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बुधवार, 16 मार्च 2011
हृद्यांजलि पर प्रकाशित लेखों की सूची
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मंगलवार, 10 नवंबर 2009
बुद्धिजीवियों की बुद्धि पर सवाल
एकबार फिर देश के तथाकथित बुद्धिजीवियों की बुद्धि पर सवाल उठ रहे हैं. ऐसा पहलीबार नहीं है कि देश के बुद्धिजीवियों पर सवाल खड़े किए जा रहे हों. देश के तथाकथित बुद्धिजीवियों पर सवाल पहले भी उठते रहे हैं. लेकिन पहले इन सवालों को खारिज कर दिया जाता था. लेकिन इसबार सवाल उठाने वाला मंच ही ऐसा है जिस
जय हिंदी जय भारत
जय हिंदी जय भारत
शनिवार, 31 अक्टूबर 2009
इंदिरा गांधी को याद करवाया जा रहा है
न्यूज चैनलों पर चल रहे है इंदिरा स्मरण एपिसोड को देखकर आसानी से समझता जा सकता है कि कुछ लोग इस देश को कैसे चला रहा है.
प्रेमचंद ने ठीक ही कहा था कि गवर्नमेंट कुछ पढ़े लिखे लोगों(निहायत ही चालाक) द्वारा गरीबों को दबाने के लिए बनाया गया संगठन है.
टेलीविजन चैनलों पर चला रहे इंदिरा एपिसोड का अर्थ ये बिल्कुल नहीं लगाया जाना चाहिए कि अचानक टेलीविजन चैनलों को इंदिरा प्रेम उत्पन्न हो गया है या वे इंदिरा गांधी के कथित योगदान को याद कर रहे हैं. दरअसल ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है. बल्कि टेलीविजन चैनलों को उनकी हैसियत के हिसाब से पैसे दिए गए, उसी के अनुसार उसे वीडियो फुटेज मुहैया कराए गए और कांग्रेसी भक्तों द्वारा प्रत्येक एपीसोड की पटकथा तैयार की गई-
चैनलों पर चल रहे कुछ कार्यक्रमों की बानगी-
इंदिरा बिन इंडिया-
कतरा-कतरा हिंदुस्तान.. आदि
इंदिरा स्मरण एपिसोड में जनता के टैक्स के पैसे पानी की तरह बहाए जा रहे हैं. चैनलों को लाखों-करोड़ों रुपये दिए जा रहे हैं. चुनाव प्रसार के तर्ज पर.
ये सब ऐसे समय में हो रहा है, जबकि पूरे देश के लोग उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती द्वारा उत्तरप्रदेश में बनाए जा रहे स्मारकों पर सवालिया निशान खड़े रहे हैं. मायावती पर जनता के पैसे के दुरुपयोग का आरोप लग रहा है. आखिर, कोई केंद्र सरकार से पूरे कि इंदिरा संस्मरण एपिसोड पर खर्च किए जा रहे ये पैसे क्या जनता के नहीं हैं और क्या इनका सदुपयोग हो रहा है.
जनता को इमोशनली(भावनात्मक रूप से) ब्लैकमेल करने का हथकंडा अगर कांग्रेस अपना सकती है तो मायावती क्यों नहीं. आखिर इंदिरा गांधी ने सत्तर के दशक में देश के गरीबी हटा दी थी. फिर आज राहुल बाबा क्यों चिल्ला रहे हैं कि ये गरीबों का देश है. आखिर क्यों(राहुल के ही शब्दों में) सरकारी पैसा जनता तक नहीं पहुंचती है. आखिर किसने भ्रष्टाचार को बढ़ाया. आखिर किसने भ्रष्टाचारियों को संरक्षण दिया. राहुल बाबा ने आखिर क्वात्रोकी ड्रामें में वे विद्रूप क्यों बने रहे.
प्रेमचंद ने ठीक ही कहा था कि गवर्नमेंट कुछ पढ़े लिखे लोगों(निहायत ही चालाक) द्वारा गरीबों को दबाने के लिए बनाया गया संगठन है.
टेलीविजन चैनलों पर चला रहे इंदिरा एपिसोड का अर्थ ये बिल्कुल नहीं लगाया जाना चाहिए कि अचानक टेलीविजन चैनलों को इंदिरा प्रेम उत्पन्न हो गया है या वे इंदिरा गांधी के कथित योगदान को याद कर रहे हैं. दरअसल ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है. बल्कि टेलीविजन चैनलों को उनकी हैसियत के हिसाब से पैसे दिए गए, उसी के अनुसार उसे वीडियो फुटेज मुहैया कराए गए और कांग्रेसी भक्तों द्वारा प्रत्येक एपीसोड की पटकथा तैयार की गई-
चैनलों पर चल रहे कुछ कार्यक्रमों की बानगी-
इंदिरा बिन इंडिया-
कतरा-कतरा हिंदुस्तान.. आदि
इंदिरा स्मरण एपिसोड में जनता के टैक्स के पैसे पानी की तरह बहाए जा रहे हैं. चैनलों को लाखों-करोड़ों रुपये दिए जा रहे हैं. चुनाव प्रसार के तर्ज पर.
