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गुरुवार, 27 नवंबर 2008

पचास हजार में बनते हैं ईसाई

पचास हजार में बनते हैं ईसाई, सहारा समय पर पढ़े ये सनसनीखेज रिपोर्ट

गुरुवार, 16 अक्टूबर 2008

पोप का पाप- जलता हिंदुस्तान

मूल लेखक- एल आर फ्रांसिस, अध्यक्ष, पुअर क्रिश्चियन लिबरेशन फ्रंट (francispclm@yahoo.com)
साभार- विस्फोट

चर्च पर हिन्दू चरमपंथियों द्वारा हमला तो खबर बनती है लेकिन यह खबर कभी क्यों नहीं बनती कि चर्च के अंदर कितना शोषण, अत्याचार और दमन हो रहा है. चर्च संगठन अपने ही कर्मचारियों का शोषण करते हैं, नन्स और पादरी की संदेहास्पद हत्याओं के मामले भी प्रकाश में आये हैं, जिनमें चर्च प्रशासन से जुड़े लोग ही शामिल पाये गये हैं, फिर भी हमारा प्रबुद्ध समाज चर्च संगठनों के बीच फैली इन कुरीतियों के बारे में कभी अपनी जबान नहीं खोलता.

पिछले दिनों चर्चों से जुड़ी ऐसी कई घटनांए सामने आई हैं जिन्हें साप्रदायिकता की श्रेणी में रखा जा रहा है। अभी हाल ही में रतलाम (मध्य प्रदेश) की रेलवे कंलोनी में स्थित 85 वर्ष पुराने चर्च में आग लगा दी गई। इस घटना को सीधे हिन्दु संगठनों से जोड़ा गया। मामला तुंरत अतंराष्ट्रीय स्तर तक पंहुचाया गया। चर्च अधिकारियों और उनके विदेशी आकाओं की भकुटियां तन गई। बाद में पता चला कि उक्त घटना की तह में था उसी चर्च का चौकीदार था- नोयल पारे. नोयल पारे ने आक्रोशवश ही चर्च में आग लगाई थी।

चर्च की 86वीं वशZगांठ मनाई जाने वाली थी। बड़े समारोह की तैयारियॉ थी। किंतु उस चर्च के चौकीदार पर आठ हजार का कर्ज था। कर्ज था बनियों का। जिनसे वह पेट भरने के लिये जरुरी नून-तेल उधार लेता था। चर्च प्रशासन उसे मात्र 1000 रुपए मासिक वेतन देता था। कितना बड़ा अंतर है सरकारी नियमों में न्यूनतम मजदूरी को लेकर और चर्च प्रषासन द्वारा दी जाने वाली मजदूरी के बीच. देश की राजधानी दिल्ली में ही चर्च द्वारा चलाये जाने वाले अधिक्तर संस्थानों में भी ऐसा ही हाल है, सरकारी आदेश पोप पोषित धर्मराज्य के प्रशासकों के ठेंगे पर होते है। चर्च का गुलाम कर्मचारी 24 घंटे काम करके एक हजार रुपए महीना अर्थात 33 रुपए प्रतिदिन, ऐसी स्थिति में -क्रिया की प्रतिक्रिया - शोषण का परिणाम आक्रोश तो होगा ही. आक्रोशवश ऐसा कर्मचारी कुछ भी कर सकता है। हत्या या आत्महत्या या फिर तोड़फोड़ मारपीट अगजनी इत्यादि या चोरी चकारी, लूटपाट कुछ भी।

