हिंदी शोध संसार
कांग्रेस लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
कांग्रेस लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2011

तेलंगाना के भंवरजाल में फंसी कांग्रेस सरकार

लेखक- डॉ. देवकुमार पुखराज
आंध्रप्रदेश के दस जिलों को मिलाकर तेलंगाना नामक अलग राज्य बनाने की
मांग को लेकर चल रहा आंदोलन तेज रफ्तार पकड़ चुका है। तेलंगाना इलाके में
सकल जनालु सामे यानि समग्र लोगों का आंदोलन के चलते एक माह से जनजीवन
ठप्प पड़ गया है और इसके मंद पड़ने की उम्मीद भी फिलहाल बनती नहीं दिख
रही है। पृथक प्रांत के लिए जारी आंदोलन ने राज्य की किरण रेड्डी सरकार
के सामने गंभीर राजनैतिक संकट पैदा कर दिया है। केन्द्र की यूपीए सरकार
और कांग्रेस पार्टी भी तेलंगाना के जाल में बुरी तरह उलझ सी गयी है।
दूसरे शब्दों में कहें तो कांग्रेस की हालत सांप-छुछुंदर वाली होकर रह
गयी है। यदि तेलंगाना बनाने की दिशा में आगे बढ़े तो आंध्र के बाकी दो
इलाके रायलसीमा और तटीय आंध्र में गलत संदेश जाएगा और आंदोलन का श्रेय भी
केसीआर की टीआरएस पार्टी ले उड़ेगी। उधर तेलंगाना नहीं बनने की स्थिति
में भी इस इलाके से कांग्रेस का पत्ता साफ होते साफ दिख रहा है। कांग्रेस
को दूसरी दुविधा इस बात को लेकर है कि कहीं ऐसा करने से दूसरे राज्यों के
बंटवारे की मांग न तूल पकड़ ले।उन्हें यह आशंका सता रही है तेलंगाना को
मंजूरी दी तो पृथक विदर्भ, पृथक हरित प्रदेश, पृथक बुंदेलखंड और पृथक
पूर्वांचल के लिए मांगें तूल पकड़ लेंगी। कांग्रेस पार्टी अंदर और बाहर
दोनों तरफ से दबाव में है। इलाके से आने वाले सांसद और विधायक हर हाल में
पृथक राज्य का सपना पूरा होते देखना चाहते हैं। सांसद मधु गौड़ याश्की
घोषणा कर चुके हैं कि जरूरत पड़ी तो वे पार्टी छोड़ने से भी पीछे नहीं
रहेंगे।
मतलब साफ है कि कांग्रेस नेतृत्व के सामने राजनैतिक फैसले लेने की गंभीर
चुनौती आ पड़ी है। लेकिन प्रधानमंत्री आवास पर हुई कोर कमेटी की कई
बैठकें भी बगैर किसी नतीजे पर पहुंचे खत्म हो चुकी है। कांग्रेस नेतृ्त्व
के सामने एक हीं फार्मूला है कि किसी तरह इस मामले को लटकाये रखा जाए।
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि कांग्रेस को हर हाल में तेलंगाना हारी
हुई बाजी दिख रहा है। ये एक ऐसा मसला है जो कांग्रेस के लिए गले की हड्डी
बन चुका है।
उधर तेलंगाना राष्ट्र समिति के प्रमुख और सांसद के. चन्द्रशेखर राव
प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की हड़ताल वापस लेने संबंधी अपील ठुकरा
चुके हैं। केसीआर का कहना है कि ये हड़ताल तबतक जारी रहेगी जबतक सरकार एक
निश्चित समय-सीमा में अलग तेलंगाना राज्य बनाने का प्रस्ताव सामने नहीं
रखती।
तेलंगाना के लाखों सरकारी कर्मचारी और अध्यापक एक माह से हड़ताल पर हैं।
वकील भी अदालतों का बहिष्कार कर रहे हैं। प्रशासनिक कामकाज ठप पड़ा है और
स्कूल- कॉलेज भी बंद हैं। राज्य पथ परिवहन निगम के कर्मचारियों के आंदोलन
में शामिल हो जाने के चलते हैदराबाद से लेकर जिला मुख्यालयों तक में
सार्वजनिक परिवहन सेवा ठप्प पड़ गयी है। एक आकलन के मुताबिक अकेले आरटीसी
को 2 सौ करोड़ रुपये से ज्यादा का घाटा हो चुका है। सिंगरेनी कोयलरी के
70 हज़ार कर्मचारियों के भी हड़ताल पर रहने से कोयले का खनन बंद है।
मज़दूरों की हड़ताल से हर दिन एक लाख साठ हज़ार टन कोयले का उत्पादन रुक
गया है और राज्य के सभी बिजली घरों को कोयले की कमी का सामना करना पड़
रहा है। पडोस के राज्यों कर्नाटक और महाराष्ट्र में भी बिजली का संकट बढ़
गया है। केवल रामागुंडम के एनटीपीसी प्लांट में सात सौ मेगावाट बिजली का
उत्पादन घट गया है। इस संयंत्र से दक्षिण भारत के सभी राज्यों को बिजली
मिलती है। खदानों में हड़ताल के कारण कोयले का उत्पादन बंद हो गया है और
बिजली का उत्पादन घट गया है। अकेले आंध्रप्रदेश को इस समय सात लाख यूनिट
से भी ज़्यादा बिजली की कमी का सामना करना पड़ रहा है। राजधानी हैदराबाद
में बिजली की कटौती को दो घंटे से बढाकर चार घंटे करना पड़ा है। अन्य
जिलों और ग्रामीण इलाकों में तो 12 घंटे तक लोड शेडिंग हो रही है।
किसानों को कम बिजली मिलने से उनकी फसलें सूख जाने का ख़तरा पैदा हो गया
है।
आंदोलन की गहराई इस बात से मापी जा सकती है कि दशहरे के दिन जब सारे देश
में लोग रावण-मेधनाथ के पुतले फूंक रहे थे तो तेलंगना के समर्थक रावण की
जगह कांग्रेस पार्टी के नेताओं के पुतले जला रहे थे। अदिलाबाद और
निज़ामाबाद से लेकर नलगोण्डा और खम्मम ज़िलों तक हर जगह तेलंगाना
समर्थकों ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह,
मुख्यामंत्री किरण कुमार रेड्डी सहित बड़े नेताओं के पुतले और कट-आउट
जलाये।
तेलंगाना संयुक्त कार्रवाई समिति के संयोजक प्रो. कोदंडराम रेड्डी इस
हड़ताल को आखिरी युद्ध की संज्ञा दे रहे हैं। आगे उनका कार्यक्रम हड़ताल
को और तेज करने का है। वे कहते हैं- "बहरी सरकार को सुनाने और नींद से
जगाने के लिए हम रेल सेवा भी ठप्प करने वाले हैं।" वैसे हड़ताल के कारण
हर वर्ग प्रभवित हो रहा है। सर्वाधिक नुकसान किसानों,छात्रों और लघु
कारोबारियों को हुआ है। उद्योग-व्यापार से लेकर हैदराबाद की इमेज तक को
गहरा धक्का लगा है। इस पूरे घटनाक्रम से राज्य में होने वाले निवेश पर
खासा असर पड़ा है। कई निवेशकों ने अपना पैसा निकाल लिया है और वो
विशाखापट्टनम जैसी जगहों पर निवेश करने लगे हैं। जानकार मानते हैं कि
1999 से 2009 का समय आंध्रप्रदेश के लिए स्वर्णिम था, लेकिन मौजूदा
परिस्थितियां ख़राब हैं और अगले दो से तीन साल इसी तरह चलता रहा तो
हैदराबाद से निवेशक पूरी तरह दूर हो जाएंगे। लेकिन तेलंगाना समर्थक ऐसा
नहीं मानते। खेल पत्रकार चंद्रमौली मुत्तिरेड्डी कहते हैं- तेलंगाना बनने
के बाद भारी संख्या में एनआरआई इलाके में निवेश करेंगे, स्थानीय लोगों को
रोजगार के अवसर प्राप्त होंगे और कुछ खास किस्म के पूंजीपतियों का
वर्चस्व खत्म होगा। ये इलाका राजनीतिक,सामाजिक और सांस्कृतिक तौर से अपनी
विशिष्ठ पहचान को प्राप्त करेगा।
वैसे तेलंगाना मामले पर 2009 से अबतक लोगों की सोच में भी काफ़ी बदलाव
आया है। आंध्रप्रदेश में बहुत से लोग अब चाहते हैं कि अलग तेलंगाना राज्य
बन जाए और यह मामला ख़त्म हो। रेलवे में कार्यरत एनजीओ कॉलोनी निवासी सी.
एम. रेड्डी कहते हैं कि रोज-रोज की हड़ताल और उपद्रव से बेहतर है कि
सरकार एक बार में फैसला कर ले।
गत 29 सितम्बर को मुख्य विपक्षी तेलुगु देशम पार्टी के तेलंगाना क्षेत्र
से आने वाले 32 विधायकों ने छह महीने में दूसरी बार विधानसभा से त्याग
पत्र दे दिया। उनकी सरकार से मांग है कि तेलंगाना राज्य की स्थापना के
लिए जल्द से जल्द एक विधेयक संसद में पेश किया जाये। इससे पहले फ़रवरी
में सभी दलों के 100 तेलंगाना विधायकों ने इस्तीफ़ा दिया था,जिसे स्पीकर
एन. मनोहर ने यह कह कर रद्द कर दिया था कि वो भावावेश में उठाया गया क़दम
था। अब तेलंगाना राष्ट्र समिति के 11 और टीडीपी के चार बाग़ी विधायक
दूसरी बार त्याग पत्र स्पीकर को सौंप चुके हैं। इस बीच टीडीपी प्रमुख
एन.चन्द्रबाबू नाय़डू ने भी साफ कर दिया है कि यदि सरकार तेलंगाना बनाने
के लिए पहल करती है तो वे इसका विरोध नहीं करेंगे। कुल मिलाकर गेंद
केन्द्र सरकार के पाले में हीं पड़ी है। फैसला उसे हीं लेना है।

