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मंगलवार, 5 जुलाई 2011

अब ईमानदार नहीं रह गए हैं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह




जी हां, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अब ईमानदार नहीं रह गए हैं। हो सकता है कुछ पत्रकार जिनका प्रधानमंत्री और सरकार से निहित स्वार्थ जुड़ा हो, वो प्रधानमंत्री को अब भी ईमानदार कह सकते हैं। उन्हें क्लीनचिट दे सकते हैं। उन्हें बेदाग और साफ-सुथरी छवि का इंसान कह सकते हैं। मगर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अब ईमानदार नहीं रह गए हैं।
आश्चर्य की बात है कि देश में लाखों करोड़ का घोटाला हो जाने के बाद भी देश की सरकार की मुखिया को लोग ईमानदार बताते रहे हैं। मनमोहन को बेदाग और साफ-सुथरी छवि का नेता बताते रहे हैं। हालांकि ऐसा कहने वालों में ज्यादातर लोग कांग्रेस के हैं या कांग्रेस पोषित मीडिया के हैं। मीडिया क्यों कांग्रेस और केंद्र सरकार का गुणगान करती है और रामदेव और अन्ना हजारे जैसे लोगों का पर्दाफाश करने में जुटी रहती है। ये जानना ज्यादा मुश्किल नहीं है। अगर आपको इसकी सच्चाई जानना हो तो इस लिंक को पढ़ें । ऐसे बिके हुए मीडिया और पत्रकारों की बात करना ही बेकार है।
हाल में प्रधानमंत्री ने प्रिंट मीडिया के चुने हुए पांच वरिष्ठ संपादकों के साथ बैठक की। पत्रकारों के मुताबिक, प्रधानमंत्री आत्मविश्वास से लबरेज थे। वो बातचीत के बीच-बीत में हंसी-मजाक भी कर रहे थे। यानी साबित करने की कोशिश कर रहे थे कि वो नर्वस बिल्कुल नहीं हैं। इन्हीं पत्रकारों में से एक ने राष्ट्रमंडल खेल घोटाले के बारे में पूछा कि मणिशंकर अय्यर ने खेल घोटाले के बारे में आपको काफी पहले पत्र लिखा था। लेकिन आपने घोटाले की अनदेख की। तो प्रधानमंत्री ने कहा कि मणिशंकर अय्यर का पत्र आइडियोलॉजिकल(वैचारिक) था। प्रधानमंत्री के इस बयान के महज दो दिन बाद हेडलाइन्स टुडे ने मणिशंकर अय्यर के उस पत्र को चैनल पर दिखाया जिसमें साफ साफ कहा गया था कि राष्ट्रमंडल खेल आयोजन में बड़े पैमाने पर घोटाला हो रहा है। उनके एक नहीं बल्कि कई पत्र लिखे। इस पत्र में घोटाले के लिए साफ-साफ कलमाड़ी और उसके सहयोगियों को जिम्मेदार ठहराया गया। बताया गया कि खर्च की रकम को कई गुना बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया। मगर, प्रधानमंत्री ने समय रहते कोई कार्रवाई नहीं की। अब जब पत्रकारों ने इस घोटाले में उनकी भागीदारी के बारे में पूछा तो उन्हें मणिशंकर अय्यर के पत्र को ऑइडियोलॉजिकल पत्र करार दिया।
