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रविवार, 1 फ़रवरी 2009

ये धुआं-धुंआ क्यों है?

यानी श्रीलंका का सच
श्रीलंका में दशकों से जारी गृहयुद्ध की वजह जातीय पहचान और स्वयं को श्रेष्ठ दिखाने की होड़ है. जातीय पहचान की यह लड़ाई औपनिवेशिक काल से ही जारी है. इस लड़ाई की बीज औपनिवेशिक काल में ही बोई गई थी. बहुसंख्यक सिंहला और अल्पसंख्यक तमिलों के बीच पुरातात्विक स्थलों, पौराणिक नामों और इनका राजनीतिक उपयोग को लेकर खून बहता रहा है.
जातीय पहचान के प्रति आग्रह ईसाई मिशनरियों के श्रीलंका आगमन से ही शुरू होता है. उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में श्रीलंका में ज्यों ज्यों ईसाई मिशनरियों की गतिविधियां बढ़ी, अल्पसंख्यक तमिलों में भी धार्मिक, सांस्कृतिक और भाषाई पहचान का भाव जगने लगा और वह अभिव्यक्त भी होने लगा । अपनी पहचान बनाये रखने के लिए उन्होंने ईसाई मिशनरियों की तरह मंदिरों, स्कूलों का निर्माण, सभाओं का आयोजन और साहित्यों का प्रकाशन शुरू किया.
बात 1815 की है. ब्रिटन ने श्रीलंका पर कब्जा जमा लिया. प्रशासन का काम चलाने के लिए विधान परिषद का गठन हुआ. विधान परिषद में तीन यूरोपीय, एक सिंहला और एक तमिल को जगह मिली. साफ है कि सत्ता में सिंहलाओं और तमिलों को उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिला. सत्ता में उचित भागीदारी नहीं मिलने से दोनों ही समुदायों में असंतोष पैदा हुआ. बाद में अंग्रेजों ने इस असंतोष को हथियार के रूप में अपनाया. फूट डालो, राज करो की नीति के तहत जातीय विभाजन और सांप्रदायिकता को बढ़ावा दिया.
1948 में श्रीलंका आजाद हुआ. इसी साल सिलोन नागरिकता कानून अस्तित्व में आया. इस कानून के मुताबिक तमिल भारतीय मूल के हैं इसलिए उन्हें श्रीलंका की नागरिकता नहीं दी जा सकती है. हालांकि इस कानून को मान्यता नहीं मिली.
1956 में सिंहला को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिया गया, जिसका तमिल राष्ट्रवादी पार्टी ने विरोध किया और उसके सांसद सत्याग्रह पर बैठ गए. बाद में इस विरोध ने हिंसक रूप ले लिया. इस हिंसा में दर्जनों लोग मारे गए और हजारों तमिलों को बेघर होना पड़ा. 1958 के दंगे के बाद तमिल राष्ट्रवादी पार्टी पर प्रतिबंध लगा दिया गया.
संघर्ष का दूसरा कारण सरकार की वह नीति थी जिसके तहत बहुसंख्यक सिंहला समुदाय को पूर्वी प्रांत में बसाया गया, जो परंपरागत रूप से तमिल राष्ट्रवादी लोगों का होमलैंड समझा जाता है. संघर्ष का तात्कालिक कारण यही है.
सत्तर के दशक में भारत से तमिल पुस्तकों, पत्र-पत्रिकाओं और फिल्में के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया गया. साथ ही, श्रीलंका में उन संगठनों पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया, जिनका संबंध तमिलानाडु के राजनीतिक दलों से था. छात्रों के भारत आकर पढ़ाई करने पर रोक लगा दी गई. श्रीलंकाई तमिलों ने इन कदमों को उनकी अपनी संस्कृति से काटने की साजिश करार दिया, हालांकि सरकार ने इन कदमों को आर्थिक आत्मनिर्भरता के समाजवादी एजेंडा का हिस्सा बताया.
1973 में सरकार ने मानकीकरण की नीति लागू की. सरकार के हिसाब से इसका उद्देश्य शिक्षा में असमानता दूर करना था, लेकिन इससे सिंहलियों को ही फायदा हुआ और श्रीलंका के विश्वविद्यालयों में तमिल छात्रों की संख्या लगातार घटती गई.
इसी साल तमिल राष्ट्रवादी पार्टी यानी फेडरल पार्टी ने अलग तमिल राष्ट्र की मांग कर डाली. अपनी मांग को मजबूत करने के लिए फेडरल पार्टी ने अन्य तमिल पार्टियों को अपने साथ कर दिया और इस तरह तमिल यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट का निर्माण हुआ. फ्रंट का 1976 में एक सम्मेलन हुआ, जिसमें पार्टी ने अलग राष्ट्र की मांग की. हालांकि इस समय तक सरकार की नीतियों के भारी विरोध के बावजूद पार्टी एक राष्ट्र के सिद्धांत की बात करती थी.