रविवार, 21 अगस्त 2011

कांग्रेस को अब गैर-राजनीतिक चेहरों का ही सहारा

गैर-राजनीतिक चेहरों के जरिए कांग्रेस अन्ना के आंदोलन से निपटने को तैयार

कांग्रेस के राजनीतिक दिग्गज टीम अन्ना की रणनीति के सामने औंधे मुंह गिरे हैं। कपिल सिब्बल, चिदंबरम, मनीष तिवारी, दिग्विजय सिंह, अंबिका सोनी, अभिषेक मनु सिंघवी, रेणुका चौधरी, राशिद अल्वी जैसे कांग्रेसी दिग्गजों की बोलती बंद है। खबर तो मिल रही है कि कांग्रेस ने अशालीन और अभद्र भाषा बोलने के लिए मशहूर अपने प्रवक्ता मनीष तिवारी को तरीपार कर दिया है। बड़बोले नेताओं को जुबान पर ताला लगाने को कहा गया है। जुबान खोलने पर तोल-तोल के बोलने को कहा गया है। कल तक टीम अन्ना के लिए अभद्र भाषा बोलने वाले कांग्रेसी दिग्गजों को मुंह की खानी पड़ी है। अभी तक टीम अन्ना ने उनकी हरेक चतुराई और चलाकी का मुंहतोड़ जवाब दिया है। आगे क्या होगा कहना जरा मुश्किल है। लेकिन फिलहाल जो परिस्थिति दिख रही है। उसमें टीम अन्ना सरकार पर भारी दिख रही हैं। कांग्रेस के अंदर अन्ना के मुद्दे पर फूट पड़ती दिख रही है। कांग्रेसी नेता ही अन्ना के खिलाफ कार्रवाई गलत ठहरा रहे हैं। उनकी तथाकथित कानून की दलील पर कांग्रेसी नेता ही सवाल उठा रहे हैं।

कांग्रेस ने टीम अन्ना को नीचा दिखाने की कम कोशिश नहीं की, लेकिन उन्हें टीम अन्ना से अब तक मात ही मिली है। इसमें जहां टीम अन्ना की रणनीति का योगदान है तो वहीं, अन्ना के अनशन को बिना शर्त मिल रहे मीडिया सहयोग को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। पंद्रह अगस्त की शाम की बात है। राजघाट से लौटने के बाद अन्ना हजारे दिल्ली के कंस्टीट्यूशनल क्लब में प्रेसवार्ता कर रहे थे। उस प्रेसवार्ता में मीडियाकर्मियों ने अन्ना की बात-बात पर जो तालियां बजाई उससे कांग्रेस को जबरदस्त खीझ हुई। उससे भी आगे बढ़कर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने अन्ना के अनशन का जो 24*7 लाइव कवरेज किया, वो भी कांग्रेस और सरकार की नजरों में चढ़ गया। मीडियावालों ने सरकार से कुछ ऐसे सवाल किए जिससे सरकार ना सिर्फ असहज हुई बल्कि उससे जवाब देते नहीं बना। कांग्रेस या यूपीए सरकार ने इससे पहले कभी ऐसे सवालों का सामना नहीं किया। उसे ये सोच-सोचकर परेशानी महसूस हुई कि क्या मीडिया उससे इस ढंग के सवाल भी कर सकती है। दरअसल कांग्रेस ने कभी मीडिया से इस तरह के सवालों की उम्मीद नहीं करती है, जिसका जवाब उसके पास नहीं हो।

दो रोज पहले की बात है। केंद्रीय मंत्री अंबिका सोनी ने टीम अन्ना के सदस्य अरविंद केजरीवाल की योग्यता पर सवाल खड़ा करते हुए कहा कि अरविंद केजरीवाल को कौन जानता था। हमारी सरकार ने आरटीआई लाया, इसी के कारण लोग उन्हें जानते हैं। तभी मीडियाकर्मियों ने सवाल दागा, क्या आप ने ही अरविंद केजरीवाल को मैग्सेसे अवार्ड दिलाया। क्या आप ही उन्हें आईआईटी में एडमिशन दिलाया। क्या आप ही के चलते वो आईआरएस बने। जाहिर है कि कांग्रेस कम से कम मीडिया से तो ऐसे सवालों की उम्मीद नहीं करती है। कांग्रेस के युवराज और मीडिया द्वारा बहुप्रचारित भारत के भावी प्रधानमंत्री राहुल गांधी तो अन्ना के मुद्दे पर जुबान खोलने के लिए तैयार नहीं। तेलुगु सुपरस्टार और पीआरपी प्रमुख चिरंजीवी के कांग्रेस में शामिल होने के मौके पर पत्रकारों ने राहुल से बार-बार अन्ना के मुद्दे पर कुछ बोलने के लिए कहा। लेकिन राहुल गांधी ने मीडिया को नजरअंदाज कर दिया। कांग्रेस राहुल गांधी को यूथ आइकॉन के रूप में प्रस्तुत करती है, मगर यूथ आइकॉन यूथ अन्ना के मामलों पर सवालों को टाल जाते हैं। दसअसल राहुल गांधी देश के किसी भी अहम मुद्दे पर किसी भी सवाल का जवाब देने में खुद को सक्षम नहीं पाते हैं।

राजनीति के हर मोर्चे पर हार चुकी कांग्रेस अब अपने गैर राजनीतिक चेहरों को मैदान में उतार रही हैं। ये ऐसे लोग हैं जो कांग्रेस के प्रति अगुग्रहीत रहे हैं। इन चेहरों में कुछ खुद को सामाजिक कार्यकर्ता कहते हैं जो कांग्रेस के अहसानों तले दबे रहे हैं। इन सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों ने कांग्रेस को सत्ता में बनाए रखने के लिए एक समिति बनाई जिसे राष्ट्रीय सलाहकार परिषद नाम दिया गया। इस बहुप्रचारित परिषद के अध्यक्ष स्वयं यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी हैं।

अन्ना के अनशन से कांग्रेस में हाहाकार मचा हुआ है। कांग्रेसी दिग्गज हाथ जला चुके हैं। ऐसे में कांग्रेस ने अब इन अहसानमंद गैर-राजनीतिक चेहरों को मैदान में उतार दी है। इन लोगों की एक गुट ने अरुणा रॉय की अगुवाई में शनिवार को लोकपाल बिल का एक नया ड्राफ्ट पेश कर दिया और इस ड्राफ्ट को संसद की स्थायी समिति में पेश करने की बात कही जा रही है। आपको एकबार फिर याद दिला दें कि अरुणा राय यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की एक सदस्य हैं, इस परिषद में हर्षमंदर भी हैं। हर्षमंदर मजबूत लोकपाल के पक्ष में तो हैं लेकिन वो अन्ना के तरीकों से सहमत नहीं हैं। सिर्फ हर्षमंदर ही नहीं अरुणा रॉय भी अन्ना के अनशन से सहमत नहीं है। अरुणा रॉय को जनलोकपाल से भी शिकायत है। और उन्होंने लोकपाल का अपना मसौदा पेश किया है। इस मसौदे में एक दो नहीं बल्कि पांच-पांच स्तरों लोकपाल बनाने की बात कही गई है।

