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बुधवार, 30 मई 2012

आखिर क्या है अल्पसंख्यक आरक्षण


  लेखक- वेद प्रताप वैदिक

आंध्र के उच्च न्यायालय ने कमाल कर दिया। जाति के आधार पर दिए जा रहे आरक्षण से देश पहले ही बिखर रहा है, अब मजहब के आधार पर भी आरक्षण दिया जाने लगा था। इसी साल पांच राज्यों में चुनाव जीतने की बड़ी चुनौती कांग्रेस के सामने थी। उसने सोचा यदि उसे मुसलमानों के थोकबंद वोट हथियाने हैं तो वह उनके सामने आरक्षण की गाजर लटका दे।


उत्तरप्रदेश में इस हथकंडे के सफल होने की आशा सबसे ज्यादा थी। दिसंबर 2011 में केंद्र सरकार ने घोषणा कर दी कि शिक्षा और सरकारी नौकरियों में मुसलमानों को भी 4.5 प्रतिशत आरक्षण दिया जाएगा। लेकिन मुसलमान जरा भी नहीं फिसले। उन्होंने चुनावों में कांग्रेस को सबक सिखा दिया। अब आंध्र के उच्च न्यायालय ने दोहरी मार लगा दी। सांप्रदायिक आरक्षण को राजनीति और कानून दोनों ने रद्द कर दिया।


अदालत ने सरकार के इस आदेश को चलताऊ बताया है। उसका कहना है कि सरकारी वकील यह नहीं बता सके कि ‘अल्पसंख्यक’ का अर्थ क्या है? क्या ईसाई, बौद्ध, सिख, जैन, यहूदी और पारसी भी अल्पसंख्यक नहीं हैं? यदि अल्पसंख्या का आधार धर्म या मजहब ही है तो मुसलमानों के मुकाबले ये अन्य धर्मावलंबी तो कहीं ज्यादा बड़े अल्पसंख्यक हैं, क्योंकि इनकी संख्या तो बहुत कम है।


हालांकि अदालत ने यह तर्क नहीं दिया है, लेकिन तर्क तो यह भी बनता है कि यदि आरक्षण का आधार अल्पसंख्या है तो जो अत्यल्पसंख्यक हैं, उन्हें भी आरक्षण मिलना चाहिए और ज्यादा मिलना चाहिए। पहले मिलना चाहिए।


सरकारी आदेश में इसके बारे में कोई संकेत नहीं है यानी अदालत की नजर में यह आदेश जारी करते समय सरकार ने लापरवाही बरती है। अदालत की यह आलोचना जरा नरम है। उसे कहना चाहिए था कि सरकार ने लापरवाही नहीं बरती, बल्कि बड़ी चतुराई से थोकबंद वोट खींचने की साजिश की थी।


वास्तव में हमारी अदालतों को चाहिए कि वे ‘अल्पसंख्यक’ शब्द पर ही गंभीर बहस चलाएं। राजनीति में ‘अल्पसंख्यक’ कौन है? वही है, जो खुद हार जाए या जिसका उम्मीदवार हार जाए। हर चुनाव में मतदाताओं का एक हिस्सा बहुसंख्यक सिद्ध होता है और दूसरा अल्पसंख्यक! बहुसंख्या और अल्पसंख्या बदलती रहती है।


लोकतंत्र में कोई भी स्थायी रूप से अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक नहीं हो सकता। भाषा, धर्म, जाति, रंग-रूप में जरूर स्थायी अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक हो सकते हैं, लेकिन उनके नाम पर चलने वाली राजनीति क्या शुद्ध राजनीति होती है? वह भ्रष्ट राजनीति होती है। मुसलमानों के लिए 4.5 प्रतिशत आरक्षण का मकसद भला क्या था? यदि सरकार का तर्क यह है कि उसने मुसलमानों को नहीं, बल्कि मुसलमानों में जो पिछड़े हैं, सिर्फ उन्हें आरक्षण दिया है तो यह तर्क भी बड़ा लचर है। इसके विरुद्ध कई तर्क खड़े हो जाते हैं।


सबसे पहला तर्क तो यह है कि आप कैसे तय करेंगे कि मुसलमानों में पिछड़ा कौन है? यह सिर्फ जातियों के आधार पर ही तय करेंगे यानी आप कानूनी तौर पर यह मानेंगे कि इस्लाम में जातियां होती हैं। यह इस्लाम के सिद्धांतों के विरुद्ध होगा, क्योंकि इस्लाम तो इंसानी बराबरी का धर्म है। इस्लाम पर जातिवाद क्यों थोपा जा रहा है? दूसरा, मुसलमानों में जिन जातियों को आप पिछड़ा मान लेंगे, वे फायदे में रहेंगी और जिन्हें पिछड़ा नहीं मानेंगे, वे नुकसान में रहेंगी। आप धार्मिक आरक्षण के नाम पर अपना उल्लू तो सीधा कर लेंगे, लेकिन मुसलमानों को आपस में लड़वा देंगे।



तीसरा, यदि आप गरीबी के आधार पर पिछड़ापन तय करते हैं तो फिर गरीबों में भी फर्क क्यों डालते हैं? एक गरीब और दूसरे गरीब में फर्क क्या है? क्या गरीब लोग सिर्फ हिंदुओं और मुसलमानों में ही हैं, दूसरे मजहबों में नहीं हैं? सिर्फ मजहबों की ही बात नहीं है। यह बात जाति पर भी लागू होती है। कोई किसी भी जाति का हो, यदि वह गरीब है तो उसे आरक्षण क्यों नहीं मिलना चाहिए? किसी भी जाति या मजहब के अमीर व शक्तिशाली व्यक्ति को आरक्षण देना सामाजिक न्याय नहीं, सामाजिक अन्याय है।


चौथा, अनेक मुस्लिम संगठनों ने मांग की थी कि आरक्षण देना है तो सभी मुसलमानों को दें ताकि आरक्षित पदों को भरने वाले उपयुक्त लोग तो मिल सकें, क्योंकि आरक्षितों में उन पदों पर पहुंचने की इच्छा, जरूरत और न्यूनतम योग्यता भी तो होनी चाहिए। पांचवां, यह आरक्षण मुसलमानों को स्वतंत्र रूप से नहीं दिया गया था।


यह पिछड़ों के 27 प्रतिशत के कोटे में से काटकर दिया गया था। यानी गांव-गांव में रहने वाले हिंदू पिछड़ों और मुस्लिम पिछड़ों में तलवारें खिंचतीं, उनमें वैमनस्य फैलता। इसका एक नतीजा यह भी हुआ कि कांग्रेस ने हिंदुओं और मुसलमानों दोनों के वोट खोए। आंध्र की अदालत ने दो-टूक फैसला देकर भारत के सांप्रदायिक सद्भाव को सबल बनाया है। छठा, अदालत ने इस सरकारी आदेश को असंवैधानिक करार दिया है, क्योंकि इसका आधार मजहब था। यह कानूनी दृष्टि है, लेकिन राजनीतिक दृष्टि से देखें तो मजहबी आरक्षण आगे जाकर पता नहीं कितने और कैसे-कैसे ‘नए पाकिस्तानों’ को खड़ा कर देगा, क्योंकि हमारे यहां तो संप्रदायों के अंदर भी अनेक उप-संप्रदाय होते हैं।


इस फैसले के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय में अपील करने के बजाय भारत सरकार को चाहिए कि वह मजहब के अलावा जाति के आधार पर दिए जाने वाले आरक्षण पर भी पुनर्विचार करे और यह भी सोचे कि आरक्षण सिर्फ शिक्षा में दिया जाए और नौकरी में बिल्कुल भी नहीं। यदि आरक्षण सिर्फ शिक्षा में दिया जाए तो देश के 80 करोड़ गरीबों की जिंदगी में नया उजाला पैदा हो जाएगा।




वे जो भी पद पाएंगे, वह किसी की कृपा से नहीं, बल्कि अपनी योग्यता से पाएंगे। उनके आरक्षण का आधार उनकी जरूरत होगी, उनकी जाति नहीं। वे लोग अपने पद पर पहुंचकर सिर्फ अपनी जाति नहीं, पूरे देश की सेवा करेंगे। भारत सबल बनेगा।

सोमवार, 23 जनवरी 2012

जनरल वीके सिंह उम्र विवाद


थलसेना प्रमुख जनरल वीके सिंह का जन्म 1950 में नहीं बल्कि 1951 में हुआ। हालांकि सरकार जनरल का जन्म 1950 में होने का दुष्प्रचार कर रही है। जो दस्तावेज सामने आए हैं। वो साबित करते हैं कि राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (एनडीए) में मौजूद दस्तावेजों में यही तारीख दर्ज है

यूपीए सरकार चाहती है कि जनता इस पर विश्वास करे कि जनरल सिंह अपने जन्म का वर्ष 'बदलवाना' चाहते हैं, क्योंकि वह अपना कार्यकाल एक साल बढ़वाना चाहते हैं। जबकि सच इसके उलट है। एनडीए में अपने शुरुआती दौर में जनरल सिंह ने कैडेट के तौर पर अपनी कहानी लिखी थी। इसका पहला वाक्य है, 'मैं 10 मई 1951 को पैदा हुआ।'

सरकार ने उनकी जन्म तिथि 10 मई 1950 मानी है। वहीं, सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाकर अपनी जन्मतिथि 10 मई 1951 होने का दावा किया है। इससे पहले जनरल सिंह के तत्कालीन अंग्रेजी शिक्षक बीएस भटनागर ने भी कहा था कि उनकी गलती से एनडीए का आवेदन भरते समय सिंह की जन्म तारीख 1950 दर्ज हो गई थी। भटनागर ने ही यह फार्म भरा था।

क्या कहता है रिकॉर्ड
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जनरल सिंह के पिता मेजर जगत सिंह की बटालियन 14 राजपूत रेजिमेंट्स ने तीन अगस्त 1965 को प्रमाणित किया है कि सेना प्रमुख का जन्म 10 मई 1951 को हुआ था। सेना की आधिकारिक रिकॉर्ड कीपर एडजुटेंट जनरल ने भी इसी तारीख का उल्लेख किया है।

- राजस्थान सेकंडरी बोर्ड के स्कूल लिविंग सर्टिफिकेट में भी जन्म तारीख 10 मई 1951 है।

- एयरफोर्स सिलेक्शन बोर्ड में जनरल सिंह ने 1965 में जब पहली बार आवेदन किया था उसके दस्तावेज में भी जन्म की तारीख 10 मई 1951 है।

-जनरल सिंह के स्कूल के स्कॉलर रजिस्टर में भी जन्म की तारीख 1951 बताई गई है।

  • कानून मंत्रालय में रक्षा मामलों के कानूनी सलाहकार ने साफ कहा है कि स्कूल लिविंग सर्टिफिकेट उम्र को साबित करने का मजबूत साक्ष्य है।

  • आखिर सरकार एक राष्ट्रभक्त जनरल को जालसाझ साबित करने में क्यों जुटी है.. ये समझना जरा भी मुश्किल नहीं है। क्योंकि ये भ्रष्टचार एक भी ईमानदार व्यक्ति को किसी भी पद पर देख नहीं सकती। क्योंकि एक-एक ईमानदार व्यक्ति उसकी नींद हराम करने के लिए काफी है।

