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रविवार, 29 जुलाई 2012

क्या सवाल उठाना और जांच की मांग करना राष्ट्र का अपमान है?


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इन पर सवाल उठाना क्या राष्ट्र का अपमान है?

राम ने सीता की अग्नि-परीक्षा ली। क्यों ली? क्या राम को सीता पर शक था? क्या राम को अपनी पत्नी पर ही विश्वास नहीं था? क्या औरत विश्वास करने लायक नहीं होती है? जब राम को सीता पर विश्वास था तो उन्होंने सीता की अग्नि-परीक्षा क्यों ली। आखिर लोगों को सीता पर भरोसा क्यों नहीं था। क्या सीता की अग्नि-परीक्षा महिला जाति के खिलाफ है। क्या ये पुरुष के कलुषित मानसिकता का द्योतक है। क्या इससे सीता की गरिमा घटी है? क्या इससे राम की मर्यादा पर बट्टा नहीं लगा है? आखिर हरबार नारी जाति ही क्यों परीक्षा देती रहे। आखिर व्यक्तिगत परीक्षा नारी जाति की परीक्षा क्यों बन जाती है। जब राम ने सीता की अग्नि-परीक्षा ली, इसके बाद भी उन्होंने एक धोबी की बात में आकर सीता को दोबारा वन क्यों भेज दिया। क्या परीक्षा सिर्फ औरत की होती है, क्या पुरुषों की परीक्षा नहीं होती है। पुरूषों की परीक्षा क्यों नहीं होती है। अगर कोई पुरूष की परीक्षा चाहता है तो पुरुष इसके लिए तैयार क्यों नहीं होता है। प्रश्नों की सूची और भी लंबी हो सकती है। 
 
यहां मैं अपने स्तर पर हर प्रश्न का जवाब देना चाहूंगा। राम ने सीता के सतीत्व की परीक्षा के लिए अग्नि-परीक्षा ली (यहां अग्नि-परीक्षा का अर्थ कठिन परीक्षा से है)। राम को अपनी पत्नी पर शक नहीं था। राम को अपनी पत्नी पर अटूट विश्वास था, जितना विश्वास एक मर्यादा पुरूषोत्तम में होना चाहिए। औरत विश्वास करने लायक होती है। राम को अपनी भार्या सीता पर अटूट विश्वास था फिर भी उन्होंने लोगों का शक दूर करने के लिए सीता की अग्नि-परीक्षा ली। सवाल उठाना, शक करना मानव की सहज प्रवृति है, इसलिए लोगों ने सीता जैसी पवित्र स्त्री पर भी शक किया, यानी शक किसी पर भी किया जा सकता है, सवाल किसी पर भी उठाया जा सकता है। हॉं लोगों को सीता पर भरोसा नहीं था क्योंकि ये मानव की सहज प्रकृति और प्रवृति है। सीता की अग्नि-परीक्षा को नारी जाति के खिलाफ नहीं माना जा सकता है। इंसान व्यक्ति के सबसे अहम मानी जानी वाली चीज पर ही सवाल उठाता है। नारी के लिए उसका सतीत्व, उसकी लाज, उसका शील ही सर्वश्रेष्ठ है, इसलिए सीता के सतीत्व पर ही सवाल उठाया गया। इसे पुरूष के कलुषित मानसिकता का द्योतक नहीं माना जा सकता है। पुरूष ही नहीं, बल्कि खुद महिलाएं ही महिलाओं के सतीत्व, चालचलन, शील और लज्जा पर सवाल उठाती हुई देखी जा सकती हैं। किसी पुरूष प्रधान समाज नहीं, बल्कि पूरी मानव जाति की ये प्रकृति है कि वह किसी व्यक्ति की सबसे बड़ी पूंजी या सबसे बड़ी शक्ति पर ही सवाल उठाता है और उसे संदेह के घरे में लाता है। उसकी जांच कराना चाहता है। जाहिर है कि उस अग्नि-परीक्षा से सीता की मर्यादा कम नहीं हुई है और ना ही राम की मर्यादा कम हुई है। 
 
जहां तक बात हरबार नारी जाति की परीक्षा की है तो परीक्षा नारी जाती तक सीमित नहीं है। ना ही ये किसी वर्ग तक सीमित होनी चाहिए। भले ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह खुद को बचाने के लिए ये सामंतवादी तर्क दे रहे हों कि सीजर की पत्नी को संदेह से परे रखा जाना चाहिए। ये सोच उनकी हो सकती है। मगर, जनता को किसी पर भी शक और सवाल करने का हक होना चाहिए। सवाल को राष्ट्र के अपमान से जोड़ा जाना व्यक्ति के मौलिक अधिकारों के विरुद्ध है। सीता की अग्नि-परीक्षा लेने के बाद भी राम ने उन्हें जंगल भेजा क्योंकि उनकी जनता में से एक की शिकायत थी कि राम ने लंका गई सीता को वापस क्यों लाया। इस परीक्षा देना आम आदमी के लिए संभव नहीं। राम ने ऐसा किया और इसलिए तो राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं, हमारे आदर्श पुरुष हैं, हमारे भगवान हैं। सीता नारी जाति की गौरव और आदर्श हैं। आखिर ये लोग इतने श्रेष्ठ क्यों और कैसे हैं। राम ने कभी नहीं कहा कि उन्हें सीता के शील-स्वभाव और सतीत्व पर पूरा भरोसा है और वो इसकी परीक्षा नहीं कराएंगे (जैसा कि बार-बार खुद प्रधानमंत्री और सरकार के मंत्री कहते हुए देखते जा सकते हैं)। लाख विश्वास के बावजूद उन्होंने ऐसा किया ताकि जनता को सीता पर शक न रह जाए और सीता की गरिमा और मर्यादा में अभिवृद्धि हो। 
 