कुल मिलाकर, आजादी से पहले जो काम अंग्रेजों ने किया, वही काम आजादी के बाद आत्मनिर्भरता के नाम पर श्रीलंका सरकार ने किया.
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श्रीलंका सरकार की गलत नीतियों और पक्षपातपूर्ण रवैये की वजह से श्रीलंका तमिलों में गहरा असंतोष पैदा हो गया.
जो तमिल पार्टियां 1973 तक राष्ट्र विभाजन के खिलाफ थी, वो भी अगल राष्ट्र की मांग करने लगीं.
सरकार की नीतियों की वजह से बहुसंख्यक सिंहला समुदाय को जहां फायदा पहुंचा, वहां अल्पसंख्यक तमिलों को नुकसान. शिक्षा से लेकर रोजगार तक, धर्म से लेकर संस्कृति तक, वाणिज्य से लेकर व्यवसाय तक.. हर जगह तमिलों को बेदखल किया गया. उन्हें उनके हक से वंचित किया गया. सत्तर और अस्सी के दशक में स्थिति ये हो गई कि तमिल युवकों का युनिवर्सिटी में दाखिला और रोजगार पाना नामुमकिन-सा हो गया. इन बेरोजगार और बेकार युवकों ने विद्रोह का रास्ता अख्तियार कर लिया. ब्लैक जुलाई की घटना से भी तमिल विद्रोह को हवा मिली. तेईस जुलाई 1983 को एलटीटीई के एक हमले में श्रीलंकाई सेना के तेरह जवान मारे गए. इस घटना के बाद भड़की हिंसा में कम से कम एक हजार तमिल मारे गए और कम से कम दस हजार घरों को आग के हवाले कर दिया गया. इस नरसंहार ने दुनियाभर के तमिलों को हिला दिया. श्रीलंका में हजारों युवकों ने सशस्त्र विद्रोह का रास्ता अपना लिया.
औपनिवेशिक काल में चाय के बगानों में काम करने के लिए मजदूरों से भारत से श्रीलंका लाया गया था. कहते हैं कि घाव कितना भी गहरा हो, समय के साथ भर जाता है, लेकिन तमिलों के साथ ऐसा नहीं हुआ. जिन तमिलों ने देश की प्रगति में हिस्सेदारी निभाई, उन्हें ने बहुसंख्यक सिंहल समुदाय अपना मानने के लिए तैयार नहीं हुआ. यही वजह है कि तमिलों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी गरीबी की जिंदगी गुजारने के लिए मजबूर होना पड़ा.
1962 में भारत और श्रीलंका के बीच एक संधि हुई जिसके तहत अगले पंद्रह सालों में छह लाख तमिलों को भारत भेजा जाना था और पौने चार लाख तमिलों को श्रीलंका की नागरिकता देनी थी. लेकिन ये तमिल श्रीलंका से भारत नहीं लौटे. बिना नागरिकता, बिना अधिकार वे श्रीलंका में ही रहते रहे. साल 2003 तक उन्हें श्रीलंका की नागरिकता नहीं मिली.
जब सिंहला को राजभाषा का दर्जा मिला तो तमिलभाषी लोगों को नौकरियों से निकाल दिया गया. एक ओर भारत से तमिल साहित्य, फिल्मों, पत्र-पत्रिकाओं के आयात पर रोक लगा दी गई. दूसरी ओर, शिक्षा नीति के मानकीकरण के नाम पर तमिलों के कॉलजों में प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया गया. 1981 के जाफना लाइब्रेरी अग्निकांड से तमिलों को बहुत ठेस पहुंची. इकतीस मई से दो जून तक बड़े ही सुनियोजित तरीके से तमिलों पर हमला किया गया. तमिल अखबार के ऑफिस और लाइब्रेरी को आग के हवाले कर दिया गया. इस अग्निकांड में लाइब्रेरी की करीब एक लाख तमिल पुस्तकें जलकर राख हो गई. इस अग्निकांड में कई पुलिसकर्मी भी शामिल थे.
श्रीलंका साल 1983 से ही गृहयुद्ध की विभीषिका झेल रहा है. इस युद्ध में आधिकारिक रूप से सत्तर हजार से भी ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं. इसे दुनिया का सबसे खतरनाक संघर्षों में से एक माना जाता है. यह युद्ध मुख्यत तमिल विद्रोही एलटीटीई और सिंहला समुदाय के प्रभाव वाली सरकार के बीच है. दुनिया के इकतीस देशों ने एलटीटीई को आतंकवादी संगठन का दर्ज दे रहा है.