आखिर प्रधानमंत्री क्यों झूठ बोल रहे हैं। प्रधानमंत्री सच पर पर्दा डालकर अपनी कौन सी छवि पेश कर रहे हैं। इतना ही नहीं, खेल आयोजन की तैयारियों के दौरान खेल मंत्रालय के तात्कालीन कर्ता-धर्ताओं, मणिशंकर अय्यर, सुनील दत्त, एमएस गिल ने भी प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री पी चिदंबरम को घोटाले के बारे में बार-बार लिखा। लेकिन इन लोगों ने घोटाला होने दिया। प्रधानमंत्री ने तो मंत्रिसमूह के अनुरोधों को भी नजरअंदाज कर दिया और इसके लिए उन्होंने अजब-अनोखे तर्क भी दिए।
दूसरा मामला चालीख लाख करोड़ रुपये के कोयला घोटाले का है। इस घोटाले में प्रधानमंत्री सीधे-सीधे आरोपों के घेरे में आते हैं। 2006-10 तक कोयला मंत्रालय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के अधीन रहा है और इस दौरान 73 कोल ब्लॉक प्राइवेट कंपनियों को बिना कोई पैसा लिए दिए गए। शर्त महज इतना था कि जितना टन कोयला निकाला जाए। 100 रुपये प्रति टन के हिसाब से सरकार को भुगतान किया जाए। शायद प्रधानमंत्री को भी मालूम होगा कि बाजार में कोयला का भाव 2000 रुपये प्रति टन है, ऐसे में कंपनियां सिर्फ 100 रुपये टन क्यों भुगतान करेगी। क्या ये राष्ट्रीय संपत्ति की लूट नहीं। क्या इस घोटाले के बाद भी प्रधानमंत्री ईमानदार बनने का ढ़ोंग करते रहेंगे।
कौन नहीं जानता है कि दशकों से बिहार अंधेरे में जीने के लिए मजबूर है। नीतीश कुमार ने सड़कें तो बना दी लेकिन बिहार में बिजली नहीं है। बिहार में बिजली पैदा करने के लिए सरकार ने दो कोल ब्लॉक दिए। लेकिन बाद में उन्हें ये कहकर रद्द कर दिया गया कि तय समय-सीमा तक कोयले का खनन नहीं किया गया। इस तरह सरकारी ऊर्जा कंपनियों को दिए गए चौदह कोल ब्लॉक रद्द कर दिए गए। लेकिन निजी कंपनियों को दिए गए कोल-ब्लॉकों में से एक को भी रद्द नहीं किया गया है.. जबकि ज्यादातर कोल ब्लॉकों में कोयले का खनन अभी शुरू भी नहीं हुआ है।
टूजी स्पेक्ट्रम में ए राजा, कनिमोझी सहित दर्जन भर लोग जेल की हवा खा रहे हैं, जबकि स्पेक्ट्रम नवीकरणीय संसाधन है। आप कितना भी स्पेक्ट्रम पैदा कर सकते हैं। वहीं कोयला ऊर्जा का अनवीकरणीय स्रोत है.. जो एकबार खत्म हो जाए तो उसे दोबारा स्थापित नहीं किया जा सकता है। ब्लैक गोल्ड कहे जाने वाले कोयले की लूट के लिए जिम्मेदार एक भी व्यक्ति पर कार्रवाई नहीं हुई है। इस घोटाले में न सिर्फ कांग्रेस बल्कि भाजपा भी घेरे में है। हां भाजपा का पाप थोड़ा कम है। मगर जब दोनों घेरे में हैं, इसलिए इस घोटाले को मीडिया में सुर्खियां नहीं मिल पा रही है।
इस घोटाले के बाद भी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ईमानदार बने हुए हैं। मीडिया कांफ्रेंस कर रहे हैं खुद को ताकतवर कह रहे हैं। संदेह का लाभ दिए जाने की भी बात कर रहे हैं। ये भी कह रहे हैं कि जितना दोषी उन्हें बताया जा रहा है वो उतने बड़े दोषी या गुनहगार हैं नहीं। क्या इस खुलासे के बाद भी प्रधानमंत्री ईमानदार बने रहेंगे। शायद नहीं।