सरकार के इशारों पर नाचने वाली सीबीआई और सीवीसी को लोकपाल से अलग रखने की बात कही गई है। अरुणा रॉय ने ऐसे समय में लोकपाल का अपना मसौदा पेश किया जब अन्ना हजारे पांच दिनों से अनशन पर हैं। अरुणा रॉय लगातार राष्ट्रीय सलाहकार परिषद में बनी हुई हैं। उन्होंने इससे पहले कभी ऐसा बिल पेश नहीं किया। इससे पहले भी अन्ना ने अनशन किया था। अन्ना के अनशन के बाद सरकार ने एक संयुक्त प्रारूपण समिति भी बनाई थी। जिसमें टीम अन्ना और सरकार की ओर से पांच पांच सदस्य थे। उस समय भी अरुणा रॉय की टीम की ओर से कोई सलाह या सुझाव नहीं आया। जबकि वो सलाहकार परिषद में बनी हुई थी। लेकिन अब जब अन्ना हजारे छह दिनों से अनशन पर हैं और पूरा देश सड़कों पर उतर चुका.. ऐसे में अरुणा रॉय के इस मसौदे को क्या कहा जाय। ये सुझाव या सलाह नहीं बल्कि पूरा का पूरा मसौदा है। साफ है कि ये अन्ना के आंदोलन की हवा निकालने की सरकारी कोशिश है और कांग्रेस ने अपने गैर-राजनीतिक चेहरों को सामने लाकर अन्ना के आंदोलन की हवा निकालने की कोशिश की है।

ऐसा नहीं है कि अरुणा रॉय पर ही बात समाप्त हो जाएगी। कांग्रेस के और कई गैर-राजनीतिक चेहरे सामने आएंगे। इन लोगों का अपना-अपना मसौदा होगा और इस मसौदे के जरिए वो अन्ना के आंदोलन को अप्रभावी बनाने की कोशिश करेंगे। टीम अन्ना को इसके लिए भी तैयार रहना होगा। ऐसे में जन लोकपाल का भविष्य आम जनता के समर्थन पर निर्भर करेगा।

हालांकि अन्ना पहले ही साफ कर चुके हैं कि उनकी लड़ाई किसी पार्टी के खिलाफ नहीं है बल्कि ये लड़ाई व्यवस्था के खिलाफ है। टीम अन्ना ने भाजपा की भी आलोचना की है क्योंकि भाजपा ने जो रवैया अख्तियार कर रखा है वो ना सिर्फ आश्चर्यजनक है बल्कि वो खुद भाजपा के लिए भी घातक है। अगर भाजपा अपना रुख साफ नहीं करती है तो उस पर भी भ्रष्टाचारियों को संरक्षण देने का आरोप लगेगा और चुनाव के समय पब्लिक भाजपा नेताओं का स्वागत अंडे और टमाटरों से करेगी। फिलहाल भाजपा बीज बोने के लिए तैयार नहीं है, मगर उसकी नजर फसल पर लगी हुई है।

इधर, कांग्रेस राजनीतिक रूप से असहाय तो हो ही चुकी है। गैर-राजनीतिक रूप से भी वो सीधे-सीधे सामने नहीं आ रही है। यहां भी उसका कुटिल और चालाक स्वभाव उसे ऐसा करने से रोक रही है। साफ है कि वो वो हर जंग को अपनी कुटिलता व चालाकीपन से जीतना चाहती है। लोकतांत्रिक मूल्यों की धज्जियां उड़ाने के लिए वह बात-बात में कानून, संविधान, प्रक्रिया, लोकतंत्र आदि की दुहाई देती है। मगर, अन्ना और उनकी टीम की सादगी, सरलता, बेबाकीपन और पारदर्शिता के आगे उसका हर दांव फीका पड़ता जा रहा है। और आगे भी ऐसा ही होगा। इसमें कोई संदेह नहीं।


रविवार, 31 जुलाई 2011

सोनिया गांधी का सच

लेखक- एस गुरुमूर्ति साभार- भारतीय पक्ष

जब श्वेजर इलस्ट्रेटे ने यह आरोप लगाया कि सोनिया गांधी ने राजीव गांधी द्वारा घूस में लिए गए पैसे को राहुल गांधी के खाते में रखा है तो मां-बेटे में से किसी ने न तो विरोध किया और न ही इस पत्रिका के खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई की।

राजनीति में राजीव गांधी ने सबसे खतरनाक गलती क्या की थी? यह बताने में दिमाग पर ज्यादा जोर नहीं पड़ना चाहिए कि उनकी सबसे बड़ी गलती खुद ईमानदार होने का दावा करते हुए अपने को मिस्टर क्लीन के तौर पर पेश करना थी। यह उनके लिए घातक साबित हुआ। इंदिरा गांधी उनसे अलग थीं। जब उनसे उनकी सरकार के भ्रष्टाचार के बारे में सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि यह तो पूरी दुनिया में चल रहा है। यह बात 1983 की है। दिल्ली उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश ने इसके बाद यह कहा था कि जब इतने उच्च पद पर बैठने वाला इसे तर्कसंगत बता रहा है तो ऐसे में आखिर भ्रष्टाचार पर काबू कैसे पाया जाएगा। इन बातों का नतीजा यह हुआ कि इंदिरा गांधी पर कभी किसी ने भ्रष्टाचार का आरोप नहीं लगाया। क्योंकि उन्होंने कभी यह दावा नहीं किया कि वह ईमानदार हैं। पर इसके उलट राजीव गांधी ने अपनी ईमानदारी के दावे कर खुद को कड़ी निगरानी में ला दिया। राजीव गांधी की ईमानदारी की पोल 1989 में बोफोर्स मामले पर खुल गई और जनता ने इसकी सजा देते हुए उन्हें और कांग्रेस को सत्ता से बेदखल कर दिया। सियासी लोगों के लिए इस घटना ने यह सीख दी कि अगर आप ईमानदार नहीं हैं तो कभी ईमानदारी के दावे मत कीजिए। पर यह सीख खुद गांधी परिवार को याद नहीं है। इस मामले में सोनिया गांधी ने इंदिरा गांधी के सुरक्षित रास्ते को न चुनकर राजीव गांधी के घातक रास्ते पर चलने का फैसला किया है। इसके नतीजे भी उनके लिए दुखदायी होने की ही उम्मीद है। तो क्या 1987 से 1989 के बीच की राजनीति का एक बार फिर दुहराव होने वाला है?

इंदिरा को भूलकर राजीव की राह चलने वाली सोनिया गांधी ने 2010 के नवंबर में इलाहाबाद में हुई पार्टी की एक रैली में भ्रष्टाचार को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करने यानि जीरो टालरेंस की बात कही थी। इसके कुछ दिनों बाद ही जब दिल्ली में कांग्रेस अधिवेशन हुआ तो सोनिया गांधी ने फिर यही बात दोहराई। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी ने कभी भी भ्रष्ट लोगों को नहीं बख्शा है क्योंकि भ्रष्टाचार से विकास बाधित होता है। इसी तरह का भाषण राजीव गांधी ने 25 साल पहले मुंबई अधिवेशन में दिया था। इस मसले पर राजीव दो मामलों में सोनिया से अलग थे। जब राजीव गांधी ने खुद को मिस्टर क्लीन कहा था उस वक्त ऐसा कोई घोटाला नहीं था जिसकी वजह से उन्हें रक्षात्मक होना पड़े। पर सोनिया ने तो राष्ट्रमंडल, आदर्श और 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले के बीच ईमानदार होने का दावा किया है। दूसरी बात यह कि राजीव ने बिल्कुल शून्य से शुरुआत की थी और उनकी मिस्टर क्लीन की छवि को खत्म करने का काम तो बोफोर्स घोटले ने किया था। इसके विपरीत सोनिया गांधी के खिलाफ घूसखोरी के तौर पर अरबों डालर लेकर स्विस बैंक खातों में जमा करने की बात पहले ही सामने आ चुकी है। इसमें बोफोर्स सौदे में क्वात्रोचि से मिले लाखों डॉलर शामिल नहीं हैं। स्विट्जरलैंड की एक प्रतिष्ठित पत्रिका और रूस के एक खोजी पत्रकार ने सोनिया गांधी के परिवार पर घूसखोरी में लिप्त होने के कई सबूत जुटाकर सबके सामने रखा है। इस बात के दो दशक बीत जाने के बाद भी सोनिया ने आरोपों का न तो खंडन किया है और न ही खुलासा करने वालों के खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की है। इसकी पृष्ठभूमि में सोनिया गांधी की वह बात ढकोसला मालूम पड़ती है जिसमें उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ने की बात कही है। दरअसल, कहानी कुछ इस प्रकार है।

2.2 अरब डॉलर से 11 अरब डॉलर!

