टिस राजिंदर सच्चर(देश में मुसलमानों की स्थिति पर मशहूर सच्चर समिति की रिपोर्ट के लेखक), दिलीप पडगांवकर(केंद्र सरकार द्वारा कश्मीर पर गठित तीन मध्यस्थों में से एक), हरीश खरे(प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार), रीता मनचंदा(भारत-पाक शांति के लिए संघर्ष करने वाली महिलाओं के एक समूह की स्थानीय साझेदार), वेद भासिन(कश्मीर टाइम्स के संपादक), हरिंदर बावेजा(खोजी संपादक, हेडलाइन्स टुडे), गौतम नवलखा व कमल चेनॉय(मानवाधिकार कार्यकर्ता), प्रफुल्ल विदवई (मशहूर स्तंभकार)

ये लोकप्रिय भारतीय उदारवादियों की सूची है, जो भारतीय संवाद में अहम प्रभाव रखते हैं- चाहे मामला कश्मीर का हो या धर्मनिरपेक्षता का, मामला भ्रष्टाचार का हो या सांप्रदायिकता का, बात नरेंद्र मोदी की हो या सोनिया गांधी का।

लेकिन ये सूची पद्म पुरस्कारों के लिए संभावित लोगों की सूची नहीं है। ये उन लोगों की सूची है जो गुलाम नबी फाई के अतिथि बनते रहे हैं। वही, गुलाम नबी फाई जिसे आईएसआई के लिए काम करने के आरोप में अमेरिकी खुफिया एजेंसी एफबीआई ने गिरफ्तार किया है। उन्नीस जुलाई को वाशिंग्टन टाइम्स में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, फाई को जिन आरोपों में गिरफ्तार किया गया है उनमें पाकिस्तानी सरकार और पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई से लाखों डॉलर लेना, कश्मीर से भारत को निकाल बाहर करने के लिए निर्वाचित अमेरिकी अधिकारियों को प्रभावित करने के लिए इन पैसों से योजनाएं बनाना शामिल है। फाई को कश्मीर से भारत को निकाल बाहर करने के लिए योजना बनाने के जुर्म में गिरफ्तार नहीं किया गया है क्योंकि अमेरिका में ऐसा करना अपराध नहीं है। बल्कि फाई पाकिस्तानी हितों के लिए अमेरिकी अधिकारियों के प्रभाव को खरीदने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। भारतीय कानून के मुताबिक, अगर इन लोगों को पता होता कि ये फाई कौन है, तो फाई की सूची में शामिल इन भारतीय उदारवादियों पर देशद्रोह का मामला हो सकता है और अगर इनको फाई के बारे में पता नहीं था तो पूर्व संपादक आर जगनाथन के मुताबिक सिर्फ उपयोगी बेवकूफ हैं। लेकिन क्या ये सिर्फ बेवकूफ हैं।

इस मामले में अपने ४५ पृष्ठों के शपथपत्र में एफबीआई ने फाई पर विदेशी नीतियों के एजेंट के रूप में काम करने का षडयंत्र रचने का आरोप लगाया। रिपोर्टों के मुताबिक, एफबीआई ने अपने शपथ पत्र में फाई को अमेरिकी में कश्मीरी चोले में पाकिस्तानी हितों के लिए काम करने वाला बताया। जिन्हें कश्मीरी चोले के रूप में कश्मीर अमेरिकी कौंउसिल नामक संस्था बना रखी थी। रिपोर्टों के मुताबिक, फाई पाकिस्तान में बैठे अपने आकाओं से बात-बात पर सलाह लेता था। एफबीआई ने अपने शपथ पत्र में कहा है कि हर साल ढाई करोड़ से साढ़े तीन करोड़ के हिसाब से फाई ने पाकिस्तान से कम से कम ४ मिलियन(यानी बीस करोड़ रुपये) कश्मीर मुद्दे को पाकिस्तान के पक्ष में मोड़ने के लिए लिये। लेख के शुरू में जिन लोगों का जिक्र किया गया है वो वही लोग है जो फाई की कार्ययोजना को आगे बढ़ाने में उसके पैरवीकार हैं। कश्मीर से भारत को भगाने के लिए आईएसआई के इशारे पर फाई द्वारा आयोजित विचार मंथन और बैठकों में ये लोग शामिल होते रहे हैं।

ऐसा लगता है कि फाई को पाकिस्तान में बैठे उनके आकाओं से संबंध बताने के लिए एफबीआई ने पुख्ता काम किया है। ऐसा करने के लिए एफबीआई ने फाई और उसके आकाओं के करीब चार हजार ईमेलों और फोन-कॉलों को इकट्ठा किया है। ऐसा लगता है कि फाई के एक सहयोगी ने जुर्म कबूल कर लिया है कि फाई आईएसआई का एक कारकून है और एफबीआई इस सहयोगी को बतौर गवाह इस्तेमाल करना चाहता है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार इस गवाह के मुताबिक, पाकिस्तान सरकार के लिए प्रचार करने के लिए आईएसआई ने कश्मीर अमेरिकी कौंसिल का निर्माण करवाया। चूंकि फाई एक कश्मीरी है और उसके पास अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से मास्टर की डिग्री है इसलिए वो अमेरिका को बैगर संदेह हुए वहां काम कर सकता था। रिपोर्टों के मुताबिक, आईएसआई एजेंट होने के बाद उसने पाकिस्तान और आईएसआई के निर्देश पर काम करना शुरू किया। इसके लिए पैसे उसे आईएसआई से मिलते थे। उपरोक्त गवाह के मुताबिक, फाई के भाषण का अस्सी प्रतिशत हिस्सा आईएसआई लिखकर देता था और बाकी बीस प्रतिशत पर भी उसकी स्वीकृति लेनी होती थी। इसलिए फाई सौ फीसदी आईएसआई का एजेंट था।

हमारे उपरोक्त उदारवादी और धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवी इस आईएसआई एजेंट यानी गुलाम नबी फाई द्वारा आयोजित सम्मेलनों में भारत के बतौर महत्वपूर्ण अतिथि शिरकत करते थे। इन बुद्धिजीवियों की मदद से फाई भारत के हितों को नुकसान पहुंचाने में बड़े ही प्रभावी ढ़ंग से कारगर हुआ। फाई का मुकाबला करने के लिए भारत सरकार को पिछले साल कश्मीर कैडर के एक रिटायर्ड आईएएस अधिकारी वजाहत हबीबुल्लाह को वाशिंगटन स्थित अमेरिकी दूतावास में सामुदायिक मामलों का मंत्री नियुक्त करना पड़ा।