ये सब ऐसे समय में हो रहा है, जबकि पूरे देश के लोग उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती द्वारा उत्तरप्रदेश में बनाए जा रहे स्मारकों पर सवालिया निशान खड़े रहे हैं. मायावती पर जनता के पैसे के दुरुपयोग का आरोप लग रहा है. आखिर, कोई केंद्र सरकार से पूरे कि इंदिरा संस्मरण एपिसोड पर खर्च किए जा रहे ये पैसे क्या जनता के नहीं हैं और क्या इनका सदुपयोग हो रहा है.
जनता को इमोशनली(भावनात्मक रूप से) ब्लैकमेल करने का हथकंडा अगर कांग्रेस अपना सकती है तो मायावती क्यों नहीं. आखिर इंदिरा गांधी ने सत्तर के दशक में देश के गरीबी हटा दी थी. फिर आज राहुल बाबा क्यों चिल्ला रहे हैं कि ये गरीबों का देश है. आखिर क्यों(राहुल के ही शब्दों में) सरकारी पैसा जनता तक नहीं पहुंचती है. आखिर किसने भ्रष्टाचार को बढ़ाया. आखिर किसने भ्रष्टाचारियों को संरक्षण दिया. राहुल बाबा ने आखिर क्वात्रोकी ड्रामें में वे विद्रूप क्यों बने रहे.
शनिवार, 17 अक्टूबर 2009
भूख का दर्द
भूख लेखकों, कवियों, कलाकारों का पसंदीदा विषय रहा है, लेकिन यह सबसे पसंदीदा विषय रहा है लेखकों का. नेता इसी शब्द की कलाबाजियां दिखाकर चुनाव जीतते हैं, मगर दुर्भाग्य है कि वहीं नेता इस भूख को मिटाने के बड़े-बड़े दावे भी करते हैं. नेताओं के इस दोमुंहेपन से भूख बहुत ही दुखी है, भूख के ही मुंह से ही सुनिए.. उसके दर्द की कहानी.
मैं भूख हूं, शायद दुनिया का सबसे प्रभावशाली शब्द, शायद सबसे ताकतवर भाव. भूख इंसान को भीख मांगने के लिए मजबूर कर देता है. भीख मांगने वाले को लोग भिखारी कहते हैं, उससे घृणा करते हैं.. मगर एक कवि जब कहता है..
वह आता
दो टूक कलेजे को करता
पछताता पथ पर आता
पेट पीठ दोनों मिलकर हैं एक
चल रहा लकुटिया टेक
मुट्ठी भर दाने को
भूख मिटाने को
वह आता
दो टूक कलेजे को करता
पछताता पथ पर आता
भिखारी को भिक्षुक कहने वाला यह कवि महाकवि बन जाता है.
एक दूसरा कवि कहता है..
स्वानों को मिलते दूध-वस्त्र
व्याकुल बच्चे अकुलाते हैं
मां की हड्डी से चिपक ठिठुर
जाड़े की रात बिताते हैं
और यह कवि राष्ट्र कवि बन जाता है.
मैंने यानी भूख ने कितने ही कवियों, लेखकों, फिल्मकारों को नाम, अपार शोहरत और दौलत दी, उस भूख को ही हमारे नेता मिटाने की बात करते हैं. आप ही सोचिए किसी को मिटाने की बात करना कितना बड़ा गुनाह है. ये बात कोई चोरी चुपके नहीं करता बल्कि मुझे मिटाने के लिए लोग घोषणाएं करते हैं. कांग्रेस कहती है कि गरीबी हटाओ, तो भाजपा कहती है भय, भूख और भ्रष्टाचार के खिलाफ भाजपा को वोट दें. मुझे मिटाने की बात सिर्फ भारत के ही नेता नहीं, बल्कि दुनिया की सबसे बड़ी पंचायत संयुक्त राष्ट्र से भी होती रहती है.