मगर, दुर्भाग्य है कि आज हम खुद को ईमानदार, साफ-छवि कहते हुए थकते नहीं हैं, मगर कोई अग्नि-परीक्षा देने(स्वतंत्र एजेंसी से जांच) के लिए तैयार नहीं हैं। जनता का संदेह सवालों के जरिए सामने आ रहे हैं। मगर प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि सीजर की पत्नी को संदेह के घेरे बाहर रखा जाना चाहिए। सरकार के मंत्री और सिपहसलार मान हानि के मुकदमे की धमकी देते हैं (कुछ ऐसा ही धमकी देने वाले एक केंद्रीय मंत्री को हाल ही में इस्तीफा देना पड़ा।) जनता सवाल उठाती है तो सरकार सवाल उठाने वालों को परेशान करने के लिए उसके पीछे अपना सरकारी तंत्र लगा देती है। वो राजतंत्र था जिसमें अक्सर राजाओं ने लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा की, मगर आज लोकतंत्र है जिसमें बड़े ही सुनियोजित तरीके से लोकतंत्र की हत्या की जाती है। इस हत्या में लोकतंत्र का दंभ भरने वाले राजनेता और राजनीतिक दलों के लोग शामिल होते हैं। 
 
केंद्र की यूपीए सरकार के एक वरिष्ठ नेता(पीएमओ कार्यालय में राज्य मंत्री नारायण सामी और कांग्रस प्रवक्ता राशिद अल्बी) ने सरकार पर जनता द्वारा सवाल उठाने को राष्ट्र का अपमान बता दिया और यहां तक कह दिया कि विदेशी ताकतें इन्हें निर्देशित कर रही हैं।
दरअसल, वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे के नेतृत्व में देश की जनता पिछले कुछ महीनों से भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग लड़ रही है, जिसे टीम अन्ना के नाम से जाना जाता है। इस टीम ने देश में हर स्तर पर फैले भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए विधेयक का एक मसौदा तैयार किया, जिसे जन लोकपाल नाम दिया। टीम ने इस मसौदे को कानून का शक्ल देने की मांग की, सरकार ने साफ इनकार कर दिया। अपनी मांग को लेकर अन्ना को बार-बार अनशन भी करना पड़ा। 
एकबार तो अन्ना बारह दिनों तक अनशन पर रहे। सरकार ने संसद की भावना (सेंस ऑफ पार्लियामेंट) पारित करवाया और अन्ना की तीन अहम मांगों को ज्यों का त्यों मान लेने का वादा किया। मगर, जब नया सरकारी मसौदा बना तो सरकार अपने वादे से मुकरती दिखी। सरकार के मंत्री इस लहजे में बयान देने लगे कि मुझे जैसा लगा मैंने कर दिया, आप मेरी गर्दन पर बंदूक रखकर बात नहीं मनवा सकते और सरकार ने जनता की मांग मानने से इनकार कर दिया। सरकार ने अपने मसौदे में भ्रष्टाचारियों को बचाने और इसके खिलाफ आवाज उठाने वालों को कुचलने की पूरी व्यवस्था कर दी। जहां भ्रष्टाचार के खिलाफ शिकायत करने वालों को दो साल की सजा और भ्रष्टाचारी को छह महीने की सजा का प्रावधान किया गया। भ्रष्टाचारी के लिए सरकारी वकील की व्यवस्था की गई। 

