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रविवार, 29 जुलाई 2012

क्या सवाल उठाना और जांच की मांग करना राष्ट्र का अपमान है?


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इन पर सवाल उठाना क्या राष्ट्र का अपमान है?

राम ने सीता की अग्नि-परीक्षा ली। क्यों ली? क्या राम को सीता पर शक था? क्या राम को अपनी पत्नी पर ही विश्वास नहीं था? क्या औरत विश्वास करने लायक नहीं होती है? जब राम को सीता पर विश्वास था तो उन्होंने सीता की अग्नि-परीक्षा क्यों ली। आखिर लोगों को सीता पर भरोसा क्यों नहीं था। क्या सीता की अग्नि-परीक्षा महिला जाति के खिलाफ है। क्या ये पुरुष के कलुषित मानसिकता का द्योतक है। क्या इससे सीता की गरिमा घटी है? क्या इससे राम की मर्यादा पर बट्टा नहीं लगा है? आखिर हरबार नारी जाति ही क्यों परीक्षा देती रहे। आखिर व्यक्तिगत परीक्षा नारी जाति की परीक्षा क्यों बन जाती है। जब राम ने सीता की अग्नि-परीक्षा ली, इसके बाद भी उन्होंने एक धोबी की बात में आकर सीता को दोबारा वन क्यों भेज दिया। क्या परीक्षा सिर्फ औरत की होती है, क्या पुरुषों की परीक्षा नहीं होती है। पुरूषों की परीक्षा क्यों नहीं होती है। अगर कोई पुरूष की परीक्षा चाहता है तो पुरुष इसके लिए तैयार क्यों नहीं होता है। प्रश्नों की सूची और भी लंबी हो सकती है। 
 
यहां मैं अपने स्तर पर हर प्रश्न का जवाब देना चाहूंगा। राम ने सीता के सतीत्व की परीक्षा के लिए अग्नि-परीक्षा ली (यहां अग्नि-परीक्षा का अर्थ कठिन परीक्षा से है)। राम को अपनी पत्नी पर शक नहीं था। राम को अपनी पत्नी पर अटूट विश्वास था, जितना विश्वास एक मर्यादा पुरूषोत्तम में होना चाहिए। औरत विश्वास करने लायक होती है। राम को अपनी भार्या सीता पर अटूट विश्वास था फिर भी उन्होंने लोगों का शक दूर करने के लिए सीता की अग्नि-परीक्षा ली। सवाल उठाना, शक करना मानव की सहज प्रवृति है, इसलिए लोगों ने सीता जैसी पवित्र स्त्री पर भी शक किया, यानी शक किसी पर भी किया जा सकता है, सवाल किसी पर भी उठाया जा सकता है। हॉं लोगों को सीता पर भरोसा नहीं था क्योंकि ये मानव की सहज प्रकृति और प्रवृति है। सीता की अग्नि-परीक्षा को नारी जाति के खिलाफ नहीं माना जा सकता है। इंसान व्यक्ति के सबसे अहम मानी जानी वाली चीज पर ही सवाल उठाता है। नारी के लिए उसका सतीत्व, उसकी लाज, उसका शील ही सर्वश्रेष्ठ है, इसलिए सीता के सतीत्व पर ही सवाल उठाया गया। इसे पुरूष के कलुषित मानसिकता का द्योतक नहीं माना जा सकता है। पुरूष ही नहीं, बल्कि खुद महिलाएं ही महिलाओं के सतीत्व, चालचलन, शील और लज्जा पर सवाल उठाती हुई देखी जा सकती हैं। किसी पुरूष प्रधान समाज नहीं, बल्कि पूरी मानव जाति की ये प्रकृति है कि वह किसी व्यक्ति की सबसे बड़ी पूंजी या सबसे बड़ी शक्ति पर ही सवाल उठाता है और उसे संदेह के घरे में लाता है। उसकी जांच कराना चाहता है। जाहिर है कि उस अग्नि-परीक्षा से सीता की मर्यादा कम नहीं हुई है और ना ही राम की मर्यादा कम हुई है। 
 
जहां तक बात हरबार नारी जाति की परीक्षा की है तो परीक्षा नारी जाती तक सीमित नहीं है। ना ही ये किसी वर्ग तक सीमित होनी चाहिए। भले ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह खुद को बचाने के लिए ये सामंतवादी तर्क दे रहे हों कि सीजर की पत्नी को संदेह से परे रखा जाना चाहिए। ये सोच उनकी हो सकती है। मगर, जनता को किसी पर भी शक और सवाल करने का हक होना चाहिए। सवाल को राष्ट्र के अपमान से जोड़ा जाना व्यक्ति के मौलिक अधिकारों के विरुद्ध है। सीता की अग्नि-परीक्षा लेने के बाद भी राम ने उन्हें जंगल भेजा क्योंकि उनकी जनता में से एक की शिकायत थी कि राम ने लंका गई सीता को वापस क्यों लाया। इस परीक्षा देना आम आदमी के लिए संभव नहीं। राम ने ऐसा किया और इसलिए तो राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं, हमारे आदर्श पुरुष हैं, हमारे भगवान हैं। सीता नारी जाति की गौरव और आदर्श हैं। आखिर ये लोग इतने श्रेष्ठ क्यों और कैसे हैं। राम ने कभी नहीं कहा कि उन्हें सीता के शील-स्वभाव और सतीत्व पर पूरा भरोसा है और वो इसकी परीक्षा नहीं कराएंगे (जैसा कि बार-बार खुद प्रधानमंत्री और सरकार के मंत्री कहते हुए देखते जा सकते हैं)। लाख विश्वास के बावजूद उन्होंने ऐसा किया ताकि जनता को सीता पर शक न रह जाए और सीता की गरिमा और मर्यादा में अभिवृद्धि हो। 
 