2001 युद्धविराम के बाद शांति की संभावना बनी. 2002 में दोनों पक्षों ने एक संधि पर हस्ताक्षर भी किया, लेकिन 2005 में हिंसा फिर से भड़क उठी. 2006 में सरकार ने एलटीटीई के खिलाफ मोर्चा खोल दिया और पूर्वी प्रांत से उसे बाहर खदेड़ दिया. इसके बावजूद लिट्टे ने अलग राष्ट्र की मांग को लेकर संघर्ष फिर से शुरू करने की घोषणा की. श्रीलंकाई सेना ने दावा किया कि उसने दुश्मन के सारे नौकाओं को नष्ट कर दिया है और उसने ये भी दावा किया कि आने वाले समय में वह उसे पूरी तरह नष्ट कर देगी. एलटीटीई पर सैंकड़ों बार संधि उल्लंघन का आरोप लगाते हुए उसने दो जनवरी 2008 को उसके खिलाफ युद्ध छेड़ दिया.
एक साल बाद उसने लिट्टे के गढ़ किलिनोच्ची पर कब्जा जमा लिया. इस संघर्ष की वजह से करीब दो लाख तमिलों को विस्थापित होना पड़ा.
संघर्ष के कारण
सिंहला वनली एक्ट- इस कानून के मुताबिक देश की राष्ट्रभाषा सिंहला होगी
गैर-सिंहलियों को रोजगार मिलना करीब-करीब असंभव हो गया
जो पहले से नौकरी में थे, उन्हें नौकरी से निकाला जाने लगा
प्रधानमंत्री एसडब्ल्यूआरडी भंडारनायके ने यह कानून लाया था
शिक्षा का कथित मानकीकरण
इस कानून के तहत, विश्वविद्यालयों में तमिलों का प्रवेश असंभव हो गया
नौकरियों में भी गैर-सिंहलियों के लिए कोई काम नहीं बचा
उन्हें नौकरी से निकाला जाने लगा
तमिल यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट का गठन
टीयूएलएफ ने अधिकार के लिए सशस्त्र संघर्ष का समर्थन किया
बेरोजगार और बेकार युवकों ने हथियार उठा लिया
वामदल शुरू-शुरू में सांप्रदायिक संघर्ष का समर्थन नहीं किया
बाद में, भाषा के मुद्दे पर वामदलों ने टीयूएलएफ का साथ दिया
1974 में लिबरेशन टाईगर ऑफ तमिल ईलम का गठन
एलटीटीई को राजनीतिक समर्थन
एलटीटीई का राजनीतिक और प्रशासनिक प्रतिष्ठानों पर हमला
लिट्टे का कारनामा
1977 में जाफना के महापौर अल्फ्रेड दुरैअप्पा की हत्या
1977 में स्वयं प्रभाकरन द्वारा तमिल सांसद एम कनगरत्नम की हत्या
1983 में सैनिक काफिले पर हमला, 13 सैनिकों की मौत
1984 में केंट और डॉलर फॉर्म में आम नागरिकों की सामूहिक हत्या
1985 में अनुराधापुरम में 146 नागरिकों की हत्या
1987 में एलटीटीई ने पहलीबार आत्मघाती हमले को अंजाम दिया
विस्फोटकों से भरे ट्रक को सैन्य शिविर की दीवार से टकरा दिया
इस हमले में चालीस सैनिक मारे गए
इस हमले के बाद लिट्टे ने 170 से भी ज्यादा आत्मघाती हमले को अंजाम दिया
यह संख्या दुनिया के किसी भी संगठन के आत्मघाती हमले की संख्या से ज्यादा है
आखिरकार आत्मघाती हमला एलटीटीई की पहचान बनाया.
1989 में जाफना विश्वविद्याल के प्रोफेसर और मानवाधिकारवादी डॉ रजनी की हत्या
1993 में लिट्टे ने एक आत्मघाती हमले में राष्ट्रपति रनसिंघे प्रेमदासा की हत्या कर दी.