गुरुवार, 19 जनवरी 2012

अंदर का आदमी, बाहर का आदमी- संदर्भ गुजरात में लोकायुक्त की नियुक्ति

बात ज्यादा पुरानी नहीं है। बसपा से निष्कासित भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे बाबू सिंह कुशवाहा को भाजपा ने बड़ी ही बेशर्मी से पार्टी में शामिल कर लिया। वही, भाजपा-
  • जिसके एक मुख्यमंत्री ने उत्तराखंड में एक ऐसा लोकायुक्त कानून बनाया जिसकी प्रशंसा टीम अन्ना तक ने की।
  • जिसके एक मुख्यमंत्री को भ्रष्टाचार के आरोपों में जेल की हवा खानी पड़ी।
  • जिसके अध्यक्ष ने टीम अन्ना को लोकपाल के मुद्दे पर समर्थन देने की चिट्ठी दे डाली। उसी भाजपा ने ऐसी बेशर्मी कर दी। बाबू सिंह कुशवाहा को पार्टी में शामिल कर लिया। पार्टी आलाकमान के इस फैसले के विरोध में पार्टी के कई बड़े छोटे नेताओं ने विरोध का झंडा थाम लिया। गोरखपुर सांसद आदित्यनाथ और उमा भारती ने तो उत्तरप्रदेश में पार्टी के लिए चुनाव प्रचार नहीं करने का ऐलान कर दिया। तो वहीं, मेनका गांधी सहित कई नेता ने आलाकमान के फैसले की आलोचना शुरू कर दी। इस विरोध के चलते आलाकमान को अपना फैसला वापस लेना पड़ा और पार्टी में कुशवाहा की सदस्यता स्थगित करनी पड़ी। आखिर भाजपा आलाकमान ने ऐसा फैसला क्यों लिया, जिसके लिए उसे अपनी पार्टी के अंदर ही विरोध झेलना पड़ा हो। ऐसा नहीं है कि भाजपा आलाकमान ने बिना-सोचे समझे इतना बड़ा फैसला ले लिया हो।
  • युद्ध का नाम भले ही धर्मयुद्ध हो, मगर युद्ध धर्मयुद्ध नहीं होता। युद्ध में जीत ही एकमात्र लक्ष्य होता हो, चाहे उसके लिए कितना ही पाप क्यों ना करना पड़े। जहां एक ओर, अल्पसंख्यकों को लुभाने के लिए अल्पसंख्यक आरक्षण का ब्रह्मास्र हो तो दूसरी ओर वाला दामन में थोड़ा दाग लगाने से गूरेज कोई कैसे करेगा।
    सो भाजपा ने एक बड़ा वोट बैंक अपने हिस्से में करने के लोभ से कुशवाहा को अपनी पार्टी का हिस्सा बना लिया। मगर, सवाल उठता है कि क्या कांग्रेस में कोई एक नेता सोनिया और राहुल का विरोध कर सकता है। क्या किसी में ऐसा करने की हिम्मत है। शायद नहीं। कांग्रेस के अंदर क्या, कांग्रेस के बाहर भी बहुत कम लोगों में सोनिया और राहुल का विरोध करने की हिम्मत है।
  • बीसी खंडूरी जैसे कितने लोग हैं जो रेलखंड का उद्घाटन सोनिया से कराने के विरोध में राष्ट्रपति से शिकायत कर सकते हैं।
  • किसे सीबीआई का डंडा सहने की शक्ति है- ना तो लालू में ना रामविलास में, ना मायावती में और ना ही मुलायम में।
  • अकेली ममता बनर्जी ने केंद्र सरकार के चार अहम फैसले के खिलाफ खड़ा होने की हिम्मत दिखा दी, शायद इसलिए कि ममता को सीबीआई का डर नहीं है और पश्चिम बंगाल में उनको कांग्रेस का डर भी नहीं है।
  • लेख के मुख्य विषय पर तो अभी आए भी नहीं, भूमिका बहुत बड़ी हो गयी। मगर इस बड़ी भूमिका का संबंध गुजरात में लोकायुक्त की नियुक्ति से है।
  • एक केंद्र सरकार है जिसे लोकपाल बनाने में बाहरी(शायद विदेशी?) लोगों का हस्तक्षेप नहीं चाहिए। चार-पांच तेज, तर्रार शातिर टाइप के मंत्री मिलकर एक डिब्बा टाइप अपंग लोकपाल बनाकर उसे संवैधानिक का दर्जा दिला देगी(जनता से कह देगी कि भ्रष्टाचार से केवल वही लड़ सकती है- राहुल करेंगे- लोकपाल को संवैधानिक दर्जा दिलाना राहुल का नहीं, इस देश के हर युवा का सपना है)
  • राहुल ने ये कैसे सोच लिया, कि देश के युवा का सपना इतना अपंग, इतना निर्बल, इतना कमजोर है- जो ऊपर बैठे कुछ लोगों के हाथों की कठपुतली हो।
  • देश के युवाओं का सपना मंत्रियों नेताओं, अफसरों को भ्रष्टाचार करने की खुली छूट देता हो और कमजोर, असहाय और न्याय के लिए लड़ने वालों की नींद हराम करता हो।
  • केंद्र को अपने ऊपर नजर रखने वाले कानून बनाने के लिए बाहरी आदमी का हस्तक्षेप नहीं चाहिए-- लेकिन राज्यों एक बाहरी आदमी(राज्यपाल- यानी केंद्र का एजेंट) हरवक्त राज्य सरकारों की नींद उड़ाने के लिए चाहिए जो राज्य सरकारों के अधिकारों में हस्तक्षेप करे।
  • वैसे लंबे समय से राज्यों में राज्यपालों की भूमिका केंद्र के एजेंट की रही है, जो विरोधी पार्टी की सरकारों को अस्थिर करने में जुटी रहते हैं। मगर, गुजरात में लोकायुक्त की नियुक्ति जिस तरह से हुई है, उसने राज्यपाल की भूमिका पर कई सवाल खड़े किए हैं।
  • गुजरात हाईकोर्ट ने भले ही लोकायुक्त की नियुक्ति को वैध करार दिए हों, लेकिन कई राज्यों के राज्यपालों ने(इनमें कर्नाटक के राज्यपाल, पूर्व कानून मंत्री और सोनिया गांधी के भक्त एच आर भारद्वाज यानी हंसराज भारद्वाज भी शामिल हैं) जिन्होंने साफ साफ कहा है कि राज्यपालों की शक्ति सीमित है क्योंकि वह मुख्यमंत्रियों की तरह चुना हुआ प्रतिनिधि नहीं होता है, इसलिए लोकायुक्त की नियुक्ति जैसे अहम मुद्दे पर उसे मुख्यमंत्री से जरूर राय-मशविरा लेना चाहिए। मगर, गुजरात की राज्यपाल ने ऐसा नहीं किया।
  • सुप्रीमकोर्ट के कई वकीलों ने भी कहा है कि संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार, राज्यपाल को ऐसे अहम मामलों में मुख्यमंत्री से रायमशविरा करना चाहिए।
  • फिलहाल मामला सुप्रीमकोर्ट पहुंच गया है। गुजरात हाईकोर्ट ने मामले को सुप्रीमकोर्ट में चुनौती दी है।

शुक्रवार, 23 दिसंबर 2011

मजहब नहीं सिखाता आपस में वैर रखना



आठ दशकों से भी अधिक समय से राष्ट्रीय हित में कार्यरत राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ अपने विरुद्ध किए जाने वाले तमाम दुष्प्रचार के बाद भी राष्ट्र-निर्माण के अपने कार्य में लगा हुआ है | इसी का एक अनुपम उदाहरण सामने आया है आतंकवाद के साये में जी रहे मुस्लिम बहुल कश्मीर के सन्दर्भ में | ज्ञात हो कि संघ से १९५९ से (५२ वर्षों से) जुड़े वरिष्ठ कार्यकर्ता इन्द्रेश कुमार ने कुछ वर्षों पहले घाटी के मुस्लिमों को राष्ट्र की मुख्यधारा में जोड़ने के लिए मुस्लिम राष्ट्रीय मंच की स्थापना की थी | इन्द्रेश कुमार पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज से मेकेनिकल इंजीनियरिंग में सर्वाधिक अंकों के साथ उत्तीर्ण हुए थे परन्तु १० वर्ष की आयु से ही संघ से जुड़े होने के कारण उनका राष्ट्र-निर्माण में ही स्वयं को समर्पित करने का मन था | उनके घोर साहस एवं सपर्पित कर्मयोग का परिणाम तब भी सामने आया था जब मुस्लिम राष्ट्रीय मंच ने लगभग १० लाख मुस्लिम लोगों के हस्ताक्षर गो-हत्या के विरोध में करवा के दिखलाये | मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के राष्ट्रीय एकीकरण के इतने बड़े प्रयास को मीडिया ने कभी दिखाने का प्रयास नहीं किया | यदि कभी दिखलाया भी तो इस रूप में जैसे संघ भी तथाकथित राजनैतिक दलों की तरह तुष्टिकरण के खेल खेल रहा है | यहाँ तक कि राष्ट्र को जोड़ने के इस यज्ञ की सफलता से घबराए सत्ताधारी राजनैतिक गठबंधन की सरकार ने मक्का मस्जिद धमाकों के सिलसिले में सीबीआई को भी इन्द्रेश कुमार के पीछे लगा दिया | परन्तु संघ के प्रत्यक्ष योगदान से एवं इन्द्रेश कुमार के सतत प्रयासों से बने इस संगठन का चमत्कार अब छुपाये नहीं छुप रहा |

मुस्लिम राष्ट्रीय मंच विगत ३ माह से “हम हिन्दुस्तानी, कश्मीर हिंदुस्तान का”, नाम से एक सशक्त अभियान चलाये हुए था | इस अभियान के अंतर्गत राष्ट्रवादी मुस्लिमों से मस्जिदों में प्रार्थनाएं की, व्याख्यान आयोजित किए एवं देश भर में सभाएं की | अभियान का समापन इस रविवार को दिल्ली में हुआ जिसमें इतनी सर्दी के बाद भी देश के २३ राज्यों के १७५ जनपदों से आये १० हज़ार राष्ट्रवादी मुस्लिमों ने भाग लिया | समापन समारोह में कश्मीर को शेष भारत से अलग संविधान देने वाली धारा ३७० को स्थायी रूप से समाप्त करने, कश्मीरी युवाओं को रोजगार दिलवाने, एवं पाकिस्तान एवं चीन द्वारा हड़प लिए गए कश्मीर के भूभागों को वापस लेने की मांगें उन १० हज़ार मुस्लिमों द्वारा एक स्वर में उठायी गयी |

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In Eng : RSS' Magic - Kashmiri Muslims call for revoking article 370, taking
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चर्चा का प्रारंभ श्रीनगर के मुहम्मद फारूक ने किया | उन्होंने स्पष्ट कहा कि कश्मीर समस्या की जद धारा ३७० ही है और इसे यथाशीघ्र हटाया जाना चाहिए | उन्होंने कहा कि मुस्लिम राष्ट्रीय मंच ही नहीं, घाटी के आम मुस्लिम भी यही चाहते हैं | उन्होंने सीधे सीधे शेख अब्दुल्ला और जवाहरलाल नेहरु को कश्मीर समस्या के लिए उत्तरदायी ठहराया |