जिससे देश की जनता को लगा कि सरकार भ्रष्टाचार को खत्म नहीं करना चाहती है। सरकार ने भ्रष्टाचार का विरोध करने वालों को सरकारी तंत्र का दुरुपयोग कर सताना शुरू किया। फिर तो टीम अन्ना इस तथ्य की पड़ताल में लग गई कि आखिर सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ना क्यों नहीं चाहती है। इसके लिए टीम अन्ना को बहुत ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी। इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्रियों और आरटीआई के तहत मिले दस्तावेजों का अध्ययन किया तो पाया कि सरकार के चौंतीस में से पंद्रह मंत्री भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों से घिरे हैं। ऐसे में अगर जनलोकपाल जैसा कानून अस्तित्व में आता है तो इन मंत्रियों की जगह सरकार में नहीं बल्कि तिहाड़ में होगी। आखिर कौन सी सरकार अपनी ही गर्दन पर तलवार चलाएगी। इतना ही नहीं संसद में बैठे 162 से ज्यादा सांसदों पर भी भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं। आखिर ऐसे सांसद भला ऐसा कानून क्यों चाहेंगे, जो उन्हें ही जेल की हवा खिलाने लगे। यही वजह है कि संसद में बैठे लोग और सरकार ऐसा कोई कानून नहीं चाहती है। जनता को बेवकूफ बनाने के लिए वह कहने के लिए लोकपाल लाना चाहती है और खुद को भ्रष्टाचार के खिलाफ सबसे बड़े पैरोकार के रूप में भी पेश करना चाहती है। सरकार के जिन मंत्रियों पर टीम अन्ना ने भ्रष्टाचार के आरोप लगाए उनमें खुद प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह, पूर्व वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी, गृह मंत्री पी चिदंबरम, विदेश मंत्री एस एम कृष्णा, कृषि मंत्री शरद पवार, मानव संसाधन मंत्री और दूरसंचार मंत्री कपिल सिब्बल, कानून मंत्री सलमान खुर्शीद, शहरी विकास मंत्री कमलनाथ, विज्ञान और तकनीकी मंत्री विलासराव देशमुख, भारी उद्योग मंत्री प्रफुल्ल पटेल, जहाजरानी मंत्री जी के वासन, अक्षय ऊर्जा मंत्री फारुख अब्दुल्ला, खाद और रसायन मंत्री एमके अलागिरी, ऊर्जा मंत्री सुशील कुमार शिंदे और पूर्व मंत्री वीरभद्र सिंह(कोर्ट में भ्रष्टाचार के आरोप तय होने के बाद दिया इस्तीफा) के नाम शामिल हैं। टीम अन्ना ने इन मंत्रियों के खिलाफ सबूत भी पेश करने का दावा किया है और सबूतों की एक-एक प्रति प्रधानमंत्री कार्यालय और सोनिया गांधी को भी भेजा। टीम ने मंत्रियों के ऊपर लगे आरोपों की जांच सुप्रीमकोर्ट के जज की अगुवाई में किसी स्वतंत्र जांच एजेंसी से कराने की मांग की है, मगर सरकार ने टीम अन्ना के आरोपों को खारिज कर दिया। 
 
इन मंत्रियों पर लगे आरोप बहुत ही गंभीर किस्म के हैं। देश के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी पर कम से कम पांच गंभीर आरोप हैं। राष्ट्रपति देश के प्रथम नागरिक होते हैं, उनके खिलाफ किसी प्रकार की जांच नहीं हो सकती है। उन्हें सिर्फ और सिर्फ महाभियोग से ही हटाया जा सकता है, जो बहुत ही जटिल प्रक्रिया होती है। जब संसद के 162 सदस्यों पर गंभीर आरोप है तो सवाल उठता है कि आखिर कौन उनके खिलाफ महाभियोग चलाने के लिए आगे बढ़ेगा। यही वजह है कि टीम अन्ना ने सरकार से बार-बार उन्हें राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार नहीं बनाए जाने की अपील की। लेकिन सरकार ने एक नहीं सुनी। और सरकार की नैतिकता के पतन के चलते भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरा एक व्यक्ति देश के सर्वोच्च पद तक पहुंच जाता है, जहां उसके खिलाफ आरोपों की जांच तक नहीं हो सकती है। सरकार का कहना था कि सिर्फ मीडिया रिपोर्टों के आधार पर किसी के खिलाफ जांच नहीं की जा सकती है। सरकार का ये कुतर्क कानून के खिलाफ हैं। अगर किसी पर गंभीर आरोप लगते हैं तो बिना सबूत उसपर मुकदमा दर्ज करने का प्रावधान है। पुलिस मामला दर्ज करके ही जांच शुरू करती है और सबूत इकट्ठा करती है। मगर सरकार ने जांच कराने से ही इनकार कर दिया(आखिर वो इनकार करेगी क्यों नहीं, जांच में मंत्रियों का फंसना तो तय है ही)। सरकार ने सलाह दी कि जिनको शिकायत है वो कोर्ट जाए। मगर सवाल है कि कोर्ट तो मामले की जांच नहीं करेगा ना। जांच करेगी वही जांच एजेंसियां जो सरकार के अधीन है और क्या वो सरकार के मंत्रियों के खिलाफ जांच करेगी। चिदंबरम के खिलाफ जांच करने से इनकार कर सीबीआई इसका सबूत पहले ही दे चुकी है। 