कितनी विचित्र बात है। एक तरफ भारत को कश्मीर से भगाने के लिए प्रधानमंत्री के वर्तमान मीडिया सलाहकार हरीश खरे और कश्मीर मामलों पर सरकार के तीन मध्यस्थों में एक दिलीप पडगांवकर आईएसआई के पैसों से आयोजित समारोहों में शिरकत कर भारत के हितों को चोट पहुंचाते हैं, आहत करते हैं, नुकसान पहुंचाते हैं दूसरी तरफ, भारत सरकार को नुकसान की भरपाई के लिए कश्मीर कैडर के एक रिटायर्ड आईएएस अधिकारी को वाशिंगटन भेजना पड़ता है। नतीजा साफ है कि जो लोग फाई के जरिए आईएसआई के षडयंत्र के हिस्सा हैं वही लोग आज यूपीए सरकार के भी अंग हैं।

मगर, सवाल है कि क्या भारत को कश्मीर से बाहर करने के षडयंत्र में फाई इन महत्वपूर्ण लोगों ये जाने बगैर शामिल कर लिया कि इनके विचार उसके आकाओं के हितों को आगे बढाएगा। फाई ने किसी अरुण शौरी, किसी चो रामास्वामी, किसी एमजे अकबर, किसी अर्नब गोस्वामी को क्यों नहीं बुलाया। साफ है कि इन लोगों के विचार आईएसआई के एजेंडे और षडयंत्र को आगे नहीं बढ़ाते, बल्कि अवरुद्ध कर देते। फाई जानता था कि उसकी सूची में शामिल भारतीय उदारवादियों का जम्मू-कस्मीर पर विचार अलगाव वादियों के लिए हितकर होगा और आईएसआई के षडयंत्र को सफल बनाएगा। इसलिए इन्हें सिर्फ उपयोगी बेवकूफ मानना ठीक नहीं है, बल्कि इसे खारिज करना आसान है।


फाई की सूची के दो उदारवादी अब भी अतिउच्च पद पर हैं- एक जम्मू-कश्मीर पर केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त मध्यस्थ हैं(कैबिनेट सचिव स्तरीय वेतन और सुविधाएं) तो दूसरे प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार हैं। प्रधानमंत्री जी, ये सबूत कोई भारतीय पुलिस नहीं दे रही है। बल्कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी एफबीआई दे रही है। ये वही अमेरिका है जिसे आप सबसे ज्यादा प्यार करते हैं। आप सुन रहे हैं।


पद-टिप्पणी- इस लेख में कुलदीप नैयर का नाम शामिल नहीं है।

सोमवार, 25 जुलाई 2011

कुलदीप नैयर ने क्यों पकड़ा कान?


देश में राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में संलिप्त लोगों को कोई कमी नहीं है। इनमें कई अपने आपको नामी-गिरामी पत्रकार और बुद्धिजीवी होने का दावा करते हैं। ऐसे लोगों पत्रकारों और बुद्धिजीवियों की दुकान चल भी रही है क्योंकि ये लोग आईएसआई जैसी भारत विरोधी गतिविधियों में संलिप्त एजेंसियों के पैसे से विदेशों की यात्रा करते हैं, उनके सेमिनार में शामिल होते हैं, जाने-अनजाने भारत विरोधी बयान देते हैं, कश्मीर की आजादी की बात करते हैं, आतंकवादियों के मानवाधिकारों की पैरवी करते हैं, राष्ट्रविरोधी ताकतों को संरक्षण देने की वकालत करते हैं, आतंकवादियों के पुनर्वास के लिए लॉबिंग करते हैं। इसके लिए ये लोग आईएसआई जैसी एजेंसियों से संरक्षण पाने वाले संगठनों से कुछ पुरस्कार, अवार्ड आदि जैसी चीजें पा जाते हैं। पुरस्कार पा जाने के बाद स्वघोषित सेक्यूलर भारतीय मीडिया संस्थानों में इन लेख संपादकीय पृष्ठों में छप जाता है, बदले में मोटी रकम की कमाई भी हो जाती है अंग्रेजी बोलने वाले इनमें कई कथित पत्रकारों और बुद्धिजीवियों को टेलीविजन का ग्लैमर पाने का वांछित मौका भी मिल जाता है। इस मौका को हासिल करते-करते इन लोगों को कुछ अंतर्राष्ट्रीय अवार्ड और कुछ राष्ट्रीय अवार्ड भी मिल जाता है और ये लोग देशी संस्कृति को मुंह चिढ़ाने लगते हैं। देश के लिए त्याग और तपस्या करने वालों को मुंह चिढ़ाते हैं। सरकार में अपनी पैठ बनाते हैं फिर योजना परियोजना पारित करते हैं। देश में मन-मुताबिक कानून बनाने के लिए लॉबिंग करते हैं।