बारामूला से आये मुश्ताक अहमद पीर ने कहा कि अलगाववाद की राजनीति करने से या लाल चौक पर तिरंगा लहर देने से कश्मीर कि समस्याएं हल नहीं होंगी एवं उसके लिए राज्य की प्रगति में बाधक कारणों के उन्मूलन की आवश्यकता है | बशीर अहमद, जिन्होंने अपना मत “भारत माँ की जय” के नारे के साथ देना आरम्भ किया, उन्होंने कहा कि कश्मीर के विस्थापितों को ६ दशक से मत डालने तक का अधिकार नहीं है जो उन्हें मिलना चाहिए | इंजिनियर गुलाम अली जो बक्करवाल समाज से आते हैं, उन्होंने भी शेख अब्दुल्लाह और नेहरु को ही कश्मीर समस्या का दोषी माना | उन्होंने आगे कहा कि कश्मीर के राजनैतिक दलों ने जम्मू के निवासियों के साथ अन्याय किया है | उन्होंने ये भी कहा कि धारा ३७० कुछ स्वार्थी नेताओं के हाथ का खिलौना रही है और इसने कभी जनता का भला नहीं किया | गुलाम अली ने भारतीय संसद को पाकिस्तान और चीन से अपना कश्मीर वापस लेने की उसकी वर्षों पुरानी प्रतिज्ञा को पूरा करने को भी कहा |

कश्मीर से आई हालिमा ने आम लोगों की आर्थिक दशा सुधारने वाले प्रयासों की आवश्यकता पर बल दिया | नजीर मीर, जिन्होंने आतंकवाद में अपने तीन भाई गँवा दिए, उन्होंने आजादी की मांग की भर्त्सना करते हुए कहा कि जब हम पहले ही आज़ाद है तो ऐसी मांग के पीछे क्या औचित्य रह जाता है? मुफ्ती मौलाना अब्दू सामी ने हसरत मोहानी, आंबेडकर एवं रफ़ी अहमद किदवई का नाम लेकर कहा कि ये लोग भी ३७० के विरोध में थे परन्तु नेहरु की जिद के कारण ३७० आई और कश्मीरियों का जीवन बर्बाद कर गयी | तब से अब तक सभी राजनैतिक दलों ने इसका दुरूपयोग भारत के विरोध में ही किया है | उन्होंने मुस्लिम राष्ट्रीय मंच की प्रशंसा की और भरोसा दिलाया कि उनका संगठन इन्द्रेश कुमार के नेतृत्व में काम करता रहेगा |

जमात-ए-हिंद के अध्यक्ष ने इस अवसर पर कहा कि यह अभियान राष्ट्र हित में चलाया गया क्योंकि भारत के सीमावर्ती भागों में स्वाधीनता के इतने वर्ष बाद भी स्थितियाँ विकट हैं | उन्होंने कहा कि मुस्लिम राष्ट्रीय मंच पहला मुस्लिम संगठन है जिसने सीमा सुरक्षा का विषय उठाया है | बंगलूरू से आये अब्बास अली बोहरा ने कहा कि दक्षिण भारत के मुस्लिम कश्मीर के राष्ट्रवादी मुस्लिमों के साथ हैं |

muslim-rashtriya-manch-RSS-kashmir-jammu

छत्तीसगढ़ हज समिति के सभापति डॉ. सलीम राज ने कहा कि कांग्रेस ने मुस्लिमों को बदनाम करवाया है | भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा के अध्यक्ष तनवीर अहमद ने कश्मीर समस्या का इतिहास लोगों को स्मरण करवाया | उन्होंने कहा कि जब महाराज हरि सिंह ने २६ अक्टूबर १९४७ को विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए तो कश्मीर का भारत में विलय पूर्ण एवं अंतिम था परन्तु नेहरु की हठधर्मिता एवं एकतरफा युद्धविराम और मामले को संयुक्त राष्ट्र में ले जाने के कारण ये समस्या अस्तित्व में आई | उन्होंने रफ़ी अहमद किदवई के कथन का स्मरण करवाया कि कांग्रेस ने कश्मीर की सभ्यता नष्ट कर देने का काम किया है |

दिल्ली के इमरान इस्माइल ने कहा कि वो इन्द्रेश कुमार ही थे जिन्होंने कश्मीरी विधवाओं की विनती पर ७२४ सिलाई मशीनें कश्मीर भिजवाई थी | भूकंप के समय भी उन्होंने ही पीड़ितों को सहायता उपलब्ध करवाई थी जबकि एक भी मुस्लिम नेता सहायता करने आगे नहीं आया था | इमरान ने कड़े शब्दों में इन्द्रेश कुमार को आतंकवादी गतिविधियों से जोड़ने के कांग्रेसी हथकंडों की निंदा की और कहा कि ये लोग भारत के मुस्लिमों को संघ के विरूद्ध भड़काते हैं ताकि डरा दिखा कर वोट लिए जा सकें |

भाजपा के डॉ. डी के जैन ने कहा कि कश्मीर की स्वायत्तता की मांग निराधार है | कांग्रेस और दूसरे दल झूठ पे झूठ फैला कर देश को बांटने के षड़यंत्र कर रहे हैं और संदेह का माहौल देश में पैदा कर रहे हैं | इन्द्रेश कुमार जो कोहरे के कारण ट्रेन के देरी से चलने के कारण सभा में नहीं पहुच पाए, उन्होंने मोबाइल फोन से अपना संबोधन दिया | उन्होंने कहा कि सरकार निर्दोषों को आतंकवादी बनाने का कुत्सित खेल खेल रही है और भारत विरोधी तत्त्व एवं राजनैतिक दल कश्मीर के लोगों को भ्रमित करने का प्रयास कर रहे हैं | उन्होंने कहा कि मुस्लिम राष्ट्रीय मंच शान्ति, सौहार्द एवं आपसी सद्भाव से भरपूर भारत के निर्माण का सात्विक प्रयास है और उन्हें विश्वास है कि यह अवश्य सफल होगा |

एक ओर तमाम तथाकथित धर्मनिरपेक्ष राजनैतिक दल अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकने के लिए मुस्लिम समाज को वोट बैंक मान कर उन्हें आरक्षण की अफीम पिलाने में जुटे हैं ताकि समाज को धर्म के नाम पर बाँट सकें | तथाकथित पिछडों के अधिकार की बात करने वाले जातियों में समाज को पहले ही बाँट चुके हैं | वही दूसरी ओर हिंदू-मुस्लिम का भेद मिटा कर मुस्लिमों को राष्ट्र की मुख्यधारा से जोड़ने के प्रयास में एवं जातियों के भेद मिटा कर हिंदू समाज को एक करने में लगे संघ के संगठन जुटे हुए हैं | जो लोग संघ के स्वयंसेवकों से परिचित हैं, अथवा संघ की पचासों अनुसांघिक संस्थाओं में से किसी से जुड़ कर राष्ट्र निर्माण के कार्य में लगे हुए हैं, उनके लिए संघ सम्मान का विषय है | कितनी ही बड़ी संख्या में परिवार होंगे जिनके बच्चे संघ के विद्यालयों में शिक्षा प्राप्त कर राष्ट्र निर्माण में जुटे हैं |

सच्चाई दिखलाना मीडिया का काम होता है, परन्तु जब मीडिया स्वयं कोयले की दलाली में (नीरा राडिया के टेपों में) मुँह काला कर चुका हो, तो राष्ट्रवादी मीडिया की कमी जनता को खलती है | समाज और देश को तोड़ने वाले लोग, वोट बैंक की राजनीति करने वाले लोग, तथाकथित बुद्धिजीवी व मीडिया के लोगों ने मिल कर दुष्प्रचार का जो एक गहरा जाल संघ के इर्द-गिर्द बुना है, भारत की जनता को इसके आर पार देखने की आवश्यकता है |

आईबीटीएल से साभार

सोमवार, 19 दिसंबर 2011

अन्ना हजारे के प्रति

हलचल मचा गया,
संत वो, हलचल मचा गया।

पथ में पड़े जो रजकण थे,
वो भी भरने लगे हुंकार।
एक बुलाए, हजारों आए,
करने लगे पुकार।
उठाओ ऊंगली,
बांधो मुठी,
जीना सिखा गया,
संत वो, हलचल मचा गया।

वक्त आ गया जगने का अब
तू-तू, मैं-मैं छोड़ो,
हमें समझ नादान, लड़ाते
उनसे नाता तोड़ो,
सुनो पुकारे, अन्ना हजारे
नव युग का गांधी आ गया
संत वो, जीना सिखा गया।

देख तुम्हारे, बुलंद इरादे
प्राण फूंक दे मुर्दों में,
तेरे हाथों में देख तिरंगा
हाहाकार मच गया भ्रष्टों में
कपटी और कुटिल ताकतों से
लड़ना सिखा गया
संत वो, हलचल मचा गया।

बुधवार, 7 दिसंबर 2011

अब बदलने की बारी है.. संदर्भ- जन लोकपाल











डरते
जिससे भ्रष्ट, चाहती जनता वो जन लोकपाल।
भ्रष्टाचार का कलंक मिटानेवाला है जन लोकपाल।
लोकपाल जिसके अंदर हो प्रधानमंत्री से प्यून।
क्योंकि पद का नाम देखकर, अपराध न होता न्यून।।
खल पर कसे शिकंजा, स्वतंत्र सीबीआई को होने दो।
लोकपाल के अंदर लाकर, काम नेक करने दो।।
बैठे न्याय मंदिर में जो है, दें लोकपाल का संग।
उनके बिना कैसे पूरा हो, ये पवित्र सत्संग।।
विशेषाधिकार के नाम पर संसद, को भी न छोड़ा जाए।
सांसदों का भी भ्रष्ट आचरण, निगरानी में आए।।
आम आदमी अधिक त्रस्त है, निचली नौकरशाही से।
भ्रष्टाचार संग लेट-लतीफी, बाबूओं की मनमानी से।।
लोकपाल के जैसे ही हों, हर राज्य में लोकायुक्त।
केवल नेताओं के हाथों, ये भी ना हो नियुक्त।।
कितनी बार कही जा चुकी, सड़ गया ये तंत्र।
सड़े हुए इस तंत्र में कैसे, सिसक रहा लोकतंत्र।।
बहुत हो चुका, अब हठ छोड़ो, बदलने की बारी है।
तुमसे नहीं हुआ तो अब, जनता की तैयारी है।।

मंगलवार, 1 नवंबर 2011

क्या हुआ हिंदू आतंकवाद का... संदर्भ- मालेगांव धमाके के आरोपियों की जमानत का एनआईए नहीं करेगी विरोध

केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम ने एक अहम जानकारी दी है- जिससे हिंदू आतंकवाद के पैरोकारों को सदमा लगे और हिंदू आतंकवाद शब्द का विरोध कर रहे लोगों को थोड़ी शांति मिले। वो जानकारी ये है कि अब एनआईए यानी राष्ट्रीय अन्वेषण ब्यूरो(शायद, जिसका निर्माण सिर्फ और सिर्फ हिंदू आतंकवाद पर नकेल कसने की मकसद से हुआ था), अब मालेगांव धमाके के नौ आरोपियों की जमानत याचिका का विरोध नहीं करेगी।
सवाल उठता है आखिर क्यों, क्या एनआईए थक गया है या यूपीए सरकार थक गई या हिंदू आतंकवाद का राग अलापने वाले कांग्रेसी नेता, चाहे कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी हो या वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी या गृहमंत्री पी चिदंबरम थक गए हैं।
आखिर, एनआईए अब क्यों विरोध नहीं करेगी जमानत याचिका का।
आखिरकार, इन लोगों को तीन सालों तक जेल में रखने के बाद एनआईए अब क्यों पीछे हट रही है। कम से कम जांच पूरी होने तक और आरोप पत्र दाखिल होने तक इन लोगों को जेल में तो रखा ही जा सकता है। मगर, इन तीन सालों में मुंबई एटीएस और एनआईए ने क्या हासिल किया।
इसका सिर्फ एक और एक जवाब है- कुछ नहीं, सिफर, शून्य और कुछ नहीं।
आखिर मुंबई एटीएस और एनआईए इतनी निकम्मा है जो अपने आकाओं की एक हसरत पूरी नहीं कर सका।
गृहमंत्री की इस घोषणा के बाद, महाराष्ट्र एटीएस को बड़ी फजीहत और शर्मींदगी झेलनी पड़ेगी। इतना हीं, इस मामले ने उसकी जांच के तरीकों और बड़े बड़े दावों(अपने राजनीतिक आकाओं की शह पर ही सही) पोल खोलकर रख दी है।
जब चिदंबरम से पूछा गया कि क्या तीन सालों से जेल में बंद ये लोग निर्दोष हैं तो चिदंबरम ने कहा-- नहीं..
और तब तक नहीं, जब इस धमाके में शामिल किसी दूसरे व्यक्ति के बारे में पता नहीं लगा लिया जाता और उसके खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किए जाते।
इतना ही, चिदंबरम ने यहां तक कहा कि जब पुराने आरोप पत्र का संशोधन नहीं हो जाता, तब तक वो किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकते।
हालांकि चिदंबरम को अभी भी स्वामी असीमानंद के कथित स्वीकारोक्ति में हिंदूवादी आतंकवाद की संभावना दिख रही है।
ये सभी तक साफ नहीं हो पाया है कि राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण यानी एनआईए इन नौ लोगों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल करने वाले पुलिस अधिकारियों की भूमिका की जांच करेगी या नहीं। आखिर इन पुलिस अधिकारियों ने किस आधार पर इन लोगों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया।

मंगलवार, 18 अक्टूबर 2011

हिन्दी का ताबूत



हिन्दी के ताबूत में हिन्दी के ही लोगों ने हिन्दी के ही नाम पर अब तक की सबसे बड़ी सरकारी कील ठोंक दी है। हिन्दी पखवाड़े के अंत में, 26 सितंबर 2011 को तत्कालीन राजभाषा सचिव वीणा ने अपनी सेवानिवृत्ति से चार दिन पहले एक परिपत्र (सर्कुलर) जारी कर के हिन्दी की हत्या की मुहिम की आधिकारिक घोषणा कर दी है। यह हिन्दी को सहज और सुगम बनाने के नाम पर किया गया है। परिपत्र कहता है कि सरकारी कामकाज की हिन्दी बहुत कठिन और दुरूह हो गई है। इसलिए उसमें अंग्रेजी के प्रचलित और लोकप्रिय शब्दों को डाल कर सरल करना बहुत जरूरी है। इस महान फैसले के समर्थन में वीणा जी ने प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली केन्द्रीय हिन्दी समिति से लेकर गृहराज्य मंत्री की मंत्रालयी बैठकों और राजभाषा विभाग द्वारा समय समय पर जारी निर्देशों का सहारा लिया है। यह परिपत्र केन्द्र सरकार के सारे कार्यालयों, निगमों को भेजा गया है इसे अमल में लाने के लिए। यानी कुछ दिनों में हम सरकारी दफ्तरों, कामकाज, पत्राचार की भाषा में इसका प्रभाव देखना शुरु कर देंगे। शायद केन्द्रीय मंत्रियों और वरिष्ठ अधिकारियों के उनके सहायकों और राजभाषा अधिकारियों द्वारा लिखे जाने वाले सरकारी भाषणों में भी हमें यह नई सहज, सरल हिन्दी सुनाई पड़ने लगेगी। फिर यह पाठ्यपुस्तकों में, दूसरी पुस्तकों में, अखबारों, पत्रिकाओं में और कुछ साहित्यिक रचनाओं में भी दिखने लगेगी।


सारे अंग्रेजी अखबारों ने इस हिन्दी को हिन्ग्लिश कहा है। वीणा उपाध्याय के पत्र में इस शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है। उसमें इसे हिन्दी को सुबोध और सुगम बनाना कहा गया है। अंग्रेजी और कई हिन्दी अखबारों ने इस ऐतिहासिक पहल का बड़ा स्वागत किया है। इसे शुद्ध, संस्कृतनिष्ठ, कठिन शब्दों की कैद से हिन्दी की मुक्ति कहा है। तो कैसी है यह नई आजाद सरकारी हिन्दी ? यह ऐसी हिन्दी है जिसमें छात्र, विद्यार्थी, प्रधानाचार्य, विद्यालय, विश्वविद्यालय, यंत्र, अनुच्छेद, मध्यान्ह भोजन, व्यंजन, भंडार, प्रकल्प, चेतना, नियमित, परिसर, छात्रवृत्ति, उच्च शिक्षा जैसे शब्द सरकारी कामकाज की हिन्दी से बाहर कर दिए गए हैं क्योंकि ये राजभाषा विभाग को कठिन और अगम लगते हैं। यह केवल उदाहरण है। परिपत्र में हिन्दी और भारतीय भाषाओं में प्रचलित हो गए अंग्रेजी, अरबी, फारसी और तुर्की शब्दों की बाकायदा सूची दी गई है जैसे टिकट, सिग्नल, स्टेशन, रेल, अदालत, कानून, फौज वगैरह।


परिपत्र ने अपनी नई समझ के आधार के रूप में किन्ही अनाम हिन्दी पत्रिकाओं में आज कल प्रचलित हिन्दी व्यवहार के कई नमूने भी उद्धृत किए हैं। उन्हें कहा है - हिंदी भाषा की आधुनिक शैली के कुछ उदाहरण। इनमें शामिल हैं प्रोजेक्ट, अवेयरनेस, कैम्पस, एरिया, कालेज, रेगुलर, स्टूडेन्ट, प्रोफेशनल सिंगिंग, इंटरनेशनल बिजनेस, स्ट्रीम, कोर्स, एप्लाई, हायर एजूकेशन, प्रतिभाशाली भारतीय स्टूडेन्ट्स वगैरह। तो ये हैं नई सरकारी हिन्दी की आदर्श आधुनिक शैली।


परिपत्र अपनी वैचारिक भूमिका भी साफ करता है। वह कहता है कि “किसी भी भाषा के दो रूप होते हैं – साहित्यिक और कामकाज की भाषा। कामकाज की भाषा में साहित्यिक शब्दों के इस्तेमाल से उस भाषा की ओर आम आदमी का रुझान कम हो जाता है और उसके प्रति मानसिक विरोध बढ़ता है। इसलिए हिन्दी की शालीनता और मर्यादा को सुरक्षित रखते हुए उसे सुबोध और सुगम बनाना आज के समय की माँग है।“


हमारे कई हिन्दी प्रेमी मित्रों को इसमें वैश्वीकरण और अंग्रेजी की पोषक शक्तियों का एक सुविचारित षडयंत्र दिखता है। कई पश्चिमी विद्वानों ने वैश्वीकरण के नाम पर अमेरिका के सांस्कृतिक नवउपनिवेशवाद को बढ़ाने वाली शक्तियों के उन षडयंत्रों के बारे में सविस्तार लिखा है जिसमें प्राचीन और समृद्ध समाजों से धीरे धीरे उनकी भाषाएँ छीन कर उसकी जगह अंग्रेजी को स्थापित किया जाता है। और यों उन समाजों को एक स्मृतिहीन, संस्कारहीन, सांस्कृतिक अनाथ और पराई संस्कृति पर आश्रित समाज बना कर अपना उपनिवेश बना लिया जाता है। अफ्रीकी देशों में यह व्यापक स्तर पर हो चुका है।


मुझे इसमें यह वैश्विक षडयंत्र नहीं सरकार और प्रशासन में बैठे लोगों का मानसिक दिवालियापन, निर्बुद्धिपन और भाषा की समझ और अपनी हिन्दी से लगाव दोनों का भयानक अभाव दिखता है। यह भी साफ दिखता है कि राजभाषा विभाग के मंत्री और शीर्षस्थ अधिकारी भी न तो देश की राजभाषा की अहमियत और व्यवहार की बारीकियाँ समझते हैं न ही भाषा जैसे बेहद गंभीर, जटिल और महत्वपूर्ण विषय की कोई गहरी और सटीक समझ उनमें है। भाषा और राजभाषा, साहित्यिक और कामकाजी भाषा के बीच एक नकली और मूर्खतापूर्ण विभाजन भी उन्होंने कर दिया है। अभी हम यह नहीं जानते कि किसके आदेश से, किन महान हिन्दी भाषाविदों और विद्वानों से चर्चा करके, किस वैचारिक प्रक्रिया के बाद यह परिपत्र जारी किया गया। अभी तो हम इतना ही जानते हैं कि इस सरकारी मूर्खता का तत्काल व्यापक विरोध करके इसे वापस कराया जाना जरूरी है। यह सारे हिन्दी जगत और देश की हर भाषा के समाज के लिए एक चुनौती है।


पुनश्च - यह एक संक्षिप्त, फौरी प्रतिक्रिया है। इसका विस्तार करूँगा जल्द।

सोमवार, 17 अक्टूबर 2011

राजभाषा हिंदी को नष्ट करने का एक और सरकारी आदेश भाग-2

सरकार ने हिंदी को नष्ट करने की एक और चाल चल दी है। जी, हां, बात को घूमाने-फिर से कोई फायदा नहीं है। सरकार, हिंदी को सरल और जनप्रिय बनाने की आड़ में इस पर कुठाराघात कर दिया है। केंद्रीय हिंदी समिति ने अपनी तीसवीं बैठक में कथित तौर पर राजभाषा हिंदी को प्रोत्साहित करने के लिए जो प्रस्ताव दिए हैं वो प्रस्ताव हिंदी के लिए घातक है।
वो प्रस्ताव हिंदी को हिंदी से दूर ले जाने की एक जुटिल चाल है। ये चाल उन लोगों ने चली है। जिन्हें हिंदी से कोई लेना देना नहीं है। वो अपने अंग्रेजी ग्यान के आधार पर दूसरों को मुर्ख समझने की बार-बार भूल करते हैं।
केंद्रीय हिंदी समिति में ऐसे ऐसे लोगों हैं जो न सिर्फ अंग्रेजी में खाते और सोचते हैं बल्कि थूकते भी अंग्रेजी में ही हैं।
केंद्रीय हिंदी समिति के कर्ता-धर्ताओं की सूची देखिए, सबकुछ साफ हो जाएगा।
इन लोगों ने हिंदी के कल्याण(कल्याण यानी कल्याण) के लिए कुछ सोचा है। पता नहीं क्यों सोचा और किस हैसियत से सोचा। लेकिन इनकी सोच का नतीजा हिंदी की बर्बादी के प्रस्ताव के रूप में सामने आया है। ये प्रस्ताव अब सरकारी आदेश बन चुका है और जल्द ही देश भर में लागू होने वाला है।
इन लोगों को परियोजना, योजना, उद्देश्य, महत्व, जागरूकता, वृक्षारोपण, नियमित, परिसर, विश्वविद्यालय, जल संरक्षण जैसे शब्द कठिन लगते हैं। इसलिए इसकी जगह प्रोजेक्ट, मकसद, अहमियत, अवेयरनेस, रिफोस्टेशन, रेगुलर, कैंपस, कॉलेज, वाटर हार्वेस्टिंग जैसे शब्दों के प्रयोग के निर्देश दिए हैं।