 
इन सबके बावजूद सरकार ने आरोपी मंत्रियों के खिलाफ एसआईटी बैठाने से साफ इनकार कर दिया। प्रणब मुखर्जी राष्ट्रपति बन गए। अब उनके खिलाफ जांच नहीं हो सकती है।
प्रणब मुखर्जी के खिलाफ आरोप गंभीर किस्म के हैं।
2007 में केंद्र सरकार ने गैर-बासमती चावलों के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया। नतीजा हुआ कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में चावल के दाम आसमान छूने लगे। जिसके कारण गरीब देशों में खाने का संकट उत्पन्न हो गया। तब जाकर भारत सरकार ने मानवीय आधार पर बाजार से कम कीमत पर बीस गरीब देशों को चावल देने की घोषणा की। मगर, भारत सरकार ने सीधे वहां की सरकारों को चावल निर्यात करने बजाय अमीरा फुड्स को चावल एक्सपोर्ट कर दिया और अमीरा फुड्स ने बाजार की कीमत पर वहां की सरकारों को चावल बेचा। जब घाना की सरकार बदली तो उसने इस मामले की जांच कराई। साथ ही घाना की सरकार ने भारत सरकार को पत्र लिखकर मामले की जांच कराने की मांग की। घाना की सरकार ने इस घोटाले में भारत के जिन मंत्रियों की भूमिका की जांच की मांग की वो हैं-- प्रणब मुखर्जी और आनंद शर्मा।
प्रणब मुखर्जी पर दूसरा आरोप नेवी वार रूम लीक मामले से जुड़ा हुआ है। जो कि देश के रक्षा मामलों से जुड़ा हुआ अत्यंत गंभीर मामला है।
आउटलुक की रिपोर्ट के मुताबिक, जुलाई 2007 में नेवी वार रूम से एक पेनड्राइव लीक हुई। पेन ड्राइव कमांडर विंग कमांडर एसएल सुरवे के घर से मिले। पेनड्राइव के दस्तावेजों में भारतीय सेना रक्षा खरीदारी, भारत की भावी रक्षा तैयारी की जानकारी थी। ये दस्तावेज अभिषेक वर्मा, रविशंकरन और कुलभूषण पराशर को दी गई। रविशंकरन नौसेना का रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कमांडर है जिसने ये जानकारी स्कॉर्पियन पनडुब्बी के निर्माता थेल्स को ये जानकारी दी।
जुलाई 2005 में जब इस घोटाले का खुलासा हुआ तो दिसंबर 2005 में नौसेना ने आंतरिक जांच(सीबीआई जांच नहीं) के आदेश दिए। और इस जांच के आधार पर नेवी के तीन कमांडरों, विजेंद्र राणा, विनोद कुमार झा और कैप्टन कश्यप कुमार को बिना किसी मुकदमे के नेवी से निकाल दिया गया। इनके निष्कासन की वजह "राष्ट्रपति की इच्छा” बताई गई(ऐसी वजह जिसका इस्तेमाल नगण्य ही होता है)। इन पर रिश्वत लेकर गोपनीय दस्तावेज लीक करने का आरोप था, मगर बगैर मुकदमा चलाए इन्हें नौसेना से बाहर कर देना आश्चर्यजनक था। सच्चाई थी कि नेवी ने इतने बड़े मामले की जांच की जिम्मेदारी डेढ़ साल तक सीबीआई को नहीं सौंपी। इस मामले में आरोप है कि रविशंकरन को बचाने के लिए ही, जानबूझ कर इसकी जांच में देरी की गई।
सीएनएन-आईबीएन पर करण थापर के इंटरव्यू में तत्कालीन रक्षा मंत्री प्रणब मुखर्जी ने कहा था कि इस पेन ड्राइव में देश की रक्षा से जुड़ी जानकारी नहीं थी, बल्कि व्यवसायिक जानकारी थी। जबकि डेढ़ साल बाद आई सीबीआई जांच रिपोर्ट में कहा गया है कि इस पेन ड्राइव में देश की रक्षा से जुड़ी अहम जानकारी थी। आखिर प्रणब मुखर्जी के झूढ की वजह क्या थी। क्या इसकी जांच इस देश के लिए जरूरी नहीं है. नवंबर 2005 में रविशंकरन सहित अन्य लोगों को देश से बाहर जाने दिया गया।
पेन ड्राइव में मौजूद जानकारी स्कॉर्पियन बनाने वाली कंपनी थेल्स तक पहुंच चुकी थी। अक्टूबर 2005 में 18000 करोड़ का स्कॉर्पियन पनडुब्बी सौदा हुआ। इस सौदे पर तत्कालीन रक्षा मंत्री प्रणब मुखर्जी ने हस्ताक्षर किया था।
आरोप है कि इस सौदे में दलालों ने अहम भूमिका निभाई थी। देश के कानून के तहत रक्षा सौदों में दलाली की अनुमति नहीं है। इस सौदे में अभिषेक वर्मा और स्कॉर्पियन बनाने वाली कंपनी थेल्स के बीच
ईमेलों का आदान-प्रदान हुआ। थेल्स कंपनी ने लिखा कि इस सौदे में 4 प्रतिशत की कमीशन मांगी जा रही है, जो संभव नहीं है इसलिए वो सरकार द्वारा नामित कांग्रेस पार्टी के खजांची या किसी ऐसे व्यक्ति से बातचीत करना चाहते हैं। जवाब में अभिषेक वर्मा ने लिखा कि वो ही इस सौदे में कांग्रेस पार्टी का प्रतिनिधित्व करेंगे। कुछ दिनों बाद थेल्स कंपनी चार प्रतिशत चार प्रतिशत का कमीशन देने के लिए तैयार हो गई। सवाल उठता है कि क्या प्रणब मुखर्जी को इसकी जानकारी थी। अगर नहीं तो प्रणब मुखर्जी इसकी जांच से कतरा क्यों रहे हैं। क्या देश की रक्षा से जुड़ी इतनी अहम जानकारी के विदेशी कंपनियों के हाथ पहुंचने के मामले की जांच देश के लिए जरूरी नहीं है।
प्रणब मुखर्जी पर एक और बड़ा आरोप है और वो है किसी स्वतंत्र वित्तीय जांच एजेंसी की जांच प्रक्रिया में बाधा डालने और देश की जनता के साथ धोखाधड़ी करने का।
सेबी के पूर्णकालिक सदस्य के एम अब्राहम ने प्रधानमंत्री को तीन पत्र लिखकर(जिसमें से एक पत्र आईटीआई के जरिए मीडिया में सार्वजनिक हो चुका है) कहा है कि वित्तमंत्री और उनके दफ्तर(प्रणब मुखर्जी और उनके दफ्तर पढ़ें) से उन पर दबाव डाला जा रहा है कि सेबी के अंदर कुछ मामलों को रफा-दफा कर दिया जाए। अब्राहम ने लिखा कि वो रिलायंस, सहारा और बैंक ऑफ राजस्थान के कुछ गंभीर मामलों की जांच कर रहे हैं, लेकिन उनके सीनियर उनसे सवाल करते हैं कि क्या आप उन मामलों को मैनेज कर सकते हैं और वो कई बार बातचीत में कह चुके हैं कि इसमें कुछ बड़े लोग, खासकर वित्तमंत्री इनमें रुचि ले रहे हैं। उन्होंने लिखा कि उनके सीनियर जब कभी वित्तमंत्री से मिलने दिल्ली जाते हैं तो वो सभी सदस्यों से सभी मामलों की रिपोर्ट बनाने कहते हैं- जो जांच प्रक्रिया में सीधा-सीधा हस्तक्षेप है। जब मैंने व्यक्तिगत प्रताड़ना की शिकायत की तो वो कई बार कह चुके हैं कि वो उस महिला को जानते हैं जो इसके पीछे है और वो है ओमिता पॉल- जो वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी की सचिव हैं। इस मामले में प्रधानमंत्री ने कुछ नहीं किया। उलटे अब्राहम जैसे अधिकारी को प्रताड़ित किया जा रहा है।
इतने आरोप अकेले प्रणब मुखर्जी(जो अब राष्ट्रपति बन चुके हैं) पर हैं। बाकी आरोपी मंत्रियों पर गंभीर किस्म के आरोप हैं। इन आरोपों की जांच होनी चाहिए थी लेकिन खुद कानून मंत्री टीम अन्ना पर आरोप लगा रहे हैं। ये कितना हास्यास्पद है कि सरकार अपने नागरिकों पर आरोप लगा रही है। जब टीम अन्ना पर आरोप है तो उन्हें जांच से कौन रोक रहा है। सरकार क्यों नहीं इन लोगों को न्याय के कटघरे तक पहुंचा रही है, क्यों नहीं सजा दिलवा रही है।
जब विद्रोही कडप्पा सांसद जगन मोहन की बारी आती है तो उन्हें छह महीने के भीतर जेल पहुंचा दिया जाता है, सीबीआई अति सक्रिय हो उठती है, मगर जब बारी लालू, मुलायम, मायावती की आती है तो दशकों तक फाइल दफ्तरों में धूल फांकती है। जब कभी समर्थन की जरूरत होती है तो सीबीआई सक्रिय हो उठती है। क्या आखिर यही सीबीआई अपने आहारदाता सरकार के मंत्रियों के खिलाफ लगे मुकदमों की जांच करेगी। क्या सीबीआई ने पहले कभी ऐसा किया है, जो आज करेगी।