मगर, दुर्भाग्य है कि आज हम खुद को ईमानदार, साफ-छवि कहते हुए थकते नहीं हैं, मगर कोई अग्नि-परीक्षा देने(स्वतंत्र एजेंसी से जांच) के लिए तैयार नहीं हैं। जनता का संदेह सवालों के जरिए सामने आ रहे हैं। मगर प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि सीजर की पत्नी को संदेह के घेरे बाहर रखा जाना चाहिए। सरकार के मंत्री और सिपहसलार मान हानि के मुकदमे की धमकी देते हैं (कुछ ऐसा ही धमकी देने वाले एक केंद्रीय मंत्री को हाल ही में इस्तीफा देना पड़ा।) जनता सवाल उठाती है तो सरकार सवाल उठाने वालों को परेशान करने के लिए उसके पीछे अपना सरकारी तंत्र लगा देती है। वो राजतंत्र था जिसमें अक्सर राजाओं ने लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा की, मगर आज लोकतंत्र है जिसमें बड़े ही सुनियोजित तरीके से लोकतंत्र की हत्या की जाती है। इस हत्या में लोकतंत्र का दंभ भरने वाले राजनेता और राजनीतिक दलों के लोग शामिल होते हैं। 
 
केंद्र की यूपीए सरकार के एक वरिष्ठ नेता(पीएमओ कार्यालय में राज्य मंत्री नारायण सामी और कांग्रस प्रवक्ता राशिद अल्बी) ने सरकार पर जनता द्वारा सवाल उठाने को राष्ट्र का अपमान बता दिया और यहां तक कह दिया कि विदेशी ताकतें इन्हें निर्देशित कर रही हैं।
दरअसल, वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे के नेतृत्व में देश की जनता पिछले कुछ महीनों से भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग लड़ रही है, जिसे टीम अन्ना के नाम से जाना जाता है। इस टीम ने देश में हर स्तर पर फैले भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए विधेयक का एक मसौदा तैयार किया, जिसे जन लोकपाल नाम दिया। टीम ने इस मसौदे को कानून का शक्ल देने की मांग की, सरकार ने साफ इनकार कर दिया। अपनी मांग को लेकर अन्ना को बार-बार अनशन भी करना पड़ा। 
एकबार तो अन्ना बारह दिनों तक अनशन पर रहे। सरकार ने संसद की भावना (सेंस ऑफ पार्लियामेंट) पारित करवाया और अन्ना की तीन अहम मांगों को ज्यों का त्यों मान लेने का वादा किया। मगर, जब नया सरकारी मसौदा बना तो सरकार अपने वादे से मुकरती दिखी। सरकार के मंत्री इस लहजे में बयान देने लगे कि मुझे जैसा लगा मैंने कर दिया, आप मेरी गर्दन पर बंदूक रखकर बात नहीं मनवा सकते और सरकार ने जनता की मांग मानने से इनकार कर दिया। सरकार ने अपने मसौदे में भ्रष्टाचारियों को बचाने और इसके खिलाफ आवाज उठाने वालों को कुचलने की पूरी व्यवस्था कर दी। जहां भ्रष्टाचार के खिलाफ शिकायत करने वालों को दो साल की सजा और भ्रष्टाचारी को छह महीने की सजा का प्रावधान किया गया। भ्रष्टाचारी के लिए सरकारी वकील की व्यवस्था की गई। 

जिससे देश की जनता को लगा कि सरकार भ्रष्टाचार को खत्म नहीं करना चाहती है। सरकार ने भ्रष्टाचार का विरोध करने वालों को सरकारी तंत्र का दुरुपयोग कर सताना शुरू किया। फिर तो टीम अन्ना इस तथ्य की पड़ताल में लग गई कि आखिर सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ना क्यों नहीं चाहती है। इसके लिए टीम अन्ना को बहुत ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी। इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्रियों और आरटीआई के तहत मिले दस्तावेजों का अध्ययन किया तो पाया कि सरकार के चौंतीस में से पंद्रह मंत्री भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों से घिरे हैं। ऐसे में अगर जनलोकपाल जैसा कानून अस्तित्व में आता है तो इन मंत्रियों की जगह सरकार में नहीं बल्कि तिहाड़ में होगी। आखिर कौन सी सरकार अपनी ही गर्दन पर तलवार चलाएगी। इतना ही नहीं संसद में बैठे 162 से ज्यादा सांसदों पर भी भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं। आखिर ऐसे सांसद भला ऐसा कानून क्यों चाहेंगे, जो उन्हें ही जेल की हवा खिलाने लगे। यही वजह है कि संसद में बैठे लोग और सरकार ऐसा कोई कानून नहीं चाहती है। जनता को बेवकूफ बनाने के लिए वह कहने के लिए लोकपाल लाना चाहती है और खुद को भ्रष्टाचार के खिलाफ सबसे बड़े पैरोकार के रूप में भी पेश करना चाहती है। सरकार के जिन मंत्रियों पर टीम अन्ना ने भ्रष्टाचार के आरोप लगाए उनमें खुद प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह, पूर्व वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी, गृह मंत्री पी चिदंबरम, विदेश मंत्री एस एम कृष्णा, कृषि मंत्री शरद पवार, मानव संसाधन मंत्री और दूरसंचार मंत्री कपिल सिब्बल, कानून मंत्री सलमान खुर्शीद, शहरी विकास मंत्री कमलनाथ, विज्ञान और तकनीकी मंत्री विलासराव देशमुख, भारी उद्योग मंत्री प्रफुल्ल पटेल, जहाजरानी मंत्री जी के वासन, अक्षय ऊर्जा मंत्री फारुख अब्दुल्ला, खाद और रसायन मंत्री एमके अलागिरी, ऊर्जा मंत्री सुशील कुमार शिंदे और पूर्व मंत्री वीरभद्र सिंह(कोर्ट में भ्रष्टाचार के आरोप तय होने के बाद दिया इस्तीफा) के नाम शामिल हैं। टीम अन्ना ने इन मंत्रियों के खिलाफ सबूत भी पेश करने का दावा किया है और सबूतों की एक-एक प्रति प्रधानमंत्री कार्यालय और सोनिया गांधी को भी भेजा। टीम ने मंत्रियों के ऊपर लगे आरोपों की जांच सुप्रीमकोर्ट के जज की अगुवाई में किसी स्वतंत्र जांच एजेंसी से कराने की मांग की है, मगर सरकार ने टीम अन्ना के आरोपों को खारिज कर दिया। 
 
