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मंगलवार, 26 जुलाई 2011

क्या ये सिर्फ उपयोगी बेवकूफ हैं?

मूल लेखक- एस गुरुमूर्ति साभार- एक्प्रेसबुज.कॉम अनुवाद- सत्यजीत प्रकाश

उदारवादियों और धर्मनिरपेक्षतावादियों की सूची देखिएः- जस्टिस राजिंदर सच्चर(देश में मुसलमानों की स्थिति पर मशहूर सच्चर समिति की रिपोर्ट के लेखक), दिलीप पडगांवकर(केंद्र सरकार द्वारा कश्मीर पर गठित तीन मध्यस्थों में से एक), हरीश खरे(प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार), रीता मनचंदा(भारत-पाक शांति के लिए संघर्ष करने वाली महिलाओं के एक समूह की स्थानीय साझेदार), वेद भासिन(कश्मीर टाइम्स के संपादक), हरिंदर बावेजा(खोजी संपादक, हेडलाइन्स टुडे), गौतम नवलखा व कमल चेनॉय(मानवाधिकार कार्यकर्ता), प्रफुल्ल विदवई (मशहूर स्तंभकार)

ये लोकप्रिय भारतीय उदारवादियों की सूची है, जो भारतीय संवाद में अहम प्रभाव रखते हैं- चाहे मामला कश्मीर का हो या धर्मनिरपेक्षता का, मामला भ्रष्टाचार का हो या सांप्रदायिकता का, बात नरेंद्र मोदी की हो या सोनिया गांधी का।

लेकिन ये सूची पद्म पुरस्कारों के लिए संभावित लोगों की सूची नहीं है। ये उन लोगों की सूची है जो गुलाम नबी फाई के अतिथि बनते रहे हैं। वही, गुलाम नबी फाई जिसे आईएसआई के लिए काम करने के आरोप में अमेरिकी खुफिया एजेंसी एफबीआई ने गिरफ्तार किया है। उन्नीस जुलाई को वाशिंग्टन टाइम्स में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, फाई को जिन आरोपों में गिरफ्तार किया गया है उनमें पाकिस्तानी सरकार और पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई से लाखों डॉलर लेना, कश्मीर से भारत को निकाल बाहर करने के लिए निर्वाचित अमेरिकी अधिकारियों को प्रभावित करने के लिए इन पैसों से योजनाएं बनाना शामिल है। फाई को कश्मीर से भारत को निकाल बाहर करने के लिए योजना बनाने के जुर्म में गिरफ्तार नहीं किया गया है क्योंकि अमेरिका में ऐसा करना अपराध नहीं है। बल्कि फाई पाकिस्तानी हितों के लिए अमेरिकी अधिकारियों के प्रभाव को खरीदने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। भारतीय कानून के मुताबिक, अगर इन लोगों को पता होता कि ये फाई कौन है, तो फाई की सूची में शामिल इन भारतीय उदारवादियों पर देशद्रोह का मामला हो सकता है और अगर इनको फाई के बारे में पता नहीं था तो पूर्व संपादक आर जगनाथन के मुताबिक सिर्फ उपयोगी बेवकूफ हैं। लेकिन क्या ये सिर्फ बेवकूफ हैं।

इस मामले में अपने ४५ पृष्ठों के शपथपत्र में एफबीआई ने फाई पर विदेशी नीतियों के एजेंट के रूप में काम करने का षडयंत्र रचने का आरोप लगाया। रिपोर्टों के मुताबिक, एफबीआई ने अपने शपथ पत्र में फाई को अमेरिकी में कश्मीरी चोले में पाकिस्तानी हितों के लिए काम करने वाला बताया। जिन्हें कश्मीरी चोले के रूप में कश्मीर अमेरिकी कौंउसिल नामक संस्था बना रखी थी। रिपोर्टों के मुताबिक, फाई पाकिस्तान में बैठे अपने आकाओं से बात-बात पर सलाह लेता था। एफबीआई ने अपने शपथ पत्र में कहा है कि हर साल ढाई करोड़ से साढ़े तीन करोड़ के हिसाब से फाई ने पाकिस्तान से कम से कम ४ मिलियन(यानी बीस करोड़ रुपये) कश्मीर मुद्दे को पाकिस्तान के पक्ष में मोड़ने के लिए लिये। लेख के शुरू में जिन लोगों का जिक्र किया गया है वो वही लोग है जो फाई की कार्ययोजना को आगे बढ़ाने में उसके पैरवीकार हैं। कश्मीर से भारत को भगाने के लिए आईएसआई के इशारे पर फाई द्वारा आयोजित विचार मंथन और बैठकों में ये लोग शामिल होते रहे हैं।

