प्रणब मुखर्जी देश के उन शीर्षस्थ राजनेताओं में गिने जाते हैं जो सर्वोच्च नहीं होकर भी सर्वोच्च ही माने जाते हैं। वो गुस्सा भी करते हैं तो लोगों को पसंद आता है। बांग्ला-टोन वाली उनकी अंग्रेजी लोगों को स्वदेशी भाषा लगती है। उमर भी काफी हो चुकी है। राजनीति से रिटायर्ड होने के बारे में भी विचार करते होंगे। यही वजह है कि उन्होंने अपने प्रियपुत्र को राजनीति में ला ही दिया। हमारे जैसे लाखों लोगों को लग रहा था कि जाते-जाते प्रणब मुखर्जी कुछ ऐसा करेंगे, जिसके लिए उन्होंने भारत की आने वाली पीढ़ी हमेशा याद रखेगी। लेकिन देश की राजनीति, खासकर कांग्रेस की आंतरिक राजनीति ने उन्हें पहले भी ऐसा करने का मौका नहीं दिया और शायद अब उनका हाथ और भी बंधा-बंधा नजर आ रहा है। प्रणब मुखर्जी अब चाहकर भी कुछ नहीं कर पाएंगे। यही वजह है कि प्रणब में पहले वाली बात नहीं दिख रही है।
इन दिनों प्रणब मुखर्जी देश से जो कह रहे हैं उसपर किसी को भी भरोसा नहीं हो रहा है। सुप्रीमकोर्ट को भी उन्होंने कहा था कि सरकार कालेधन को स्वदेश लाने के लिए उपाय कर रही है। लेकिन सुप्रीमकोर्ट ने उनपर भरोसा नहीं किया। सरकार ने कालेधन की जांच के लिए जो एसआईटी बनाई, सुप्रीमकोर्ट ने जस्टिस जीवन रेड्डी को उसका अध्यक्ष बना दिया। उसका उपाध्यक्ष भी सुप्रीमकोर्ट ने ही नियुक्त किया। आखिर क्यों। आखिर सुप्रीमकोर्ट को प्रणब या सरकार की बातों पर क्यों भरोसा नहीं है।
दरअसल, अपने अंतिम समय में प्रणब मुखर्जी कुछ ऐसा काम करते जा रहे हैं। जिनपर लोगों को भरोसा नहीं हो पा रहा है। ऐसा लग रहा है कि प्रणब मुखर्जी किसी को बचाने की कोशिश में ऐसा कर रहे हैं। जाहिर है कि स्वीस बैंकों में जमा काला धन उस आम आदमी का नहीं है जिसकी दुहाई दे-देकर भारत में सरकारें बनती आई है। ये पैसा नेताओं, नौकरशाहों, उद्योगपतियों, फिल्म कलाकारों, तस्करों, नशीली दवाओं के व्यापारियों का है। जाहिर है कि इस देश में ज्यादा समय तक शासन कांग्रेस पार्टी का रहा है और सबसे ज्यादा घोटाला भी इसी पार्टी ने किया है, इसलिए सबसे ज्यादा पैसा इसी पार्टी के नेताओं का होगा। इसलिए इन नेताओं को बचाना, कांग्रेस पार्टी के हर मंत्रियों का प्राथमिक कर्तव्य होगा। पैसा बीजेपी समेत दूसरी पार्टियों के नेताओं का भी होगा। इसलिए ये पार्टियां भी कांग्रेस पर ज्यादा दबाव डालना उचित नहीं समझती हैं, क्योंकि इनका भी भंडाफोड़ हो जाएगा।
तो बात प्रणब मुखर्जी की कर रहे हैं। ये बात वहां से शुरू होती है। जब सुप्रीमकोर्ट ने सरकार से उन नामों का खुलासा करने को कहा, जो उसे जर्मन सरकार से मिले थे। सरकार ने संधि का हवाला देकर इनका खुलासा करने से इनकार कर दिया। तहलका जैसी पत्रिकाओं ने इन लोगों के नाम छाप दिए, मगर सरकार ने अभी तक इन नामों का खुलासा नहीं किया। इन लोगों पर कोई कार्रवाई तक नहीं की। सरकार एक नहीं सौ बार झूठ बोलती रही। सरकार की इन बातों पर ना तो देश की जनता को भरोसा हुआ और न ही सुप्रीमकोर्ट को। आखिर कार सुप्रीमकोर्ट ने एसआईटी का गठन कर दिया।