स्विस बैंक में सोनिया गांधी के अरबों डालर जमा होने की बात खुद स्विट्जरलैंड में ही उजागर हुई। यही वह देश है जहां दुनिया भर के भ्रष्टाचारी लूट का धन रखते हैं। स्विट्जरलैंड की सबसे लोकप्रिय पत्रिका श्वेजर इलस्ट्रेटे ने अपने 19 नवंबर, 1991 के एक अंक में एक खास रिपोर्ट प्रकाशित की। इसमें विकासशील देशों के ऐसे 13 नेताओं का नाम था जिन्होंने भ्रष्ट तरीके से अर्जित किए पैसे को स्विस बैंक में जमा कर रखा था। इसमें राजीव गांधी का नाम भी था। श्वेजर इलस्ट्रेटे कोई छोटी पत्रिका नहीं है बल्कि इसकी 2.15 लाख प्रतियां बिकती हैं और इसके पाठकों की संख्या 9.17 लाख है। यह संख्या स्विट्जरलैंड की कुल वयस्क आबादी का छठा हिस्सा है। केजीबी के रिकार्ड्स का हवाला देते हुए पत्रिका ने लिखा, ”पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की विधवा सोनिया गांधी अपने नाबालिग बेटे के नाम पर एक गुप्त खाते का संचालन कर रही हैं जिसमें ढाई अरब स्विस प्रफैंक यानि 2.2 अरब डालर हैं।” राहुल गांधी 1988 के जून में बालिग हुए थे। इसलिए यह खाता निश्चित तौर पर इसके पहले ही खुला होगा। अगर इस रकम को आज के रुपए में बदला जाए तो यह 10,000 करोड़ रुपये के बराबर बैठती है। स्विस बैंक अपने ग्राहकों के पैसे को दबा कर नहीं रखता है, बल्कि इसका निवेश करता है। सुरक्षित दीर्घ अवधि वाली योजनाओं में निवेश करने पर यह रकम 2009 तक बढ़कर 9.41 अरब डालर यानी 42,345 करोड़ रुपये हो जाती है। अगर इसे अमेरिकी शेयर बाजार में लगाया गया होगा तो यह 58,365 करोड़ रुपए हो गई होगी। यदि घूस की इस रकम को आधा दीर्घावधि निवेश योजनाओं में और आधा शेयर बाजार में लगाया गया होगा, जिसकी पूरी संभावना है, तो यह रकम 50,355 करोड़ रुपए हो जाती है। अगर इस पैसे को शेयर बाजार में लगाया गया होता तो 2008 की वैश्विक आर्थिक मंदी से पहले यह रकम 83,900 करोड़ रुपए होती। किसी भी तरह से हिसाब लगाने पर 2.2 अरब डालर की वह रकम आज 43,000 करोड़ रुपए से 84,000 करोड़ रुपए के बीच ठहरती है।

केजीबी दस्तावेज

सोनिया गांधी के खिलाफ कहीं ज्यादा गंभीर तरीके से मामले को उजागर किया रूस की खुफिया एजेंसी केजीबी ने। एजेंसी के दस्तावेजों में यह दर्ज है कि गांधी परिवार ने केजीबी से घूस के तौर पर पैसे लिए। प्रख्यात खोजी पत्रकार येवगेनिया अलबतस ने अपनी किताब ‘दि स्टेट विदिन ए स्टेट: दि केजीबी एंड इट्स होल्ड ऑन रसिया-पास्ट, प्रजेंट एंड फ्यूचर’ में लिखा है, ”एंद्रोपोव की जगह लेने वाले नए केजीबी प्रमुख विक्टर चेब्रीकोव के दस्तखत वाले 1982 के एक पत्र में लिखा है- ‘यूएसएसआर केजीबी ने भारत के प्रधानमंत्री राजीव गांधी के बेटे से संबंध बना रखे हैं। आर गांधी ने इस बात पर आभार जताया है कि सोवियत कारोबारी संगठनों के सहयोग से वह जो कंपनी चला रहे हैं, उसके कारोबारी सौदों का लाभ प्रधानमंत्री के परिवार को मिल रहा है। आर. गांधी ने बताया है कि इस चैनल के जरिए प्राप्त होने वाले पैसे का एक बड़ा हिस्सा आर गांधी की पार्टी की मदद के लिए खर्च किया जा रहा है।” (पृष्ठ 223)। अलबतस ने यह भी उजागर किया है कि दिसंबर, 2005 में केजीबी प्रमुख विक्टर चेब्रीकोव ने सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी की केन्द्रीय समिति से राजीव गांधी के परिवार को अमेरिकी डालर में भुगतान करने की अनुमति मांगी थी। राजीव गांधी के परिवार के तौर पर उन्होंने सोनिया गांधी, राहुल गांधी और सोनिया गांधी की मां पाओला मैनो का नाम दिया था। अलबतस की किताब आने से पहले ही रूस की मीडिया ने पैसे के लेनदेन के मामले को उजागर कर दिया था। इसके आधार पर 4 जुलाई 1992 को दि हिंदू में एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई जिसमें कहा गया, ”रूस की विदेशी खुफिया सेवा इस संभावना को स्वीकार करती है कि राजीव गांधी के नियंत्रण वाली कंपनी को फायदा पहुंचाने के लिए केजीबी ने उन्हें सोवियत संघ से लाभ वाले ठेके दिलवाए हों।’

भारतीय मीडिया

राजीव गांधी की हत्या की वजह से उस वक्त भारतीय मीडिया में स्विट्जरलैंड और रूस के खुलासों की चर्चा नहीं हो पाई। पर जब सोनिया गांधी ने कांग्रेस की कमान संभाली तो भारतीय मीडिया की दिलचस्पी इस मामले में बढ़ गई। जाने-माने स्तंभकार एजी नूरानी ने इन दोनों खुलासों के आधार पर 31 दिसंबर 1998 को स्टेट्समैन में लिखा था। सुब्रमण्यम स्वामी ने श्वेजर इलस्ट्रेटे और अलबतस की किताब के पन्नों को स्कैन कर अपनी जनता पार्टी की वेबसाइट पर डाला है। इसमें पत्रिका का वह ई-मेल भी शामिल है जिसमें इस बात की पुष्टि है कि पत्रिका ने 1991 के नवंबर अंक में राजीव गांधी के बारे में एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी। जब सोनिया गांधी ने 27 अप्रैल, 2009 को मैंगलोर में यह कहा कि स्विस बैंक में जमा भारतीय काले धन को वापस लाने के लिए कांग्रेस कदम उठा रही है तब मैंने 29 अप्रैल, 2009 को इन तथ्यों को शामिल करते हुए एक लेख न्यू इंडियन एक्सप्रेस में लिखा। काला धन वापस लाने के सोनिया गांधी के दावे के संदर्भ में इस लेख में उनके परिवार के भ्रष्टाचार पर सवाल उठाया गया। जाने-माने पत्रकार राजिंदर पुरी ने 15 अगस्त 2006 को केजीबी के खुलासों पर एक लेख लिखा था। इंडिया टुडे के 27 दिसंबर, 2010 के अंक में राम जेठमलानी ने स्विट्जरलैंड में हुए खुलासे की बात कहते हुए यह सवाल उठाया कि वह पैसा अब कहां है? साफ है कि भारतीय मीडिया ने इन दोनों खुलासों पर बीच-बीच में लेख प्रकाशित किया। माकपा सांसद अमल दत्ता ने 7 दिसंबर, 1991 को 2.2 अरब डालर के मसले को संसद में उठाया था, लेकिन उस वक्त लोकसभा के अध्यक्ष रहे शिवराज पाटिल ने राजीव गांधी का नाम कार्यवाही से निकलवा दिया था।

संदेह का घेरा

सवाल यह उठता है कि इन दोनों खुलासों पर सोनिया गांधी और 1988 में बालिग हुए राहुल गांधी ने क्या जवाब दिया? जवाब है कुछ नहीं। सच कहा जाए तो इन खुलासों से ज्यादा गांधी परिवार की चुप्पी ने उनकी छवि को नुकसान पहुंचाने का काम किया है। जब श्वेजर इलस्ट्रेटे ने यह आरोप लगाया कि सोनिया गांधी ने राजीव गांधी द्वारा घूस में लिए गए पैसे को राहुल गांधी के खाते में रखा है, तो मां-बेटे में से किसी ने न तो इसका विरोध किया और न ही इस पत्रिका के खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई की। मां-बेटे ने न ही 1998 में इस मामले पर लेख लिखने वाले एजी नूरानी के खिलाफ कोई कदम उठाया और न ही संबंधित दस्तावेज 2002 में अपनी वेबसाइट पर डालने वाले सुब्रमण्यम स्वामी के खिलाफ कुछ किया। न ही उन्होंने मेरे या एक्सप्रेस के खिलाफ 2009 के अप्रैल में इन तथ्यों पर आधारित लेख छापने के लिए कोई कानूनी कार्रवाई की। जब 1992 में रूस में केजीबी से संबंधित खुलासे की खबर दि हिंदू और टाइम्स आफ इंडिया ने प्रकाशित की, उस वक्त भी किसी गांधी ने कोई शिकायत नहीं की। न ही किसी गांधी ने येवगेनिया अलबतस के खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई की जिन्होंने 1994 में केजीबी और राजीव गांधी के बीच पैसे के लेनदेन के बारे में लिखा। न ही इन लोगों ने 15 अगस्त, 2006 को ऐसा लेख लिखने वाले राजिंदर पुरी के खिलाफ कोई कदम उठाया। हालांकि, 2007 में सोनिया के कुछ वफादार लोगों ने उनकी प्रतिष्ठा बचाने के लिए अमेरिका में बड़े अनमने ढंग से एक मुकद्दमा जरूर दर्ज कराया था। ऐसा तब हुआ जब वहां के कुछ प्रवासी भारतीयों ने अलबतस के खुलासों के आधार पर पूरे पन्ने का विज्ञापन न्यूयार्क टाइम्स में छपवाया। वे सोनिया गांधी की सच्चाई को अमेरिका वालों के सामने रखना चाहते थे। अमेरिकी अदालत ने इस मुकद्दमे को तुरंत खारिज कर दिया क्योंकि सोनिया गांधी खुद अपने नाम से मुकद्दमा दर्ज कराने की हिम्मत नहीं जुटा सकीं। आश्चर्य की बात यह है कि इस मुकद्दमें में भी स्विस बैंक में 2.2 अरब डालर होने की बात को चुनौती नहीं दी गई थी।