ऐसे पत्रकारों, लेखकों और बुद्धिजीवियों पर इस तरह के आरोप काफी अर्से से लगते रहे हैं। मगर, इनकी पुष्टि जब तक अमेरिका जैसे पश्चिमी देश नहीं कर देते हैं तब तक हमारे देश में इन्हें मानने की प्रथा और परंपरा नहीं रही है। स्वामी विवेकानंद भारत भ्रमण करते रहे लेकिन उन्होंने किसी ने विद्वान या ऋषि नहीं माना। किसी ने उन्हें पूज्य नहीं समझा। अपने को साबित करने के लिए उन्हें अमेरिका जाना पड़ा, वहां जब अमेरिकी विद्वानों ने उनकी विद्वता
को
लोहा माना तो विवेकानंद रातों रात मशहूर हो गए। भारत ने उन्हें तत्काल पूज्य मान लिया। हमारे तथाकथित बुद्धिजीवियों और मानवाधिकारवादियों पर लगे आरोपो के बारे में जब अमेरिका ने आरोप लगाया तो पूरी दुनिया में, खासकर भारत के बुद्धिजीवियों में हलचल मच गई।
कुलदीप नैयर ने तो ऐसे सेमिनारों में जाने से कान ही पकड़ ली।
दरअसल, पूरा मामला गुलाम नबी फाई की गिरफ्तारी से सामने आया। फाई कश्मीरी पृथक्कतावादी बुद्धिजीवी है। जिसने पाकिस्तान के किसी विश्वविद्यालय से जनसंचार में पीएचडी की डिग्री हासिल की और इस दौरान वो पाकिस्तान खुफिया एजेंसी आईएसआई के संपर्क में आया। आईएसआई ने फाई की बुद्धि और उसकी भारत विरोधी मानसिकता का इस्तेमाल करना चाहा और उसे अमेरिका भेज दिया।
गुलाम नबी फाई अमेरिका में भारत विरोधी गतिविधियों में संलिप्त हो गया। वह अमेरिका में भारत-विरोधी जनमत तैयार करने लगा। वह कश्मीर में भारतीय सेना द्वारा कथित मानवाधिकारों के उल्लंघन और कश्मीर के आजादी के लिए अमेरिकी सांसदों दबाव बनाने लगा और ऐसे सांसदों, नेताओं और बुद्धिजीवियों का गुट तैयार करने लगा। गुलाम नबी फाई की नजर भारत के ऐसे बुद्धिजीवियों और पत्रकारों पर भी थी जो कश्मीर में मानवाधिकार के कथि उल्लंघन पर आए दिन शोर-मचाते रहते हैं और किसी न किसी रूप में कश्मीर की आजादी का गीत गाते हैं। अरुंधती राय जैसे लोगों की आवाज काफी मुखर है तो बाकी लोग अपने निजी स्वार्थों के लिए किसी न किसी रूप में इस कार्य में शामिल हैं। दुर्भाग्यवश जैसे लोग मानवाधिकार के पैरोकार समझे जाते हैं और सम्मानित भी किए जाते हैं।
जहां तक बात फाई की है तो वो कई सालों से अमेरिका में भारत विरोधी गतिविधि चला रहा था। अमेरिका में उसकी गिरफ्तारी के बाद ही इन सब बातों का खुलासा हुआ है कि अमेरिका पाकिस्तान में आतंकवाद से लड़ाई के लिए जो पैसा देता है। उसी पैसे का इस्तेमाल पाकिस्तान की आईएसआई भारत विरोधी गतिविधियों के लिए करता है। इसी पैसे का एक बड़ा हिस्सा गुलाम नबी फाई के पास भी पहुंचता है। अमेरिका द्वारा कोर्ट में दी गई जानकारी के मुताबिक, आईएसआई ने वर्ष 2010-2011 में गुलाम नबी फाई को 4 से 5 मिलियन डॉलर धन दिया। फाई इस धन का इस्तेमाल कश्मीर की आजादी के लिए अमेरिकी सांसदों को अपने पक्ष में करने, भारतीय पत्रकारों और बुद्धिजीवियों को अमेरिका बुलाकार सेमिनार कराने आदि के लिए किया करता था।
अमेरिका में गुलामनबी फाई के सम्मेलन में जाने वाले भारतीय बुद्धिजीवियों और पत्रकारों में कुलदीप नैयर, हरिंदर बवेजा और दिलीप पडगांवकर शामिल हैं।
याद रहे ये दिलीप पडगांवकर वहीं हैं तो कश्मीर समस्या के समाधान के लिए भारत सरकार द्वारा गठित तीन सदस्यीय सलाहकार समिति में शामिल हैं। जो अलगाववादियों और आतंकवादियों से बातचीत के पक्षधर रहे हैं और जिन्होंने उनसे जेलों में जाकर मुलाकात भी है। दिलीप पडगांवकर आतंकवादियों के पुनर्वास की भी पैरवी करते रहे हैं।
ये स्वनामधन्य पत्रकार थोड़े से नाम और पैसे के लिए गुलाम नबी फाई जैसे देशद्राहियों का मोहरा बनते रहे हैं। और जाने-अनजाने आईएसआई के पैसे पर देशविरोधी गतिविधियों में शामिल एजेंसियों के लिए विदेश दौरा करते रहे हैं।
यहां ध्यान देने वाली बात है कि फाई सालों से अमेरिका में रहकर आईएसआई के पैसे से भारत विरोधी गतिविधियां चला रहा था और ऐसा नहीं है कि अमेरिका को इसकी भनक नहीं लगी होगी। मगर, अमेरिका ने इसका भंडाफोड़ तब किया है जब उसे अमेरिका पर लगाम लगानी थी। पाकिस्तान के एबटाबाद में अलकायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन की हत्या के बाद पाकिस्तान के साथ अमेरिका की ठनने लगी फिर अमेरिका ने पाकिस्तान को उसकी औकात बतानी चाही और गुलाम नबी फाई की कारिस्तानियों का भंडाफोड़ किया।
अब किसी को समझने में देरी नहीं करनी चाहिए कि अरुंधती राय जैसे लोगों को बुकर पुरस्कार क्यों मिल जाता है। क्यों जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी से लाल पैगाम देने वाले अमेरिका विरोधी राग अलापते रहते हैं और ज्योंही कोई मौका मिलता है अमेरिका के लिबर्टी ऑफ स्टेच्यू से जा लिपटते हैं।

गुरुवार, 27 नवंबर 2008

लोग नहीं रखेंगे याद


मुंबई में छब्बीस तारीख की रात क्या हुआ, कहने की जरूरत नहीं है. मैं पूरी रात टेलीविजन चैनल बदलता रहा. टेलीविजन चैनलों ने इसे देश का सबसे बड़ा आतंकवादी हमला करार दिया. हताहतों की संख्या के हिसाब से देखें तो यह हमला देश में हुए कई अन्य हमलों से छोटा है, लेकिन यह हमला जितना जटिल है, जितने लंबे देर तक चला है(अभी जारी है), इसे देश का सबसे बड़ा आतंकवादी हमला कहा जाना गैर-मुनासिब नहीं है. सबसे अहम बात अभी मिली जानकारी के मुताबिक, पुलिस के ग्यारह मारे जा चुके हैं. इनमें मुंबई एटीएस के प्रमुख हेमंत करकरे, एक एसीपी और एक एनकाउंटर स्पेशलिस्ट शामिल हैं. खबरों में मुताबिक नौ सेना का एक जवान भीमारा गया है. ऑपरेशन में राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड के 200 कमांडो, थल सेना और नौ सेना के जवान, ब्लैक कमांडो, मुंबई पुलिस जुटा हुआ है. ताज होटल, ट्रिडेंट होटल, ओबराय होटल में फंसे पर्यटकों और विदेशी अधिकारियों को निकाला जा रहा है. पिछले बारह घंटे से लगातार ऑपरेशन जारी है. कब खत्म होगा कहा नहीं जा सकता है.