जानकार सूत्रों की मानें तो प्रणब मुखर्जी स्वीटजरलैंड के साथ जिस संधि के होने की बात कर रहे हैं इस संधि के तहत अप्रैल २०११ के बाद स्वीस बैंक में जमा धन का ही पता चल पाएगा। आखिर सवाल उठता है कि पिछले साठ साल में स्वीस बैंक सहित दुनिया के बाकी बैंकों में जो पैसा जमा हुआ उसका क्या होगा। क्या वो पैसा क्या बेईमानों, गद्दारों और लुटेरों का ही रह जाएगा। आखिर प्रणब मुखर्जी की बातों पर भरोसा हो तो कैसे।
वो कह रहे हैं कि ५४ देशों के साथ बातचीत हो चुकी है और ७४ देशों के साथ बातचीत जारी है. आखिर उन्होंने इन देशों के साथ क्या बात की और फिलहाल क्या बात कर रहे हैं। इन बातों का जवाब उन्हें देना चाहिए।
भारतीय पक्ष में छपे एस गुरूमूर्ति के लेख "सोनिया का सच" में स्वीस बैंक में सोनिया गांधी का करीब २.२ अरब डॉलर से ११ अरब डॉलर जमा होने की बात कही गई है। विभिन्न तथ्यों और संदर्भों के हवाले से कहा गया है कि सोनिया गांधी या गांधी परिवार के किसी व्यक्ति ने इस खबर का कभी खंडन नहीं किया या किसी पर कभी कोई मुकदमा नहीं चलाया। सुब्रह्मण्यम स्वामी भी बार बार इस तरह के दावे करते रहे हैं। आखिर इस कालेधन का सच क्या है, करदाताओं और देशवासियों को पता होना चाहिए।
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शनिवार, 30 जुलाई 2011
प्रणब की बातों पर लोगों को क्यों नहीं हो रहा है भरोसा
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सोमवार, 27 जून 2011
सरकार भी करती है षडयंत्र, चरित्रहनन
आचार्य बालकृष्ण का कार्यक्रम नेशनल चैनल यानी दूरदर्शन पर चलता था, तब बालकृष्ण फर्जी व्यक्ति नहीं थे। जब चार-चार मंत्री रामदेव की अगुवाई करने गए, तब रामदेव ठग नहीं थे। प्रशांत भूषण वर्षों से सुप्रीमकोर्ट में वकालत करते हैं, तब वो दलाल नहीं थे। सालों से मंदिर में सोए रहे अन्ना आरएसएस का मुखौटा नहीं थे। उनके संपत्ति की जांच नहीं गई। लेकिन आज जब इन लोगों ने भ्रष्टचार और कालेधन के खिलाफ आवाज उठाया तो बालकृष्ण फर्जी व्यक्ति हो गए, रामदेव ठग हो गए, प्रशांतभूषण राजस्व चोर हो गए, अन्ना हजारे आरएसएस का मुखौटा हो गए। क्या ये समझना किसी अंधे-बहरे व्यक्ति के लिए भी मुश्किल है। ये सरकार लोगों को ठग बनाती है, चोर बनाती है, फर्जी बनाती है, आरएसएस का मुखौटा बनाती है। वो भी उन लोगों को जो उसके खिलाफ जबान खोलते हैं। मीडिया को खरीदकर खुलकर ईमानदार घोषित करती है। भ्रष्टाचारियों को शह देती है। ऐसे में भ्रष्टाचार मिटेगा कैसे। कैसे होगा कालेधन का खात्मा। दरअसल, इस कालेधन में सरकार के कई मंत्रियों, विपक्षी दल के नेताओं की हिस्सेदारी है, सोनिया, राहुल, राजीव