हिंदी शोध संसार
धर्मनिरपेक्षता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
धर्मनिरपेक्षता लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 14 नवंबर 2014

नेहरू की ही सवा-शताब्दी क्यों?

शंकर शरण 
IV/ 44, एन.सी..आर.टी. आवास, श्री अरविंद मार्ग, नई दिल्ली 110 016


जवाहरलाल नेहरू की सवा-शताब्दी मनाने हेतु बनी उच्च-स्तरीय समिति का पुनर्गठन एक अधूरा कदम है। उस के पहले देश को यह बताया जाना चाहिए कि किस आधार पर नेहरू की शताब्दी और सवा-शताब्दी मनाने के लिए मँहगा सरकारी उपक्रम हुआ, जबकि डॉ. राजेंद्र प्रसाद के लिए नहीं?
यदि नेहरू प्रथम प्रधान मंत्री थे, तो प्रसाद भी प्रथम राष्ट्रपति थे। उसी तरह, क्यों गाँधी-जयंती स्थाई अवकाश घोषित हो गया, जबकि ‘राष्ट्र-पितामह’ स्वामी दयानन्द सरस्वती को वह मान नहीं मिला? फिर, किस कारण सरदार वल्लभभाई पटेल को स्वतंत्र भारत के चौवालीस वर्षों तक देश के औपचारिक सर्वोच्च सम्मान के योग्य नहीं समझा गया? उन से पहले इंदिरा गाँधी, राजीव गाँधी ही नहीं, कई क्षेत्रीय नेताओं तक को भारत-रत्न बनाया जा चुका था! अतः अनेक सवाल एवं तथ्य नेहरू और उनके वंश की महानता भारतीय मानस पर जबरन थोपने का संकेत करते हैं।
हरेक देश में किसी दिवंगत की जयंती मनाने या न मनाने के कारण मूलतः समान होते हैं। जिसने देश और समाज की सच्ची सेवा की, उसे याद करते हैं। जिसने ऐसा कुछ विशेष न किया अथवा हानि पहुँचाई, उसे भूल जाया जाता है। अतः तुलनात्मक सवाल यह भी है कि आज रूस में लेनिन और चीन में माओ को किन कारणों से विस्मृत किया जा चुका है?
लेनिन से नेहरू की तुलना भारत में पहले भी होती रही है। तीस-चालीस साल पहले कांग्रेसी नेता और मार्क्सवादी प्रोफेसर इस पर लेख व पुस्तकें प्रकाशित किया करते थे, और सरकार से ईनाम पाते थे। तब रूस में लेनिन और यहाँ नेहरू की अतुलनीय महानता एक स्वयंसिद्धि होती थी। तदनुरूप दोनों को अपने-अपने देश का मुक्ति-योद्धा, प्रथम शासक, मार्गदर्शक, विचारक, नीति-निर्माता, इस प्रकार महामानव, आदि बताने का चलन था।
फिर समय आया कि रूसियों ने वह लेनिन-पूजा बंद कर दी। वही स्थिति चीन में माओ की हुई। इस तरह, आज उन देशों में अपने-अपने उन कथित मार्गदर्शक, महान विचारक लेनिन, माओ की जयंती मनना तक पूरी तरह बंद हो चुका है। रूस और चीन में इस व्यक्ति-पूजा पटाक्षेप के पीछे कोई जोर-जबर्दस्ती नहीं हुई। रूस चीन की जनता ने सर्वसम्मति से उस कथित महानता का अध्याय बंद किया। कारण यह भी था कि वह पूजा उन पर दशकों तक जबरन थोपी हुई थी। क्या नेहरू की स्थिति भिन्न है?
अब यह निर्विवाद है कि लेनिन, माओ की महानता की गाथाएं उनके देशों में राज्यसत्ता की ताकत के बल पर गढ़ी और प्रचारित की जाती रहीं। उन के जीवन के हर काले अध्याय और कदमों पर भारी पर्दा डाल कर रूसी-चीनी जनगण के जीवन के हर पहलू को लेनिन-माओमय बना डाला गया था। इसीलिए, जैसे ही वह जबरन सत्ता दबाव हटा, लोगों ने स्वयं वह लज्जास्पद पूजा बंद कर दी। इस पर सर्वसहमति इतनी स्पष्ट थी कि उनके देशों में कोई मामूली विवाद तक न हुआ। आज रूस और चीन में टॉल्सटॉय और कन्फ्यूशियस ही सर्वोच्च चिंतक माने जाते हैं, लेनिन और माओ तो बिलकुल नहीं।
सच पूछें तो इस प्रसंग में भी नेहरू को लेनिन से तुलनीय बनाने का समय आ गया है। जिस तरह, कम्युनिस्ट राज ने रूस पर लेनिन-पूजा थोपी थी, उसी तरह नेहरूवंश के राज ने भारत में नेहरू-गाँधी पूजा थोपी। दूसरी ओर, नेहरू का राजनीतिक, वैचारिक रिकॉर्ड भी लेनिन से तुलनीय है। अर्थ-नीति, विदेश-नीति, गृह-नीति, शैक्षिक-नीति, दार्शनिक रुख आदि किसी भी बुनियादी बिन्दु पर नेहरू की विरासत गौरवपूर्ण नहीं है।
उलटे, राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश-नीति में नेहरू के निर्णयों, कार्यों, विचारों में एक से एक लज्जास्पद अध्याय हैं। तिब्बत पर स्थापित भारतीय कूटनीतिक संरक्षण अधिकार को स्वतः छोड़कर उस महत्पूर्ण पड़ोसी देश को अपने ‘मित्र’ कम्युनिस्ट चीन के हवाले कर नेहरू ने स्वयं भारत को अरक्षित कर डाला, जबकि सरदार पटेल ने इसके विरुद्ध चेतावनी दी थी। आज अरुणाचल प्रदेश पर चीन का दावा तिब्बत के माध्यम से है, और किसी तरह नहीं। फिर, प्रधान मंत्री रूप में अपनी प्रथम अमेरिका यात्रा में नेहरू ने अमेरिकियों को कम्युनिस्टों वाला साम्राज्यवाद-विरोध का लेक्चर पिलाकर स्तब्ध, क्षुब्ध कर दिया। इस प्रकार, दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण देश से संबंध बिगाड़ने की शुरुआत की। कम्युनिस्ट चीन से दोस्ती निभाने की खातिर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् में भारत को प्रस्तावित स्थाई सीट ठुकराया। यहाँ तक कि जब उसी दोस्त ने चुपके से घुस-पैठ कर कश्मीर के पूर्वी हिस्से का एक भाग दखल कर लिया, तो नेहरू ने संसद में प्रधानमंत्री पद से बयान दिया कि ‘उस हिस्से में तो घास भी नहीं उगती’!
ऐसी बचकानी समझ और लज्जास्पद योग्यता वाले व्यक्ति को प्रथम प्रधान मंत्री बनाने का अपराध मोहनदास गाँधी ने किया था। पर विगत छः दशकों के झूठे, सरकारी प्रचार के कारण आज देश के लोग जानते भी नहीं कि स्वतंत्रता मिलने के समय कांग्रेस में प्रथम प्रधानमंत्री के रूप में नेहरू पहली तो क्या, दूसरी पसंद भी नहीं थे! सब से ऊपर सरदार पटेल, फिर जे. बी. कृपलानी को कांग्रेसियों ने अपनी पसंद बताया था। उन्हें अमान्य कर गाँधीजी ने नेहरू को थोपा, जिन्होंने स्वतंत्र भारत के नवनिर्माण और नीति-निर्धारण की पूरी मिट्टी पलीद कर दी।
यहाँ तक कि नेहरू का व्यक्तिगत जीवन भी अनुकरणीय नहीं था। स्वयं नेहरू के वरिष्ठतम सहयोगियों समेत अनगिनत समकालीनों ने यह लिखा है। लेडी माउंटबेटन के अंतरंग प्रभाव में नेहरू ने देश का विभाजन, कश्मीर की ऐसी-तैसी तथा कम्युनिस्ट षडयंत्रकारियों की मदद की। कश्मीर को विवादित और पाकिस्तान को सदा के लिए लोलुप बनाने में नेहरू का सबसे बड़ा दोष है। और यह उन्होंने अपने गृहमंत्री सरदार पटेल को अँधेरे में रख कर किया था! यह सब कोई आरोप नहीं, जगजाहिर तथ्य हैं जिनके प्रमाण उतने ही सर्वसुलभ हैं।
तब ऐसे ‘प्रथम’ मार्गदर्शक की सवा-शताब्दी जयंती में हम क्या मनाएं? किस बात की चर्चा करें? क्या वही झूठ और अतिरंजनाएं दुहराएं, जो नेहरूवंशी सत्ता ने जोर-जबरदस्ती और छल-प्रपंच से स्थापित कर दी हैं? क्या समकालीन रूसी और चीनी जनता से इस मामले में कोई तुलनात्मक लाभ न उठाएं?
किसी भ्रम में न रहें। नेहरू के पक्ष में, उनकी विरुदावली और ‘योगदान’ के जितने भी किस्से व तर्क दिए जाते रहे हैं, वे ठीक वैसे ही हैं जैसे सोवियत सत्ता के दिनों में लेनिन के पक्ष में मिलते थे। अतः बिना उन गंभीर दोषों के, जो नेहरू में थे, बावजूद हमारी सरकार ने यदि प्रथम राष्ट्रपति देशरत्न डॉ. राजेंद्र प्रसाद की कोई शताब्दी या सवा-शताब्दी नहीं मनाई – तो कोई कारण नहीं कि अनगिनत लज्जास्पद कार्यों के बावजूद हम नेहरू पर देश का पैसा और समय बर्बाद करते रहें। यह पहले ही बहुत अधिक हो चुका है, कम से कम इस का ध्यान भी रखें।
केंद्रीय कैबिनेट ने सही निर्णय लिया है कि ल्युटन की दिल्ली में मृत नेताओं को आवंटित बंगलों को ‘स्मारक’ यानी उनके वंशजों द्वारा कब्जाने की प्रक्रिया बंद की जाएगी। किन्तु, तब अब तक किए गए कब्जों को बनाए रखने की क्या तुक है? इसकी शुरुआत तो नेहरू से ही हुई थी। तीनमूर्ति भवन प्रधान मंत्री निवास था। उसे नेहरू की मृत्यु के बाद उनका स्मारक बना दिया गया। उस तर्क से राष्ट्रपति भवन को राजेंद्र प्रसाद का स्माकर बना देना चाहिए था!
अतः जयंती, स्मारक, संस्थाओं, योजनाओं के नामकरण, आदि प्रक्रियाओं में यह विचित्र भेद-भाव – आगे ही नहीं, पीछे का भी – सदा के लिए खत्म होना चाहिए। पतंजलि, पाणिनि, चाणक्य, कालिदास, तुलसीदास, जैसे शाश्वत मूल्य के अनगिन मणि-मानिकों ही नहीं; स्वामी विवेकानंद, श्रीअरविन्द, जगदीशचंद्र बोस, जदुनाथ सरकार, ध्यानचंद, आदि भारत के कई समकालीन सच्चे महापुरुषों को स्वतंत्र भारत में हमने कितना सरकारी-राष्ट्रीय आदर दिया है? हमारे देश में एक लगभग अशिक्षित नेता के नाम पर बीसियों विश्वविद्यालय खोले गए हैं, और महान इतिहासकार जदुनाथ सरकार, महान कवि निराला या अज्ञेय के नाम पर एक भी नहीं! इस का तर्क उस सोवियत व्यवस्था से तनिक भी भिन्न नहीं, जिसमें पूरी शिक्षा को लेनिन-स्तालिनमय कर दिया गया था, जबकि दॉस्ताएवस्की, सोल्झेनित्सिन जैसे मनीषी पुस्तकालयों से भी बहिष्कृत थे।
ध्यान रहे, आधे-अधूरे सुधार किसी काम के नहीं होते। हमारे नए शासकों को साहस दिखाना चाहिए कि देश का स्वाभिमान हमारा आदर्श हो। चाटुकारिता, भेद-भाव और छिछोरापन इस स्वाभिमान को लज्जित करते हैं। नेहरू की सवा-शताब्दी शाही रूप से मनाई जाएगी, पिछली सरकार का यह निर्णय देश का गौरव बढ़ाने वाला नहीं, बल्कि क्षुद्र कारणों से था।
नई सरकार को इस बिंदु पर सांगोपांग और खुला विचार करना चाहिए। देश के महापुरुषों, मनीषियों की पहचान, सम्मान और उनसे सीखने का स्पष्ट और बुद्धिमत्तापूर्ण मानदंड बनाना ही स्वागत योग्य होगा। तब तक सरकार द्वारा स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री की सवा-शताब्दी ठीक वैसी ही मननी चाहिए, जैसी प्रथम राष्ट्रपति की मनी। न कम, न ज्यादा।
हालाँकि, यदि हम गाँधी-नेहरू को वही स्थान दे सकें, जो रूसी जनता ने लेनिन-स्तालिन को दे दिया है तो सब से अच्छा हो। वैसे भी, समय के साथ होगा वही। सत्ता-प्रायोजित महानता को लोग सदा माथे पर उठाए नहीं रहेंगे। चाहें तो तीन-मूर्ति भवन को सभी दिवंगत नेताओं को श्रद्धांजलि-स्मारक में बदल दें। उन्हें, उनके गुणों का स्मरण करना तो ठीक है। किन्तु उस से पहले हमें यह भी स्मरण करना चाहिए कि भारतवर्ष में अनादिकाल से मरणशील मनुष्यों, चाहे वे कितने ही महान रहे हों, का कोई स्मारक, समारोह, जयंती मनाने की परंपरा नहीं रही है। जहाँ से हमने यह परंपरा नकल कर ली है, वहाँ भी इस की एक लाज रहती है। कम से कम हम इस का भी ख्याल रखें।
-------------