ऐसा लगता है कि फाई को पाकिस्तान में बैठे उनके आकाओं से संबंध बताने के लिए एफबीआई ने पुख्ता काम किया है। ऐसा करने के लिए एफबीआई ने फाई और उसके आकाओं के करीब चार हजार ईमेलों और फोन-कॉलों को इकट्ठा किया है। ऐसा लगता है कि फाई के एक सहयोगी ने जुर्म कबूल कर लिया है कि फाई आईएसआई का एक कारकून है और एफबीआई इस सहयोगी को बतौर गवाह इस्तेमाल करना चाहता है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार इस गवाह के मुताबिक, पाकिस्तान सरकार के लिए प्रचार करने के लिए आईएसआई ने कश्मीर अमेरिकी कौंसिल का निर्माण करवाया। चूंकि फाई एक कश्मीरी है और उसके पास अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से मास्टर की डिग्री है इसलिए वो अमेरिका को बैगर संदेह हुए वहां काम कर सकता था। रिपोर्टों के मुताबिक, आईएसआई एजेंट होने के बाद उसने पाकिस्तान और आईएसआई के निर्देश पर काम करना शुरू किया। इसके लिए पैसे उसे आईएसआई से मिलते थे। उपरोक्त गवाह के मुताबिक, फाई के भाषण का अस्सी प्रतिशत हिस्सा आईएसआई लिखकर देता था और बाकी बीस प्रतिशत पर भी उसकी स्वीकृति लेनी होती थी। इसलिए फाई सौ फीसदी आईएसआई का एजेंट था।

हमारे उपरोक्त उदारवादी और धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवी इस आईएसआई एजेंट यानी गुलाम नबी फाई द्वारा आयोजित सम्मेलनों में भारत के बतौर महत्वपूर्ण अतिथि शिरकत करते थे। इन बुद्धिजीवियों की मदद से फाई भारत के हितों को नुकसान पहुंचाने में बड़े ही प्रभावी ढ़ंग से कारगर हुआ। फाई का मुकाबला करने के लिए भारत सरकार को पिछले साल कश्मीर कैडर के एक रिटायर्ड आईएएस अधिकारी वजाहत हबीबुल्लाह को वाशिंगटन स्थित अमेरिकी दूतावास में सामुदायिक मामलों का मंत्री नियुक्त करना पड़ा।

कितनी विचित्र बात है। एक तरफ भारत को कश्मीर से भगाने के लिए प्रधानमंत्री के वर्तमान मीडिया सलाहकार हरीश खरे और कश्मीर मामलों पर सरकार के तीन मध्यस्थों में एक दिलीप पडगांवकर आईएसआई के पैसों से आयोजित समारोहों में शिरकत कर भारत के हितों को चोट पहुंचाते हैं, आहत करते हैं, नुकसान पहुंचाते हैं दूसरी तरफ, भारत सरकार को नुकसान की भरपाई के लिए कश्मीर कैडर के एक रिटायर्ड आईएएस अधिकारी को वाशिंगटन भेजना पड़ता है। नतीजा साफ है कि जो लोग फाई के जरिए आईएसआई के षडयंत्र के हिस्सा हैं वही लोग आज यूपीए सरकार के भी अंग हैं।

मगर, सवाल है कि क्या भारत को कश्मीर से बाहर करने के षडयंत्र में फाई इन महत्वपूर्ण लोगों ये जाने बगैर शामिल कर लिया कि इनके विचार उसके आकाओं के हितों को आगे बढाएगा। फाई ने किसी अरुण शौरी, किसी चो रामास्वामी, किसी एमजे अकबर, किसी अर्नब गोस्वामी को क्यों नहीं बुलाया। साफ है कि इन लोगों के विचार आईएसआई के एजेंडे और षडयंत्र को आगे नहीं बढ़ाते, बल्कि अवरुद्ध कर देते। फाई जानता था कि उसकी सूची में शामिल भारतीय उदारवादियों का जम्मू-कस्मीर पर विचार अलगाव वादियों के लिए हितकर होगा और आईएसआई के षडयंत्र को सफल बनाएगा। इसलिए इन्हें सिर्फ उपयोगी बेवकूफ मानना ठीक नहीं है, बल्कि इसे खारिज करना आसान है।


फाई की सूची के दो उदारवादी अब भी अतिउच्च पद पर हैं- एक जम्मू-कश्मीर पर केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त मध्यस्थ हैं(कैबिनेट सचिव स्तरीय वेतन और सुविधाएं) तो दूसरे प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार हैं। प्रधानमंत्री जी, ये सबूत कोई भारतीय पुलिस नहीं दे रही है। बल्कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी एफबीआई दे रही है। ये वही अमेरिका है जिसे आप सबसे ज्यादा प्यार करते हैं। आप सुन रहे हैं।


पद-टिप्पणी- इस लेख में कुलदीप नैयर का नाम शामिल नहीं है।

सोमवार, 25 जुलाई 2011

कुलदीप नैयर ने क्यों पकड़ा कान?


