हिंदी शोध संसार
संकट लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
संकट लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 28 जुलाई 2011

क्या अमेरिका कंगाल हो जाएगा


अगर
अमेरिका बजट खर्च में कटौती नहीं करता है और कर्ज की सीमा नहीं बढ़ाता है तो उसकी कर्ज समस्या बहुत ही गंभीर हो जाएगी और उसे ये काम बहु जल्द करना होगा। दो अगस्त तक अगर वो कर्ज सीमा नहीं बढ़ाता है तो वो डिफाल्टर हो सकता है।
दुनियाभर की अखबारें अमेरिकी कर्ज संकट से भरा हुआ है।
अमेरिकी डेट क्लॉक के आंकडों को देखें तो अमेरिका की हालत बहुत पतली है। उसके हर नागरिक पर ४६००० डॉलर का कर्जा है।
बीबीसी के मुताबिक, पिछले साल अमेरिका का बजटीय घाटा १.५ ट्रिलियन डॉलर था और अमेरका पर १४.३ ट्रिलियन से ज्यादा कर्ज है।

२०१२ में अमेरिका का प्रस्तावित बजट ३.७ ट्रिलियन डॉलर का है। जिसमें डेढ़ ट्रिलियन डॉलर की कटौती करने की सख्त आवश्यकता महसूस की जा रही है। बजट में कटौती का मतलब अनेक योजनाओं में कटौती।
अमेरिका के कर्ज संकट पर चीन चुटकी ले रहा है और कह रहा है कि अमेरिका का कर्ज संकट लोकतंत्र को बदनाम कर रहा है और लोकतंत्र का मजाक भी उड़ा रहा है।

देश

जीडीपी के मुकाबले कर्ज का अनुपात

जीडीपी के मुकाबले बाहरी कर्ज का अनुपात

अमेरिका

134.00%

---

भारत

52.00%

21.00%

इंग्लैंड

80.00%

388.00%

चीन

17.00%

5.00%

फ्रांस

86.00%

208.00%

रूस

10.00%

32%


क्या खुले बाजार, खुली पूंजी और खुले श्रम व्यवस्था पर फिर से सोचने की जरूरत नहीं है। जिस तरह से भारत सरकार अपना बाजार खोल रही है। क्या वो संकट का संकेत नहीं है। क्या उदारवाद और भूमंडलीकरण हमें गर्त में ढकेल नहीं देगा। अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी ताकत है फिर उसे कर्ज संकट ने परेशान कर रखा है फिर हमारे क्या बिसात है। जब हमारे ऊपर संकट आएगा तो हम कहां ठहरेंगे। हमारे देश के नीति निर्माताओं को फिर से सोचने की जरूरत है।