शुक्रवार, 23 दिसंबर 2011

मजहब नहीं सिखाता आपस में वैर रखना



आठ दशकों से भी अधिक समय से राष्ट्रीय हित में कार्यरत राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ अपने विरुद्ध किए जाने वाले तमाम दुष्प्रचार के बाद भी राष्ट्र-निर्माण के अपने कार्य में लगा हुआ है | इसी का एक अनुपम उदाहरण सामने आया है आतंकवाद के साये में जी रहे मुस्लिम बहुल कश्मीर के सन्दर्भ में | ज्ञात हो कि संघ से १९५९ से (५२ वर्षों से) जुड़े वरिष्ठ कार्यकर्ता इन्द्रेश कुमार ने कुछ वर्षों पहले घाटी के मुस्लिमों को राष्ट्र की मुख्यधारा में जोड़ने के लिए मुस्लिम राष्ट्रीय मंच की स्थापना की थी | इन्द्रेश कुमार पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज से मेकेनिकल इंजीनियरिंग में सर्वाधिक अंकों के साथ उत्तीर्ण हुए थे परन्तु १० वर्ष की आयु से ही संघ से जुड़े होने के कारण उनका राष्ट्र-निर्माण में ही स्वयं को समर्पित करने का मन था | उनके घोर साहस एवं सपर्पित कर्मयोग का परिणाम तब भी सामने आया था जब मुस्लिम राष्ट्रीय मंच ने लगभग १० लाख मुस्लिम लोगों के हस्ताक्षर गो-हत्या के विरोध में करवा के दिखलाये | मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के राष्ट्रीय एकीकरण के इतने बड़े प्रयास को मीडिया ने कभी दिखाने का प्रयास नहीं किया | यदि कभी दिखलाया भी तो इस रूप में जैसे संघ भी तथाकथित राजनैतिक दलों की तरह तुष्टिकरण के खेल खेल रहा है | यहाँ तक कि राष्ट्र को जोड़ने के इस यज्ञ की सफलता से घबराए सत्ताधारी राजनैतिक गठबंधन की सरकार ने मक्का मस्जिद धमाकों के सिलसिले में सीबीआई को भी इन्द्रेश कुमार के पीछे लगा दिया | परन्तु संघ के प्रत्यक्ष योगदान से एवं इन्द्रेश कुमार के सतत प्रयासों से बने इस संगठन का चमत्कार अब छुपाये नहीं छुप रहा |

मुस्लिम राष्ट्रीय मंच विगत ३ माह से “हम हिन्दुस्तानी, कश्मीर हिंदुस्तान का”, नाम से एक सशक्त अभियान चलाये हुए था | इस अभियान के अंतर्गत राष्ट्रवादी मुस्लिमों से मस्जिदों में प्रार्थनाएं की, व्याख्यान आयोजित किए एवं देश भर में सभाएं की | अभियान का समापन इस रविवार को दिल्ली में हुआ जिसमें इतनी सर्दी के बाद भी देश के २३ राज्यों के १७५ जनपदों से आये १० हज़ार राष्ट्रवादी मुस्लिमों ने भाग लिया | समापन समारोह में कश्मीर को शेष भारत से अलग संविधान देने वाली धारा ३७० को स्थायी रूप से समाप्त करने, कश्मीरी युवाओं को रोजगार दिलवाने, एवं पाकिस्तान एवं चीन द्वारा हड़प लिए गए कश्मीर के भूभागों को वापस लेने की मांगें उन १० हज़ार मुस्लिमों द्वारा एक स्वर में उठायी गयी |

- - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - -
In Eng : RSS' Magic - Kashmiri Muslims call for revoking article 370, taking
- - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - -

चर्चा का प्रारंभ श्रीनगर के मुहम्मद फारूक ने किया | उन्होंने स्पष्ट कहा कि कश्मीर समस्या की जद धारा ३७० ही है और इसे यथाशीघ्र हटाया जाना चाहिए | उन्होंने कहा कि मुस्लिम राष्ट्रीय मंच ही नहीं, घाटी के आम मुस्लिम भी यही चाहते हैं | उन्होंने सीधे सीधे शेख अब्दुल्ला और जवाहरलाल नेहरु को कश्मीर समस्या के लिए उत्तरदायी ठहराया |

बारामूला से आये मुश्ताक अहमद पीर ने कहा कि अलगाववाद की राजनीति करने से या लाल चौक पर तिरंगा लहर देने से कश्मीर कि समस्याएं हल नहीं होंगी एवं उसके लिए राज्य की प्रगति में बाधक कारणों के उन्मूलन की आवश्यकता है | बशीर अहमद, जिन्होंने अपना मत “भारत माँ की जय” के नारे के साथ देना आरम्भ किया, उन्होंने कहा कि कश्मीर के विस्थापितों को ६ दशक से मत डालने तक का अधिकार नहीं है जो उन्हें मिलना चाहिए | इंजिनियर गुलाम अली जो बक्करवाल समाज से आते हैं, उन्होंने भी शेख अब्दुल्लाह और नेहरु को ही कश्मीर समस्या का दोषी माना | उन्होंने आगे कहा कि कश्मीर के राजनैतिक दलों ने जम्मू के निवासियों के साथ अन्याय किया है | उन्होंने ये भी कहा कि धारा ३७० कुछ स्वार्थी नेताओं के हाथ का खिलौना रही है और इसने कभी जनता का भला नहीं किया | गुलाम अली ने भारतीय संसद को पाकिस्तान और चीन से अपना कश्मीर वापस लेने की उसकी वर्षों पुरानी प्रतिज्ञा को पूरा करने को भी कहा |

कश्मीर से आई हालिमा ने आम लोगों की आर्थिक दशा सुधारने वाले प्रयासों की आवश्यकता पर बल दिया | नजीर मीर, जिन्होंने आतंकवाद में अपने तीन भाई गँवा दिए, उन्होंने आजादी की मांग की भर्त्सना करते हुए कहा कि जब हम पहले ही आज़ाद है तो ऐसी मांग के पीछे क्या औचित्य रह जाता है? मुफ्ती मौलाना अब्दू सामी ने हसरत मोहानी, आंबेडकर एवं रफ़ी अहमद किदवई का नाम लेकर कहा कि ये लोग भी ३७० के विरोध में थे परन्तु नेहरु की जिद के कारण ३७० आई और कश्मीरियों का जीवन बर्बाद कर गयी | तब से अब तक सभी राजनैतिक दलों ने इसका दुरूपयोग भारत के विरोध में ही किया है | उन्होंने मुस्लिम राष्ट्रीय मंच की प्रशंसा की और भरोसा दिलाया कि उनका संगठन इन्द्रेश कुमार के नेतृत्व में काम करता रहेगा |

जमात-ए-हिंद के अध्यक्ष ने इस अवसर पर कहा कि यह अभियान राष्ट्र हित में चलाया गया क्योंकि भारत के सीमावर्ती भागों में स्वाधीनता के इतने वर्ष बाद भी स्थितियाँ विकट हैं | उन्होंने कहा कि मुस्लिम राष्ट्रीय मंच पहला मुस्लिम संगठन है जिसने सीमा सुरक्षा का विषय उठाया है | बंगलूरू से आये अब्बास अली बोहरा ने कहा कि दक्षिण भारत के मुस्लिम कश्मीर के राष्ट्रवादी मुस्लिमों के साथ हैं |

muslim-rashtriya-manch-RSS-kashmir-jammu

छत्तीसगढ़ हज समिति के सभापति डॉ. सलीम राज ने कहा कि कांग्रेस ने मुस्लिमों को बदनाम करवाया है | भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा के अध्यक्ष तनवीर अहमद ने कश्मीर समस्या का इतिहास लोगों को स्मरण करवाया | उन्होंने कहा कि जब महाराज हरि सिंह ने २६ अक्टूबर १९४७ को विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए तो कश्मीर का भारत में विलय पूर्ण एवं अंतिम था परन्तु नेहरु की हठधर्मिता एवं एकतरफा युद्धविराम और मामले को संयुक्त राष्ट्र में ले जाने के कारण ये समस्या अस्तित्व में आई | उन्होंने रफ़ी अहमद किदवई के कथन का स्मरण करवाया कि कांग्रेस ने कश्मीर की सभ्यता नष्ट कर देने का काम किया है |

दिल्ली के इमरान इस्माइल ने कहा कि वो इन्द्रेश कुमार ही थे जिन्होंने कश्मीरी विधवाओं की विनती पर ७२४ सिलाई मशीनें कश्मीर भिजवाई थी | भूकंप के समय भी उन्होंने ही पीड़ितों को सहायता उपलब्ध करवाई थी जबकि एक भी मुस्लिम नेता सहायता करने आगे नहीं आया था | इमरान ने कड़े शब्दों में इन्द्रेश कुमार को आतंकवादी गतिविधियों से जोड़ने के कांग्रेसी हथकंडों की निंदा की और कहा कि ये लोग भारत के मुस्लिमों को संघ के विरूद्ध भड़काते हैं ताकि डरा दिखा कर वोट लिए जा सकें |

