हिंदी शोध संसार
धर्म लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
धर्म लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 1 अप्रैल 2013

हिंदूत्व का प्रचार है योग सीखना? योग तंदुरुस्ती की सार्वभौमिक भाषा- ह्वाइट हाउस

दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कहा, नहीं, बिल्कुल नहीं। योग सीखना हिंदू धर्म का प्रचार कतई नहीं है। ओबामा ने सिर्फ कहा नहीं, बल्कि उन्होंने इसे एक आवश्यक शारीरिक अभ्यास के रूप में खुले दिल से अपनाया भी। वो भी उस वक्त जब इस प्राचीन भारतीय जीवन पद्धति को हिंदूत्व प्रचार का माध्यम बताकर अमेरिका के कई स्कूल इसके खिलाफ मोर्चाबंदी कर रहे हैं।
ह्वाईट हाउस के पिछले सप्ताह की घोषणा में कहा गया है कि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और उनकी पत्नी मिशेल ओबामा सोमवार को परंपरागत ईस्टर एग रॉल उत्सव के दौरान बच्चों और उनके अभिभावकों के लिए एक "योगा गार्डन" का आयोजन करेंगे। राष्ट्रपति भवन परिसर में आयोजित ईस्टर समारोह में शामिल होने वाले लोगों को याद दिलाया गया कि इस उत्सव की थीम "स्वस्थ रहो, सक्रिय रहो और स्वस्थ होओ” है, लिहाजा इस अवसर पर राष्ट्रपति भवन परिसर यानी ह्वाइट हाउस लॉउन में देशभर से आने वाले अमेरिकी लोगों और बच्चों से अपील की गई है कि वो प्रशिक्षित पेशेवर योग शिक्षकों से योग कक्षा का आनंद उठाएं। 
 
ये पहलीबार नहीं है, जब ओबामा ने ईस्टर के मौके पर अपने आवास पर योग कक्षा का आयोजन किया हो, लेकिन इस साल इस आयोजन का विशेष महत्व इसलिए है कि स्कूलों में योग सिखाने को चुनौती देने वाली याचिका की कैलिफोर्निया की एक अदालत में सुनवाई चल रही है। सैन डियागो की अदालत में गुरुवार को मामले में याचिका दायर की गई।
अमेरिका के लोगों के जीवन में योग इस कदर शामिल हो गया है कि जब कोई इस पर सवाल उठाता है तो सामने वाला सवाल उठाने वाले को बड़ी ही हैरानी से देखने लगते हैं कि आखिर योग पर भी किसी को आपत्ति हो सकती है।
सैन डियागो कोर्ट में भी कुछ ऐसा ही हुआ। मामले की सुनवाई कर रहे वरिष्ठ जज जॉन मेयर खुद योगाभ्यास करते हैं, सुनवाई की शुरुआत में ही उन्होंने पूछ दिया कि क्या इससे भी किसी को कोई परेशानी है।
हालांकि याचिकाकर्ताओं के वकील को जज की इस टिप्पणी से तब तक कोई आपत्ति नहीं है, अगर मेयर खुले दिमाग से योग के आध्यात्मिक संबंधों पर बहस को सुने।
याचिका में कहा गया है कि योग मूल रूप से धर्म से जुड़ा हुआ है। हालांकि जज मेयर समेत ज्यादातर अमेरिकी ऐसा नहीं मानते हैं कि योग का किसी धर्म से कोई संबंध है, बल्कि वो इसे शरीर को स्वस्थ रखने का अभ्यास मानते हैं।
जज जॉन मेयर सहज योग का अभ्यास करते हैं। याचिका पर सुनवाई करते हुए उन्होंने टिप्पणी की कि अगर आपको लगता है कि योग कोई धार्मिक संबंध है तो ये मेरे लिए एक बड़ी खबर है।

अदालत में मामले की सुनवाई के बीच, ह्वाईट हाउस देशवासियों, खासकर बच्चों को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करने में जुटा है। ये जागरूकता उस चिंता से जुड़ी हुई है, जिसका संबंध लगातार देश के गिरते स्वास्थ्य और तेजी से बढ़ रहे स्वास्थ्य खर्च से है। दरअसल इसकी पहल बराक ओबामा की पत्नी मिशेल ओबामा की ओर से हुई है, जो खुद योग, स्वास्थ्य और सेहत की दीवानी हैं।
योग गार्डन का आयोजन एक प्रमाणित योग शिक्षक, लीह क्यूलिस द्वारा किया जा रहा है। 2009 में ओबामा के राष्ट्रपति बनते ही, ह्वाईट हाउस ने लीह से संपर्क किया। लीह के पति जॉन लिपफर्ट इवेंट मैंनेजर (समारोह प्रबंधक) हैं, जिन्होंने ओबामा के शपथ ग्रहण समारोह के आयोजन की जिम्मेदारी संभाली। लिपफर्ट अभिभावकों और बच्चों को योग सिखाने के लिए पूरे अमेरिका से शिक्षकों के चयन की जिम्मेदारी संभालते हैं।
ह्वाइट हाउस की इस पहल पर क्यूलिस का कहना है कि इस आयोजन का उद्देश्य परिवारों और बच्चों को सक्रिय जीवनशैली के उन सामान्य सू्त्रों को बताना है, जिसके लिए न तो किसी के सहयोग की जरूरत है और ना ही पैसे की। लोग घर जाकर खुद इसे कर सकते हैं।
दरअसल, ह्वाइट हाउस ने अपने योग अभियान को दो कदम और आगे ले जाते हुए-- आम अमेरिकियों को शारीरिक गतिविधि करने और स्वस्थ खानपान को अपने दैनिक जीवनशैली के रूप में अपनाने के लिए प्रोत्साहित करने हेतु प्रेजिडेंसियल एक्टिव लाइफस्टाइल अवार्ड यानी राष्ट्रपति सक्रिय जीवनशैली पुरस्कार की शुरुआत की है। योग अभ्यास को अपनाते हुए ह्वाइट हाउस ने इसके किसी धर्म से जुड़े होने की बात को खारिज कर दिया है।

योग के खिलाफ दायर याचिका और इसपर विवाद का जिक्र किए बगैर ह्वाइट हाउस ने कहा कि धर्म और संस्कृतियों की सीमा को लांघते हुए योग अमेरिका में आध्यात्मिक अभ्यास की एक सार्वभौमिक भाषा बन चुकी है। ह्वाइट हाउस की ओर से कहा गया है कि हर दिन सर्वांगीन तंदुरुस्ती और स्वास्थ्य सुधार के लिए लाखों लोग योग का अभ्यास करते हैं, इसलिए हम सबको योग कक्षा में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं। ह्वाइट हाउस ने लोगों से अपील की है कि लोग योग का समर्थन करें और देश के सामने मौजूद चुनौतियों को उत्तर दें।
इस मौके पर ह्वाइट हाउस ने जिन लोगों को आमंत्रित किया है, उनमें भारतीय-अमेरिकी हॉकी खिलाड़ी अजय धाडवाल शामिल हैं, जिन्होंने अमेरिका का प्रतिनिधित्व किया।

मंगलवार, 2 अगस्त 2011

संतकवि रसखान की अनुपम कृति

  • मानुष हौं तो वही रसखानि, बसौं बृज गोकुल गांव के ग्वारन।
  • जो पशु हौं, तो कहां बस मेरो, चरौं नित नंद की धेनु मझारन।।
  • पाहन हौं, तो वही गिरि को, जो धरयों कर छत्र पुरंदर धारण।
  • ज्यौ खग हौं, तो बसेरो करौं मिली कालिंदीकूल कदम्ब की डारन।

  • या लकुरि अरु कामरिया पर, राज तिरु पुर को तजि डारौं।
  • आठों सिद्धि नवों निधि को सुख, नंद की धेनु चराई बिसारौं।।
  • इन आंखन सौं कबौं रसखानि, बृद के वन-बाग तड़ाग निहारौं।
  • कोटिक हौं कलधौत के धाम, करील के कुंजन ऊपर वारौं।।

  • मोर-पंखा सिर ऊपर राखिहौं, गुंज की माल गरे पहिरौंगी।
  • ओढ़ि पितंबर ले लकुटी, बन गोधन ग्वारिन संग फिरौंगी।।
  • भाव तो वोहि मेरी रसखानि, सो तेरे कहे सब स्वांग भरौंगी।
  • या मुरली मुरलीधर की, अधरान धरि अधरा ना धरौंगी।।

  • शेष महेश गणेश दिनेश, सुरेशहूं जाहि निरंतर गावै
  • जाहि अनादि अनंत अखंड, अछेद अभेद सुदेव बतावै।।
  • नारद से सुक व्यास रटै, पचि हारे तौ पुनि पार ना पावै।
  • ताहि अहीर की छोहरिया, छछिया भर छाछ पे नाच नचावै।।