गुरुवार, 7 जुलाई 2011

फिर बाहर आया तेलंगाना का जिन्न



डॉ देवकुमार पुखराज
तेलंगाना का जिन्न बंद बोतल से एकबार फिर बाहर निकल आया है। इलाके के जनप्रतिनिधि सामूहिक इस्तीफा दे रहे हैं। अर्से बाद अलग तेलंगाना राज्य का मुद्दा राजनीति के केन्द्र में आ गया है। इलाके में बंद और रेल- रोको जैसे आंदोलन तेज हो गये हैं। केन्द्र की कांग्रेसनीत यूपीए सरकार और आंध्रप्रदेश में एन.किरण कुमार रेड्डी की सरकार के सामने एकाएक राजनीतिक फैसले लेने की कठिन चुनौती आ खड़ी हुई है। पांच दशक पुराने तेलंगाना आंदोलन में शायद ये पहला मौका है जब इलाके के सभी जनप्रतिनिधि दलीय परिधि से ऊपर उठकर एक सूर में बोलते दिख रहे हैं।
आंध्र प्रदेश में उठे राजनीतिक संकट के बावजूद केंद्र सरकार फ़िलहाल वहां राष्ट्रपति शासन के बारे में विचार नहीं कर रही हैदिल्ली में एक संवाददाता सम्मेलन के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने साफ कर दिया है कि आंध्र प्रदेश में राष्ट्रपति शासन की कोई संभावना नहीं है। लेकिन राजनीतिक विश्ले षकों का मानना है कि अगर राज्य में राजनीतिक गतिरोध इसी तरह चलता रहा तो राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता है
दरअसल, पृथक तेलंगाना राज्य के समर्थन में अभी तक आंध्रप्रदेश के 294 में सौ विधायकों ने इस्तीफ़ा दे दिया हैइनमें से 45 कांग्रेस, 37 तेलुगु देशम पार्टी, 11 तेलंगाना राष्ट्र समिति, चार सीपीआई और 2 भाजपा के विधायक हैटीडीपी के बागी विधायक नागम जनार्दन रेड्डी ने पहले ही अपना इस्तीफ़ा दे दिया था। इस तरह तेलंगाना क्षेत्र के 119 में से 100 विधायकों ने इस्तीफ़ा दे दिया हैबाक़ी बचे 19 में से सात विधायक मजलिसे इत्तेहादुल मुसलमिन से जुड़े हैं जिसका हैदराबाद और आसपास के इलाके में खासा प्रभाव माना जाता है। लोकसत्ता पार्टी के प्रमुख और शहरी इलाके से विधायक जयप्रकाश नारायण भी इस्तीफा नहीं देने के पक्ष में हैं। एमआईएम आरंभ से हीं राज्य को दो भागों में बांटे जाने के ख़िलाफ़ है। विधायकों के साथ हीं तेलंगाना क्षेत्र से आने वाले सांसदों ने भी इस्तीफा देकर नेतृत्व के सामने परेशानी खड़ी कर दी है। तेलंगाना क्षेत्र के कई मंत्रियों ने भी इस्तीफे दे दिए हैं जिससे कांग्रेस के लिए मुश्किलें खड़ी हो गई हैं। सौ विधायकों के इस्तीफ़े के बाद विधानसभा में 194 सदस्य रह गए हैं। जानकार बताते हैं कि सदन में कांग्रेस को अभी भी बहुमत हासिल है और सरकार को तकनीकी रूप से कोई ख़तरा नहीं है। वैसे आंध्रप्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष एन. मनोहर अभी विदेश दौरे पर अमरीका में हैं। कहा जा रहा है कि स्पीकर के स्वदेश लौटने तक फ़िलहाल यथास्थिति बनी रहने की संभावना है। पृथक तेलंगाना के मसले पर तेलंगाना क्षेत्र के 17 में से 13 सांसदों ने भी इस्तीफ़ा दे दिया हैइनमें से नौ कांग्रेस, दो टीआरएस और दो टीडीपी के सांसद हैं। इनके इस्तीफ़े को लेकर भी लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने अभी तक कोई फ़ैसला नहीं लिया है। लेकिन केन्द्र की कांग्रेस सरकार के सामने समस्या गंभीर है।