कुछ वर्ष पूर्व मध्य प्रदेश के ही झाबुआ में कान्वेंट की ननों (धर्म-बहनों) पर सामूहिक हमला व बलात्कार का मामला भी खूब उछाला गया। लेकिन उस समय भी बात वहीं थी बंदर की बला तबेले के सिर. हिन्दू संगठन ही बदनाम किये गये। इस मामले में भी झाबुआ के धर्मांतरित ईसाइयों का आक्रोश ही था। मलयाली-दक्षिण भारतीय ननें बनाम आदिवासी ईसाई. यहां रतलाम में चर्च जलाने की जिस घटना का जिक्र किया जा रहा है उसके मूल में भी मलयाली चर्च प्रशासन पादरी जोस मैथ्यू (मलयाली) बनाम नोयल पारे (स्थानीय मराठी मूल का आदिवासी) है. हाल ही में बिजनौर -उतर प्रदेश की एक स्थानीय अदालत ने `संत मेरी स्कूल´ की नन प्रमिला की 5 नवंबर 2007 को हुई हत्या के मामले में स्कूल के चौकीदार जॉन को उम्रकैद की सजा सुनाई है। कुछ दिन पूर्व उतराखंड के रामपुर में एक कैथोलिक पादरी एवं उसकी नौकरानी की हत्या के मामले में भी उक्त आश्रम से जुड़े कुछ लोग पकड़े गये है। आजकल उड़ीसा में एक नन के साथ हुये बलात्कार का मामला राष्ट्रीय एवं अतंरराष्ट्रीय समाचार पत्रों में छाया हुआ है.उड़ीसा पुलिस ने संदेह के आधार पर चार लोगों को हिरासत में लिया है. पीड़ित नन चर्च अधिकारियों के संरक्षण में अज्ञातवास में चली गई है. चर्च अधिकारियों के मुताबिक पीड़िता को सही समय पर सामने लाया जायेगा। किसी भी महिला के साथ बलात्कार एक घिनौना अपराध है. बलात्कारी शरीर ही नहीं पीड़िता की आत्मा की भी हत्या कर देता है. ऐसा अपराधी कोई भी हो उसे क्षमा नहीं किया जाना चाहिए परन्तु उड़ीसा मामले को लेकर कुछ चर्च अधिकारियों पर ही अगुंली उठ रही है. ऐसे में यह जरूरी है कि सच लोगों के सामने लाया जाना चाहिए।


मलयाली मूल और मंगलूर - कर्नाटक -गोवा पुर्तगाली मूल के धर्माचार्यों द्वारा भारत के ईसाई चर्च एवं अन्य संस्थान संचालित हो रहे है। भारत की स्वतंत्रता के बाद जब विदेशी मिशनरी अपने मूल देशों की और लौटे तो भारत की ईसाई संपदा चल और अचल पूंजी पर इन्हीं दक्षिण भारतीय पादरियों -बिशपों का एकाधिकार हो गया जो आज तक बना हुआ है। शेष ईसाई तो मात्र शासित और शोषित रुप में चर्च के सदस्य है.यहीं नहीं उड़ीसा में जो हो रहा है उसमें भी मलयाली मिशनरियों का बड़ा हाथ है। कटक के आर्च बिशप राइट रेव्हण रिफेल चीनथ भी मलयाली ही है। वहां इनकी गलतियों की सजा गरीब एवं सीधे साधे धर्मांतरित वंचितों को मिली। छल, फरेब, धोखाधड़ी के बलबूते अपने साम्राज्य का विस्तार करते `पोप पोषित´ यह मिशनरी हिन्दू दलितों को मतांतरित करने के बाद भी सरकारी दस्तावेजों में हिन्दू रहने के लिए प्रेरित करते है, ताकि वह इन से नहीं सरकार से अपने अधिकारों के लिए लड़ते रहे और इनकी धर्मांतरण की दुकान बिना किसी रोक-टोक के चलती रहे।