अगर मान लिया जाए कि ये दोनों खुलासे आधारहीन हैं और गांधी परिवार ईमानदार है तो ऐसे में उनकी ओर से कैसी प्रतिक्रिया होनी चाहिए थी? ईमानदार आदमी की प्रतिक्रिया वैसी ही होती है जैसी मोरारजी देसाई ने दी थी। जब पुलित्जर पुरस्कार विजेता खोजी पत्रकार सेमोर हेर्स ने अपनी किताब में यह आरोप लगाया कि भारतीय कैबिनेट में मोरारजी सीआईए एजेंट थे तो 87 साल के बूढ़े और रिटायर्ड मोरारजी देसाई ने न सिर्फ गुस्से का इजहार किया बल्कि एक मानहानि का मुकद्दमा भी दर्ज कराया। मोरारजी देसाई के मरने के पांच साल बाद अमेरिकन स्पेक्टेटर में रेल जेन आइजैक ने लिखा कि हेर्स चरित्र हनन करने में माहिर थे और हेनरी किसिंजर को नीचा दिखाने के लिए उन्होंने मोरारजी को निशाना बना लिया। जब मोरारजी के मानहानि मुकद्दमे पर सुनवाई शुरू हुई तो 93 साल की उम्र वाले मोरारजी अमेरिका जाने में सक्षम नहीं थे और उनकी जगह पर किसिंजर ने जाकर हेर्स के दावों को खारिज किया। कहने का मतलब है कि अगर कोई ईमादार होता है तो अपनी उम्र का ख्याल न करते हुए खुद पर लगाए जा रहे आरोपों पर प्रतिक्रिया देता है। संप्रग की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने अब तक इस मसले पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। यह तब जब वे पूरी तरह से सक्रिय हैं, न कि मोरारजी देसाई की तरह सेवानिवृत्त और बुजुर्ग। जब स्विस पत्रिका में यह मामला उजागर हुआ था तो उनकी उम्र महज 41 साल थी। अगर सोनिया और राहुल के बजाए इन दोनों खुलासों में भाजपा के लालकृष्ण आडवाणी और नरेंद्र मोदी का नाम होता तो भारतीय मीडिया और सोनिया गांधी की सरकार उन्हें सलाखों के पीछे भेजने के लिए क्या नहीं करती।

20.80 लाख करोड़ रुपए की लूट

स्विस बैंक में गांधी परिवार के अरबों रुपए का मामला विदेशी गुमनाम खातों में जमा भारतीय पैसे को वापस लाने से जुड़ा हुआ है। भारत को छोड़कर दुनिया के सभी देशों ने स्विस बैंक और इसकी तरह अन्य बैंकों में जमा काले धन को वापस लाने में दिलचस्पी दिखाई है। पर भारत ने इस काम में कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाई। आखिर ऐसा क्यों?

2009 में हुए लोकसभा चुनावों के दौरान भाजपा नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने यह कहा था कि अगर वे सत्ता में आते हैं तो विदेशों में जमा काले धन को वापस लाएंगे। विदेशों में भारत का 500 अरब डालर से लेकर 1400 अरब डालर के बीच काला धन जमा होने का अनुमान है। कांग्रेस ने इतनी रकम होने की बात को शुरुआत में नकार दिया था। पर जब यह मामला तूल पकड़ने लगा तो मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी ने भी यह कहा कि वे इस काले धन को वापस लाएंगे। वैश्विक स्तर पर काले धन के मसले पर काम करने वाली संस्था ग्लोबल फायनैंशियल इंटीग्रिटी (जीएफआई) ने भारत में हुई लूट के बारे में कहा है, ”1948 से लेकर 2008 के बीच भारत ने 213 अरब डालर काले धन के रूप में गंवाए हैं। यह कर चोरी, भ्रष्टाचार, घूसखोरी और आपराधिक गतिविधियों के जरिए किया गया है।” ऐसे में क्या किसी को यह बताने में बहुत मुश्किल होगी कि आखिर कैसे सोनिया के परिवार के गुप्त खाते में 2.2 अरब डॉलर आए? जीएफआई के आंकड़े में 2जी और राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन के नाम पर हुई लूट तो शामिल ही नहीं है। अब ऐसे में इस बात पर विचार करना जरूरी हो जाता है कि सोनिया गांधी के गुप्त खाते की वजह से भारत का विदेशों में जमा काला धन वापस लाने की कोशिशों पर किस तरह का असर पड़ेगा?

लूटने वाले सुरक्षित

कुछ उदाहरणों से यह बात साफ हो जाएगी कि भारत सरकार किस तरह विदेशों में जमा भारत के काले धन को वापस लाने में दिलचस्पी नहीं ले रही है। 2008 के फरवरी में जर्मनी के सरकारी अधिकारियों ने यह जानकारी जुटाई की लिशेंस्टीन बैंक में दुनिया के कई देशों के नागरिकों ने कितना काला धन जमा किया है। जर्मनी के वित्त मंत्री ने उस वक्त कहा कि अगर दुनिया की कोई और सरकार काला धन जमा करने वाले अपने नागरिकों का नाम जानना चाहती है तो वे उसे ये नाम दे देंगे। मीडिया में कुछ ऐसी खबरें आईं जिनमें कहा गया कि लिशेंस्टीन बैंक से जिन खाताधारियों के नाम मिले हैं उनमें 250 भारतीय भी हैं। जर्मनी के खुले प्रस्ताव के बावजूद संप्रग सरकार ने इन नामों को जानने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। टाइम्स आफ इंडिया में भी उस समय एक खबर प्रकाशित हुई जिसमें बताया गया कि वित्त मंत्रालय और प्रधनमंत्री कार्यालय लिशेंस्टीन के खाताधारियों के नाम जानने में दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं। इस बीच दबाव बढ़ने पर भारत सरकार ने नाम के लिए अनुरोध तो किया लेकिन खुले प्रस्ताव के बजाए जर्मनी के साथ हुए कर समझौते के तहत। आखिर दोनों में फर्क क्या है? फर्क यह है कि कर समझौते के तहत मिलने वाले नामों को गोपनीय रखा जाता है लेकिन खुले प्रस्ताव के तहत मिलने वाले नाम को सार्वजनिक किया जा सकता है। इससे साफ हो जाता है कि सरकार वैसे लोगों का नाम नहीं उजागर करना चाहती है जिन्होंने काला धन विदेशी बैंकों में जमा कर रखा है।

दूसरा सनसनीखेज मामला है हसन अली का। पुणे के इस कारोबारी के बारे में यह पाया गया कि वह 1.5 लाख करोड़ रुपए के स्विस खाते का संचालन कर रहा था। आयकर विभाग ने उस पर भारत का पैसा गलत ढंग से विदेशी खाते में रखने के लिए 71,848 करोड़ रुपए का कर लगाया। इस मामले में जानकारी हासिल करने के लिए स्विस सरकार को जो अनुरोध भेजा गया उसे इस तरह से तैयार किया गया कि सूचनाएं नहीं मिल सकें। हसन अली के साथ कई बड़े नामों के जुड़े होने की बात की जा रही है। सरकार आखिर क्यों नहीं इस मामले की गहराई से जांच करना चाहती है। हसन अली जैसे लोग ही भारत के भ्रष्ट लोगों का पैसा विदेशों में हवाला के जरिए पहुंचाते हैं। अगर हसन अली से जुड़ी सच्चाई सामने आ जाती है तो कई भ्रष्ट लोग नंगे हो जाएंगे। हमें यह भी समझना होगा कि सोनिया गांधी के अरबों डालर स्विस बैंक में होते हुए भारत के 462 अरब डालर की लूट की स्वतंत्र जांच नहीं हो सकती। सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने चुनाव लड़ते वक्त जो हलफनामा दिया था उसके मुताबिक दोनों की संयुक्त संपत्ति सिर्फ 363 लाख रुपए है। सोनिया के पास कोई कार नहीं है। 19 नवंबर 2010 को सोनिया ने कहा कि भ्रष्टाचार और लोभ भारत में बढ़ रहा है। 19 दिसंबर 2010 को राहुल गांधी ने कहा कि भ्रष्ट लोगों को कठोर सजा दी जानी चाहिए। आमीन!

