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रविवार, 4 मार्च 2012

मूल चाणक्य नीति

आज से करीब 2300 साल पहले पहले पैदा हुए चाणक्य भारतीय राजनीति और अर्थशास्त्र के पहले विचारक माने जाते हैं। पाटलिपुत्र (पटना) के शक्तिशाली नंद वंश को उखाड़ फेंकने और अपने शिष्य चंदगुप्त मौर्य को बतौर राजा स्थापित करने में चाणक्य का अहम योगदान रहा। ज्ञान के केंद्र तक्षशिला विश्वविद्यालय में आचार्य रहे चाणक्य राजनीति के चतुर खिलाड़ी थे और इसी कारण उनकी नीति कोरे आदर्शवाद पर नहीं, बल्कि व्यावहारिक ज्ञान पर टिकी है। आगे दिए जा रहीं उनकी कुछ बातें भी चाणक्य नीति की इसी विशेषता के दर्शन होते हैं :

- किसी भी व्यक्ति को जरूरत से ज्यादा ईमानदार नहीं होना चाहिए। सीधे तने वाले पेड़ ही सबसे काटे जाते हैं और बहुत ज्यादा ईमानदार लोगों को ही सबसे ज्यादा कष्ट उठाने पड़ते हैं।

- अगर कोई सांप जहरीला नहीं है, तब भी उसे फुफकारना नहीं छोड़ना चाहिए। उसी तरह से कमजोर व्यक्ति को भी हर वक्त अपनी कमजोरी का प्रदर्शन नहीं करना चाहिए।

- सबसे बड़ा गुरुमंत्र : कभी भी अपने रहस्यों को किसी के साथ साझा मत करो, यह प्रवृत्ति तुम्हें बर्बाद कर देगी।

- हर मित्रता के पीछे कुछ स्वार्थ जरूर छिपा होता है। दुनिया में ऐसी कोई दोस्ती नहीं जिसके पीछे लोगों के अपने हित न छिपे हों, यह कटु सत्य है, लेकिन यही सत्य है।

- अपने बच्चे को पहले पांच साल दुलार के साथ पालना चाहिए। अगले पांच साल उसे डांट-फटकार के साथ निगरानी में रखना चाहिए। लेकिन जब बच्चा सोलह साल का हो जाए, तो उसके साथ दोस्त की तरह व्यवहार करना चाहिए। बड़े बच्चे आपके सबसे अच्छे दोस्त होते हैं।

- दिल में प्यार रखने वाले लोगों को दुख ही झेलने पड़ते हैं। दिल में प्यार पनपने पर बहुत सुख महसूस होता है, मगर इस सुख के साथ एक डर भी अंदर ही अंदर पनपने लगता है, खोने का डर, अधिकार कम होने का डर आदि-आदि। मगर दिल में प्यार पनपे नहीं, ऐसा तो हो नहीं सकता। तो प्यार पनपे मगर कुछ समझदारी के साथ। संक्षेप में कहें तो प्रीति में चालाकी रखने वाले ही अंतत: सुखी रहते हैं।

- ऐसा पैसा जो बहुत तकलीफ के बाद मिले, अपना धर्म-ईमान छोड़ने पर मिले या दुश्मनों की चापलूसी से, उनकी सत्ता स्वीकारने से मिले, उसे स्वीकार नहीं करना चाहिए।

- नीच प्रवृति के लोग दूसरों के दिलों को चोट पहुंचाने वाली, उनके विश्वासों को छलनी करने वाली बातें करते हैं, दूसरों की बुराई कर खुश हो जाते हैं। मगर ऐसे लोग अपनी बड़ी-बड़ी और झूठी बातों के बुने जाल में खुद भी फंस जाते हैं। जिस तरह से रेत के टीले को अपनी बांबी समझकर सांप घुस जाता है और दम घुटने से उसकी मौत हो जाती है, उसी तरह से ऐसे लोग भी अपनी बुराइयों के बोझ तले मर जाते हैं।

- जो बीत गया, सो बीत गया। अपने हाथ से कोई गलत काम हो गया हो तो उसकी फिक्र छोड़ते हुए वर्तमान को सलीके से जीकर भविष्य को संवारना चाहिए।

- असंभव शब्द का इस्तेमाल बुजदिल करते हैं। बहादुर और बुद्धिमान व्यक्ति अपना रास्ता खुद बनाते हैं।