  • धूरि भरे अति शोभित श्याम जू, जैसी बनी सिर सुंदर चोटी।
  • खेलत खात फिरै अंगना, पग पैरी बाजती पीरी कछौटी।।
  • जा छवि को रसखान विलोकत, बारत काम कलानिधि कोटी।
  • काग के भाग कहा कहिए, हरि हाथ सों ले गयो माखन रोटी।ष

  • बैन वही उनको गुन गाई, औ कान वही उन बैन सो सानी।
  • हाथ वही उन गात सरै, औ पाइ वही जो वही अनुजानी।।
  • आन वही उन आन के संग, और मान वही जु करै मनमानी।
  • त्यों रसखानि वही रसखानि, जो है रसखानि सो है रसखानि।।

  • शंकर के सुर जाहि जपै, चतुरानन ध्यावै धर्म बढ़ावै।
  • नैक हिये जिहिं आनत ही, जड़ मूढ़ महा रसखानि कहावै।।
  • जा पर देव अदेव भू अंगना, वारत प्राणन प्राणन पावै।
  • ताहि अहीर की छोहरिया, छछिया भर छाछ पे नाच नचावै।।

रविवार, 19 दिसंबर 2010

मुझे गर्व है कि मैं हिंदू हूं

मैं घोषणा करता हूं कि मैं एक हिंदू हूं, हिंदू इसलिए कि यह हमें स्वतंत्रता देता है, हम चाहें जैसे जिए. हम चाहें ईश्वर को माने या ना माने. मंदिर जाएं या नहीं जाएं, हम शैव्य बने या शाक्त या वैष्णव. हम चाहे गीता का माने या रामायण को, चाहे बुद्ध या महावीर

गुरुवार, 18 नवंबर 2010

विजय रथ

Lord Shri Ram Chander Ji 03

रावण रथी विरथ रघुवीरा।

देख विभीषण भयहुं अधीरा।।

अधिक प्रीति मन भा संदेहा।

बंदि चरण कह सहित सनेहा।

नाथ ना रथ नहीं तन पद त्राणा।

कहिं विधि जीतब वीर बलवाना।

सुनहुं सखा कह कृपा निधाना।

ज्यों जय होई स्यंदन आना।।

सौरज धीरज तेहिं रथ चाका।

बल विवेक दृढ़ ध्वाजा पताका।।

सत्य शील दम परहित घोड़े।

क्षमा दया कृपा रजु जोड़े।

ईश भजन सारथि सुजाना।

संयम नियम शील मुख नाना।

रखा धर्म अस रथ जाके।

जीत न सकहिं कतहुं रिपु ताके।।

महा अजय संसार रिपु जीति सकहिं जो वीर।

जाके अस बल होहिं दृढ़ सुनहु सखा मतिधीर।।

सोमवार, 3 मई 2010

"मेरी जंग पेट्रो-डॉलर इस्लाम के खिलाफ है"

  • कोई भी धर्म सबसे बड़ा या ऊंचा नहीं है
  • गैर-धर्म को मानने वाले लोग नर्क नहीं जाएंगे
  • इस्लाम कोई नया धर्म नहीं है
  • इस्लाम में वही बातें हैं, जो पहले विभिन्न धर्मों में कही गई थीं
  • पूरी दुनिया में इस्लामिक साम्राज्य की स्थापना का लक्ष्य पेट्रो-डॉलर और प्रेमियों और जेहादियों का है, इस्लाम का नहीं.
मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना. अगर मजहब आपस में बैर रखना नहीं सिखाता है तो क्या सिखाता है. निस्संदेह आपस में प्रेम03052010404 03052010405 करना और सह-अस्तित्व सिखता है. लेकिन कई धर्मभीरू लोग सोचते हैं कि मेरा धर्म सबसे ऊंचा है और जो लोग इस धर्म को नहीं मानते हैं वो नर्क जाएंगे. ऐसे लोग अन्य धर्मावलंबियों को अपने धर्म के दायरे में लाना अपना धार्मिक कतर्व्य समझते हैं. ऐसे लोगों को लगता है कि ऐसा करने से उनका भगवान उन्हें स्वर्ग प्रदान करेगा.
दरअसल धार्मिक सर्वोत्कृष्टता का ये सिद्धांत ही दुनिया की अस्थिरता की वजह है. धार्मिक सर्वोत्कृष्टता की मानसिकता इस्लाम धर्म के अनुयायियों के बीच फैलायी गई है. इस सिद्धांत को फैलाने के लिए अरब देशों के पेट्रो-डॉलर का इस्तेमाल किया गया है. इस्लाम का ये नया रूप पेट्रो-डॉलर इस्लाम के नाम से जाना जाता है. इस नए इस्लाम के संस्थापकों और अनुयायियों ने पूरी दुनिया में नव प्रकल्पित इस्लामिक साम्राज्य की स्थापना के लिए बीड़ा उठा रखा है. वो आतंक के जरिए पूरी दुनिया में इस्लाम फैलाना चाहते हैं.
नव प्रकल्पित पेट्रो-डॉलर इस्लाम मूल इस्लाम के लिए खतरनाक है. यह बहु-पंथवादी, धर्मनिरपेक्षतावादी समाज के लिए खतरनाक है. यह इस्लाम, धर्म को व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मामला नहीं रहने देता है, बल्कि यह धर्म को इंसान के ऊपर थोपता है, यही वजह है कि इसने मूल इस्लाम को बदनाम कर रखा है. इसलिए मूल इस्लाम के अनुयायी इस नव प्रकल्पित इस्लाम का विरोध कर रहे हैं. नव प्रकल्पित इस्लाम का विरोध करने वालों की कमी नहीं है, लेकिन उनकी आवाज को दबाने की हर संभव कोशिश की जाती रही है. लेकिन कुछ आवाज हैं, जो तमाम झंझावातों के बावजूद मुखर होकर निकल रही हैं-
उन्हीं आवाजों में से एक आवाज है- सुल्तान शाहीन की.
सुल्तान शाहीन दिल्ली में रहते हैं. अपनी वेबसाइट www.newageislam.com के जरिए शाहीन जेहादियों और पेट्रो-डॉलर नव इस्लाम के खिलाफ जंग लड़ रहे हैं. शाहीन की जंग न सिर्फ तालिबान और उनके समर्थकों के खिलाफ है बल्कि उन इस्लामिक सर्वोच्चतावादियों के खिलाफ भी है, जो दावा करते हैं कि इस्लाम ही एक मात्र धर्म है, जो स्वर्ग तक पहुंचा सकता है. एक तरफ शाहीन जहां कट्टरवाद और सर्वोच्चतावाद के खिलाप जंग लड़ रहे हैं, वहीं, वो सहिष्णु, बहुपंथवादी इस्लाम के प्रति लोगों का रूझान बढ़ा रहे हैं.
शाहीन की वेबसाइट के पाठकों की संख्या लाखों में है. एक लाख सत्रह हजार तो केवल सब्सक्राइबर हैं(सब्सक्रिप्सन मुफ्त है). शाहीन के लेखों को पढ़ने वालों में भारतीय भी हैं और आस्ट्रेलियाई भी. अरब भी है और अमेरिकी भी. मुंबई के डॉ जाकिर नाइक इस्लाम को सबसे ऊंचा धर्म मानते हैं और उसे स्थापित करने की कोशिश भी करते हैं, यही वजह है कि वो शाहीन के आलोचक हैं. लेकिन इस्लामिक विद्वान नियाज फतेहपुरी शाहीन के विश्लेषण के कायल हैं.
शाहीन का जन्म बिहार के औरंगाबाद में हुआ. वे एक मौलवी के पुत्र हैं. इनका बचपन बहुत ही मुश्किलों में बीता. कम उम्र में ही पिता चल बसे. पांच भाई-बहनों की जिम्मेदारी शाहीन के कंधों पर आ पड़ी. पटना कॉलेज में पढ़ाई करते वक्त उन्होंने एक स्थानीय उर्दू दैनिक में पार्ट-टाइम काम करना शुरू कर दिया. भारतीय मूल के आरिफ अली की साप्ताहिक पत्रिका एशिया टाइम्स के संपादन के लिए वे लंदन गए. एक दशक के लंदन प्रवास के दौरान उन्हें इस्लाम और मुसलमानों की सच्चाई के बारे में उन्हें पता चला. उन्होंने वहां एक युवक से सुना, जो मुसलमान अहले हदीस को नहीं मानते हैं, उनकी हत्या कर दी जानी चाहिए. इस युवक की बात ने उन्हें परेशान कर दिया. इस युवक का संबंध अल मुजाहिद्दीन और हिजबुल तहरीर जैसे कट्टपंथी संगठनों से था. ओमर बकरी ने वहां के हजारों मुस्लिम युवकों का ब्रेनवाश किया. शाहीन को चिंता सता रही थी कि ये कट्टपंथ भारतीय उपमहाद्वीप तक न पहुंच जाए और भारतीय युवकों को अपना ग्रास न बना लें.
जब वे भारत में आए तब उन्हें भारत में भी कट्टपंथ उस कट्टरपंथ का सामना करना पड़ा यानी वो कट्टरपंथ भारत में भी पैर जमा चुका है. नब्बे के दशक में शाहीन दिल्ली में एक पत्रिका का संपादन का काम संभाल रहे थे. ये पत्रिका कथित तौर पर प्रभावशाली, शिक्षित और प्रतिभाशाली लोगों की थी. शाहीन ने पत्रिका के संपादन का काम कुछ महीने पहले ही संभाला था कि प्रबंधक मंडल के एक सदस्य ने पूछा- तुम ने एक दशक पहले एक हिंदू लड़की से शादी की थी, तुमने उसे अभी तक मुसलमान क्यों नहीं बनाया. शाहीन ने कुरान की एक आयत का जिक्र करते हुए कहा कि
धर्म मजबूरी या जोर-जबरदस्ती की चीज नहीं है और इस्लाम धर्म स्वीकारना या नहीं स्वीकारना उसका निजी मसला है
. बात इतनी सी थी और शाहीन को नौकरी से निकाल दिया गया. नौकरी जाने से वे सदमे में आ गए. सबसे बड़ा सदमा तो उन्हें इस बात का लगा कि जिन लोगों ने उनके साथ ये दुर्व्यवहार किया वे भारतीय मुस्लिम समुदाय के मक्खन(क्रीम) समझे जाते हैं.
नौकरी जाने के बाद शाहीन स्वतंत्र पत्रकारिता करने लगे. अपने लेखों में उन्होंने कट्टपंथी मानसिकता का खुलकर विरोध किया, जिसे बहुपंथवादी-बहुसांस्कृतिक भारतीय समाज और भारतीय इस्लाम को खतरा है. यही वजह थी कि संघ परिवार और भाजपा के कई नेताओं ने उन्हें मुस्लिम समाज तक पहुंचने का उचित रास्ता समझा, लेकिन शाहीन का कहना है कि बहुत से मुसलमान ही उनसे घृणा करते हैं. इसलिए वे उस समाज तक पहुंचने का सही रास्ता नहीं बन सकते. ये लोग शाहीन को काफिर और पाखंडी तक कहते हैं.
अपनी बात लोगों तक पहुंचाने के लिए उन्होंने अंतर्जाल को अपना माध्यम बनाया, जिसने कई कठमुल्लाओं को चिढ़ा दिया. कई बार तो इनकी वेबसाइट को हैक कर लिया गया, लेकिन अब शाहीन ने अपना काम जारी रखा है. आज उनकी साइट सुपरहिट है.
शाहीन का कहना है कि

