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मंगलवार, 25 नवंबर 2008

चर्च का झूठ

लेखक-आर एस फ्रांसिस

जी हां यह सच है कि धर्मांतंरण के मामले पर `चर्च झूठ बोलता है। चर्च से तात्पर्य यहां वैटिकन द्वारा संचालित रोमन कैथोलिक चर्च से है जो कि भारत में `कैथोलिक बिशप कांफ्रेस ऑफ इंडिया´ द्वारा शासित है, जिसका मुख्यालय नई दिल्ली में है। विगत माह उड़ीसा के कंधमाल में एक हिन्दू संत की हत्या के बाद भड़की हिंसा में वहां मुख्य कारण मंतातरण है, यह समस्या एक विकराल रुप लेती जा रही है, जिसमें केन्द्र की सरकार से लेकर पश्चिमी देशों की सरकारें तक अपनी-अपनी रोटियां सेंक रही है। उड़ीसा को मुद्दा बना कर `आस्ट्रेलिया, अमेरिका, फ्रांस, इटली आदि देश भारत पर दबाव बना रहे हैं।

वहीं दूसरी तरफ चर्च बड़ी सफाई से यह झूठ बार -बार बोल रहा है कि `हम धर्मांतरण नहीं करते´ "धर्मांतरण कराने वाले गुप्र या चर्च दूसरे है।" स्पष्ट है कि कैथोलिक चर्च धर्मांतरण के आरोप को खारिज करता है। पिछले दिनों कई टी.वी.चैनलों और आंग्रेजी अखबारों को कैथोलिक चर्च के कई अधिकारियों, बिशपों एवं प्रवक्ताओं ने यहीं कहा कि `हम तो निर्दोष हैं´-हम धर्मातरण करते ही नहीं, वे लोग कोई और हैं।

कैथोलिक चर्च के अधिकारियों का यह तर्क `चर्च की गतिविधियों की मामूली समझ रखने वाले किसी भी व्यक्ति के गले नही उतर सकता´ क्योंकि एक ओर तो `वैटिकन/ पोप´ विश्व के कोने-कोने में जाकर समस्त पृथ्वी पर `ईसाइयत´ के विस्तार पर जोर दे रहे हैं। खुद `पोप जॉन पॉल द्वितीय´ ने एक दशक पूर्व अपने भारत प्रवास के दौरान यह घोषणा की थी कि इक्कीसवीं शताब्दी दक्षिण एशिया में चर्च की होगी। लेकिन आज उनके तमाम अनुयायी `बिशप, फादर, नन्स जोर देकर कह रहे है है कि किसी को ईसाई बनाने या उसका मत-परिवर्तन करने से हमारा कोई लेना देना नहीं है -`हिन्दुत्वादी कट्टरपंथी हमें बक्शें और जो अन्य ईसाई मिशनरी यह कार्य कर रहे हैं उनसे ही निपटें´।

इनके झूठ से पर्दा उठाता है पोप का 10 नवम्बर 1994 को एशिया के बिशपों के नाम लिखा गया एक पत्र जिसमें स्पष्ट किया गया है कि एशिया के इस भाग में (भारत और चीन) उनके प्राचीन धर्म और संस्कृति के कारण `क्रििष्चयानिटी´ के प्रचार पर दबाव बनता है और टकराव की स्थिति उत्पन होती है। यह ईसाइयत के विस्तार के लिए एक बड़ी चुनौती है क्योंकि हिन्दुइज्म और बुद्धिइज्म को यहां के लोगों ने नशे की सी आदत में अपना रखा है। इस पत्र से पता चलता है कि `पोप और उनके अनुयायियों की मानसिकता कैसी है। उनकी नजर में `हिन्दू और बौद्ध धर्मावलम्बी मात्र अंधविश्वास के नशे में डूबे हुए लोग है।´जिन्हें कैथोलिक चर्च उस नशे से उबार कर स्वस्थ्य मानसिकता देकर ईसाइयत द्वारा मुक्ति का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। यह एक तरह से हिन्दुओं एवं बौद्धों को गाली देने जैसी बात है।