गांधी का पैसा है। स्वीस पत्रिका में स्वीस बैंक में राजीव गांधी के बैंक खाते होने की बात कही थी, लेकिन गांधी-नेहरू परिवार ने इस रिपोर्ट का खंडन नही किया। आखिर क्यों। अब जब विरोधी यही आरोप उनपर लगा रहे हैं तो सरकार उनका गला घोंट देना चाहती है। उनकी जुबान बंद कर देना चाहती है। आखिर इन लोगों ने पैसा जमा करने के लिए कितने ही पापड़ बेले। अब आखिर सरकार इनकी पोल कैसे खुलने देगी। यही वजह है कि सरकार अच्छे लोगों का चरित्र हनन करती है। आनेवाले समय में भी सरकार भ्रष्ट लोगों को बचाने के लिए सारे संवैधानिक मर्यादाओं को लांघने और संवैधानिक की हत्या करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ेगी। इसलिए सरकार भ्रष्टाचार पर लगाम लगाएगी, और मनमोहन अपनी छवि सुधारेंगे यह सोचना मूर्खता है। सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया, आखिर मनमोहन सिंह अहसानफरामोश कैसे हो जाएंगे। वो सोनिया गांधी की कृतज्ञता के बोझ से दबे हुए हैं आखिर वो कृतध्न कैसे हो जाएगे। एक व्यक्ति जो एक पंचायत का चुनाव नहीं जीत सकता है वो व्यक्ति दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का प्रधानमंत्री है। वो अहसान की कीमत को चुकाएगा ही। मनमोहन वही कीमत चुका रहे हैं। कई लोग कहते हैं कि सोनिया के अहसानों का मोल चुकाने के लिए वो देश के साथ विश्वासघात कर रहे हैं। जनता को धोखा दे रहे हैं तो उसका भी जवाब है कि इस देश की जनता ने मनमोहन को वोट कहां दिया है। आखिर जनता ने मनमोहन सिंह पर कौन सा उपकार किया जो वो जनता के प्रति कृतज्ञ बनें रहेंगे। मनमोहन सिंह तो सोनिया गांधी के कर्ज तले दबे हुए हैं। वो तो उन्हीं का कर्ज उतारेंगे। इसलिए मनमोहन सिंह से अपेक्षा करना व्यर्थ है। अभी और अभी मनमोहन सिंह का सिर्फ एक और एक मात्र मकसद है और वो है येन-केन-प्रकारेन साम-दंड-भय-भेद के जरिए कुर्सी से चिपके रहना ताकि ज्यादा से ज्यादा समय तक सोनिया अम्मा की सेवा की जा सके। घोटालों से घिरे गांधी नेहरू परिवार को घोटालों से बचाया जा सके। और मनमोहन सिंह यही कर रहे हैं। इसके लिए उन्हें दिग्विजय और सिब्बल जैसे ताल-बैताल को षडयंत्र, दुष्प्रचार, प्रतिष्ठा हनन, चरित्र हनन का ठेका दे रखा है। ये ताल-बैताल अपनी भूमिका बखूबी अदा कर रहे हैं। कभी प्रशांत-भूषण के खिलाफ सीडी निकाल रहे हैं, तो कभी अन्ना और रामदेव के खिलाफ सीबीआई लगा रहे हैं, कभी रामदेव को ठग कह रहे हैं तो बालकृष्ण को फर्जी व्यक्ति करार दे रहे हैं। कपिल सिब्बल कभी रामदेव से बात करते हैं तो कभी उनकी हत्या के लिए पांच हजार पुलिस को लगा देते हैं। यानी जो कोई इनके कुकृत्यों के खिलाफ बोलेगा उनका हाल रामदेव जैसा होगा। पिग्गी सिंह तो अन्ना हजारे को भी रामदेव की तरह कार्रवाई के लिए तैयार रहने की चेतावनी दे डाली है। एक तरफ सरकार का षडयंत्र, सरकारी लठैत, बेलगाम पुलिस दूसरी तरफ निहत्थी जनता और सिविल सोसायटी के लोग। देखते हैं ये लड़ाई और कितनी लंबी चल पाती है।