हिंदी शब्दों को कठिन बताकर इनकी जगह अनुवाद में अंग्रेजी, उर्दू, फारसी, अरबी, तुर्की के शब्दों को डालने के निर्देश हैं।
दरअसल, इन लोगों को पता नहीं है कि हिंदी के शब्द क्या हैं क्यों हैं,
जागरूकता की जगह अवेयरनेस लिखने से कितना भयंकर नुकसान होगा इसका अंदाजा शायद इन लोगों को नहीं है। दरअसल, निर्बुद्ध लोग ऊंचे-ऊंचे पद पा गए हैं वो अपना काम ठीक से कर नहीं पाते हैं और बात-बात में दूसरों के काम में टांग अड़ाते हैं। टांग की नहीं अड़ाते बल्कि अपनी सोच दूसरों पर थोपने से भी बात नहीं आते।
एक किरण से बदल गया जग
जागी दुनिया भोर हुआ।
जग जागा- जगना, जागना, जगाना, जागरूकता, जागरण, जगमग, जाग्रत, जागृति, जनजागरण, जनजागृति, जाग्रतावस्था का एक दूसरे से नाता है। अवेयरनेस का किससे नाता है।
कानून से गैर-कानून, कानूनी कानूनची, कानूनगो ही हो सकते हैं.. मगर विधि से विधान, संविधान, विधेयक, विधायक, संविधि, वैधानिक, अवैधानिक, असंवैधानिक, विधिवत, विधानसभा, विधिसम्मत, विधिपूर्वक, जैसे दर्जनों शब्द हैं। क्या एक शब्द को उठाकर, उसे कठिन बताकर खारिज किया जा सकता है।
नियम से नियमपूर्वक, नियमानुसार, नियमित, अधिनियमित, अधिनियम, नियामक, नियंता जैसे शब्दों को दुरूह बताया जा सकता है।
जिंदगी भर डिक्शनरी ढोने वाले लोगों को हिंदी का शब्दकोश पलटे बिना ही विद्वान होने का अहंकार हो जाता है और खुद को ग्यानी समझने का भान होने लगता है।
वो हिंदी के शब्दों को दुरुह बताने का दुष्चक्र रचने लगते हैं।

शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2011

तेलंगाना के भंवरजाल में फंसी कांग्रेस सरकार

लेखक- डॉ. देवकुमार पुखराज
आंध्रप्रदेश के दस जिलों को मिलाकर तेलंगाना नामक अलग राज्य बनाने की
मांग को लेकर चल रहा आंदोलन तेज रफ्तार पकड़ चुका है। तेलंगाना इलाके में
सकल जनालु सामे यानि समग्र लोगों का आंदोलन के चलते एक माह से जनजीवन
ठप्प पड़ गया है और इसके मंद पड़ने की उम्मीद भी फिलहाल बनती नहीं दिख
रही है। पृथक प्रांत के लिए जारी आंदोलन ने राज्य की किरण रेड्डी सरकार
के सामने गंभीर राजनैतिक संकट पैदा कर दिया है। केन्द्र की यूपीए सरकार
और कांग्रेस पार्टी भी तेलंगाना के जाल में बुरी तरह उलझ सी गयी है।
दूसरे शब्दों में कहें तो कांग्रेस की हालत सांप-छुछुंदर वाली होकर रह
गयी है। यदि तेलंगाना बनाने की दिशा में आगे बढ़े तो आंध्र के बाकी दो
इलाके रायलसीमा और तटीय आंध्र में गलत संदेश जाएगा और आंदोलन का श्रेय भी
केसीआर की टीआरएस पार्टी ले उड़ेगी। उधर तेलंगाना नहीं बनने की स्थिति
में भी इस इलाके से कांग्रेस का पत्ता साफ होते साफ दिख रहा है। कांग्रेस
को दूसरी दुविधा इस बात को लेकर है कि कहीं ऐसा करने से दूसरे राज्यों के
बंटवारे की मांग न तूल पकड़ ले।उन्हें यह आशंका सता रही है तेलंगाना को
मंजूरी दी तो पृथक विदर्भ, पृथक हरित प्रदेश, पृथक बुंदेलखंड और पृथक
पूर्वांचल के लिए मांगें तूल पकड़ लेंगी। कांग्रेस पार्टी अंदर और बाहर
दोनों तरफ से दबाव में है। इलाके से आने वाले सांसद और विधायक हर हाल में
पृथक राज्य का सपना पूरा होते देखना चाहते हैं। सांसद मधु गौड़ याश्की
घोषणा कर चुके हैं कि जरूरत पड़ी तो वे पार्टी छोड़ने से भी पीछे नहीं
रहेंगे।
मतलब साफ है कि कांग्रेस नेतृत्व के सामने राजनैतिक फैसले लेने की गंभीर
चुनौती आ पड़ी है। लेकिन प्रधानमंत्री आवास पर हुई कोर कमेटी की कई
बैठकें भी बगैर किसी नतीजे पर पहुंचे खत्म हो चुकी है। कांग्रेस नेतृ्त्व
के सामने एक हीं फार्मूला है कि किसी तरह इस मामले को लटकाये रखा जाए।
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि कांग्रेस को हर हाल में तेलंगाना हारी
हुई बाजी दिख रहा है। ये एक ऐसा मसला है जो कांग्रेस के लिए गले की हड्डी
बन चुका है।
उधर तेलंगाना राष्ट्र समिति के प्रमुख और सांसद के. चन्द्रशेखर राव
प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की हड़ताल वापस लेने संबंधी अपील ठुकरा
चुके हैं। केसीआर का कहना है कि ये हड़ताल तबतक जारी रहेगी जबतक सरकार एक
निश्चित समय-सीमा में अलग तेलंगाना राज्य बनाने का प्रस्ताव सामने नहीं
रखती।
तेलंगाना के लाखों सरकारी कर्मचारी और अध्यापक एक माह से हड़ताल पर हैं।
वकील भी अदालतों का बहिष्कार कर रहे हैं। प्रशासनिक कामकाज ठप पड़ा है और
स्कूल- कॉलेज भी बंद हैं। राज्य पथ परिवहन निगम के कर्मचारियों के आंदोलन
में शामिल हो जाने के चलते हैदराबाद से लेकर जिला मुख्यालयों तक में
सार्वजनिक परिवहन सेवा ठप्प पड़ गयी है। एक आकलन के मुताबिक अकेले आरटीसी
को 2 सौ करोड़ रुपये से ज्यादा का घाटा हो चुका है। सिंगरेनी कोयलरी के
70 हज़ार कर्मचारियों के भी हड़ताल पर रहने से कोयले का खनन बंद है।
मज़दूरों की हड़ताल से हर दिन एक लाख साठ हज़ार टन कोयले का उत्पादन रुक
गया है और राज्य के सभी बिजली घरों को कोयले की कमी का सामना करना पड़
रहा है। पडोस के राज्यों कर्नाटक और महाराष्ट्र में भी बिजली का संकट बढ़
गया है। केवल रामागुंडम के एनटीपीसी प्लांट में सात सौ मेगावाट बिजली का
उत्पादन घट गया है। इस संयंत्र से दक्षिण भारत के सभी राज्यों को बिजली
मिलती है। खदानों में हड़ताल के कारण कोयले का उत्पादन बंद हो गया है और
बिजली का उत्पादन घट गया है। अकेले आंध्रप्रदेश को इस समय सात लाख यूनिट
से भी ज़्यादा बिजली की कमी का सामना करना पड़ रहा है। राजधानी हैदराबाद
में बिजली की कटौती को दो घंटे से बढाकर चार घंटे करना पड़ा है। अन्य
जिलों और ग्रामीण इलाकों में तो 12 घंटे तक लोड शेडिंग हो रही है।
किसानों को कम बिजली मिलने से उनकी फसलें सूख जाने का ख़तरा पैदा हो गया
है।
आंदोलन की गहराई इस बात से मापी जा सकती है कि दशहरे के दिन जब सारे देश
में लोग रावण-मेधनाथ के पुतले फूंक रहे थे तो तेलंगना के समर्थक रावण की
जगह कांग्रेस पार्टी के नेताओं के पुतले जला रहे थे। अदिलाबाद और
निज़ामाबाद से लेकर नलगोण्डा और खम्मम ज़िलों तक हर जगह तेलंगाना
समर्थकों ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह,
मुख्यामंत्री किरण कुमार रेड्डी सहित बड़े नेताओं के पुतले और कट-आउट
जलाये।
तेलंगाना संयुक्त कार्रवाई समिति के संयोजक प्रो. कोदंडराम रेड्डी इस
हड़ताल को आखिरी युद्ध की संज्ञा दे रहे हैं। आगे उनका कार्यक्रम हड़ताल
को और तेज करने का है। वे कहते हैं- "बहरी सरकार को सुनाने और नींद से
जगाने के लिए हम रेल सेवा भी ठप्प करने वाले हैं।" वैसे हड़ताल के कारण
हर वर्ग प्रभवित हो रहा है। सर्वाधिक नुकसान किसानों,छात्रों और लघु
कारोबारियों को हुआ है। उद्योग-व्यापार से लेकर हैदराबाद की इमेज तक को
गहरा धक्का लगा है। इस पूरे घटनाक्रम से राज्य में होने वाले निवेश पर
खासा असर पड़ा है। कई निवेशकों ने अपना पैसा निकाल लिया है और वो
विशाखापट्टनम जैसी जगहों पर निवेश करने लगे हैं। जानकार मानते हैं कि
1999 से 2009 का समय आंध्रप्रदेश के लिए स्वर्णिम था, लेकिन मौजूदा
परिस्थितियां ख़राब हैं और अगले दो से तीन साल इसी तरह चलता रहा तो
हैदराबाद से निवेशक पूरी तरह दूर हो जाएंगे। लेकिन तेलंगाना समर्थक ऐसा
नहीं मानते। खेल पत्रकार चंद्रमौली मुत्तिरेड्डी कहते हैं- तेलंगाना बनने
के बाद भारी संख्या में एनआरआई इलाके में निवेश करेंगे, स्थानीय लोगों को
रोजगार के अवसर प्राप्त होंगे और कुछ खास किस्म के पूंजीपतियों का
वर्चस्व खत्म होगा। ये इलाका राजनीतिक,सामाजिक और सांस्कृतिक तौर से अपनी
विशिष्ठ पहचान को प्राप्त करेगा।
वैसे तेलंगाना मामले पर 2009 से अबतक लोगों की सोच में भी काफ़ी बदलाव
आया है। आंध्रप्रदेश में बहुत से लोग अब चाहते हैं कि अलग तेलंगाना राज्य
बन जाए और यह मामला ख़त्म हो। रेलवे में कार्यरत एनजीओ कॉलोनी निवासी सी.
एम. रेड्डी कहते हैं कि रोज-रोज की हड़ताल और उपद्रव से बेहतर है कि
सरकार एक बार में फैसला कर ले।
गत 29 सितम्बर को मुख्य विपक्षी तेलुगु देशम पार्टी के तेलंगाना क्षेत्र
से आने वाले 32 विधायकों ने छह महीने में दूसरी बार विधानसभा से त्याग
पत्र दे दिया। उनकी सरकार से मांग है कि तेलंगाना राज्य की स्थापना के
लिए जल्द से जल्द एक विधेयक संसद में पेश किया जाये। इससे पहले फ़रवरी
में सभी दलों के 100 तेलंगाना विधायकों ने इस्तीफ़ा दिया था,जिसे स्पीकर
एन. मनोहर ने यह कह कर रद्द कर दिया था कि वो भावावेश में उठाया गया क़दम
था। अब तेलंगाना राष्ट्र समिति के 11 और टीडीपी के चार बाग़ी विधायक
दूसरी बार त्याग पत्र स्पीकर को सौंप चुके हैं। इस बीच टीडीपी प्रमुख
एन.चन्द्रबाबू नाय़डू ने भी साफ कर दिया है कि यदि सरकार तेलंगाना बनाने
के लिए पहल करती है तो वे इसका विरोध नहीं करेंगे। कुल मिलाकर गेंद
केन्द्र सरकार के पाले में हीं पड़ी है। फैसला उसे हीं लेना है।