भाजपा के डॉ. डी के जैन ने कहा कि कश्मीर की स्वायत्तता की मांग निराधार है | कांग्रेस और दूसरे दल झूठ पे झूठ फैला कर देश को बांटने के षड़यंत्र कर रहे हैं और संदेह का माहौल देश में पैदा कर रहे हैं | इन्द्रेश कुमार जो कोहरे के कारण ट्रेन के देरी से चलने के कारण सभा में नहीं पहुच पाए, उन्होंने मोबाइल फोन से अपना संबोधन दिया | उन्होंने कहा कि सरकार निर्दोषों को आतंकवादी बनाने का कुत्सित खेल खेल रही है और भारत विरोधी तत्त्व एवं राजनैतिक दल कश्मीर के लोगों को भ्रमित करने का प्रयास कर रहे हैं | उन्होंने कहा कि मुस्लिम राष्ट्रीय मंच शान्ति, सौहार्द एवं आपसी सद्भाव से भरपूर भारत के निर्माण का सात्विक प्रयास है और उन्हें विश्वास है कि यह अवश्य सफल होगा |

एक ओर तमाम तथाकथित धर्मनिरपेक्ष राजनैतिक दल अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकने के लिए मुस्लिम समाज को वोट बैंक मान कर उन्हें आरक्षण की अफीम पिलाने में जुटे हैं ताकि समाज को धर्म के नाम पर बाँट सकें | तथाकथित पिछडों के अधिकार की बात करने वाले जातियों में समाज को पहले ही बाँट चुके हैं | वही दूसरी ओर हिंदू-मुस्लिम का भेद मिटा कर मुस्लिमों को राष्ट्र की मुख्यधारा से जोड़ने के प्रयास में एवं जातियों के भेद मिटा कर हिंदू समाज को एक करने में लगे संघ के संगठन जुटे हुए हैं | जो लोग संघ के स्वयंसेवकों से परिचित हैं, अथवा संघ की पचासों अनुसांघिक संस्थाओं में से किसी से जुड़ कर राष्ट्र निर्माण के कार्य में लगे हुए हैं, उनके लिए संघ सम्मान का विषय है | कितनी ही बड़ी संख्या में परिवार होंगे जिनके बच्चे संघ के विद्यालयों में शिक्षा प्राप्त कर राष्ट्र निर्माण में जुटे हैं |

सच्चाई दिखलाना मीडिया का काम होता है, परन्तु जब मीडिया स्वयं कोयले की दलाली में (नीरा राडिया के टेपों में) मुँह काला कर चुका हो, तो राष्ट्रवादी मीडिया की कमी जनता को खलती है | समाज और देश को तोड़ने वाले लोग, वोट बैंक की राजनीति करने वाले लोग, तथाकथित बुद्धिजीवी व मीडिया के लोगों ने मिल कर दुष्प्रचार का जो एक गहरा जाल संघ के इर्द-गिर्द बुना है, भारत की जनता को इसके आर पार देखने की आवश्यकता है |

आईबीटीएल से साभार

मंगलवार, 26 जुलाई 2011

क्या ये सिर्फ उपयोगी बेवकूफ हैं?

मूल लेखक- एस गुरुमूर्ति साभार- एक्प्रेसबुज.कॉम अनुवाद- सत्यजीत प्रकाश

उदारवादियों और धर्मनिरपेक्षतावादियों की सूची देखिएः- जस्टिस राजिंदर सच्चर(देश में मुसलमानों की स्थिति पर मशहूर सच्चर समिति की रिपोर्ट के लेखक), दिलीप पडगांवकर(केंद्र सरकार द्वारा कश्मीर पर गठित तीन मध्यस्थों में से एक), हरीश खरे(प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार), रीता मनचंदा(भारत-पाक शांति के लिए संघर्ष करने वाली महिलाओं के एक समूह की स्थानीय साझेदार), वेद भासिन(कश्मीर टाइम्स के संपादक), हरिंदर बावेजा(खोजी संपादक, हेडलाइन्स टुडे), गौतम नवलखा व कमल चेनॉय(मानवाधिकार कार्यकर्ता), प्रफुल्ल विदवई (मशहूर स्तंभकार)

ये लोकप्रिय भारतीय उदारवादियों की सूची है, जो भारतीय संवाद में अहम प्रभाव रखते हैं- चाहे मामला कश्मीर का हो या धर्मनिरपेक्षता का, मामला भ्रष्टाचार का हो या सांप्रदायिकता का, बात नरेंद्र मोदी की हो या सोनिया गांधी का।

लेकिन ये सूची पद्म पुरस्कारों के लिए संभावित लोगों की सूची नहीं है। ये उन लोगों की सूची है जो गुलाम नबी फाई के अतिथि बनते रहे हैं। वही, गुलाम नबी फाई जिसे आईएसआई के लिए काम करने के आरोप में अमेरिकी खुफिया एजेंसी एफबीआई ने गिरफ्तार किया है। उन्नीस जुलाई को वाशिंग्टन टाइम्स में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, फाई को जिन आरोपों में गिरफ्तार किया गया है उनमें पाकिस्तानी सरकार और पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई से लाखों डॉलर लेना, कश्मीर से भारत को निकाल बाहर करने के लिए निर्वाचित अमेरिकी अधिकारियों को प्रभावित करने के लिए इन पैसों से योजनाएं बनाना शामिल है। फाई को कश्मीर से भारत को निकाल बाहर करने के लिए योजना बनाने के जुर्म में गिरफ्तार नहीं किया गया है क्योंकि अमेरिका में ऐसा करना अपराध नहीं है। बल्कि फाई पाकिस्तानी हितों के लिए अमेरिकी अधिकारियों के प्रभाव को खरीदने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। भारतीय कानून के मुताबिक, अगर इन लोगों को पता होता कि ये फाई कौन है, तो फाई की सूची में शामिल इन भारतीय उदारवादियों पर देशद्रोह का मामला हो सकता है और अगर इनको फाई के बारे में पता नहीं था तो पूर्व संपादक आर जगनाथन के मुताबिक सिर्फ उपयोगी बेवकूफ हैं। लेकिन क्या ये सिर्फ बेवकूफ हैं।

इस मामले में अपने ४५ पृष्ठों के शपथपत्र में एफबीआई ने फाई पर विदेशी नीतियों के एजेंट के रूप में काम करने का षडयंत्र रचने का आरोप लगाया। रिपोर्टों के मुताबिक, एफबीआई ने अपने शपथ पत्र में फाई को अमेरिकी में कश्मीरी चोले में पाकिस्तानी हितों के लिए काम करने वाला बताया। जिन्हें कश्मीरी चोले के रूप में कश्मीर अमेरिकी कौंउसिल नामक संस्था बना रखी थी। रिपोर्टों के मुताबिक, फाई पाकिस्तान में बैठे अपने आकाओं से बात-बात पर सलाह लेता था। एफबीआई ने अपने शपथ पत्र में कहा है कि हर साल ढाई करोड़ से साढ़े तीन करोड़ के हिसाब से फाई ने पाकिस्तान से कम से कम ४ मिलियन(यानी बीस करोड़ रुपये) कश्मीर मुद्दे को पाकिस्तान के पक्ष में मोड़ने के लिए लिये। लेख के शुरू में जिन लोगों का जिक्र किया गया है वो वही लोग है जो फाई की कार्ययोजना को आगे बढ़ाने में उसके पैरवीकार हैं। कश्मीर से भारत को भगाने के लिए आईएसआई के इशारे पर फाई द्वारा आयोजित विचार मंथन और बैठकों में ये लोग शामिल होते रहे हैं।

ऐसा लगता है कि फाई को पाकिस्तान में बैठे उनके आकाओं से संबंध बताने के लिए एफबीआई ने पुख्ता काम किया है। ऐसा करने के लिए एफबीआई ने फाई और उसके आकाओं के करीब चार हजार ईमेलों और फोन-कॉलों को इकट्ठा किया है। ऐसा लगता है कि फाई के एक सहयोगी ने जुर्म कबूल कर लिया है कि फाई आईएसआई का एक कारकून है और एफबीआई इस सहयोगी को बतौर गवाह इस्तेमाल करना चाहता है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार इस गवाह के मुताबिक, पाकिस्तान सरकार के लिए प्रचार करने के लिए आईएसआई ने कश्मीर अमेरिकी कौंसिल का निर्माण करवाया। चूंकि फाई एक कश्मीरी है और उसके पास अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से मास्टर की डिग्री है इसलिए वो अमेरिका को बैगर संदेह हुए वहां काम कर सकता था। रिपोर्टों के मुताबिक, आईएसआई एजेंट होने के बाद उसने पाकिस्तान और आईएसआई के निर्देश पर काम करना शुरू किया। इसके लिए पैसे उसे आईएसआई से मिलते थे। उपरोक्त गवाह के मुताबिक, फाई के भाषण का अस्सी प्रतिशत हिस्सा आईएसआई लिखकर देता था और बाकी बीस प्रतिशत पर भी उसकी स्वीकृति लेनी होती थी। इसलिए फाई सौ फीसदी आईएसआई का एजेंट था।

हमारे उपरोक्त उदारवादी और धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवी इस आईएसआई एजेंट यानी गुलाम नबी फाई द्वारा आयोजित सम्मेलनों में भारत के बतौर महत्वपूर्ण अतिथि शिरकत करते थे। इन बुद्धिजीवियों की मदद से फाई भारत के हितों को नुकसान पहुंचाने में बड़े ही प्रभावी ढ़ंग से कारगर हुआ। फाई का मुकाबला करने के लिए भारत सरकार को पिछले साल कश्मीर कैडर के एक रिटायर्ड आईएएस अधिकारी वजाहत हबीबुल्लाह को वाशिंगटन स्थित अमेरिकी दूतावास में सामुदायिक मामलों का मंत्री नियुक्त करना पड़ा।

कितनी विचित्र बात है। एक तरफ भारत को कश्मीर से भगाने के लिए प्रधानमंत्री के वर्तमान मीडिया सलाहकार हरीश खरे और कश्मीर मामलों पर सरकार के तीन मध्यस्थों में एक दिलीप पडगांवकर आईएसआई के पैसों से आयोजित समारोहों में शिरकत कर भारत के हितों को चोट पहुंचाते हैं, आहत करते हैं, नुकसान पहुंचाते हैं दूसरी तरफ, भारत सरकार को नुकसान की भरपाई के लिए कश्मीर कैडर के एक रिटायर्ड आईएएस अधिकारी को वाशिंगटन भेजना पड़ता है। नतीजा साफ है कि जो लोग फाई के जरिए आईएसआई के षडयंत्र के हिस्सा हैं वही लोग आज यूपीए सरकार के भी अंग हैं।

मगर, सवाल है कि क्या भारत को कश्मीर से बाहर करने के षडयंत्र में फाई इन महत्वपूर्ण लोगों ये जाने बगैर शामिल कर लिया कि इनके विचार उसके आकाओं के हितों को आगे बढाएगा। फाई ने किसी अरुण शौरी, किसी चो रामास्वामी, किसी एमजे अकबर, किसी अर्नब गोस्वामी को क्यों नहीं बुलाया। साफ है कि इन लोगों के विचार आईएसआई के एजेंडे और षडयंत्र को आगे नहीं बढ़ाते, बल्कि अवरुद्ध कर देते। फाई जानता था कि उसकी सूची में शामिल भारतीय उदारवादियों का जम्मू-कस्मीर पर विचार अलगाव वादियों के लिए हितकर होगा और आईएसआई के षडयंत्र को सफल बनाएगा। इसलिए इन्हें सिर्फ उपयोगी बेवकूफ मानना ठीक नहीं है, बल्कि इसे खारिज करना आसान है।