जनता की निराशा अपने चरम तक पहुंच चुकी है। प्रणब मुखर्जी के राष्ट्रपति बनने के बाद तो जनता ने मान लिया कि बेशर्म हो चुकी सरकार भ्रष्टाचार को देश के सबसे ऊंचे पद पर प्रतिष्ठित कर सकती है। कई लोग को भ्रष्टाचार को वैधानिक दर्जा दिलाने की बात करते थे, मगर यूपीए की सरकार ने तो भ्रष्टाचार को राष्ट्रपति पद तक पहुंचा दिया। सरकार ने औपचारिक जांच कराकर मामले की लीपापोती करना भी उचित नहीं समझा और प्रणब मुखर्जी को राष्ट्रपति बना दिया।

मंगलवार, 26 जुलाई 2011

ए राजा, बड़े नमक हराम हो जी तुम


ए राजा, ए क्या कर रहे हो। अभी तो छह महीने भी नहीं हुए। अभी से डंक मारने लगे हो। वो उसी मधु-छत्ते को। जिसमें तुम कभी रहते थे। तुम्हें कितने प्यार से रखा जाता था। सब तुम्हारी खातिरदारी करते थे। जारी खुदाई एक तरफ, जनाब मनमोहन एक तरफ। सरकारी बनी। तुम्हारा विरोध हुआ। फिर भी मनमोहन तुम्हें अपने पाले में ही ले ही लिए। तुम्हें बचाने के लिए सेफरॉन-टेरर थ्योरी का इजाद हुआ। भले ही विफल हो गया। मगर हुआ ना। तुम्हारे लिए जीरो लॉस थ्योरी का इजाद हुआ। तुम नहीं बच सके। मगर इजाद तो हुआ न। जितना बन सका। सबने किया। तुम्हारे लिए एक महीने से ज्यादा संसद का काम कुर्बान किया। इससे ज्यादा हम क्या कर सकते हैं। बेटा बड़का कोरट को कौन समझा सकत है। तुम्ही बताओ। हम तोहार के बचावे खातिर कि-कि नैय करते हैं। मगर तु हौ कि समझवे नय करता है। ये यार अभी भी लगे हुए मगर, तुम क्या कर रहे हो। कभी प्रधानमंत्री के नाम ले रहे हो तो कभी वित्तमंत्री के औरो तो और कानून मंत्रालय को भी नय छोड़ रहे हो। यार। तुमको समझ में नय आता है कि इस प्रधानमंत्री पर आरोप लगाना सूरज पर थूकने जैसा है। ई हम नय कांग्रेस प्रवक्ता कह रहे है। अब समझो सूरज पर थुकोगे तो किस पर पड़ेगा। यार जितना बन सका किया। जितना हो सका तुमको लूटने दिया। कभी रोका। कभी कोई जीओएम बनाया। तुमने जैसा कहा वैसा होने दिया। कभी पब्लिक का, कोरट का, ख्याल किया। नय न। फिर क्यों सबको कोर्ट में घसीट रहे हो। अरे प्रधानमंत्री अकेला आदमी होता है तुम्हारे कौन-कोन से काम पर ध्यान रखेगा। कहा था जैसा लगे कर लो। और क्या चाहिए। मगर तुम सबको घिसियाय रहे हो। शरम नय आती है। बड़े नमक हराम होजी।

