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रविवार, 11 नवंबर 2012

संस्कृत भाषा और भारत में वैज्ञानिक विकास, भाग-8


यह लेख सुप्रीमकोर्ट के पूर्व न्यायमूर्ति और भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष जस्टिस मार्कंडेय काट्जू के उस अभिभाषण का अनुवाद है, जो उन्होंने 27 नवंबर 2011को काशी हिंदी विश्वविद्यालय, वाराणसी में दिया था। 
खगोलशास्त्र
प्राचीन भारत में, आर्यभट्ट ने अपनी पुस्तक आर्यभट्टीय में एक गणितीय प्रणाली को प्रस्तुत किया, जिसमें संकल्पना की गई कि पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमती है। उन्होंने सूर्य के परिप्रेक्ष्य में ग्रहों की गति के बारे में भी विचार किया (दूसरे शब्दों में, आर्यभट्ट की गणितीय प्रणाली में कॉर्पर्निकस के हेलियोसेंट्रिक सिद्धांत के संकेत थे, हालांकि इस पर विवाद की गुंजाइश है)। दूसरे प्रसिद्ध खगोलशास्त्री थे, ब्रह्मगुप्त, जो उज्जैन के खगोलीय वेधशाला के प्रमुख थे और खगोलशास्र पर एक प्रसिद्ध पुस्तक लिखी, और भास्कराचार्य भी उज्जैन के वैधशाला के प्रमुख थे, वराहमिहिर ने गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत प्रस्तुत किया जो बताया है कि एक बल है जिसके कारण कोई वस्तु पृथ्वी की ओर आकर्षित होती है और जो आकाशीय पिंडों को अपने निश्चित स्थान पर बना रखता है।
मैं यहां इन महान खगोलशास्त्रियों के सिद्धांतों को विस्तार से प्रस्तुत नहीं करने जा रहा हूँ, लेकिन इतना निश्चयपूर्वक कहूंगा कि हजारों साल पहले भारत के महान खगोलशास्त्रियों द्वारा की गई गणना के आधार पर आज भी सूर्य और चंद्र ग्रहणों के समय और तिथि की भविष्यवाणी की जा सकती है। ये गणनाएं उस समय की गई, जब दूरदर्शी जैसे आधुनिक यंत्र नहीं थे और खुली आंखों से निरीक्षण करना होता था।
चिकित्सा
प्राचीन भारतीय चिकित्सा जगत में सुश्रुत और चरक के नाम सबसे प्रसिद्ध हैं। सुश्रुत शल्य चिकित्सा के जनक माने जाते हैं और उन्होंने मोतियाबिंद की सर्जरी और प्लास्टिक सर्जरी आदि की खोज की, ये आधुनिक सर्जरी की खोज से सदियों पहले हुई थी। सुश्रुत की पुस्तक सुश्रुत संहिता में चिकित्सा और सर्जरी के बारे में विस्तार के बताया गया है, इनमें सर्जरी में प्रयोग होने वाले दर्जनों औजार शामिल है, जिन्हें गूगल में इंटरनेटपर आसानी से ढूंढा जा सकता है। सुश्रुत अच्छे सर्जन माने जाते थे, क्योंकि इन्हें शरीर के आंतरिकी का बहुत अच्छा ज्ञान था। चरक ने आंतरिक चिकित्सा पर चरक संहिता नामक आयुर्वेदिक ग्रंथ की रचना की, जो आधुनिक आयुर्वेदिक चिकित्सा का केंद्र है। चरक संहिता और सुश्रुत संहिता दोनों ही ग्रंथ संस्कृत में लिखे गए, जिन्हें गूगल में इंटरनेट पर विस्तारपूर्वक देखा जा सकता है। यह उल्लेखनीय है कि लंदन साइंस म्यूजियम के प्रथम तल पर चिकित्सा से जुड़ी हैं, जहां चिकित्सा के क्षेत्र में सुश्रुत के यंत्रों सहित प्राचीन भारत की उपलब्धियों का भी जिक्र है।
इससे जाहिर है कि प्राचीन काल में भारत चिकित्सा के क्षेत्र में दुनिया के सभी देशों से काफी आगे था।
अभियांत्रिकी
दक्षिण भारत के तंजौर, त्रिची मंदिरों और खजुराहो और ओडीशा के मंदिर इस बात के गवाह है कि अभियांत्रिकी के क्षेत्र में भी हम काफी आगे थे। कहा जाता है कि छठी शताब्दी में कर्नाटक के ऐहोल में एक संस्थान था जहां संरचनागत मैकेनिक्स का विकास हुआ था। इस संस्थान में विकसित ढालुआं छत का उपयोग केरल, पूर्वी आंध्रप्रदेश और तमिलनाडु में संरचनाओं को बनाने में हुआ।
यहां आगे का विषय समझने के लिए थोड़ा और विषयांतर होना पड़ेगा।
भारतीय संस्कृति के प्रति अंग्रेज शासकों का रवैया
भारतीय संस्कृति के प्रति अंग्रेजी शासकों के व्यवहार तीन ऐतिहासिक चरणों से होकर गुजरा। पहला चरण 1600 ईस्वी है, जब अंग्रेज भारत आए थे और व्यापारी के रूप में बांबे, मद्रास और कलकत्ता में अपनी बस्तियां बसाई थी। यह चरण 1757 तक चला जब उन्होंने पलासी की लड़ाई लड़ी। इस काल में भारतीय संस्कृति के प्रति अंग्रेजों का व्यवहार बिल्कुल अगर था क्योंकि वो व्यापारी के रूप में भारत पैसा कमाने के लिए आए थे, इसलिए उन्हें भारतीय संस्कृति में रूचि नहीं थी।