इन मंत्रियों पर लगे आरोप बहुत ही गंभीर किस्म के हैं। देश के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी पर कम से कम पांच गंभीर आरोप हैं। राष्ट्रपति देश के प्रथम नागरिक होते हैं, उनके खिलाफ किसी प्रकार की जांच नहीं हो सकती है। उन्हें सिर्फ और सिर्फ महाभियोग से ही हटाया जा सकता है, जो बहुत ही जटिल प्रक्रिया होती है। जब संसद के 162 सदस्यों पर गंभीर आरोप है तो सवाल उठता है कि आखिर कौन उनके खिलाफ महाभियोग चलाने के लिए आगे बढ़ेगा। यही वजह है कि टीम अन्ना ने सरकार से बार-बार उन्हें राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार नहीं बनाए जाने की अपील की। लेकिन सरकार ने एक नहीं सुनी। और सरकार की नैतिकता के पतन के चलते भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरा एक व्यक्ति देश के सर्वोच्च पद तक पहुंच जाता है, जहां उसके खिलाफ आरोपों की जांच तक नहीं हो सकती है। सरकार का कहना था कि सिर्फ मीडिया रिपोर्टों के आधार पर किसी के खिलाफ जांच नहीं की जा सकती है। सरकार का ये कुतर्क कानून के खिलाफ हैं। अगर किसी पर गंभीर आरोप लगते हैं तो बिना सबूत उसपर मुकदमा दर्ज करने का प्रावधान है। पुलिस मामला दर्ज करके ही जांच शुरू करती है और सबूत इकट्ठा करती है। मगर सरकार ने जांच कराने से ही इनकार कर दिया(आखिर वो इनकार करेगी क्यों नहीं, जांच में मंत्रियों का फंसना तो तय है ही)। सरकार ने सलाह दी कि जिनको शिकायत है वो कोर्ट जाए। मगर सवाल है कि कोर्ट तो मामले की जांच नहीं करेगा ना। जांच करेगी वही जांच एजेंसियां जो सरकार के अधीन है और क्या वो सरकार के मंत्रियों के खिलाफ जांच करेगी। चिदंबरम के खिलाफ जांच करने से इनकार कर सीबीआई इसका सबूत पहले ही दे चुकी है। 