सोमवार, 27 जून 2011

सरकार भी करती है षडयंत्र, चरित्रहनन


आचार्य बालकृष्ण का कार्यक्रम नेशनल चैनल यानी दूरदर्शन पर चलता था, तब बालकृष्ण फर्जी व्यक्ति नहीं थे। जब चार-चार मंत्री रामदेव की अगुवाई करने गए, तब रामदेव ठग नहीं थे। प्रशांत भूषण वर्षों से सुप्रीमकोर्ट में वकालत करते हैं, तब वो दलाल नहीं थे। सालों से मंदिर में सोए रहे अन्ना आरएसएस का मुखौटा नहीं थे। उनके संपत्ति की जांच नहीं गई। लेकिन आज जब इन लोगों ने भ्रष्टचार और कालेधन के खिलाफ आवाज उठाया तो बालकृष्ण फर्जी व्यक्ति हो गए, रामदेव ठग हो गए, प्रशांतभूषण राजस्व चोर हो गए, अन्ना हजारे आरएसएस का मुखौटा हो गए। क्या ये समझना किसी अंधे-बहरे व्यक्ति के लिए भी मुश्किल है। ये सरकार लोगों को ठग बनाती है, चोर बनाती है, फर्जी बनाती है, आरएसएस का मुखौटा बनाती है। वो भी उन लोगों को जो उसके खिलाफ जबान खोलते हैं। मीडिया को खरीदकर खुलकर ईमानदार घोषित करती है। भ्रष्टाचारियों को शह देती है। ऐसे में भ्रष्टाचार मिटेगा कैसे। कैसे होगा कालेधन का खात्मा। दरअसल, इस कालेधन में सरकार के कई मंत्रियों, विपक्षी दल के नेताओं की हिस्सेदारी है, सोनिया, राहुल, राजीव गांधी का पैसा है। स्वीस पत्रिका में स्वीस बैंक में राजीव गांधी के बैंक खाते होने की बात कही थी, लेकिन गांधी-नेहरू परिवार ने इस रिपोर्ट का खंडन नही किया। आखिर क्यों। अब जब विरोधी यही आरोप उनपर लगा रहे हैं तो सरकार उनका गला घोंट देना चाहती है। उनकी जुबान बंद कर देना चाहती है। आखिर इन लोगों ने पैसा जमा करने के लिए कितने ही पापड़ बेले। अब आखिर सरकार इनकी पोल कैसे खुलने देगी। यही वजह है कि सरकार अच्छे लोगों का चरित्र हनन करती है। आनेवाले समय में भी सरकार भ्रष्ट लोगों को बचाने के लिए सारे संवैधानिक मर्यादाओं को लांघने और संवैधानिक की हत्या करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ेगी। इसलिए सरकार भ्रष्टाचार पर लगाम लगाएगी, और मनमोहन अपनी छवि सुधारेंगे यह सोचना मूर्खता है। सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया, आखिर मनमोहन सिंह अहसानफरामोश कैसे हो जाएंगे। वो सोनिया गांधी की कृतज्ञता के बोझ से दबे हुए हैं आखिर वो कृतध्न कैसे हो जाएगे। एक व्यक्ति जो एक पंचायत का चुनाव नहीं जीत सकता है वो व्यक्ति दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का प्रधानमंत्री है। वो अहसान की कीमत को चुकाएगा ही। मनमोहन वही कीमत चुका रहे हैं। कई लोग कहते हैं कि सोनिया के अहसानों का मोल चुकाने के लिए वो देश के साथ विश्वासघात कर रहे हैं। जनता को धोखा दे रहे हैं तो उसका भी जवाब है कि इस देश की जनता ने मनमोहन को वोट कहां दिया है। आखिर जनता ने मनमोहन सिंह पर कौन सा उपकार किया जो वो जनता के प्रति कृतज्ञ बनें रहेंगे। मनमोहन सिंह तो सोनिया गांधी के कर्ज तले दबे हुए हैं। वो तो उन्हीं का कर्ज उतारेंगे। इसलिए मनमोहन सिंह से अपेक्षा करना व्यर्थ है। अभी और अभी मनमोहन सिंह का सिर्फ एक और एक मात्र मकसद है और वो है येन-केन-प्रकारेन साम-दंड-भय-भेद के जरिए कुर्सी से चिपके रहना ताकि ज्यादा से ज्यादा समय तक सोनिया अम्मा की सेवा की जा सके। घोटालों से घिरे गांधी नेहरू परिवार को घोटालों से बचाया जा सके। और मनमोहन सिंह यही कर रहे हैं। इसके लिए उन्हें दिग्विजय और सिब्बल जैसे ताल-बैताल को षडयंत्र, दुष्प्रचार, प्रतिष्ठा हनन, चरित्र हनन का ठेका दे रखा है। ये ताल-बैताल अपनी भूमिका बखूबी अदा कर रहे हैं। कभी प्रशांत-भूषण के खिलाफ सीडी निकाल रहे हैं, तो कभी अन्ना और रामदेव के खिलाफ सीबीआई लगा रहे हैं, कभी रामदेव को ठग कह रहे हैं तो बालकृष्ण को फर्जी व्यक्ति करार दे रहे हैं। कपिल सिब्बल कभी रामदेव से बात करते हैं तो कभी उनकी हत्या के लिए पांच हजार पुलिस को लगा देते हैं। यानी जो कोई इनके कुकृत्यों के खिलाफ बोलेगा उनका हाल रामदेव जैसा होगा। पिग्गी सिंह तो अन्ना हजारे को भी रामदेव की तरह कार्रवाई के लिए तैयार रहने की चेतावनी दे डाली है। एक तरफ सरकार का षडयंत्र, सरकारी लठैत, बेलगाम पुलिस दूसरी तरफ निहत्थी जनता और सिविल सोसायटी के लोग। देखते हैं ये लड़ाई और कितनी लंबी चल पाती है।
लेकिन इन सबमें विपक्षी पार्टी भाजपा और कम्युनिष्टों की भूमिका कम निंदनीय नहीं है। ये पार्टियां भी आंदोलनकारियों को समर्थन करने के बजाय सरकार का हाथ मजबूत करने में लगी हैं। ये पार्टियां नहीं चाहती हैं कि कोई सशक्त लोकपाल कानून बने, विदेशों में जमा कालेधन को वापस लाने के लिए कोई पहल हो। ये पार्टियों तो सिर्फ और सिर्फ राजनीति करना जानती हैं। ये पार्टियां कभी जनता के हाथ से लड़ाई हाइजैक करना चाहती है तो कभी सरकार के सुर में सुर मिलाती है। जाहिर है कि विदेशों में जमा कालेधन में इनकी भी हिस्सेदारी है। जब चेहरे बेनकाब होंगे तो इनका चेहरा भी सबके सामने होगा। आखिर ये पार्टियां क्यों चाहेगी कि भ्रष्टाचार और कालेधन के खिलाफ कोई कानून बने। क्या इनके पास येदियुरप्पा जैसे मुख्यमंत्री नहीं हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई को ये क्यों बर्दाश्त करेंगी, क्योंकि ऐसा होने से इनके भी दर्जनों नेता जेल में होंगे। ऐसे में भ्रष्टाचार रुकेगा इसकी आशा बिल्कुल नहीं की जानी चाहिए। कालेधन पर कोई कार्रवाई होगी। इसकी उम्मीद बिल्कुल नहीं की जानी चाहिए। सरकार का षडयंत्र, दमनचक्र जारी रहेगा। और ये सिलसिला तब रुकेगा जब जनता खुलकर आंदोलन करेगी और भ्रष्टाचारियों को सबक सिखाएगी।