आदम, मोसा और मोहम्मद साहब की तरह राम और कृष्ण भी उनके लिए पैगंबर हैं और हजरत मोहम्मद की तरह हजरत राम और हजरत कृष्ण कहने में उन्हें कोई परहेज नहीं है.

रविवार, 29 नवंबर 2009

जगदगुरु रामानंदाचार्य करेंगे गुंडी के भगवान रंगनाथ मंदिर में पूजन


आरा, 29 नवंबर। रामानंदी वैष्णव सम्प्रदाय के मुख्य आचार्य जगदगुरु रामानंदाचार्य पद प्रतिष्ठित स्वामी रामनरेशाचार्य जी महाराज भोजपुर जिले के गुंडी स्थित भगवान रंगनाथ के प्रसिद्ध मंदिर में पूजन करेंगे। इसके लिए मंदिर प्रबंधन ने विशेष तैयारियां शुरू कर दी है। बैरागी सम्प्रदाय से जुड़े संत-महात्मा और वैष्णव भक्तजन भी अपने स्तर से आचार्यश्री के स्वागत औऱ अभिनंदन की तैयारियों में जुटे हैं।
रामानंद सम्प्रदाय के मूल आचार्यपीठ, श्रीमठ , काशी के वर्तमान पीठाधीश्वर स्वामी रामनरेशाचार्यजी महाराज इसके निमित्त तीन दिनों के प्रवास पर आरा आ रहे हैं। वे 8 दिसम्बर को दोपहर तक आरा पहुंचेंगे औऱ अल्प विश्राम के बाद गुंड़ी के लिए प्रस्थान करेंगे। उनकी यात्रा की तैयारियों में जुटे सतेन्द्र पाण्डेय ने बताया कि आरा जीरो माईल पर हीं गाजे-बाजे के साथ महाराजश्री का जोरदार स्वागत किया जाएगा। फिर वे कतीरा स्थित नागरमल बगीचे में विश्राम के लिए रूकेंगे। स्थानीय भक्तगण इस दौरान उनका आरती-पूजन कर स्वागत करेंगे। अपराह्न तीन बजे से उनका काफिला गुंडी के लिए रवाना हो जाएगा। रास्ते में भी जगह-जगह उनके स्वागत की तैयारियां की जा रही है। भगवान रंगनाथ मंदिर के व्यवस्थापक डॉ. बबन सिंह ने बताया कि सरैंया बाजार पर महाराजश्री को हाथी-घोड़े ,बैण्ड-बाजे के साथ हजारो भक्त स्वागत करेंगे। वहां से शोभा यात्रा की शक्ल में वे गुंडी तक जाएंगे। शाम को प्रवचन का कार्यक्रम मंदिर परिसर में हीं निर्धारित है। दूसरे दिन सुबह वे षोडशोपचार विधि से भगवान रंगनाथ का पूजन करेंगे। काशी से पधारे वैदिक विद्वान औऱ श्रीमठ के वेदपाठी छात्र पूजन में पुरोहित का कार्य सुसम्पन्न करेंगे। शाम में पुनः स्थानीय श्रद्धालुओं को आचार्यश्री के अमृत वचन का लाभ मिल सकेगा। तीसरे दिन वे आरा होते हुए काशी के लिए प्रस्थान कर जाएंगे।
गुंडी स्थित भगवान रंगनाथ के मंदिर में रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य का ये दूसरा प्रवास होगा। इससे पहले सन् 2001 में वे भगवान का दर्शन करने गुंडी गये थे। आयोजन से जुड़े लोग बताते हैं कि तभी आचार्यश्री ने दूसरी बार आकर भगवान के पूजन करने का संकल्प व्यक्त किया था। भगवान रंगनाथ का मंदिर भोजपुर जिले में अपनी तरह का इकलौता मंदिर है जो दक्षिण भारतीय शैली में निर्मित है और सैकड़ो वर्ष पुराना है। मंदिर का वास्तु शिल्प देखते हीं बनता है। इसका गोपुरम् इस प्रकार से बना है कि रोज प्रातः भगवान भाष्कर की रश्मियां भगवान का अभिषेक करती हैं। कुछ साल पहले तक दक्षिण भारत के पुजारी हीं यहां की व्यवस्था और पूजा-पाठ की जिम्मेदारियां संभालते थे। इस रुप में ये मंदिर उत्तर भारत औऱ दक्षिण भारत के बीच एक सांस्कृतिक सेतु का भी काम करता है। माना जा रहा है कि रामभक्ति परंपरा के मूल आचार्य पीठ के मुख्य आचार्य के आगमन और पूजन से जनमानस के बीच मंदिर की विशेषता को लेकर चर्चा तेज होगी औऱ शासन-प्रशासन का ध्यान भी इसकी ओर जाएगा। यदि ऐसा होता है तो गुंडी को पर्यटन केन्द्र के रुप में विकसित करने की मांग फिर से जोर पकड़ेगी, जो हाल वर्षों में मंद पड़ गयी थी।
यहां उल्लेख करना जरूरी है कि जगदगुरु रामानंदाचार्य की गद्दी पर विराजमान स्वामी श्रीरामनरेशाचार्यजी महाराज का भोजपुर से गहरा सरोकार है। उनकी जन्मभूमि इसी जिले के परसियां गांव में है। ये अलग बात है कि अपने संकल्पों के चलते घर छोड़ने के बाद जन्मभूमि पर वे नहीं गये। उनके ग्रामीण औऱ श्रद्धालु भक्त बार-बार के आग्रह के बावजूद आचार्यश्री को परसियां ले जाने में असफल रहे हैं। बाल्यावस्था में हीं घर छोड़कर काशी गये स्वामीजी ने किशोरवय में हीं वैष्णवी दीक्षा ली और विरक्त संन्यासी हो गये। काशी में रहते हुए छह दर्शनों में उन्होंने सर्वोच्च उपाधियां अर्जित की औऱ न्याय शास्त्र के पारंगत विद्वान के रूप में देश भर में मान्य हुए। संस्कृत विद्वानों की पाठशाला के नाम से चर्चित हरिद्वार के कैलास आश्रम में कई वर्षों तक उन्होंने न्याय दर्शन पढ़ाया। इनसे पढ़े हुए अनेक लोग देश के कई प्रमुख विश्वविद्यालयों में संस्कृत के प्राध्यापक हैं और अनेक शिष्य मठ-मंदिरों के प्रधान के रुप सनातन धर्म की सेवा में संलग्न हैं। रामानंद सम्प्रदाय के विशिष्ठ संत-महात्माओं ने वर्ष 1988 में उन्हें श्रीमठ लाकर जगदगुरू रामानंदाचार्य पद पर प्रतिष्ठित किया, तब से लगातार भारत के कोने -कोने में फैले विशाल बैरागी समाज के संत-महात्माओं औऱ दुनिया भर के राम भक्तों का वे मार्गदर्शन कर रहे हैं। सम्प्रति वे हरिद्वार में दुनिया का सबसे बड़ा राममंदिर बनाने में संलग्न हैं .