 
इन सबके बावजूद सरकार ने आरोपी मंत्रियों के खिलाफ एसआईटी बैठाने से साफ इनकार कर दिया। प्रणब मुखर्जी राष्ट्रपति बन गए। अब उनके खिलाफ जांच नहीं हो सकती है।
प्रणब मुखर्जी के खिलाफ आरोप गंभीर किस्म के हैं।
2007 में केंद्र सरकार ने गैर-बासमती चावलों के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया। नतीजा हुआ कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में चावल के दाम आसमान छूने लगे। जिसके कारण गरीब देशों में खाने का संकट उत्पन्न हो गया। तब जाकर भारत सरकार ने मानवीय आधार पर बाजार से कम कीमत पर बीस गरीब देशों को चावल देने की घोषणा की। मगर, भारत सरकार ने सीधे वहां की सरकारों को चावल निर्यात करने बजाय अमीरा फुड्स को चावल एक्सपोर्ट कर दिया और अमीरा फुड्स ने बाजार की कीमत पर वहां की सरकारों को चावल बेचा। जब घाना की सरकार बदली तो उसने इस मामले की जांच कराई। साथ ही घाना की सरकार ने भारत सरकार को पत्र लिखकर मामले की जांच कराने की मांग की। घाना की सरकार ने इस घोटाले में भारत के जिन मंत्रियों की भूमिका की जांच की मांग की वो हैं-- प्रणब मुखर्जी और आनंद शर्मा।
प्रणब मुखर्जी पर दूसरा आरोप नेवी वार रूम लीक मामले से जुड़ा हुआ है। जो कि देश के रक्षा मामलों से जुड़ा हुआ अत्यंत गंभीर मामला है।
आउटलुक की रिपोर्ट के मुताबिक, जुलाई 2007 में नेवी वार रूम से एक पेनड्राइव लीक हुई। पेन ड्राइव कमांडर विंग कमांडर एसएल सुरवे के घर से मिले। पेनड्राइव के दस्तावेजों में भारतीय सेना रक्षा खरीदारी, भारत की भावी रक्षा तैयारी की जानकारी थी। ये दस्तावेज अभिषेक वर्मा, रविशंकरन और कुलभूषण पराशर को दी गई। रविशंकरन नौसेना का रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कमांडर है जिसने ये जानकारी स्कॉर्पियन पनडुब्बी के निर्माता थेल्स को ये जानकारी दी।
जुलाई 2005 में जब इस घोटाले का खुलासा हुआ तो दिसंबर 2005 में नौसेना ने आंतरिक जांच(सीबीआई जांच नहीं) के आदेश दिए। और इस जांच के आधार पर नेवी के तीन कमांडरों, विजेंद्र राणा, विनोद कुमार झा और कैप्टन कश्यप कुमार को बिना किसी मुकदमे के नेवी से निकाल दिया गया। इनके निष्कासन की वजह "राष्ट्रपति की इच्छा” बताई गई(ऐसी वजह जिसका इस्तेमाल नगण्य ही होता है)। इन पर रिश्वत लेकर गोपनीय दस्तावेज लीक करने का आरोप था, मगर बगैर मुकदमा चलाए इन्हें नौसेना से बाहर कर देना आश्चर्यजनक था। सच्चाई थी कि नेवी ने इतने बड़े मामले की जांच की जिम्मेदारी डेढ़ साल तक सीबीआई को नहीं सौंपी। इस मामले में आरोप है कि रविशंकरन को बचाने के लिए ही, जानबूझ कर इसकी जांच में देरी की गई।
सीएनएन-आईबीएन पर करण थापर के इंटरव्यू में तत्कालीन रक्षा मंत्री प्रणब मुखर्जी ने कहा था कि इस पेन ड्राइव में देश की रक्षा से जुड़ी जानकारी नहीं थी, बल्कि व्यवसायिक जानकारी थी। जबकि डेढ़ साल बाद आई सीबीआई जांच रिपोर्ट में कहा गया है कि इस पेन ड्राइव में देश की रक्षा से जुड़ी अहम जानकारी थी। आखिर प्रणब मुखर्जी के झूढ की वजह क्या थी। क्या इसकी जांच इस देश के लिए जरूरी नहीं है. नवंबर 2005 में रविशंकरन सहित अन्य लोगों को देश से बाहर जाने दिया गया।
पेन ड्राइव में मौजूद जानकारी स्कॉर्पियन बनाने वाली कंपनी थेल्स तक पहुंच चुकी थी। अक्टूबर 2005 में 18000 करोड़ का स्कॉर्पियन पनडुब्बी सौदा हुआ। इस सौदे पर तत्कालीन रक्षा मंत्री प्रणब मुखर्जी ने हस्ताक्षर किया था।
आरोप है कि इस सौदे में दलालों ने अहम भूमिका निभाई थी। देश के कानून के तहत रक्षा सौदों में दलाली की अनुमति नहीं है। इस सौदे में अभिषेक वर्मा और स्कॉर्पियन बनाने वाली कंपनी थेल्स के बीच
ईमेलों का आदान-प्रदान हुआ। थेल्स कंपनी ने लिखा कि इस सौदे में 4 प्रतिशत की कमीशन मांगी जा रही है, जो संभव नहीं है इसलिए वो सरकार द्वारा नामित कांग्रेस पार्टी के खजांची या किसी ऐसे व्यक्ति से बातचीत करना चाहते हैं। जवाब में अभिषेक वर्मा ने लिखा कि वो ही इस सौदे में कांग्रेस पार्टी का प्रतिनिधित्व करेंगे। कुछ दिनों बाद थेल्स कंपनी चार प्रतिशत चार प्रतिशत का कमीशन देने के लिए तैयार हो गई। सवाल उठता है कि क्या प्रणब मुखर्जी को इसकी जानकारी थी। अगर नहीं तो प्रणब मुखर्जी इसकी जांच से कतरा क्यों रहे हैं। क्या देश की रक्षा से जुड़ी इतनी अहम जानकारी के विदेशी कंपनियों के हाथ पहुंचने के मामले की जांच देश के लिए जरूरी नहीं है।
प्रणब मुखर्जी पर एक और बड़ा आरोप है और वो है किसी स्वतंत्र वित्तीय जांच एजेंसी की जांच प्रक्रिया में बाधा डालने और देश की जनता के साथ धोखाधड़ी करने का।
सेबी के पूर्णकालिक सदस्य के एम अब्राहम ने प्रधानमंत्री को तीन पत्र लिखकर(जिसमें से एक पत्र आईटीआई के जरिए मीडिया में सार्वजनिक हो चुका है) कहा है कि वित्तमंत्री और उनके दफ्तर(प्रणब मुखर्जी और उनके दफ्तर पढ़ें) से उन पर दबाव डाला जा रहा है कि सेबी के अंदर कुछ मामलों को रफा-दफा कर दिया जाए। अब्राहम ने लिखा कि वो रिलायंस, सहारा और बैंक ऑफ राजस्थान के कुछ गंभीर मामलों की जांच कर रहे हैं, लेकिन उनके सीनियर उनसे सवाल करते हैं कि क्या आप उन मामलों को मैनेज कर सकते हैं और वो कई बार बातचीत में कह चुके हैं कि इसमें कुछ बड़े लोग, खासकर वित्तमंत्री इनमें रुचि ले रहे हैं। उन्होंने लिखा कि उनके सीनियर जब कभी वित्तमंत्री से मिलने दिल्ली जाते हैं तो वो सभी सदस्यों से सभी मामलों की रिपोर्ट बनाने कहते हैं- जो जांच प्रक्रिया में सीधा-सीधा हस्तक्षेप है। जब मैंने व्यक्तिगत प्रताड़ना की शिकायत की तो वो कई बार कह चुके हैं कि वो उस महिला को जानते हैं जो इसके पीछे है और वो है ओमिता पॉल- जो वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी की सचिव हैं। इस मामले में प्रधानमंत्री ने कुछ नहीं किया। उलटे अब्राहम जैसे अधिकारी को प्रताड़ित किया जा रहा है।
इतने आरोप अकेले प्रणब मुखर्जी(जो अब राष्ट्रपति बन चुके हैं) पर हैं। बाकी आरोपी मंत्रियों पर गंभीर किस्म के आरोप हैं। इन आरोपों की जांच होनी चाहिए थी लेकिन खुद कानून मंत्री टीम अन्ना पर आरोप लगा रहे हैं। ये कितना हास्यास्पद है कि सरकार अपने नागरिकों पर आरोप लगा रही है। जब टीम अन्ना पर आरोप है तो उन्हें जांच से कौन रोक रहा है। सरकार क्यों नहीं इन लोगों को न्याय के कटघरे तक पहुंचा रही है, क्यों नहीं सजा दिलवा रही है।
जब विद्रोही कडप्पा सांसद जगन मोहन की बारी आती है तो उन्हें छह महीने के भीतर जेल पहुंचा दिया जाता है, सीबीआई अति सक्रिय हो उठती है, मगर जब बारी लालू, मुलायम, मायावती की आती है तो दशकों तक फाइल दफ्तरों में धूल फांकती है। जब कभी समर्थन की जरूरत होती है तो सीबीआई सक्रिय हो उठती है। क्या आखिर यही सीबीआई अपने आहारदाता सरकार के मंत्रियों के खिलाफ लगे मुकदमों की जांच करेगी। क्या सीबीआई ने पहले कभी ऐसा किया है, जो आज करेगी।