- संकट काल के लिए धन बचाएं। परिवार पर संकट आए तो धन कुर्बान कर दें। लेकिन अपनी आत्मा की हिफाजत हमें अपने परिवार और धन को भी दांव पर लगाकर करनी चाहिए।

- भाई-बंधुओं की परख संकट के समय और अपनी स्त्री की परख धन के नष्ट हो जाने पर ही होती है।

- कष्टों से भी बड़ा कष्ट दूसरों के घर पर रहना है।

आचार्य चाणक्य एक ऐसी महान विभूति थे, जिन्होंने अपनी विद्वत्ता और क्षमताओं के बल पर भारतीय इतिहास की धारा को बदल दिया। मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चाणक्य कुशल राजनीतिज्ञ, चतुर कूटनीतिज्ञ, प्रकांड अर्थशास्त्री के रूप में भी विश्वविख्‍यात हुए। इतनी सदियाँ गुजरने के बाद आज भी यदि चाणक्य के द्वारा बताए गए सिद्धांत ‍और नीतियाँ प्रासंगिक हैं तो मात्र इसलिए क्योंकि उन्होंने अपने गहन अध्‍ययन, चिंतन और जीवानानुभवों से अर्जित अमूल्य ज्ञान को, पूरी तरह नि:स्वार्थ होकर मानवीय कल्याण के उद्‍देश्य से अभिव्यक्त किया।

वर्तमान दौर की सामाजिक संरचना, भूमंडलीकृत अर्थव्यवस्था और शासन-प्रशासन को सुचारू ढंग से बताई गई ‍नीतियाँ और सूत्र अत्यधिक कारगर सिद्ध हो सकते हैं। चाणक्य नीति के द्वितीय अध्याय से यहाँ प्रस्तुत हैं कुछ अंश -

1. जिस प्रकार सभी पर्वतों पर मणि नहीं मिलती, सभी हाथियों के मस्तक में मोती उत्पन्न नहीं होता, सभी वनों में चंदन का वृक्ष नहीं होता, उसी प्रकार सज्जन पुरुष सभी जगहों पर नहीं मिलते हैं।

2. झूठ बोलना, उतावलापन दिखाना, दुस्साहस करना, छल-कपट करना, मूर्खतापूर्ण कार्य करना, लोभ करना, अपवित्रता और निर्दयता - ये सभी स्त्रियों के स्वाभाविक दोष हैं। चाणक्य उपर्युक्त दोषों को स्त्रियों का स्वाभाविक गुण मानते हैं। हालाँकि वर्तमान दौर की शिक्षित स्त्रियों में इन दोषों का होना सही नहीं कहा जा सकता है।

3. भोजन के लिए अच्छे पदार्थों का उपलब्ध होना, उन्हें पचाने की शक्ति का होना, सुंदर स्त्री के साथ संसर्ग के लिए कामशक्ति का होना, प्रचुर धन के साथ-साथ धन देने की इच्छा होना। ये सभी सुख मनुष्य को बहुत कठिनता से प्राप्त होते हैं।

4. चाणक्य कहते हैं कि जिस व्यक्ति का पुत्र उसके नियंत्रण में रहता है, जिसकी पत्नी आज्ञा के अनुसार आचरण करती है और जो व्यक्ति अपने कमाए धन से पूरी तरह संतुष्ट रहता है। ऐसे मनुष्य के लिए यह संसार ही स्वर्ग के समान है।

5. चाणक्य का मानना है कि वही गृहस्थी सुखी है, जिसकी संतान उनकी आज्ञा का पालन करती है। पिता का भी कर्तव्य है कि वह पुत्रों का पालन-पोषण अच्छी तरह से करे। इसी प्रकार ऐसे व्यक्ति को मित्र नहीं कहा जा सकता है, जिस पर विश्वास नहीं किया जा सके और ऐसी पत्नी व्यर्थ है जिससे किसी प्रकार का सुख प्राप्त न हो।

6. जो मित्र आपके सामने चिकनी-चुपड़ी बातें करता हो और पीठ पीछे आपके कार्य को बिगाड़ देता हो, उसे त्याग देने में ही भलाई है। चाणक्य कहते हैं कि वह उस बर्तन के समान है, जिसके ऊपर के हिस्से में दूध लगा है परंतु अंदर विष भरा हुआ होता है।