सोमवार, 20 जून 2011

टूजी घोटाले से बीस गुना बड़ा घोटाला- कोयला घोटाला, भ्रष्टाचार के घेरे में सीधे-सीधे प्रधानमंत्री

यूपीए सरकार ने घोटालों के सारे विश्व रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए हैं। जिस घोटाले का जिक्र यहां किया जा रहा है वो ना सिर्फ स्वतंत्र भारत के इतिहास का सबसे बड़ा घोटाला है, बल्कि वो शायद दुनिया के इतिहास का सबसे बड़ा घोटाला है। अब तक के घोटालों में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ये कहकर बचते रहे हैं कि ये उनका विभाग नहीं है, टूजी घोटाला, आदर्श घोटाला, एस-बैंड घोटाला, सीडब्ल्यूजी घोटाला के बारे में वो कुछ नहीं जानते हैं, लेकिन कोयला मंत्रालय ज्यादातर समय तक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के हाथों में रहा है और उनके हाथों में कोयला मंत्रालय का प्रभार होते हुए ७३ कंपनियों को कोयला खदानें मुफ्त दी गई है।
कोयला घोटाला- ईटीवी-चौथी दुनिया लिंक- वीडियो लिंक
कोयला घोटाला- ईटीवी चौथी दुनिया- पाठ्य लिंक
न्यूज एक्स पर दिखाए गए खबरों के मुताबिक, कोयला घोटाला करीब चालीस लाख करोड़ का है। यानी टूजी घोटाले से पच्चीस गुना बड़ा घोटाला। यानी सभी घोटालों का बाप।

  • बिहार अंधेरे में जी रहा है- केंद्र सरकार बिहार को कोल लिंक नहीं दे रही है ताकि वो बिजली पैदा कर सके।
  • अन्ना हजारे और नागरिक समाज प्रधानमंत्री और न्यायपालिका को लोकपाल के दायरे में क्यों लाना चाहते हैं अब लोगों को समझ में आना चाहिए।
  • कॉर्पोरेट जगत-राजनेता-पत्रकार मिलकर देश को कैसे लूट रहे हैं। इसकी बानगी है ये घोटाला।
  • इस घोटाले में यूपीए के अलावा एनडीए भी शामिल है।
  • अब जनता को समझ में आना चाहिए कि भाजपा, कांग्रेस, सपा, बसपा, तृणमूल, राजद समेत तमाम दल क्यों लोकपाल का विरोध कर रहे हैं
  • वो इस लूट की प्रक्रिया को जारी रखना चाहते हैं।
  • तथ्यों को बढ़िए, वीडियो देखिए, न्यूज पर नजर रखिए और प्रतिक्रिया भी दीजिए।
  • हो सके तो त्याग की मूर्ति सोनिया अम्मा से भी पूछिए, मॉं आपके शासन में ये क्या हो रहा है।
  • हमारे देश के भावी प्रधानमंत्री(पिग्गीराजा की अंतिम ख्वाहिश) से पूछिए कि वो क्यों इन गंभीर मसलों पर मूक-बधिर हो जाते हैं।

गुरुवार, 16 जून 2011

सोनिया माता का कुनबा

इस महाग्यान को बूझना ज्यादा मुश्किल नहीं है, लेकिन ग्यान को पहुंचाना जरूरी था, इसलिए शीर्षक में थोड़ी चुनौती बोध दे दिया है।
भ्रष्टाचारियों के सबसे बड़े संरक्षक- अम्मा का वरदहस्त प्राप्त


भ्रष्टाचार नामक भ्रष्ट आचार की निर्मात्री
ए राजा का फेसबुक एकाउंट- बड़े-बड़े लोगों से जान पहचान
 अब तक के सबसे बजट की फिल्म- रिलीज होने से पहले सुपर-डुपर हिट- सारे रिकॉर्ड ध्वस्त


भारत लूट का सपना बुना- बेशर्मी बढ़ी कई गुना

सोमवार, 30 नवंबर 2009

78000 हजार करोड़ रुपये का घोटाला?

जिसके लिए लोगों ने आंसू बहाए और जानें दीं..