गुरुवार, 22 सितंबर 2011

टीम अन्ना की नई रणनीति- अरविंद केजरीवाल उम्मीदवारों को घेरने की रणनीति बनाई

रामलीला मैदान सरकार और राजनीतिक दलों को घुटने टेकने पर मजबूर करने वाली टीम अन्ना ने अब अपने आंदोलन को गति देने के लिए नई रणनीति बनाई है। नई रणनीति के तहत, भ्रष्ट लोगों को चुनाव जीतने से रोकना है। टीम ने हरियाणा के हिसार उपचुनाव से बकायदा इसकी शुरुआत भी कर दी है।

हिसार में आयोजित एक प्रेस कांफ्रेंस में अरविंद केजरीवाल, किरण बेदी, प्रशांत भूषण ने कहा कि चुनाव लड़ने वाले सभी उम्मीदवारों को जनलोकपाल का समर्थन करना होगा। अगर वो ऐसा नहीं करते हैं, तो टीम अन्ना पूरे चुनाव क्षेत्र में घूम-घूमकर लोगों को सचेत करेगी कि वो ऐसे उम्मीदवारों को वोट नहीं डालें। जो जनलोकपाल का समर्थन नहीं करते हैं।

चुनाव जीतने के बाद सांसद महोदय पार्टी आलाकमान के फरमान से डरने नहीं लगे। इसलिए लिए अरविंद केजरीवाल ने कहा है कि उम्मीदवार अपने-अपने आलाकमान से लिखवाकर लाएं कि वो जनलोकपाल का समर्थन करते हैं। और उम्मीदवारों को नाम वापसी से पहले लिखित तौर पर जनता ये वचन देना होगा। वर्ना जनता विकल्प पर तलाश करेगी।

टीम अन्ना ने जनप्रतिनिधियों के मत या विवेक पर आलाकमान की तलवार चलने से बचाने के लिए ऐसा किया है। चुनाव जीतने के बाद जनप्रतिनिधि आलाकमान के ह्विप से डर-डरकर काम करते हैं। वो अपने विवेक से किसी मुद्दे का समर्थन या विरोध नहीं कर सकते हैं बल्कि आलाकमान के निर्देश का इंतजार करते हैं। दरअसल, जनता उन्हें अपना प्रतिनिधि चुनती है मगर, ये प्रतिनिधि किसी और के बन जाते हैं और वहीं करते हैं जो मंजूर--आलाकमान होता है।

ऐसे में अन्ना के सहयोगियों की ये रणनीति बहुत ही सुविचारित है।

टीम अन्ना की ये रणनीति आगामी विधानसभा और लोकसभा चुनावों के लिए भी होगी।

सोमवार, 19 सितंबर 2011

जनलोकपाल ही क्यों, सरकारी लोकपाल का बहिष्कार क्यों

टीम अन्ना ने सरकारी लोकपाल को "जोकपाल" करार दिया। अगर ध्यान से देंखे तो इसमें भ्रष्ट मंत्रियों, अधिकारियों और शक्तिशाली लोगों को बचाने की पूरी व्यवस्था की गई है। ऐसा करने के लिए कानूनी प्रावधानों की धज्जियां उड़ाई गई है। सरकारी लोकपाल विधेयक का प्रावधान तैयार करते वक्त संयुक्त राष्ट्र के साथ भ्रष्टाचार विरोधी संधि की भी पूरी तरह अनदेखी की गई। पांच मंत्रियों की सरकारी समिति ने जो ड्राफ्ट तैयार किया और दावा किया कि उन्होंने नागरिक समाज के छत्तीस में से बीस बिंदुओं को ज्यों का त्यों लोकपाल ड्राफ्ट में शामिल किया और बाकी दस बिंदुओं को संशोधन के साथ शामिल किया गया, ये दावा सरासर झूठ के अलावा कुछ नहीं है। इनके दावों की पड़ताल से हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि अगर संशोधन के बावजूद सरकारी लोकपाल एक जोकपाल ही है तो पता नहीं पहले यह बिल कैसा होगा। सरकारी लोकपाल की अहम खामियां-


प्राथमिकी से पहले सुनवाई-

नागरिक समाज ने मांग की थी कि किसी भी लोकसेवक या नौकरशाह के खिलाफ भ्रष्टाचार की जांच शुरू करने और आरोपपत्र दायर करने के लिए किसी से मंजूरी लेने की जरूरत नहीं हो। सरकारी लोकपाल में इस बात को मान लिया गया लेकिन भ्रष्ट अधिकारियों को बचाने के लिए पूरी व्यवस्था की गई है और ऐसा करने के लिए कानूनी प्रक्रियाओं की धज्जियां उड़ाई गई है।

सरकारी लोकपाल आरोपी को सुनवाई का मौका दिए बगैर प्राथमिकी दर्ज करने से रोकता है। यानी आरोपी को पहले सुनवाई को मौका दो फिर उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करो। यह सामान्य आपराधिक कानून के खिलाफ है। सामान्य आपराधिक कानून के तहत पुलिस संज्ञेय अपराध के मामले में सिर्फ साधारण सूचना के आधार पर प्राथमिकी दर्ज करने के लिए प्रतिबद्ध है।


लोकपाल विधेयक ना सिर्फ प्राथमिकी से पहले बल्कि आरोप पत्र से पहले भी भ्रष्ट अधिकारी को सुनवाई का मौका देने की भी सिफारिश करता है, जो अकारण ही भ्रष्टाचार को संरक्षण देने वाला है।

भ्रष्ट अधिकारियों और नेताओं

को बचाने के

लिए तो इस विधेयक में बहुत कुछ हैं लेकिन व्हिसिलब्लोअर यानी सचेतकों की सुरक्षा के लिए इसमें कुछ भी नहीं है। हद तो तब हो गई, जब इस विधेयक में सचेतकों पर मुकदमा चलाने वाले प्रावधान जोड़े गए। यानी बिल के मुताबिक, उल्टे शिकायर्ताओं के खिलाफ मामला दर्ज किया जा सकेगा और अगर आरोप गलत पाया जाता है तो शि

कायत कर्ता को कड़ी से कड़ी सजा मिलेगी। हास्यास्पद तो ये है कि आरोपी पर अगर आरोप साबित हो जाता है तो उसे मात्र छह माह की सजा मिलेगी, मगर शिकायतकर्ता अगर लगत पाया जाता है तो उसे कम से कम दो साल की सजा मिलेगी।

संयुक्त राष्ट्र भ्रष्टाचार-विरोधी संधि का उल्लंघन

विधेयक की प्रस्तावना में संयुक्त राष्ट्र भ्रष्टाचार विरोधी संधि का कोई उल्लेख नहीं है। इस संधि की पूरी तरह अनदेखी कर दी गई। संधि में भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए मंत्रियों, नौकरशाहों, जजों, विधायकों और सांसदों के लिए एक समान व्यवस्था की बात कही गई है। मगर, सरकारी विधेयक में संसद के अंदर सांसदों के आचरण को लोकपाल के दायरे से बाहर रखा गया है। साथ ही, इनमें जजों को शामिल नहीं किया गया है। इतना ही नहीं, करीब सवा करोड़ सरकारी कर्मचारियों में से महज 65000 हजार सरकारी कर्मचारियों यानी (0.5 प्रतिशत) को ही लोकपाल के दायरे में लाया जा रहा है वो सिर्फ केंद्र सरकार के ग्रेड-ए के कर्मचारियों को।

लोकपाल के अध्यक्ष को सदस्यों को हटाना।

सरकारी विधेयक के मुताबिक, लोकपाल के अध्यक्ष या किसी भी सदस्य के खिलाफ राष्ट्रपति के निर्देश पर सुप्रीमकोर्ट द्वारा जांच शुरू होने के बाद उन्हें लोकपाल के पद से हटाया जा सकता है। बाद में विधेयक में संशोधन कर यह प्रावधान किया गया कि राष्ट्रपति न सिर्फ सरकार की सिफारिश बल्कि कम से कम 100 सांसदों द्वारा हस्ताक्षरित याचिका या किसी नागरिक द्वारा दायर याचिका से मामला बनने पर लोकपाल के सदस्य या अध्यक्ष को हटाया जा सकेगा। साफ है कि अगर सरकार नहीं चाहती हो तो कोई भी लोकपाल जवाबदेह नहीं हो सकता है। यह लोकपाल नामक स्वायत्त संस्था के निर्माण के बिल्कुल खिलाफ है।

नागरिक समाज पर चोट--

सरकारी लोकपाल के पहले ड्राफ्ट में लोकपाल के दायरे में सभी गैर-सरकारी संस्थाओं(एनजीओ), सोसायटी और न्यासों यानी ट्रस्टों को लाने की सिफारिश की गई है।


जारी है...

शनिवार, 10 सितंबर 2011

Who is supreme- people or parliament? सर्वोच्च जनता या संसद?

This essay has been written for my English blog parindian

Some people from the dias of Anna Hazare at Ramlila Maidan in Delhi allegedly spoken a few controversial words to the parliamentarians and the parliament issues privilege notices to actor Ompuri and members of team Anna, Kiran Bedi, Prashant Bhushan, Arvind Kezriwal. Interestingly, no notice has been issued to Anna Hazare, who spoken rather more controversial and objectionable words to the politician classes. Why? The political class of our country know the answer of the question better. The notices to team Anna and actor Ompuri have been taken as the side effect, say after affect of the peoples movement. The political class of our country is not ready to take the movement easily. They claim the supremacy of the parliament and the parliamentary system. At the same time, they do not think and do not want to think, who make the parliament. The problem arises from here. There are fashionable terms for the dictators in the political arena, such as Supremo, high command etc. These are not easy to take words. The high command or the supremo of the party decides what an MP or MLA should think, speak and do. Once one get elected, his mind, soul and body get dedicated to the supremo. He can not think, speak and do, what his people want.

This is not matter of any one party or any particular type of party, but our entire political system is chained. The supremo or high command of any party decide the fate of the people related to it. And lastly the incumbent party decide the fate of the national. In our democratic system, people once in five year caste their vote to elect their representative. The candidates make tall and popular promises to catch their vote. And once the candidate wins, never cares the wish of the people. They claim that they did a lot to eradicate the problems of the people. Since the days of India's independence, people are listening the music of development at different tunes. The Indians are tolerant naturally. But, the arrogant political class thinks, people are gentle and can be cheated easily. The liberalization and the globalization made the things more worse. The illegal nexus of politics-industry and bureaucracy promoted corruption in public life. The shrewd and cunning people made their place in politics. The power, politics and paisa made them too arrogant. They think they are everything and people are nothings. They think that they have power to rule either they get elected or not.