7. चाणक्य कहते हैं कि जो व्यक्ति अच्छा मित्र नहीं है उस पर तो विश्वास नहीं करना चाहिए, परंतु इसके साथ ही अच्छे मित्र के संबंद में भी पूरा विश्वास नहीं करना चाहिए, क्योंकि यदि वह नाराज हो गया तो आपके सारे भेद खोल सकता है। अत: सावधानी अत्यंत आवश्यक है।

8. चाणक्य का मानना है कि व्यक्ति को कभी अपने मन का भेद नहीं खोलना चाहिए। उसे जो भी कार्य करना है, उसे अपने मन में रखे और पूरी तन्मयता के साथ समय आने पर उसे पूरा करना चाहिए।

9. चाणक्य का कहना है कि मूर्खता के समान यौवन भी दुखदायी होता है क्योंकि जवानी में व्यक्ति कामवासना के आवेग में कोई भी मूर्खतापूर्ण कार्य कर सकता है। परंतु इनसे भी अधिक कष्टदायक है दूसरों पर आश्रित रहना।

10. चाणक्य कहते हैं कि बचपन में संतान को जैसी शिक्षा दी जाती है, उनका विकास उसी प्रकार होता है। इसलिए माता-पिता का कर्तव्य है कि वे उन्हें ऐसे मार्ग पर चलाएँ, जिससे उनमें उत्तम चरित्र का विकास हो क्योंकि गुणी व्यक्तियों से ही कुल की शोभा बढ़ती है।

11. वे माता-पिता अपने बच्चों के लिए शत्रु के समान हैं, जिन्होंने बच्चों को ‍अच्छी शिक्षा नहीं दी। क्योंकि अनपढ़ बालक का विद्वानों के समूह में उसी प्रकार अपमान होता है जैसे हंसों के झुंड में बगुले की स्थिति होती है। शिक्षा विहीन मनुष्य बिना पूँछ के जानवर जैसा होता है, इसलिए माता-पिता का कर्तव्य है कि वे बच्चों को ऐसी शिक्षा दें जिससे वे समाज को सुशोभित करें।

12. चाणक्य कहते हैं कि अधिक लाड़ प्यार करने से बच्चों में अनेक दोष उत्पन्न हो जाते हैं। इसलिए यदि वे कोई गलत काम करते हैं तो उसे नजरअंदाज करके लाड़-प्यार करना उचित नहीं है। बच्चे को डाँटना भी आवश्यक है।

13. शिक्षा और अध्ययन की महत्ता बताते हुए चाणक्य कहते हैं कि मनुष्य का जन्म बहुत सौभाग्य से मिलता है, इसलिए हमें अपने अधिकाधिक समय का वे‍दादि शास्त्रों के अध्ययन में तथा दान जैसे अच्छे कार्यों में ही सदुपयोग करना चाहिए।

14. जिस प्रकार पत्नी के वियोग का दुख, अपने भाई-बंधुओं से प्राप्त अपमान का दुख असहनीय होता है, उसी प्रकार कर्ज से दबा व्यक्ति भी हर समय दुखी रहता है। दुष्ट राजा की सेवा में रहने वाला नौकर भी दुखी रहता है। निर्धनता का अभिशाप भी मनुष्य कभी नहीं भुला पाता। इनसे व्यक्ति की आत्मा अंदर ही अंदर जलती रहती है।

15. चाणक्य के अनुसार नदी के किनारे स्थित वृक्षों का जीवन अनिश्चित होता है, क्योंकि नदियाँ बाढ़ के समय अपने किनारे के पेड़ों को उजाड़ देती हैं। इसी प्रकार दूसरे के घरों में रहने वाली स्त्री भी किसी समय पतन के मार्ग पर जा सकती है। इसी तरह जिस राजा के पास अच्छी सलाह देने वाले मंत्री नहीं होते, वह भी बहुत समय तक सुरक्षित नहीं रह सकता। इसमें जरा भी संदेह नहीं करना चाहिए।

16. चाणक्य कहते हैं कि जिस तरह वेश्या धन के समाप्त होने पर पुरुष से मुँह मोड़ लेती है। उसी तरह जब राजा शक्तिहीन हो जाता है तो प्रजा उसका साथ छोड़ देती है। इसी प्रकार वृक्षों पर रहने वाले पक्षी भी तभी तक किसी वृक्ष पर बसेरा रखते हैं, जब तक वहाँ से उन्हें फल प्राप्त होते रहते हैं। अतिथि का जब पूरा स्वागत-सत्कार कर दिया जाता है तो वह भी उस घर को छोड़ देता है।