वास्तविकता यह है कि अब हिन्दुओं के सामने भी अपनी संस्कृति और धर्म के आस्तित्व का प्रश्न खड़ा हो गया है। हिन्दू धर्म और संस्कृति पर सदियों से आक्रान्ताओं ने जुल्म ढाये हैं। कभी उन्हें काफिर कह कर कत्लेआम का ग्रास बनाया गया तो कभी उन्हें मूर्तिपूजक, अंधविश्वासी कहकर गाली दी गई। यह सिलसिला वर्तमान समय तक चल रहा हैं। भूमंडलीकरण के नाम पर चारों दिशाओं - धर्म, संस्कृति, अर्थव्यवस्था, राजनीति - पर अलग अलग तरह के मुलम्मे चढ़ाकर सुनियोजित आक्रमण हो रहे है। ऐसी स्थिति में अस्तित्व की रक्षा के लिए साम,दाम,दण्ड-भेद की नीतिया अपनाई ही जायेगी।

नई दिल्ली में जन्तर मंतर पर धरने पर बैठे `कैथोलिक आर्चडायसिस ऑफ दिल्ली के प्रवक्ता ने सफेद झूठ बोलते हुए मीडिया से कहा कि ``वैटिकन ने हमें स्पष्ट आदेश दिया है कि इंच मात्र या इशारे मात्र से भी किसी को धर्मांतरण के लिए प्रोत्साहित नहीं करें. उक्त चर्च अधिकारी कितना बड़ा झूठ बोल रहा है यह वैटिकन द्वारा जारी इस आदेश से साफ होता है। `एशिया फार ग्लेसिया´ में पोप/ वैटिकन- बिशपों, फादरों, ननों, कार्डीनल, डीकन और लेइटी को साफ निर्देश देता है कि वह एशिया में कैथोलिक चर्च की गतिविधियों को विस्तार देने में जुट जाए। ताकि एशियावासियों को अधिक से अधिक संख्या में `नया जीवन´ अर्थात मतांतरण द्वारा बचाया जा सकें। स्पश्ट है कि एशिया की जनता बगैर चर्च की शरण में गए मृत्प्राय है जिसे `पोप´ द्वारा नियुक्त किये गए बिशप, कार्डीनल, प्रीस्ट, नन्स व अन्य बप्तिस्मा (क्रििष्चयनटी संस्कार) पाये लोग ही नवजीवन दें सकते है।

गुरुवार, 16 अक्टूबर 2008

पोप का पाप- जलता हिंदुस्तान

मूल लेखक- एल आर फ्रांसिस, अध्यक्ष, पुअर क्रिश्चियन लिबरेशन फ्रंट (francispclm@yahoo.com)
साभार- विस्फोट

चर्च पर हिन्दू चरमपंथियों द्वारा हमला तो खबर बनती है लेकिन यह खबर कभी क्यों नहीं बनती कि चर्च के अंदर कितना शोषण, अत्याचार और दमन हो रहा है. चर्च संगठन अपने ही कर्मचारियों का शोषण करते हैं, नन्स और पादरी की संदेहास्पद हत्याओं के मामले भी प्रकाश में आये हैं, जिनमें चर्च प्रशासन से जुड़े लोग ही शामिल पाये गये हैं, फिर भी हमारा प्रबुद्ध समाज चर्च संगठनों के बीच फैली इन कुरीतियों के बारे में कभी अपनी जबान नहीं खोलता.