दूसरा चरण 1757 से 1857 ईस्वी यानी भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम, जिसे सिपाही विद्रोह भी कहा जाता है, तक चला। पलासी की लड़ाई 1757 में लड़ी गई और इसके बाद बंगाल की दीवानी मुगल शासकों ने अंग्रेजों को दे दी। उस वक्त बंगाल में बिहार और उड़ीसा भी शामिल था। पूरा बंगाल अंग्रेजों की हुकूमत के अंदर आ गया। 1757 से 1857 तक अंग्रेजों ने भारतीय संस्कृति को गंभीरता से अध्ययन किया और कुछ अहम योगदान भी दिया, खासकर भारतीय सांस्कृतिक ज्ञान को पश्चिमी देशों में फैलाने में।
तीसरा चरण 1857 के सिपाही विद्रोह और इसे ब्रिटिश शासकों द्वारा क्रूरता पूर्वक कुचलने के बाद से शुरू हुआ। 1857 के बाद तो अंग्रजों ने निश्चिय कर लिया कि वो शासन के प्रति ऐसा विद्रोह दोबारा नहीं होने देंगे। इसके लिए उन्होंने दो काम किए-(1) भारत में उन्होंने भारतीय सेना में सैनिकों, खासकर अंग्रेजी सैनिकों की संख्या बढ़ाई, शस्त्र भंडारों को यूरोपीय सैनिकों के हाथों में सौंप दिया। (2) अंग्रेजों ने जानबूझकर भारतीय लोगों को हतोत्साहित और अपमानित करना शुरू कर दिया। इसके लिए उन्होंने इस तरह का दुष्प्रचार फैलाना शुरू कर दिया कि अंग्रेजों के आने से पहले भारतीय लोग सिर्फ मुर्खों और गुलामों की प्रजाति के थे। उनकी संस्कृति मुर्खों और गुलामों की रही है और भारतीय संस्कृति में कुछ भी अच्छा नहीं है। ये सब जानबूझकर किया गया ताकि भारतीय लोगों को लगने लगे कि वो हीनतर प्रजाति से हैं और अंग्रेज उनके स्वामी है। अंग्रेजों के शासन के तीसरे चरण का नतीजा है कि हम अपने महान पूर्वजों के योगदान, खासकर विज्ञान के क्षेत्र में योगदान को भूल गए। दूसरे चरण में तो अंग्रेजों को भारती संस्कृति में थोड़ी रुचि थी और उन्होंने इसका अध्ययन किया।
ऐसे ही अंग्रेजों में सबसे पहले नाम आता है सर विलियम जोन्स का, जो 1783 में कलकत्ता सुप्रीमकोर्ट के जज के रूप में भारत आए। वह बचपन से ही अत्यंत विलक्षण प्रतिभा के धनी थे, जिन्होंने छोटी उम्र में ही, ग्रीक, लैटिन, पर्सियन, अरबी, हिब्रू जैसी भाषाओं पर एकाधिकार हासिल कर लिया। उन्होंने ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में पढ़ाई की और एक वकील बनने के लिहाज से बार परीक्षा पास की। जब वो भारत आए तो उन्होंने सुना कि भारत में भी एक प्राचीन भाषा संस्कृत है, इसमें उनकी रुचि जगी और उन्होंने इसके अध्ययन का फैसला किया। नतीजा हुआ कि वो एक शिक्षक की तलाश में जुट गए। आखिरकार कलकत्ता के भीड़भाड़ वाले इलाके में एक धुप्प अंधेरे कमरे में रहने वाले बंगाली ब्राह्मण रामलोचन कवि भूषण उन्हें शिक्षक के रूप में मिल गए। सर विलियम जोन्स अपने शिक्षक के पास संस्कृत सीखने के लिए व्यक्तिगत रूप से जाने लगे। सर जोन्स ने अपने संस्मरण में लिखा कि जब उनकी पढ़ाई पूरी होती तो वो देखते थे कि उनके शिक्षक रामलोचन उस जगह की सफाई करते, जहां जोन्स बैठते थे, ऐसा इसलिए कि रामलोचन उन्हें मलेच्छ मानते थे। हालाकि सर जोन्स ने इसे अपना अपमान नहीं माना और विचार किया कि उन्हें अपने शिक्षक के रीति-रिवाजों को मानना चाहिए।
संस्कृत भाषा में दक्षता हासिल करने के बाद सर विलियम जो्स ने कलकता में एशियाटिक सोसायटी की स्थापना की और कालिदास के अभिज्ञान शाकुंतलम सहित दूसरे कई संस्कृत ग्रंथों का अंग्रेजी में अनुवाद किया। उनका ये अनुवाद जर्मनी के महान विद्वान गोथे को बेहद अच्छी लगी और उन्होंने इसकी बेहद प्रशंसा की। सर जोन्स ने साबित किया कि संस्कृत भाषा ग्रीक और लैटिन के बेदह करीब है। वास्तव में संस्कृत लैटिन से ज्यादा ग्रीक के करीब है क्योंकि संस्कृत में तीन वचन होते हैं, एकवचन, द्विवचन और बहुवचन। ग्रीक में भी जैसा ही होता है, जबकि लैटिन में दो वचन ही होते हैं जैसा कि अंग्रेजी, हिंदी और दूसरी कई भाषाओं में।