1७. बुरे चरित्र वाले, अकारण दूसरों को हानि पहुँचाने वाले तथा अशुद्ध स्थान पर रहने वाले व्यक्ति के साथ जो पुरुष मित्रता करता है, वह शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। आचार्य चाणक्य का कहना है मनुष्य को कुसंगति से बचना चाहिए। वे कहते हैं कि मनुष्य की भलाई इसी में है कि वह जितनी जल्दी हो सके, दुष्ट व्यक्ति का साथ छोड़ दे।

1८. चाणक्य कहते हैं कि मित्रता, बराबरी वाले व्यक्तियों में ही करना ठीक रहता है। सरकारी नौकरी सर्वोत्तम होती है और अच्छे व्यापार के लिए व्यवहारकुशल होना आवश्यक है। इसी तरह सुंदर व सुशील स्त्री घर में ही शोभा देती है।

शनिवार, 8 जनवरी 2011

स्वामी जी का संदेश





पश्चिमी देशों के सफल दौरे के बाद जब स्वामी विवेकानंद भारत आए। तो उनके एक शिष्य ने पूछा कि उन्हें पश्चिमी देशों का क्यों दौड़ा करना पड़ा। वास्तव में यह एक विचारोत्तेजक प्रश्न था। इस प्रश्न का उत्तर स्वामीजी ने किस तरह दिया।