जनता की निराशा अपने चरम तक पहुंच चुकी है। प्रणब मुखर्जी के राष्ट्रपति बनने के बाद तो जनता ने मान लिया कि बेशर्म हो चुकी सरकार भ्रष्टाचार को देश के सबसे ऊंचे पद पर प्रतिष्ठित कर सकती है। कई लोग को भ्रष्टाचार को वैधानिक दर्जा दिलाने की बात करते थे, मगर यूपीए की सरकार ने तो भ्रष्टाचार को राष्ट्रपति पद तक पहुंचा दिया। सरकार ने औपचारिक जांच कराकर मामले की लीपापोती करना भी उचित नहीं समझा और प्रणब मुखर्जी को राष्ट्रपति बना दिया।

रविवार, 15 जनवरी 2012

जन आंदोलनों और जन जागरुकता का साल

इस लेख को पढ़ने के लिए डीवीटीटी योगेश फॉंट की आवश्यकता हो सकती है जिसे यहां से डॉऊनलोड किया जा सकता है।


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मीडिया पर लगाम लगाना- लोकतंत्र का गला दबाने जैसा

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बुधवार, 21 दिसंबर 2011

सिटीजन चार्टर- सरकारी चार्टर और अन्ना के चार्टर में अंतर

सिटीजऩ चार्टर: अन्ना के प्रस्ताव बनाम सरकारी बिल

सरकारी कामकाज में भ्रष्टाचार की एक बड़ी शिकायत रिश्वतखोरी को लेकर है. व्यापार का लाईसेंस लेना हो, मकान का नक्शा पास करना हो, रजिस्ट्री करानी हो, बैंक से लोन लेना हो, पासपोर्ट अथवा ड्राविंग लाईसेंस बनवाना हो, राशनकार्ड, नरेगा जॉबकार्ड यहां तक कि वोटर कार्ड बनवाने में भी रिश्वत चलती है


अन्ना हज़ारे ने रिश्वत के बिना काम होने और रिश्वतखोरों को दंड लगाने की व्यवस्था लोकपाल क़ानून के ही तहत बनाने का प्रावधान रखा है सरकार ने इसके लिए अलग से क़ानून बनाने के लिए बिल संसद में पेश किया है:-