देश में राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में संलिप्त लोगों को कोई कमी नहीं है। इनमें कई अपने आपको नामी-गिरामी पत्रकार और बुद्धिजीवी होने का दावा करते हैं। ऐसे लोगों पत्रकारों और बुद्धिजीवियों की दुकान चल भी रही है क्योंकि ये लोग आईएसआई जैसी भारत विरोधी गतिविधियों में संलिप्त एजेंसियों के पैसे से विदेशों की यात्रा करते हैं, उनके सेमिनार में शामिल होते हैं, जाने-अनजाने भारत विरोधी बयान देते हैं, कश्मीर की आजादी की बात करते हैं, आतंकवादियों के मानवाधिकारों की पैरवी करते हैं, राष्ट्रविरोधी ताकतों को संरक्षण देने की वकालत करते हैं, आतंकवादियों के पुनर्वास के लिए लॉबिंग करते हैं। इसके लिए ये लोग आईएसआई जैसी एजेंसियों से संरक्षण पाने वाले संगठनों से कुछ पुरस्कार, अवार्ड आदि जैसी चीजें पा जाते हैं। पुरस्कार पा जाने के बाद स्वघोषित सेक्यूलर भारतीय मीडिया संस्थानों में इन लेख संपादकीय पृष्ठों में छप जाता है, बदले में मोटी रकम की कमाई भी हो जाती है अंग्रेजी बोलने वाले इनमें कई कथित पत्रकारों और बुद्धिजीवियों को टेलीविजन का ग्लैमर पाने का वांछित मौका भी मिल जाता है। इस मौका को हासिल करते-करते इन लोगों को कुछ अंतर्राष्ट्रीय अवार्ड और कुछ राष्ट्रीय अवार्ड भी मिल जाता है और ये लोग देशी संस्कृति को मुंह चिढ़ाने लगते हैं। देश के लिए त्याग और तपस्या करने वालों को मुंह चिढ़ाते हैं। सरकार में अपनी पैठ बनाते हैं फिर योजना परियोजना पारित करते हैं। देश में मन-मुताबिक कानून बनाने के लिए लॉबिंग करते हैं।