आंध्र प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी ग़ुलाम नबी आज़ाद, लोकसभा में कांग्रेस के नेता प्रणब मुखर्जी और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल इस्तीफ़ा देनेवाले सांसदों को मनाने की लगातार कोशिश करते रहे हैं, लेकिन गतिरोध बरकरार हैतेलंगाना क्षेत्र के सांसद और विधायक अब आर-पार की लड़ाई के मूड में हैंऐसे में इस गतिरोध के जल्दी ख़त्म होने की उम्मीद नज़र नहीं आ रही है। उधर तेलंगाना जेएसी के 48 घंटे के बंद की सफलता ने राज्य प्रशासन के सामने गंभीर स्थिति उत्पन्न कर दी है। बंद के बाद टी. जेएसी ने इलाके की रेल सेवा ठप्प करने और सड़क पर हीं खाना बनाने और खाने जैसे कार्यक्रम करने की घोषणा कर रखी है। 5-6 जुलाई को 48 घंटे की बंद के दौरान हैदराबाद सहित तेलंगाना क्षेत्र के सभी दस ज़िलों में परिवहन सेवा बुरी तरह प्रभावित रही। राज्य परिवहन निगम की 10 हज़ार से ज़्यादा बसें नहीं चली और यात्रियों को भारी परेशानी झेलनी पड़ी। ज्वाइंट एक्शन कमेटी की योजना राष्ट्रीय राजमार्गों पर अवरोध खड़े कर उन्हें जाम कर देने की है आने वाले दिनों में विरोध प्रदर्शनों का सिलसिला तेज हो सकता है।
तेलंगाना राष्ट्र समिति के अध्यक्ष के. चंद्रशेखर राव ने केंद्र सरकार को चेतावनी देते हुए इस्तीफा लोकसभा अध्यक्ष को फैक्स कर दिया है। उन्होंने कहा है कि यदि केन्द्र सरकार ने अपना वादा पूरा करते हुए अलग तेलंगाना प्रांत नहीं बनाया तो पूरे इलाके की स्थिति और खराब हो सकती है। वे याद दिलाते हैं कि नवंबर 2009 में गृहमंत्री पी. चिदम्बरम् ने आंदोलनों के दबाव में आकर हीं अलग तेलंगाना प्रांत गठित करने की प्रक्रिया शुरू करने की बात कही थी।लेकिन फिर आंध्र प्रदेश में विरोध के चलते मामला रूक गया। बाद में श्रीकृष्ण आयोग का गठन किया गया, जिसने केंद्र सरकार को कई विकल्प सुझाए लेकिन तब से सरकार उन पर विचार करने का ही भरोसा दिला रही है। वैसे केसीआर ने हैदराबाद को केन्द्र शासित प्रदेश बनाने और तेलंगाना को स्वायत परिषद बनाने के प्रस्ताव को पहले हीं खारिज कर दिया है।
केन्द्र की सरकार के साथ-साथ आंध्रप्रदेश में किरण कुमार रेड्डी को भी तेलंगाना का भूत पीछा कर रहा था। हाल तक वाईएस जगनमोहन की चुनौति झेल रहे किरण रेड्डी दल के विधायकों और मंत्रियों के बागी तेवर अपना लेने से पसोपेश में हैं। मुख्य विपक्षी पार्टी टीडीपी के मुखिया चन्द्रबाबू नायडु को भी उनके विधायको ने दो टूक कह दिया है। विधायक कहते हैं कि जनता की भावना को देखते हुए उनके पास इस्तीफा देने के अलावे कोई विकल्प नहीं बचा था। सरकार के सामने संकट ये है यदि उसने तेलंगाना को लेकर कुछ कार्रवाई आगे बढ़ाई तो तटीय आंध्र और रायलसीमा इलाके में भी आंदोलन की आग भड़क सकती है।