इन्हें वंचितों एवं आदिवासियों के प्रति कितनी सहनाभूति है यह उड़ीसा के कंधमाल और कर्नाटक में हुए कुछ चर्चों पर हमलों के दौरान विरोध करने के तरीके से भी समझा जा सकता है। जहां उड़ीसा के मामले में कैथोलिक चर्च अधिकारी एक औपचारिकता निभाते दिखाई दिये वहीं मंगलूर में हुई घटनाओं के बाद उन्होंने आसमान सिर पर उठा लिया। अंग्रेंजी अखबारों में दो-दो पेज तक की खबरे आनी शुरू हुई। चर्च अधिकारी और उनके राजनीतिक समर्थक ऐसे सक्रिय हुए मानों कर्नाटक में `ईसाइयत´ समाप्त होने को हो। चर्च अधिकारियों की सक्रियता और उग्र तेवरों को देखते हुए कर्नाटक के मुख्यमंत्री तुरंत मंगलूर डायसिस के बिषप के यहां सफाई देने वैसे ही पुहचें जैसे राजग के शासनकाल में केन्द्र सरकार अपनी सफाई देती थी। मंगलूर की घटनाओं के बाद चर्च अधिकारियों का उग्र होना स्भाविक था क्योंकि एक तरह से वह चर्च का मिनी वैटिकन जो ठहरा। यदि मराठियों,असामियों, बगालियों, पंजाबियों आदि को अपने अस्तित्व की चिन्ता सता सकती है तो उड़ीसा के मूल निवासियों को भी अपने अस्तित्व की रक्षा की चिन्ता होना स्भाविक है।

मलयाली मूल और मंगलूर - कर्नाटक -गोवा पुर्तगाली मूल के धर्माचार्यों द्वारा भारत के ईसाई चर्च एवं अन्य संस्थान संचालित हो रहे है। भारत की स्वतंत्रता के बाद जब विदेशी मिशनरी अपने मूल देशों की और लौटे तो भारत की ईसाई संपदा चल और अचल पूंजी पर इन्हीं दक्षिण भारतीय पादरियों -बिशपों का एकाधिकार हो गया जो आज तक बना हुआ है। शेष ईसाई तो मात्र शासित और शोषित रुप में चर्च के सदस्य है। यह दक्षिण भारतीय पादरी - बिशप विदेशी मिशनरियों द्वारा छोड़ी गई अकूत सम्पति को अपने हाथ से निकलने न देने की फिराक में नित नयें हथकंडे अपनाते रहते है। यहां एक तथ्य और भी उल्लेखनीय है कि वास्कोडिगामा द्वारा छोड़े गये पुर्तगाली मूल के मिशनरियों के वंशज अब भी मंगलोरियन -गोअन - के रुप में उपस्थित है। उतर प्रदेश के नौ कैथोलिक डायसिसों आगरा, मेरठ, झॉसी, बिजनौर, इलाहाबाद, लखनाऊ, बनारस, गोरखपुर, बरेली - के बिशपों में से छ: बिशप पुर्तगाली मूल के है - शेष मलयाली (केरल) के है। अभी कुछ माह पूर्व केरल के आर्च बिशप ने केरल के ईसाइयों के नाम एक परिपत्र (फतवा) जारी किया था ``यह कि प्रत्येक दम्पती को चाहिये कि वे `अधिक से अधिक´ संतान उत्पन्न करें. आशय यही था कि चर्च संपदा को हथियाये रखने के लिए केरल के कर्णधारों की अवश्यकता है।

चर्च अधिकारी आज विभिन्न तरीकों से अथाह दौलत कमा रहे हैं. उनका पूरा व्यावसाय इस देश के करोड़ों वंचितों के नाम पर चल रहा है। भारत सरकार का वार्षिक बजट तो आय-व्याय के साथ घाटे के बजट के रुप में जुड़ा होता है मगर इनके घाटे का तो सवाल ही नहीं और साथ ही धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों के हित्तों की रक्षा का भार भारत की सरकार पर जिसके तहत इटली की सरकार और वैटिकन भारत के राजदूत को बुलाकर डांट लगाती है। यहीं कारण है कि चर्च अधिकारियों द्वारा शोषित आम ईसाई अनाथ सा विक्षिप्तावस्था में जा पहुंचा है जिसका भविष्य आक्रोश और विरोध की नींव पर खड़ा है.

नोट- ब्लॉग संचालक ने एक भी शब्द अपनी ओर से नहीं जोड़ा है.