आखिर मुझमें क्या कमी है जो लोग मुझे मिटाना चाहते हैं. मैं दुनिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती हूं. मुझपर हर कोई विजय पाना चाहता है. लेकिन मैं मिटनेवाली नहीं हूं, आसानी से तो बिल्कुल ही नहीं. मैं बहुत ताकतवर हूं, लेकिन जब इंसान मेरी वजह से मौत के मुंह में जाता तो, तो मेरा दिल भी द्रवित हो जाता है, मैं भी रोने लगती हूं. आखिर हर उस इंसान के साथ मेरी भी तो मौत होती है. इंसान एकबार मरता है और मैं बार-बार मरती हूं. मुझे भी इससे छुटकारा चाहिए. लेकिन मैं खुद ही नहीं मिट सकती हूं न. मुझे मिटानेवाला कोई चाहिए. अगर कोई मेरी बात सुन रहा हो तो मैं उससे कहना चाहती हूं कि जितना पैसा, जितना संसाधन तुम हथियार बनाने में खर्च करते हो, उसका एक चौथाई भी अगर मुझपर खर्च कर दो तो मैं मिट सकती हूं. अंत में, मैं सिर्फ इतना कहना चाहती हूं कि घोषणाएं करना छोड़ो और सच्चाई को कबूलो, नहीं तो मैं बार-बार और हरबार तुमको चुनौती देती रहूं.
गुरुवार, 15 अक्टूबर 2009
बुद्धिजीवियों का क्रूर चेहरा
देश के लिए कलंक बन चुके तथाकथित बुद्धिजीवियों और सेल्युलरों का एक और क्रूर चेहरा सामने आया है. इन लोगों ने केंद्र सरकार की उस योजना के खिलाफ तर्राष्ट्रीय अभियान शुरू किया है, जिसके तहत केंद्र सरकार नवंबर के पहले सप्ताह से नक्सल प्रभावित राज्यों
महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, पश्चिम बंगाल में माओवादियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई करने जा रही है. इन लोगों ने प्रधानमंत्री के नाम एक खुले पत्र पर हस्ताक्षर अभियान शुरू किया है. पत्र में लिखा गया गया है कि
सरकार महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, आंध्रप्रदेश, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, झारखंड में नक्सलियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की योजना को तत्काल वापस ले. क्योंकि इस कार्रवाई से जंगल में रह रहे लाखों गरीब और आदिवासी बेघर होंगे, उनके सामने पुनर्वास की समस्या आ खड़ी होगी. इससे गरीब लोगों की पहले से खराब हालत और खराब हो जाएगी. और इससे जबरदस्त मानवीय त्रासदी पैदा होगी. इस अभियान से आदिवासियों का अपमान होगा और मानवाधिकार का व्यापक उल्लंघन होगा. आगे पत्र में कहा गया है कि पहले ही विभिन्न सरकारी अभियानों से छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल में हजारों लोग बेघर हो चुके हैं और सैंकड़ों की संख्या में लोग मारे जा चुके हैं. नई योजना से देश में गृहयुद्ध की स्थिति पैदा हो जाएगी. इसलिए सरकार को ये योजना तत्काल वापस ले लेना चाहिए.इतना ही नहीं, पत्र में सीधे सीधे माओवादी नक्सलियों का समर्थन भी किया गया है.
माओवादी नक्सली बहुराष्ट्रीय कंपनियों और सेज के खिलाफ आदिवासियों की लड़ाई में मदद कर रहे हैं और ऐसे में नक्सलियों के खिलाफ कार्रवाई करने से देश में भयानक गृहयुद्ध फैल जाएगी और इससे जबरदस्त मानवीय त्रासदी पैदा होगी. जिससे निपटना सरकार के लिए मुश्किल हो जाएगा.
प्रधानमंत्री के नाम लिखे इस खुले पत्र में हस्तक्षर करने वालों में अरुंधती राय, दीपांकर भट्टाचार्य, सुप्रीमकोर्ट के कई वकील, दिल्ली विश्वविद्यालय, जेएनयू, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, जामिया मिलिया इस्लामिया के कई शिक्षक और छात्रों के अलावा विदेशों के भी कई लोग शामिल हैं.
इन तथाकथित क्रूर बुद्धिजीवियों के बारे में लिखना उचित नहीं था, लेकिन इनका कलंकित चेहरा बार-बार सामने लाना जरूरी हो जाता है. आखिर ये लोग चाहते क्या हैं. इन्होंने नेपाल में राजशाही के खिला फ माओवादियों का समर्थन किया था. उस समय सीताराम येचुरी जैसे लोग भी माओवादियों का बचाव करते थे, लेकिन पश्चिम बंगाल में उनकी ही सरकार के खिलाफ जब वामपंथियों का आतंक शुरू हो गया तो सीताराम येचुरी और बुद्धदेव भट्टाचार्य चिल्लाने लगे कि नक्सलियों के पास कोई विचारधारा नहीं है और इसका सफाया जरूरी है. सीताराम येचुरी ने तो यहां तक कहा है कि जितने लोग का कत्ल तालिबान ने नहीं किया होगा उससे ज्यादा लोग गढ़चिरौली में नक्सलियों की हिंसा में मारे गए. उनका कहना ये भी है कि जो लोग संवाद की भाषा नहीं, हिंसा की भाषा समझते हैं उन्हें हिंसा का जवाब हिंसा से दिया जाना चाहिए. जबकि सीपीएम महासचिव प्रकाश करात अभी भी नक्सल समस्या का राजनीतिक समाधान चाहते हैं न कि प्रतिहिंसा.