फाई की सूची के दो उदारवादी अब भी अतिउच्च पद पर हैं- एक जम्मू-कश्मीर पर केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त मध्यस्थ हैं(कैबिनेट सचिव स्तरीय वेतन और सुविधाएं) तो दूसरे प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार हैं। प्रधानमंत्री जी, ये सबूत कोई भारतीय पुलिस नहीं दे रही है। बल्कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी एफबीआई दे रही है। ये वही अमेरिका है जिसे आप सबसे ज्यादा प्यार करते हैं। आप सुन रहे हैं।


पद-टिप्पणी- इस लेख में कुलदीप नैयर का नाम शामिल नहीं है।

सोमवार, 3 मई 2010

"मेरी जंग पेट्रो-डॉलर इस्लाम के खिलाफ है"

  • कोई भी धर्म सबसे बड़ा या ऊंचा नहीं है
  • गैर-धर्म को मानने वाले लोग नर्क नहीं जाएंगे
  • इस्लाम कोई नया धर्म नहीं है
  • इस्लाम में वही बातें हैं, जो पहले विभिन्न धर्मों में कही गई थीं
  • पूरी दुनिया में इस्लामिक साम्राज्य की स्थापना का लक्ष्य पेट्रो-डॉलर और प्रेमियों और जेहादियों का है, इस्लाम का नहीं.
मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना. अगर मजहब आपस में बैर रखना नहीं सिखाता है तो क्या सिखाता है. निस्संदेह आपस में प्रेम03052010404 03052010405 करना और सह-अस्तित्व सिखता है. लेकिन कई धर्मभीरू लोग सोचते हैं कि मेरा धर्म सबसे ऊंचा है और जो लोग इस धर्म को नहीं मानते हैं वो नर्क जाएंगे. ऐसे लोग अन्य धर्मावलंबियों को अपने धर्म के दायरे में लाना अपना धार्मिक कतर्व्य समझते हैं. ऐसे लोगों को लगता है कि ऐसा करने से उनका भगवान उन्हें स्वर्ग प्रदान करेगा.
दरअसल धार्मिक सर्वोत्कृष्टता का ये सिद्धांत ही दुनिया की अस्थिरता की वजह है. धार्मिक सर्वोत्कृष्टता की मानसिकता इस्लाम धर्म के अनुयायियों के बीच फैलायी गई है. इस सिद्धांत को फैलाने के लिए अरब देशों के पेट्रो-डॉलर का इस्तेमाल किया गया है. इस्लाम का ये नया रूप पेट्रो-डॉलर इस्लाम के नाम से जाना जाता है. इस नए इस्लाम के संस्थापकों और अनुयायियों ने पूरी दुनिया में नव प्रकल्पित इस्लामिक साम्राज्य की स्थापना के लिए बीड़ा उठा रखा है. वो आतंक के जरिए पूरी दुनिया में इस्लाम फैलाना चाहते हैं.
नव प्रकल्पित पेट्रो-डॉलर इस्लाम मूल इस्लाम के लिए खतरनाक है. यह बहु-पंथवादी, धर्मनिरपेक्षतावादी समाज के लिए खतरनाक है. यह इस्लाम, धर्म को व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मामला नहीं रहने देता है, बल्कि यह धर्म को इंसान के ऊपर थोपता है, यही वजह है कि इसने मूल इस्लाम को बदनाम कर रखा है. इसलिए मूल इस्लाम के अनुयायी इस नव प्रकल्पित इस्लाम का विरोध कर रहे हैं. नव प्रकल्पित इस्लाम का विरोध करने वालों की कमी नहीं है, लेकिन उनकी आवाज को दबाने की हर संभव कोशिश की जाती रही है. लेकिन कुछ आवाज हैं, जो तमाम झंझावातों के बावजूद मुखर होकर निकल रही हैं-
उन्हीं आवाजों में से एक आवाज है- सुल्तान शाहीन की.
सुल्तान शाहीन दिल्ली में रहते हैं. अपनी वेबसाइट www.newageislam.com के जरिए शाहीन जेहादियों और पेट्रो-डॉलर नव इस्लाम के खिलाफ जंग लड़ रहे हैं. शाहीन की जंग न सिर्फ तालिबान और उनके समर्थकों के खिलाफ है बल्कि उन इस्लामिक सर्वोच्चतावादियों के खिलाफ भी है, जो दावा करते हैं कि इस्लाम ही एक मात्र धर्म है, जो स्वर्ग तक पहुंचा सकता है. एक तरफ शाहीन जहां कट्टरवाद और सर्वोच्चतावाद के खिलाप जंग लड़ रहे हैं, वहीं, वो सहिष्णु, बहुपंथवादी इस्लाम के प्रति लोगों का रूझान बढ़ा रहे हैं.
शाहीन की वेबसाइट के पाठकों की संख्या लाखों में है. एक लाख सत्रह हजार तो केवल सब्सक्राइबर हैं(सब्सक्रिप्सन मुफ्त है). शाहीन के लेखों को पढ़ने वालों में भारतीय भी हैं और आस्ट्रेलियाई भी. अरब भी है और अमेरिकी भी. मुंबई के डॉ जाकिर नाइक इस्लाम को सबसे ऊंचा धर्म मानते हैं और उसे स्थापित करने की कोशिश भी करते हैं, यही वजह है कि वो शाहीन के आलोचक हैं. लेकिन इस्लामिक विद्वान नियाज फतेहपुरी शाहीन के विश्लेषण के कायल हैं.
शाहीन का जन्म बिहार के औरंगाबाद में हुआ. वे एक मौलवी के पुत्र हैं. इनका बचपन बहुत ही मुश्किलों में बीता. कम उम्र में ही पिता चल बसे. पांच भाई-बहनों की जिम्मेदारी शाहीन के कंधों पर आ पड़ी. पटना कॉलेज में पढ़ाई करते वक्त उन्होंने एक स्थानीय उर्दू दैनिक में पार्ट-टाइम काम करना शुरू कर दिया. भारतीय मूल के आरिफ अली की साप्ताहिक पत्रिका एशिया टाइम्स के संपादन के लिए वे लंदन गए. एक दशक के लंदन प्रवास के दौरान उन्हें इस्लाम और मुसलमानों की सच्चाई के बारे में उन्हें पता चला. उन्होंने वहां एक युवक से सुना, जो मुसलमान अहले हदीस को नहीं मानते हैं, उनकी हत्या कर दी जानी चाहिए. इस युवक की बात ने उन्हें परेशान कर दिया. इस युवक का संबंध अल मुजाहिद्दीन और हिजबुल तहरीर जैसे कट्टपंथी संगठनों से था. ओमर बकरी ने वहां के हजारों मुस्लिम युवकों का ब्रेनवाश किया. शाहीन को चिंता सता रही थी कि ये कट्टपंथ भारतीय उपमहाद्वीप तक न पहुंच जाए और भारतीय युवकों को अपना ग्रास न बना लें.
जब वे भारत में आए तब उन्हें भारत में भी कट्टपंथ उस कट्टरपंथ का सामना करना पड़ा यानी वो कट्टरपंथ भारत में भी पैर जमा चुका है. नब्बे के दशक में शाहीन दिल्ली में एक पत्रिका का संपादन का काम संभाल रहे थे. ये पत्रिका कथित तौर पर प्रभावशाली, शिक्षित और प्रतिभाशाली लोगों की थी. शाहीन ने पत्रिका के संपादन का काम कुछ महीने पहले ही संभाला था कि प्रबंधक मंडल के एक सदस्य ने पूछा- तुम ने एक दशक पहले एक हिंदू लड़की से शादी की थी, तुमने उसे अभी तक मुसलमान क्यों नहीं बनाया. शाहीन ने कुरान की एक आयत का जिक्र करते हुए कहा कि
धर्म मजबूरी या जोर-जबरदस्ती की चीज नहीं है और इस्लाम धर्म स्वीकारना या नहीं स्वीकारना उसका निजी मसला है
. बात इतनी सी थी और शाहीन को नौकरी से निकाल दिया गया. नौकरी जाने से वे सदमे में आ गए. सबसे बड़ा सदमा तो उन्हें इस बात का लगा कि जिन लोगों ने उनके साथ ये दुर्व्यवहार किया वे भारतीय मुस्लिम समुदाय के मक्खन(क्रीम) समझे जाते हैं.
नौकरी जाने के बाद शाहीन स्वतंत्र पत्रकारिता करने लगे. अपने लेखों में उन्होंने कट्टपंथी मानसिकता का खुलकर विरोध किया, जिसे बहुपंथवादी-बहुसांस्कृतिक भारतीय समाज और भारतीय इस्लाम को खतरा है. यही वजह थी कि संघ परिवार और भाजपा के कई नेताओं ने उन्हें मुस्लिम समाज तक पहुंचने का उचित रास्ता समझा, लेकिन शाहीन का कहना है कि बहुत से मुसलमान ही उनसे घृणा करते हैं. इसलिए वे उस समाज तक पहुंचने का सही रास्ता नहीं बन सकते. ये लोग शाहीन को काफिर और पाखंडी तक कहते हैं.
अपनी बात लोगों तक पहुंचाने के लिए उन्होंने अंतर्जाल को अपना माध्यम बनाया, जिसने कई कठमुल्लाओं को चिढ़ा दिया. कई बार तो इनकी वेबसाइट को हैक कर लिया गया, लेकिन अब शाहीन ने अपना काम जारी रखा है. आज उनकी साइट सुपरहिट है.
शाहीन का कहना है कि

आदम, मोसा और मोहम्मद साहब की तरह राम और कृष्ण भी उनके लिए पैगंबर हैं और हजरत मोहम्मद की तरह हजरत राम और हजरत कृष्ण कहने में उन्हें कोई परहेज नहीं है.

गुरुवार, 18 मार्च 2010

मारिए पत्थर, पाइए ईनाम

610x jk3

एक फिल्मी डॉयलॉग- स्साले, पुलिस वाले पर हाथ उठाते हो, मैं तुम्हारी जिंदगी बर्बाद करके रख दूंगा.

मैं नहीं चाहता कि कोई पुलिस वाला किसी अदना सी बात पर किसी की जिंदगी बर्बाद कर दे. अगर कोई पुलिस वाला अपनी वर्दी का नाजायज इस्तेमाल कर किसी की जिंदगी बर्बाद करता है तो उसे कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए.

लेकिन ऊपर आप जो चित्र देख रहे हैं उस चित्र ने कई पुलिस वालों की जिंदगी बर्बाद कर दी है. सारे अधिकारों को छीनकर सुरक्षा बलों के जवानों को बारोजगार पत्थरबाजों (क्योंकि पत्थर चलाना ही इनका रोजगार है) के बीच खड़ा कर दिया जाता है. इन पत्थरबाजों ने कश्मीर की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया है. ये पत्थरबाज लगातार सप्ताहों और महीनों तक पत्थरबाजी करने में माहिर होते हैं.

ये पत्थरबाज कही से आते हैं तो कही से लाए जाते हैं(भाड़े पर लाए जाने की खबर कई अखबारों में छपी है). इन पेशेवर पत्थरबाजों में बड़ी संख्या में बच्चे भी शामिल होते हैं.

कुछ दिनों पहले की बात है पत्थरबाजों की इस भीड़ को तितर-बितर करने के लिए सुरक्षाबलों ने आंसू गैस के गोले छोड़े, सुरक्षाबलों की इस कार्रवाई में इस तेरह साल के बच्चे की मौत हो गई(आंसू गैस के गोले लगने से)

सुरक्षाबलों की इस कार्रवाई के लिए जवान को निलंबित कर दिया गया, उस मुकदमे की कार्रवाई हो रही है. 