सोमवार, 22 फ़रवरी 2010

घाव पर नमक

संसद के बजट सत्र में सदस्यों को संबोधित कर राष्ट्रपति दो बातें कहीं, शायद आपको पसंद आए
महंगाई का फायदा देश के किसानों को मिला.
महंगाई सर्वांगीण विकास का सूचक है
हमारे राष्ट्रनिर्माताओं ने जो सपना देखा था, हम उस सपने को पूरा करने के इतने करीब कभी नहीं थे, जितने अब हैं.

जय हिंदी जय भारत

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2010

अब तो मान जाइये कि आप नक्कारे हैं, (प्रधानमंत्री के नाम खुला पत्र)

आदरणीय मनमोहन सिंह जी,                                                                                                        manmohan-singh-2                  
अब तो मान जाइए कि आप नक्कारे साबित हुए हैं और तथाकथित विश्वबंधुत्व के आपका सिद्धांत(उदारवाद और वैश्विकरण) फेल हो गया है. आपके उदारीकरण और वैश्विकरण में आम आदमी का खून चूसने वाले मोटे-मोटे जोंक ही शामिल थे, कहां से कम होगी महंगाई.
आपका अर्थशास्त्र आदमी की मुश्किलों की आग घी डालने का ही काम किया. महंगाई कम करने के लिए कभी बैंक दरों को बढ़ाओ- कभी बैंक दरों को घटाओ वाला आपका(आपका ही का क्या, चिदंबरम, अहलूवालिया और कुछ कुछ प्रणब दा का सिद्धांत भी) फेल हो गया. आप लोगों को मुश्किलों से छुटकारा नहीं दिला पाए. कई लोग कहते हैं कि आप बहुत ईमानदार हैं. लेकिन मैं तो कहूंगा कि आप भोले नौकरशाह हैं जिसे कॉर्पोरेटरों की भाषा भी समझ में नहीं आती, नेता तो आप कभी हुए नहीं कि आम लोगों की भाषा समझ आपको समझ में आए. हां सोनिया मैडम को(उन बहुत लोगों की तरह) आपमें ईमानदारी और नेता के महान गुण आपमें दिखाई दिए, और आपको देश की सबसे बड़ी(वास्तव में) कुर्सी सौंप दी. और आपने ने भी उनकी महत्वाकांक्षाओं को खूब पूरा किया. आम आदमी के मुंह का निवाला छीनकर बहुराष्ट्रीय कंपनियों की जेबें मोटी करने लगे.
जहां तक मेरा मानना है कि आम आदमी की भाषा को समझने के लिए न ही ऑक्सफोर्ड में पढ़ने, न ही विश्व बैंक में नौकरी करने और न ही अंतर्राष्ट्रीय डिग्री और डिप्लोमाओं को बटोरने की जरूरत है.
अगर देशी सरकारी स्कूलों में पढ़ा-लिखा दो चार भदेस नेताओं को सोनिया जी जैसे लोगों का वरदहस्त(यानी उसे वोट बैंक का जुगाड़ न करना पड़े- जिसके लिए उसे सारा कुकर्म करना पड़ता है, मसलन, सांप्रदायिक दंगे करवाने होते हैं, भाषा, जाति, क्षेत्र के नाम पर लोगों को लड़ाना पड़ता आदि ) प्राप्त हो जाए तो वह कुछ महीनों क्या, कुछ दिनों में महंगाई पर काबू पा लेगा(ये मेरा चैलेंज है). क्योंकि वो आपसे कहीं बेहतर आम आदमी को समझता है. उसे बोलने के लिए लिखे हुए भाषण पढ़ने की जरूरत नहीं होती है. इसके लिए अंतर्राष्ट्रीय मुद्राबाजार, जीडीपी, सीआरआर जैसे भारी भरकम शब्दों की जरूरत नहीं है.
इसके लिए जरूरत है बाजार पर नियंत्रण की और उसे करने के लिए अर्थशास्त्री की मोटी पोथी पढ़ने की जरूरत नहीं है.
अंत में, आपने बहुत देर कर दी, वो बात स्वीकार में जो आपको बहुत पहले स्वीकार कर लेना चाहिए था कि यह हमारे बस की चीज नहीं है. आप कहीं रहेंगे मोटी तनख्वाह वाली नौकरी कर लेंगे. लेकिन उन लोगों का क्या होगा जिसे पानी पीने के लिए हर रोज कुआं खोदना पड़ता है.
आपका
एक आम आदमी

गुरुवार, 10 सितंबर 2009

क्या डेढ़ सौ साल बाद भारत मरूस्थल बन जाएगा?


क्या होगा जब मॉनसून हमेशा-हमेशा के लिए भारत से रूखसत हो जाएगी. तब क्या भारत मरूस्थल में तब्दील हो जाएगा. विशेषज्ञों की माने से सौ-डेढ़ सौ साल में ऐसी स्थिति आने वाली है. जब देश से मॉनसून हमेशा हमेशा के लिए दूर चली जाएगी.

शनिवार, 18 अक्टूबर 2008

अनार्थिक क्रियाओं का अर्थशास्त्र

वैश्विक आर्थिक संकट पर काफी दिनों से कुछ लिखने का मन कर रहा था. आज मौका मिला और लिख मारा. भगवान बुद्ध ने कहा था, दुनिया दुखों से भरा, इस दुख के कारण है और इसका निवारण भी है.

ये वैश्विक आर्थिक संकट की घड़ी है. अकेले इस साल अमेरिका की बारह बड़ी वित्तीय संस्थाएं दिवालिया होने की घोषणा कर चुकी है. इसके अलावा, कम से कम छह कंपनियों ने खुद को दिवालियेपन से बचाने के लिए खुद को बेच दिया है. बुश प्रशासन ने भी माना कि अमेरिका 1930 के बाद से अब तक के सबसे बड़े वित्तीय संकट से गुजर रहा है. इस वित्तीय संकट से उबारने के लिए बुश प्रशासन ने अमेरिकी कांग्रेस से 700000000000 (सात खरब डॉलर) की आर्थिक सहायत मांगी, जिसे कांग्रेस ने काफी नानुकर के बाद स्वीकार कर लिया. इस पैकेज को बेल-आउट पैकेज(मुक्ति-राशि) कहा गया. न्यूयार्क टाइम्स में छपी खबरों के मुताबिक, इस आर्थिक संकट से उबारने के लिए,

  1. वित्तीय संस्थानों की स्वायत्तता और आत्मप्रबंधन के अधिकारों को कम करना.