ऐसे पत्रकारों, लेखकों और बुद्धिजीवियों पर इस तरह के आरोप काफी अर्से से लगते रहे हैं। मगर, इनकी पुष्टि जब तक अमेरिका जैसे पश्चिमी देश नहीं कर देते हैं तब तक हमारे देश में इन्हें मानने की प्रथा और परंपरा नहीं रही है। स्वामी विवेकानंद भारत भ्रमण करते रहे लेकिन उन्होंने किसी ने विद्वान या ऋषि नहीं माना। किसी ने उन्हें पूज्य नहीं समझा। अपने को साबित करने के लिए उन्हें अमेरिका जाना पड़ा, वहां जब अमेरिकी विद्वानों ने उनकी विद्वता
को
लोहा माना तो विवेकानंद रातों रात मशहूर हो गए। भारत ने उन्हें तत्काल पूज्य मान लिया। हमारे तथाकथित बुद्धिजीवियों और मानवाधिकारवादियों पर लगे आरोपो के बारे में जब अमेरिका ने आरोप लगाया तो पूरी दुनिया में, खासकर भारत के बुद्धिजीवियों में हलचल मच गई।
कुलदीप नैयर ने तो ऐसे सेमिनारों में जाने से कान ही पकड़ ली।
दरअसल, पूरा मामला गुलाम नबी फाई की गिरफ्तारी से सामने आया। फाई कश्मीरी पृथक्कतावादी बुद्धिजीवी है। जिसने पाकिस्तान के किसी विश्वविद्यालय से जनसंचार में पीएचडी की डिग्री हासिल की और इस दौरान वो पाकिस्तान खुफिया एजेंसी आईएसआई के संपर्क में आया। आईएसआई ने फाई की बुद्धि और उसकी भारत विरोधी मानसिकता का इस्तेमाल करना चाहा और उसे अमेरिका भेज दिया।
गुलाम नबी फाई अमेरिका में भारत विरोधी गतिविधियों में संलिप्त हो गया। वह अमेरिका में भारत-विरोधी जनमत तैयार करने लगा। वह कश्मीर में भारतीय सेना द्वारा कथित मानवाधिकारों के उल्लंघन और कश्मीर के आजादी के लिए अमेरिकी सांसदों दबाव बनाने लगा और ऐसे सांसदों, नेताओं और बुद्धिजीवियों का गुट तैयार करने लगा। गुलाम नबी फाई की नजर भारत के ऐसे बुद्धिजीवियों और पत्रकारों पर भी थी जो कश्मीर में मानवाधिकार के कथि उल्लंघन पर आए दिन शोर-मचाते रहते हैं और किसी न किसी रूप में कश्मीर की आजादी का गीत गाते हैं। अरुंधती राय जैसे लोगों की आवाज काफी मुखर है तो बाकी लोग अपने निजी स्वार्थों के लिए किसी न किसी रूप में इस कार्य में शामिल हैं। दुर्भाग्यवश जैसे लोग मानवाधिकार के पैरोकार समझे जाते हैं और सम्मानित भी किए जाते हैं।
जहां तक बात फाई की है तो वो कई सालों से अमेरिका में भारत विरोधी गतिविधि चला रहा था। अमेरिका में उसकी गिरफ्तारी के बाद ही इन सब बातों का खुलासा हुआ है कि अमेरिका पाकिस्तान में आतंकवाद से लड़ाई के लिए जो पैसा देता है। उसी पैसे का इस्तेमाल पाकिस्तान की आईएसआई भारत विरोधी गतिविधियों के लिए करता है। इसी पैसे का एक बड़ा हिस्सा गुलाम नबी फाई के पास भी पहुंचता है। अमेरिका द्वारा कोर्ट में दी गई जानकारी के मुताबिक, आईएसआई ने वर्ष 2010-2011 में गुलाम नबी फाई को 4 से 5 मिलियन डॉलर धन दिया। फाई इस धन का इस्तेमाल कश्मीर की आजादी के लिए अमेरिकी सांसदों को अपने पक्ष में करने, भारतीय पत्रकारों और बुद्धिजीवियों को अमेरिका बुलाकार सेमिनार कराने आदि के लिए किया करता था।
अमेरिका में गुलामनबी फाई के सम्मेलन में जाने वाले भारतीय बुद्धिजीवियों और पत्रकारों में कुलदीप नैयर, हरिंदर बवेजा और दिलीप पडगांवकर शामिल हैं।
याद रहे ये दिलीप पडगांवकर वहीं हैं तो कश्मीर समस्या के समाधान के लिए भारत सरकार द्वारा गठित तीन सदस्यीय सलाहकार समिति में शामिल हैं। जो अलगाववादियों और आतंकवादियों से बातचीत के पक्षधर रहे हैं और जिन्होंने उनसे जेलों में जाकर मुलाकात भी है। दिलीप पडगांवकर आतंकवादियों के पुनर्वास की भी पैरवी करते रहे हैं।
ये स्वनामधन्य पत्रकार थोड़े से नाम और पैसे के लिए गुलाम नबी फाई जैसे देशद्राहियों का मोहरा बनते रहे हैं। और जाने-अनजाने आईएसआई के पैसे पर देशविरोधी गतिविधियों में शामिल एजेंसियों के लिए विदेश दौरा करते रहे हैं।
यहां ध्यान देने वाली बात है कि फाई सालों से अमेरिका में रहकर आईएसआई के पैसे से भारत विरोधी गतिविधियां चला रहा था और ऐसा नहीं है कि अमेरिका को इसकी भनक नहीं लगी होगी। मगर, अमेरिका ने इसका भंडाफोड़ तब किया है जब उसे अमेरिका पर लगाम लगानी थी। पाकिस्तान के एबटाबाद में अलकायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन की हत्या के बाद पाकिस्तान के साथ अमेरिका की ठनने लगी फिर अमेरिका ने पाकिस्तान को उसकी औकात बतानी चाही और गुलाम नबी फाई की कारिस्तानियों का भंडाफोड़ किया।
अब किसी को समझने में देरी नहीं करनी चाहिए कि अरुंधती राय जैसे लोगों को बुकर पुरस्कार क्यों मिल जाता है। क्यों जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी से लाल पैगाम देने वाले अमेरिका विरोधी राग अलापते रहते हैं और ज्योंही कोई मौका मिलता है अमेरिका के लिबर्टी ऑफ स्टेच्यू से जा लिपटते हैं।