लेकिन आज खबर आई है कि स्थानीय पुलिस प्रशासन ने पत्थरबाजों के पुर्नवास और टूर पैकेज के लिए सरकार पत्र लिखा है. इस कार्यवाही से सरकार पत्थरबाजों का दिल जीतना चाहती है.

हाल ही में, पुलिस ने जम्मू में शांतिपूर्ण धरना दे रहे निर्दोष लोगों पर लाठियां बरसायी वहीं, दूसरी ओर घाटी में पत्थरबाजों पर सरकार मेहरबान है. यानी-

पत्थर मारो, ईनाम पाओ

दरअसल, ये केंद्र सरकार की हीलिंग टच नीति( वो पत्थर मारे और हम उन्हें तेल लगाकर सहलायें) है जिसने सुरक्षा बलों का नैतिक बल गिराने का काम किया है.

सरकार की तेल लगाकर सहलाओं नीति केवल कट्टरपंथी इस्लामी आतंकवादियों पर लागू होती है(पाक-अधिकृत कश्मीर के आतंकवादियों को क्षमादान और पुनर्वास) की नीति, बदले में शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर लाठी बरसाई जाती है.

सरकार संसद में अपनी मंशा साफ कर चुकी है कि चरमपंथी धर्म से अभिप्रेरित होते हैं. अपने देश में कार्यरत आतंकवादियों और चरमपंथियों को गृहमंत्री चिदंबरम ने दो हिस्सों में बांटा- जिहादी आतंकवादी(इस्लामी आतंकवादी कहने से परहेज किया, भाजपा द्वारा ऐतराज जताने पर कहा, वो भाजपा के लिए अपना विचार नहीं बदल सकते हैं) और हिंदू आतंकवाद.

माओवादी आतंकवादियों को उन्होंने हिंदू आतंकवादियों की श्रेणी में रखा और सरकार हिंदू आतंकवादियों को समाप्त करने के लिए ऑपरेशन ग्रीन हंट चला रही है. वहीं जेहादी आतंकवादियों(इस्लामी आतंकवादी नहीं करना चाहें तो मत कहें)  के लिए पुनर्वास और हीलिंग टच पॉलिसी है.

यानी पत्थर मारो ईनाम पाओ

कांग्रेस पिछले साठ सालों से कश्मीर में ये पॉलिसी अपना रही है, लेकिन कश्मीर का एक बच्चा भी कहने के लिए तैयार नहीं है कि वह भारत में रहना चाहता है. हम खरबों खर्च कर और कश्मीरी पंडितों को घाटी से खदेड़कर भी कश्मीरियों से भारत का नहीं कहवा सके.

शनिवार, 20 फ़रवरी 2010

क्या यही सेक्यूलरिज्म है?

Scale of injustice_thumb[3] चित्र- साभार-nomadmolouges.blogspot.com
हाल ही में पश्चिम बंगाल सरकार की बुद्धदेव भट्टाचार्य की सरकार ने अल्पसंख्यकों(सेक्यलुरों के लिए अल्पसंख्यकों का मतलब सिर्फ मुसलमान होता है) के लिए दस प्रतिशत आरक्षण देने का फैसला किया है. पश्चिम बंगाल सरकार के इस फैसले से कांग्रेस किकर्तव्यविमूढ़ हो गई है. आखिर क्या करे और न करें. दरअसल पश्चिम बंगाल सरकार ने रंगनाथ मिश्रा समिति की रिपोर्ट के आधार पर अल्पसंख्यकों(सिर्फ मुसलमानों) को आरक्षण दिया है. रंगनाथ मिश्रा कमिटी की रिपोर्ट तीन साल पहले यानी 2007 में ही आई थी, लेकिन केंद्र में कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार इसे संसद में रखने से घबरा रही थी. वो जानती थी कि इसे संसद में रखने पर हंगामा होगा. आखिरकार उसने ये हिम्मत कर दिखाया. रिपोर्ट संसद में पेश की गई. इस पर भाजपा ने बवाल भी मचाया, मगर इसे सांप्रदायिक पार्टी का शोर-शराबा कहकर खारिज कर दिया गया. अभी केंद्र सरकार इस रिपोर्ट पर विचार विमर्श ही कर रही थी कि पश्चिम बंगाल की बुद्धदेब भट्टाचार्य की सरकार ने मुसलमानों को दस प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा कर दी.
पश्चिम बंगाल सरकार ने मुसलमानों को आरक्षण देने का धर्म निरपेक्षतावादी कदम किन परिस्थितियों में उठाया इसे समझने की जरूरत है. बुद्धदेव भट्टाचार्य की सरकार पश्चिम बंगाल में सीपीएम के हाल से परेशान थी. सीपीएम के गढ़ कहे जाने वाले पश्चिम बंगाल और केरल से उसका सफाया हो रहा था. पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की अगुवाई वाली तृणमूल कांग्रेस के सामने सीपीएम के अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया. स्थानीय निकाय के चुनावों में सीपीएम का मटियामेट हो गया. रही-सही कसर लोकसभा के चुनावों ने निकाल दी. सीपीएम को इससे पहले कभी भी पश्चिम बंगाल में ऐसी बुरी स्थिति का सामना करना नहीं पड़ा था. सिंगूर और नंदीग्राम नरसंहार ने सीपीएम का क्रूर और वीभत्स चेहरा लोगों के सामने ला दिया. छद्म-धर्म-निरपेक्षता का चोला ओढ़ने वाले सीपीए का क्रूर चेहरा सबके सामने था. इन नरसंहारों में ज्यादातर मुसलमानों को ही सीपीएम के कार्यकर्ताओं ने निशाना बनाया. बुद्धदेव भट्टाचार्य के क्रूर नेतृत्व के सामने ममता बनर्जी का कुशल नेतृत्व था. लोगों ने ममता के विराट व्यक्तित्व का साथ दिया और सीपीएम को खारिज कर दिया. सीपीएम अपने ढहते किले से परेशान थी और ऐसे में छद्म धर्मनिरपेक्षता पूर्ण रंगनाथ मिश्रा कमिटी की रिपोर्ट का उसने सहारा लिया और दे डाला मुसलमानों को दस प्रतिशत आरक्षण.
रंगनाथ मिश्रा कमिटी ने किस आधार पर मुसलमानों को आरक्षण देने की सिफारिश की? केंद्रीय कैबिनेट ने अब तक इस पर कोई फैसला नहीं किया तो आखिर किस आधार पर पश्चिम बंगाल सरकार ने मुसलमानों को आरक्षण दिया. सवाल उठता है कि आखिर धर्म निरपेक्षता का दंभ भरने वाली सीपीएम सांप्रदायिक क्यों नहीं है?
संविधान में आर्थिक पिछड़ापन के आधार पर किसी को भी आरक्षण देने की व्यवस्था नहीं है. संविधान में आरक्षण की व्यवस्था सिर्फ उन लोगों के लिए की गई है, जिन्हें सामाजिक भेदभाव, उत्पीड़न और छुआछूत का दंश झेलना पड़ा था. इस श्रेणी ने केवल अनुसूचित जातियां और जनजातियां ही शामिल हैं. लेकिन तथाकथित सेक्यूलरों ने आर्थिक पिछड़ेपन का राग छेड़कर मुसलमानों को भी आरक्षण देने के लिए समिति बनवाकर उससे सिफारिश भी करवा ली (यहां गौर करने वाली बात की, सत्ताधारी पार्टियां अपने इच्छानुसार समितियां और आयोग बनाती है और अपने इच्छानुसार ही रिपोर्ट तैयार करवाती है और सिफारिशें भी करवाती हैं. जैसे लालू ने गोधरा कांड की जांच के लिए यूसी बनर्जी कमिटी बनवाई और “दूध का दूध और पानी का पानी रिपोर्ट” ला दिया और उसका फायदा बिहार विधानसभा चुनाव में उठाने की कोशिश की. ऐसी ही लिब्राहन आयोग और रंगनाथ मिश्रा कमिटी की रिपोर्ट में कांग्रेस ने सिफारिशें करवाई)
अगर आर्थिक पिछड़ेपन के आधार पर ही आरक्षण देना हो तो जाति-धर्म के ऊपर उठकर गरीबों की पहचान क्यों नहीं की जाती है. क्यों नहीं पता किया जाता है कि इस देश में कितने प्रतिशत लोग गरीब है और उन सभी को आरक्षण का लाभ क्यों नहीं दिया जाता. क्यों जाति धर्म के नाम पर विभिन्न समूहों को आरक्षण देने की व्यवस्था की गई है.
पादरियों और मुल्लाओं ने हिंदुओं को प्रलोभन देकर धर्मांतरित करवाया. उन्हें प्रलोभन दिया गया कि “उनसे प्यार करो जो सबसे प्यार करता है” लेकिन धर्मांतरित होने बाद भी न तो अल्लाह न और न ही परमपिता परमात्मा ने इन दलितों से प्रेम किया. उनकी हालत बद से बदतर हो गई. अब ये मुसलमान और ईसाई दलित होकर आरक्षण की मांग कर रहे हैं.  आखिर, धर्मांतरण करने वालों से क्यों नहीं पूछा जाए कि इनकी स्थिति क्यों नहीं बदली. और फिर जिन लोगों ने सामाजिक भेदभाव से तंग आकर धर्मांतरण कर लिया उन्हें यह आरक्षण का लाभ क्यों मिलना चाहिए.
कांग्रेस के युवराज दलितों के घर रात बिताकर, विदेशी मेहमानों के साथ गरीबी का फोटो खिंचवाकर हीरो तो बन जाते हैं लेकिन क्या उनके पास इस बात का जवाब है कि देश में कितने प्रतिशत लोग गरीब हैं. उनको क्या पता होगा. जिस अमेठी के लोगों ने राहुल के मॉ, दादी, चाचा, खुद उनको सांसद बनाया, उसी अमेठी में आजादी के बासठ साल गुजर जाने के बाद भी लोग गरीब क्यों है. क्या राहुल को पता कि अमेठी में कितने लोग गरीब हैं. शायद नहीं.  देश में गरीबी है यह जानने के लिए प्राचीन राजा-महराजाओं की तरह राहुल को भी गरीबों के घर रात बिताना पड़ता है. उन्होंने  कहना पड़ता है कि केंद्र सरकार द्वारा भेजा गया एक रूपये में से महज पांच पैसा ही गरीबों तक पहुंच पाता है(कुछ ऐसा ही खुलासा इनके पिताजी ने दशकों पहले किया था)
अजी राहुल की बात छोड़ भी दें तो क्या सरकार को पता है कि देश में कितने लोग गरीब हैं. नहीं
हाल ही अनेक समितियों का गठन हुआ. सबने अलग अलग रिपोर्ट दिया. गरीबी के आंकड़े में सबों की रिपोर्ट में जमीन आसमान का अंतर है.
साल 2005 में विभिन्न मंचों से हमारे ईमानदार अफसरशाह प्रधानमंत्री जी घोषणा किया करते थे कि देश में मात्र 26 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा नीचे रह गए हैं(महान उपलब्धि) वे आने वाले पांच सालों में इसे घटाकर दस प्रतिशत पर ला देंगे. लेकिन अभी जो गरीबी के आंकड़े सामने आएं हैं वे चौकाने वाले हैं. भले ही हर समितियों के आंकड़ों मे जमीन आसमान का फर्क है, लेकिन देश में गरीबों की संख्या में भारी बढ़ोतरी हुई है. हां अमीरों की संख्या में भी कुछ बढ़ोतरी हुई है.
गरीबी के ये आंकड़े-
प्रधानमंत्री के अनुसार(2005)- 26.5 प्रतिशत
योजना आयोग द्वारा गठित तेंदुलकर समिति के अनुसार- 41.8 प्रतिशत
विश्व बैंक रिपोर्ट(2005)- 42 प्रतिशत(सवा डॉलर यानी साठ रुपया प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन के हिसाब से)
योजना आयोग के अनुसार(2005)-27.5 प्रतिशत
ग्रामीण विकास मंत्रालय की रिपोर्ट- 50 प्रतिशत
अर्जुन सेनगुप्ता समिति की रिपोर्ट-78 प्रतिशत
जब सरकार को गरीबों की संख्या के बारे में ही पता नहीं है तो वो गरीबी को कम करने के लिए प्रयास करेगी तो किस स्तर पर. वो गरीबों को जाति-धर्म के नाम पर आरक्षण के दायरे में बांधकर उन्हें ठगने और गुमराह करने की कोशिश कर रही है.