इस प्रकार सर विलियम जोन्स ने बताया कि संस्कृत, ग्रीक और लैटिन समान भाषा से पैदा हुए हैं और वो भाषा के तुलनात्मक अध्ययन के जनक माने जाने लगे।
दूसरे ब्रिटिश विद्वानों ने भी भारतीय संस्कृति पर शोध किया, यहां सबके बारे में विस्तार से बताने की जरूरत नहीं है, क्योंकि इसमें काफी समय लगेगा।
यहां यह उल्लेखनीय है कि भारतीय विद्वानों की महान उपलब्धियों, जिनका जिक्र संस्कृत भाषा में है, से ये पश्चिमी विद्वान हतप्रभ थे।
आधुनिक भारत में विज्ञान की स्थिति-
जैसा कि ऊपर कहा गया है कि एक समय था जब भारत विज्ञान के क्षेत्र में विश्व में अग्रणी था। अरब और चीन के विद्वान छात्र बनकर नालंदा, तक्षशिला, विक्रमशिला, उज्जैन विश्वविद्यालयों में हमसे सीखने के लिए भारत आते थे, लेकिन बड़ा ही दुखद है कि आज हम आधुनिक विज्ञान में पश्चिमी दुनिया से बहुत ही पीछे हैं। इसमें संदेह नहीं है कि हमारी मातृभूमि ने सीवी रमन, चंद्रशेखर, रामानुजन, सतेंद्रनाथ बोस, जगदीशचंद्र बोस, मेघनाद साहा जैसे महान वैज्ञानिकों और गणितज्ञों को पैदा किया, लेकिन ये बीते जमाने की बात है।
हालांकि ऐसा नहीं है कि हममें वंशानुगत दोष पैदा हो गया है, बल्कि कुछ ऐतिहासिक कारणों के चलते ऐसा हुआ है। वास्तव में कैलिफोर्निया के सिलिकन वैली में भारतीय वैज्ञानिकों का दबदबा है। अमेरिका के ज्यादा विश्वविद्यालयों में विज्ञान और गणित के शिक्षक भारतीय हैं। इसलिए आधुनिक विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में भारत के पिछड़ेपन का कारण वंशानुगत दोष नहीं है, बल्कि कुछ अन्य वजह है। हमारे पास वैज्ञानिक विरासत और ज्ञान की बहुत बड़ी पूंजी है जो आधुनिक युग में विज्ञान के क्षेत्र में झंडा गाड़ने के लिए हमें नैतिक साहस और ताकत दे सकती है।

रविवार, 4 नवंबर 2012

संस्कृत भाषा और भारत में वैज्ञानिक विकास, भाग-7


यह लेख सुप्रीमकोर्ट के पूर्व न्यायमूर्ति और भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष जस्टिस मार्कंडेय काट्जू के उस अभिभाषण का अनुवाद है, जो उन्होंने 27 नवंबर 2011को काशी हिंदी विश्वविद्यालय, वाराणसी में दिया था। 
हालांकि दूसरे प्रमाण भी हैं जैसे अनुमान(हस्तक्षेप), शब्द(विशेषज्ञ या अधिकृत व्यक्ति की उक्ति) आदि। इसलिए अधिकतर वैज्ञानिक ज्ञान अनुमान प्रमाण से संबंध रखता है। उदाहरण के लिए, रदरफोर्ड ने अपनी आंखों से परमाणु को नहीं देखा, लेकिन अल्फा किरणों( धनात्मक हिलियम आयन है) विचलन का अध्ययन कर अनुमान प्रमाण के आधार निर्णय किया कि परमाणु के नाभिक में धनात्मक कण हैं, जिसके चारों ओर ऋणात्मक इलेक्ट्रॉन चक्कर लगाता है। ठीक इसी तरह प्रत्यक्ष प्रमाण के आधार पर ब्लैक होल यानी कृष्ण विवर को भी जाना नहीं जा सकता है(क्योंकि इससे प्रकाश नहीं निकलता), लेकिन आकाशीय पिंडों पर अदृष्य पिंडों के गुरुत्वाकर्षण बल की मौजूदगी के आधार पर हम ब्लैक होल या कृष्ण विवर की मौजूदगी का अनुमान लगाते हैं।
न्याय-मीमांसा के ज्ञान-मीमांसा में तीसरा प्रमाण है शब्द प्रमाण। यह किसी भी खास क्षेत्र में विशेषज्ञ या प्रतिष्ठित या अधिकृत व्यक्ति का वाक्य है। हम इनके प्रमाण को नहीं समझ पाने के बावजूद ऐसे वाक्यों को सत्य मानते हैं, क्योंकि जिसने ऐसा कहा है उसकी उस क्षेत्र में प्रतिष्ठा है।






उदारहण के लिए E=MC2 को बतौर शब्द प्रमाण के रूप में स्वीकार करते हैं क्योंकि यह कथन आइँस्टीन का है, जिन्होंने सैद्धांति भौतिकीविद् के रूप में प्रतिष्ठा पाई है। हालांकि हम अभी ये समझ नहीं पाये हैं कि वो किस तरह इस समीकरण पर पहुंचे(इसके लिए उच्च गणित और भौतिक ज्ञान की आवश्यकता है जो हमारे पास नहीं है)। ठीक इसी तरह हम डॉक्टर की बात को भी स्वीकारते हैं क्योंकि वो रोग विशेषज्ञ है।
न्याय-मीमांसा का अगला प्रमाण उपमा है, लेकिन यहां इसके वर्णन की जरूरत नहीं है।