पिछले दिनों चर्चों से जुड़ी ऐसी कई घटनांए सामने आई हैं जिन्हें साप्रदायिकता की श्रेणी में रखा जा रहा है। अभी हाल ही में रतलाम (मध्य प्रदेश) की रेलवे कंलोनी में स्थित 85 वर्ष पुराने चर्च में आग लगा दी गई। इस घटना को सीधे हिन्दु संगठनों से जोड़ा गया। मामला तुंरत अतंराष्ट्रीय स्तर तक पंहुचाया गया। चर्च अधिकारियों और उनके विदेशी आकाओं की भकुटियां तन गई। बाद में पता चला कि उक्त घटना की तह में था उसी चर्च का चौकीदार था- नोयल पारे. नोयल पारे ने आक्रोशवश ही चर्च में आग लगाई थी।

चर्च की 86वीं वशZगांठ मनाई जाने वाली थी। बड़े समारोह की तैयारियॉ थी। किंतु उस चर्च के चौकीदार पर आठ हजार का कर्ज था। कर्ज था बनियों का। जिनसे वह पेट भरने के लिये जरुरी नून-तेल उधार लेता था। चर्च प्रशासन उसे मात्र 1000 रुपए मासिक वेतन देता था। कितना बड़ा अंतर है सरकारी नियमों में न्यूनतम मजदूरी को लेकर और चर्च प्रषासन द्वारा दी जाने वाली मजदूरी के बीच. देश की राजधानी दिल्ली में ही चर्च द्वारा चलाये जाने वाले अधिक्तर संस्थानों में भी ऐसा ही हाल है, सरकारी आदेश पोप पोषित धर्मराज्य के प्रशासकों के ठेंगे पर होते है। चर्च का गुलाम कर्मचारी 24 घंटे काम करके एक हजार रुपए महीना अर्थात 33 रुपए प्रतिदिन, ऐसी स्थिति में -क्रिया की प्रतिक्रिया - शोषण का परिणाम आक्रोश तो होगा ही. आक्रोशवश ऐसा कर्मचारी कुछ भी कर सकता है। हत्या या आत्महत्या या फिर तोड़फोड़ मारपीट अगजनी इत्यादि या चोरी चकारी, लूटपाट कुछ भी।

कुछ वर्ष पूर्व मध्य प्रदेश के ही झाबुआ में कान्वेंट की ननों (धर्म-बहनों) पर सामूहिक हमला व बलात्कार का मामला भी खूब उछाला गया। लेकिन उस समय भी बात वहीं थी बंदर की बला तबेले के सिर. हिन्दू संगठन ही बदनाम किये गये। इस मामले में भी झाबुआ के धर्मांतरित ईसाइयों का आक्रोश ही था। मलयाली-दक्षिण भारतीय ननें बनाम आदिवासी ईसाई. यहां रतलाम में चर्च जलाने की जिस घटना का जिक्र किया जा रहा है उसके मूल में भी मलयाली चर्च प्रशासन पादरी जोस मैथ्यू (मलयाली) बनाम नोयल पारे (स्थानीय मराठी मूल का आदिवासी) है. हाल ही में बिजनौर -उतर प्रदेश की एक स्थानीय अदालत ने `संत मेरी स्कूल´ की नन प्रमिला की 5 नवंबर 2007 को हुई हत्या के मामले में स्कूल के चौकीदार जॉन को उम्रकैद की सजा सुनाई है। कुछ दिन पूर्व उतराखंड के रामपुर में एक कैथोलिक पादरी एवं उसकी नौकरानी की हत्या के मामले में भी उक्त आश्रम से जुड़े कुछ लोग पकड़े गये है। आजकल उड़ीसा में एक नन के साथ हुये बलात्कार का मामला राष्ट्रीय एवं अतंरराष्ट्रीय समाचार पत्रों में छाया हुआ है.उड़ीसा पुलिस ने संदेह के आधार पर चार लोगों को हिरासत में लिया है. पीड़ित नन चर्च अधिकारियों के संरक्षण में अज्ञातवास में चली गई है. चर्च अधिकारियों के मुताबिक पीड़िता को सही समय पर सामने लाया जायेगा। किसी भी महिला के साथ बलात्कार एक घिनौना अपराध है. बलात्कारी शरीर ही नहीं पीड़िता की आत्मा की भी हत्या कर देता है. ऐसा अपराधी कोई भी हो उसे क्षमा नहीं किया जाना चाहिए परन्तु उड़ीसा मामले को लेकर कुछ चर्च अधिकारियों पर ही अगुंली उठ रही है. ऐसे में यह जरूरी है कि सच लोगों के सामने लाया जाना चाहिए।