लेकिन इन सबमें विपक्षी पार्टी भाजपा और कम्युनिष्टों की भूमिका कम निंदनीय नहीं है। ये पार्टियां भी आंदोलनकारियों को समर्थन करने के बजाय सरकार का हाथ मजबूत करने में लगी हैं। ये पार्टियां नहीं चाहती हैं कि कोई सशक्त लोकपाल कानून बने, विदेशों में जमा कालेधन को वापस लाने के लिए कोई पहल हो। ये पार्टियों तो सिर्फ और सिर्फ राजनीति करना जानती हैं। ये पार्टियां कभी जनता के हाथ से लड़ाई हाइजैक करना चाहती है तो कभी सरकार के सुर में सुर मिलाती है। जाहिर है कि विदेशों में जमा कालेधन में इनकी भी हिस्सेदारी है। जब चेहरे बेनकाब होंगे तो इनका चेहरा भी सबके सामने होगा। आखिर ये पार्टियां क्यों चाहेगी कि भ्रष्टाचार और कालेधन के खिलाफ कोई कानून बने। क्या इनके पास येदियुरप्पा जैसे मुख्यमंत्री नहीं हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई को ये क्यों बर्दाश्त करेंगी, क्योंकि ऐसा होने से इनके भी दर्जनों नेता जेल में होंगे। ऐसे में भ्रष्टाचार रुकेगा इसकी आशा बिल्कुल नहीं की जानी चाहिए। कालेधन पर कोई कार्रवाई होगी। इसकी उम्मीद बिल्कुल नहीं की जानी चाहिए। सरकार का षडयंत्र, दमनचक्र जारी रहेगा। और ये सिलसिला तब रुकेगा जब जनता खुलकर आंदोलन करेगी और भ्रष्टाचारियों को सबक सिखाएगी।
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रविवार, 29 मई 2011
सोनिया का एकाउंट स्वीस बैंक में- सुब्रह्मण्यम स्वामी का खुलासा
चंडीगढ़. ‘सोनिया गांधी ऐसी विषकन्या है जो देश को धीरे-धीरे खा रही हैं। उनका एक लाख करोड़ विदेश में जमा है। ये कहां और किस बैंक में है, मुझे पता है। स्विट्जरलैंड के नियमों के मुताबिक अगर सरकार ऐलान कर दे कि इस अकाउंट में जमा पैसे का राष्ट्रीयकरण कर दिया जाए तो ये पैसा भारत को मिल सकता है। लेकिन केंद्र की सत्तारूढ़ सरकार ऐसा नहीं करेगी।’ सोनिया गांधी पर ये गंभीर आरोप लगाए जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष सुब्रमण्यम स्वामी ने।
लॉ भवन, सेक्टर 37 में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की ओर से ‘भ्रष्टाचार के विरुद्ध निर्णायक युद्ध’ विषय पर आयोजित विचार गोष्ठी में स्वामी बतौर मुख्य अतिथि मौजूद थे। उन्होंने कहा कि सोनिया गांधी केंद्रीय रक्षा मंत्री पर फ्रांस से जहाज खरीदने के लिए दबाव बना रही हैं। सिर्फ इसलिए कि फ्रांस के राष्ट्रपति की पत्नी भी इटेलियन हैं। यह मामला भी बोफोर्स घोटाले से कम नहीं है।