जय हिंदी जय भारत

बुधवार, 11 नवंबर 2009

कार्यफल जानिए- रामश्लाका प्रश्नावली से

सु

प्र

बि

हो

मु

सु

नु

बि

धि

रु

सि

सि

रहिं

बस

हि

मं

अं

सुज

सो

सु

कु

धा

बे

नो

त्य

कु

जो

रि

की

हो

सं

रा

पु

सु

सी

जे

सं

रे

हो

नि

हुं

चि

हिं

तु

का

मि

मी

म्हा

जा

हू

हीं

ता

रा

रे

री

हृ

का

खा

जू

रा

पू

नि

को

जो

गो

मु

जि

यँ

ने

मनि

हि

रा

मि

री

न्मु

खि

जि

जं

सिं

नु

को

मि

निज

र्क

धु

सु

का

गु

रि

नि

ढ़

ती

ना

पु

तु

नु

वै

सि

हुं

सु

म्ह

रा

ला

धी

री

हू

हीं

खा

जू

रा



रे



श्री रामश्लाका प्रश्नावली वर्ण महिमा का अद्वितीय उदाहरण है. गोस्वामी तुलसीदास का सानिध्य पाकर इन शब्दों की गरिमा और भी बढ़ गई है. इसकी महिमा स्वयंसिद्ध है.  आप किसी कार्य के बारे में जानने के लिए उत्सुक हैं उसके परिणाम को लेकर मन में उधेरबुन है तो इस रामश्लाका प्रश्नावली से इस उधेरबुन को दूर सकते हैं. इस प्रश्नावली के किसी एक बक्से के अक्षर या अक्षरों या मात्रा(बक्से में जो कुछ हो) को पुस्तिका पर लिख लें. फिर जैसे मैंने चुना, फ(दूसरी पंक्ति में रेखांकित) अब इस फ को छोड़कर, उसके नवें अक्षर या अक्षरों या मात्रा का चुनिये. जैसे मेरे चुने हुए ये अक्षर ल आया. फिर ल को छोड़कर, उसका नौवा अक्षर. इसी तरह आगे तब तक बढ़ें जब सबसे पहले चुने अक्षर पर न पहुंच जाएं.  चुने हुए अक्षरों या मात्रा को लिखते जाए. इससे एक चौपाई बनती है. बस यही चौपाई आपके प्रश्न का उत्तर है.
जैसे मेरे चुने हुए फ से जो चौपाइ बनी-
सु फ ल म नो र थ हो हुं तु म्हा रे  रा मु ल ख नु सु नि भ ए सु खा रे
इस प्रश्नश्लाका से कुल नौ चौपाइयां बनती हैं जो इस प्रकार फलाफल देती हैं-
1. सुनु सिए सत्य असीस हमारी। पूजिहि मन कामना तुम्हारी।।
फल- ये प्रसंग श्री सीताजी के गौरी पूजन के दौरान आया है और गौरी जी ने सीता माता को आशार्वाद दिया है कि तुम्हारा मनोरथ पूरा होगा. यानी प्रश्नकर्ता का प्रश्न उत्तम है और अभीष्टकार्य सिद्ध होगा.
2. प्रबिसि नगर कीजे से काजा। हृदय राखि कौसलपुर राजा।।
फल- प्रसंग हनुमान जी के लंका में प्रवेश के समय आया है. प्रश्नकर्ता भगवान का नाम लेकर कार्य शुरू करे, कार्य सिद्ध होगा.
3. उघरहिं अंत न होइ निबाहू। कालनेमि जिमि रावन राहू।।
फल- प्रसंग बालकांड के सत्संग वर्णन प्रसंग में है. प्रश्नकर्ता जाने कि इस कार्य में भलाई नहीं है और कार्य की सफलता में संदेह है.
4. बिधि बस सुजन कुसंग परहीं। फनि मनि सम निज सुन अनुसरहीं.
फल- प्रसंग बालकांड में है. प्रश्नकर्ता से आग्रह है कि वे खोटे मनुष्य का साथ छोड़ दे और कार्य पूरा होने में संदेह है.
5. मुद मंगलमय संत समाजू। जो जग जंगम तीरथराजू।।
फल- प्रश्न उत्तम है और कार्य सिद्ध होगा.
6. गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई।।
फल- प्रश्न श्रेष्ठ है और कार्य सिद्ध होगा.
7. बरुन कुबेर सुरेश समीरा। रन सन्मुख धरि काहुं न धीरा।।
फल- कार्य पूर्ण होने में संदेह है
8. सुफल मनोरथ होहुं तुम्हारे। रामु लखनु सुनि भए सुखारे।।
फल- प्रश्न उत्तम है. कार्य सिद्ध होगा.
9. होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ाबै साखा.
फल- कार्य होने में संदेह है, इसे भगवान पर छोड़ देना अच्छा है.

जय हिंदी जय भारत

मंगलवार, 16 दिसंबर 2008

इस्लाम का सही मायने

दो रोज पहले टाइम्स ऑफ इंडिया में इस्लामिक विद्वान वहीदुद्दीन का एक आलेख पढ़ रहा था. आलेख की शुरूआत उन्होंने एक सवाल से किया- आतंकवाद की समस्या का समाधान कैसे निकले. उन्होंने कहा एक ओर सत्ता अपने बल से आतंकवाद को कुचल देना चाहता है तो दूसरी ओर ऐसे भी लोग है जो इसकी निंदा करते हैं और निंदा करते रह जाते हैं. मगर दोनों ही तरीके नाकाफी साबित होते हैं, तो फिर समस्या का समाधान कैसे हो.
वहीदुद्दीन के मुताबिक, आतंकवाद भी एक विचारधारा पर आधारित है, इसलिए यह जरूरी है कि विचारधारा की लड़ाई विपरीत-विचारधारा से लड़ी जाए. आतंकवाद उस विचारधारा पर आधारित है जो इस्लाम को एक राजनीतिक व्यवस्था मानता है, और वह विचारधारा चाहता है कि पूरी दुनिया में यह व्यवस्था लागू हो जाए. कई युवा इस विचारधारा के प्रति इतने कट्टर है कि वह इस व्यवस्था को पूरी दुनिया में लागू करने के लिए कोई भी कुर्बानी देने के लिए तैयार हैं. यह विचारधारा युवाओं को बताता है कि जिहाद की राह में कुर्बान होने पर उन्हें जन्नत नसीब होगा.
वहीदुद्दीन के मुताबिक, कुरान या हदीस में कहीं भी इस्लामिक साम्राज्य की स्थापना की बात नहीं कही है. दरअसल इस्लाम का मतलब शांति का मजहब होता है. वहीदुद्दीन के हिसाब से इस्लाम की दो बाते उसकी महानता को साबित करने के लिए काफी है- पहला खुदा को अपना सृजनकर्ता मानो और उसके समक्ष खुद का आत्मसमर्पण कर दो. दूसरा, सब के साथ मिल-जुल कर रहो और सबको उसका अधिकार दिलाओ. इस्लाम में एक निर्दोष की हत्या पूरे इंसानियत के कत्ल के बराबर है.
दरअसल इस्लाम को राजनीतिक विचारधारा मानने वाले लोग इस्लाम को नहीं मानते हैं, वे अपनी विचारधारा के प्रति आग्रही होते हैं. इस्लाम का आतंकवाद का कोई लेना देना नहीं है. इस्लाम का ताल्लुक केवल शांति, स्नेह और सहिष्णुता से है.
जेहाज का मतलब शांतिपूर्ण संघर्ष है. यह संघर्ष आंतरिक बुराईयों है. अपने अंदर की बुराइयों से संघर्ष.