बुधवार, 20 जनवरी 2010

मत थूकिए मानवाधिकारवादियों पर

मेरे एक मित्र बहुत ही खिन्न थे. उनका मन थूकने को कर रहा था. आप कहेंगे, थूकने का मन कर रहा तो क्या परेशानी है, अपने देश में जहां तहां थूकने पर तो प्रतिबंध नहीं है. लेकिन उनका मन जहां थूकने को कर रहा था, मैं वहां थूकने की इजाजत उन्हें कभी नहीं दे सकता. आखिर मेरी भी मजबूरी है. इस पोस्ट को पढ़िये फिर पता चल जाएगा मैं उन्हें थूकने की अनुमति क्यों नहीं देता हूं.
आज कश्मीरी पंडितों के लिए पलायन दिवस है. 1990 में आज ही के दिन से कश्मीरी पंडित छोड़कर देश के विभिन्न भागों में भागना शुरू किया था. बीस साल हो गए कश्मीरी पंडित अपने ही देश में शरणार्थियों की जिंदगी जी रहे हैं. उनकी जिंदगी बद से बदतर हो रही है. उनके बच्चों को शिक्षा और रोजगार नहीं है. नई पीढ़ी का भविष्य क्या होगा आसानी से समझा जाता है. बात साल दो साल की नहीं है, बीस सालों से ये लोग शरणार्थी की जिंदगी जीने को मजबूर हैं. इनका क्या कसूर है? इनका कसूर सिर्फ इतना है कि ये मुस्लिम बहुल राज्य जम्मू-कश्मीर में हिंदू थे. देश में अल्पसंख्यकों के लिए योजनाएं बन रही हैं. सच्चर कमिटी बनाई गई. रंगनाथ मिश्रा समिति ने मुसलमानों को आरक्षण की भी सिफारिश कर दी.
refugee1 dsc_31091
लेकिन इन अभागे कश्मीरी पंडितों को अपने ही घरों में नहीं रहने दिया जा रहा है. अपने देश में मानवाधिकारों के लिए लड़ने वाले संगठनों की कमी नहीं है. लेकिन आज तक कहीं भी किसी भी मानवाधिकार संगठन को कश्मीरी पंडितों के मानवाधिकार के लिए संघर्ष करते नहीं देखा गया है. एक भी मानवाधिकार कार्यकर्ता कश्मीरी पंडित के पक्ष में नहीं है. उसके दुख-दर्द को सुनने वाला नहीं है. सरकारों की नाकामी का आलम ये कि बीस सालों से कोई इनकी सुधि लेने वाला नहीं है.
जब कभी ये अपनी आवाज उठाते हैं इन्हें सांप्रदायिक कहा जाता है. देश के मानवाधिकारवादी अल्पसंख्यकों की रक्षा के नाम पर तमाम तरह की लड़ाई लड़ते हैं, नारे लगाते हैं, मीडिया में प्रभाव जमाकर सरकार, प्रशासन और न्यायपालिका पर दबाव बनाते हैं. हमारे देश के मानवाधिकारवादियों की यही चाल, चरित्र और चेहरा है.
1172657131488_RIK-10thevent_022
1989 और 1990 में घाटी में कश्मीरी पंडितों को निशाना बनाकर आतंकवादी हमले किए गए. आतंकियों के आगे सरकार असहाय थी. यही कारण थे कि कश्मीरी पंडितों को घाटी छोड़कर भागना पड़ा. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक पिछली सदी के अंत तक कश्मीर में छह प्रतिशत हिंदू थे. जो 2006 में घटकर मात्र 0.1 प्रतिशत रह गए. इस्लामिक आतंकवाद में जिस तरह कश्मीरी पंडितों को निशाना बनाया गया उसमें करीब चार लाख कश्मीर पंडितों को या तो घाटी छोड़कर भागना पड़ा या उनकी हत्या कर दी गई. अमेरिकी कांग्रेस में 2006 में पारित एक प्रस्ताव में इस घटना को जातीय निर्मूलीकरण नाम देकर इसकी निंदा की गई. 2009 में भी ओरेगन विधानसभा में एक प्रस्ताव पारित हुआ जिसमें जम्मू-कस्मीर में इस्लामिक राज्य की स्थापना के लिए जातीय निर्मूलीकरण की संज्ञा दी गई. पिछले साल भी आतंकवादियों ने कश्मीरी पंडितों को धमकी दी.
भारत की धर्मनिरपेक्षता को लेकर सीना ऊंचा करने वालों के मुंह तमाचा है यह इस्लामी राज्य. उन मानवाधिकारवादियों के मुंह पर भी जो देश को इस्लामिक गणराज्य बनाने के लिए दिनरात मिहनत करते हैं.
(सभी चित्र साभार- आपत्ति होने पर सूचित करें.)

गुरुवार, 7 जनवरी 2010

राष्ट्रीय अस्मिता के सवाल

ऑल इंडिया क्रिश्चियन फेडरेशन यानी अखिल भारतीय ईसाई महासंघ ने दलित ईसाईयों को अनुसूचित जाति यानी ओबीसी का दर्जा दिए जाने की मांग की है. इस संबंध में फेडरेशन ने सुप्रीमकोर्ट में एक याचिका दायर की है. इस याचिका के आधार पर सुप्रीमकोर्ट ने केंद्र सरकार, आंध्रप्रदेश सरकार और राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग को नोटिस जारी किया है. कोर्ट ने याचिका में पक्षकार बनाए गए सामाजिक न्याय मंत्रालय और अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय से भी जवाब मांगा है.
    याचिका में भारतीय संविधान के अनुसूचित जाति आदेश- 1950 को असंवैधानिक घोषित कर इसे रद्द किए जाने की मांग की गई है. याचिका में कहा गया है कि इस आदेश में हिंदू दलितों और अन्य धर्मों(इस्लाम और ईसाई) के दलितों में भेदभाव किया गया है.
    आरक्षण के विरोध में कर्णधार
    खबर इतनी ही है-
    लेकिन खबर बहुत बड़ी है. ये खबर बहुत से सवाल खड़े करती है. मसलन-

    • ईसाई और इस्लाम में दलितों की कोई अवधारणा नहीं है, तो ये दलित आए कहां से?

    • क्या इस्लाम और ईसाई में भी दलित की अवधारणा बनाकर जातिभेद और वर्गभेद पैदा करने की कोशिश तो नहीं की जा रही है?

    • याचिका में धर्मांतरित दलितों की बात कही गई है. यानी वैसे दलित जो हिंदू से अपना धर्म बदलकर इस्लाम या ईसाई धर्म ग्रहण किया?

    • तो क्या, इन लोगों ने धर्म परिवर्तन इसलिए किया कि उन्हें वहां जाकर दलित रहना पड़ेगा?

    • क्या इन्होंने इस लिए धर्म परिवर्तन किया कि वहां भी उन्हें अछूत का भेदभाव सहना पड़ेगा?

                शायद नहीं, दलितों को धर्म बदलवाते वक्त ये प्रलोभन दिया गया कि उनके साथ कोई भेदभाव नहीं होगा. उनकी सामाजिक और आर्थिक समस्या मिट जाएगी.

            • आखिर धर्मांतरण करने वालों और कराने वालों से क्यों नहीं पूछा जाता है कि उनकी सामाजिक और आर्थिक समस्या क्यों नहीं मिटी, उनकी हालत क्यों बदतर है?

            • अगर उनकी समस्या मिट गई है तो क्यों उनके लिए आरक्षण की मांग की जा रही है?

            • क्यों उन्हें फिर से दलित बनाया जा रहा है?

            • आखिर हिंदू दलितों के आरक्षण में सेंध लगाने की कोशिश क्यों की जा रही है?

            • क्या धर्मांतरण को बढ़ावा देने के लिए ऐसा नहीं किया जा रहा है?

            • अगर, हां तो देश में धर्मांतरण को बढ़ावा देने की इजाजत किसी को क्यों दी जानी चाहिए?
                        संविधान में आरक्षण की व्यवस्था एकमात्र वजह से की गई. वो थी, दलितों से साथ सदियों से हुआ अन्याय. आजादी के बाद इन लोगों के साथ हुए अन्याय के बदले इन्हें आरक्षण देने की व्यवस्था की गई.
                        लेकिन,

                    • जिन लोगों ने इस अन्याय का विद्रोह करते हुए अपना धर्म बदल लिया. वो कैसे दलित रह रहे.

                    • और उन्हें आरक्षण का लाभ क्यों लिया जाना चाहिए(जैसा कि ऑल इंडिया क्रिश्चियन फेडरेशन कह रहा है?
                                इन लोगों को आरक्षण देने का मतलब धर्मांतरण को बढ़ावा देना है.
                                सुप्रीमकोर्ट ने सरकार से जवाब तलब किया है. जैसा कि सरकार रंगनाथ मिश्रा कमिटी की रिपोर्ट लाकर अपनी मंशा जता दी है तो वो इन दलितों को भी आरक्षण देने के पक्ष में है. यानी सीधे सादे शब्दों में, कांग्रेस धर्मांतरण को बढ़ावा देना चाहती है. इसलिए वह कोर्ट के सवाल का जवाब रंगनाथ मिश्रा समिति की रिपोर्ट के आधार पर देगी.
                                कांग्रेस का तर्क ये भी है कि इन लोगों को आर्थिक आधार पर आरक्षण दिया जाएगा. तो सवाल उठता है कि सरकार ने आधार आर्थिक आधार पर समाज के दो वर्गों(गरीब और अमीर) का पता लगाने की कोशिश क्यों नहीं की. अगर सरकार आर्थिक आधार पर समाज के पिछड़े वर्गों का पता लगाना चाहेगी तो कहीं से कोई समाज विभाजन की स्थिति पैदा नहीं होगी. लेकिन सरकार का मकसद समाज को टुकड़ों में तोड़ने की है और धर्मांतरण को बढ़ावा देने का है इसलिए वह आर्थिक आधार पर धर्मांतरित ईसाईयों और मुसलमानों को आरक्षण दिलाने की मांग का समर्थन करेगी.

                            • अगर आर्थिक आधार पर आरक्षण देना है तो हिंदू सवर्णों को आरक्षण क्यों नहीं दिया जाए.

                                  ये कोई नई बात नहीं है. आंध्रप्रदेश में कांग्रेस की वाईएसआर सरकार ने मुसलमानों को चार प्रतिशत आरक्षण दे भी चुकी है.

                                शनिवार, 1 अगस्त 2009

                                एक और मुसलमान


                                एक और मुसलमान
                                इमरान हाशमी जिसे ने बॉलीवुड में सीरियल किस प्रतियोगिता में बार-बार बाजी मार कर बड़ी ख्याति हासिल की है. हाशमी के मामा महेश भट्ट को लोग डैडी, सारांश के लिए कम जिस्म, मर्डर के लिए ज्यादा जानते हैं. दरअसल, भारतीय सिनेमा जो अस्सी साल में नहीं कर पाई, इमरान हाशमी के बूते महेश भट्ट ने कुछ ही दिनों में कर दिया.