गुरुवार, 11 मार्च 2010

नानाजी, जैसा हम उन्हें जानते थे, भाग-3

पिछले अंक में हम बात कर रहे थे कि रामनाथ गोयंका जी, अच्युत पट्टवर्द्धनजी, जयप्रकाश नारायणजी, नानाजी देशमुख और राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर तिरूपति दर्शन के लिए रवाना हुए. आगे-
रामधारी सिंह दिनकर ने सबकी उपस्थिति में भगवान तिरूपति के सामने प्रार्थना की(जयप्रकाश और दूसरे लोगों को सुनाकर)-
हे भगवान तिरुपति, हमारा शेष जीवन लोकनायक जयप्रकाश नारायण को अर्पित कर दो, ताकि वो मातृभूमि की सेवा कर सकें.  
भगवान तिरुपति का दर्शन कर सभी मद्रास पहुंचे. माउंट रोड, जहां इंडियन एक्सप्रेस का ऑफिस था, रामनाथजी के घर पहुंचते ही दिनकर जी रामनाथजी की गोद में गिर गए और कुछ ही पलों में उन्होंने आखिरी सांस ली- उस समय वहां, जयप्रकाश नारायण, नानाजी देशमुख और अच्युत पट्टवर्धन उपस्थित थे. साफ था कि दिनकरजी की प्रार्थना का भगवान तिरूपति बालाजी ने उत्तर दिया. दिनकरजी के निधन के तुरंत बाद जयप्रकाश नारायण ने बिहार के छात्र आंदोलन का नेतृत्व करने का फैसला लिया. इसबार जयप्रकाश नारायण ने तनिक देरी नहीं की. मेरे बार-बार के अनुरोध के बावजूद नानाजी ने इस घटना के बारे में इंडियन एक्सप्रेस में लिखने से मना कर दिया. जब मैने पूछा कि लोग इस घटना के बारे में कैसे जानेंगे तो उन्होंने कहा कि
मैंने सारी बात अपनी डायरी में लिख दी है, मेरी मृत्यु के बाद लोग जान जाएंगे. अब नानाजी देशमुख इस दुनिया में नहीं है, इसलिए मैं उन बातों को लिखने में स्वयं को स्वतंत्र पा रहा हूं.
बाकी तो सबको मालूम है. पौरूषग्रंथि के ऑपरेशन के बाद लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने स्वतंत्र भारत के सबसे बड़े जन आंदोलन का नेतृत्व किया. यह नेतृत्व भ्रष्टाचार के खिलाफ था. इस आंदोलन के कारण इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लगा दिया. आरएसएस पर प्रतिबंध लगा दिया और सभी विरोधी नेताओं को जेल में ढूंस दिया गया. यह समय नानाजी के जीवन का सर्वोत्तम काल था. इस दौरान नानाजी देशमुख ने भूमिगत आंदोलन चलाया. नानाजी के आंदोलन ने 1977 में देश में लोकलहर खड़ा कर दिया. इंदिरा गांधी ने अपनी निरंकुशता को जारी रखने के लिए जनादेश का मार्ग चुना. लोकसभा चुनाव की घोषणा कर दी गई. नानाजी के भूमिगत आंदोलन ने वो लोकलहर पैदा कर दी कि इंदिरा गांधी की खुफिया एजेंसियां भी चकमा खा गई. नानाजी देशमुख जनता पार्टी के निर्माता थे. वो पहलीबार चुनाव लड़े और जीत हासिल की, लेकिन जब मोरारजी देसाई ने उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल होने के लिए जोर डाला, उन्होंने ऐसा करने से इनकार कर दिया.
बाद में जब जनता पार्टी में विभाजन हुआ और 1980 में भारतीय जनता पार्टी बनी, नानाजी ने सक्रिय राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा कर दी. उन्होंने घोषणा की कि वो 65 साल के हो गए हैं इसलिए सक्रिय राजनीति से संन्यास लेना पसंद करेंगे. अब नानाजी एक नई भूमिका में थे- दबे-कुचले लोगों की सामाजिक-आर्थिक बेहतरी को सुनिश्चित करने और उनकी नैतिकता और आध्यात्मिकता को संबल प्रदान करने में वे जुट गए. उन्होंने उत्तरप्रदेश के सबसे पिछड़े जिले चित्रकूट में अपना सेवा प्रकल्प शुरू किया, इसके बाद महाराष्ट्र के सूखा-प्रभावित और गरीब जिले बीड़ में सेवा प्रकल्प चलाया. अंतत: करीब पांच सौ गांवों में सामाजिक-आर्थिक उत्थान और प्रगति का व्यापक कार्य किया. तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ एपीजे अब्दुल कलाम ने नानाजी के चित्रकूट प्रकल्प का स्वयं निरीक्षण किया. कलाम ने नानाजी के कार्यों की भूरि-भूरि प्रशंसा की. उन्होंने कहा कि कि जिले के अस्सी गांव मुकदमे मुक्त हैं. 
चित्रकूट में मैंने नानाजी देशमुख और दीनदयाल उपाध्याय के उनके साथियों से मुलाकात की. दीन दयाल शोध संस्थान ग्रामीण विकास के प्रारूप को लागू करने वाला अनुपम संस्थान है यह प्रारूप भारत के लिए उपयुक्त है. विकास कार्यों से अलग दीनदयाल उपाध्याय संस्थान विवाद-मुक्त समाज की स्थापना में मदद करता है. मैं समझता हूं कि चित्रकूट के आसपास अस्सी गांव मुकदमा-मुक्त है. गांव के लोगों ने सर्वसम्मति से फैसला किया कि किसी विवाद का हल करने के लिए वे वे अदालत नहीं जाएंगे. तय हुआ कि विवाद आपसी सहमति से सुलझा लिए जाएंगे. नानाजी देशमुख के मुताबिक अगर लोग लड़ते झगड़ते रहेंगे तो विकास के लिए समय ही नहीं बचेगा." कलाम के मुताबिक, विकास के इस अनुपम प्रारूप को सामाजिक संगठनों, न्यायिक संगठनों और सरकार के माध्यम से देश के विभिन्न भागों में फैलाया जा सकता है. शोषितों और दलितों के उत्थान के लिए समर्पित नानाजी की प्रशंसा करते हुए कलाम ने कहा कि नानाजी चित्रकूट में जो कर रहे हैं वो अन्य लोगों के लिए आंखें खोलने वाला होना चाहिए.
वैसे तो पूरा देश ही उनकी कर्मभूमि थी, लेकिन अंतिम कर्मभूमि के रूप में उन्होंने चित्रकूट को नया जीवन दिया. 