1996 में कोलंबों के सेंट्रल बैंक में आत्मघाती हमला, 90 की मौत, 1400 घायल
1997 में श्रीलंकाई वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमला
1998 में बौद्धों के सबसे पवित्र मंदिरों में से एक टेंपल ऑफ टूथ पर हमला
1999 गोनागाला पर हमला, 50 सिंघलियों की मौत
2001 में भंडारनायके इंटरनेशनल हवाई अड्डे पर हमला
इस हमले में एयरफोर्स के आठ और श्रीलंकन एयरलाइन्स के चार विमान नष्ट हो गए
हमले का प्रतिरोध
1983 में सेना पर लिट्टे के हमले के बाद सिंहलियों ने तमिलों पर सुनियोजित हमले किए
इन हमलों में एक हजार से ज्यादा तमिल मारे गए
तमिलों के सिंहलियों के इलाके से भागना पड़ा
अनुराधापुरम हत्या मामले के जवाब में सेना ने कुमदिनी बोट पर हत्या कर 23 तमिलों की हत्या कर दी
1987 सेना ने ऑपरेशन लिबरेशन शुरू किया
इसका लक्ष्य जाफना को मुक्त कराना था
इस ऑपरेशन में सेना को जीत मिली, मगर प्रभाकरन भागने में कामयाब हो गया
भारतीय हस्तक्षेप
भारत ने कई कारणों से श्रीलंकाई संघर्ष में हस्तक्षेप किया. इनमें क्षेत्रीय शक्ति के रूप में खुद को प्रदर्शित करना और तमिलनाडु में आजादी की मांग को दबाना शामिल था. चूंकि तमिलनाडु के लोग सांस्कृतिक कारणों से श्रीलंकाई तमिलों के हितों के पक्षधर रहे हैं, इसलिए भारत सरकार को भी संघर्ष के दौरान श्रीलंकाई तमिलों की मदद में आगे आना पड़ा है. 80 के दशक की शुरुआत में भारतीय एजेंसियों ने कई तरह से तमिलों की मदद की.
पांच जून 1987 को जब श्रीलंका सरकार ने दावा किया कि वे जाफना पर कब्जा करने के करीब हैं, तभी भारत ने पैराशूट के जरिए जाफना में राहत सामाग्रियां गिराई. भारत की इस मदद को लिट्टे की प्रत्यक्ष मदद भी माना गया. इसके बाद 29 जुलाई, 1987 को प्रधानमंत्री राजीव गांधी और श्रीलंकाई राष्ट्रपति जयवर्द्धने के बीच एक समझौते पर हस्ताक्षर हुआ. इस समझौते के तहत तमिल को आधिकारिक दर्जा दिया गया. साथ ही, तमिलों के कई अन्य मांगें मान ली गईं. वहीं, भारतीय शांति रक्षक बलों के सामने विद्रोहियों को हथियार डालना पड़ा.
ज्यादातर विद्रोही गुटों ने भारतीय शांति रक्षक बलों के सामने हथियार डाल दिए थे, लेकिन लिट्टे इसके लिए तैयार नहीं हुआ. भारतीय शांति रक्षक सेना ने लिट्टे को तोड़ने की पूरी कोशिश की. तीन सालों तक दोनों के बीच युद्ध चला. इस दौरान शांति रक्षकों पर मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप भी लगे. उधर, सिंहलियों ने भी अपने देश में भारतीय सैनिकों की उपस्थिति का विरोध करना शुरू किया. इसके बाद श्रीलंका सरकार ने भारत से शांति रक्षकबलों को वापस बुलाने की मांग की, लेकिन राजीव गांधी ने इससे इनकार कर दिया. 1989 के संसदीय चुनाव में राजीव गांधी की हार के बाद नए प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने श्रीलंका से शांति रक्षक बलों को हटाने का आदेश दिया. इन तीन सालों में श्रीलंका में ग्यारह सौ भारतीय सैनिक मारे गए, वहीं पांच हजार श्रीलंकाई भी मारे गए.
1991 में एक आत्मघाती हमलाकर लिट्टे ने राजीव गांधी की हत्या कर दी. इसके बाद भारत ने श्रीलंकाई तमिलों की मदद बंद कर दी.
साल 2008 में जब श्रीलंकाई सेना ने लिट्टे के ठिकानों पर कब्जा करना शुरू किया तो भारत की गठबंधन सरकार हिल गई. तमिलनाडु के राजनीतिक दलों ने केंद्र सरकार से श्रीलंकाई मामले में हस्तक्षेप की मांग की. ऐसा नहीं करने पर मुख्य सहयोगी दल डीएमके ने सरकार से हटने की भी धमकी दे डाली. केंद्र सरकार पर दबाव बनाने के लिए तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम करुणानिधि ने अपने सांसदों से इस्तीफा तक ले लिया. तमिलों के मुद्दे पर तमिलनाडु की तमाम पार्टियां साथ हो गई और श्रीलंका में तुरंत युद्धविराम की मांग की. भारी दबाव के बीच विदेशमंत्री प्रणव मुखर्जी श्रीलंका गए. श्रीलंका के राष्ट्रपति ने उन्हें तमिलों की सुरक्षा का आश्वासन दिया. युद्ध में फंसे आम-नागरिकों को बाहर निकलने लिए उसने एकतरफा युद्ध विराम भी किया. अगर यही बात पहले होती तो सैंकड़ों निर्दोष लोगों की जान बच जाती.