                                बुधवार, 7 जनवरी 2009

                                क्या करोगे अजहर मसूद का?

                                प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने सार्वजनिक मंच से घोषणा कर दी है कि मुंबई आतंकी हमलों में पाकिस्तान के ना सिर्फ़ नॉन-स्टेट ऐक्टर जिम्मेदार हैं, बल्कि इन हमलों में पाकिस्तान का सरकारी अमला भी जिम्मेदार है। ये बात एकाएक किसी प्रतिक्रिया के तौर पर नहीं कही गई है बल्कि पूरी जाँच और सबूत इकट्ठा करने के बाद कही गई है। अब पाकिस्तान पर यह निर्भर है कि वह क्या करता है। एक तो वह वह भारत के सबूतों को ग़लत कहकर खारिज कर देगा, दूसरा वह इस पर कार्रवाई करेगा। उसकी कार्रवाई दो रूपों में हो सकती है। एक तो वह खुद उन दहशतगर्दों के खिलाफ कार्रवाई करेगा या भारत जिन आतंकवादियों कि मांग कर रहा है, वह उसे भारत को सौप देगा।
                                अब यहाँ भारत के हक़ में है कि वह पाकिस्तान पर कूटनीतिक दबाव बनाकर उसे खुद कार्रवाई के लिए मजबूर करे। आतकवादियों को भारत को सौपे जाने की जिद भारत न करे इसी में भारत का फायदा है। भारत में राजनितिक हालत जितने गंदे हो जाए हैं। उसमे किसी भी स्थिति में आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं हो सकेगी। भ्रष्टाचार को छोड़ भी दे तो यहाँ अलाप्संख्यक वोट बैंक की राजनीती इतनी गन्दी हो चुकी है, किसी भी सूरत में आतंकियों को सजा नहीं दिलाई जा सकती है।
                                मुलायम सिंह मामले में सुप्रीम कोर्ट सीबीआई को फटकार की घूंटी पिला चुकी है। सुप्रीम कोर्ट ने भी माना है की सीबीआई जैसी संस्थाएं भी राजनितिक मोहरे की तरह इस्तेमाल हो रही है।
                                सरकार पर जन दबाव है। जन दबाव का ही नतीजा है की वह पाकिस्तान के खिलाफ कुछ बोलने का हिम्मत जुटा पा रही है। लेकिन क्या वह आतंकवादियों को भारत हो सौंपे जाने के बाद भी इतनी ही हिम्मत रख सकेगी। इसका सीधा सा जवाब है कभी नहीं।
                                माना भारत की अदालतों ने अपना काम पूरी ईमानदारी से कर भी दिया तो क्या भारत सरकार उस सजा को लागू करवा पाएगी। यहाँ भी जवाब मिलेगा बिल्कुल नहीं।
                                जो सरकार प्रति आतंकवाद खड़ा कर सकती है, पहले सिख, फिर मुस्लमान और फिर हिन्दू को आतंकवादी बना सकती है, वो आतंकवाद के खिलाफ खड़ी होने का हिम्मत कैसे कर सकती है। उदाअहरण सामने है, सुप्रीम कोर्ट चार साल पहले अफज़ल गुरु को मौत की सजा सुना चुकी है। मौत की सजा पर पुनर्विचार याचिका भी खारिज कर चुकी है। ऐसे आतंकवादी को वह संरक्षण देकर जिन्दा रखे हुए है, वह पाकिस्तान से लाये आतंकवादी को सजा कैसे दिलवा पायेगी।
                                दो रोज पहले सरकार ने एक विधेयक पारित कराया है। जिसके तहत सात साल से कम सजा पाने वाले आरोपियों को गिरफ्तार नहीं किया जा सकेगा। एक तरफ़ गैर कानूनी गतिविधि निरोधक कानून है तो दूसरी तरफ़ ये कानून जहाँ अपराध की पूरी छोट है। ऐसे में आतकवाद के खिलाफ लड़ने की बात बेईमानी है।

                                सोमवार, 9 जून 2008

                                क्या करोगे अफजल का


                                उसी मोहम्मद अफजल की बात कर रहा हूं, जिसे अफजल गुरू कहा जाता है, जिसे सुप्रीमकोर्ट ने संसद भवन हमले के मामले में सुप्रीमकोर्ट ने दोषी करार देते हुए मौत की सजा सुनाई है. सजा 2004 में ही सुनाई गई है. सुप्रीमकोर्ट ने उसकी पुनर्विचार याचिका भी खारिज कर दी है.

                                उसकी फांसी की सजा पर अमल होना है या नहीं, यह यूपीए सरकार पर निर्भर है. गृहमंत्रालय का कहना है कि मामला राष्ट्रपति के पास अटका है. यूपीए सरकार का कहना है कि विपक्ष भाजपा को कानून की समझ नहीं है. इससे साबित होता है कि दुनिया की सबसे समझदार है यूपीए सरकार. भाजपा उस पर तुष्टिकरण की राजनीति करने का आरोप लगा चुकी है.

                                अब स्वयं मोहम्मद अफजल, जिसे वोट बैंक के लिए कांग्रेस सरकार बचाने की कोशिश कर रही है, आरोप लगा रहा है कि यूपीए सरकार दोमुंही है और उसके साथ दोहरी चाल चल रही है.

                                अफजल कहता है..

                                मैं सचमुच चाहता हूं कि अगला प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी बने, क्योंकि वहीं एक ऐसा व्यक्ति है जो मेरे बारे में निर्णय ले सकता है और मुझे फांसी पर चढ़ा सकता है.

                                अफजल का कहना है कि कांग्रेस उसके साथ डबल गेम खेल रही है और उसे नहीं लगता है कि यूपीए सरकार किसी नतीजे पर पहुंच पाएगी.

                                उसने गृहमंत्री की उस दलील को भी खारिज कर दिया है जिसमें उन्होंने अफजल की तुलना सरबजीत से की थी. अफजल का कहना है कि दोनों का मामला अलग-अलग है और उसे सरबजीत से हमदर्दी है. उसकी लड़ाई कश्मीर को लेकर है. भारत सरकार जो भी निर्णय लेती है उस पर उसे कोई आपत्ति नहीं होगी.

                                अफजल का कहना है कि जेल में उसकी जिंदगी नरक बन गई है और वह मुर्दा बनकर और जीना नहीं चाहता है. उसने कहा कि मैंने दो महीने पहले सरकार से सजा पर निर्णय लेने का अनुरोध किया था, लेकिन सरकार अभी तक किसी नतीजे पर नहीं पहुंची है.


                                पहले भाजपा का आरोप था, अब एक मुजरिम आरोप लगा रहा है. वही मुजरिम जिसे सरकार बचाने की कोशिश कर रही है. आखर उसे बचाकर क्या करोगे.

                                सोमवार, 31 दिसंबर 2007

                                समाज को बांटने में तुष्टिकरण का योगदान

                                पिछले सप्ताह की बात है-- एक बडे राष्ट्रीय चैनल पर-- जो कभी कभार जुबान पर सच और दिल में इंडिया होने की बात बडे गर्व के साथ करता है-- एक कार्यक्रम में एक सवाल पूछा गया था। वो सवाल था-- देश के संसाधनों पर किसका हक है-- सवाल का जवाब इन तीन विकल्पों में चुनना था-- १- अल्पसंख्यकों का २- बहुसंख्यकों का ३- जिसकी लाठी, उसकी भैंस।
                                सवाल को देखने से साफ हो जाता है कि देश के संसाधनों पर सिर्फ अल्पसंख्यकों या सिर्फ बहुसंख्यकों या फिर जो लड़कर जीत सकता है उसी का हक होगा।
                                हमारे देश के एक बडे राष्ट्रीय चैनल की मानसिकता दो खंडो में विभाजित है।
                                इस सवाल का संदर्भ- गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के उस बयान के परिप्रेक्ष्य में था-- जिसमें मोदी ने राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठक में-- ११वे पंचवर्षीय योजना में मुसलमानों को ज्यादा तरजीह देने को-- सांप्रदायिक बजट-- करार दिया था।
                                इस संबध में-- हिंदुस्तान TIMES में सीपीएम नेता सीताराम येचुरी का एक आलेख छपा-- जिसमे येचुरी ने मुसलमानों को ज्यादा तरजीह देने की बात को इस आधार पर सही ठहराया था कि मनमोहन से पहले इंदिरा गाँधी और राजीव गाँधी भी इस तरह की पहल कर चुके थे।
                                देश की आजादी के बाद करीब सालों तक कांग्रेस ने शासन किया। इंदिरा ने गरीबी हटाओ का नारा दिया-- गरीबी नहीं हटी, भले गरीब अपनी जंग हारकर मिट रहे हो।
                                मनमोहन सिंह की सरकार ने मुसलमानों की स्थिति जानने के लिए सच्चर समिति बनाईं- और आज वे आज देश के संसाधनों में मुसलमानों को पहला हक दिए जाने की बात कर रहे है।
                                मनमोहन को इन सवालों के जवाब भी देने चाहिऐ-- आज सच्चर समिति की रिपोर्ट जो हकिक़क बयां कर रही है, उसके लिए जिम्मेदार कौन है? क्या देश पर चालीस साल राज करने वाली पार्टी कांग्रेस इसके लिए जिम्मेदार नही है? क्या मनमोहन सिंह को मालूम है कि इस देश मैं समाज के कई तबकों की स्थिति सच्चर समिति की रिपोर्ट से भी बदतर है? मनमोहन सिंह की सरकार उन मज्लूमों के लिए कुछ क्यों नहीं करती?
                                क्यों नहीं सरकार सम्पूर्ण भारत का सर्वेक्षण कर गरीबो की पहचान करती है? क्यों नही सरकार सभी गरीबों के विकास के लिए एक जैसा कदम उठती है?
                                सच्चर समिति के अनुसार, सरकारी नौकरियों में मुसलमानों की संख्या कम है। इसके लिए किसे दोषी ठहराया जाना चाहिऐ? इसके लिए मुसलमानों की शिक्षा ज्यादा दोषी है, जो मदरसों से शुरू होकर मदरसों में खत्म होती है। सरकार उन्हें मुख्यधारा की शिक्षा देने के लिए प्रावधान क्यों बनती।
                                दर-असल इस पूरे कवायद का मकसद मुल्लाओं के फरमान को अपने पक्ष में करना है, ताकि कांग्रेस सत्ता की गद्दी पर युगों-युगों तक कायम रहे- भले ही देश का बंटाधार हो जाये।
                                मुस्लिम तुष्टिकरण कांग्रेस की दें है और यह कई रूपों देश को बाँट रहा है।