गुरुवार, 16 जून 2011

सोनिया माता का कुनबा

इस महाग्यान को बूझना ज्यादा मुश्किल नहीं है, लेकिन ग्यान को पहुंचाना जरूरी था, इसलिए शीर्षक में थोड़ी चुनौती बोध दे दिया है।
भ्रष्टाचारियों के सबसे बड़े संरक्षक- अम्मा का वरदहस्त प्राप्त


भ्रष्टाचार नामक भ्रष्ट आचार की निर्मात्री
ए राजा का फेसबुक एकाउंट- बड़े-बड़े लोगों से जान पहचान
 अब तक के सबसे बजट की फिल्म- रिलीज होने से पहले सुपर-डुपर हिट- सारे रिकॉर्ड ध्वस्त


भारत लूट का सपना बुना- बेशर्मी बढ़ी कई गुना

रविवार, 12 जून 2011

रामदेव पर कार्रवाई-एक पत्रकार का अनुभव

3 जून को स्वामी रामदेव ने मुझसे पूछा था कि क्या ऐसा हो ***ता है कि पुलिस उन्हें गिरफ्तार करने की कोशिश करे ? मैंने उनसे कहा कि कोई भी सरकार इतनी ब़ड़ी गलती नही करेगी “ आप शांति से अनशन कर रहे हैं ,आपके हज़ारो समर्थक मौजूद हैं, चालीस TV Channels की OB Vans वहां खड़ी हैं.” .. मैंने उनसे कहा था 'सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह ऐसा कभी नहीं

मंगलवार, 7 जून 2011

कांग्रेस जवान हुई, चर्चा सरेआम हुई।


कांग्रेस जवान हो गई है। मगर उसे जवान होने में एक सौ पच्चीस साल लग गए। जून सन 1975 में उसने कुछ गलतियां की थी, जिसे कुछ लोग आपातकाल या इमरजेंसी के नाम से जानते हैं.. मगर वो गलतियां कांग्रेस की "बचपन की गलतियां" थीं। इन गलतियों के शिकार अपराधबोध से ग्रसित युवाओं को तथाकथित झोलाछाप सेक्सोलॉजिस्ट "शरमाना छोड़ें, शान से जिएं" “बचपन की गलतियों पर मत शरमाएं” बी-ग्रेड की पत्रकाओं में विज्ञापन देकर ठगते हैं। कांग्रेस के --लॉजिस्टों ने "बचपन की उन गलतियों" के अपराध बोध को लेकर हीन भावना से ग्रसित कांग्रेस को उबार लिया है। ये ..लॉजिस्ट

रविवार, 29 मई 2011

कांग्रेस रे कांग्रेस तेरा जवाब नहीं


कांग्रेस के पंचस्तंभ
सचमुच कांग्रेस का कोई जवाब नहीं है। सत्ता के लिए ये कुछ भी कर सकती है। देश को जाति-धर्म के नाम पर टुकड़ों में बांट सकती है। अपने विरोधियों को कुचल सकती है। उन्हें सलाखों के अंदर डलवा सकती है। अपने विरोध में चलाए जा रहे आंदोलन को हर हाल में दबा सकती है। विरोधियों को पनपने नहीं दे सकती है। अपने स्वामी भक्तों से दूसरों के ऊपर कीचड़ उछला सकती है। मगर, त्याग की देवी सकती है कि कोई उनकी निष्ठा पर सवाल नहीं खड़ा करे। 
 
त्याग की देवी सोनिया गांधी
कांग्रेस के इतिहास को देखें तो आपको एक भी आरोप गलत नहीं लगेगा। कांग्रेस इसका खामियाजा भी भुगत चुकी है। मगर, अतीत से वो कुछ सीखने का नाम नहीं लेती है।
अयोग्य लोग गांधी-नेहरू परिवार का चमचागिरी करके ऊंचा पद और ऊंची प्रतिष्ठा पा लेते हैं। इसके लिए वो किसी हद तक गिर सकते हैं। सिब्ते रजी, बूटा सिंह, हंसराज भारद्वाज के उदाहरण किसी से छिपा हुआ नहीं है। कानून-संविधान के नाम पर संविधान की हत्या करते हैं। नियम कायदे के नाम पर नियम कायदे की धज्जियां उड़ाते हैं। लोकतंत्र के नाम पर लोकतंत्र का खून बहाने से नहीं चूकते हैं।
स्वामी रामदेव
हाल के दिनों में इसके कई उदाहरण देखने को मिले हैं। सबसे ताजा उदाहरण स्वामी रामदेव प्रकरण है। स्वामी रामदेव भ्रष्टाचार के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन चला रहे हैं। वो एक लाख किलोमीटर की देश यात्रा पूरी करने वाले हैं। चार जून से वो दिल्ली में आमरण अनशन शुरू करने वाले हैं। लेकिन कांग्रेस ने उनके आंदोलन को कुचलने की तैयारी शुरू कर दी है। कांग्रेस जयप्रकाश नारायण और अन्ना हजारे के आंदोलन को देख चुकी है। अन्ना हजारे के आंदोलन ने किस तरह इसे झुकने के लिए मजबूर कर दिया, यह किसी से छिपा हुआ नहीं है। अगर अन्ना के आंदोलन के स्वरूप और इसमें लोगों की भागीदारी के बारे में कांग्रेस को पता होता तो कांग्रेस उस आंदोलन को भी कुचल देती। मगर उसे उसकी व्यापकता के बारे में पता नहीं था। उसवक्त कांग्रेस का खुफिया ढांचा कमजोर पड़ गया और वो उसे समझने में नाकाम रही। वो समझ रहे थे कि निर्बल से लगने वाले सामाजिक कार्यकर्ता अरविंद केजरीवाल, कांग्रेस की भ्रष्ट और बेईमान राजनीति का शिकार बनी किरण बेदी, सुप्रीमकोर्ट के वकील प्रशांत भूषण आखिर कर ही क्या सकते हैं। उनके आंदोलन में कौन शामिल होगा। कौन मोमबत्तियां जलाएगा, कौन उपवास करेगा। कौन नारे लगाएगा। लेकिन, आंदोलन में अनाम अन्ना के शामिल होते ही आंदोलन ने राष्ट्रव्यापी रूप ले लिया। आखिर आंदोलनकारियों के सामने सरकार को झुकना पड़ा। बेमोल बिकने वाले चमचे जहां-तहां कहते नजर आए कि जो अन्ना चाहते हैं वही सरकार भी चाहती है। अगर सरकार भी यही चाहती है तो वो डफली क्यों बजाती फिर रही है। लुटेरे देश लूट रहे हैं और कांग्रेस पूरी सत्ता और शक्ति के साथ लुटेरों की मदद कर रही है।
तो बात कर रहे थे बाबा रामदेव की। रामदेव 4 जून से नई दिल्ली के रामलीला मैदान में अनशन शुरू करने वाले हैं। बाबा रामदेव के आंदोलन से कांग्रेस पूरी तरह डर चुकी है। कांग्रेस को खूब पता है कि बाबा रामदेव कितना बड़ा आंदोलन खड़ा सकते हैं। देश को करोड़ों लोग बाबा रामदेव के एक आह्वान पर उनके साथ आंदोलन में कूद सकते हैं। कांग्रेस पूरी तरह डर चुकी है। उसने प्रशासनिक तौर पर मीडिया में खबर दे दी कि रामलीला मैदान में चार तारीख को ज्यादा से ज्यादा दस हजार लोगों को ही इकट्ठा होने की अनुमति है। बाबा यहां सिर्फ योग शिविर चला सकते हैं। बाबा यहां कोई राजनीतिक आंदोलन नहीं कर सकते हैं। उपवास और अनशन नहीं कर सकते हैं।
मध्यप्रदेश में राजनीतिक बाजी हार चुके और राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा कर चुके कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह बार-बार बाबा रामदेव को धमकी दे रहे हैं कि अगर बाबा आंदोलन छेड़ते हैं तो सरकार उनके खिलाफ जांच बैठा देगी। सरकार उनके खिलाफ सीबीआई, प्रवर्तन निदेशालय, आयकर विभाग.. आदि आदि एजेंसियों को लगा लेगी। दिग्विजय सिंह के बाद कल कांग्रेस सांसद संजय निरूपम ने भी इसी अंदाज में बाबा को धमकी दी। कहा, बाबा बाबागिरी करे, योग सिखायें तो ठीक है मगर राजनीति में कूदेंगे तो बदनामी के छींटे उनके ऊपर भी पड़ेंगे। निरूपम ने भी बाबा को धमकी डे डाली कि अगर बाबा आंदोलन खड़ा करते हैं तो सरकार उनकी संपत्ति की जांच कराएंगी।
ये सिर्फ धमकी नहीं, बल्कि एक प्रकार का ब्लैकमेलिंग है।
अगर बाबा ने गलत तरीके से धन जमा किया है तो बाबा की संपत्ति की जांच पहले भी की जा सकती है। संपत्ति की जांच के लिए बाबा के आंदोलन की प्रतीक्षा क्यों की जा रही है। क्या ये ब्लैकमेलिंग नहीं है। तुम आंदोलन छोड़ो, मैं तुम्हें भ्रष्टाचार करने की छूट दूंगा। तुम आंदोलन करते हो तो मैं तुम्हें जेल भेजवाऊंगा। तुम्हें बदनाम करूंगा। तुम्हें जलील करूगा।
बाबा राजनीति में कूदते हैं तो उनकी संपत्ति की जांच होगी। क्या सरकार उस हर व्यक्ति की संपत्ति की जांच कराती है जो राजनीति में कूदता है। अगर हां तो राजनेताओं के पास करोड़ों की संपत्ति है वो कहां से आए। क्या राजनीति में आने से पहले कमाया है या राजनीति में आने के बाद। उनके संपत्तियों की जांच क्यों नहीं होती। क्योंकि मुलायम सिंह यादव, लालूप्रसाद यादव, मायावती के खिलाफ सीबीआई दो बार आगे और तीन बार पीछे होती है। क्यों नहीं इनकी संपत्ति की जांच होती है। क्यों चारा घोटाले के बाद भी लालू यूपीए सरकार में रेलमंत्री बन जाते हैं। क्योंकि मुलायम और माया वक्त-बे-वक्त यूपीए के समर्थन में पत्ते खोले बैठे रहते हैं। ये बात किसी से भी छिपी हुई नहीं है।
लोकपाल विधेयक ड्राफ्टिंग समिति के सह-अध्यक्ष शांति भूषण और प्रशांत भूषण के खिलाफ क्यों फर्जी सीडी बनाई जाती है। क्यों दिग्विजय सिंह उस सीडी के बचाव में आ खड़े होते हैं।
कथित त्याग की देवी सोनिया गांधी क्यों नहीं अपने चमचों की जुबान पर ताला लगाती है। क्यों उन्हें अनर्गल वार्तालाप करने देती है। दरअसल, इन जुबानों की निर्माता-निर्देशक सोनिया अम्मा ही है। उन्हीं के रिमोट कंट्रोल से ही ये अपने ट्यून बनते हैं। मगर, जब इनसे कोई पूछता है तो कहती हैं तो कोई उनकी निष्ठा पर सवाल ही नहीं उठाए। अगर नजर देश से इतर देश की सत्ता पर ही हो तो सवाल उठेंगे ही।
रामदेव आंदोलन करेंगे और उनका आंदोलन सफल भी होगा। क्योंकि लुटेरों और उनको सह देने वालों पर लगाम लगना जरूरी है।
आखिर क्या वजह है कि कांग्रेस ने चालीस सालों तक देश पर शासन किया मगर, देश की अस्सी प्रतिशत जनता बीस रुपये से कम पर गुजारा करने के लिए मजबूर है और उसी देश में 25 अरब डॉलर की संपत्ति विदेशों में जमा करा चुका हसन अली, ए राजा मौज कर रहा है।
कपिल सिब्बल की धूर्त मुस्कुराहत क्या-क्या नहीं कह देती है। कपिल सिब्बल के पास इस सवाल का क्या जवाब है कि जब टूजी घोटाला हुआ ही नहीं, तो पूर्व दूरसंचार मंत्री ए राजा, डीएमके सांसद कन्नीमोझी, बेहुरा, बलवा जेल में क्यों हैं। आखिर इन लोगों को बचान के आरोप में उन्हें अपना पद क्यों नहीं छोड़ना चाहिए।
मगर त्याग की देवी सोनिया अम्मा ना तो दिग्विजय सिंह से सवाल पूछ सकती है और ना ही कपिल सिब्बल से.. क्योंकि देश में लोकतंत्र है और लोकतंत्र में सबको.. जो मन है जो कहने का अधिकार है। लूटने का अधिकार है। कांग्रेस को बचाने का अधिकार है। 
फिर भी सोनिया की निष्ठा पर सवाल मत उठाइए। क्योंकि वो त्याग की देवी है। उन्हें प्रधानमंत्री पद का त्याग किया है।