प्रस्तुत संदेश कुछ रोज पहले ही प्राप्त हुई थी, जिसे विस्तृत जानकारी और विश्वस्तता की जांच किए बगैर पोस्ट नहीं करने की इच्छा थी. मगर समाचार पत्रों में खबर आ रही है कि आंध्रप्रदेश के पूर्व को मुख्यमंत्री वाईएस राजशेखर रेड्डी के पुत्र जगमोहन रेड्डी को खुश करने के लिए कांग्रेस उन्हें केंद्र में मंत्रीपद देने की तैयारी कर रही है. जगनमोहन रेड्डी पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं. ऐसे में, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह को उन्हें मंत्रीपद से उपकृत करने से पहले देश की जनता से ये साफ करना चाहिए कि भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों से घिरे जगनमोहन रेड्डी को ईमानदार प्रधानमंत्री(? लालू और कोड़ा के संरक्षक ) अपने मंत्रीमंडल में कैसे जगह देंगे?
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                                     चार साल में 78000 करोड़ बनाए

टाटा, रिलायंस, बजाज, इन्फोसिस, विप्रो, बिड़ला ग्रुप को अरबपति बनने में दशकों लग गए लेकिन वाइएसआर एंड कंपनी को करीब 78000 करोड़ रुपये का साम्राज्य बनाने में महज साढ़े चार साल लगे.
सोचिए, 2008-09 में आंध्रप्रदेश का बजट 1,00,000 करोड़ रुपये था, जबकि वाइएसआर का साम्राज्य 78000 करोड़ रुपये का है यानी
1 परिवार=1 राज्य
23000 मेगावाट क्षमता वाली एनटीपीए के एक शेयर का दाम महज 290 रुपये है, जबकि मात्र 22.50 मेगावाट क्षमता वाली संदूर पावर(वाइएसआर की कंपनी) के एक शेयर का दाम 675 रुपये के करीब है. आर्थिक मंदी से जूझ रहे देश और दुनिया के अर्थशास्त्रियों को वाईएसआर परिवार एंड कंपनी से प्रबंधन का गुर सीखने चाहिए.
जगनमोहन की कंपनी जगती पब्लिकेशन(साक्षी समाचार पत्र और भविष्य में शुरू होने वाले इंदिरा टीवी) की बाजार पूंजी 3600 करोड़ रुपये है. है न युवराज का जादू?
7800 करोड़ रुपये के सत्यम घोटाले को देश का सबसे बड़ा कॉर्पोरेट घोटाला माना जाता है तो 78000 करोड़ रुपये के वाइएसआर फैमिली एंड कंपनी के घोटाले को आप क्या कहेंगे. है नाम देने की हिम्मत?
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                                           78000 करोड़ का साम्राज्य

1956 में आंध्रप्रदेश की शक्ति उत्पादन क्षमता(पावर जेनरेशन कैपेसिटी) 213 मेगावाट थी जो अब 12500 मेगावाट है, बिहार की वर्तमान पावर उत्पादन क्षमता महज 4000 मेगावाट है. यानी आंध्रप्रदेश को 12500 मेगावाट शक्ति पैदा करने में तिरपन साल लगे, लेकिन महज दो साल पहले शुरू हुई वाइएसआर फैमिली एंड कंपनी अगले सात साल में 14000 मेगावाट विद्युत शक्ति पैदा करने की योजना बनाई है. यानी ऐसा करिश्मा सिर्फ वाइएसआर फैमिली एंड कंपनी ही कर सकती है.
रघुराम सिमेंट कंपनी में वाइएस जगमोहन की पूंजी 45 करोड़ रुपये थी. लेकिन कुछ सालों बाद जब यह भारती सिमेंट बन गई तो जगनमोहन की हिस्सेदारी 6500 करोड़ रुपये है.. What an Idea sir jee?
शायद यह भारतीय अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा घोटाला है.
और शायद यही वजह है कि वाईएसआर को खोजने के लिए देश का सबसे बड़ा अभियान चलाया

