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शुक्रवार, 14 नवंबर 2014

नेहरू की ही सवा-शताब्दी क्यों?

शंकर शरण 
IV/ 44, एन.सी..आर.टी. आवास, श्री अरविंद मार्ग, नई दिल्ली 110 016


जवाहरलाल नेहरू की सवा-शताब्दी मनाने हेतु बनी उच्च-स्तरीय समिति का पुनर्गठन एक अधूरा कदम है। उस के पहले देश को यह बताया जाना चाहिए कि किस आधार पर नेहरू की शताब्दी और सवा-शताब्दी मनाने के लिए मँहगा सरकारी उपक्रम हुआ, जबकि डॉ. राजेंद्र प्रसाद के लिए नहीं?
यदि नेहरू प्रथम प्रधान मंत्री थे, तो प्रसाद भी प्रथम राष्ट्रपति थे। उसी तरह, क्यों गाँधी-जयंती स्थाई अवकाश घोषित हो गया, जबकि ‘राष्ट्र-पितामह’ स्वामी दयानन्द सरस्वती को वह मान नहीं मिला? फिर, किस कारण सरदार वल्लभभाई पटेल को स्वतंत्र भारत के चौवालीस वर्षों तक देश के औपचारिक सर्वोच्च सम्मान के योग्य नहीं समझा गया? उन से पहले इंदिरा गाँधी, राजीव गाँधी ही नहीं, कई क्षेत्रीय नेताओं तक को भारत-रत्न बनाया जा चुका था! अतः अनेक सवाल एवं तथ्य नेहरू और उनके वंश की महानता भारतीय मानस पर जबरन थोपने का संकेत करते हैं।
हरेक देश में किसी दिवंगत की जयंती मनाने या न मनाने के कारण मूलतः समान होते हैं। जिसने देश और समाज की सच्ची सेवा की, उसे याद करते हैं। जिसने ऐसा कुछ विशेष न किया अथवा हानि पहुँचाई, उसे भूल जाया जाता है। अतः तुलनात्मक सवाल यह भी है कि आज रूस में लेनिन और चीन में माओ को किन कारणों से विस्मृत किया जा चुका है?
लेनिन से नेहरू की तुलना भारत में पहले भी होती रही है। तीस-चालीस साल पहले कांग्रेसी नेता और मार्क्सवादी प्रोफेसर इस पर लेख व पुस्तकें प्रकाशित किया करते थे, और सरकार से ईनाम पाते थे। तब रूस में लेनिन और यहाँ नेहरू की अतुलनीय महानता एक स्वयंसिद्धि होती थी। तदनुरूप दोनों को अपने-अपने देश का मुक्ति-योद्धा, प्रथम शासक, मार्गदर्शक, विचारक, नीति-निर्माता, इस प्रकार महामानव, आदि बताने का चलन था।
फिर समय आया कि रूसियों ने वह लेनिन-पूजा बंद कर दी। वही स्थिति चीन में माओ की हुई। इस तरह, आज उन देशों में अपने-अपने उन कथित मार्गदर्शक, महान विचारक लेनिन, माओ की जयंती मनना तक पूरी तरह बंद हो चुका है। रूस और चीन में इस व्यक्ति-पूजा पटाक्षेप के पीछे कोई जोर-जबर्दस्ती नहीं हुई। रूस चीन की जनता ने सर्वसम्मति से उस कथित महानता का अध्याय बंद किया। कारण यह भी था कि वह पूजा उन पर दशकों तक जबरन थोपी हुई थी। क्या नेहरू की स्थिति भिन्न है?
अब यह निर्विवाद है कि लेनिन, माओ की महानता की गाथाएं उनके देशों में राज्यसत्ता की ताकत के बल पर गढ़ी और प्रचारित की जाती रहीं। उन के जीवन के हर काले अध्याय और कदमों पर भारी पर्दा डाल कर रूसी-चीनी जनगण के जीवन के हर पहलू को लेनिन-माओमय बना डाला गया था। इसीलिए, जैसे ही वह जबरन सत्ता दबाव हटा, लोगों ने स्वयं वह लज्जास्पद पूजा बंद कर दी। इस पर सर्वसहमति इतनी स्पष्ट थी कि उनके देशों में कोई मामूली विवाद तक न हुआ। आज रूस और चीन में टॉल्सटॉय और कन्फ्यूशियस ही सर्वोच्च चिंतक माने जाते हैं, लेनिन और माओ तो बिलकुल नहीं।
सच पूछें तो इस प्रसंग में भी नेहरू को लेनिन से तुलनीय बनाने का समय आ गया है। जिस तरह, कम्युनिस्ट राज ने रूस पर लेनिन-पूजा थोपी थी, उसी तरह नेहरूवंश के राज ने भारत में नेहरू-गाँधी पूजा थोपी। दूसरी ओर, नेहरू का राजनीतिक, वैचारिक रिकॉर्ड भी लेनिन से तुलनीय है। अर्थ-नीति, विदेश-नीति, गृह-नीति, शैक्षिक-नीति, दार्शनिक रुख आदि किसी भी बुनियादी बिन्दु पर नेहरू की विरासत गौरवपूर्ण नहीं है।