                                बुधवार, 26 दिसंबर 2007

                                सेकुलरवाद की खुली पोल

                                गुजरात चुनाव के परिणामों से तथाकथित सेकुलर ब्रिगेड की पोल खुल गयी है। गुजरात की जनता ने अपने लिए काम करने वाले योग्य और कुशल उम्मीदवार को चुना है। धर्मं-निरपेक्षता की चादर ओढ़कर तुष्टिकरण की राजनीती करनेवालों को नकार दिया है। जहाँ तक २००२ के गुजरात दंगों की बात है। जनता उसे भूल चुकी है। तभी तो मोदी के खिलाफ मोर्चा खोलने वाली मीडिया को मुँह की खानी पड़ी है। नयी दिल्ली के एक टीवी समूह ने तो अपने ही चैनल द्वारा स्थापित आदर्श पत्रकारिता के मानदंडों की धज्जियाँ उड़ते हुए अपने चैनल के साख पर बट्टा लगा दिया है। इस चैनल के एक लब्ध-प्रतिष्ठित एंकर ने तो तमाम हदें पर कर दी। उसके मुँह से निकले शब्द-- मोदी विकास के साबुन से सांप्रदायिक दंगों का खून धोना चाहते हैं-- बड़ा ही हास्यास्पद लगता है। इस चैनल को ऐसा लगता था कि हम अपने टीवी चैनल के बदौलत देश-प्रदेश की सरकार बदल सकते है। अगर ऐसा होता तो देश में पैसे वालों की कमी नहीं है। वे लोग भी अपना-अपना चैनल खोल कर रोज-रोज सरकार बनाते और गिराते। पर, शुक्र है कि ये लोकतंत्र है, और यहाँ जनता की चलती है। टीवी चैनलों की नहीं। जनता चैनलों को सबक सिखाने में भी पीछे नहीं रहती है। कुछ शहरों में कुछ संबाद-दाताओं के बल पर चैनल तो चलाये जा सकते हैं, पर जनता- के पास तक नहीं पहुंचा जा सकता है।

                                रविवार, 23 दिसंबर 2007

                                फिर आ गए मोदी

                                फिर आ गए मोदी। पूरे बैंग के साथ। १८२ सीटों वाली विधानसभा में उन्हें ११७ सीटें मिली। उन्हें मौत का सौदागर कहने वाली कांग्रेस को मात्र ६१। तथाकथित धर्मनिरपेक्षता के झंडा-बारदारों को मुँह की खानी पड़ी। खुद के-- जुबान पर सच, दिल में इंडिया का दावा करने वाली एक प्रचार-चैनल की सारी विज्ञापन बाजी की हवा निकल गयी। सारे राष्ट्र-विरोधी प्रचारकों का मुहँ लटक गया।
                                आखिर मोदी की मिहनत रंग लाई। मोदी के बोलने की कला और उनका रणनीतिक कौशल ने बीजेपी को चौथी बार गुजरात में वापस ले आई। इसके साथ गुजरात की जनता ने मोदी के काम को पसंद किया और तीसरी बार मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी सौपी।
                                कांग्रेस ने खुद अपनी हर की नींव खोदी। पिछले चार सालों में कांग्रेस ने एक भी बड़ा जन आन्दोलन नहीं निकला। कांग्रेसी नेता अपनी मांद में सोये रहे। चुनाव आते ही सुगबुगाने लगे। ऊपर से कांग्रेस के अदूरदर्शी नेताओं का भाषण पढकर सोनिया गाँधी ने गूड गोबर कर दिया। बिना जाने समझे मोदी को मौत का सौदागर कह दिया। शायद उनको पता भी नहीं होगा कि मौत का सौदागर किसे कहते है। कांग्रेस नेता ये कैसे भूल गए कि उन्होने सिख दंगों के दौरान जमकर रक्त पट करवाया और राजीव गाँधी ने कहा कि जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है। खैर छोडिये, कांग्रेस ने गुजरात में मुख्यमंत्री पद का कोई उम्मीदवार नहीं किया। ऐसी बात नहीं कि उनके पास नेताओं की कमी थी। मोदी जैसी शख्सियत नहीं, लेकिन शंकर सिंह वाघेला जैसे नेता उनमे जरूर थे, लेकिन कांग्रेस ने उन्हें अछूत बनाए रखा और जिम्मेदारी नहीं सौपी।
                                यही कांग्रेस है, जिसकी अध्यक्ष, राजीव गाँधी फाउन्डेशन की भी अध्यक्ष हैं, ने मोदी सर्वोत्तम प्रशासन का अवार्ड दिया॥ आज उसी को मौत का सौदागर कहते हैं-- आखिर गुजरात कि जनता इसे कैसे बर्दास्त कराती।
                                मोदी ने जंगल की जमीन आदिवासियों को पट्टे पर देने का प्रस्ताव रखा, कांग्रेस ने इसका विरोध करके आदिवासियों से रार मोल ले लिया। वहीं दूसरी तरफ मोदी की कई योजनाएं सफल रही। उन्होने नर्मदा का पानी उत्तरी क्षेत्र के लोगों को देकर लोगों का दिल जीता। फिर हर वक्त लोगों के बीच रहे। चाहे एक प्रचारक के रुप में हों या नेता के रुप में॥ आखिर बीजेपी टीम के एक समर्पित खिलाडी को जनता ने मेन ऑफ़ दे मैच चूना॥ मुबारक हो मोदी। अगर मोदी की जीत से कोई खफा हो तो वह होता रहे.

                                मंगलवार, 18 दिसंबर 2007

                                मोदी फिर आ रहे हैं?

                                चुनाव के बाद के जनमत सर्वेक्षण कह रहे हैं कि मोदी फिर आ रहे हैं। वही व्यक्ति जिसे तथाकथित धर्म-निरपेक्ष बिरादरी पसंद नहीं करता--जिसे सोनिया मौत का सौदागर कहती हैं-- जिसे दिग्विजय सिंह "हिन्दू आतंकवादियों का मुखिया" कहते हैं-- जिसके खिलाफ जावेद अख्तर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच जाते हैं। पता नहीं ये लोग कश्मीर में कश्मीरी पंडितों पर सालों से हो रहे जुर्म से आँखें क्यों मूंदे रहते है-- पता नहीं क्यों नंदीग्राम पर बुद्धदेव के बयान पर जावेद साहेब सुप्रीम कोर्ट क्यों नहीं जाते?-- पता नहीं क्यों असाम में आदिवासियों के खिलाफ सुनियोजित हिंसा की चीख से इनकी नींद क्यों नहीं खुलती?-- पता नहीं, क्यों ये लोग सिखों के कत्ले-आम पर सवाल उठाते? एक व्यक्ति जो आज विकास की बात करता है--उसे ये लोग मौत का सौदागर कहते हैं। बे-ईमान और दहशतगर्द कहते हैं। उसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंच जाते हैं। एक व्यक्ति जो आतंकवादी को आतंकवादी कहता है तो उसके खिलाफ सरे लोग खडे हो जाते हैं। सोनिया मैडम कहती हैं-- कि बीजेपी देश में आतंकवाद का हौवा खड़ा कर रही है। गृहमंत्री साहेब कहते हैं कि इस आतंकवाद और नक्सल समस्या निकट भविष्य में खतम नहीं हो सकता है। इस साल इस देश में आतंकवाद की कम से कम दस बड़ी घटनाएँ हुयी और इतनी ही नक्सल की घटनाएँ॥ इन घटनाओं में कम से कम पांच सौ लोग मरे गए॥ अगर असाम की आतंकवादी घटनाओं को जोड़ दिया जाये तो यह संख्या आठ सौ तक पहुंच जायेगी॥ और मैडम कहती है कि बीजेपी आतंकवाद का हौवा खड़ा कर रही है। अब तक कितने आतंकवादी घटनाओं की सही जांच हो पायी है और कितने आतंकवादियों को सजा मिल पाई है। आख़िर ये सवाल तो उठेंगे। अगर बीजेपी आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई करती है तो आप धर्म का ढिंढोरा पिटने लगती है और कहती है कि देश को पोटा की कोई जरूरत नही है।
                                हमले तो बीजेपी के शासन में भी हुए लेकिन विमान अपहरण मामला को छोड़कर बीजेपी ने सभी हमलों का मूह्तोड़ जवाब दिया दुश्मन यहीं, इसी धरती पर दम तोड़ गए। पर आपके शासन में, आपने हमलों का जवाब दिया? खैर मैं ये सवाल आपसे क्यों पूछ रहा हूँ। जनता की प्रतिनिधि आप हैं। पर सवाल आप ही का खड़ा किया हुआ है। गुजरात की जनता नरेन्द्र मोदी को सर आंखों पर क्यों बिठाये हुए है? इसका जवाब खोजने के लिए आपको ज्यादा परेशां होना नहीं पड़ेगा।
                                फ़िलहाल हम और आप गुजरात चुनाव परिणामों की प्रतीक्षा करें॥ देखें गुजरात की जनता का भगवान मालिक है या फिर आप?

                                मंगलवार, 4 दिसंबर 2007

                                मोदी बड़ा या गुजरात

                                एक वक्ता था, जब इंदिरा के बारे में किसी कांग्रेसी नेता ने कहा-- इंदिरा इज इंडिया, इंडिया इज इंदिरा। साफ है कि इंडिया की पहचान आज इंदिरा गाँधी से नहीं है। उसी तरह मोदी गुजरात से बड़ा नहीं है। क्योकि गुजरात से मोदी हैं, मोदी से गुजरात नहीं। गुजरात तब भी रहेगा, जब मोदी नहीं रहेंगे। कितने मोदी आएंगें कितने जाएंगे। पता नही।
                                प्रायः सभी राष्ट्रीय चैनलों ने मोदी के खिलाफ अभियान चला रखा है। जुबान पर सच कहने वाले एक राष्ट्रीय चैनल ने तो बाकायदा मोर्चा खोल रखा है। इस चैनल पर इस समय करीब बीस प्रतिशत कार्यक्रम मोदी बनाम गुजरात के नाम पर चलाया जा रहा है।
                                इस साल के सबसे बडे प्रस्तोता के मुहँ से बड़ी हास्यास्पद बात निकलती है- कि मोदी विकास के साबुन से सांप्रदायिक दंगों का खून धोना चाहते हैं।
                                इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता है कि गुजरात दंगों में खून बहा- अगर हिन्दू और मुसलमान के खून का रंग अलग अलग होता तो शायद पता चल जाता कि इस दंगें में मुसलमान के साथ हिन्दू भी मारे गए थे।
                                गुजरात दंगों के साथ गोधरा ट्रेन अग्निकांड का जिक्र क्यों नहीं किया जाता। आखिर क्या कसूर था उन कारसेवकों का जिन्हें कथित बेस्ट बेकरी से भी बढकर मौत मिली। अठावन लोंगों को एक साथ भट्ठी में झोंक किया गया।
                                सियासत के जंग में अगर बीजेपी मौत का सौदागर है तो कांग्रेस और वामपंथियों ने भी किसी से कम जुर्म नहीं ढाए।
                                १९८४ के सिख विरोधी दंगे, नंदीग्राम जनसंहार, असाम में चल रहे जातीय हिंसा पर तथाकथित जुबान पर सच सच होने का दवा करने वाली मीडिया चर्चा करने से क्यों बचती रहती है।
                                अगर इस देश में हिंदुत्व वादी राजनीती जिंदा है तो वो मुस्लिम तुष्टिकरण की वजह से। कांग्रेस और तथाकथित छद्म-धर्मनिरपेक्ष शक्तियों की वजह से।
                                हमारी राष्ट्रीय मीडिया जिस तरह से मोदी के पीछे हाथ धोकर पड़ी है, उससे मोदी का कतई नुकसान नहीं होगा। मोदी और ताक़तवर होकर उभरेंगे।
                                आप मोदी के विकास के नारे का विरोध करते हैं। बाढ़, भूकंप, सूखा और सांप्रदायिक दंगों से जूझते गुजरात में मोदी ने जो विकास कर दिखाया वह सिर्फ मोदी ही कर सकता है।
                                यह सच है की मोदी किसी की बात नहीं सुनते, किसी को घूस लेने नहीं देते, भर्ष्टाचार पर लगाम कसे हुए हैं। ऐसे में उनके कई अपने विरोधी हैं तो आश्चर्य कैसा?