शनिवार, 9 जुलाई 2011

प्रभाष जोशी की 75वीं जयंती



ऋषि पत्रकार प्रभाष जोशी की 75वीं जयंती 15-16 जुलाई लाई को इंदौर में भाषाई पत्रकारिता महोत्सव के तौर पर मनायी जाएगी। दो दिवसीय सारस्वत समारोह का समायोजन इंदौर प्रेस क्लब और प्रभाष परम्परा न्यास ने किया है। महोत्सव का उदघाटन उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी 15 जुलाई को शाम 5 बजे करेंगे। पत्रकारिता की चुनौतियां और प्रभाष जी के सामाजिक, सांस्कृतिक सरोकारों पर कई सत्रों में चर्चा प्रस्तावित है। महोत्सव का नामकरण प्रभाष प्रसंग किया गया है।
समारोह के दौरान प्रभाष पर्व नामक पुस्तक का लोकार्पण उपराष्ट्रपति के कर-कमलों द्वारा होगा। पांच सौ पन्नों की इस किताब में प्रभाष जी के निधन के बाद उनपर लिखे गये लेखों-संस्मरणों का संग्रह है। प्रभाष जोशी की दो कहानियां और एक कविता भी पुस्तक में संकलित है, जो साठ के दशक में लिखी गयी थी। सम्मेलन में जिन विषयों पर चर्चा होनी है उसमें क्रिकेट, पत्रकारिता, जल-जंगल-जमीन और जनांदोलन शामिल है। वर्तमान समय में पत्रकारिता के समक्ष चुनौतियां विषयक सत्र में डॉ वेदप्रताप वैदिक, रामबहादुर राय, कुमार केतकर, हरिवंश, रामशरण जोशी,पुण्य प्रसून वाजपेयी, प्रांजय गुहा ठाकुरता, ओम थानवी,जैसे नामचीन पत्रकार भाग लेंगे।
सामाजिक- सांस्कृतिक विषय से जुड़े सत्रों में अनुपम मिश्र, हर्षमंदर, प्रशांत भूषण, मेधा पाटकर जैसे लोगों के विचार सुनने को मिलेंगे। प्रभाष जोशी के प्रसंदीदा विषय क्रिकेट पर भी एक सत्र होगा जिसमें नायडु से धौनी तक के सफर की चर्चा होगी। क्रिकेटर बिशन सिंह बेदी खासतौर से इस मौके पर अपना अनुभव बांटेंगे। तीसरे प्रेस आयोग की जरूरत पर एक मसौदा वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय ने तैयार किया है, उसे भी सम्मेलन के दौरान प्रस्तुत किया जाएगा।
प्रभाष प्रसंग के लिए प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष जस्टिस पी वी सांवत ने खास तौर पर एक आलेख भेजा है, जिसे प्रतिनिधियों के बीच वितरित किया जाएगा। शुभा मुद्दगल का गायन सुनने का आनंद भी प्रतिनिधि उठा सकेंगे। समापन के दिन गणेश शंकर विद्यार्थी की प्रतिमा से राजेन्द्र माथुर की प्रतिमा स्थल तक पद यात्रा भी होगी।

मंगलवार, 25 मई 2010

कैसे लिखे समाचार?

  •                                                   field-notes

  • शुद्धता


  • स्पष्टता


  • संक्षिप्तता



    शुद्धता, समाचार की आत्मा होती है यानी आप समाचार लिखते वक्त जो कुछ भी लिखे सही-सही लिखे, शब्द, वाक्य, आंकड़े, नाम आदि-आदि. अगर आप सही लिखते हैं तो आपका आधा काम हुआ समझिए. अगर आपकी लिखावट शुद्ध और मानक है तभी वह पाठकों का ध्यान आकर्षित करेगी, वर्ना पाठक को आपसे दूर ले जाएगी. वैसे शुद्धता हर तरह की लिखावट की प्रथम कसौटी है.

    सही, लिखने के साथ-साथ आप स्पष्टता और संक्षिप्तता पर भी ध्यान दें.

    खराब लिखावट बेकार लिखावट है. यह पाठक के विश्वास को खत्म करती है जो कि प्रेस की स्वतंत्रता के लिए आवश्यक है. प्रेस को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता इस बात को लेकर है कि वह लोगों को सही और निष्पक्ष जानकारी मुहैया कराती है. सही और निष्पक्ष जानकारी मत निर्धारण के लिए जरूरी है क्योंकि यह सही मत स्वस्थ लोकतंत्र के भविष्य को तय करती है.

    अगर प्रेस की सच्चाई और निष्पक्षता से जनता का भरोसा उठ जाता है तो जल्द ही लोकतंत्र से भी उसका भरोसा उठ जाएगा. इसलिए समाचार लिखते वक्त नाम, स्पेलिंग, आंकड़े, कथ्य और तथ्य की शुद्धता पर विशेष ध्यान दें. कुल मिलाकर शुद्धता और सच्चाई को प्राथमिकता दें.

    दूसरी बात है, संक्षिप्तता. लेखन में कोई बात, कोई शब्द ऐसा नहीं हो जिसका वाक्य में कोई मतलब नहीं हो हो. इस वाक्य पर ध्यान दें-

    ए ने बी के ऊपर मामला दर्ज कराया.

    को अगर हम ऐसा कहें कि-

    ए ने बी पर मामला दर्ज कराया

    तो इससे वाक्य में संक्षिप्तता की काफी गुंजाइश बचती है. संक्षिप्तता वाक्य स्तर पर हो और न्यूज स्टोरी स्तर पर भी. न्यूज स्टोरी लिखने में उल्टा पिरामिड को ध्यान में रखें. यानी सबसे अहम सबसे ऊपर और सहायक तथ्य सबसे नीचे. ध्यान रहे अहम तथ्य सबसे ज्यादा और सहायक तथ्य सबसे कम हों.

    अब बारी तीसरी बात यानी स्पष्टता की. बात स्पष्ट हो, संपूर्ण हो ताकि पाठक के सभी सवालों के जवाब मिल जाएं. अनाप-शनाप और अनर्गल, कहने का मतलब कि बेमतलब की बात मत करें.

    बात को सामान्य शब्दों में यानी बोलचाल की भाषा में व्यक्त करें ताकि एक सामान्य व्यक्ति भी आपकी बात समझ जाए. आप जितनी बातें सोच सकते हैं उतनी लिख नहीं सकते. लिखना बहुत ही मुश्किल है. आप जितना जानते हैं, उतना भी नहीं लिख सकते. कहते हैं कि व्यक्ति के पास जितना बड़ा शब्द भंडार होता है वह उसका महज एक दसवां हिस्सा ही लिख पाता है. यानी आप अपने ज्ञान का महज दस प्रतिशत प्रयोग कर सकते हैं. आप जानते हैं तो अच्छा लिख सकते हैं.