गुरुवार, 23 अक्टूबर 2008

तहलका का सच(तरुण तेजपाल के नाम खुला पत्र)

तहलका संपादक के नाम खुला पत्र - साजिद राशिद

प्रिय तरूण तेजपाल जी, मैं तहलका का नियमित पाठक हूं. इसलिए पिछले दिनों जब तहलका ने सिमी पर केन्द्रित अंक निकाला तो मैंने इसे बहुत उत्सुकता से पढ़ा. लेकिन पढ़कर मैं चकित रह गया. मुझे उम्मीद थी कि तीन महीनों की खोजबीन के बाद आपने सिमी के बारे में जो जानकारी दी होगी उससे निश्चित ही मेरी समझ में बढ़ोत्तरी होगी....
यह अपेक्षा इसलिए भी थी क्योंकि तहलका पहले भी इस तरह की खोजी रपटों में हर पक्ष की गहन पड़ताल करता है और सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलुओं को सामने रखता है. लेकिन विद्वान खोजी पत्रकार अजीत साही ने तीन महीने की मेहनत और खोजबीन के बाद सिमी के बारे में जो निष्कर्ष प्रस्तुत किया है वह यह है कि सिमी के पदाधिकारी जिन्हें बम विस्फोटों और देशद्रोह के आरोप मेंगिरफ्तार किया गया है वे बेहद मासूम हैं और उनके खिलाफ कोई सबूत नहीं है. पूरी पत्रकारिता का सारयह है, क्योंकि सिमी पर प्रतिबंध का कोई ठोस आधार नहीं बनता, इसलिए उसपर प्रतिबंध नहीं होनाचाहिए.

मेरे ख्याल से आपके प्रतिनिधि अजीत साही ने तीन महीनों तक ग्यारह शहरों का कष्टदायक सफर तय करके सिमी कार्यकर्ताओं के परिजनों से मिलकर जो मालूमात हासिल की है वह तो बिल्कुल सही है क्योंकि सिमी का अपने बचाव में जो बयान है अजीत साही ने बड़ी ईमानदारी से उसे दर्ज किया है. लेकिनअफसोस सिर्फ इतना है कि उन्होंने इसे कहीं भी क्रास चेक नहीं किया है . और शहरों के बारे में तो नहीं लेकिन मुंबई में अजीत साही ने दूसरा पक्ष जानने के लिए किससे संपर्क किया? मुंबई में अंग्रेजी की वरिष्ठ पत्रकार ज्योति पुनवानी पिछले तीन सालों से मुसलमानों की समस्याओं पर इतना "सहानुभूति पूर्वक" लिखती हैं कि जमात--इस्लामी और सिमी के एक पदाधिकारी ने उन्हें मुसलमान होने का न्यौता ही दे दिया था. साल भर पहले तक ज्योति पुनवानी सिमी को इस्लाम के प्रति अति उत्साही युवाओं का संगठन बताती रही हैं. जमात-ए-इस्लामी के हुकूमत-ए-इलाहिया (दुनियाभर में अल्लाह की हुकूमत) के नजरिये में उन्हें कोई आपत्ति नजर नहीं आती. विशेष न्यायाधिकरण का सिमीसे प्रतिबंध हटाने का फैसला आने के बाद १७ अगस्त को टाईम्स आफ इंडिया में इन्हीं ज्योति पुनवानीने लिखा था हाउ माई परसेप्शन आफ सिमी चेंज्ड, और विस्तार से बताया है कि कैसे सिमी के बारे मेंउनकी धारणा बदल गयी.
तरूण तेजपाल जी, क्या साही से आपको यह नहीं पूछना चाहिए था कि उन्होंने सिमी के चरित्र का दूसरापक्ष जानने की कोशिश क्यों नहीं की? उन्होंनेअपनी पूरी रिपोर्टिंग सिमी के बचाव पक्ष के वकील के तौर पर क्यों किया ? आपने सिमी का जो प्रोफाईल दिया है उसमें उसके संस्थापक मोहम्मद अहमदुल्ला सिद्दीकी के बारे में लिखा है कि उन्होंने १९७७ में उन्होंने सिमी की स्थापना की, लेकिन पाठकों को यह बताने कीजहमत क्यों नहीं उठायी कि कुछ ही सालों बाद सिद्दीकी ने सिमी से अपना नाता तोड़ लिया था . पिछले साल इंडियन एक्सप्रेस को दिये एक साक्षात्कार में उन्होंनेकहा था उन्हें सिमी की स्थापना पर अफसोस है, क्योंकि वह इस्लाम के रास्ते से हटकर जेहाद के रास्तेपर चला गया है. इसी तरह आपनेसिमी और जमात-ए-इस्लामी के संबंध पर सिर्फ इतना लिखा गया है कि वह जमात-ए-इस्लामी का एकउपसंगठन था और वह जमात से अलग अपनी पहचान कायम करना चाहता था जबकि हकीकत यह हैकि सिमी के जेहादी तेवरों को देखने के बाद जमात ने खुद सिमी से अपना रिश्ता तोड़ लिया था . लेकिन यह भी सच है कि यह संबंध विच्छेद एक दिखावा मात्र था.
अब मैं कुछ ऐसे तथ्य रखना चाहूंगा जो अजीत शाही द्वारा ११ शहरों में खोजबीन करने के बाद भी सिमी के बारे में जुटाये नहीं जा सके. १९९६ में अफगानिस्तान में तालिबान की हुकूमत कायम होने के बादसिमी ने उसे अपना आदर्श मानते हुए भारत में नारों और पोस्टरों के जरिए जेहाद का ऐलान कर दिया. २९ अक्टूबर १९९९ को सिमी ने कानपुर में सिमी ने अखिल भारतीय सम्मेलन आयोजित किया था जिसमें देशभर के २० हजार से अधिक प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया था. इस सम्मेलन को फिलीस्तीनी जिहादी संगठन हमास के नेता शेखयासीन अहमद ने संबोधित किया था. आप जानते ही होंगे कि शेख यासीन ने ही इजरायल औरअमेरिका में आत्मघाती हमले करवाये थे. इसी सम्मेलन को फोन द्वारा जमात-ए-इस्लामी (पाक) केअध्यक्ष काजी हुसैन ने भी संबोधित किया था . यह सिमी ही था जिसने कानपुर के तमाम सिनेमघरों को बंदकराने का आदेश दिया था और वहां की लड़कियों को बुर्का पहनने की चेतावनी दी थी.

चलिए मान लेते हैं कि आपका संवावदताता कानपुर नहीं गया था इसलिए इन जानकारियों से मरहूमरह गया हो लेकिन आपको यह पता ही होगा कि सिमी के पांच उद्येश्य हैं- अल्लाह मकसद हमारा, रसूलरहबल हमारा, कुरान कानून हमारा, जिहाद रास्ता हमारा, शहादत मंजिल हमारी. सिमी के लेटरहेड परबने निशान में धरती पर कुरान रखा हुआ है और कुरान पर एके-४७ रायफल . इसलिए सिमी खुद अपने इरादों को छुपाकर नहीं रख रहा है. पृथ्वी पर कुरान और उस पवित्र किताब पर एके-४७ का अर्थ किसी को समझाने की जरूरत नहीं है. सिमी किसके खिलाफ जेहाद करना चाहता है और क्यों शहीद हो जाना चाहता है, क्या इसके पीछे छिपे मकसद को बताना होगा? एक मिनट में डेढ़ सौबुलेट दागनेवाली एके-४७ का इस्तेमाल आखिर किस लक्ष्य के लिए होता है ? हमें तो यह पता है कि इससे निकलेवाली गोलियां जान बचाती नहीं, जान लेती हैं. तरूण जी जितना आपको खाकी पैण्ट और लाठीधारियों से परहेज है उतना ही हमें भी है. छह इंच का चाकूनुमात्रिशूल बांटनेवाले बजरंगदलियों से घृणा होती है, फिर एक-४७ लेकर देहाद का इरादा रखनेवाले हमारीनजर में मासूम कैसे हो सकते हैं? "काफिर भारत" को नेस्तनाबूत कर देने की प्रतिज्ञा लेनेवाले लादेनऔर तालिबान जिनके आदर्श हों उन्हें किन मानदंडों पर आप राष्ट्रवादी साबित करेंगे? आपकी यह रिपोर्ट बहुत सारे उर्दू अखबारों ने अपने यहां छापी है. निश्चित रूप से जो सिमी को इस्लाम का सच्चा खिदमतगार मानते हैं उन्हें आपकी रिपोर्ट से बहुत बल मिला है. लेकिन आपकी इस रिपोर्ट से उन मुट्ठीभर मुस्लिम बुद्धिजीवियों को जरूर धक्का लगेगा जो सिमी की देशविरोधी गतिविधियों से अपने संप्रदाय को सचेत करते रहे हैं. काश तहलका सिमी के मुखौटे के पीछे की असली सच्चाई सामने लाने की कोशिश की होती....