मंगलवार, 2 सितंबर 2008

सेक्यूलर एजेंडा- फूट डालो राज करो

बिपिन चंद्रा देश के जाने-माने मार्क्सवादी इतिहासकार है. उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और आजादी के बाद के भारत पर महत्वपूर्ण पुस्तकों की रचना की, जो कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाती है. एक जून, 2008 के टाइम्स ऑफ इंडिया में उनका इंटरव्यू पढ़ा. उन्होंने सांप्रदायिकता पर बौद्धिकतापूर्ण बातें कही. उनके बौद्धिकतापूर्ण बातों को पढ़कर जो मेरे में सामान्य बातें उपजी आपके सामने रख रहा हूं-
1.बौद्धिक दृष्टिकोण- भारत जैसे विविधतापूर्ण समाज में यदि सांप्रदायिकता को नहीं रोका गया तो यह देश को टुकड़ों में तोड़ सकता है. यदि इसे नियंत्रित नहीं किया गया तो यहां लेबनान और श्रीलंका जैसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है. सांप्रदायिकता यहां जड़ें जमा चुकी है. देश की कुल आबादी के कम से कम बीस प्रतिशत लोग भाजपा को वोट देते हैं. सांप्रदायिकता, पहले मध्यमवर्गीय समाज में पाई जाती थी, लेकिन अब इसने आमलोगों को अपनी चपेट में ले लिया है. अब वनवासियों, आदिवासियों और गांवों में सांप्रदायिकता फैलने लगी है. पहले कहा जाता था कि दक्षिण भारतीय सांप्रदायिक नहीं हो सकते हैं, लेकिन आप देखेंगे कि सांप्रदायिकता कर्नाटक, केरल और आंध्रप्रदेश में भी पैदा होने लगी है.
सामान्य दृष्टिकोण- स्वाभाविक है शहरों में पढ़े लिखे लोग ज्यादा होते है. वे तथा-कथिक सेक्यूलरों(छद्म-धर्मनिरपेक्षों) की घिनौनी राजनीति समझ गए हैं(देश के विद्वान प्रधानमंत्री कहते हैं कि देश के संसाधनों पर पहला हक मुसलमानों का है, मुस्लिम बहुल जिलों की पहचान की जाती है, वहां जनता के टैक्स से 5500करोड़ रुपये दिए जाते हैं) जब सरकार मुसलमान परस्त राजनीति करेगी तो जनता हिंदु-परस्त होती है तो क्या बुराई है, इसके लिए छद्म-धर्म-निरपेक्ष लोग ही जिम्मेदार हैं. सरकार अलगाव परस्त कश्मीरियों के आगे घुटने टेक देती है तो स्वाभाविक है कि जम्मू की राष्ट्रभक्त जनता अपने जायज मांगों के लिए आवाज उठाए. शहर के बाद गांव और जंगल के लोग भी सरकार सरकार की घिनौनी राजनीति को समझ रहे हैं. जहां तक दक्षिण भारत की बात है. यहां कि जनता को उत्तरभारतीयों की अपेक्षा रूढिवादी रही है. लेकिन यहां के राजनेता उत्तरभारतीय राजनेताओं के मुकाबले कम घिनौनी किए हैं. अब आंध्रप्रदेश की कांग्रेस सरकार ने यहां व्यापक रूप से इसकी शुरूआत की है. अब यहां सांप्रदायिक जहर घुलेंगे, इससे लिए कथित छद्म-धर्मनिपरपेक्ष गुट जिम्मेदार है.