शनिवार, 24 जनवरी 2009

इजरायल का अस्तित्व

इजरायल दुनिया का एकमात्र यहूदी देश है. अपनी आजादी से पहले भी और आजादी के बाद भी इजराइल अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा है. यूं कहे तो इजरायल का अस्तित्व संघर्ष और सिर्फ संघर्ष पर टिका है. उसका आज तक का इतिहास अत्यंत ही रक्त-रंजित रहा है. इसके बावजूद भविष्य शांतिपूर्ण होगा, इसकी सिर्फ शुभकामना ही दी जा सकती है.
इजरायल पश्चिमी एशिया का एक छोटा सा देश है. यह भूमध्यसागर के किनारे स्थित है. इसकी उत्तरी सीमा पर लेबनान, उत्तर-पूर्व में सीरिया, पूर्व में जॉर्डन और दक्षिण-पश्चिम में मिश्र स्थित है. क्षेत्रफल के हिसाब छोटा होने के बावजूद इजरायल काफी विविधतओं भरा देश है. पश्चिमी तट और गजा पट्टी इजरायल से सटा हुआ है.
इजरायल की आबादी बहत्तर लाख अस्सी हजार है. इनमें यहूदी बहुसंख्यक हैं. इजरायल दुनिया का एकमात्र यहूदी राष्ट्र है. यहूदी के अलावा यहां अरबी मुस्लिम, ईसाई और अन्य जातियां भी रहती हैं.
आधुनिक इजरायल प्राचीनकाल के यहूदी भूमि की परिकल्पना पर आधारित है. कभी समूचा इयरायल यहूदी धर्मावलंबियों का देश माना जाता था. प्रथम विश्वयुद्ध के बाद राष्ट्रसंघ ने यहूदियों के लिए एक अलग देश के रूप में इजरायल के गठन के ब्रिटेन के प्रस्ताव को मान्यता दे दी. 1947 में संयुक्त राष्ट्र ने इजरायल के विभाजन को मंजूरी दे दी. जिसके तहत यहूदियों और अरबों के लिए अलग राज्य को मंजूरी दे दी. 14 मई 1948 को यहूदी बहुल राज्य इजरायल ने अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दी. इजरायल के इस घोषणा को आस-पास के अरब राष्ट्रों ने मानने से इनकार कर दिया और इजरायल के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया.
इजरायल ने अरब राष्ट्रों के साथ एक ही समय कई मोर्चों पर युद्ध लड़ा और सभी युद्धों में जीत हासिल की. इस जीत ने अलग इजरायल की स्वतंत्रता को पुख्ता कर दिया. इतना ही नहीं, इस जीत के बाद इजरायल ने संयुक्त राष्ट्र की विभाजन योजना के बाहर भी अपनी सीमा का विस्तार किया. इसके बाद से इजरायल को अपने पड़ोसी अरब देशों से लगातार संघर्ष करना पड़ा. ये संघर्ष बड़े युद्धों और रक्तपात के अंतहीन सिलसिले के रूप में सामने आया और आज भी जारी है.
सीधे-सीधे शब्दों में कहें तो इजयराल की स्थापना और उसका अस्तित्व संघर्षों पर ही टिका है. इजरायल ने मिश्र और जॉर्डन के साथ कई शांति-संधि भी किए, लेकिन शांति के ये प्रयास इजरायल और फिलीस्तीनियों में दीर्घकालीन शांति
लाने में नाकामयाब रहे.
इजरायल में संसदीय शासन व्यवस्था है. प्रधानमंत्री सरकार का मुखिया होता है. सकलू घरेलू उत्पाद के हिसाब से इजरायल दुनिया का चौवालिसवां सबसे बड़ा देश है. मानव विकास सूचकांक, प्रेस की स्वतंत्रताऔर आर्थिक प्रतिस्पर्धा के हिसाब से मध्यपूर्व के देशों में इजरायल का स्थान सबसे ऊपर है. देश का सबसे बड़ा शहर येरूसलम इसकी राजधानी है, जबकि तेल अवीव इसकी वित्तीय राजधानी है.
इतिहास
इजरायल ईसापूर्व से ही यहूदियों की पवित्र भूमि मानी जाती है. प्राचीन मान्यता के अनुसार, ईश्वर ने तीन यहूदियों को रहने के लिए ये धरती दी थी. विद्वान मानते हैं कि यह समय ईसा पूर्व दूसरी सहस्त्राब्दी की हो सकती है. यहूदी परंपरा के मुताबिक ईसापूर्व ग्यारहवी सदी में इस भूमि पर इजरायली साम्राज्य स्थापित हुआ था और इन शासकों ने करीब एक हजार साल तक इजराइल पर शासन किया था. इजरायल के ये स्थल यहूदियों के लिए सबसे पवित्र माना जाता है.