सोमवार, 8 मार्च 2010

नानाजी, जैसा हम उन्हें जानते थे, भाग-2

ना हीं रामनाथ गोयंका जी और ना ही नानाजी जानते थे कि डर किस चिड़िया का नाम है. इन दोनों महापुरुषों ने अनायास ही हजारों लोगों, पत्रकारों के दिलों में सच कहने और लिखने का साहस भर दिया.
वो रामनाथ जी और नानाजी ही थे, जिन्होंने लोकनायक जयप्रकाश नारायण को  1974 में बिहार के छात्र आंदोलन का नेतृत्व करने के लिए राजी किया, इसने देश के राजनीतिक परिदृश्य को बदल दिया. बिहार का छात्र आंदोलन स्वतंत्र भारत के सबसे बड़े आंदोलनों में से था.
एक अविश्वनीय घटना जिसने गोयंकाजी और नानाजी की अपील पर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की निरंकुश सत्ता के खिलाफ विद्रोह का नेतृत्व करने के लिए जयप्रकाश नारायण को राजी कर लिया.   इस घटना के बारे में मुझे जानकारी, 1980 के अंत में मिली, जब मैंने मुंबई के इंडियन एक्सप्रेस टावर में नानाजी और रामनाथजी से पूछा कि उन्होंने जयप्रकाश नारायण को आंदोलन के लिए कैसे राजी किया. तब नानाजी वो रोमांचकारी और अविश्वनीय घटना कह सुनाई.
बात, 1973 की है. स्थान था बैंगलोर स्थित इंडियन एक्सप्रेस का गेस्ट हाउस(अतिथि गृह). इस ऐतिहासिक बैठक में रामनाथ गोयंका, नानाजी देशमुख, 1942 के भूमिगत आंदोलन के नायक अच्युत पट्टवर्द्धन और राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर शामिल थे. चारों इस बात बात पर जोर दे रहे थे कि इंदिरा गांधी की निरंकुश सत्ता के खिलाफ विद्रोह की अगुवाई जयप्रकाश को करनी चाहिए, क्योंकि इंदिरा गांधी बहुत ही निरंकुश हो चुकी थी, उन्होंने न्यायपालिका और नौकरशाही सहित लोकतंत्र के संस्थागत ढांचे को ध्वस्त करना शुरू कर दिया था. यहां एक बात ये भी सच थी कि राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर जवाहरलाल नेहरू को सबसे प्रिय दोस्तों में से एक थे और साखकर इंदिरा गांधी से उनके बहुत अच्छे संबंध थे. मगर ये दोस्ती राष्ट्र के प्रति कर्तव्यों के निर्वहन की राह में दिनकर जी के लिए कभी रोड़ा नहीं बनी. जयप्रकाश नारायण मुख्य रूप से अपने खराब स्वास्थ्य के चलते विद्रोह का नेतृत्व करने में हिचकते थे. वो मधुमेह के रोगी थे और साथ ही उन्हें पौरूषग्रंथि संबंधी जटिलताएं भी थी. जयप्रकाश नारायण ने कहा कि वे लंबे समय तक जीवित नहीं रहेंगे और उनका स्वास्थ्य इस महान कार्य को अपने हाथ में लेने की अनुमति नहीं दे रहा है. रामनाथ जी ने उन्हें भरोसा दिलाया कि वे उनके पौरूषग्रंथि का भेल्लोर में ऑपरेशन कराकर समस्या को दूर करा देंगें और बाद में उन्होंने ऐसा किया भी. लेकिन जयप्रकाश नारायण तब भी तैयार नहीं हुए.
इस स्थिति में, रामनाथ गोयंका जी, एक महान आस्थावादी होने के कारण, सभी लोगों को तिरूपति चलने की सलाह दी. गोयंका ने कहा कि वे इसके बाद मद्रास चलेंगे जहां आगे विचार विमर्श होगा. सभी तिरूपति की ओर रवाना हो गए.
आगे पढ़ेंगे, जेपी आंदोलन के लिए राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ने कैसे बलिदान दिया-  