मलयाली मूल और मंगलूर - कर्नाटक -गोवा पुर्तगाली मूल के धर्माचार्यों द्वारा भारत के ईसाई चर्च एवं अन्य संस्थान संचालित हो रहे है। भारत की स्वतंत्रता के बाद जब विदेशी मिशनरी अपने मूल देशों की और लौटे तो भारत की ईसाई संपदा चल और अचल पूंजी पर इन्हीं दक्षिण भारतीय पादरियों -बिशपों का एकाधिकार हो गया जो आज तक बना हुआ है। शेष ईसाई तो मात्र शासित और शोषित रुप में चर्च के सदस्य है.यहीं नहीं उड़ीसा में जो हो रहा है उसमें भी मलयाली मिशनरियों का बड़ा हाथ है। कटक के आर्च बिशप राइट रेव्हण रिफेल चीनथ भी मलयाली ही है। वहां इनकी गलतियों की सजा गरीब एवं सीधे साधे धर्मांतरित वंचितों को मिली। छल, फरेब, धोखाधड़ी के बलबूते अपने साम्राज्य का विस्तार करते `पोप पोषित´ यह मिशनरी हिन्दू दलितों को मतांतरित करने के बाद भी सरकारी दस्तावेजों में हिन्दू रहने के लिए प्रेरित करते है, ताकि वह इन से नहीं सरकार से अपने अधिकारों के लिए लड़ते रहे और इनकी धर्मांतरण की दुकान बिना किसी रोक-टोक के चलती रहे।

इन्हें वंचितों एवं आदिवासियों के प्रति कितनी सहनाभूति है यह उड़ीसा के कंधमाल और कर्नाटक में हुए कुछ चर्चों पर हमलों के दौरान विरोध करने के तरीके से भी समझा जा सकता है। जहां उड़ीसा के मामले में कैथोलिक चर्च अधिकारी एक औपचारिकता निभाते दिखाई दिये वहीं मंगलूर में हुई घटनाओं के बाद उन्होंने आसमान सिर पर उठा लिया। अंग्रेंजी अखबारों में दो-दो पेज तक की खबरे आनी शुरू हुई। चर्च अधिकारी और उनके राजनीतिक समर्थक ऐसे सक्रिय हुए मानों कर्नाटक में `ईसाइयत´ समाप्त होने को हो। चर्च अधिकारियों की सक्रियता और उग्र तेवरों को देखते हुए कर्नाटक के मुख्यमंत्री तुरंत मंगलूर डायसिस के बिषप के यहां सफाई देने वैसे ही पुहचें जैसे राजग के शासनकाल में केन्द्र सरकार अपनी सफाई देती थी। मंगलूर की घटनाओं के बाद चर्च अधिकारियों का उग्र होना स्भाविक था क्योंकि एक तरह से वह चर्च का मिनी वैटिकन जो ठहरा। यदि मराठियों,असामियों, बगालियों, पंजाबियों आदि को अपने अस्तित्व की चिन्ता सता सकती है तो उड़ीसा के मूल निवासियों को भी अपने अस्तित्व की रक्षा की चिन्ता होना स्भाविक है।