इजरायली साम्राज्य और सातवीं शताब्दी में इस्लामी विजय के मध्य इजरायल पर सीरिया, बेबीलोनिया, पर्सिया, ग्रीक, रोम, ससेनिया और बायजेनटाइन का शासन रहा. 132 ईस्वी में रोमन साम्राज्य के खिलाफ बार कोखबा विद्रोह की असफलता के बाद इस क्षेत्र में यहूदियों की उपस्थिति घट गई. यहूदियों का बड़े पैमाने पर पलायन हुआ. 628-29 ईस्वी में बायजेनटाइन शासक हेराक्ल्यूस ने वृहत पैमाने पर यहूदियों का संहार किया, जिसके कारण यहूदियों को वहां से भागना पड़ा. इस घटना के बाद यहां यहूदियों की संख्या नगण्य हो गई. 1260 में इजरायल मामलुक सल्तनत का हिस्सा बन गया और 1516 में यह ओटोमन साम्राज्य का हिस्सा बन गया, जिसने बीसवीं सदी तक इस क्षेत्र पर शासन किया.
इजरायलियों को करीब पंद्रह सौ सालों तक अपनी जमीन से अलग रहना पड़ा, लेकिन सांस्कृतिक एकता ने इनके दिलों में मातृभूमि के प्रति प्रेम की लौ को जलाये रखा. बाइबिल और यहूदी प्रार्थना पुस्तिका ने इनकी आशा और विश्वास को बरकरार रखा. बारहवीं सदी की शुरुआत में कैथोलिक ईसाईयों की प्रताड़ना से पीड़ित होकर यहूदी एकबार फिर इजरायल लौटने लगे. 1492 में स्पेन ने यहूदियों को खदेड़ दिया. सोलहवी शताब्दी में इजरायल चार शहरों में यहूदियों ने जड़ें जमा ली और अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में भारी संख्या में लोग इजरायल में आ बसे.
उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में यहूदियों ने एक अलग यहूदी राष्ट्र की मांग शुरू कर दी. 1896 में हर्जल ने अपनी किताब द जेविस स्टेट में भावी यहूदी राष्ट्र की रूप रेखा रखी. अगले ही साल वर्ल्ड जियोनिस्ट कांग्रेस की स्थापना हुई, जिसकी अध्यक्षता हर्जल ने की.
1904-14 के दौरान करीब चालीस हजार यहूदी फिलीस्तीन में आकर बस गए. प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान ब्रिटेन के विदेशमंत्री आर्थर बलफोर ने एक घोषणा पत्र जारी किया, जिसे बलफोर घोषणापत्र के नाम से जाना जाता है. इस घोषणा पत्र में फिलीस्तीन के अंदर एक यहूदी राष्ट्र की बात कही गई थी. इस घोषणा पत्र में ये बात भी शामिल की गई कि कुछ भी ऐसा नहीं किया जाए जिससे फिलीस्तीन में यहूदियों के नागरिक अधिकारों के खिलाफ हो, चाहे यहूदी दुनिया के किसी भी भाग में भी क्यों न हो. यहूदी स्वयंसेवकों की मदद से जेविस लीगन नाम से सेना की बटालियन बनी, जिसने फिलीस्तीन को जीतने में ब्रिटिश सेना की मदद की. इसका अरबों ने विरोध किया और 1920 का फिलीस्तीन युद्ध हुआ.
1922 लीग ऑफ नेशन्स ने बलफोर घोषणा पत्र से मिलते जुलते ब्रिटेन के एक प्रस्ताव को मंजूरी दे दी. इस क्षेत्र में अरब मुस्लिमों की आबादी ज्यादा थी, लेकिन इस क्षेत्र का सबसे बड़ा शहर येरूसलम यहूदी बहुल था. इधर, यहूदियों का फिलीस्तीन आना जारी रहा और फिलीस्तीन में यहूदियों की आबादी एक लाख हो गई. 1930 में नाजीवाद के उदय के कारण यूरोप से भारी संख्या में यहूदियों का पलायन हुआ और फिलीस्तीन में यहूदियों की संख्या बढ़कर ढाई लाख से भी ज्यादा हो गई. यहूदियों आबादी के विस्तार ने 1936-39 के अरब क्रांति को जन्म दिया. इधर, दुनियाभर में यहूदियों के संहार का सिलसिला जारी रहा. द्वितीय विश्व आते-आते फिलीस्तीन में यहूदियों की आबादी बढ़कर तैंतीस प्रतिशत तक आ पहुंची.