कहा जा रहा है कि एक दर्जन से ज्यादा आतंकवादी समुद्री रास्ते से आए. एक तिकड़मी टेलीविजन चैनल, जिसे खबरें ज्यादातर सूत्रों से ही मिलती है, ने बार-बार कहा है कि आतंकवादी गुजरात से आए हैं. उस चैनल के सूत्रों का कहना है कि केंद्र सरकार ने उसे बहुत सी जानकारी दी है, लेकिन ये जानकारी चैनलों के माध्यम से आतंकवादी तक नहीं पहुंच जाएं, इसलिए वह इन्हें अपने चैनल पर नहीं दिखा सकता है. हालांकि कई चैनलों ने लगातार बड़ी ही शिद्दत से पल-पल की जानकारी दी, सही जानकारी देने की हर संभव कोशिश की. आईबीएन-7 का पत्रकार तो मानों रो-रोकर जानकारी दे रहा हो.


होटलों, छत्रपति शिवाजी टर्मिनल और सड़कों पर कहीं चीख पुकार थी, तो कहीं कराह. कुल मिलाकर एक जबरदस्त सन्नाटा.
इन सबके बीच चैनलों पर शहीदों के गुनगान में कसीदे पढ़े जाने लगे. कहा जाने लगा कि इन शहीदों को हिंदुस्तान कभी नहीं भूलेगा, यानी हमेशा याद रखेगा. लेकिन पश्चिमी इतिहासकारों का ये आरोप कि हिंदुस्तानी कभी अच्छे इतिहासकार नहीं रहे हैं, क्योंकि वे भुलक्कड़ होते हैं. हम हिंदुस्तानी इस कथ्य पर भले ही विदेशियों को गाली दें, लेकिन गंभीरतापूर्वक सोंचे तो वह कहीं न कहीं सच कह रहे होते हैं. सच है कि हम बड़ी से बड़ी घटना, बड़े से बड़े दर्द, बड़े से बड़े अपमान, बड़ी से बड़ी जिल्लत, बड़ी से बड़ी मार को भूलने के आदि होते हैं. ऐसे में ये कहा जाए कि इन शहीदों को देश कभी नहीं भूलेगा. ये उनकी शहादत को गाली देना है. वो व्यक्ति जब तक जिंदा था, जो हुआ पाप पुण्य किया. अब उसके जाने के बाद तो उसे गाली नहीं दें, लेकिन हमारी फितरत है कि हम इसके आदि हैं.


मुठभेड़ जारी है, तब तक हम थोड़े संजीदा हैं. हालांकि बेशर्मों, पतितों और कुकर्मियों का इक्का-दुक्का बयान आना शुरू हो गया है. भौं-तरेर चिरकुच ने कह दिया है कि राज्य सरकार को तमाम सरकारी इमदाद मुहैया करायी जा रही है, जिसकी उसे जरूरत है. तिकड़मी चैनल का जाल बिछना शुरू हो गया है. उसने बता दिया है कि आतंकवादी गुजरात से आएं है. उसके पास बहुत सी जानकारी है, जिसे केंद्र सरकार ने उसे मुहैया कराया है, वो भी सूत्रों के जरिए. मुठभेड़ को खत्म होते ही वह इस गुप्तज्ञान का प्रचार प्रसार करेगा. इस ज्ञान में कुछ बातें इस तरह की है-
पहला, तो इसे विदेशी हमला करार दिया जाएगा.
दूसरा, इसे अंडरवर्ल्ड की सांठगांठ बताया जाएगा.
तीसरा, इसमें हिंदू आतंकवादियों(इस तिकड़मी चैनल और कांग्रेस की हालिया खोज) के शामिल रहने की बात कही जाएगी.
चौथा, गुजरात सरकार को कठघरे में खड़ा किया जाएगा.


और भी कई बातें हो सकती हैं, जिसे उद्घाटन तो यही चैनल करेगा.


मुठभेड़ के खत्म होते ही, बेशर्मों, कथित धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवियों, लाल सलाम ब्रिगेड आदि की बेशर्म बयानबाजी शुरू हो जाएगी. भगवा ब्रिगेड को ओर से पोटा जैसे कड़े कानून की मांग होगी. जिसे लात मारे कुत्ते की कांय-कांय समझकर खारिज कर दिया जाएगा. नए सिरे से हिंदू आतंकवादियों की खोज की जाएगी. उन्हें परेशान किया जाएगा, यातनाएं दी जाएगी. फिर कहां याद रहेंगे ये शहीद. और आखिर हिंदुस्तान उन्हें क्यों याद रखेगा.

सोमवार, 20 अक्टूबर 2008

एक मुसलमान सौ बेईमान


सबसे पहले, दो घटनाओं का जिक्र करना चाहूंगा. पहली, कांग्रेस के मुस्लिम नेताओं ने शनिवार को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाकात कर उन्हें जामियानगर के बाटला हाउस मुठभेड़ कांड को लेकर अल्पसंख्यक समुदाय में उठ रही शंकाओं से अवगत कराया और इसे दूर करने के लिए तत्काल प्रभावी कदम उठाए जाने की मांग की. इस प्रतिनिधिमंडल में कांग्रेस महासचिव मोहसिना किदवई, पूर्व केंद्रीय मंत्री सी के जाफर शरीफ, सलमान खुर्शीद, राज्यसभा के उपसभापति के रहमान खान, अल्पसंख्यक विभाग के अध्यक्ष इमरान किदवई और अनीस दुर्रानी शामिल थे.

दूसरी घटना, देवबंद विचारधारा के संगठन जमीयत उलेमा--हिंद के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि शिवराज पाटिल के गृहमंत्री पद पर रहते दहशतगर्दी का खात्मा नामुमकिन है. मदनी ने केंद्र सरकार कटघरे में खड़ा करते हुए कहा कि आतंकवादी वारदातों के लिए गृहमंत्री मुसलमानों को कसूरवार मान रहे हैं. मदनी का यह तर्क गृहमंत्रालय के उस बयान पर आया है जिसमें मंत्रालय बार-बार दोहराता रहा है कि आतंकी वारदातों के पीछे अयोध्या में विवादित ढांचा तोड़े जाने और 2002 का गुजरात दंगा है.