मलयाली मूल और मंगलूर - कर्नाटक -गोवा पुर्तगाली मूल के धर्माचार्यों द्वारा भारत के ईसाई चर्च एवं अन्य संस्थान संचालित हो रहे है। भारत की स्वतंत्रता के बाद जब विदेशी मिशनरी अपने मूल देशों की और लौटे तो भारत की ईसाई संपदा चल और अचल पूंजी पर इन्हीं दक्षिण भारतीय पादरियों -बिशपों का एकाधिकार हो गया जो आज तक बना हुआ है। शेष ईसाई तो मात्र शासित और शोषित रुप में चर्च के सदस्य है। यह दक्षिण भारतीय पादरी - बिशप विदेशी मिशनरियों द्वारा छोड़ी गई अकूत सम्पति को अपने हाथ से निकलने न देने की फिराक में नित नयें हथकंडे अपनाते रहते है। यहां एक तथ्य और भी उल्लेखनीय है कि वास्कोडिगामा द्वारा छोड़े गये पुर्तगाली मूल के मिशनरियों के वंशज अब भी मंगलोरियन -गोअन - के रुप में उपस्थित है। उतर प्रदेश के नौ कैथोलिक डायसिसों आगरा, मेरठ, झॉसी, बिजनौर, इलाहाबाद, लखनाऊ, बनारस, गोरखपुर, बरेली - के बिशपों में से छ: बिशप पुर्तगाली मूल के है - शेष मलयाली (केरल) के है। अभी कुछ माह पूर्व केरल के आर्च बिशप ने केरल के ईसाइयों के नाम एक परिपत्र (फतवा) जारी किया था ``यह कि प्रत्येक दम्पती को चाहिये कि वे `अधिक से अधिक´ संतान उत्पन्न करें. आशय यही था कि चर्च संपदा को हथियाये रखने के लिए केरल के कर्णधारों की अवश्यकता है।

चर्च अधिकारी आज विभिन्न तरीकों से अथाह दौलत कमा रहे हैं. उनका पूरा व्यावसाय इस देश के करोड़ों वंचितों के नाम पर चल रहा है। भारत सरकार का वार्षिक बजट तो आय-व्याय के साथ घाटे के बजट के रुप में जुड़ा होता है मगर इनके घाटे का तो सवाल ही नहीं और साथ ही धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों के हित्तों की रक्षा का भार भारत की सरकार पर जिसके तहत इटली की सरकार और वैटिकन भारत के राजदूत को बुलाकर डांट लगाती है। यहीं कारण है कि चर्च अधिकारियों द्वारा शोषित आम ईसाई अनाथ सा विक्षिप्तावस्था में जा पहुंचा है जिसका भविष्य आक्रोश और विरोध की नींव पर खड़ा है.

नोट- ब्लॉग संचालक ने एक भी शब्द अपनी ओर से नहीं जोड़ा है.

सोमवार, 8 सितंबर 2008

कंधमाल हिंसा के लिए ईसाई मिशनरियां जिम्मेदार

कंधमाल में स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की नृशंसतापूर्वक हत्या के बाद हिंसा भड़की. निस्संदेह इस हिंसा में दर्जनों निर्दोषों को भी कीमत चुकानी पड़ी. मगर यह हिंसा क्यों भड़की, इस पर लीपा-पोती करने और तुष्टिकरण की नीति अपनाने से ज्यादा जरूरी है कि मसले पर गंभीरता पूर्वक विचार हो.

यह पहलीबार नहीं था जब कि स्वामी जी पर हमले हुए हों, अंतिमबार हुए हमले से पहले स्वामी पर आठ हमले और हुए थे, आठवां हमला आठ माह पहले हुआ था, जिसमें स्वामी से बाल-बाल बच गए. इस हमले के बाद कंधमाल में व्यापक हिंसा भड़क उठी थी. उस हिंसा की आग शांत हुई नहीं कि एकबार फिर स्वामीजी पर हमला हुआ और अंतिमरूप से उनकी हत्या कर दी गई. सरकार ने आनन-फानन में कह दिया कि ये हत्या माओवादी नक्सलियों ने की है. मामले की जांच किए बगैर.

स्वामीजी कंधमाल के आदिवासी बहुल क्षेत्र में शिक्षा और आदिवासियों के समग्र उत्थान की दिशा में कार्य कर रहे थे. स्वामीजी का ये कार्य ईसाई मिशनरियों को अच्छा नहीं लग रहा था. वे मिशनरियों की आंखों की किरकिरी बने हुए थे और मिशनरियां उन्हें अपने रास्ते से हटाना चाहती थी और आखिरकार हटाकर ही दम लिया.