उन्होंने कहा कि विदेशी बैंकों में जमा पूंजी वापस लाने के लिए केंद्र सरकार को बदलना जरूरी है। उन्होंने कहा, ‘यूपीए सरकार आम आदमी के साथ होने का दावा करती है जबकि सच्चाई यह है कि देश की 70 फीसदी पूंजी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से विलासिता के प्रोडक्ट बनाने में लगी है। इस देश में भ्रष्टाचार का समाधान हिंदुत्व और सनातन धर्म को बढ़ावा देने से ही संभव है। धर्म ही हमें अच्छे और गलत की समझ और भ्रष्टाचार से दूर रहने की सीख देता है।’
साथ ही उन्होंने कहा कि इमरजेंसी के दौरान सरकार के पास शक्ति होने की वजह से लोगों का संघर्ष कामयाब होने पर संदेह था। लेकिन लोगों का काफी समर्थन मिला और इसके बाद हुए लोकसभा चुनाव में भी संघर्ष को काफी मजबूती मिली। उसी प्रकार अब भी भ्रष्टाचार के खिलाफ वैसा ही समर्थन मिल रहा है।
स्वामी ने पीएम मनमोहन सिंह को बिना रीढ़ की हड्डी का व्यक्तिबताते हुए कहा कि मनमोहन सिंह की नजर में तो सोनिया जी और राहुल जी ही 2जी हैं। पी. चिदंबरम और राहुल गांधी के उस बयान की भी उन्होंने निंदा कि जिसमें हिंदू आतंकवाद को लश्कर-ए-तैयबा से भी खतरनाक बताया गया। उन्होंने कहा कि हिंदू नाम से इतनी नफरत इस देश में बर्दाश्त नहीं की जा सकती।
सौ- दैनिक भास्कर
लॉ भवन, सेक्टर 37 में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की ओर से ‘भ्रष्टाचार के विरुद्ध निर्णायक युद्ध’ विषय पर आयोजित विचार गोष्ठी में स्वामी बतौर मुख्य अतिथि मौजूद थे। उन्होंने कहा कि सोनिया गांधी केंद्रीय रक्षा मंत्री पर फ्रांस से जहाज खरीदने के लिए दबाव बना रही हैं। सिर्फ इसलिए कि फ्रांस के राष्ट्रपति की पत्नी भी इटेलियन हैं। यह मामला भी बोफोर्स घोटाले से कम नहीं है।
उन्होंने कहा कि विदेशी बैंकों में जमा पूंजी वापस लाने के लिए केंद्र सरकार को बदलना जरूरी है। उन्होंने कहा, ‘यूपीए सरकार आम आदमी के साथ होने का दावा करती है जबकि सच्चाई यह है कि देश की 70 फीसदी पूंजी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से विलासिता के प्रोडक्ट बनाने में लगी है। इस देश में भ्रष्टाचार का समाधान हिंदुत्व और सनातन धर्म को बढ़ावा देने से ही संभव है। धर्म ही हमें अच्छे और गलत की समझ और भ्रष्टाचार से दूर रहने की सीख देता है।’
साथ ही उन्होंने कहा कि इमरजेंसी के दौरान सरकार के पास शक्ति होने की वजह से लोगों का संघर्ष कामयाब होने पर संदेह था। लेकिन लोगों का काफी समर्थन मिला और इसके बाद हुए लोकसभा चुनाव में भी संघर्ष को काफी मजबूती मिली। उसी प्रकार अब भी भ्रष्टाचार के खिलाफ वैसा ही समर्थन मिल रहा है।
स्वामी ने पीएम मनमोहन सिंह को बिना रीढ़ की हड्डी का व्यक्तिबताते हुए कहा कि मनमोहन सिंह की नजर में तो सोनिया जी और राहुल जी ही 2जी हैं। पी. चिदंबरम और राहुल गांधी के उस बयान की भी उन्होंने निंदा कि जिसमें हिंदू आतंकवाद को लश्कर-ए-तैयबा से भी खतरनाक बताया गया। उन्होंने कहा कि हिंदू नाम से इतनी नफरत इस देश में बर्दाश्त नहीं की जा सकती।
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