योग्यता विस्तार- पहली घटना. दिल्ली बम धमाकों के बाद मीडिया ने टेप रिकॉर्डर छाप गृहमंत्री को पहले उनके बयानों, फिर उनके मॉडलिंग स्टाईल को लेकर खूब हंगामा किया. की मुखरता ने लामीडियालू जैसे सिमी समर्थकों की, कुछ देर के लिए ही सही, जुबान बंद करा दी. लालू आनन-फानन में प्रधानमंत्री के पास गए और गृहमंत्री की जमकर शिकायतें की. बाद में वे सोनिया से मिले. लेकिन सोनिया की विनम्रता भरी फटकार ने लालू को बयान बदलने के लिए मजबूर कर दिया. लालू, सोनिया के विनम्र फटकार पर निरुत्तर हो गए कि एक तरफ तो आप सिमी जैसे संगठनों के पक्ष में सार्वजनिक बयान देते हैं और जब बम विस्फोट होता है तो आप गृहमंत्री और खुफिया विभाग के ऊपर नाराजगी जताते हैं, ऐसा बिल्किल नहीं चलेगा.

सिमी पर साल 2006 में प्रतिबंध लगा था, तब तक लेकर हाल के दिनों तक केंद्र सरकार उसके विरूद्ध पर्याप्त सबूत कोर्ट में पेश नहीं कर सकी. इसलिए दिल्ली हाईकोर्ट के विशेष न्यायाधिकरण ने सबूतों के अभाव में सिमी पर से प्रतिबंध हटाने का निर्देश दिया.

इसके बाद, लालू, मुलायम और रामविलास पासवान के पर निकल आए. सबने सिमी के समर्थन में जोर-जोर से चिल्लाना शुरू कर दिया. उनका कहना था कि सिमी पर प्रतिबंध लगाया जाता है तो बजरंग दल, दुर्गावाहिनी और विश्व हिंदू परिषद पर भी प्रतिबंध लगे.

केंद्र सरकार ने अपने ही सहयोगियों के इस गैर-जिम्मेदाराना हरकत पर कुछ नहीं कहा, लेकिन वो तुरंत सुप्रीमकोर्ट पहुंचकर न्यायाधिकरण के आदेश पर रोक लगाने की अपील की और कोर्ट ने उसकी बात मान भी ली. बाद में केंद्र ने हाल के दिनों में हुए बम धमाकों में सिमी के हाथ होने का सबूत कोर्ट में पेश किया. फिलहाल सिमी पर प्रतिबंध जारी है. लेकिन लालू, मुलायम और रामविलास पासवान के बयान ने खुद केंद्र सरकार को कटघरे में ला खड़ा किया.

हाल के दिनों में अहमदाबाद, बैंगलोर और दिल्ली में बम धमाके हुए. केंद्रीय गृहमंत्री शिवराज पाटील के नरम रवैये पर सवाल उठे तो लालू यहां भी शामिल हो गए और सोनिया से फटकार सुनी.

बाटला हाउस मुठभेड़ पर पहले अमर सिंह, फिर ममता बनर्जी, फिर कांग्रेसी के मुस्लिम नेताओं ने सवाल उठाए और मामले की जांच की मांग की. इस मांग में रामविलास पासवान, सीपीएम महासचिव प्रकाश करात और सीपीआई महासचिव ए बी बर्धन शामिल हो गए.

सब का एक स्वर से कहना था कि निर्दोष मुसलमानों को निशाना बनाया गया. मुठभेड़ फर्जी थी. अमर सिंह ने तो यहां तक कह दिया कि शहीद एमसी शर्मा को स्पेशल सेल से निलंबित कर दिया गया था और वह बहाली के लिए दफ्तरों का चक्कर काट रहा है. अमर सिंह ने तो बेशर्मी की हद करते हुए कहा कि किसी पुलिस वाले ने ही उसे गोली मारी थी.

इतनी बेह्याई, इतनी निर्लज्जता, महज चंद वोटों के लिए.

महज चंद वोटो के लिए, पूरे मुस्लिम समाज को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की जा रही है. महज चंद वोटों के लिए ये लोग देश के साथ गद्दारी कर रहे हैं.

जब कभी आतंकवाद से लड़ने की बात आती है, आतंकवाद से लड़ने के लिए कानून बनाने की बात आती है, तो कहते हैं कि इस कानून का दुरूपयोग होगा. साफ-साफ कहते हैं कि अल्पसंख्यकों को परेशान किया जाएगा.

देश में किस चीज का दुरूपयोग नहीं होता है. विधायिका, न्यायिका, कार्यपालिका सबका दुरूपयोग होता है. पुलिस, जज, नेता खरीदे जाते है और बिकते हैं. तो क्या संसद, विधानसभाओं, अदालतों, पुलिस मुख्यालयों को भंग कर दिया जाय.

एक समुदाय जिसे कभी राष्ट्र की मुख्यधारा में एक साजिश के तहत शामिल नहीं होने दिया गया, कभी शाहबानो तो कभी अफजल के नाम पर मुसलमानों को ठगा जाता रहा है.

इनका वोट हासिल करने के लिए सभी राष्ट्र के साथ गद्दारी में जुटे हैं.