बुधवार, 14 जनवरी 2009

सत्यम के बहाने


2004 में एक अमेरिकी जर्नल में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका ओसामा के अलावा एक और शख्स से डरता है, वो है रामलिंगा राजू . वहीं, रामलिंगा राजू, जिसकी कंपनी सत्यम कंप्यूटर्स का झंडा आईटी जगत में शान से लहराता था, आज उसके सितारे गर्दिश में है. अमेरिका को डराने वाले शख्स का ऐसा हश्र होगा, इसकी कल्पना शायद ही किसी ने की होगी.
एक अमेरिकी विश्वविद्यालय से प्रबंधन में स्नातक की डिग्री लेने वाले रामलिंग राजू ने अमेरिकी कुशल कामगारों की नींद हराम कर दी थी. उन्होंने उनके काम को हथिया लिया और वो काम भारतीय कामगारों तक पहुंचाया. विजन-2020 के रोल मॉडल बन गए. आम भारतीय को मोटी तनख्वाह और आरामपसंद जिंदगी का सपना दिखाया. उनकी कंपनी सत्यम में नौकरी पाने वाले अपने आपको बड़ा भाग्यशाली समझते थे. सत्यम से जुड़ने वाले शख्स की सामाजिक हैसियत खुद-ब-खुद बढ़ जाती थी.
कभी अमेरिकी कंपनियों के लिए चुनौती पेश करने वाली आईटी कंपनी सत्यम आज पूरी दुनिया के लिए खलनायक बन बनी है. इसने करोड़ों लोगों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है. 1987 से सफर की शुरुआत करने के बाद सत्यम जल्द ही देश की चौथी सबसे बड़ी आईटी कंपनी बन गई. इस तरक्की से दुनियाभर के आईटी दिग्गजरों की आंखें चौंधिया गई और लोग सत्यम का गुणगान करने लगे. लेकिन इस तरक्की का राज सात जनवरी 2009 को लोगों के सामने आ गया. जब कंपनी के संस्थापक और चैयरमैन राजू ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया. निदेशकमंडल और सेबी को लिखे अपने पत्र में उन्होंने लिखा कि वर्षों से कंपनी की वित्तीय हालत खराब चल रही है. बाजार में कंपनी का रुतबा कायम रखने के लिए साल-दर-साल उन्होंने कंपनी को मुनाफे में दिखाया. जिसके लिए कंपनी के खातों में हेर-फेर की गई. उधर, कंपनी के शेयर में प्रोमोटरों की हिस्सेदारी लगातार घटती चली गई. जिसकी वजह से कंपनी का राज खुलने का खतरा पैदा हो गया. और इससे बचने के लिए उन्होंने अपने पुत्र की स्वामित्व वाली कंपनी मेटास के अधिग्रहण का फैसला किया. उन्होंने कहा कि सत्यम को संकट से उबारने के लिए उन्होंने हरसंभव प्रयास किया, लेकिन उनके तमाम प्रयासों के बावजूद सत्यम की हालत लगातार बिगड़ती चली गई. राजू ने कहा,
"यह बाघ की सवारी करने जैसा है, यह जाने बगैर कि उसका आहार बनने से कैसे बचा जाय"
उन्होंने लिखा कि वो गुनहगार है, खुद को कानून के हवाले करने के लिए तैयार हैं और अब वो हर परिणाम भुगतने के लिए तैयार हैं. इसके बाद जो कुछ हुआ सबके सामने है.