शनिवार, 16 अगस्त 2008

मैं बांटा बंदर के जैसा

मैं बांटा बंदर के जैसा
--------------------------------
लालकिले के प्राचीर से प्रधानमंत्री ने राष्ट्र की जनता को संबोधित किया(उस जनता को जो उन्हें चाहती है, अगर चाहती तो वे राज्यसभा के बदले लोकसभा के सदस्य होते.) प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में कहा कि देश के लोगों को विभाजनकारी शक्तियों से सावधान रहना चाहिए.
विभाजनकारी शक्तियों को पहचानने के लिए दिमाग पर जोर डालना नहीं पड़ेगा. बात को घूमाने फिराने के बदले सीधी-सीधी कह देता हूं. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उनकी सरकार ने पिछले साढ़े चार सालों में देश में विभाजन की जो कथा लिखी, वैसी कथा इससे शायद किसी कांग्रेसी सरकार ने करने की हिम्मत नहीं दिखाई(वैसे शाहबानो प्रकरण कई एक प्रकरणों के जरिए कांग्रेस इस जाबांजी का उदाहरण पेश कर चुकी है. वैसे इसकी क्षमता शक नहीं किया जाना चाहिए). कांग्रेस की सरकार ने मुस्लिमों की सामाजिक, आर्थिक स्थिति जानने के लिए सच्चर कमिटी बनाई, उसकी रिपोर्ट के जरिए देश में कई विभाजनकारी योजनाएं लागू करवाई(अभी तक हिंदुओं की सामाजिक और आर्थिक स्थिति जानने के लिए उसने एक भी कमिटी नहीं बनाई.)
1. मुस्लिम लड़कियों के लिए अलग से छात्रवृति की घोषणा की.
2. मुस्लिम बहुल में सरकारी बैंको की शाखाएं खोलने का प्रावधान किया.
3. इनमें मुसलमानों को कर्ज देने की विशेष व्यवस्था की गई.
4. बजट में मुसलमानों को 5500 करोड़ रुपये आवंटित किए गए.
6. आंध्रप्रदेश में मुसलमानों के लिए अलग से आरक्षण की व्यवस्था की गई.
7. मुस्लिम छात्रों की व्यवसायिक शिक्षा का खर्च सरकार वहन करेगी.
8. प्रधानमंत्री ने कहा था, इस देश के संसाधनों पर पहला हक मुसलमानों का है.
9. अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में मुसलमानों को पचास प्रतिशत आरक्षण देने की तरफदारी कांग्रेस करती है.
10. ओबीसी आरक्षण को अल्पसंख्यकों द्वारा संचालित शिक्षण संस्थानों में लागू नहीं करने की पैरवी कांग्रेस करती है.
11. अमरनाथ श्राईन बोर्ड को जमीन देकर अलगाववादियों के दबाव में जमीन वापस कांग्रेस सरकार लेती है..
........................
तो माननीय प्रधानमंत्री जी, आप और आपकी सरकार से ज्यादा विभाजनकारी शक्ति कौन है. भाजपाई और उनके अनुयायी तो महज आपकी विभाजन कारी नीतियों का विरोध करते हैं. और आप हैं जो न्याय के नाम पर अन्याय किए जा रहे हैं. आप ही लोगों को आगाह करते है. हद है. साहब.