बुधवार, 20 अगस्त 2008

भारत का बिगड़ैल बेटा-कश्मीर






किसी ने कहा था- भगवान ने पहले कश्मीर को बनाया होगा और इसे देखकर ही स्वर्ग का निर्माण किया होगा. लोग कहते हैं- कश्मीर भारत का स्वर्ग है- कई लोग कहते है- कश्मीर भारत का गौरव है(कुछ साल पहले तक मैं भी कहता था.) भारत सरकार बार-बार कहती है- कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है(बिहार और राजस्थान के बारे में सरकार ऐसा कब कहती है) मतलब साफ है कि कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं है, इसलिए भारत सरकार ऐसा कहती है(जैसे कि पागल कहता है कि मैं पागल नहीं हूं, पागल तो दुनिया है.)
अमरनाथ श्राईन बोर्ड भूमि विवाद के बहाने एक बार फिर जाहिर हो गया कि कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं है. वहां की जनता कहती है कि वह आजादी चाहती है. वही जनता, जिसे आजादी से अबतक भारत ने करीब दो लाख करोड़ रूपये के पैकेज दिए. बदले में भारत को क्या मिला? कश्मीर की आजादी के नारे, भारत मुर्दाबाद, पाकिस्तान जिंदाबाद. शान हमारी जो झंडा है, उसे कश्मीर में जलाया गया. उसकी होली खेली गई. उसे पैरों के तले रौंदा गया. पाकिस्तान और प्रतिबंधित आतंकवादी संगठनों का झंडा लहराया गया. पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाए गए.
उपदेशो हि मुर्खानां प्रकोपाय न शांतये पय: पानं भुजंगानां केवलं विषवर्धनम. मतलब मुर्खों को उपदेश देकर समझाया नहीं जा सकता. सांप को दूध पिलाने का हश्र यहीं होता है. पाकिस्तान और कश्मीर के अलगाववादी जानते हैं कि भारत नपुंसकों का देश है. यहां सत्ता पाने और उसे बरकरार रखने के लिए राजनेता कुछ भी कर सकते हैं. यहां सिमी जैसे प्रतिबंधित आतंकवादी संगठनों के समर्थन में केंद्रीयमंत्री आवाज बुलंद कर सकते हैं. वो ये भी जानते हैं कि आतंकवाद का सफाया करने के लिए दबाव डालने वालों को केंद्रीय मंत्री सबसे बड़ा आतंकवादी करार देते हैं, तो इस देश में देशविरोध गतिविधियां चलाने वालों, तिरंगा को रौंदनेवालों, तिरंगा को जलानेवालों, पाकिस्तान का नारा बुलंद करनेवाली, आतंकवादी संगठनों का पाकिस्तान का झंडा फहराने वालों को तरजीह क्यों नहीं मिल सकती. देशभक्तों को उनकी देशभक्ति के लिए जहां सजा मिलती है. जहां देशद्रोहियों को पुरस्कार दिए जाते हैं, वहां एक क्या आनेवाले समय में दर्जनों कश्मीर बन जाएं तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए. अमरनाथ श्राईन बोर्ड भूमि विवाद पर जम्मू के लोगों का लगातार विरोध जमीन के एक छोटे टुकड़े को लेकर नहीं, बल्कि यह विरोध जम्मू के लोगों, कश्मीरी पंड़ितों के साथ केंद्र और राज्य सरकारों के द्वारा लगातार की जा रही ज्यादतियों का विरोध है. यह ज्यादतियां इसलिए हो रही है कि यहां के लोग राष्ट्रभक्त हैं और राष्ट्रीय झंडे को थामकर वंदे मातरम का नारा लगाते हैं.
अमरनाथ
श्राईनबोर्ड को जमीन लेना और फिर वापस लेना, जानबूझ कर खेला गया सियासी खेल है, जिसमें शामिल हैं, पाकिस्तान, वहां की खुफिया एजेंसी आईएसआई, कश्मीर की दो अहम राजनीतिक पार्टियां, पीडीपी और नेशनल कांफ्रेस और घाटी के अलगाववादी और आतंकवादी संगठन.
ये नहीं चाहते हैं कि घाटी में कोई बाहरी गतिविधि बढ़े. घाटी के अलगाववादी नेताओं ने भूमि हस्तांतरण को घाटी में हिंदुओं को बसाने की साजिश करार दिया. कश्मीर के नेता महबूबा मुफ्ती, उमर अब्दुल्ला और फार्रूख अब्दुल्ला अलगाववादियों के सुर में सुर मिलाते हुए नजर आए. कांग्रेस हमेशा से तुष्टिकरण की राजनीति करती रही है, वहां भी उसने यही किया. वह बोर्ड को जमीन तो देना चाहती है, लेकिन अलगाववादियों को नाखुश करके नहीं. सो उसने अपनी सरकार का बलि दे दी. जम्मू-कश्मीर जलता रहा और वह सोती रही. बाद में एक सर्वदलीय समिति भी बनायी लेकिन अमरनाथ यात्रा समाप्त होने के बाद समिति की उपयोगिता ही उसने खत्म कर दी. जिस कश्मीर की आर्थिक नाकेबंदी को कश्मीरी नेताओं और अलगाववादियों ने मुद्दा बनाया, उसका सच ये है कि घाटी में इस आठ से सोलह तारीख के बीच नौ हजार के ज्यादा ट्रकों की आवाजाही हुई. अब इतना हो जाने के बाद भी भारत सरकार को सोचना चाहिए, कि कश्मीर से भारत को क्या मिल रहा है और हम उस सपोले को क्यों पाल रहे हैं, जो हरबार हमें ही डसता है. जो हमारी एकता-अखंडता पर सवाल उठाता है. सरकार को चाहिए कि जल्द से जल्द वहां से धारा-370 हटाए और कश्मीर से विशेषाधिकार का दर्जा खत्म करे. वहां सभी जाति- सभी धर्म के लोगों को बसाए. लेकिन सरकार में ना तो ऐसी ताकत है ओर ना ही इच्छाशक्ति.


प्रसंगवश-
क्षमा
, दया, तप, त्याग, मनोबल
सबका लिया सहारा.

पर नरव्याघ्र सुयोधन तुमसे

कहो कहां कब हारा.

क्षमाशील हो रिपु समक्ष
तुम
विनीत हुए जितना ही.
दुष्ट कौरव ने तुमको कायर समझा उतना ही.
क्षमा शोभती उस भुजंग को

जिसके पास गरल हो.

उसको क्या जो दंतहीन

विषहीन, विनीत, सरल हो.

तीन दिवस तक पंथ मांगते

रघुपति रहे सिंधु किनारे.
बैठे-बैठे छंद को पढ़ते
अनुनय के प्यारे-प्यारे.

उत्तर से जब एक नाद भी

उठा नहीं सागर से.

उठी अधीर धधक पौरूष की

आग राम के शर से.

सिंधु देह धर त्राहि-त्राहि

करता आ गिरा शरण में.

चरण पूज दासता ग्रहण की

बंधा मूढ़ बंधन में.

सच पूछो तो शर में ही

बसती दीप्ति विनय की.

संधि वचन संपूज्य उसी का

जिसमें शक्ति विजय की.