वैसे ईसाई मिशनरियों का दंभ होता है कि वे निस्वार्थ समाज सेवा का काम कर रहे हैं, वे पिछड़े इलाकों में स्कूल, अस्पताल और सामुदायिक विकास केंद्रों का निर्माण करते हैं. मगर समाज सेवा की आड़ में ईसाई मिशनरियां व्यापक तौर पर धर्म परिवर्तन के काम में जुटी हुई हैं.

कंधमाल की ही बात करें तो छह लाख की आबादी वाले कंधमाल में एक लाख से भी ज्यादा ईसाई हैं. इनमें से करीब सत्तर हजार लोग अनुसूचित जाति से धर्मपरिवर्तन कराके ईसाई बनाए गए हैं. ईसाई मिशनरियों का अक्सर दावा होता है कि प्रभु ईशु मसीह तुमसे बहुत प्यार करते हैं, तुम्हें गले लगाना चाहता हैं. तुम्हारे सभी कष्टों और पीड़ाओं को खत्म कर देना चाहते हैं. तुम्हें गरीबी, बेकारी से छुटकारा दिलाना चाहते हैं. सच बात तो ये है कि भगवान राम की तरह स्वयं प्रभु ईशु मसीह ने भी अपने जीवन में अनेक दुख झेले, कष्टों का सामना किया, अंत में तो उन्हें सूली पर चढ़ा दी. वे स्वयं नियति प्रदत्त कष्टों से नहीं बच सके तो वे दूसरों का कष्ट कहां से हर लेंगे. यही वजह है कि ये धर्मांतरित ईसाई, मिशनरियों के लाख दावे के बाद भी गरीब हैं, ये गरीब अनपढ़ ईसाई, अनुसूचित जनजाति के तहत आरक्षण चाहते हैं. कंधमाल के कोंध(अनुसूचित जनजातियों) का मानना है कि उन्हें आरक्षण नहीं दी जा सकती है. संविधान के मुताबिक भी, अनुसूचित जाति(एससी) के जिन लोगों ने धर्मांतरण कर लिया है उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं दिया जा सकता है. कोंध जाति(एसटी) और धर्मांतरित ईसाईयों(पन्ना-एससी) के बीच इसी बात का झगड़ा है.

आरएसएस जैसी संस्थाओं पर अक्सर ये आरोप लगता रहा है कि वे धर्मांतरण तो रोकना चाहते हैं, लेकिन आदिवासियों के उत्थान और उसकी समस्याओं को सुलझाने के लिए उन्होंने कुछ भी नहीं कर रहे है. इसी आरोप के जवाब में आरएसएस की अनुषंगी संस्थाओं ने आदिवासी और पिछड़े इलाकों में व्यापक विकास के काम शुरू किए. मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, झारखंड के आदिवासी इलाकों में संघ के स्कूल, अस्पताल चलाए जा रहे हैं ताकि धर्म परिवर्तन को रोका जा सके. आरएसएस का काम ईसाई मिशनरियों के धर्म-परिवर्तन की राह में रोड़ा साबित हो रहा है, इसलिए वे इन्हें खत्म कर देना चाहते हैं.

उड़ीसा के कंधमाल में स्वामी लक्ष्मणानंद की हत्या इसी बात का उदाहरण है. जस्टिस एंड ट्रायल नामक स्वयंसेवी संगठन ने भी कंधमाल हिंसा के लिए ईसाई मिशनरियों को जिम्मेदार ठहराया. संगठन के अध्यक्ष और पूर्व महाधिवक्ता सरदार जीएस गिल ने एक संवाददाता सम्मेलन में कहा कि धर्म परिवर्तन निरोधक कानून के बावजूद ईसाई मिशनरियां भोले-भाले आदिवासियों का धर्म परिवर्तन करवा रही है, जिससे समय-समय पर तनाव पैदा होता रहता है. मामले की जांच के बाद संगठन के अध्यक्ष ने कहा कि लक्ष्मणानंद सरस्वती पर ईसाई मिशनरियों ने आठ बार हमले कराये और नौवे बार में स्वामी जी की मौत हो गई. समिति ने साफ साफ कहा कि इस बात की कोई ठोस वजह नहीं है कि माओवादियों स्वामी जी की हत्या कर दे. समिति ने ये भी कहा कि क्या ईसाई मिशनरियों ने माओवादियों से उनकी हत्या करायी है, इस बात की भी जांच कराई जानी चाहिए.

राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन के प्रवर्तक और प्रख्यात राष्ट्रवादी चिंतक के एन गोविंदाचार्य ने कंधमाल हिंसा के लिए सरकारों की तुष्टिकरण की नीति को जिम्मेदार ठहराया. उन्होंने कहा कि बार-बार की धमकी के बावजूद सरकार स्वामी जी जैसे महत्वपूर्ण व्यक्ति को सुरक्षा मुहैया कराने में नाकायाब रही है और उनकी हत्या के बाद उसे माओवादी का कारनामा करार दे रही है, जो अनुचित है.
देशभर में चल रहे मिशनरी की स्कूलों पर भी सवाल उठ रहा है. कंधमाल की हिंसा के विरोध ईसाई मिशनरी स्कूलों ने बंद की घोषणा कर दी. साफ है कि ईसाई मिशनरियां मुफ्त में शिक्षा नहीं देती. अंग्रेजी शिक्षा के नाम पर भारी लूट-खरोट मचाए हुए है. इसके बावजूद वो स्कूलों में ईसाई धर्म की शिक्षा देती है. ईसाई धर्म से संबंधित किताबें बांटती है या यूं कहें धर्म परिवर्तन के लिए प्रोत्साहित करती हैं. जो ईलाका पिछड़ा है, वहां वह इस काम को अपने बूते करती भी है.
ऐसे में छद्म-निरपेक्षियों का भंडाफोड़ होना स्वाभाविक है, जो हर घटना के लिए सांप्रदायिक शक्तियों को जिम्मेदार ठहराते हैं. सत्य तो ये है कि इन्हीं लोगों की वजह से समाज में जहर घुलता जा रहा है.

शनिवार, 30 अगस्त 2008

क्यों जल रहा है कंधमाल


आठ महीनों बाद कंधमाल एकबार फिर जल उठा है. आठ महीने पहले स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती हमले को लेकर कंधमाल जल उठा है. अब बहाना है उन्हीं स्वामीजी की हत्या का. क्या स्वामी जी की हत्या ही कंधमाल की आग की वजह है या फिर कोई और? स्थानीय लोगों का मानना है कि ये आरक्षण की आग है जिसे हर कोई हर कीमत पर हासिल करना चाहता है. करीब साढ़ छह लाख की आबादी वाले कंधमाल जिले में बाबन प्रतिशत अनुसूचित जनजाति और सत्रह प्रतिशत अनुसूचित जाति के लोग रहते हैं. एक लाख के करीब यहां ईसाईयों की आबादी है. ईसाईयों की आधा से ज्यादा आबादी धर्मांतरित अनुसूचित जाति यानी एससी की है. धर्मांतरित ईसाई, पना ईसाई कहलाते हैं. पना ईसाई खुद को अनुसूचित जनजाति में शामिल किए जाने की मांग कर रहे हैं. जो कंधमाल में लगे आग की जड़ है. कानून के मुताबिक, जो अनुसूचित जनजाति धर्मांतरित होकर क्रिश्चन बन गए है उन्हें एसटी कोटे में आरक्षण का लाभ मिलता है, लेकिन अनुसूचित जाति के लोग, जिन्होंने अपना धर्म बदल लिया है उन्हें यह फायदा नहीं मिलता है. विश्व हिंदू परिषद पन्ना ईसाईयों को आरक्षण दिए जाने के विरोध में है.