जैसा कि पहले ही कहा जा चुका है कि न्याय-दर्शन वैज्ञानिक दृष्टिकोण को प्रस्तुत करता है और यह प्रत्यक्ष प्रमाण पर ज्यादा जोर देता है(हालांकि कभी-कभी ये भी भ्रमपूर्ण या मृग-मारीचिका जैसा हो सकता है) यही आधार विज्ञान का भी है क्योंकि विज्ञान में हम निरीक्षण, परीक्षण और तार्किक व्याख्या पर जोर देते हैं।
ये भी कहा जा सकता है कि यह जरूरी नहीं है कि प्रत्यक्ष प्रमाण हर मामले में सत्य का ज्ञान दे। उदाहरण के लिए हम देखते हैं कि सुबह में सूर्य पूर्व से उदित होता है, दोपहर में यह हमारे सिर के ऊपर आ जाता है और शाम में यह पश्चिम में अस्त हो जाता है। अगर हम सिर्फ प्रत्यक्ष प्रमाण पर निर्भर करें तो हमारा निष्कर्ष होगा कि सूर्य पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगाता है, हालांकि महान वैज्ञानिक और खगोलशास्त्री आर्यभट्ट ने अपनी पुस्तक आर्यभट्टियम में लिखा है कि अगर हम माने कि पृथ्वी अपने अक्ष पर धूम रही है तो ऐसा ही दृश्यगत प्रभाव उत्पन्न होगा। दूसरे शब्दों में अगर पृथ्वी अपने अक्ष पर घूर्णन कर रही है तो प्रतीत होगा कि सूर्य पू्र्व उदित होता है और पश्चिम में अस्त होता है। इसलिए प्रत्यक्ष प्रमाण के अलावा हम तर्कबुद्धि का भी इस्तेमाल करते हैं क्योंकि अकेले निरीक्षण हमें सत्य ज्ञान की ओर नहीं ले जाएगा।
यह कहा जा सकता है कि न्याय-दर्शन ने तर्क और विज्ञान के आवश्यक तार्किक चिंतन को अरस्तु और अन्य ग्रीक विचारकों से भी विकसित रूप में प्रस्तुत किया(देखे डीपी चट्टोपाध्यय की पुस्तक)
इसप्रकार, प्राचीन भारत में न्याय दर्शन ने विज्ञान के विकास को अहम समर्थन और प्रोत्साहन दिया। यह उल्लेख किया जा सकता है कि न्याय दर्शन एक सत दर्शन है यानी भारतीय दर्शन के छह परंपरागत दर्शनों में से एक। यह चार्वाक जैसे गैर-परंपरागत दर्शन का हिस्सा नहीं है। यही कारण है कि हमारे महान वैज्ञानिक परंपरावादियों द्वारा तंग या परेशान नहीं किए गए क्योंकि वो कह सकते थे कि वो जो कुछ कर या कह रहे हैं वो परंपरागत दर्शन यानी न्याय-दर्शन पर आधारित है। यह यूरोप के परंपरावादी चिंतन से बिल्कुल अलग है, जहां महान वैज्ञानिक गैलिलियो को चर्चों द्वारा परेशान किया गया क्योंकि उनका चिंतन और काम बाइबिल से अलग था। भारत के साथ ऐसा हादसा नहीं हुआ, यहां की परंपरावादी सोच ही वैज्ञानकि विचार, तर्क या तर्क विज्ञान का समर्थन करती है।
प्राचीन भारत में हर कहीं वाद-विवाद या शास्रार्थ होते थे, जिसमें बड़ी बड़ी सभाओं में विचारों पर तर्क-वितर्क, दूसरे विचारों की आलोचना और विरोध की अनुमति थी। विचारों और अभिव्यक्ति की ऐसी स्वतंत्रता ने विज्ञान के विकास में अहम योगदान दिया क्योंकि विज्ञान के लिए स्वतंत्रता, चिंतन की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वंतत्रता और असहमति की स्वतंत्रता की आवश्यकता होती है। महान वैज्ञानिक चरक ने अपनी पुस्तक चरक संहिता में लिखा है कि विज्ञान के विकास के लिए वाद-विवाद, खासकर समान मानसिक स्तर वालों के बीच वाद-विवाद या शास्रार्थ परम आवश्यक है।
प्राचीन न्याय शास्रों, जिनमें गौतम का न्याय सूत्र में वाद-विदाद के कई तरीकों का वर्णन है जैसे, वद, जल्प, वितंड आदि। गौतम के बाद के न्याय दर्शन के जानकारों ने इसे और परिमार्जित किया।
विज्ञान के प्रगति और विकास को प्रोत्साहित करने वाले दो कारकों के उल्लेख के बाद अब हम अपने महान वैज्ञानिकों द्वारा विज्ञान के विभिन्न विषयों में योगदान की चर्चा करते हैं।
गणित
गणित के क्षेत्र में प्राचीन विश्व की सबसे महान और क्रांतिकारी वैज्ञानिक उपलब्धियों में दाशमिक प्रणाली का नाम सबसे ऊपर है। यूरोपीय लोगों द्वारा दाशमिक अंक प्रणाली को अरबी अंक प्रणाली नाम दिया गया, लेकिन अरबी विद्वान इसे हिंदू अंक प्रणाली मानते हैं। क्या ये अरबी अंक प्रणाली है या हिंदू। इस संदर्भ में यह उल्लेख करना आवश्यक है कि ऊर्दू, फारसी और अरबी भाषाएं दायीं से बायीं ओर लिखी जाती है, लेकिन अगर आप इन भाषायों को बोलने वाले लोगों से कोई संख्या, मान लीजिए 257 लिखने के लिए कहिए तो इस संख्या को बायीं से दायीं ओर ही लिखेंगे। यह दिखाता है कि ये संख्याएं उस भाषा से ली गई है जो बायीं से दायीं ओर लिखी जाती है। अब यह मान्य हो चुका है कि ये संख्याएं भारत से आई हैं और अरबों ने हमसे इसका नकल किया है।