सत्यम के निदेशकमंडल और सेबी को इस आशय का पत्र लिखते हुए उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया. जिस समय उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दिया, उस वक्त(सात जनवरी, समय-11.30 बजे) सत्यम के एक शेयर की कीमत 188 रुपये थी. लेकिन शाम तक इसकी कीमत घटकर चालीस रुपये रह गई. दूसरे दिन यह कीमत 6.25 पैसे के न्यूनतम स्तर पर आ गई. इससे कंपनी में निवेशकों को करीब दस हजार करोड़ का नुकसान हुआ. कंपनी की हालत सबके सामने है. कंपनी पर से निवेशकों का भरोसा उठ गया. उनके कर्मचारियों को सड़क पर आने का डर सताने लगा है. उधर, विप्रो और इंफोसिस जैसे कंपनियों के खातों का हिसाब रखने वाली एजेंसी केपीएमजी का कहना है कि कंपनी में हुए इस घोटाले के लिए अकेले रामलिंग राजू जिम्मेदार नहीं हैं, कंपनी के मुख्यकार्यकारी अधिकारी रिचर्य रेकी ने कहा कि यह सब तर्क से परे है. कोई नहीं कह सकता है कि इस पत्र में जो कुछ लिखा गया है, वह सबका सब सही ही है. अभी इस बात पर भरोसा करना सही नहीं होगा कि जो कुछ भी हुआ उसके लिए अकेले राजू जिम्मेदार है. बल्कि खातों के संचालन से जुड़े तमाम लोगों को सामने लाने की जरूरत है.
दरअसल कंपनी के साथ परेशानी उस वक्त शुरू हुई जब सोलह दिसंबर 2008 को सत्यम कंप्यूटर्स के निदेशकमंडल ने एक मीटिंग बुलाई गई और बैठक में रामलिंग राजू के बेटों की स्वामित्व वाली कंपनी मेटास इंफ्रास्ट्रेक्चर और मेटास प्रोपर्टीज के अधिग्रहण का प्रस्ताव पारित किया. इस अधिग्रहण के पीछे तर्क दिया गया कि
मंदी के इस दौर में वर्तमान विकासदर बनाए रखना नामुमकिन है.
विदेशी मुद्रा के मुकाबले भारतीय मुद्रा में आई गिरावट से भारी दबाव पैदा हुआ है.
बाजार के जिन क्षेत्रों में अब तक विकास देखा जा रहा है, वो मंदी की मार से बुरी तरह प्रभावित हैं.
साथ ही, आउट-सोर्सिंग को लेकर अमेरिकी सरकार ने जो रवैया अपना रखा है, उससे आने वाले समय में परेशानी और भी बढ़ सकती है. ऐसे में आईटी के अलावा बुनियादी ढांचा, ऊर्जा, आदि क्षेत्रों में निवेश करके कंपनी के विकास दर को बरकरार रखा जा सकता है.
बैठक में बताया गया कि भारत अगले पांच सालों में अपने बुनियादी ढांचों पर पांच सौ बिलियन डॉलर, जबकि चीन साढ़े सात सौ बिलियन डॉलर खर्च करेगा. इस लिहाज से बुनियादी ढांचा क्षेत्र में निवेश करना फायदेमंद सौदा साबित हो सकती है.
इन्हीं सब तर्कों के साथ सत्यम निदेशकमंडल ने 7914.10 करोड़ रुपये में मेटास के अधिग्रहण का फैसला किया.
पहले ही मंदी की मार से जूझ रियल स्टेट में निवेश करना सत्यम के निवेशकों को नागवार गुजरा और उन्होंने सत्यम निदेशकमंडल मंडल के इस फैसले का विरोध किया. वाकई लोगों को आश्चर्य हुआ कि आखिर सत्यम ने रियल स्टेट क्षेत्र में कूदने का फैसला क्यों किया. फैसले पर इस बात को लेकर भी ऐतराज था कि आखिर सत्यम के चेयरमैन राजू के बेटे की कंपनी में ही निवेश का फैसला क्यों किया गया.