इजरायल की आजादी
1945 के बाद ब्रिटेन का यहूदियों का साथ मतभेद बढ़ गया. 1947 में ब्रिटेन ने यह कहकर फिलीस्तीन शासनादेश को वापस ले लिया कि वह अरबों और यहूदियों के बीच सर्वसम्मत हल निकालने में नाकामयाब रहा. नवगठित संयुक्त राष्ट्र संघ ने 29 नवंबर, 1947 को संयुक्त राष्ट्र विभाजन प्रस्ताव(संयुक्त राष्ट्र आमसभा प्रस्ताव 181) को मंजूरी दे दी और इस प्रकार अरब और यहूदियों के लिए दो राष्ट्रों ने निर्माण हुआ. इस प्रस्ताव के तहत संघर्ष रोकने के लिए येरूसलम को अंतर्राष्ट्रीय शहर घोषित कर दिया गया और स्वयं संयुक्त राष्ट्र ने इसके प्रशासन की जिम्मेदारी संभाल ली. इस प्रस्ताव को अरब लीग और अरब उच्च समिति ने खारिज कर दिया. एक दिसंबर, 1947 से अरब उच्च समिति ने तीन दिवसीय हड़ताल शुरू की और अरब लड़ाकाओं नें यहूदियों पर हमला कर दिया. यहूदियों ने भी रक्षात्मक रुख अपनाया और अरबों को जवाब देना शुरू किया. इस तरह यहां गृहयुद्ध भड़क उठा. इस गृहयुद्ध की वजह से फिलीस्तीन-अरब अर्थव्यवस्था ढह गई और फिलीस्तीन-अरब को भागना पड़ा.
14 मई, 1948 को यहूदी एजेंसी ने इजरायल की स्वतंत्रता की घोषणा कर दी. इधर, मिस्र, सीरिया, जॉर्डन, लेबनान और इराक ने एक साथ इजरायल पर हमला कर दिया. इस युद्ध को 1948 का अरब-इजरायल युद्ध के नाम से भी जाना जाता है. इस युद्ध में अरब देशों की सहायता के लिए मोरक्को, सूडान, यमन और सऊदी अरब ने भी अपने सैनिक भेजे. यह युद्ध एक साल तक चला. और अंत में युद्धविराम की घोषणा हुई. ग्रीन-लाइन के नाम के अस्थायी सीमा रेखा पर सहमति बनी. अलग जॉर्डन को पश्चिम तट और गजा नाम दिया गया. गजा पट्टी पर मिस्र ने नियंत्रण कर लिया. 11 मई, 1949 को संयुक्त राष्ट्र ने इजरायल को अपनी सदस्यता प्रदान की. संघर्ष के दौरान अस्सी प्रतिशत अरब आबादी (7,11,000) को वहां से भागना पड़ा. इस समय फिलीस्तीन शरणार्थी की समस्या इजराइल-फिलीस्तीन संघर्ष की मुख्य वजह माना जा रहा है.
अरब देशों ने इजरायल को मान्यता देने से इनकार कर दिया और इजरायल को नष्ट करने का आह्वान किया. 1967 में मिस्र, सीरिया और जॉर्डन की सेना इजरायली सीमा पर पहुंच गई. और संयुक्त राष्ट्र शांति रक्षकों को वहां से भगा दिया. साथ ही, उन्होंने लालसागर तक इजरायल की आवाजाही पर रोक लगा दी. इजरायल ने अरबों के इस कार्रवाई का जवाब दिया और छह दिनों तक चले युद्ध में उसे निर्णायक जीत मिली. उसने पश्चिमतट, गजा पट्टी, सिनाई प्रायद्वीप और गोलन की पहाड़ियों पर कब्जा जमा लिया. 1949 में ग्रीन लाईन इजरायल और विजित क्षेत्र की प्रशासनिक सीमा बन गयी. पूर्व येरूसलम के साथ येरूसलम की सीमा में भी विस्तार हुआ. 1980 में पारित येरूसलम कानून ने इस सीमा को मंजूरी दे दी, जिसने येरूसलम की स्थिति पर विवाद खड़ा कर दिया.
1967 के युद्ध में अरबों की हार ने अरब में गैर-सरकारी तत्वों के संघर्ष को बढ़ावा दिया. फिलीस्तीन लिबरेशन ऑर्गनाइजेशन ने तो हथियार बंद संघर्ष को ही आजादी का एकमात्र रास्ता करार दिया. साठ के दशक के शुरू और सत्तर के दशक के अंत में फिलीस्तीनियों ने इजरायलियों के खिलाफ दुनियाभर में श्रृंखलाबद्ध हमले किये. 1972 के ग्रीमकालीन ओलंपिक में इजरायली खिलाड़ियों का संहार इसमें शामिल है. उधर, इजरायल ने भी इन हमलों का जवाब दिया.