अब मैं दाशमिक प्रणाली के क्रांतिकारी महत्व का जिक्र करूंगा। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि प्राचीन रोम, जार और अगस्तस की सभ्यता निस्संदेह एक महान सभ्यता थी, मगर आप अगर किसी प्राचीन रोमन से एक मिलियन लिखने के लिए कहेंगे तो वो पागल हो जाएगा, क्योंकि एक मिलियन लिखने के लिए उसे एक मिलेनियम या एक हजार(इसका प्रतीक M) उसे एक हजार बार लिखना पड़ेगा। रोमन अंक प्रणाली में एक हजार यानी M से बड़ा अंक नहीं होता है। उसे दो हजार लिखने के लिए दो बार MM लिखना पड़ेगा। तीन हजार लिखने के लिए तीन बार MMM लिखना पड़ेगा। इसी तरह एक मिलियन यानी दस लाख लिखने के लिए एक हजार बार M लिखना पड़ेगा।
दूसरी ओर, हमारी दाशमिक प्रणाली में एक एक मिलियन यानी दस लाख लिखने के लिए एक के बाद छह शून्य 1000000 ळिखना पड़ेगा। रोमन अंक प्रणाली में शून्य नहीं है। शून्य भारत की खोज है और इसकी खोज के बगैर प्रगति संभव नहीं है।
हम यहां अपने महान गणितज्ञों जैसे आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त, भास्कर, बराहमिहिर जैसे अनगिनत वैज्ञानिकों के महान योगदानों की विस्तृत चर्चा नहीं करने जा रहे हैं, इनके बारे में आप गूगल में सर्च कर सकते हैं। हालांकि इस सिलसिले में हम यहां सिर्फ दो उदाहरण देंगे।
भारतीय दाशमिक प्रणाली में संख्या 1,00,000 एक लाख कहते हैं। 100 लाख एक करोड़ कहता है। 100 करोड़ एक अरब, 100 अरब एक खरब, 100 खरब एक नील, 100 नील एक पद्म, 100 पद्म एक शंख और 100 शंख एक महाशंख कहलाता है। इस प्रकार एक महाशंख लिखने के लिए एक पर उन्नीस शून्य लिखा जाता है(ज्यादा जानकारी के लिए गूगल पर मौजूद वीएस आप्टे की संस्कृत-इंगलिश डिक्शनरी देख सकते हैं) दूसरी ओर, प्राचीन रोम के लोग एक हजार से ज्यादा की संख्या एम को बार-बार और बहुत बार दुहराए बगैर नहीं लिख सकते हैं।
एक दूसरा उदारहण लीजिए, अग्नि पुराण के मुताबिक, कलियुग, जिसमें हम रहते हैं, चार लाख बत्तीस हजार वर्षों का का है। इससे पहले का युग द्वापर कलियुग से दुगुने काल का था, द्वापर से पहले का त्रेता युग कलियुग से तीन गुना और इससे पहले का सतयुग कलियुग से चार गुना काल का था। चार युग मिलाकर कुल तैंतालिस लाख बीस हजार वर्षों का है। छप्पन चतुर्युग मिलकर एक मन्वंतर कहलाता है। चौदह मन्वंतर एक कल्प, बारह कल्प एक बह्म कहलाता है। इस तरह ब्रह्म अरबों और खरबों वर्ष का होगा।
भारत के परंपरावादी लोग जब प्रतिदिन संकल्प करते हैं तो उन्हें अपने का युग, कलियुग, द्वापर, त्रेता, सतयुग के साथ चतुर्युगी, मन्वंतर, कल्प, बह्म के ठीक वही दिन, महीना, और साल, जिसमें वो रहते हैं का जिक्र करना होता है। ऐसा कहा जाता है कि हम वर्तमान मन्वंतर के 28वें चतुर्युगी में जी रहे हैं। ये भी कहा जाता है कि कल्प का आधा मन्वंतर समाप्त हो चुका है, जबकि आधा मन्वंतर बाकी है। इस समय हम वैवश्वत मन्वंतर में जी रहे हैं।
भले ही कोई हमारी व्यवस्था में विश्वास नहीं करे, लेकिन हमारे पूर्वजों की संकल्पना की उड़ानों से आश्चर्यचकित हुए बगैर नहीं रह सकता है, जिन्होंने इतिहास के अरबों और खरबों वर्षों की कल्पना की।
र्यभट्ट ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक आर्यभट्टियम में बीजगणित, अंकगणित, त्रिकोणमिति, द्विघात समीकरण और साइन तालिका के बारे में लिखा। उन्होंने पाई का मान 3.1416 ज्ञात किया जो पाई के वास्तविक मान के अत्यंत निकट है। आर्यभट्ट के कार्यों को पहले ग्रीक और बाद में अरबों ने ग्रहण किया।
हम यहां ब्रह्मगुप्त, भास्कराचार्य, वराहमिहिर के योगदानों की चर्चा नहीं करेंगे, क्योंकि इसमें काफी समय लग जाएगा।
आगे हम खगोलशास्त्र के बारे में चर्चा करेंगे...