इसका जवाब राजू ने अपने पत्र में दिया कि सत्यम को खास्ताहाली से उबारने के लिए उन्होंने ऐसा किया. मेटास के अधिग्रहण से कंपनी को जो फायदा होता उससे वह अपने घाटे की भरपाई करती और मेटास की देनदारी से बाद में निपटती. लेकिन निवेशकों के विरोध ने सारा गुड़ गोबर कर दिया. और अधिग्रहण का फैसला टालना पड़ा. पूरे मामले में किरकिरी झेल रहे राजू ने आखिरकार सच को सामने लाने का फैसला किया.
सच सामने आते ही सत्यम पर शिकंजा कसने लगा. सत्यम को जेल की हवा खानी पड़ी. सेबी ने सत्यम के शेयरों पर प्रतिबंध लगा दिया. उधर, न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज में भी सत्यम के शेयरों पर प्रतिबंध लगा दिया. सत्यम पर दर्जनों मामले दर्ज कराए गए. सरकार ने सत्यम के कामकाज की देखभाल के लिए तीन सदस्यीय समिति बना डाली. समिति ने अपना कामकाज भी शुरू कर दिया.
उधर, सत्यम के खातों की जांच की जिम्मेदारी एसएफआईओ(सीरियस फ्रॉड इन्वस्टीगेशन ऑफिस) को सौंप दी गई है. विभाग को तीन माह में रिपोर्ट सौंपने को कहा गया है. यानी जब तक रिपोर्ट आएगी सरकार लोकसभा चुनाव में पूरी तरह उलझी रहेगी. पूरे रिपोर्ट का क्या हश्र होना है, एक सामान्य प्रबुद्ध नागरिक जरूर जानता है. केंद्र और राज्य में कांग्रेस की सरकार है, वह सत्यम और राजू को बचाने के लिए पूरी तरह खुलकर सामने आ गई है. तर्क ये दिया जा रहा है कि सरकार को कर्मचारियों के हितों की चिंता है. यानी सरकार हर महीने 520 करोड़ रुपये के हिसाब से तीन महीने तक कर्मचारियों को सेलरी देगी. देश में करोड़ों लोग बेरोजगार हैं, लाखों लोग रोज सड़कों पर आ रहे हैं, सरकार को इन लोगों की चिंता क्यों नहीं है. आखिर सत्यम के उन कर्मचारियों की चिंता सरकार को क्यों सताने लगी जो कम से कम पचास हजार रुपये माहवारी वेतन पाते रहे हैं. क्या इसलिए कि वो आरामपसंद जिंदगी जीने के आदि हो चुके हैं और अब मुखलिसी की जिंदगी नहीं जी सकते. उसे बिहार में फंसे चालीस लाख लोंगों की चिंता क्यों नहीं सतायी तो पूरी तरह बर्बाद हो चुके हैं. उस समय 1000 करोड़ रुपये की घोषणा करने के लिए प्रधानमंत्री को हवाई सर्वेक्षण करना पड़ा, लालू और रामविलास से वोट के गणित सुलझाने पड़े और आज दो हजार करोड़ रुपये देने में थोड़ी भी हिचक नहीं आ रही है.
हमें भी ये भी पता है कि सरकार ने उन पैसों पर भी टैक्स लिया है, जिसे सत्यम ने कभी कमाया ही नहीं, आखिर, सरकार अब तक कहां सोती रही. उसे क्यों नहीं पता चला कि सत्यम के लाभ का चिट्ठा पूरी तरह झूठ का पुलिंदा है. वह और कब तक सोती रहेगी. आर्थिक विकास के आंकड़ों में वह जनता को कब तक ठगती रहेगी. वह उद्योग घरानों के खातों की क्यों नहीं जांच करवाती है. शायद सरकार भी जानती है कि वह जिन लोगों से जांच करवाएगी वो लोग अपनी क्षमता से कम और उपहारों से ज्यादा खुश होते हैं. जो बैंकर गरीब किसानों से ऋण वसूली के लिए हर हथकंडा अपनाने से नहीं चूकते वो सत्यम को सालों-साल गलत इंट्री कैसे देते रहे. अब भी सुधरने का वक्त है. विकास के आंकड़ों से बाहर निकलकर ठोस धरातल पर कुछ करने की जरूरत है.