क्या है दोनों प्रस्तावों में बुनियादी अंतर -


अन्ना के प्रस्ताव (जनलोकपाल कानून के तहत)
सरकार के प्रस्ताव (जनशिकायत निवारण के लिए अलग कानून के तहत)
1
इस काननू के लागू होने के बाद समुचित समय सीमा में, अधिकतम एक वर्ष के अंदर प्रत्येक लोक प्राधिकरण (पब्लिक अथॉरिटी) एक सिटीजऩ चार्टर बनाएगा
लगभग ऐसी ही व्यवस्था की गई है
2
प्रत्यके सिटीजऩ चार्टर में उस लोक प्राधिकरण द्वारा किए जाने वाले कार्यों की समय प्रतिबद्धता के बारे में, और उस समय सीमा में कार्य पूरा करने के लिए जिम्मेदार अधिकारियों के बारे में स्पष्ट विवरण होगा
लगभग ऐसी ही व्यवस्था की गई है
3
यदि कोई लोक प्राधिकरण, इस काननू के लागू होने के एक वर्ष के अंदर सिटीजऩ चार्टर तैयार नहीं करता है तो उस प्राधिकरण से चर्चा के बाद, लोकपाल/लोकायुक्त स्वयं उसका सिटीजऩ चार्टर तैयार करेगा और यह उस लोक प्राधिकरण पर बाध्य होगा.
सरकारी सिटीजऩ चार्टर बिल में लोकपाल/लोकायुक्त के पास अथवा अलग से बन रहे जनशिकायत आयोग के पास ऐसा कोई अधिकार नहीं है
4
प्रत्येक लोक प्राधिकरण पाने सिटीजऩ चार्टर को लागू करने के लिए आवश्यक संसाधनों का आकलन करेगा और सरकार उसे वह संसाधन उपलब्ध कराएगी
ऐसी कोई व्यवस्था ही नहीं है: अत: कोई भी विभाग संसाधन उपलब्ध न होने,
कर्मचारियों की संख्या कम होने आदि कारणों को बहाना बनाकर तय समय
सीमा में काम न करने की ज़िम्मेदारी से बचेगा.
5
प्रत्येक लोक प्राधिकरण, अपने सभी केन्द्रों में, जहां जहां भी उसके कार्यालय हों, एक कर्मचारी को जनशिकायत निवारण अधिकारी के रुप में नामित करेगी. कोई भी नागरिक सिटीजऩ चार्टर का उल्लंघन होने की स्थिति में जनशिकायत अधिकारी के पास शिकायत कर सकेगा.
लगभग ऐसी ही व्यवस्था की गई है
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किसी भी कार्यालय में उसका वरिष्ठतम अधिकारी जनशिकायत निवारण अधिकारी के रूप में नामित होगा.
ऐसा नहीं है
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जनशिकायत निवारण अधिकारी का यह कर्तव्य होगा कि वह , नागरिकों से सिटीजऩ चार्टर के उल्लंघन की शिकायतें प्राप्त करे और प्राप्ति के अधिकतम 30 दिन के अंदर उनका समाधान करे.
सरकार के प्रस्ताव में जनशिकायत निवारण अधिकारी के यहां शिकायत करने पर उनकी पावती (रिसिप्ट) लेने के लिए भी दो दिन का समय रख दिया है इसका
मतलब यह हुआ कि शिकायत करने के वक्त शिकायत के काग़ज़ लेकर रख लिए जाएंगे और अगर उसे पावती चाहिए तो अगले दो दिन तक कम से कम एक चक्कर जरू़ र कटवाया जाएगा. हालांकि बिल में यथासंभव ईमले अथवा एसएमएस से भी पावती भेजने की बात कही गई है लेकिन व्यावहारिकता में एक सामान्य सरकारी दफ्तर में किसी आम आदमी को एक सामान्य आवेदन की रिसिप्ट तक नहीं दी जाती.शिकायत की पावती देने के लिए दो दिन का समय देने से शायद ही किसी को हाथों हाथ पावती मिले.


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जनशिकायत निवारण अधिकारी द्वारा 30 दिन की समय सीमा में शिकायत का निवारण नहीं किए जाने की स्थिति में विभाग के प्रमुख के पास इसकी शिकायत की जा सकती है
विभाग के प्रमुख के पास शिकायत करने की कोई प्रावधान नहीं है.
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यदि विभाग प्रमुख भी अगले 30 दिन के अंदर समस्या का समाधान नहीं करता है तो इसकी शिकायत लोकपाल के न्यायिक अधिकारी के समक्ष की जा सकेगी लोकपाल प्रत्यके जिले में कम से कम एक न्यायिक अधिकारी की नियुक्ति करेगा. किसी जिले में कार्य की अधिकता को देख़ते हुए यह संख्या एक से अधिक भी हो सकती है लोकपाल द्वारा न्यायिक अधिकारी के पद पर नियुक्तियां अवकाश प्राप्त न्यायधीश, अवकाश प्राप्त सरकारी अधिकारी अथवा इसी किस्म के अन्य सामान्य नागरिकों के बीच से की जाएंगी
सिटीजऩ चार्टर बिल के अनुसार जनशिकायत अधिकारी के 30 दिन में शिकायत दूर न करने पर एक डेज़ीगिनेटिड अथॉरिटी के पास अपील की जाएगी. बिल में यह तो लिखा है कि यह डेज़ीगेनेटेड अथॉरिटी उस विभाग से अलग एक अधिकारी होगा. उसके पास सिविल कोर्ट की पावर भी होगी. इसका काम होगा तीस दिन में अपील का निस्तारण करना लेकिन यह कौन अधिकारी होगा? क्या यह अलग से नियुक्त किया जाएगा अथवा किसी अन्य विभाग के अधिकारी को यह दायित्व दिया जा सके गा? क्या हर विभाग के लिए अलग अलग अधिकारी इसके लिए बाहर से नियुक्त किए जाएंगे. अगर नई नियुक्ति होगी तो वह किस तरह होगी? किस योग्यता के व्यक्ति की होगी? इस बारे में बिल में कुछ नहीं लिखा है. इसका फ़ायदा उठाकर सरकार राजनीतिक संपर्क वाले किसी भी व्यक्ति को नियुक्त कर सकेगी. और जन शिकायत निवारण की व्यवस्था ज़िला स्तर पर राजनीतिक कृपापात्र लोगों की नियुक्ति का धंधा बन कर रह जाएगी.
यह डेज़ीगेनेटेड अथॉरिटी ज़िला स्तर पर एक होगी, पूरे राज्य के लिए एक होगी अथवा हरेक विभाग में एक जन शिकायत निवारण अधिकारी के लिए अलग अलग होगी? इसका कोई ज़िक्र बिल में नहीं है.