2. बौद्धिक दृष्टिकोण- सांप्रदायिकता एक विचारधारा है. इस विचारधारा के मुताबिक, हिंदुओं का सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक हित मुसलमानों के हित से अलग हैं. क्योंकि हिंदू-मुसलमान अलग-अलग हैं. सांप्रदायिक दंगे बीमारी के लक्षण मात्र हैं. यह सांप्रदायिक दंगों के बगैर भी फल-फूल सकती हैं. उदाहरण के तौर पर, तीस और चालीस के दशक में सांप्रदायिक दंगे नहीं हुए, लेकिन 1937 से 1945 के बीच सांप्रदायिकता का खूब विकास हुआ. सांप्रदायिका को बढ़ावा देने के लिए सांप्रदायिक दंगे कराए जाते हैं. 2002 के गुजरात दंगों को ही लीजिए. इस दंगे का मकसद मुसलमानों को मारना या उनकी संपत्ति को बर्बाद करना नहीं था, इसका मकसद सांप्रदायिकता को बढ़ावा देना था. एकबार यह मकसद हासिल कर लिया गया फिर देखिए हर जगह शांति है.
सामान्य दृष्टिकोण- जहां तक विचारधारा की बात है, विचारधारा तो कम्युनिष्टों की परि-संपत्ति है. जन-सामान्य के पास विचारधारा कहां होती है कि वो उसपर काम करते और उसकी लड़ाई लड़े. उसकी विचारधारा तो (कार्यकाले समुत्पन्ने) परिस्थितियों के अनुसार पैदा होती है. अगर ऐसा नहीं होता तो शैव्य-शाक्त, वैष्णव, द्वैत, अद्वैत, सगुण, निर्गुण, साकार, निरंकार जैसी विचारधाराएं पैदा नहीं होती. हजारों धर्मग्रंथ नहीं लिखे जाते. मुस्लिम धर्मावलंबियों की तरह हर किसी को कुरआन और हदीस के डंडे से ही हांकते. लेकिन देखिए कम्युनिष्टों के पास मार्क्स और लेनिन के बाद कोई विचारधारा ही पैदा नहीं हुई. शांति का अर्थ ये नहीं है कि प्रभाव कायम करके ही शांति स्थापित होती है. अगर है तो अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोपीय देशों में शांति क्यों है.
3. आतंकवाद को सांप्रदायिक विचारधारा से जोड़ा जा सकता है. उदाहरण के लिए, आज हिंदू आतंकवाद नहीं के बरावर है लेकिन हिंदू सांप्रदायिकता काफी मजबूत है. भारत के ज्यादातर मुस्लिम आतंकवाद का समर्थन नहीं करते हैं फिर भी आतंकवाद ने इस्लामिक रूप ले लिया है. यह जरूरी नहीं है कि धार्मिक रूढिवादिता का स्वरूप सांप्रदायिक हो, लेकिन यह रूढिवादिता सांप्रदायिक रूप ले सकता है, कई हिंदू और मुस्लिम रूढिवादी तो हैं, लेकिन सांप्रदायिक नहीं.
सामान्य दृष्टिकोण- हिंदू स्वभाव से सांप्रदायिक नहीं होते हैं और सह-अस्तित्व पर विश्वास करते हैं पर छद्म-निरपेक्षता ने बड़े ही सुनियोजित तरीके से इसमें सांप्रदायिकता का जहर घोला.
4. सांप्रदायिक का निदान- हमें सांप्रदायिकता को अच्छी तरह समझना होगा. मेरे छात्रों में से ही कई शुरू शुरू में सांप्रदायिक थे, लेकिन एकबार जब उन्हें पूरी बात समझाई गी तो वे बदल गए. इसलिए सांप्रदायिकता को रोकने के लिए शैक्षणिक अभियान चलाने की जरूरत है, उदाहरण के लिए, हमारी शिक्षा-व्यवस्था सांप्रदायिकता को कम करने के बजाय उसे बढावा देने का काम करती है. पाठ्यक्रम प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सांप्रदायिक विचारों का पोषण करती हैं. कभी-कभी तो लेखक भी इस बात से अनजान रहता है.
सामान्य दृष्टिकोण- मेरे विचार से सांप्रदायिकता को समाप्त करने के लिए तुष्टिकरण की राजनीति को तिलांजलि देकर समग्र समाज के विकास की बात की जाए. फूट डालो और राज करो की नीति से किसी समाज का भला होने वाला नहीं है. इससे सामाजिक विद्वेष ही पैदा होगा और समाज में जहर घुलेगा.