The arrogance of the political class is the main reason behind the mass movement of Anna Hazare. Our political class did not take the movement easily. They argue that the crowd of five to ten thousand people can not undermine the parliament and the with the support of five to ten thousand people one can not claim to be the representative of people. When the support for Anna got larger across the country, their well implemented formula “divide and rule” came into their mouth. They shouted, you have not support from Muslims and Dalits. They also alleged that the movement got financial support of America and RSS. But their divide and rule policy did not work this time. It is due to the Chanakyas of Anna. Arvind kejriwal, Prashant Bhushan, Shanti Bhushan and Kiran Bedi defeated the government every time. Team Anna studied the each and every aspect of government for the last four month and made its strategy. Team Anna knew that when and where the government would play what type of trick and prepared itself for the same.

Team Anna knew that government will do its best to stop the agitation. The team also knew that the government would arrest them. So they posted Anna's message on You tube and the tube done miracle to the people of the country. The hundreds of thousand people came out on the road. The government sent them to Tihar jail, where lacs of people sat on dharna against government's action. The government knelt down and given release order. This is the government and the same police, which a couple of hours before, thought that team Anna was a threat to law and order of the land and arrested them, but now it thinks that they are not threat.

To be continued...

गुरुवार, 11 अगस्त 2011

धत तेरे की। आप तो समझने के लिए तैयार ही नहीं हैं


सच में, आज मुझे बेहद अफसोस हो रहा है। मैं अपने छोटे की बात नहीं समझ पा रहा हूं। छोटा है। बहुत लिहाज करता है। मुझसे बोलता भी कम है। यूं कहें कि मुंह नहीं लगाता है। टभर-टभर नहीं करता है। एक लाइन में ही सही, मगर, आज वह अपने मन की बात निकाल ही गया।
क्या चाहते हैं आप, वो नैतिकता के नाम पर इस्तीफा दे दें।
बहुत ही खीझ थी उसके मन में। वह मेरी बात भी नहीं सुना। आगे बढ़ गया। उसकी बातों पर मन ही मन जिरह करता रहा।
आखिर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह क्यों इस्तीफा दें। आखिर उनकी गलती क्या है। भ्रष्टाचार किया तो उनके मंत्रियों ने। उसके लिए वो क्यों जिम्मेदार हों। आखिर उनकी ईमानदार छवि को इससे क्या नुकसान पहुंचता है।
छोटे की बातों में दम था। लेकिन मैं अपने मन को नहीं समझा पा रहा था कि आखिर इतना सब कुछ हो जाने के बाद भी मनमोहन सिंह ईमानदार कैसे बने हुए हैं और कैसे उनकी छवि अब भी साफ सुथरी बची हुई है।
अगर किसी व्यक्ति के सामने कोई अपराध होता है या कोई आपराधिक घटना होती है तो उससे अपेक्षा की जाती है कि वो पुलिस में उसकी रिपोर्ट दर्ज कराएगा। वो कोर्ट में इसकी गवाही देगा। मगर, अगर वो व्यक्ति उस अपराधी को बचाने की कोशिश करता है तो उसे क्या कहा जायेगा। उसे अपराधी कहा जाए या नहीं, मगर कम से कम उसे ईमानदार तो नहीं कहा जाएगा। कम से कम इस घटना के बाद उसकी छवि साफ सुथरी तो नहीं कही जाएगी।
जहां तक मुझे याद है टू-जी घोटाले पर कैग की रिपोर्ट आने के बाद प्रधानमंत्री कैग को उसका काम समझा रहे थे। मौका था कैग की १५० वर्षगांठ का। मनमोहन सिंह उस कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कह रहे थे कि कैग को गलती और जानबूझकर की गई गलती, वास्तविक गलती और परिकल्पना में अंतर को समझना चाहिए। कैग अपना काम ईमानदारी से कर रहा था मगर प्रधानमंत्री उसे वास्तविक गलती और परिकल्पना में अंतर समझाने में व्यस्त थे। अगर वो इस व्यस्तता को छोड़कर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करते तो उनकी छवि ईमानदार समझी जाती और यही काम करने के लिए सुप्रीमकोर्ट को मोर्चा नहीं संभालना पड़ा।
सरकारें अक्सर कोर्ट की अतिसक्रियता पर सवाल उठाती रही हैं मगर, कोर्ट को ऐसा होने के लिए मजबूत कौन करता है।
अगर कमजोर व्यक्ति अपराध को देखकर, उससे डरकर भाग जाता है, पुलिस में रिपोर्ट दर्ज नहीं कराता है, कोर्ट में गवाही नहीं देना चाहता है तो उसकी मजबूरी समझ में आती है मगर, देश का सबसे ताकतवर व्यक्ति अगर ऐसा करता है तो क्या वो ईमानदार या साफ सुथरी छवि का कहलाने लायक है?
अगर ये ताकतवर व्यक्ति उस अपराधी को बचाने की कोशिश में जुट जाए तो उसे क्या कहा जाएगा। क्या छोटे बाबू आप तब भी उसे ईमानदार ही कहेंगे।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने तो ऐसा ही किया।
जब कैग कि रिपोर्ट आई तो विपक्ष की ओर से हमले झेल रही सरकार ने अपने महारथी, कपिल सिब्बल को मोर्चे पर उतार दिया। सिब्बल ने अपनी वकालत पेशा की बाजीगरी का इस्तेमाल करते हुए जीरो लॉस की थ्योरी गढ़ डाली। यानी टूजी स्पेक्ट्रम आवंटन से सरकार को कोई नुकसान नहीं हुआ।
जब नुकसान ही नहीं हुआ तो राजा, कनिमोझी, बेहुरा सहित दर्जन भर लोग जेल में क्यों हैं। क्यों कलानिधि मारन को इस्तीफा देना पड़ा।
छोटे बाबू क्या आप बताएंगे कि जीरो लॉस की थ्योरी गढ़ने वाले कपिल सिब्बल के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई। जहां तक हमें पता है कार्रवाई नहीं, उन्हें दो-दो मंत्रालय पर बरकरार रख कर पुरस्कृत किया गया। क्या सच पर परदा डालने वालों को पुरस्कृत करना ही मनमोहन सिंह की ईमानदारी है.
सिब्बल की बात छोड़िये। खुद प्रधानमंत्री ने कहा कि टूजी स्पेक्ट्रम आवंटन से सरकार को कोई नुकसान नहीं हुआ। उन्होंने इस घोटाले से हुए नुकसान की तुलना गरीबों को दी जाने वाली सब्सिडी से कर दी। क्या लूट सब्सिडी के बराबर है। क्या सब्सिडी देने के लिए किसी सरकार को जेल जाते सुना है। क्या कोर्ट ने सब्सिडी देने के लिए सरकार के किसी मंत्री को जेल भेजा है। क्या ईमानदारी की यही परिभाषा है।
हाल ही में प्रिंट मीडिया के पत्रकारों से बातचीत में प्रधानमंत्री ने कहा कि राष्ट्रमंडल खेल घोटाले पर तत्कालीन खेल मंत्री मणिशंकर अय्यर का विरोध आडियॉलॉजिकल यानी सैद्धांतिक था। लेकिन प्रधानमंत्री को मणिशंकर अय्यर का लिखा हुआ पत्र जो मीडिया में आया है, उससे अनुसार मणिशंकर अय्यर का विरोध सैद्धांतिक नहीं बल्कि तथ्यात्मक था। बताया गया था कि राष्ट्रमंडल खेल आयोजन समिति के अध्यक्ष सुरेश कलमाडी ने किस प्रकार खुली लूट मचा रखी थी। इससे बावजूद प्रधानमंत्री ने कोई कार्रवाई करने के बजाय उससे छुपाने का काम किया।
कैग की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, तत्कालीन खेल मंत्री सुनील दत्त के विरोध के बावजूद प्रधानमंत्री कार्यालय की सिफारिश के आधार पर सुरेश कलमाडी की नियुक्ति हुई। इतना ही नहीं, खेल सचिव अरोड़ा ने भी प्रधानमंत्री कार्यालय को पत्र लिखा था लेकिन कार्रवाई तो दूर कलमाडी की नियुक्ति कर दी गई।
छोटे, भले ही तुझे मेरी बातों पर गुस्सा आता हो, लेकिन, लेकिन मैंने तुम्हारे सामने जो तथ्य रखे हैं क्या इससे तुम्हारी सोच पर कोई असर पड़ा है। क्या अब भी तुम मुझे समझने की कोशिश करोगे या नहीं। मेरे भाई प्रधानमंत्री पद की अपनी गरिमा होती है। क्या इतना सब कुछ हो जाने के बाद भी मनमोहन सिंह के लिए इस पद पर बने रहना उचित है। क्या अब भी उनकी ईमानदारी और साफ सुथरी छवि अक्षुण्ण बनी हुई है।
झुंझलाना मत। ठंडे दिमाग से सोचना।

जाते-जाते- अण्णा हजारे को सोलह अगस्त से अनशन करना पड़ रहा है। आखिर सरकार ईमानदार बनना क्यों नहीं चाहती है। आखिर उसे एक मजबूत और कारगर लोकपाल लाने में आपत्ति क्यों है। आखिर वो भ्रष्टाचार की संस्कृति को क्यों बनाए रखना चाहती है। आखिर वो कालाधन वापस देश क्यों नहीं लाना चाहती है। एक ईमानदार व्यक्ति इस पर चुप क्यों है।


वाकई सवाल गंभीर है मगर जवाब देगा कौन

इस लिंक को देखें
http://www.facebook.com/video/video.php?v=1714109831035

पता चल जाएगा कि सवाल कितना गंभीर है मगर इसका जवाब कौन देगा।

शनिवार, 6 अगस्त 2011

कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना

श्रद्धा-अश्रद्धा मन का रक्तबीज है।
बुद्धि मन की ही चंडी है।
बुद्धि अश्रद्धा का भी संहार करती है।
श्रद्धा का भी संहार कर सकती है।
अबुद्धि शरणागत का स्रोत है।
अबुद्धि खड़ा नहीं कर सकती है प्रश्नचिह्न।
मीमांसा की ओर जाने की बात ही छोड़िए।
ये कविता नहीं।
कविता तो अक्षुण्ण होती है
ये तो भीड़ है।
अव्यक्त भीड़।
उन कवियों की भीड़
जिनके मन में विचार ही विचार हैं।
नहीं हैं तो शब्द।
नहीं है तो अलंकार
नहीं है तो पिंगल।
आखिर कैसे बनेगी कविता
कविता खेतों की ककड़ी नहीं
शरणागत ने अबुद्धि पैदा कर दी है।
हर ओर, चारों ओर।
जो अबुद्धि का दास नहीं।
उसकी कोई दशा नहीं।
निजता का सम्मान
हम करते हैं।
मगर, मेरी निजता का
सम्मान कौन करेगा।
क्योंकि मैंने अबुद्धि की दासता स्वीकार नहीं की।
नहीं हुआ शरणागत।
तो देख रहे हो मेरी दशा।
व्यवस्था और तंत्र का नाम खड़ी इमारत
मेरे ऊपर गिर गई
नष्ट कर देना चाहती है मुझे।

सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मां कश्चित दुख भाग भवेत।
सभी सुखी हों, सभी निरोग हो। सभी अच्छे दिखें। किसी को कोई दुख न हो। परवरदिगार। परमपिता परमेश्वर ये यही कामना रहती है। लेकिन इस कामना के बावजूद लोग दुखी हैं। निराश हैंपीड़ित हैं। कई दुखी और निराश लोग आत्महत्या कर लेते हैं। मगर, कई पीड़ित लोग चुपके से ईलाज के लिए विदेश चले जाते हैं। अक्सर ये लोग बड़े होते हैं। मगर, सवाल तब उठता है। जब कोई सबसे बड़ा व्यक्ति(?) अपने ईलाज के लिए विदेश चला जाता है. वो चुपके-चुपके। किसी को पता भी नहीं चलता है कि वो किस हाल में है। उसे क्या हुआ है। वो ईलाज के लिए कहां जा रहा है। क्या देश में उसका इलाज नहीं हो सकता है। नहीं तो क्यों नहीं हो सकता है। क्या दे
श में कुशल डॉक्टरों की कमी है। क्या देश में अच्छे अस्पताल नहीं हैं(ये तो सब जानते हैं, मगर सवाल उन लोगों से है जो भारत को महाशक्ति या विश्वशक्ति समझते हैं। गर्व तीस इंच का सीना छत्तीस का हो जाता है) नहीं है तो क्यों नहीं है। है तो एक दो ही क्यों है।

बगल का चित्र- देश के प्रसिद्ध स्वास्थ्य संस्थान एम्स का है।

साठ साल पहले भी हम ऐसे थे। आज भी हम ऐसे हीं है। आखिर देश में सुविधाएं क्यों उपलब्ध होंगी। क्योंकि देश के चुनिंदा लोगों, मंत्रियों, संतरियों, नेताओं के लिए स्वास्थ्य की तमाम सुविधाएं विदेशों में हैं। उनकी शिक्षा-दीक्षा की तमाम व्यवस्था विदेशों में हैं। वो अंग्रेजी में गिटिर-पिटिर करते हैं और देश का शासक बन जाते हैं. ऐसे शासक हमारे लिए सुविधाएं क्यों मुहैया कराएंगे। क्यों अच्छे स्कूल बनने देंगे। उनके बच्चे भी पढ़ सकेंगे। क्यों ऐसे अस्पताल बनने देंगे। जहां उनका इलाज भी हो सकेगा। जब इनका कपड़ा भी विदेशों से धुलकर आता है तो बाकी चीजों पर माथापच्ची करना बेकार है।


मंगलवार, 2 अगस्त 2011

अंधे के हाथ में बटेर लग जाए तो वो खुद को शिकारी समझने लगता है

ऐसे ही शिकारी संसद, लोकतंत्र, संविधान की आड़ जनमत को ठेंगा दिखाने से बाज नहीं आते हैं। बीस से पच्चीस प्रतिशत लोगों का वोट हासिल कर खुद का जनता का प्रतिनिधि समझने लगते हैं और जनता के सच्चे प्रतिनिधियों की खिल्ली उड़ाते हैं। उनको तदवीर से तकदीर बनाने की सीख देते हैं। उनको चुनाव लड़ने के लिए कहते हैं। घोटाले पर घोटाले करते हैं और बेशर्मों की तरह संविधान, लोकतंत्र, प्रजातंत्र के पहरेदार होने का दंभ भरते हैं। ऐसे दंभी पाखंडियों से कौन पूछे कि जब इनका पेशा वकालतगिरी है तो ये राजनीति को क्यों गंदा करने चले आते हैं। क्यों राजनीति को वकालत की तराजू पर तौलते हैं। सच को झूठ, झूठ को सच बनाते हैं। कभी जीरो लॉस का सिद्धांत लाते हैं तो कभी खुद और अपने जैसे लोगों को बेदाग साबित कर जाते हैं। जो लोग बीस से पच्चीस प्रतिशत लोगों को वोट हासिल कर चुनाव जीतते हैं वैसे ही लोग दूसरों को सौ प्रतिशत वोट हासिल करने के लिए कहते हैं।

गुरुवार, 7 जुलाई 2011

फिर बाहर आया तेलंगाना का जिन्न



डॉ देवकुमार पुखराज
तेलंगाना का जिन्न बंद बोतल से एकबार फिर बाहर निकल आया है। इलाके के जनप्रतिनिधि सामूहिक इस्तीफा दे रहे हैं। अर्से बाद अलग तेलंगाना राज्य का मुद्दा राजनीति के केन्द्र में आ गया है। इलाके में बंद और रेल- रोको जैसे आंदोलन तेज हो गये हैं। केन्द्र की कांग्रेसनीत यूपीए सरकार और आंध्रप्रदेश में एन.किरण कुमार रेड्डी की सरकार के सामने एकाएक राजनीतिक फैसले लेने की कठिन चुनौती आ खड़ी हुई है। पांच दशक पुराने तेलंगाना आंदोलन में शायद ये पहला मौका है जब इलाके के सभी जनप्रतिनिधि दलीय परिधि से ऊपर उठकर एक सूर में बोलते दिख रहे हैं।
आंध्र प्रदेश में उठे राजनीतिक संकट के बावजूद केंद्र सरकार फ़िलहाल वहां राष्ट्रपति शासन के बारे में विचार नहीं कर रही हैदिल्ली में एक संवाददाता सम्मेलन के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने साफ कर दिया है कि आंध्र प्रदेश में राष्ट्रपति शासन की कोई संभावना नहीं है। लेकिन राजनीतिक विश्ले षकों का मानना है कि अगर राज्य में राजनीतिक गतिरोध इसी तरह चलता रहा तो राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता है
दरअसल, पृथक तेलंगाना राज्य के समर्थन में अभी तक आंध्रप्रदेश के 294 में सौ विधायकों ने इस्तीफ़ा दे दिया हैइनमें से 45 कांग्रेस, 37 तेलुगु देशम पार्टी, 11 तेलंगाना राष्ट्र समिति, चार सीपीआई और 2 भाजपा के विधायक हैटीडीपी के बागी विधायक नागम जनार्दन रेड्डी ने पहले ही अपना इस्तीफ़ा दे दिया था। इस तरह तेलंगाना क्षेत्र के 119 में से 100 विधायकों ने इस्तीफ़ा दे दिया हैबाक़ी बचे 19 में से सात विधायक मजलिसे इत्तेहादुल मुसलमिन से जुड़े हैं जिसका हैदराबाद और आसपास के इलाके में खासा प्रभाव माना जाता है। लोकसत्ता पार्टी के प्रमुख और शहरी इलाके से विधायक जयप्रकाश नारायण भी इस्तीफा नहीं देने के पक्ष में हैं। एमआईएम आरंभ से हीं राज्य को दो भागों में बांटे जाने के ख़िलाफ़ है। विधायकों के साथ हीं तेलंगाना क्षेत्र से आने वाले सांसदों ने भी इस्तीफा देकर नेतृत्व के सामने परेशानी खड़ी कर दी है। तेलंगाना क्षेत्र के कई मंत्रियों ने भी इस्तीफे दे दिए हैं जिससे कांग्रेस के लिए मुश्किलें खड़ी हो गई हैं। सौ विधायकों के इस्तीफ़े के बाद विधानसभा में 194 सदस्य रह गए हैं। जानकार बताते हैं कि सदन में कांग्रेस को अभी भी बहुमत हासिल है और सरकार को तकनीकी रूप से कोई ख़तरा नहीं है। वैसे आंध्रप्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष एन. मनोहर अभी विदेश दौरे पर अमरीका में हैं। कहा जा रहा है कि स्पीकर के स्वदेश लौटने तक फ़िलहाल यथास्थिति बनी रहने की संभावना है। पृथक तेलंगाना के मसले पर तेलंगाना क्षेत्र के 17 में से 13 सांसदों ने भी इस्तीफ़ा दे दिया हैइनमें से नौ कांग्रेस, दो टीआरएस और दो टीडीपी के सांसद हैं। इनके इस्तीफ़े को लेकर भी लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने अभी तक कोई फ़ैसला नहीं लिया है। लेकिन केन्द्र की कांग्रेस सरकार के सामने समस्या गंभीर है।आंध्र प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी ग़ुलाम नबी आज़ाद, लोकसभा में कांग्रेस के नेता प्रणब मुखर्जी और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल इस्तीफ़ा देनेवाले सांसदों को मनाने की लगातार कोशिश करते रहे हैं, लेकिन गतिरोध बरकरार हैतेलंगाना क्षेत्र के सांसद और विधायक अब आर-पार की लड़ाई के मूड में हैंऐसे में इस गतिरोध के जल्दी ख़त्म होने की उम्मीद नज़र नहीं आ रही है। उधर तेलंगाना जेएसी के 48 घंटे के बंद की सफलता ने राज्य प्रशासन के सामने गंभीर स्थिति उत्पन्न कर दी है। बंद के बाद टी. जेएसी ने इलाके की रेल सेवा ठप्प करने और सड़क पर हीं खाना बनाने और खाने जैसे कार्यक्रम करने की घोषणा कर रखी है। 5-6 जुलाई को 48 घंटे की बंद के दौरान हैदराबाद सहित तेलंगाना क्षेत्र के सभी दस ज़िलों में परिवहन सेवा बुरी तरह प्रभावित रही। राज्य परिवहन निगम की 10 हज़ार से ज़्यादा बसें नहीं चली और यात्रियों को भारी परेशानी झेलनी पड़ी। ज्वाइंट एक्शन कमेटी की योजना राष्ट्रीय राजमार्गों पर अवरोध खड़े कर उन्हें जाम कर देने की है आने वाले दिनों में विरोध प्रदर्शनों का सिलसिला तेज हो सकता है।
तेलंगाना राष्ट्र समिति के अध्यक्ष के. चंद्रशेखर राव ने केंद्र सरकार को चेतावनी देते हुए इस्तीफा लोकसभा अध्यक्ष को फैक्स कर दिया है। उन्होंने कहा है कि यदि केन्द्र सरकार ने अपना वादा पूरा करते हुए अलग तेलंगाना प्रांत नहीं बनाया तो पूरे इलाके की स्थिति और खराब हो सकती है। वे याद दिलाते हैं कि नवंबर 2009 में गृहमंत्री पी. चिदम्बरम् ने आंदोलनों के दबाव में आकर हीं अलग तेलंगाना प्रांत गठित करने की प्रक्रिया शुरू करने की बात कही थी।लेकिन फिर आंध्र प्रदेश में विरोध के चलते मामला रूक गया। बाद में श्रीकृष्ण आयोग का गठन किया गया, जिसने केंद्र सरकार को कई विकल्प सुझाए लेकिन तब से सरकार उन पर विचार करने का ही भरोसा दिला रही है। वैसे केसीआर ने हैदराबाद को केन्द्र शासित प्रदेश बनाने और तेलंगाना को स्वायत परिषद बनाने के प्रस्ताव को पहले हीं खारिज कर दिया है।
केन्द्र की सरकार के साथ-साथ आंध्रप्रदेश में किरण कुमार रेड्डी को भी तेलंगाना का भूत पीछा कर रहा था। हाल तक वाईएस जगनमोहन की चुनौति झेल रहे किरण रेड्डी दल के विधायकों और मंत्रियों के बागी तेवर अपना लेने से पसोपेश में हैं। मुख्य विपक्षी पार्टी टीडीपी के मुखिया चन्द्रबाबू नायडु को भी उनके विधायको ने दो टूक कह दिया है। विधायक कहते हैं कि जनता की भावना को देखते हुए उनके पास इस्तीफा देने के अलावे कोई विकल्प नहीं बचा था। सरकार के सामने संकट ये है यदि उसने तेलंगाना को लेकर कुछ कार्रवाई आगे बढ़ाई तो तटीय आंध्र और रायलसीमा इलाके में भी आंदोलन की आग भड़क सकती है।