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यदि न्यायिक अधिकारी की राय में शिकायत निवारण का कार्य उचित तरीके से नहीं हुआ है तो वह, संबद्ध पक्षों को सुनवाई का अवसर देते हुए, विभाग प्रमुख सहित,शिकायत निवारण न होने के लिए जिम्मेदार अधिकारी पर जुर्माना लगाएगा, जोकि शिकायत निवारण में हुई देरी के लिए अधिकतम 500 रुपए प्रतिदिन की दर से होगा और 50,000 रुपए प्रति अधिकारी से अधिक नहीं होगा. यह राशि जिम्मेदार ठहराए गए दोशी अधिकारियों के वेतन से काटी जाएगी. यदि इस तरह के मामले में पीड़ित व्यक्ति सामाजिक अथवा आर्धिक रूप से पिछड़ा है तो दोशी अधिकारी पर ज़ुर्माने की राशि दोगुना हो जाएगी.
डेज़ीगेनेटेड अथॉरिटी के पास ज़ुर्माना लगाने का अधिकार तो है अंगे्रज़ीं भाषा में शैल इंपोज पनेल्टी की जगह इंपोज पनेल्टी लिखा गया है जिससे जुर्माना लगाना या न लगाना अधिकारी के विवेक पर छोड़ दिया गया है. सूचना के अधिकार के मामले में हमने देखा है कि शैल इंपोज़ पेनल्टी लिखे होने के बावजूद सूचना आयुक्त सूचना न दने वाले अधिकारियो पर ज़ुर्माना नहीं लगाते इसका नुकसान यह है कि अब सूचना मिलती नहीं है, सूचना आयोग का डर अधिकारियों के मन में कहीं नहीं बचा है और धीरे धीरे लोग इस क़ानून के प्रति निराश होने लगे हैं
काम होने में प्रतिदिन देरी पर ज़ुर्माना लगाने की जगह कुल मिलाकर अधिकतम 50,000 रुपए तक के ज़ुर्माने का प्रावधान रखा गया है. ज़ुर्माने की राशि शिकायतकर्ता को मुआवज़े के रूप में दिलवाए जा सकने का भी प्रावधान है लेकिन सामाजिक और आर्धिक वर्ग के पिछड़े शिकायतकर्ता को दोगुना मुआवज़ा
दिलवाने अथवा ऐसे मामलों में दोशी अधिकारी पर दो गुना ज़ुर्माना लगाने का प्रावधान नहीं रखा गया है.


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लोकपाल के न्यायिक अधिकारी के भ्रष्ट होने की शिकायत लोकपाल के पास की जा सकेगी
सबसे ख़तरनाक बात है कि यह डेज़ीगेनेट अथॉरिटी किसके प्रति जवाबदेह होगा? सरकार के प्रति या जनशिकायत आयोग के प्रति? बिल के हिसाब से तो यह किसी के प्रति जवाबदेह ही नहीं होगा. ऐसी स्थिति में अगर यह अधिकारी ही भ्रष्ट हो जाए तो इसके खिलाफ एक्शन कौन लेगा?
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ऐसे मामलों में लोकपाल का न्यायिक अधिकारी एक समय सीमा तय कर, संबंधित अधिकारी को शिकायतकर्ता की शिकायत के निवारण का आदेश भी जारी करेगा.
लगभग ऐसा ही है
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किसी अधिकारी के खिलाफ बार बार एक ही तरह की शिकायतें आने को भ्रष्टाचार माना जाएगा.
यह व्यवस्था नहीं की गई है
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किसी अधिकारी के खिलाफ बार बार शिकायत आने की स्थिति में, न्यायिक अधिकारी, उस शिकायत के लिए जिम्मेदार अधिकारियों को पद से हटाने अथवा उन्हें पदोवनत करने की सिफारिश लोकपाल की खंडपीठ के पास करेगा. लोकपाल की खंडपीठ, अधिकारियों के पक्ष की समुचित सुनवाई करते हुए, सरकार को ऐसी सख्त कार्रवाई की सिफारिश करेगी.
यह व्यवस्था नहीं की गई है
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प्रत्यके लोक प्राधिकरण, प्रत्यके वर्ष, अपने सिटीजऩ चार्टर की समीक्षा कर उसमें समुचित बदलाव करेगा. यह समीक्षा, लोकपाल के प्रतिनिधि की उपस्थिति में, जन चर्चाओं के माध्यम से की जाएगी
इस बारे में स्पष्ट व्यवस्था नहीं है.
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लोकपाल, किसी लोक प्राधिकरण के सिटीजऩ चार्टर में परिवर्तन हेतु आदेश जारी कर सकता है. लेकिन यह परिवर्तन लोकपाल की तीन सदस्यीय खंडपीठ से अनुमोदित कराने होंगे
इस बारे में स्पष्ट व्यवस्था नहीं है.
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संबंधित लोक प्राधिकरण, सिटीजऩ चार्टर में परिवर्तन संबंधी लोकपाल के आदेश को, ऐसे आदेश की प्राप्ति के एक महीने के अंदर लागू करेगा.