सहनशीलता क्षमा दया को

तभी पूजता जग है

बल के दर्प चमकता
जिसके
पीछे जब जगमग है.
----------------रामधारी सिंह दिनकर

गुरुवार, 7 अगस्त 2008

कांग्रेस मतलब फूट डालो राज करो

कांग्रेस मतलब फूट डालो राज करो
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इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में बच्चों को पढ़ाया जाता है कि अंग्रेजों ने, फूट डालो, राज करों की नीति अपनाकर भारत को कब्जे में कर लिया और सदियों तक गुलाम बनाए रखा.
आज कांग्रेस पार्टी वही कर रही है. फूट डालो और राज करो.
कांग्रेस पार्टी कभी समग्रता या अखंडता की बात नहीं करती है. वह देश के विकास की बात तो करती है, मगर देश और उसके नागरिकों को टुकड़ों में बांटकर.
अगर आप नजर दौड़ाएंगे तो आपको सैंकड़ों उदाहरण मिल जाएंगे, जिससे ये साफ हो जाएगा कि कांग्रेस पार्टी देश को टुकड़ों में बांटकर सत्ता का सुख भोगना चाहती है.
1. कांग्रेस ने मुसलमानों की हालत जानने के लिए सच्चर समिति का गठन किया. समिति की रिपोर्ट आई. रिपोर्ट में बताया गया है कि सरकारी नौकरियों में मुसलमानों की उपस्थिति मात्र पांच प्रतिशत या उससे भी कम है. जबकि की आबादी के लिहाज से वे करीब पंद्रह प्रतिशत हैं. वे शैक्षणिक और आर्थिक रूप से बहुत पिछड़े हैं. इस रिपोर्ट के कुछ हिस्से को कक्षा की आठवी के एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तकों में शामिल भी किया गया है. बड़े ही रोचक तरीके से, जैसे, बच्चों क्या तुम जानते हो कि हाशिया किसे कहते हैं. तुम्हारी पाठ्यपुस्तक की बायीं ओर जो जगह छोड़ी गई है. उसे हाशिया कहते हैं. ऐसा हमारे समाज में भी होता है. समाज के कुछ लोगों को हाशिए पर धकेल दिया जाता है.. आदि, आदि.
यहां सवाल ये है कि आखिर समाज के इस हिस्से हाशिये पर किसने धकेला. कांग्रेस ने देश में चालीस सालों से ज्यादा समय तक देश में शासन किया. क्या इसे इसके लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जाना चाहिए.
2. मुसलमानों को अलग से आरक्षण दिया जा रहा है. क्यों, क्या भारतीय समाज के दूसरे वर्ग पिछड़े नहीं हैं. यदि है तो समग्र रूप से सबको आरक्षण के दायरे में क्यों नहीं लाया जाता. सबके कल्याण की बात क्यों नहीं की जाती.
3. मुसलमान बच्चों को अलग से छात्रवृति दी जा रही है और व्यवसायिक पाठ्यक्रमों में बिना शुल्क दाखिला दिया जा रहा है. हाल ही सुप्रीमकोर्ट ने कुछ शर्तों के साथ आंध्रप्रदेश में राज्य सरकार के इस प्रयास को मंजूरी दे दी है. हालांकि आखिरी फैसला आंध्रप्रदेश हाईकोर्ट का ही मान्य होगा. वैसे कई राज्यों में पहले से ही ये सूत्र लागू है.
क्या इस देश में सिर्फ मुसलमान ही गरीब हैं, जो इस छात्रवृति के हकदार हैं. आखिरकार मुसलमानों को दी जाने वाली छात्रवृति का पैसा किस समुदाय का है.
4. मंगलवार(05 अगस्त 2008) को दिल्ली हाईकोर्ट के विशेष न्यायाधिकरण ने सिमी(इस्लामी छात्र संगठन) पर से प्रतिबंध हटा लेने का फैसला दिया. हालांकि दूसरे ही दिन सुप्रीमकोर्ट ने न्यायाधिकरण के फैसले पर रोक लगा दी. और सिमी पर प्रतिबंध जारी रखा.
न्यायाधिकरण का तर्क था कि सरकार ने जो सबूत पेश किए हैं वो अपर्याप्त हैं.
यहां सरकार की नालायकी ही दिखती है, बार-बार खुफिया विभाग सिमी पर अंगुलियां उठाती रही है और आतंकवादी गतिविधियों में सिमी के शामिल होने की बात कहती रही है, फिर भी सरकार कोर्ट में सबूत नहीं पेश सकी.
आखिर सरकार जो सुप्रीमकोर्ट के बार-बार के आदेश के बाद भी अफजल के मामले को लटकाए रखा है, उससे ये आशा कैसे की जा सकती है कि वो सिमी के खिलाफ सबूत कोर्ट में पेश करे.
जब गृहमंत्री ही उसकी पैरवी में जुटे हों और उसकी तुलना सरबजीत से कर रहे हो तो उनसे क्या उम्मीद की जा सकती है.
5. सरकार कम्युनिष्टों के बार-बार के मांग के बावजूद ईपीएफ पर ब्याजदर बढाने के मु्द्दे पर टस से मस नहीं हुई, वही कम्युनिष्ट के हटते ही ब्याजदर बढ़ाने की बात कह रही है.
7. श्री अमरनाथजी श्राईन बोर्ड को दी गई जमीन के मुद्दे पर पिछले एक महीने से जम्मू जल रहा है. सरकार सो रही है. वोट बैंक की लालच में सरकार जम्मू-कश्मीर को देश से अलग माने हुए है, हालांकि हर साल उसे करोड़ों रुपये के अनुदान दिए जाते हैं. उसके लिए सेना पर करोड़ों पर खर्च किए जाते हैं.
इसी देश में सैंकड़ों हज हाउस है, हज टर्मिनल हैं. हजयात्रियों को सरकारी पैसे दिए जाते हैं, लेकिन जम्मू-कश्मीर में कुछ एकड़ जमीन श्राइन बोर्ड को दिए जाने के मुद्दे पर सरकार कट्टरपंथियों के आगे घुटने टेक देती है.
8. तस्लीमा नसरीन के मुद्दे पर सरकार मुट्ठीभर मुस्लिम कट्टरपंथियों के आगे घुटने टेक देती है.
9. पिछले चार सालों में किसानों की आत्महत्या पर घड़ियाली आंसू बहानेवाली और किसानों के कल्याण के लिए कोई कदम नहीं उठाने वाली कांग्रेस की सरकार एकाएक कर्जमाफी के लिए करीब सत्तर हजार करोड़ रुपये के पैकेज को घोषणा कर जाती है.
10. सरकार देश के नब्वे मुस्लिम बहुल इलाकों की पहचान करती है. उसके लिए पांच हजार करोड़ रुपये का पैकेज देती है. उन इलाकों में सरकारी बैकों की विशेष शाखाएं खोलने और मुसलमानों को दिलखोलकर कर्ज देने का आदेश देती है.
11. हमारे प्रधानमंत्री कहते हैं कि देश के संसाधनों पर पहला हक अल्पसंख्यकों, खासकर मुसलमानों का है.
12. सरकार मुस्लिम और अनुसूचित जाति-जनजाति बहुल इलाकों की पहचान के लिए कलेक्टरों को गुप्त पत्र लिखती है और ताकि उन इलाकों में वोट बैंक पुख्ता करने के लिए कुछ किया जा सके.
13. सरकार वोट बैंक के लिए ओबीसी आरक्षण देकर समाज को तोड़ने का काम करती है.
14. कांग्रेस की सरकार ने ही शाहबानों मामले में सुप्रीमकोर्ट का फैसला पलटने के लिए नया कानून बना डाला. यानी वोट बैंक के लिए देश के कानून के साथ खिलवाड़ करेंगे.
15. शिक्षण संस्थानों में ओबीसी को आरक्षण मिलेगा. लेकिन अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों में नहीं.
16. अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में मुसलमानों को पचास प्रतिशत आरक्षण देने की बात.
17. केंद्रीय गृहराज्यमंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल कहते हैं कि किसी एक संप्रदाय को आतंकवादी कहनेवाला सबसे बड़ा आतंकवादी है. लेकिन आतंकवादी को किसी संप्रदाय का बताने वाले को क्या कहना चाहिए. देश में समान नागरिक संहिता लागू करने में क्यों परेशानी हो रही है.
18. हज पर विदेश जाने वाले को सब्सिडी क्यों दी जाती है और अमरनाथ यात्रियों को एक अस्थायी शिविर देने में भी उन्हें दर्द क्यों होता है.
19. उत्तरी राज्यों में हिंदी को द्वितीय राजभाषा बनाने और ऊर्दू शिक्षकों की बलात् नियुक्ति तुष्टिकरण नहीं तो और क्या है साब.
20. इफ्तार पार्टियों में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेते हैं.
21. देश के मदरसों में विशेष सुविधाएं दी जाती है. साथ ही कहा गया कि जिन मदरसों में राष्ट्रीय ध्वज फहराया जाएगा. उसे विशेष अनुदान दिया जाएगा. यानी राष्ट्रीय ध्वज फहराने के लिए भी रिश्वत.
22. पंद्रह प्रतिशत आबादी के लिए अल्पसंख्यक आयोग बनता है लेकिन पचासी प्रतिशत आबादी के लिए बहुसंख्यक आयोग क्यों नहीं बनाया जाता. आखिर देश को कब तक बांटोगे. कितने टुकड़े करोगे. क्या एक राष्ट्रीय विकास आयोग से काम नहीं चलेगा.
23. अब कश्मीर ही नहीं, बल्कि पूरे भारत में भारत विरोधी तत्वों के प्रति नरमी बरती जा रही है. ऐसे तत्वों को जानबूझकर एक विशेष संप्रदाय से जोड़ा जाता है. ताकि उस संप्रदाय का वोट बैंक नहीं बिगड़े.
24. पोटा हटा दिया गया, लेकिन धारा- 370 क्यों नहीं हटाया जाता.
25. जिस मुस्लिम लीग ने भारत को बांटा, उसी मुस्लिम लीग के साथ कांग्रेस ने समझौता किया.
26. बांग्लादेशियों के मुद्दे पर दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित कहती हैं कि यहां आने वाले हमारे अतिथि होते हैं, क्या इसमें आतंकवादी भी शामिल हैं. केंद्रीय गृहमंत्री कहते हैं, ऐसे कैसे उन्हें भगा दीजिएगा, देश में कानून है वह अपना काम करेगा. जबकि सरकार ने ही राज्यों को चिट्ठी लिखकर बांग्लादेशियों को निशानदेही करने और उन्हें अलग करने के लिए कहा था.