आभार,
साजिद राशिद
(साजिद राशिद संजीदा पत्रकार हैं और जनसत्ता में नियमित कालम लिखते हैं.)

टिप्पणी- ये पत्र तहलका हिंदी पाक्षिक में छपे एक लेख- आतंक के मोहरे या बलि के बकरे, लेख पर छपी से प्रतिक्रिया के लिया गया है. इसका कोई व्यवसायिक उद्देश्य नहीं, साथ ही, ब्लॉग स्वामी ने अपनी को ओर इस लेख में एक शब्द भी नहीं जोड़ा है.

रविवार, 12 अक्टूबर 2008

मुझे गर्व है कि मैं हिंदू हूं.

मैंने वो लेख एक प्रतिक्रिया में लिखी थी.
मैं सर्वश्रेष्ठ रहकर भी किसी को अपने से नीचा नहीं देखना चाहता हूं.
हिंदू धर्म सर्वश्रेष्ठ है, लेकिन ना तो मुस्लिम ना तो ईसाई धर्म इससे कमतर है.
हिंदू धर्म ने हमें यहीं श्रेष्ठता सिखलाई है.
जहां तक मैं हिंदू धर्म को समझ सका हूं, जान सका हूं.
मैं कोई, ज्ञानी-ध्यानी, तपस्वी-योगी नहीं हूं.
तब भी मैं दावा कर सकता हूं कि मैं हिंदू धर्म के मर्म को समझता हूं.
अच्छी तरह समझता हूं.
तुलसी की झाड़ स्वास्थ्यवर्द्धक है, तो किसी ने इसे धर्म से जोड़कर पूजनीय बना है.
न्याय के खिलाफ आवाज उठाना सही है तो कृष्ण ने पार्थ से कहा यही तुम्हारा धर्म है.
मैं गंदे नाली को साफ कर रहा था तो एक बुढिया ने कहा, बेटा, तुम धर्म का काम कर रहे हो.
एक हिंदू के रूप में मैं ग्लानि से भर जाता हूं जब कोई हिंदू किसी धर्म या उसके धर्माबलंवियों को गाली देता है या किसी अन्य धर्म को नीच दिखाने की कोशिश करता है.
क्योंकि ऐसा करना हिंदू धर्म को ही अपना करना है.
भारत में जब एक ओर संतोषं परमं सुखम का मंत्र पढ़ा जा रहा था तो चार्वाक ने कहा-
यावत जीवेत, सुखम जीवेत, ऋणम कृत्वा घृतम पिबेत.
और इस घोर भौतिकतावादी विचारधारा के प्रणेता चार्वाक को हमने ऋषि से सम्मानित किया.
चार वेद लिखे, काम नहीं चला, अठारह पुराण लिख लिए, काम नहीं चला, एक सौ आठ उपनिषद लिख लिए काम नहीं चला. स्मृतियां लिखी, रामायण लिखे, महाभारत लिखे, गीता लिखे, इनमें कौन है हिंदुओं का धर्मग्रंथ. सभी हैं और भी लिखते जाओ सबको शामिल कर लेंगे.
बाइबिल और कुरान को भी उतना ही सम्मान देंगे जितना गीता और रामायण को.
कौन को हिंदुओं के इष्टदेव, सुना था, हिंदुओं के पनपन करोड़ देवता हैं, अब बढ़कर एक बीस करोड़ के करीब हो गए हैं. पैगंबर और ईशुमसीह को भी इसमें शामिल कर लो, कोई बुराई नहीं.
कभी सप्तर्षि हुए, आज आचार्यों और ऋषियों की श्रृंखला काफी बड़ी हो गई है. अनगिनत हैं.
कितना विशाल है हिंदुधर्म.
इसलिए मेरे हिंदू होने पर मुझे गर्व है.
एक हिंदू के रूप में मुझे मुझे राम की स्तुति और राम की आलोचना दोनों सुनने की ताकत है.
सबसे बड़ी ताकत रामपर सवाल उठाने और चर्चा करने की मेरी स्वतंत्रता है.
यही वजह है कि मैं हिंदू धर्म को श्रेष्ठ मानता हूं, साथ ये भी कहता हूं कि और कोई दूसरा धर्म इससे हीन या कमतर नहीं है. श्रेष्ठ बनकर सबको श्रेष्ठ देखने की अभिलाषा हीं हिंदुत्व है.
हिंदूधर्म ने भगवान बुद्ध और महावीर को भी विष्णु का अवतार माना.
हर मत हर संप्रदाय को स्वीकारा, जो जिस रूप में आया, उसी रूप में.
यही मेरा हिंदुत्व है और इसलिए मैं हिंदू हूं. और मुझे अपने हिंदू होने का गौरव है.

शनिवार, 11 अक्टूबर 2008

मैं हिंदू क्यों हूं

मैं घोषणा करता हूं कि मैं एक हिंदू हूं, हिंदू इसलिए कि यह हमें स्वतंत्रता देता है, हम चाहें जैसे जिए. हम चाहें ईश्वर को माने या ना माने. मंदिर जाएं या नहीं जाएं, हम शैव्य बने या शाक्त या वैष्णव. हम चाहे गीता का माने या रामायण को, चाहे बुद्ध या महावीर या महात्मा गांधी मेरे आदर्श हों, चाहे मनु को माने या चार्वाक को. यही एक धर्म है जो एक राजा को बुद्ध बनने देता है, एक राजा को महावीर, एक बनिया को महात्मा, एक मछुआरा को वेदव्यास. मुझे अभिमान है इस बात का कि मैं हिंदू हूं. लेकिन साथ ही मैं घोषणा करता हूं कि मुस्लिम धर्म और ईसाई धर्म भी मेरे लिए उतने ही आदरणीय हैं जितना हिंदू धर्म. पैगम्बर मोहम्मद और ईसा मसीह मेरे लिए उतने पूज्य हैं जितने कि राम. लेकिन मैं फिर कहना चाहूंगा कि मैं हिंदू हूं, क्योंकि हिंदू धर्म मुझे इसकी इजाजत देता है. अच्छे मुसलमान और ईसाई से मैं उतना ही प्रेम करता हूं जितना एक अच्छे हिंदू से. लेकिन एक बूरे हिंदू से मैं उतना ही दूर रहना चाहूंगा, जितना एक बूरे मुसलमान और ईसाई से. हिंदू धर्म कम से कम मुझे यही सिखाता है. इस सीख, इस समझ के लिए मैं आजीवन हिंदू धर्म का आभारी रहूंगा.
मेरा मंतव्य साफ है कि न तो सभी हिंदू बूरे और न ही सभी मुसलमान और ईसाई ही. लेकिन हमारे देश के नब्बे प्रतिशत नेता सिर्फ बूरे की श्रेणी में ही नहीं, गद्दार की श्रेणी में भी आते हैं. वे राष्ट्र द्रोही हैं और सत्ता के लिए देश को बेचने के लिए भी तैयार हैं.
इन नेताओं में ज्यादातर कांग्रेस पार्टी, कम्युनिष्ट पार्टी, समाजवादी पार्टी, लोक जनशक्तिपार्टी और राजद के नेता शामिल हैं.
धर्म-निरपेक्षता के नाम पर ये लोग अपना वोट बैंक बनाने में लगे रहते हैं.
मुसलमानों को मुख्यधारा की शिक्षा में शामिल नहीं कर उनके मदरसों के लिए फंड जारी करते हैं. वे नहीं चाहते हैं कि वे मुख्य धारा की शिक्षा में शामिल हों और देश का नागरिक बने. वे चाहते हैं कि वे सिर्फ उनका वोटबैंक बने रहें.
मुसलमानों को एक आम भारतीय नहीं मानकर, उनके लिए धर्म के आधार पर विशेष पैकेज जारी करते हैं.