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प्रत्येक न्यायिक अधिकारी के कार्य का सामाजिक अंकेक्षण प्रत्येक 6 महीने में किया जाएगा. सामाजिक अंकेक्षण में न्यायिक अधिकारी जनता के समक्ष प्रस्तुत होगा, अपने कार्य के संबंध में सभी तथ्य प्रस्तुत करेगा, जनता के सवालों के जवाब देगा और जनता के सुझावों को अपनी कार्य प्रणाली में शामिल करेगा. जन सुनवाई की ऐसी प्रक्रिया लोकपाल के वरिष्ठ अधिकारी की उपस्थिति में संपन्न होगी.
यह व्यवस्था नहीं की गई है
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किसी भी मामले को तब तक बंद नहीं किया जाएगा जब तक कि शिकायतकर्ता की शिकायत का निवारण नहीं हो जाता अथवा न्यायिक अधिकारी किसी शिकायत को खारिज नहीं कर देता.
यह व्यवस्था नहीं की गई है
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जनशिकायत आयोग की कोई आवश्यकता ही नहीं है. (वस्तुत: लोकपाल/लोकायुक्त के रहते जनशिकायत आयोग बनाकर एक तरह से आयुक्तों की भारी भरकम फौज खड़ी कर ली जाएगी. जिसकी आवश्यकता ही नहीं है. अगर इस बिल में प्रस्तावित डेज़ीगेनेटेड अथारिटी को ही लोकपाल/लोकायुक्त के न्यायिक अधिकारी का दर्जा दे दिया जाता तो उसकी जवाबदेही भी तय हो जाती, उसका बजट भी लोकपाल से आता और जनशिकायत आयोग की आवश्यकता भी न पड़ती. )
अगर डेज़ीगेनेटेड अथारिटी भी 30 दिन में समस्या का निवारण नहीं करता है तो अगली अपील राज्य सरकार के मामलों में राज्य जनशिकायत आयोग एवं केंद्र सरकार के मामले में केंद्रीय जनशिकायत आयोग में की जा सकेगी. (प्रत्येक आयोग में 10 आयुक्त होंगे जो प्रमुख़त: अवकाश प्राप्त सरकारी अधिकारी अथवा न्यायधीश होंगे. इन आयोगों के लिए आयुक्तों का चयन एक बेहद कमज़ोर प्रक्रिया के तहत किया जा रहा है. संभावना है कि सरकारों में रिटायर होने वाले सचिव आदि अधिकारी सूचना आयुक्तों की तरह ही इन पदों पर भी क़ब्ज़ा जमा लें. उल्लेखनीय है कि सरकार के सिटीज़न चार्टर क़ानून में जनशिकायत आयुक्त का दर्जा मुख्य सचिव के बराबर का होगा और इसके लागू होते ही देशभर में करीब 250 पद ऐसे बनेंगे यानि एक साथ 250 अवकाश प्राप्त आइएएस अधिकारियों और न्यायधीशॉ के लिए कम से कम मुख्य सचिव स्तर की कुर्सी तो बन ही गई. और उनकी ज़िम्मेदारी के नाम पर होगी एक लचर व्यवस्था जहां सरकार खुद नहीं चाहेगी कि ये लोग कुछ काम करें) जनशिकायत आयोग के पास भी सिविल कोर्ट के अधिकार होंगे और उनके पास भी ज़ुर्माना आदि लगाने के वही अधिकार होंगे जो डेज़ीगेनेटेड अथॉरिटी को दिए गए हैं
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लोकपाल/लोकायुक्त सदस्यों के पैनल के पास सिर्फ उसके न्यायिक अधिकारी के ठीक से काम न करने की शिकायतें जाएंगी. उसका काम जनशिकायत निवारण अधिकारी के बारे में लोगों की अपील पर सुनवाई करना नहीं होगा. अत: उसके पास आने वाली शिकायतें बहुत कम रहेंगी.
अगर जनशिकायत आयोग में भी 60 दिन में राहत नहीं मिलती है तो अगली अपील लोकपाल/लोकायुक्त के पास की जा सकेगी. यहां शिकायत सुनवाई की
कोई समय सीमा तय ही नहीं की गई है. (इस तरह सारी शिकायतों का भंडार लोकपाल/लोकायुक्त कार्यालय में जमा हो जाएगा. उनके पास कोई पर्याप्त व्यवस्था न होने के कारण वहां भी शिकायतों की सुनवाई शायद ही हो. )


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जिला ब्लॉक स्तर पर न्यायिक अधिकारी का बजट भी लोकपाल/लोकायुक्त के पास से आएगा


जनशिकायत आयोगों और डेज़ीगेनेटेड अथारिटी के बजट सरकार की मेहरबानी पर निर्भर रहेंगे. अक्सर देखा गया है कि सरकारें इन आयोगों को कमज़ोर करने के लिए, जानबूझकर, उन्हें पर्याप्त संख्या में कर्मचारी/अधिकारी एवं संसाधन ही नहीं उपलब्ध करातीं और इनके मुखिया संसाधनों का रोना रोते हुए काम एवं जिम्मेदारी से बचते रहते हैं





इस तरह अगर आपका किसी व्यापार के लिए लाईसेंस, मकान का नक्शा, ड्राविंग लाईसेंस, राशनकार्ड, जॉब कार्ड, जाति प्रमाण पत्र आदि बनने में रिश्वतखोरी की शिकायत आप करना चाहते हैं तो जनलोकपाल के अनुसार आपको अधिकतम जिला स्तर तक लोकपाल के न्यायिक अधिकारी तक जाना होगा. इस तरह काम होने में अधिकतम 2 से 3 महीने का समय लगेगा. इतना ही नहीं अगर किसी विभाग के प्रमुख पर एक बार भी ज़ुर्माना लग गया तो वह आगे से सुनिश्चित करेगा कि उसके यहां सिटीजऩ चार्टर का पालम ठीक से हो.
लेकिन सरकार के सिटीजऩ चार्टर बिल के प्रस्तावों में आप जनशिकायत अधिकारी, उसके बाद डेज़ीगेनेटेड अथॉरिटी, उसके बाद जनशिकायत आयोग और उसके बाद लोकपाल/लोकायुक्त के पास जाएंगे. इसमें कम से कम एक साल का समय लगेगा, और लोकपाल/लोकायुक्त के पास अपील की सुनवाई कब होगी यह तो भगवान ही जाने.