शुक्रवार, 12 सितंबर 2008

शक्ति और क्षमा


तुलसीदासजी के रामचरित मानस में रामसेतु निर्माण से पूर्व का प्रसंग है. भगवान राम विभीषण से पूछते हैं कि नाना प्रकार के जीव-जंतुओं से भरे इस विशाल सागर को कैसे पर किया जाए. विभीषण सलाह देते हैं कि सागर(सगर) आपके पूर्व थे, आप उनसे प्रार्थना करें, वे आप पर कृपा रास्ता बतला देंगे. राम सागर की प्रार्थना के लिए तैयार हो गए, लेकिन लक्ष्मण को विभीषण की सलाह अच्छी नहीं लगी. उन्होंने कहा कि कायर ही भगवान-भगवान चिल्लाते है. भगवान राम ने लक्ष्मण को यह कहकर शांत किया कि उचित समय पर ही बल प्रयोग करेंगे और उन्होंने ऐसा ही किया. गोस्वामी तुलसी दास जी ने इस प्रसंग को बहुत ही सुंदर तरीके से रचा. इसके साथ ही, दिनकर जी की रचना का भी उल्लेख करूंगा, जिसमें उन्होंने मानव मात्र को शक्तिसंपन्न होने की बात रही. अंत में यह कहने के लालच से नहीं बच पा रहा हूं कि बचपन ही में मैंने सुंदरकांड सहित अनेकों कविताओं और संस्कृत के दर्जनों श्लोकों को कंठस्थ कर लिया था जो आज भी मुझे ललित और प्रेरक लगते हैं. हालांकि बाद में इनसे नाता टूट गया, फिर भी प्रथम प्रेरणा जीवन को प्रेरित करती रही हैं. सुन कपीस लंकापति वीरा। केहि विधि तरिए जलधि गंभीर।। संकुल मकर उरग झष जाती। अति अगाध दुस्तर सब भांति।। कह लंकेश सुनहु रघुनायक। कोटि सिंधु सोषक तब सायक।। जद्यपि तद्यपि नीति अस गाई। विनय करिए सागर संग जाई।। प्रभु तुम्हार कुल गुरू जलधि, कहिहि उपाय विचारि। बिनु प्रयास सागर तरहिं सकल भालु कपि धारि।। सखा कही तुम नीकि उपाई। करिए देव जो होहिं सहाई।। मंत्र न यह लक्ष्मण मन भावा। राम वचन सुनि अति दुख पावा।। नाथ दैव कर कवन भरोसा सोखिए सिंधु करिए मन रोसा।। कादर मन कहुं एक अधारा। दैव दैव आलसी पुकारा।। सुनत बिहस बोले रघुवीरा। ऐसेहिं करब धरहुं मन धीरा।। अस कहिं प्रभु अनुजहिं समुझाई।। सिंधु समीप गए रघुराई। प्रथम प्रणाम किंह सिरूनाई। बैठे पुनि तट दर्भ डसाई।। विनय मानत जलधि जड़ गए तीन दिन बीत। बोले राम सकोप तब भय बिन होहि न प्रीत।। लक्ष्मन बान सरासन आनू। सोषौं बारिधि बिसिख कृसानु।। सठ सन विनय कुटिल सन प्रीति। सहज कृपण सन सुंदर नीति।। क्रोधहि सम कामहिं हरि कथा।। ऊसर बीज बए फल जथा। अस कहि रघुपति चाप चढावा। यह मत लक्ष्मण कर मन भावा भगवान ने महासागर के किनारे कुश की चटाई लगाकर तीन दिनों तक प्रार्थना की, मगर सिंधु ने कोई जवाब दिया. राम क्रोधित हो उठे. बोले, लक्ष्मण धनुष बाण लाओ. मुर्खों के साथ विनय करना, कुटिल के साथ प्रीति करना, कंजूसों को नीति की बात कहना, क्रोधी से समता की बात करना और कामी स्त्री-पुरूषों के समक्ष हरिकथा कहना उतना ही बेकार है, जितना ऊसर जमीन में बीज बोना. अब राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की शक्ति और क्षमा- क्षमा दया तप त्याग मनोबल सबका लिया सहारा। पर नरव्याघ्र सुयोधन तुमसे कहो कहां कब हारा। क्षमाशील हो रिपु समक्ष तुम विनीत हुए जितना ही। दुष्ट कौरव ने तुमको कायर समझा उतना ही। क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो। उसको क्या जो दंतहीन विषहीन विनीत सरल हो। तीन दिवस तक पंथ मांगते रघुपति रहे सिंधु किनारे। बैठे बैठे छंद को पढ़ते अनुनय के प्यारे प्यारे। उत्तर से जब एक नाद भी उठा नहीं सागर से। उठी अधीर धधक पौरूष की आग राम से शर से। सिंधु देह धर त्राहि-त्राहि करता आ गिरा शरण में। चरण पूजि दासता ग्रहण की बंधा मूढ बंधन में। सच पूछो तो शर में ही बसती दीप्ति विनय की । संधि वचन संपूज्य उसी का जिसमें शक्ति विजय की। सहनशीलता क्षमा दया को तभी पूजता जग है। बल के दर्प चमकता जिसके पीछे जब जगमग है।।
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