सीपीएम के अंदर ही विचारधारा का द्वंद्व है. दरअसल ये द्वंद्व सत्ता और विचारधारा के बीच है. विचारधारा कहती है कि नक्सलियों को पालो जबकि सत्ता कहती है कि ये नक्सली तुम्हारे हाथ से हमें छीन लेंगे. पश्चिम बंगाल सरकार सत्ता गंवाने के ख्याल से डरकर नक्सलियों के खिलाफ केंद्र की योजना का समर्थन कर रहे हैं.
मगर, उनलोगों का क्या जो अकेले पश्चिम बंगाल से खुश नहीं हैं, वो भी उस स्थिति में जब तृणमूल का राहु उससे दिनों-दिन ग्रसता जा रहा है. ये लोग पूरे देश में नक्सलियों का शासन चाहते हैं, इन लोगों का सपना चीन की तरह भारत में भी कम्युनिष्ट शासन स्थापित करना है.
शुक्रवार, 18 सितंबर 2009
भेड़-बकरियां ही हैं हम
भेड़ बकरियों से ज्यादा कुछ नहीं हैं हम. फिर शशि थरूर के बयान पर बवाल कैसा? कौन लोग हैं जो शशि थरूर के बयान पर बबाल मचा रहे हैं? इन लोगों में तथाकथित धर्मनिरपेक्ष मीडिया शामिल है, जो कांग्रेस को महान साबित करने में तन, मन और धन(गैर-वाजिब) जुटी हुई है.
सोमवार, 14 सितंबर 2009
नोट- यह पोस्ट वर्तिका नंदा जी के ब्लॉग से ज्यों की त्यों उद्धृत की जा रही है. जो दैनिक भास्कर में भी प्रकाशित हुई थी.
सबसे पहले सर्वेक्षण की बात। फादर जॉय कालियथ ने सर्वेक्षण करते हुए केरल के विभिन्न हिस्सों में रह रही ननों से बात की। वे इस कारण की तह में जाना चाहते थे कि क्या वजह है कि पिछले 9 साल में अकेले केरल में ही 14 ननों ने आत्महत्या कर ली और कई चर्च को छोड़ कर भाग रही हैं।
खबर यहां भी है
खबरों के घेरे में अब चर्च भी आने लगे हैं। हाल ही में इनके खबर में आने की दो वजहें रही हैं। पहली वजह वह ताजा सर्वेक्षण है जिसमें बेबाकी के साथ यह बात सामने आई है कि केरल की एक चौथाई से ज्यादा नन अपनी मौजूदा स्थिति से नाखुश हैं और दूसरी वजह है- केरल की एक नन की लिखी हुई आत्मकथा।सबसे पहले सर्वेक्षण की बात। फादर जॉय कालियथ ने सर्वेक्षण करते हुए केरल के विभिन्न हिस्सों में रह रही ननों से बात की। वे इस कारण की तह में जाना चाहते थे कि क्या वजह है कि पिछले 9 साल में अकेले केरल में ही 14 ननों ने आत्महत्या कर ली और कई चर्च को छोड़ कर भाग रही हैं।
गुरुवार, 20 अगस्त 2009
क्या जसवंत का पाप इतना बड़ा था?
विनाशकाले विपरीत बुद्धि.
समझ नहीं आ रहा है भाजपा का कर्ताधर्ता कौन है? कौन है तो भाजपा को ये अंध-निर्देश दे रहा है? शिमला में पार्टी की चिंतन बैठक शुरू भी नहीं हुई कि कहते हैं कि भाजपा ने कुछ ऐसा कर मीडिया का शो चुरा लिया. हर जगह वाद-विवाद में भाजपा-जसवंत की चर्चा होने लगी.
समझ नहीं आ रहा है भाजपा का कर्ताधर्ता कौन है? कौन है तो भाजपा को ये अंध-निर्देश दे रहा है? शिमला में पार्टी की चिंतन बैठक शुरू भी नहीं हुई कि कहते हैं कि भाजपा ने कुछ ऐसा कर मीडिया का शो चुरा लिया. हर जगह वाद-विवाद में भाजपा-जसवंत की चर्चा होने लगी.
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