1977 के संसदीय चुनाव के बाद मिस्र के राष्ट्रपति अनवर अल सादत ने इजरायली संसद में भाषण देते हुए कहा कि अरब देश इजरायल को पहलीबार मान्यता दे रहे हैं. बाद में एक समझौते के मुताबिक इजरायल ने सिनाई प्रायद्वीप से सेना हटा लिया और ग्रीन लाइन के पार फिलीस्तीन की स्वायत्ता पर बाचीत के लिए तैयार हो गया. हालांकि फिलीस्तीन की स्वायत्तता पर कभी बातचीत नहीं हो पाई. सरकारों ने इजरायलियों को पश्चिमी तट में बसाना शुरू किया, जिसकी वजह से फिर संघर्ष शुरू हो गया.
7 जून 1981 को इजरायल ने इराक के ओसिराक परमाणु रिएक्टर पर हमला कर दिया. इसकी वजह इजरायल का वो खुफिया रिपोर्ट है जिसमें इराक द्वारा परमाणु बम विकसित करने और इजरायल के खिलाफ प्रयोग करने की बात कही गई थी. 1982 में इजरायल ने लेबनान के गृहयुद्ध में हस्तक्षेप करते हुए कई युद्ध शिविरों को नष्ट कर दिया, जहां से फिलीस्तीनी लड़ाके इजरायल पर मिसाईल से हमले करते थे.
1987 में फिलीस्तीनियों ने एकबार फिर हिंसा भड़क उठी. छह साल तक चले इस युद्ध में एक हजार लोग मारे गए.
1993 में इजरायल की ओर से शिमॉन पैरेस और फिलीस्तीन लिबरेशन ऑर्गेनाइजेशन की ओर से महमूद अब्बास ने ओस्लो संधि पर हस्ताक्षर किया. इस संधि ने फिलीस्तीन राष्ट्रीय प्राधिकरण को पश्चिमी तट और गजा पट्टी पर स्व-शासन का अधिकार दिया. इस संधि का मकसद आतंकवाद को खत्म करना था. 1994 में इजरायल-जॉर्डन संधि अस्तित्व में आया जिसके तहत जॉर्डन ने इजरायल के साथ रिश्ते सामान्य करने की दिशा में कदम बढ़ाया. ये संधि दोनों पक्ष के लोगों को स्वीकार था. लेकिन 1995 में यहूदियों के नेता यित्जिहाक रबिन की हत्या ने शांति संधि को नुकसान पहुंचाया.
1990 के अंत में इजरायल ने बेंजामिन नेतनयाहु की अगुवाई में हेब्रॉन से अपना सैनिक हटा लिया और फिलीस्तीन राष्ट्रीय प्राधिकारण को शासन का अधिकार दे दिया.
1991 में प्रधानमंत्री यहुद बराक ने दक्षिणी लेबनान से सैन्य वापसी कर नए युग की शुरुआत की. बाद में भी उन्होंने फिलीस्तीन प्राधिकरण के अध्यक्ष यासर यराफात से बातचीत जारी रखी. जुलाई 2000 में कैंप डैविड में यासर अराफात और अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के बीच हो रहे सम्मेलन में बराक ने फिलीस्तीनी राज्य की स्थापना का प्रस्ताव दिया, जिसे अराफात ने नामंजूर कर दिया और इस तरह बातचीत भंग हो गई.
2001 में एरियल शैरॉन नए प्रधानमंत्री बने. शैरॉन ने गजा पट्टी से एकतरफा अपने सैनिकों को हटा लिया. मगर 2006 में हृदयाघात से वे कॉमा में चले गए और सत्ता यहुद ओल्मर्ट को सौंप दिया..
नवीन घटनाचक्र
जुलाई 2006 में हिजबुल्ला लड़ाकाओं ने इजरायल पर मिसाइल से हमले किए और दो इजरायलियों का अपहरण कर लिया. इससे द्वितीय लेबनान युद्ध भड़क उठा और लड़ाई महीने भर चली.
नवंबर 2007 में इजराइली प्रधानमंत्री यहुद ऑल्मर्ट और फिलीस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास सभी मुद्दों पर बातचीत के लिए राजी हो गए और दोनों ने संघर्ष विराम कर दिया.
मगर, दिसंबर 2008 के अंत में हमास ने युद्ध विराम का उल्लंघन करते हुए गजा पट्टी से इजरायल पर मिसाइल से हमले शुरू कर दिए. इजराइल ने भी जवाबी हमले किए. अठारह दिनों तक चले इस युद्ध में कम से कम ग्यारह सौ लोग मारे गए, जबकि कोई पांच हजार घायल हुए. गजा पट्टी में ढाई लाख मकान ध्वस्त हो गए.