कितना गिनाऊं, सत्ता सुख के लिए लालू और मुलायम जैसे आज एक चम्मचे से खा रहे हैं.

गुरुवार, 19 जून 2008

हिम्मत है तो आत्मघाती बनकर दिखाएं बाल ठाकरे








बाला साहेब ठाकरे, अगर आपको हिंदुओं की इतनी ही चिंता है तो क्या वे उत्तर-भारतीय हिंदू नहीं थे, जिसपर आपके और आपके भतीजे के गुंडों ने कहर-बरपाए.





बाल
ठाकरे को नाज है कि थाणे के थिएटर में किसी हिंदू ने बम रखा. वो ऐसा करने वाले हिंदू संगठनों को आगे आकर इसकी जिम्मेदारी लेने की अपील करते हैं. वो इसका समर्थन करते हैं कि इस्लामी आतंकवाद की मुकाबला करने के लिए हिंदू संगठन एकजुट हो और आत्मघाती दस्ते बनाएं.

मैं मूढ़मति बाला साहेब ठाकरे को चुनौती देता हूं कि अगर उनमें हिम्मत है तो वे खुद आत्मघाती बम हमलावर बनकर दिखाए. वे इसे हिंदू अस्मिता को अक्षुण्ण रखने के लिए बेहतर मानते हैं तो वे ही इस बलिदान की राह में पहला कदम बढ़ाएं. वे बूढ़े हो चुके हैं ज्यादा से ज्यादा बीस-पच्चीस साल जिएंगे, वो भी घसीट-घसीट कर. क्यों इस शेष जिंदगी को हिंदू अस्मिता की रक्षा के काम में उत्सर्ग कर देंते हैं. आने वाली पीढ़ियों उन्हें इसके लिए हमेशा हमेशा के लिए याद रखेगी.

लेकिन मुझे नहीं लगता है कि बाला साहेब ठाकरे इसके लिए तैयार हो जाएंगे, क्योंकि उन्हें जीवन से मोह है, सिर्फ अपने जीवन से, अपने बेटे और परिवार के जीवन से. वे दूसरों को भेंड़ बकरियां समझते हैं और कत्लगाह की तरफ हांकने के लिए तैयार रहते हैं.

बाला साहेब ठाकरे, अगर आपको हिंदुओं की इतनी ही चिंता है तो क्या वे उत्तर-भारतीय हिंदू नहीं थे, जिसपर आपके और आपके भतीजे के गुंडों ने कहर-बरपाए. आपने अपने सामना का इस्तेमाल उस समय आग में घी डालने के लिए किया.

एक संप्रदाय के कुछ लोग आतंकवादी है या आतंकवादियों से मिले हुए हैं तो उस पूरे संप्रदाय को आप आतंकवादियों जैसा सुलूक करते हैं अगर हिंदुओं में भी दो-चार-दस आतंकवादी बन जाएं तो क्या हिंदू धर्म के मनाने वाले सब लोगों को आतंकवादियों की निगाहों से नहीं देखा जाएगा.

ठाकरे साहब, जब कुछ लोगों से देश इतना परेशान और तबाह है तो अगर बहुसंख्यक समुदाय आतंकवादी बन जाए तो देश कितना तबाह होगा, आपने कभी सोचा है.

आप अपनी दुकान चलाने के लिए, दूसरे की दुकान पर डाका क्यों डालते हैं. धर्म को धर्म ही रहने दीजिए, प्लीज धर्मभीरुओं को आतंकवादी बनने की प्रेरणा मत दीजिए.