  2. बैंको को सरकारी एजेंट के रूप में काम करना.

  3. बैंकों के करीब आधे शेयरों को सरकार द्वारा खरीदा जाना.

  4. लघुकालिक बिकवाली पर रोक.

  5. बैंकों का राष्ट्रीयकरण जैसे प्रावधान शामिल हैं.

सात खरब डॉलर के भारी भरकम पैकेज(यह राशि वियतनाम जैसे जैसे देशों के सकल घरेलू उत्पाद की दस गुनी है.) के बावजूद बाजार की हालत पतली है. बाजार अपनी पटरी पर नहीं लौट पाया है.

विश्व बैंक का कहना है कि वर्ष 2009 में आर्थिक संकट और भी गहरा सकता है.

उधर, यूरोपीय देशों में आर्थिक गहराया हुआ है. जर्मनी ने अपने बैंको को आर्थिक दिवालियेपन से बचाने के लिए बड़ी मुक्ति-राशि की घोषणा की. यूरोपीय संघ इस त्रासदी का हल ढूढने में नाकाम साबित हो रहा है. एशियाई बाजारों में भी मंदी के काले बादल छाए हुए हैं. तमाम एशियाई शेयर बाजारों का हाल खस्ता है. वे खुद को इस संकट से निकालने के लिए कोई रास्ता नहीं ढूढ़ पा रहे हैं.

भारतीय प्रधानमंत्री, वित्तमंत्री, योजना आयोग के उपाध्यक्ष और रिजर्व बैंक के गर्वनर बार बार लोगों को भरोसा दिला रहे हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत है. इसके बावजूद आमलोगों को बाजार पर भरोसा नहीं हो पा रहा है. लोग इतने परेशान हो गए हैं कि जिस शेयर बाजार में दुगुना-चौगुना मुनाफा कमाने के लिए धन लगाए थे, उस शेयर बाजार से एक चौथाई मूलधन निकाल रहे हैं. जनवरी महीने में बीएसई का संवेदी सूचकांक 21000 के करीब था वह इस सप्ताह दस हजार के मनोवैज्ञानिक स्तर से भी नीचे गिर गया है. यह और कितना नीचे जाएगा, कहा नहीं जा सकता है.

प्रधानमंत्री, वित्तमंत्री और योजना आयोग के उपाध्यक्ष(तीनों अर्थशास्त्री) समस्या को जितना कम करके आंक रहे हैं समस्या उससे कई गुना ज्यादा है. या तो वे लोगों को सही बताना नहीं चाहते या सही बात जानते नहीं. पिछले कई महीनों से महंगाई दर बारह प्रतिशत के इर्द-गिर्द घूम रही है. अर्थशास्त्र के तीनों दिग्गज इस समस्या को हल करना तो दूर इसे समझ तक नहीं पा रहे हैं.

कारण- आर्थिक संकट का कारण है- लालच. यावत जीवेत, सुखम जीवेत ऋणम कृत्वा घृतम पीबेत- चार्वाक का यह दर्शन अगर हर समय सही होता तो कोई वजह नहीं थी कि ऋषियों को संतोषं परमं सुखम का मंत्र सूझता.

अमेरिका में साल 2001 में रियल स्टेट (अचल संपत्ति) का बूम आया. साथ में लाया बैंकिंग सुधार. बैंकों को अधिक से अधिक स्वायत्तता दी गई. वित्तीय संस्थानों को आत्मप्रबंधन का निर्णय दिया गया. फिर क्या, बैंक बिना छान के घोड़े की तरह कूदने लगे. बैंक मनमाने तरीके से पैसे बांटने और वसूली करने लगे. बिना किसी औपचारिकता या वित्तीय स्थिति का आकलन किए बगैर लोगों को कर्ज दिया गया. कुछ समय तक यह दौर चला, लेकिन बूम जल्द बुलबुले की तरह फटने लगा. लोगों के पास इतना पैसा नहीं बचा कि वे बैंकों का कर्ज चुका पाते. बैंकों की हालत पतली होने लगे और दिवालिया घोषित करने के सिवा उनके पास कोई दूसरा चारा नहीं था.