सोमवार, 20 अक्टूबर 2008

एक मुसलमान सौ बेईमान


सबसे पहले, दो घटनाओं का जिक्र करना चाहूंगा. पहली, कांग्रेस के मुस्लिम नेताओं ने शनिवार को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाकात कर उन्हें जामियानगर के बाटला हाउस मुठभेड़ कांड को लेकर अल्पसंख्यक समुदाय में उठ रही शंकाओं से अवगत कराया और इसे दूर करने के लिए तत्काल प्रभावी कदम उठाए जाने की मांग की. इस प्रतिनिधिमंडल में कांग्रेस महासचिव मोहसिना किदवई, पूर्व केंद्रीय मंत्री सी के जाफर शरीफ, सलमान खुर्शीद, राज्यसभा के उपसभापति के रहमान खान, अल्पसंख्यक विभाग के अध्यक्ष इमरान किदवई और अनीस दुर्रानी शामिल थे.

दूसरी घटना, देवबंद विचारधारा के संगठन जमीयत उलेमा--हिंद के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि शिवराज पाटिल के गृहमंत्री पद पर रहते दहशतगर्दी का खात्मा नामुमकिन है. मदनी ने केंद्र सरकार कटघरे में खड़ा करते हुए कहा कि आतंकवादी वारदातों के लिए गृहमंत्री मुसलमानों को कसूरवार मान रहे हैं. मदनी का यह तर्क गृहमंत्रालय के उस बयान पर आया है जिसमें मंत्रालय बार-बार दोहराता रहा है कि आतंकी वारदातों के पीछे अयोध्या में विवादित ढांचा तोड़े जाने और 2002 का गुजरात दंगा है.