आपका उपसंपादक तय करता है कि कौन सी स्टोरी मुख्य पृष्ठ पर होगी, मगर आप अगर अच्छा लिखते हैं तो उप-संपादक को सोचना पड़ेगा कि आपकी स्टोरी मुख्य पृष्ट पर क्यों नहीं जाए. आपकी लिखावट उप-संपादक की सोच को प्रभावित करती है. उपसंपादक की सोच पर हावी होने के लिए आपमें वो गुण होने चाहिए. आपकी लिखावट में दम होनी चाहिए. आप घटना को शुद्ध-शुद्ध, स्पष्ट और संक्षेप में लिखें. मगर घटना के बारे में सबकुछ जाने, तभी आप बेहतर लिख सकते हैं. मतलब आप जितना जानते हैं उसका केवल दस प्रतिशत लिखें.

“क” वाची प्रश्नों के उत्तर (क्या, कब, क्यों, कैसे, कौन, कैसे) आपकी स्टोरी में जरूर होनी चाहिए. जरूरी नहीं है कि प्रथम वाक्य में ही आप सारे प्रश्नों का उत्तर दे दें.

समाचार क्या है?

मजाक में किसी ने कहा, अगर कुत्ता आदमी को काटता है तो वो समाचार नहीं है, मगर अगर आदमी कुत्ता को काट ले तो ये समाचार कहलाएगा.


सरल शब्दों में कहें तो जो कुछ नया है, रोमांचक है, आकर्षक है, अलग है, अनुपम है, उत्सुकता बढ़ाने वाला है, चर्चा के योग्य है, वो समाचार है.


मगर, आजकल समाचार के मायने बदल गए हैं. आज के संपादक कहने लगे हैं कि पाठक या दर्शक जो कुछ पढ़ना या देखना चाहता है, वही समाचार है. पाठकों या दर्शकों की रुचि जानने के लिए अखबार या टेलीविजन सर्वेक्षण कराते है, प्रतिक्रिया मंगवाते हैं, फिर दर्शक या पाठक की मर्जी से समाचार परोसते हैं.


फिर, समाचार वही है जिसकी दर्शकों को जरूरत है, जो दर्शक जानना चाहता है, जिसमें उसकी रुचि है.


समाचार की कसौटी-समाचार में इनमें से एक या एक से ज्यादा तत्व होने चाहिए. समाचार को निम्नलिखित तथ्यों की कसौटी पर कसकर देखें कि वो समाचार के लायक है नहीं-


* प्रभाव- किसी भी समाचार का प्रभाव इस बात से जाना जाता है कि वह कितने व्यक्ति को प्रभावित कर रहा है यानी समाचार का प्रभाव कितने लोगों पर हो रहा है. जितने ज्यादा लोगों पर समाचार प्रभावी है वह उतना बड़ा समाचार है.
* निकटता- कोई घटना जितनी निकट में घटती है वो उतना ही बड़ा समाचार होता है. बिहार के लोगों के लिए पटना में मुख्यमंत्री क्या बोलते हैं वो ज्यादा बड़ा समाचार है, अमेरिकी राष्ट्रपति के अमेरिका में दिए बयान के मुकाबले.
* तत्क्षणता- नयापन समाचार की आत्मा होता है. कोई समाचार एक सप्ताह बाद समाचार के लायक नहीं रह जाता है. तुरंत या तत्क्षण घटने वाली घटना बड़ी खबर है. समाचार मछली की तरह होती है, जो ताजा की अच्छी होती है. बासी कोई नहीं पसंद करता है.
* बड़प्पन- खबर जितने बड़े लोगों की होती है, खबर उतनी बड़ी होती है. अभिषेक बच्चन के बेटे की शादी की खबर बड़ी खबर है. प्रधानमंत्री अगर सबेरे उठकर टहल रहे हों तो भी बड़ी खबर है. लालू की हरेक बयान बड़ी खबर है.
* नयापन- खबर में नयापन, अनुपमता और रोमांच होना चाहिए यही इसका गुण होता है.
* संघर्ष- हिंसा, युद्ध, हमला और अपराध अपने आप में बड़ी खबर है.
* प्रासंगिकता- अगर घटना प्रासंगिक है तो समाचार है वर्ना उसे कौन पूछता है. महात्मा गांधी को हर कोई जानता है. मगर जब जेम्स ओटिस उनके कुछ सामानों की नीलामी करता है तो अखबार समाचारपत्र-टीवी महात्मा गांधी के जीवन दर्शन के बारे में बताने लगते हैं. यहां इस खबर की प्रासंगिकता है.
* उपयोगिता- उपयोगिता भी समाचार का बड़ा गुण है. हम जो सूचना दे रहे हैं वो लोगों के लिए कितनी उपयोगी है, लोगों का जीवन उससे कितना संवरता है, उनका काम कितना आसान होता है.
* रूचिपरकता- समाचार रुचिकर होना चाहिए. यह समाचार का सबसे बड़ा गुण है.