सरकारी कामकाज और उसके प्रबंधन पर अट्टहास करने वालों की सारी हेकरी निकल गई और अब वे भी सरकारी नियंत्रण की दुहाई देने लगे. बड़ी-बड़ी कंपनियों के प्रबंधन का दिवाला निकल गया. प्रबंधन के बदौलत कुछ सालों में कई गुणा होने का दावा, महज मेहनत का नतीजा नहीं था, बल्कि इसके पीछे आम जनता को येन-केन-प्रकारेन लूटने और बेईमानी शामिल था.

भारत के संदर्भ में बात करें तो भारत सरकार भी अमेरिका की देखा-देखी आर्थिक सुधार- बैंकिंग सुधार की नीतियों को साफ साफ अपना लिया. बैंकों, बीमा कंपनियों और वित्तीय संस्थाओं को ज्यादा से ज्यादा स्वायत्तता और आत्मप्रबंधन की छूट दिए जाने की बात चलने लगी ताकि अर्थव्यवस्था दस क्या तीस प्रतिशत की दर से विकास करने लगे. आज सरकार का बाजार पर कहीं कोई नियंत्रण नहीं रह गया है. कौन कंपनी किस दर पर अपना उत्पाद बेच रही है, उसका नियंता सिर्फ वह कंपनी है, सरकार नहीं. उपभोक्ता को यह जानने का अधिकार नहीं है कि वस्तु के उत्पादन का खर्च क्या है. शायद यह उत्पादन खर्च सरकार भी नहीं जानती...

शेष द्वितीय भाग में....