रविवार, 14 अक्टूबर 2012

हिंदी कैसे बन सकती है सर्वश्रेष्ठ भाषा

() एक रविवारीय भोज के बाद, वार्तालाप में, भोजनोपरांत डकारते डकारते, मेरे एक पश्चिम-प्रशंसक, { भारत-निंदक, उन्हें स्वीकार ना होगा } वरिष्ठ मित्र नें प्रश्न उठाया, कि ”क्या, तुम्हारी हिंदी अंग्रेज़ी से टक्कर ले सकती है? सपने में भी नहीं।” यह सज्जन, हिंदी के प्रति, हीन भाव रखनेवालों में से है। वे, उन के ज्ञान की अपेक्षा, आयु के कारण ही, आदर पाते रहते है।
पर आंखे मूंद कर, ”साहेब वाक्यं प्रमाणं”, वाला उन का, यह पैंतरा और भारत के धर्म-भाषा-संस्कृति के प्रति हीन भावना-ग्रस्त-मानस मुझे रुचता नहीं। पर, ऐसी दुविधा में क्या करता? दुविधा इस लिए, कि यदि, उनकी आयु का आदर करूं, तो असत्य की, स्वीकृति समझी जाती है; और अपना अलग मत व्यक्त करूं, तो एक वरिष्ठ मित्र का अपमान माना जाता है। पर कुछ लोग स्वभाव से, आरोप को ही प्रमाण मान कर चलते हैं। यह सज्जन ¨ भी बहुत पढे होते हुए भी, उसी वर्ग में आते थे।
इस लिए, उस समय, उनका तर्क-हीन निर्णय और सर्वज्ञानी ठप्पामार पैंतरा देख, मुझे कुछ निराशा-सी हुयी। ऐसा नहीं, कि मेरे पास कुछ उत्तर नहीं था; पर इस लिए भी , कि हिंदी तो मेरे इस मित्र की भी भाषा थी, एक दृष्टि से मुझ से भी कुछ अधिक ही।पर उस समय उनका आक्रामक रूप, चुनौती भरा पैंतरा और ”सपने में भी नहीं” यह ब्रह्म वाक्य और आयु देख, उन्हें उत्तर देना मैं ने उचित नहीं माना। पर इस प्रसंग ने मेरी जिज्ञासा जगाई, अतः इस विषयपर कुछ पठन-पाठन-चिंतन-मनन इ. करता रहा।
() तो, क्या, हिंदी अंग्रेज़ीसे टक्कर ले सकती है?
निश्चित ले सकती है। और हिंदी भारतके लिए कई गुना लाभदायी ही नहीं, शीघ्र-उन्नतिकारक भी है। भारत की अपनी भाषा है। मैं इस विषयका हरेक बिंदु न्यूनतम शब्दों में क्रमवार आपके सामने रखूंगा। केवल तर्क ही दूंगा, भावना नहीं जगाउंगा। तर्क की भाषा सभी को स्वीकार करनी पडती है, पर केवल भावनाएं, आप को वयक्तिक जीवन में जो चाहो, करने की छूट देती है। और मैं चाहता हूं, कि सभी भारतीय हिंदी को अपनाएं; इसी लिए तर्क, केवल तर्क ही दूंगा।
()
आप निर्णय लें, मैं नहीं लूंगा। न्यूनतम समय लेकर मैं क्रमवार बिंदू आप के समक्ष रखता हूँ। इन बिंदुओं में भाउकता नहीं लाऊंगा। राष्ट्र भक्ति, भारतमाता, संस्कृति, इत्यादि शब्दों से परे, केवल तर्क के आधार पर प्रतिपादन करूंगा। तर्क ही, सर्व स्वीकृति के लिए उचित भी और आवश्यक भी है। इस लिए, केवल तर्क-तर्क-और तर्क ही दूंगा।
हिंदी और देवनागरी की वैज्ञानिकता”
()हर बिंदू पर गुणांक, आप अपने अनुमानके अनुसार, लगाने के लिए मुक्त हैं।
हमारी देवनागरी समस्त संसार की लिपियों में सबसे अधिक वैज्ञानिक है,सर्वोत्तम हैं। और, संसार के किसी भी कोने में प्रयुक्त वर्णमाला वैज्ञानिक रूप में विभाजित नहीं है, जैसी देवनागरी है। [गुणांक ५० अंग्रेज़ी २०]
() आप अपना नाम हिंदी में लिखिए। मैं ने ”मधुसूदन”(५ अक्षर) लिखा। अब अंग्रेज़ी-रोमन में लिखिए ”madhusudan” (१० अक्षर) अब, बताइए कि १० अक्षर लिखनेमें अधिक समय लगेगा, या ५ अक्षर लिखने में? ऐसे आप किसी भी शब्दके विषय में कह सकते हैं। गुणांक {हिंदी २०-अंग्रेज़ी १०}
() हिंदी में वर्तनी होती है, पर अंग्रेज़ी की भांति स्पेलिंग नहीं होती। लिपि चिह्नों के नाम और ध्वनि अभिन्न (समरूप) है।जो बोला जाता है, उसीको लिखा जाता है। क लिखो, और क ही पढो, गी लिखो और गी ही पढो।जो लिखा जाता है, वही बोला जाता है। ध्वनि और लिपि मे सामंजस्य है।