गुरुवार, 23 अक्टूबर 2008

तहलका का सच(तरुण तेजपाल के नाम खुला पत्र)

तहलका संपादक के नाम खुला पत्र - साजिद राशिद

प्रिय तरूण तेजपाल जी, मैं तहलका का नियमित पाठक हूं. इसलिए पिछले दिनों जब तहलका ने सिमी पर केन्द्रित अंक निकाला तो मैंने इसे बहुत उत्सुकता से पढ़ा. लेकिन पढ़कर मैं चकित रह गया. मुझे उम्मीद थी कि तीन महीनों की खोजबीन के बाद आपने सिमी के बारे में जो जानकारी दी होगी उससे निश्चित ही मेरी समझ में बढ़ोत्तरी होगी....
यह अपेक्षा इसलिए भी थी क्योंकि तहलका पहले भी इस तरह की खोजी रपटों में हर पक्ष की गहन पड़ताल करता है और सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलुओं को सामने रखता है. लेकिन विद्वान खोजी पत्रकार अजीत साही ने तीन महीने की मेहनत और खोजबीन के बाद सिमी के बारे में जो निष्कर्ष प्रस्तुत किया है वह यह है कि सिमी के पदाधिकारी जिन्हें बम विस्फोटों और देशद्रोह के आरोप मेंगिरफ्तार किया गया है वे बेहद मासूम हैं और उनके खिलाफ कोई सबूत नहीं है. पूरी पत्रकारिता का सारयह है, क्योंकि सिमी पर प्रतिबंध का कोई ठोस आधार नहीं बनता, इसलिए उसपर प्रतिबंध नहीं होनाचाहिए.

मेरे ख्याल से आपके प्रतिनिधि अजीत साही ने तीन महीनों तक ग्यारह शहरों का कष्टदायक सफर तय करके सिमी कार्यकर्ताओं के परिजनों से मिलकर जो मालूमात हासिल की है वह तो बिल्कुल सही है क्योंकि सिमी का अपने बचाव में जो बयान है अजीत साही ने बड़ी ईमानदारी से उसे दर्ज किया है. लेकिनअफसोस सिर्फ इतना है कि उन्होंने इसे कहीं भी क्रास चेक नहीं किया है . और शहरों के बारे में तो नहीं लेकिन मुंबई में अजीत साही ने दूसरा पक्ष जानने के लिए किससे संपर्क किया? मुंबई में अंग्रेजी की वरिष्ठ पत्रकार ज्योति पुनवानी पिछले तीन सालों से मुसलमानों की समस्याओं पर इतना "सहानुभूति पूर्वक" लिखती हैं कि जमात--इस्लामी और सिमी के एक पदाधिकारी ने उन्हें मुसलमान होने का न्यौता ही दे दिया था. साल भर पहले तक ज्योति पुनवानी सिमी को इस्लाम के प्रति अति उत्साही युवाओं का संगठन बताती रही हैं. जमात-ए-इस्लामी के हुकूमत-ए-इलाहिया (दुनियाभर में अल्लाह की हुकूमत) के नजरिये में उन्हें कोई आपत्ति नजर नहीं आती. विशेष न्यायाधिकरण का सिमीसे प्रतिबंध हटाने का फैसला आने के बाद १७ अगस्त को टाईम्स आफ इंडिया में इन्हीं ज्योति पुनवानीने लिखा था हाउ माई परसेप्शन आफ सिमी चेंज्ड, और विस्तार से बताया है कि कैसे सिमी के बारे मेंउनकी धारणा बदल गयी.
तरूण तेजपाल जी, क्या साही से आपको यह नहीं पूछना चाहिए था कि उन्होंने सिमी के चरित्र का दूसरापक्ष जानने की कोशिश क्यों नहीं की? उन्होंनेअपनी पूरी रिपोर्टिंग सिमी के बचाव पक्ष के वकील के तौर पर क्यों किया ? आपने सिमी का जो प्रोफाईल दिया है उसमें उसके संस्थापक मोहम्मद अहमदुल्ला सिद्दीकी के बारे में लिखा है कि उन्होंने १९७७ में उन्होंने सिमी की स्थापना की, लेकिन पाठकों को यह बताने कीजहमत क्यों नहीं उठायी कि कुछ ही सालों बाद सिद्दीकी ने सिमी से अपना नाता तोड़ लिया था . पिछले साल इंडियन एक्सप्रेस को दिये एक साक्षात्कार में उन्होंनेकहा था उन्हें सिमी की स्थापना पर अफसोस है, क्योंकि वह इस्लाम के रास्ते से हटकर जेहाद के रास्तेपर चला गया है. इसी तरह आपनेसिमी और जमात-ए-इस्लामी के संबंध पर सिर्फ इतना लिखा गया है कि वह जमात-ए-इस्लामी का एकउपसंगठन था और वह जमात से अलग अपनी पहचान कायम करना चाहता था जबकि हकीकत यह हैकि सिमी के जेहादी तेवरों को देखने के बाद जमात ने खुद सिमी से अपना रिश्ता तोड़ लिया था . लेकिन यह भी सच है कि यह संबंध विच्छेद एक दिखावा मात्र था.
अब मैं कुछ ऐसे तथ्य रखना चाहूंगा जो अजीत शाही द्वारा ११ शहरों में खोजबीन करने के बाद भी सिमी के बारे में जुटाये नहीं जा सके. १९९६ में अफगानिस्तान में तालिबान की हुकूमत कायम होने के बादसिमी ने उसे अपना आदर्श मानते हुए भारत में नारों और पोस्टरों के जरिए जेहाद का ऐलान कर दिया. २९ अक्टूबर १९९९ को सिमी ने कानपुर में सिमी ने अखिल भारतीय सम्मेलन आयोजित किया था जिसमें देशभर के २० हजार से अधिक प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया था. इस सम्मेलन को फिलीस्तीनी जिहादी संगठन हमास के नेता शेखयासीन अहमद ने संबोधित किया था. आप जानते ही होंगे कि शेख यासीन ने ही इजरायल औरअमेरिका में आत्मघाती हमले करवाये थे. इसी सम्मेलन को फोन द्वारा जमात-ए-इस्लामी (पाक) केअध्यक्ष काजी हुसैन ने भी संबोधित किया था . यह सिमी ही था जिसने कानपुर के तमाम सिनेमघरों को बंदकराने का आदेश दिया था और वहां की लड़कियों को बुर्का पहनने की चेतावनी दी थी.