गुरुवार, 7 अगस्त 2008

कांग्रेस मतलब फूट डालो राज करो

कांग्रेस मतलब फूट डालो राज करो
--------------------------------------------------
इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में बच्चों को पढ़ाया जाता है कि अंग्रेजों ने, फूट डालो, राज करों की नीति अपनाकर भारत को कब्जे में कर लिया और सदियों तक गुलाम बनाए रखा.
आज कांग्रेस पार्टी वही कर रही है. फूट डालो और राज करो.
कांग्रेस पार्टी कभी समग्रता या अखंडता की बात नहीं करती है. वह देश के विकास की बात तो करती है, मगर देश और उसके नागरिकों को टुकड़ों में बांटकर.
अगर आप नजर दौड़ाएंगे तो आपको सैंकड़ों उदाहरण मिल जाएंगे, जिससे ये साफ हो जाएगा कि कांग्रेस पार्टी देश को टुकड़ों में बांटकर सत्ता का सुख भोगना चाहती है.
1. कांग्रेस ने मुसलमानों की हालत जानने के लिए सच्चर समिति का गठन किया. समिति की रिपोर्ट आई. रिपोर्ट में बताया गया है कि सरकारी नौकरियों में मुसलमानों की उपस्थिति मात्र पांच प्रतिशत या उससे भी कम है. जबकि की आबादी के लिहाज से वे करीब पंद्रह प्रतिशत हैं. वे शैक्षणिक और आर्थिक रूप से बहुत पिछड़े हैं. इस रिपोर्ट के कुछ हिस्से को कक्षा की आठवी के एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तकों में शामिल भी किया गया है. बड़े ही रोचक तरीके से, जैसे, बच्चों क्या तुम जानते हो कि हाशिया किसे कहते हैं. तुम्हारी पाठ्यपुस्तक की बायीं ओर जो जगह छोड़ी गई है. उसे हाशिया कहते हैं. ऐसा हमारे समाज में भी होता है. समाज के कुछ लोगों को हाशिए पर धकेल दिया जाता है.. आदि, आदि.
यहां सवाल ये है कि आखिर समाज के इस हिस्से हाशिये पर किसने धकेला. कांग्रेस ने देश में चालीस सालों से ज्यादा समय तक देश में शासन किया. क्या इसे इसके लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जाना चाहिए.
2. मुसलमानों को अलग से आरक्षण दिया जा रहा है. क्यों, क्या भारतीय समाज के दूसरे वर्ग पिछड़े नहीं हैं. यदि है तो समग्र रूप से सबको आरक्षण के दायरे में क्यों नहीं लाया जाता. सबके कल्याण की बात क्यों नहीं की जाती.
3. मुसलमान बच्चों को अलग से छात्रवृति दी जा रही है और व्यवसायिक पाठ्यक्रमों में बिना शुल्क दाखिला दिया जा रहा है. हाल ही सुप्रीमकोर्ट ने कुछ शर्तों के साथ आंध्रप्रदेश में राज्य सरकार के इस प्रयास को मंजूरी दे दी है. हालांकि आखिरी फैसला आंध्रप्रदेश हाईकोर्ट का ही मान्य होगा. वैसे कई राज्यों में पहले से ही ये सूत्र लागू है.
क्या इस देश में सिर्फ मुसलमान ही गरीब हैं, जो इस छात्रवृति के हकदार हैं. आखिरकार मुसलमानों को दी जाने वाली छात्रवृति का पैसा किस समुदाय का है.
4. मंगलवार(05 अगस्त 2008) को दिल्ली हाईकोर्ट के विशेष न्यायाधिकरण ने सिमी(इस्लामी छात्र संगठन) पर से प्रतिबंध हटा लेने का फैसला दिया. हालांकि दूसरे ही दिन सुप्रीमकोर्ट ने न्यायाधिकरण के फैसले पर रोक लगा दी. और सिमी पर प्रतिबंध जारी रखा.
न्यायाधिकरण का तर्क था कि सरकार ने जो सबूत पेश किए हैं वो अपर्याप्त हैं.
यहां सरकार की नालायकी ही दिखती है, बार-बार खुफिया विभाग सिमी पर अंगुलियां उठाती रही है और आतंकवादी गतिविधियों में सिमी के शामिल होने की बात कहती रही है, फिर भी सरकार कोर्ट में सबूत नहीं पेश सकी.
आखिर सरकार जो सुप्रीमकोर्ट के बार-बार के आदेश के बाद भी अफजल के मामले को लटकाए रखा है, उससे ये आशा कैसे की जा सकती है कि वो सिमी के खिलाफ सबूत कोर्ट में पेश करे.
जब गृहमंत्री ही उसकी पैरवी में जुटे हों और उसकी तुलना सरबजीत से कर रहे हो तो उनसे क्या उम्मीद की जा सकती है.
5. सरकार कम्युनिष्टों के बार-बार के मांग के बावजूद ईपीएफ पर ब्याजदर बढाने के मु्द्दे पर टस से मस नहीं हुई, वही कम्युनिष्ट के हटते ही ब्याजदर बढ़ाने की बात कह रही है.
7. श्री अमरनाथजी श्राईन बोर्ड को दी गई जमीन के मुद्दे पर पिछले एक महीने से जम्मू जल रहा है. सरकार सो रही है. वोट बैंक की लालच में सरकार जम्मू-कश्मीर को देश से अलग माने हुए है, हालांकि हर साल उसे करोड़ों रुपये के अनुदान दिए जाते हैं. उसके लिए सेना पर करोड़ों पर खर्च किए जाते हैं.
इसी देश में सैंकड़ों हज हाउस है, हज टर्मिनल हैं. हजयात्रियों को सरकारी पैसे दिए जाते हैं, लेकिन जम्मू-कश्मीर में कुछ एकड़ जमीन श्राइन बोर्ड को दिए जाने के मुद्दे पर सरकार कट्टरपंथियों के आगे घुटने टेक देती है.
8. तस्लीमा नसरीन के मुद्दे पर सरकार मुट्ठीभर मुस्लिम कट्टरपंथियों के आगे घुटने टेक देती है.
9. पिछले चार सालों में किसानों की आत्महत्या पर घड़ियाली आंसू बहानेवाली और किसानों के कल्याण के लिए कोई कदम नहीं उठाने वाली कांग्रेस की सरकार एकाएक कर्जमाफी के लिए करीब सत्तर हजार करोड़ रुपये के पैकेज को घोषणा कर जाती है.
10. सरकार देश के नब्वे मुस्लिम बहुल इलाकों की पहचान करती है. उसके लिए पांच हजार करोड़ रुपये का पैकेज देती है. उन इलाकों में सरकारी बैकों की विशेष शाखाएं खोलने और मुसलमानों को दिलखोलकर कर्ज देने का आदेश देती है.
11. हमारे प्रधानमंत्री कहते हैं कि देश के संसाधनों पर पहला हक अल्पसंख्यकों, खासकर मुसलमानों का है.
12. सरकार मुस्लिम और अनुसूचित जाति-जनजाति बहुल इलाकों की पहचान के लिए कलेक्टरों को गुप्त पत्र लिखती है और ताकि उन इलाकों में वोट बैंक पुख्ता करने के लिए कुछ किया जा सके.
13. सरकार वोट बैंक के लिए ओबीसी आरक्षण देकर समाज को तोड़ने का काम करती है.
14. कांग्रेस की सरकार ने ही शाहबानों मामले में सुप्रीमकोर्ट का फैसला पलटने के लिए नया कानून बना डाला. यानी वोट बैंक के लिए देश के कानून के साथ खिलवाड़ करेंगे.
15. शिक्षण संस्थानों में ओबीसी को आरक्षण मिलेगा. लेकिन अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों में नहीं.
16. अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में मुसलमानों को पचास प्रतिशत आरक्षण देने की बात.
17. केंद्रीय गृहराज्यमंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल कहते हैं कि किसी एक संप्रदाय को आतंकवादी कहनेवाला सबसे बड़ा आतंकवादी है. लेकिन आतंकवादी को किसी संप्रदाय का बताने वाले को क्या कहना चाहिए. देश में समान नागरिक संहिता लागू करने में क्यों परेशानी हो रही है.
18. हज पर विदेश जाने वाले को सब्सिडी क्यों दी जाती है और अमरनाथ यात्रियों को एक अस्थायी शिविर देने में भी उन्हें दर्द क्यों होता है.
19. उत्तरी राज्यों में हिंदी को द्वितीय राजभाषा बनाने और ऊर्दू शिक्षकों की बलात् नियुक्ति तुष्टिकरण नहीं तो और क्या है साब.
20. इफ्तार पार्टियों में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेते हैं.
21. देश के मदरसों में विशेष सुविधाएं दी जाती है. साथ ही कहा गया कि जिन मदरसों में राष्ट्रीय ध्वज फहराया जाएगा. उसे विशेष अनुदान दिया जाएगा. यानी राष्ट्रीय ध्वज फहराने के लिए भी रिश्वत.
22. पंद्रह प्रतिशत आबादी के लिए अल्पसंख्यक आयोग बनता है लेकिन पचासी प्रतिशत आबादी के लिए बहुसंख्यक आयोग क्यों नहीं बनाया जाता. आखिर देश को कब तक बांटोगे. कितने टुकड़े करोगे. क्या एक राष्ट्रीय विकास आयोग से काम नहीं चलेगा.
23. अब कश्मीर ही नहीं, बल्कि पूरे भारत में भारत विरोधी तत्वों के प्रति नरमी बरती जा रही है. ऐसे तत्वों को जानबूझकर एक विशेष संप्रदाय से जोड़ा जाता है. ताकि उस संप्रदाय का वोट बैंक नहीं बिगड़े.
24. पोटा हटा दिया गया, लेकिन धारा- 370 क्यों नहीं हटाया जाता.
25. जिस मुस्लिम लीग ने भारत को बांटा, उसी मुस्लिम लीग के साथ कांग्रेस ने समझौता किया.
26. बांग्लादेशियों के मुद्दे पर दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित कहती हैं कि यहां आने वाले हमारे अतिथि होते हैं, क्या इसमें आतंकवादी भी शामिल हैं. केंद्रीय गृहमंत्री कहते हैं, ऐसे कैसे उन्हें भगा दीजिएगा, देश में कानून है वह अपना काम करेगा. जबकि सरकार ने ही राज्यों को चिट्ठी लिखकर बांग्लादेशियों को निशानदेही करने और उन्हें अलग करने के लिए कहा था.


कितना गिनाऊं, सत्ता सुख के लिए लालू और मुलायम जैसे आज एक चम्मचे से खा रहे हैं.