योग्यता विस्तार- पहली घटना. दिल्ली बम धमाकों के बाद मीडिया ने टेप रिकॉर्डर छाप गृहमंत्री को पहले उनके बयानों, फिर उनके मॉडलिंग स्टाईल को लेकर खूब हंगामा किया. की मुखरता ने लामीडियालू जैसे सिमी समर्थकों की, कुछ देर के लिए ही सही, जुबान बंद करा दी. लालू आनन-फानन में प्रधानमंत्री के पास गए और गृहमंत्री की जमकर शिकायतें की. बाद में वे सोनिया से मिले. लेकिन सोनिया की विनम्रता भरी फटकार ने लालू को बयान बदलने के लिए मजबूर कर दिया. लालू, सोनिया के विनम्र फटकार पर निरुत्तर हो गए कि एक तरफ तो आप सिमी जैसे संगठनों के पक्ष में सार्वजनिक बयान देते हैं और जब बम विस्फोट होता है तो आप गृहमंत्री और खुफिया विभाग के ऊपर नाराजगी जताते हैं, ऐसा बिल्किल नहीं चलेगा.

सिमी पर साल 2006 में प्रतिबंध लगा था, तब तक लेकर हाल के दिनों तक केंद्र सरकार उसके विरूद्ध पर्याप्त सबूत कोर्ट में पेश नहीं कर सकी. इसलिए दिल्ली हाईकोर्ट के विशेष न्यायाधिकरण ने सबूतों के अभाव में सिमी पर से प्रतिबंध हटाने का निर्देश दिया.

इसके बाद, लालू, मुलायम और रामविलास पासवान के पर निकल आए. सबने सिमी के समर्थन में जोर-जोर से चिल्लाना शुरू कर दिया. उनका कहना था कि सिमी पर प्रतिबंध लगाया जाता है तो बजरंग दल, दुर्गावाहिनी और विश्व हिंदू परिषद पर भी प्रतिबंध लगे.

केंद्र सरकार ने अपने ही सहयोगियों के इस गैर-जिम्मेदाराना हरकत पर कुछ नहीं कहा, लेकिन वो तुरंत सुप्रीमकोर्ट पहुंचकर न्यायाधिकरण के आदेश पर रोक लगाने की अपील की और कोर्ट ने उसकी बात मान भी ली. बाद में केंद्र ने हाल के दिनों में हुए बम धमाकों में सिमी के हाथ होने का सबूत कोर्ट में पेश किया. फिलहाल सिमी पर प्रतिबंध जारी है. लेकिन लालू, मुलायम और रामविलास पासवान के बयान ने खुद केंद्र सरकार को कटघरे में ला खड़ा किया.

हाल के दिनों में अहमदाबाद, बैंगलोर और दिल्ली में बम धमाके हुए. केंद्रीय गृहमंत्री शिवराज पाटील के नरम रवैये पर सवाल उठे तो लालू यहां भी शामिल हो गए और सोनिया से फटकार सुनी.

बाटला हाउस मुठभेड़ पर पहले अमर सिंह, फिर ममता बनर्जी, फिर कांग्रेसी के मुस्लिम नेताओं ने सवाल उठाए और मामले की जांच की मांग की. इस मांग में रामविलास पासवान, सीपीएम महासचिव प्रकाश करात और सीपीआई महासचिव ए बी बर्धन शामिल हो गए.

सब का एक स्वर से कहना था कि निर्दोष मुसलमानों को निशाना बनाया गया. मुठभेड़ फर्जी थी. अमर सिंह ने तो यहां तक कह दिया कि शहीद एमसी शर्मा को स्पेशल सेल से निलंबित कर दिया गया था और वह बहाली के लिए दफ्तरों का चक्कर काट रहा है. अमर सिंह ने तो बेशर्मी की हद करते हुए कहा कि किसी पुलिस वाले ने ही उसे गोली मारी थी.

इतनी बेह्याई, इतनी निर्लज्जता, महज चंद वोटों के लिए.

महज चंद वोटो के लिए, पूरे मुस्लिम समाज को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की जा रही है. महज चंद वोटों के लिए ये लोग देश के साथ गद्दारी कर रहे हैं.

जब कभी आतंकवाद से लड़ने की बात आती है, आतंकवाद से लड़ने के लिए कानून बनाने की बात आती है, तो कहते हैं कि इस कानून का दुरूपयोग होगा. साफ-साफ कहते हैं कि अल्पसंख्यकों को परेशान किया जाएगा.

देश में किस चीज का दुरूपयोग नहीं होता है. विधायिका, न्यायिका, कार्यपालिका सबका दुरूपयोग होता है. पुलिस, जज, नेता खरीदे जाते है और बिकते हैं. तो क्या संसद, विधानसभाओं, अदालतों, पुलिस मुख्यालयों को भंग कर दिया जाय.

एक समुदाय जिसे कभी राष्ट्र की मुख्यधारा में एक साजिश के तहत शामिल नहीं होने दिया गया, कभी शाहबानो तो कभी अफजल के नाम पर मुसलमानों को ठगा जाता रहा है.

इनका वोट हासिल करने के लिए सभी राष्ट्र के साथ गद्दारी में जुटे हैं.