चलिए मान लेते हैं कि आपका संवावदताता कानपुर नहीं गया था इसलिए इन जानकारियों से मरहूमरह गया हो लेकिन आपको यह पता ही होगा कि सिमी के पांच उद्येश्य हैं- अल्लाह मकसद हमारा, रसूलरहबल हमारा, कुरान कानून हमारा, जिहाद रास्ता हमारा, शहादत मंजिल हमारी. सिमी के लेटरहेड परबने निशान में धरती पर कुरान रखा हुआ है और कुरान पर एके-४७ रायफल . इसलिए सिमी खुद अपने इरादों को छुपाकर नहीं रख रहा है. पृथ्वी पर कुरान और उस पवित्र किताब पर एके-४७ का अर्थ किसी को समझाने की जरूरत नहीं है. सिमी किसके खिलाफ जेहाद करना चाहता है और क्यों शहीद हो जाना चाहता है, क्या इसके पीछे छिपे मकसद को बताना होगा? एक मिनट में डेढ़ सौबुलेट दागनेवाली एके-४७ का इस्तेमाल आखिर किस लक्ष्य के लिए होता है ? हमें तो यह पता है कि इससे निकलेवाली गोलियां जान बचाती नहीं, जान लेती हैं. तरूण जी जितना आपको खाकी पैण्ट और लाठीधारियों से परहेज है उतना ही हमें भी है. छह इंच का चाकूनुमात्रिशूल बांटनेवाले बजरंगदलियों से घृणा होती है, फिर एक-४७ लेकर देहाद का इरादा रखनेवाले हमारीनजर में मासूम कैसे हो सकते हैं? "काफिर भारत" को नेस्तनाबूत कर देने की प्रतिज्ञा लेनेवाले लादेनऔर तालिबान जिनके आदर्श हों उन्हें किन मानदंडों पर आप राष्ट्रवादी साबित करेंगे? आपकी यह रिपोर्ट बहुत सारे उर्दू अखबारों ने अपने यहां छापी है. निश्चित रूप से जो सिमी को इस्लाम का सच्चा खिदमतगार मानते हैं उन्हें आपकी रिपोर्ट से बहुत बल मिला है. लेकिन आपकी इस रिपोर्ट से उन मुट्ठीभर मुस्लिम बुद्धिजीवियों को जरूर धक्का लगेगा जो सिमी की देशविरोधी गतिविधियों से अपने संप्रदाय को सचेत करते रहे हैं. काश तहलका सिमी के मुखौटे के पीछे की असली सच्चाई सामने लाने की कोशिश की होती....

आभार,
साजिद राशिद
(साजिद राशिद संजीदा पत्रकार हैं और जनसत्ता में नियमित कालम लिखते हैं.)

टिप्पणी- ये पत्र तहलका हिंदी पाक्षिक में छपे एक लेख- आतंक के मोहरे या बलि के बकरे, लेख पर छपी से प्रतिक्रिया के लिया गया है. इसका कोई व्यवसायिक उद्देश्य नहीं, साथ ही, ब्लॉग स्वामी ने अपनी को ओर इस लेख में एक शब्द भी नहीं जोड़ा है.