गुरुवार, 11 सितंबर 2008

विजय-सूत्र

मैं हाईस्कूल में पढ़ता था. स्कूल में तुलसी जयंती मनाई जा रही थी. मैंने भी भाषण और कविता पाठ प्रतियोगिता में हिस्सा लिया था. कविता पाठ के लिए मैंने तुलसी रामायण की कुछ चौपाइयां उस वक्त याद की थी, वो आज भी मुझे बेहद अच्छे लगते हैं. इन चौपाइयों भगवान राम ने विभीषण को विजय के जो सूत्र बतलाए, वो इस प्रकार हैं-

रावण रथी विरथ रधुवीरा।
देख विभीषण भयहुं अधीरा।।
अधिक प्रीत मन भा संदेहा।
वंदि चरण कह सहित सनेहा।।
नाथ न रथ नहीं तन पद त्राणा।
केहिं विधि जीतव वीर बलवाना।।
सुनहुं सखा कह कृपा निधाना।
ज्यों जय होई स्यंदन आना।।
सौरज धीरज तेहिं रथ चाका।
बल विवेक दृढ़ ध्वजा पताका।।
सत्य शील दम परहित घोड़े।
क्षमा दया कृपा रजु जोड़े।
ईश भजन सारथी सुजाना।
संयम नियम शील मुख नाना।।
कवच अभेद्य विप्र गुरू पूजा।
यहि सम कोउ उपाय न दूजा।।
महा अजय संसार रिपु जीत सकहिं जो वीर।
जाके अस बल होहिं दृढ़ सुनहुं सखा मतिधीर।।

भावार्थ- राम-रावण युद्ध के मैदान में हैं. रावण रथ पर, राम भूमि पर. इसे देखकर विभीषण सशंकित हो उठा, बोला-प्रभू, आप रावण को कैसे जीत पाएंगे.
राम ने सस्नेह कहा, विभीषण जिस रथ(स्यंदन) पर विजय होगी, वो रथ मेरे पास है. धैर्य और शौर्य उस रथ के चक्के हैं. बल, विवेक और दृढ़ता उस रथ के ध्वजा-पताका हैं. सत्य, शील, दम और परोपकार उस रथ के घोड़े हैं. क्षमा, दया और कृपा उस रथ के लगाम हैं. प्रभु का भजन ज्ञानी सारथी है. संयम-नियम ये अनेक प्रकार से मददगार हैं. श्रेष्ठजन(विप्र) और गुरू की पूजा अभेद्य कवच है. इसके सिवाय विजय का कोई दूसरा रास्ता नहीं है.
विजय का यह रथ जिसके पास है. उसे संसार का कोई शत्रु नहीं जीत सकता है, चाहे वह कितना भी बलवान क्यों न हो.

रविवार, 24 अगस्त 2008

गोपाल भैया



निश्छल विश्वास और श्रद्धा की कहानी


रधिया बर्तन-बासन मांज कर किसी तरह गुजर बसर करती थी. तीन साल पहले पति गुजर गया था. बेचारी दुखी और परेशान थी. पांच साल के उसका बेटा कन्हैया दूसरे बच्चों को स्कूल जाते देख, स्कूल जाने का जिद करने लगा. स्कूल दूर था. रास्ते में घना जंगल. वह अपने आंख के तारे को किसी अनहोनी का शिकार होते नहीं देखना चाहती थी. इसलिए उसने उसे स्कूल भेजने से मना कर दिया. कन्हैया खूब रोने-धोने लगा. उसे स्कूल जाना है तो जाना है. रधिया क्या करती. एक दो रोज खुद स्कूल पहुंचा और लिवा आई. सोचा, एक दो रोज में मन उजट जाएगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. स्कूल में सैंकड़ों बच्चों के बीच उसका मन लग गया और वह अब रोज स्कूल जाने की जिद करने लगा. संभव नहीं था कि रधिया रोज-रोज कन्हैया को घर छोड़ आती. उसने एक कहानी गढ़ी.


उसने कन्हैया को अकेले स्कूल जाने के लिए कहा. कन्हैया ने कहा, मां रास्ते में जंगल है. डर लगेगा. तुम भी चलो ने. वह बोली, मैं नहीं जा सकती बेटा. तू अकेले चला जा. वैसे भी डरने की क्या बात है, जंगल में तुम्हारे गोपाल भैया रहते हैं, जब भी डर लगेगा, गोपाल भैया को बुला लेना. वो तुम्हें जंगल पार करा देंगे.


कन्हैया स्कूल जाने लगा. एक रोज थोड़ी देर हो गई. जंगल में पहुंच उसे डर लगने लगा. उसने पुकारा, गोपाल भैया, गोपाल भैया, मुझे बहुत डर लग रहा है, आइये न गोपाल भैया. कईबार बुलाने के बावजूद कोई नहीं आया. कन्हैया डर के मारे जोर-जोर से रोने लगा. डर के मारे उसके पैर नहीं उठ रहे थे, वह जार बेजार रोए रहा था. तभी एक मीठी आवाज आई, कन्हैया, क्या हुआ, तुम क्यों रो रहे हो.

कन्हैया ने आखें खोली. सामने देखा. मोर-मुकुट धारण किए हुए, हाथ में बांसुरी थामे हुए, गायों के झुंड से एक युवक आया. उसने प्यार से कन्हैया को गोद में उठा लिया.

कन्हैया बोला, भैया मुझे बहुत डर लग रहा था, आप कहां थे अभी तक?

गोपाल भैया बोले, कन्हैया, ये जंगल अपना ही है. मैं तुम्हारा भैया हूं, तो फिर डरने की क्या बात है. जब कभी डर लगे मुझे बुला लेना.

गोपाल भैया की वाणी में कुछ ऐसी मिठास थी, जो बालरूप भगवान कन्हैया में थी. कन्हैया अब बगैर किसी डर के आने जाने लगा. जब कभी मां पूछती बेटा जंगल में डर तो नहीं लगता है?

कन्हैया कहता, मां डर कैसा, अपना गोपाल भैया जो वहां हैं.

मां कन्हैया के भोलेपन पर मुस्कुराती हुई बोली, मां, बहुत अच्छे हैं गोपाल भैया. जैसा तुमने बताया. माथे पर मोर मुकुट, हाथ में मुरली, गायों को चराते हुए हमारे गोपाल भैया बहुत अच्छे हैं मां.

मां बोली, अच्छा?

कन्हैया बोला, हां मां वे बहुत अच्छे हैं.

रधिया अक्सर कन्हैया से इस तरह का सवाल करती और कन्हैया बड़े ही भोलेपन से जवाब देता.

कुछ ही दिनों बाद स्कूल में सरस्वती पूजा आयी. मास्टर साहब में छात्रों से चंदा जमा करने को कहा. सब लड़कों ने अपने शक्ति के अनुसार चावल, आटा, सब्जी, फल, दूध, पैसे आदि देने की पेशकश की. लेकिन कन्हैया से कुछ भी लाने को नहीं कहा गया तो वह उठ खड़ा हुआ, बोला, मस्सय मैं क्या लाऊं. मास्टर साहब बोले, तुम क्या लाओगे. लेकिन जब कन्हैया ने बहुत जिद की, तो मास्टर साहब ने कहा, तुम्हारा जो मन होगा लेते आना.

कन्हैया घर जाकर अपनी मम्मी से ये बात कही कि स्कूल में सरस्वती पूजा है, इसलिए मास्टर साहब ने घर से चंदा लाने को कहा है.

घर में क्या था जो राधा चंदा में देती. इसलिए उसने कहा, क्यों नहीं अपने गोपाल भैया से मांग लेते.

कन्हैया चल पड़ा अपने गोपाल भैया के पास. वहां जाकर आवाज दी, गोपाल भैया, गोपाल भैया, स्कूल में पूजा है, मास्टर साहब ने दूध लाने के लिए कहा है.

गोपाल भैया आए और एक लोटकी दूध कन्हैया को दे दिया. कन्हैया लोटकी हिलाता डुलाता स्कूल पहुंचा. स्कूल के छात्र और शिक्षक पूजा की व्यवस्था जुटे थे.

कन्हैया मास्टर साहब के पास जाकर पूछा, मस्सय, ये दूध रख लीजिए.

मास्टर साहव ने एक लड़के से कहा, इस लोटकी का दूध डिब्बे में डाल दो.

लड़के ने लोटकी से दूध डालना शुरू किया, डिब्बा भर गया लेकिन लोटकी में जितना दूध पहले था, अब भी उतना ही है. लड़का डर गया. उसने सारी बात मास्टर साहब को बतायी.

मास्टर साहब भी इस सच्चाई को देखकर हैरान हो गए.

कन्हैया से पूछा, तुमने ये दूध कहा से लाया?

कन्हैया बोला, गोपाल भैया ने दिया है.

उन्होंने फिर पूछा, गोपाल भैया कहां रहते है और क्या करते हैं?

कन्हैया बोला वे रास्ते के जंगल में रहते हैं और गाय चराते हैं.

मास्टर साहब की उत्सुकता बढ़ गई, उन्होंने पूछा, तुम्हारे गोपाल भैया दिखते कैसे हैं?

कन्हैया बोला, वे मोर-मुकुट पहनते है, मुरली बजाते हैं, मगर हैं बहुत सुंदर.

मास्टर साहब ने मन ही मन कहा कि बेटा सुंदर तो तुम भी कम नहीं हो, फिर बोले, तुम अपने गोपाल भैया से हमें मिलाओगे?

