प्रधानमंत्री डॉ मननोहन सिंह यूं तो कॉर्पोरेट जगत के दुलारे समझे जाते हैं, मगर एकबार जब उन्होंने कॉर्पोरेट बाबुओं की ऊंची तनख्वाह पर कुछ कहने की हिम्मत की तो पूरे कॉर्पोरेट जगत में इसका जबरदस्त विरोध हुआ. कई लोगों ने तो यहां तक कह दिया कि जब मटर के दाने डालोगे तो बंदर ही मिलेंगे न. मतलब साफ था गुरिल्ला फांसने के लिए सोने के बिस्किट डालने ही होंगे.
मंदी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
मंदी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
रविवार, 15 फ़रवरी 2009
किसके लिए मंदी
मंदी के मतलब
कभी एक ब्रैंड था अब ब्रैंड ही बैंड हैं. कभी मेट्रो में भी मॉल नहीं थे, अब हर चौराहे- हर नुक्कड पर मॉल दिख रहे हैं. इसका नशा इस कदर सिर चढ़कर बोला कि लोग साम्यवादी व्यवस्था को मुंह चिढ़ाने लगे. कॉर्पोरेट कल्चर और मैंनेजर संस्कृति ने पूरे बाजार या यू कहें पूरी व्यवस्था को अपनी चपेट में ले लिया. लोगों को इस व्यवस्था में मजा आने लगा. कॉर्पोरेट घरानों को हस्तक्षेप से मुक्त करने के लिए सरकार पर मध्यवर्ग का दबाव बढ़ने लगा. सरकारों ने कॉर्पोरट घरानों को हस्तक्षेप से मुक्त कर दिया.
सदस्यता लें
संदेश
(
Atom
)