अंग्रेज़ी में ऐसा नहीं है। लिखते हैं S- T- A- T- I- O- N, और पढते हैं स्टेशन। उसका उच्चारण भी आपको किसीसे सुनना ही पडेगा। हमें तो देवनागरी का लाभ अंग्रेज़ी सीखते समय भी होता है, उच्चारण सीखने में भी, शब्द कोष के कोष्ठक मे देवनागरी में लिखा (स्टेशन) पढकर हम उच्चारण सीख गए। सोचो, कि केवल अंग्रेज़ी माध्यम में पढने वाला इसे कैसे सीखेगा? चीनी तो और चकरा जाएगा। देखा देवनागरी का प्रताप ! [हिंदी ५० अंग्रेज़ी २५]
() और, अंग्रेज़ी स्पेलिंग रटने में आप घंटे, बीता देंगे। इस एक ही, हिंदी के गुण के आधार पर हिंदी अतुलनीय हो जाती है। आज भी मुझे (एक प्रोफेसर को) अंग्रेज़ी शब्दों की स्पेलिंग डिक्षनरी खोल कर देखने में पर्याप्त समय व्यय करना पडता है।हिंदी शब्द उच्चारण ठीक सुनने पर, आप उसे लिख सकते हैं। कुछ वर्तनी का ध्यान देने पर आप सही सही लिख पाएंगे। {हिं 100 गुण -अं – १० )
हो सकता है, आपको 100 गुण अधिक लगे। पर आप के समय की बचत निश्चित कीमत रखती है। इससे भी अधिक, यह गतिमान, शीघ्रता का युग है। समय बचाने आप क्या नहीं करते? विमान, रेलगाडी, मोटर, बस सारा शीघ्रता के आधार पर चुना जाता है।
() हिंदी में, एक ध्वनिका एक ही संकेत है। अंग्रेज़ी में एक ही ध्वनि के लिए, अनेक संकेत काम में लिए जाते हैं। उदा. जैसे —-> क के लिए, k (king), c (cat), ck (cuckoo) इत्यादि.
एक संकेत से अनेक ध्वनियाँ भी व्यक्त की जाती है। उदा. जैसे—> a से () ()() () () इत्यादि। [हिंदी २५ अंग्रेज़ी १०]
() यही कारण था, कि, शालांत परीक्षा में हिंदी (मराठी) माध्यम से हम लोग शीघ्रता से परीक्षा के प्रश्न हल कर लेते थे। जब हमारे अंग्रेज़ी माध्यमों वाले मित्र विलंब से, उन्ही प्रश्नों को अंग्रेज़ी माध्यम से जैसे तैसे समय पूर्व पूरा करने में कठिनाई अनुभव करते थे। एक उदाहरण लेकर देखें। भूगोल का प्रश्न:
कोंकण में रेलमार्ग क्यों नहीं? {१२ अक्षर}और अंग्रेज़ी में होता था,
Why there are no railways in Konkan?{२९ अक्षर}
उसका उत्तर लिखने में भी उन्हें अधिक लिखना पडता था। अक्षर भी अधिक, गति पराई भाषा होने से धीमी, और अंग्रेज़ी में, सोचना भी धीमे ही, होता था। प्रश्न तो वही था, पर माध्यम अलग था।और फिर शायद उन्हें स्पेलिंग का भी ध्यान रखना पडता था। पर परीक्षार्थी का प्रभाव निश्चित घट जाता होगा। जो उत्तर एक पन्ने में हम देते थे, वे दो पन्ने लेते थे। (हिं २५-अं १०}
() हिंदी का लेखन संक्षेप में होता है।
उदा:एक बार मेरी, डिपार्टमेंट की बैठक में, युनिवर्सीटी के अध्यक्ष बिना पूर्व सूचना आए थे, जब हमारी सहायिका (सेक्रेटरी) छुट्टी पर थी। तो कनिष्ठ प्राध्यापक होने के नाते, मुझे उस के सविस्तार विवरण के लिए नियुक्त किया गया।इस बैठक मे, अध्यक्ष ने महत्व पूर्ण वचन दिए थे, जिस का विवरण आवश्यक था।
मैने कुछ सोच कर, देवनागरी मे, अंग्रेजी उच्चारों को लिखा, जो रोमन लिपिकी अपेक्षा, दो से ढाइ गुना शीघ्र था। जहां The के बदले ’द’ से काम चलता था, laboratory Expense के बदले लॅबोरॅटरी एक्सपेंस इस प्रकार लिख कर नोट्स तैय्यार किए, शब्दों के ऊपर की रेखा को भी तिलांजली दी। फिर घर जाकर, उसी को रोमन लिपि मे रूपांतरित कर के दुसरे दिन प्रस्तुत किया। विभाग के अन्य प्रोफेसरों के, अचरज का पार ना था। पूछा, क्या मà �ˆ शॉर्ट हॅंड जानता हूं? मैने उत्तर मे हिंदी- देव नागरी की जानकारी दी। उनके नाम लिख कर थोडी प्राथमिक जानकारी दी। उन्हें, हमारी नागरी लिपि कोई पहली बार समझा रहा था। अपेक्षा से कई अधिक, प्रभावित हुए। एक आयर्लॅण्ड से आया प्रॉफेसर लिपि के वलयांकित सुंदर(सविनय,मेरे अक्षर सुंदर है)अक्षरों को देख कर बोला ,यह तो सुपर-ह्यूमन लिपि है। {मन में सोचा, यह तो, अंग्रेज़ी में, इसे, देव(Divine) नागरी कह रहा à ��ै।