गुरुवार, 4 सितंबर 2008

सर जी, कारण भी और वजह भी

मेरी पोस्ट, जरूरत है कुछ लोगों और संस्थाओं की, पर राज भाटिया सर जी ने टिप्पणी छोड़ी. उन्होंने कहा, कोई वजह तो होगी कि लोग मदद के लिए आगे नहीं रहे हैं.
आदरनीय सर जी, इसकी वजह भी है और कारण भी. वजह है छोटी मोटी नहीं, ऐतिहासिक वजह है. साथ ही कुछ तात्कालिक कारण हैं.
तात्कालिक कारण यह है कि लोगों को बाढ़ की विभीषिका की सही जानकारी ही नहीं है. बिहार बदहाल है, वो पहले है. बिहार के लोग बेहाल है. वो पहले से हैं. इनमें कोई बड़ी बात. न्यूज चैनलों के पास खबरें नहीं, जो कुछ आती हैं, उसे ड्रामे के रूप में पेश करते हैं. राई का पर्वत बनाना और पर्वत को राई कर देना हमारे यहां के न्यूज चैनलों के बायें हाथ का खेल है. मनोरंजन के भूख लोगों को ऐसे कार्यक्रम चाहिए जिस पर ज्यादा दिमाग नहीं लगाना पड़े. ठंडा शब्द निकले तो उसी सीधा मतलब हो कोका-कोला. बाकी अर्थ निकालने की कोशिश की जाएगी तो दर्शक चैनल चेंज कर देगा.
ये चैनल इस बाढ़ की विभीषिका को नहीं दिखा पा रहे हैं. अभी-अभी हिंदुस्तान टाइम्स पढ़ रहा था. उसमें दिखाया गया कि बिहार का बाढ़ से तबाह हुआ क्षेत्र उतना ही बड़ा जितनी बड़ी दिल्ली है. दिल्ली हिंदुस्तान की जान है. उसे तबाह होते कौन देखेगा. लेकिन बिहार कभी किसी की जान नहीं बन सका. बिहार कमाऊ पूत नहीं है. यहां की करीब साठ प्रतिशत आबादी निरक्षर है. नब्बे प्रतिशत से ज्यादा आबादी गरीबी रेखा से नीचे गुजर बसर करती है. बिहार का बहुत बड़ा क्षेत्र हर साल बाढ़ में डूब जाता है. इन प्रभावित क्षेत्रों के ज्यादातर लोग अपनी जमीन को छोड़कर दूसरी जगहों पर पलायन कर चुके हैं. कोई उद्योग धंधा तो है नहीं कि क्षेत्र का विकास हो. दिनों दिन बिहार गरीबी, बेकारी, बदहाली के दलदल में धसने को बेबस है. नेपाल के साथ संधि है, उसके साथ ऐतिहासिक रिश्ता है इसलिए वह हमें हर साल बाढ़ में डूबाता है हम चाहकर भी कुछ नहीं कर पाते है. भारत सरकार के साथ जल-संधि है, मगर भारत सरकार बिहार को हरसाल आनेवाले बदहाली से उबारने के लिए कुछ नहीं करती. रिवर लिंकिंग परियोजना की बात चली थी, वाजपेयी सरकार जाते ही उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया. बिहार के नेता, नेताओं की सही परिभाषा में आते हैं, जाति धर्म के आधार पर समाज को बांटो और राज करो. लालू, पासवान और मुलायम जैसे नेता प्रतिबंधित छात्र संगठन सिमी की तरफदारी कर देशभक्त बने हुए हैं. वे बिहार के बारे में कितना सोचेगें. लालू ने पंद्रह साल तक शासन किया, बिहार को से चौपट करके रख दिया. बिहार चालीस साल पीछे चला गया. नीतीश जी आए, कुछ करने चले, लेकिन बाढ़ ने इनकी लूटिया ही डूबो दिया फिर लालू आएंगे और बिहार में अपनी इंजीनियरिंग चलाएंगे. बिहार की बदहाली पर संसद में कभी जोरदार आवाज नहीं उठती है.
आंध्रप्रदेश की आबादी बिहार के कम है, लेकिन आंध्रप्रदेश में कम कम से छह सौ इंजीनियरिंग कॉलेज है. बिहार में तीन-चार से ज्यादा नहीं होंगे. आंध्रप्रदेश में साधारण बाढ़ आई प्रधानमंत्री ने बिना कुछ कहे ढ़ाई हजार करोड़ की सहायता की घोषणा कर दी. बिहार तबाह हो गया, प्रधानमंत्री महज एक हजार करोड़ रुपये की घोषणा कर पाए, वो भी लालू के कहने पर. उनका हाथ फिर भी ऊपर है, क्योंकि वे कहेंगे बिहार के मुख्यमंत्री ने महज एक हजार करोड़ रूपये की मांग की थी. मांग करने के बाद प्रधानमंत्री ने बाढ़ प्रभावित इलाकों का हवाई सर्वेक्षण किया और राष्ट्रीय आपदा भी घोषित कर दिए. प्रधानमंत्री खुद बताएं कि आंध्रप्रदेश में राष्ट्रीय आपदा नहीं थी फिर भी ढाई हजार करोड़ और बिहार में राष्ट्रीय आपदा है तब भी महज एक हजार करोड़ ही.
क्या मतलब होता है राष्ट्रीय आपदा का. सौ करोड़ की आबादी वाला देश राष्ट्रीय आपदा से ग्रस्त प्रदेश(कम से कम तीस लाख लोग प्रभावित) के लिए तीन हेलीकॉप्टर की ही व्यवस्था कर सका. इस हेलीकॉप्टर में एक बार में मुश्किल से दस लोग सवार हो सकते हैं. लोगों को सुरक्षित निकालने के लिए कम से आठ हजार नावों की जरूरत थी. कितने नाव पहुंचे वहां. क्या यही मतलब है राष्ट्रीय आपदा का.
रेलमंत्री लालू प्रसाद राष्ट्रीय आपदा की इस घड़ी में दिन में बीस बार प्रेस कांफ्रेंस करते हैं और इसमें राजनीतिक बयानबाजी करते हैं. कभी मुख्यसचिव तो कभी आईएएस अधिकारियों को गाली बकते हैं.
एकबार फिर, बिहार का जितना बड़ा क्षेत्र बाढ़ से प्रभावित है वो दिल्ली के क्षेत्रफल के बराबर है. न्यूज चैनल शो दिखाने के आदी हैं बाढ़ की विभीषिका कैसे दिखा पाएंगे. इसलिए सही जानकारी लोगों तक नहीं जा पा रही है.
बिहार ऐतिहासिक रूप से बदहाल है, यहां के लोग फिजी, सुरीनाम, त्रिनिनाद, मॉरीशस गए और वहां की तकदीर बदल दी. लेकिन कई कारणों से बिहार की तकदीर बदल नहीं पा रही है.