कन्हैया बोला, क्यों नहीं, चलिए अभी मिलवाते हैं.

दोनों जंगल गए.

कन्हैया ने पुकारा, गोपाल भैया, गोपाल भैया, हमारे मस्सय आपसे मिलना चाहते हैं.

गोपाल भैया ने कहा, कन्हैया मैं तुम्हारे मास्टर साहब के पास नहीं आ सकता.

कन्हैया ने पूछा, क्यों. हमारे मास्टर साहब तो अच्छे हैं. किसी को मारते भी नहीं हैं. आप आइए, आपको भी नहीं मारेंगे.

फिर आवाज आई, कन्हैया मैं नहीं आ सकता.

कन्हैया बोला, आप नहीं आइएगा तो मैंने रोने लगूंगा और उसने रोना शुरू कर दिया.

कन्हैया के रोने की आवाज सुनकर गोपाल भैया आए, और उसे चुप कराया.

कन्हैया बोला, लीजिए मास्टर साहब, आ गए हमारे गोपाल भैया. लेकिन गोपाल भैया मास्टर साहब को नहीं दिख रहे थे. मास्टर साहब समझ गए.

उन्होंने भी उसी बाल-सुलभ निश्छलता से भगवान की प्रार्थना की. भगवान ने मास्टर साहब को भी दर्शन दिया. बाद में उन्होंने रधिया को भी दर्शन दिया.

शनिवार, 23 अगस्त 2008

भगवान श्रीकृष्ण से साक्षात्कार


भगवान श्रीकृष्ण से साक्षात्कार

मैं इक फंसाना हूं बेबसी का
ये हाल का है मेरी जिंदगी का...
शायर की दर्दभरी आवाज में मुसाफिर को घनीभूत पीड़ा के बादल दिखाए दिए, जो अब तब बरसने ही वाला हो, काफी कोशिश के बावजूद भी वह, सोलिटेरी रीपर के अबूझ गाने की तरह शायर की बात नहीं समझ सका. मगर गाने में जो दर्द था, उससे साफ जाहिर होता था कि शायरी बहुत ही दुखी है. इस दुख की वजह वह चाहकर भी नहीं जान पाया.
वह आगे बढ़ने लगा. तभी शायर को लगा कि इस व्यक्ति से अपना जरूर कोई न कोई नाता है-
मेरा पहले भी है तुमसे नाता कोई
यूं ही नहीं दिल लुभाता कोई...
अगले ही क्षण वो तमाम विस्मृतियां स्मृति बन उसकी आंखों के सामने से गुजरने लगी.
अनायास ही वह भाव-विह्वल हो जो से पुकार उठा, प्रभु... मेरे स्वामी, इतने दिनों तक कहां थे आप?
मुसाफिर इधर-उधर देखा, कौन होगा, इस निर्जर में, जिसे यह आवाज दे रहा है.
शायर ने फिर उसी भाव-विह्वलता से कहा, हे प्रभु, नहीं पहचाना मुझे?
मुसाफिर उसकी ओर मुखातिब हुआ. शायर ने कहा, प्रभु मैं अर्जुन. वहीं अर्जुन जिसे आप पार्थ, कुंतीपुत्र, भारत, परंतप कहते थे, आपने जिसे गीता का उपदेश सुनाकर महाभारत का युद्ध लड़ने के लिए प्रेरित किया. मैं वही अर्जुन हूं, आपका शिष्य, आपका सखा.
मुसाफिर को कृष्ण होने का अहसास हुआ.
अर्जुन ने कहा,
देख तेरी संसार की हालत, क्या हो गई भगवान
कितना बदल गया इनसान
चांद न बदला सूरज न बदला, न बदला रे आसमान
कितना बदल गया इनसान.
भगवान मुस्कुराते हुए बोले,
वक्त ने किया, क्या हंसी सितम
न हम रहे ना हम, न तुम रहे न तुम
भगवन, ऐसा न कहिए, आपने कहा था,
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानम् धर्मस्य तदात्मानां सृजामहं।।
परियात्राणाय साधुनाम विनाशाय च दुष्कृताम।
धर्म संस्थापनार्थाय संभावामि युगे युगे.
भगवान बोले, हे पार्थ, तब की बात और थी, तब तुम जैसे कुछ लोग थे जो मुझे पहचानते थे या जानने की कोशिश करते थे, आज किसी के पास सोचने, समझने और इंसान को परखने का वक्त नहीं है. ऐसी स्थिति में मैं पैदा भी लूं तो लोग मुझे जिंदा दफना देंगे.
अर्जुन अनहोनी के भय से कातर हो उठा, बोला, प्रभू,
जब एक ही उल्लू काफी हो बर्बाद गुलिस्तां करने को
यहां शाख-शाख पर उल्लू हो, अंजाम-ए-गुलिस्तां क्या होगा.
प्रभु, आपने विविध रूपों में भारत की भूमि पर पैदा होकर यहां की आकुल-व्याकुल, तंगहाल-परेशान जनता का दुख-दर्द दूर किया है, आपको फिर से इस धरा पर पैदा होना होगा, उन गरीब, मजलूम बेसहारा लोगों का दुख-दर्द बांटना होगा.
भगवान बोले, अर्जुन, ऐसा नहीं है कि आज मैं भारत में नहीं हूं. मैं आज भी, लोगों के पास हूं, जिन्हें मेरी जरूरत है, बस अपनी पहचान छुपाए हुए, डर इसी बात का है कि यदि लोग मुझे पहचान जाएं तो मुझे बहुत परेशानी होगी.
अर्जुन बोला, क्या प्रभू मैं आपके साथ चल सकता हूं, उन्हीं लोगों के बीच जिससे आप प्यार करते हैं.
कृष्ण बोले, अर्जुन, आज कार्यक्षेत्र काफी बड़ा हो गया है. चुनौतियां काफी है, इसलिए हम जैसे लोगों को अलग-अलग मोर्चों पर काम करने की जरूरत है.
कुछ क्षण रुक कर भगवान फिर बोले, अर्जुन, छोड़ो इन गंभीर बातों को, कुछ अपने बारे में सुनाओ,
अर्जुन ने एक लंबी सांस छोड़ते हुए कहा,
सुनके क्या करोगे मुझसे मेरी कहानी
बेलुफ्त जिंदगी के किस्से हैं फीके-फीके.
आप तो जानते हैं कि
इंसान बड़ा नहीं होत है, समय होत बलवान.
भीलों ने ही लुट लिया, वही अर्जुन वही बान.
भगवान, वक्त की मार ने इस अर्जुन को भी कहीं का नहीं छोड़ा.
भगवान अर्जुन के झखमार रवैये से परेशान हो गये, वोले, तुम्हारे प्यार का क्या हुआ.
अर्जुन दुखी होकर बोला, क्या होता है प्यार का,
भगवान बोले,
जाकर जेहि पे सत्य स्नेहु
सो तेहि मिलही न कछु संदेहु.
अर्जुन ने इसका जवाब दिया,
जाने वो कैसे लोग थे जिनके प्यार को प्यार मिला
हमने तो जब कलियां मांगी कांटों का हार मिला, जाने वो कैसे..
भगवान के सामने ही अर्जुन के दबे दर्द में विद्रोह उभर आया.
जवानी भटकती है, बदकार बनकर
जवां जिस्म सजते हैं बाजार बनकर
यहां प्यार होता है व्यापार बनकर
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है..
जो अर्जुन देश-दुनिया की हालत पर लंबा चौड़ा भाषण दे रहा था, अपने निजी दुख से व्यथित हो उठा, जिसे देखकर भगवान को बड़ा दुख हुआ.
(साक्षात्कर के शेष अंश पर नजर बनाए रखें.)

गुरुवार, 1 नवंबर 2007

गुरु वंदना



वंदे बोधमयं नित्यम गुरुम शंकर रुपिनम
यमा श्रितो हि वक्रोपि चन्द्रः सर्वत्र वन्दते


गुरु ब्रह्म गुरु विष्णु गुरु देवो महेश्वरः
गुरु साक्षात् पर ब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः

अखंड मंडला कारम व्याप्तं ये चराचरम
तद पदम दर्शितम ये तस्मै श्री गुरुवे नमः

अज्ञान तिमिरान्धस्य ज्ञान्नंजन श्लाक्या
चक्षु उन्मिलितम ये तस्मै श्री गुरुवे नमः
मैं अपराधी हीन मति, परों मोह के जाल
मम कृत दोष न मानिये तुम प्रभु दीन दयाल

तारा में शशि एक है शशि में तारा अनेक
हम सब तुमको एक हैं तुम सब हमको अनेक

श्री गुरु मंगल मुख चन्द्रमा सेवक नयन चकोर
अष्ट पहर निरखते रहो श्री गुरु चरण कि ओर