} संसार भर में, इतनी वैज्ञानिक लिपि और कोई नहीं। सारे पी एच डी थे, पर उन्हें किसी ने हिंदी-नागरी लिपि के बारे में ठीक बताया नहीं था। हिंदी को उस के नाम से जानते थे, कुछ शब्द जैसे नमस्ते इत्यादि जानते थे। बंधुओ ! लगा, कि, हम जिस ढेर पर बैठे हैं, कचरे कूडे का नहीं पर हीरों का ढेर है। हृदय गद गद हुआ। हिंदी पर, गौरव प्रतीत हुआ। [हिंदी ५० अंग्रेज़ी २५]
() व्यक्ति सोचती भी शब्दों द्वारा है।जब आप सोचते हैं, मस्तिष्क में शब्द मालिका चलती है। लंबा शब्द अधिक समय लेता है, छोटा शब्द कम।
तो जब अंग्रेज़ी के शब्द ही लंबे हैं, तो उसमें सोचने की गति धीमी होनी ही है। अतिरिक्त, वह परायी भाषा होनेसे और भी धीमी। इसका अर्थ हुआ, कि अंग्रेज़ी में विचारों की गति हिंदी की अपेक्षा धीमी है। मेरी दृष्टि में हिंदी अंग्रेज़ी से दो गुना गतिमान है। [हिंदी ५० अंग्रेज़ी २५]
() लेखन की गति का भी वही निष्कर्ष। जो आशय आप ६ पन्नों में व्यक्त करेंगे। अंग्रेज़ी में व्यक्त करने में आपको १० पन्ने लगते हैं। गीता का एक २ पंक्ति का श्लोक पना भरकर अंग्रेज़ी में समझाना पडता है।[हिंदी ५० अंग्रेज़ी २५]
(१०) अर्थात, आप अंग्रेज़ी भाषा द्वारा शोध कर रहे हैं, तो जो काम ६ घंटों में हिंदी में कर सकते थे, उसे करने में आप को १० घंटे लग सकते हैं। अर्थ: आप शोध कार्य हिंदी में करेंगे, तो जीवन भर में ६७% से ७५% अधिक शोधकार्य कर सकते हैं। [हिं ५० अंग्रेज़ी २५]
(११) इस के अतिरिक्त हर छात्रको हिंदी माध्यम द्वारा, आज की शालेय शिक्षा अवधि में ही,(११-१२ वर्ष में) MSc की उपाधि मिल पाएगी। अर्थात आज तक जितने लोग केवल शाला पढकर निकले हैं, वे सारे M Sc से विभूषित होत।अंग्रेज़ी के कारण, यह ज्ञान भंडार दुर्लक्षित हो गया है।{ संदर्भ: बैसाखी पर दौडा दौडी, मुख्तार सिंह चौधरी} तो, क्या भारत आगे नहीं बढा होता? क्या भारत पीछडा होता ? भारत आज के अनुपातमें, कमसे कम, ३ स े ५ गुना आगे निकल गया होता?वैसे हम भारतीय बहुत बुद्धिमान है। यह जानकारी परदेश आकर पता चली। { हिंदी ५०० अंग्रेज़ी १००}
(१२) किसी को अंग्रेज़ी, रूसी, चीनी, अरबी, फारसी ही क्यों झूलू, स्वाहिली. हवाइयन —-संसार की कोई भी भाषा पढने से किस ने रोका है? प्रश्न:कल यदि रूस आगे बढा तो क्या तुरंत सभी को रूसी में शिक्षा देना प्रारंभ करेंगे? और परसों चीन आगे बढा तो? और फ्रांस?
वास्तव में पडोस के, चीन की भाषा पर्याप्त लोगों ने (सभी ने नहीं)सीखने की आवश्यकता है। उन की सीमा पर की कार्यवाही जानने के लिए। मेरी जानकारी के अनुसार आज कल यह जानकारी हमें अमरिका से प्राप्त होती है। या,फिर आक्रमण होने के बाद! [अनुमानसे लिखा है] अमरिका में सारी परदेशी भाषाएं गुप्त शत्रुओं की जान कारी प्राप्त करने के लिए पढी जाती हैं।
जो घोडा प्रति घंटा ५० मील की गति से दौडता है, वह क्या २० मील प्रति घंटा दौडनेवाले घोडेसे अधिक लाभदायी नहीं है?
पर भारतीय कस्तुरी मृग(हिरन) दौड रहा है, सुगंध का स्रोत ढूंढने। कोई तो उसे कहो, कहां भटक रहे हो, मेरे हिरना!तेरे पास ही, सुगंध-राशी है।
मुझे यह विश्वास नहीं होता, कि ऐसी कॉमन सेन्स वाली जानकारी जो इस लेखमें लिखी गयी है, हमारे नेतृत्व को नहीं थी? क्या किसी ने ऐसा सीधा सरल अध्ययन नहीं किया?
अब भी देर भले हुयी है। शीघ्रता से चरण बढाने चाहिए।
तो,क्या हिंदी अंग्रेज़ी से टक्कर ले सकती है? आप बुद्धिमान हैं। आप ही निर्णय करें।