उलटे, राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश-नीति में नेहरू के निर्णयों, कार्यों, विचारों में एक से एक लज्जास्पद अध्याय हैं। तिब्बत पर स्थापित भारतीय कूटनीतिक संरक्षण अधिकार को स्वतः छोड़कर उस महत्पूर्ण पड़ोसी देश को अपने ‘मित्र’ कम्युनिस्ट चीन के हवाले कर नेहरू ने स्वयं भारत को अरक्षित कर डाला, जबकि सरदार पटेल ने इसके विरुद्ध चेतावनी दी थी। आज अरुणाचल प्रदेश पर चीन का दावा तिब्बत के माध्यम से है, और किसी तरह नहीं। फिर, प्रधान मंत्री रूप में अपनी प्रथम अमेरिका यात्रा में नेहरू ने अमेरिकियों को कम्युनिस्टों वाला साम्राज्यवाद-विरोध का लेक्चर पिलाकर स्तब्ध, क्षुब्ध कर दिया। इस प्रकार, दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण देश से संबंध बिगाड़ने की शुरुआत की। कम्युनिस्ट चीन से दोस्ती निभाने की खातिर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् में भारत को प्रस्तावित स्थाई सीट ठुकराया। यहाँ तक कि जब उसी दोस्त ने चुपके से घुस-पैठ कर कश्मीर के पूर्वी हिस्से का एक भाग दखल कर लिया, तो नेहरू ने संसद में प्रधानमंत्री पद से बयान दिया कि ‘उस हिस्से में तो घास भी नहीं उगती’!
ऐसी बचकानी समझ और लज्जास्पद योग्यता वाले व्यक्ति को प्रथम प्रधान मंत्री बनाने का अपराध मोहनदास गाँधी ने किया था। पर विगत छः दशकों के झूठे, सरकारी प्रचार के कारण आज देश के लोग जानते भी नहीं कि स्वतंत्रता मिलने के समय कांग्रेस में प्रथम प्रधानमंत्री के रूप में नेहरू पहली तो क्या, दूसरी पसंद भी नहीं थे! सब से ऊपर सरदार पटेल, फिर जे. बी. कृपलानी को कांग्रेसियों ने अपनी पसंद बताया था। उन्हें अमान्य कर गाँधीजी ने नेहरू को थोपा, जिन्होंने स्वतंत्र भारत के नवनिर्माण और नीति-निर्धारण की पूरी मिट्टी पलीद कर दी।
यहाँ तक कि नेहरू का व्यक्तिगत जीवन भी अनुकरणीय नहीं था। स्वयं नेहरू के वरिष्ठतम सहयोगियों समेत अनगिनत समकालीनों ने यह लिखा है। लेडी माउंटबेटन के अंतरंग प्रभाव में नेहरू ने देश का विभाजन, कश्मीर की ऐसी-तैसी तथा कम्युनिस्ट षडयंत्रकारियों की मदद की। कश्मीर को विवादित और पाकिस्तान को सदा के लिए लोलुप बनाने में नेहरू का सबसे बड़ा दोष है। और यह उन्होंने अपने गृहमंत्री सरदार पटेल को अँधेरे में रख कर किया था! यह सब कोई आरोप नहीं, जगजाहिर तथ्य हैं जिनके प्रमाण उतने ही सर्वसुलभ हैं।
तब ऐसे ‘प्रथम’ मार्गदर्शक की सवा-शताब्दी जयंती में हम क्या मनाएं? किस बात की चर्चा करें? क्या वही झूठ और अतिरंजनाएं दुहराएं, जो नेहरूवंशी सत्ता ने जोर-जबरदस्ती और छल-प्रपंच से स्थापित कर दी हैं? क्या समकालीन रूसी और चीनी जनता से इस मामले में कोई तुलनात्मक लाभ न उठाएं?
किसी भ्रम में न रहें। नेहरू के पक्ष में, उनकी विरुदावली और ‘योगदान’ के जितने भी किस्से व तर्क दिए जाते रहे हैं, वे ठीक वैसे ही हैं जैसे सोवियत सत्ता के दिनों में लेनिन के पक्ष में मिलते थे। अतः बिना उन गंभीर दोषों के, जो नेहरू में थे, बावजूद हमारी सरकार ने यदि प्रथम राष्ट्रपति देशरत्न डॉ. राजेंद्र प्रसाद की कोई शताब्दी या सवा-शताब्दी नहीं मनाई – तो कोई कारण नहीं कि अनगिनत लज्जास्पद कार्यों के बावजूद हम नेहरू पर देश का पैसा और समय बर्बाद करते रहें। यह पहले ही बहुत अधिक हो चुका है, कम से कम इस का ध्यान भी रखें।
केंद्रीय कैबिनेट ने सही निर्णय लिया है कि ल्युटन की दिल्ली में मृत नेताओं को आवंटित बंगलों को ‘स्मारक’ यानी उनके वंशजों द्वारा कब्जाने की प्रक्रिया बंद की जाएगी। किन्तु, तब अब तक किए गए कब्जों को बनाए रखने की क्या तुक है? इसकी शुरुआत तो नेहरू से ही हुई थी। तीनमूर्ति भवन प्रधान मंत्री निवास था। उसे नेहरू की मृत्यु के बाद उनका स्मारक बना दिया गया। उस तर्क से राष्ट्रपति भवन को राजेंद्र प्रसाद का स्माकर बना देना चाहिए था!
अतः जयंती, स्मारक, संस्थाओं, योजनाओं के नामकरण, आदि प्रक्रियाओं में यह विचित्र भेद-भाव – आगे ही नहीं, पीछे का भी – सदा के लिए खत्म होना चाहिए। पतंजलि, पाणिनि, चाणक्य, कालिदास, तुलसीदास, जैसे शाश्वत मूल्य के अनगिन मणि-मानिकों ही नहीं; स्वामी विवेकानंद, श्रीअरविन्द, जगदीशचंद्र बोस, जदुनाथ सरकार, ध्यानचंद, आदि भारत के कई समकालीन सच्चे महापुरुषों को स्वतंत्र भारत में हमने कितना सरकारी-राष्ट्रीय आदर दिया है? हमारे देश में एक लगभग अशिक्षित नेता के नाम पर बीसियों विश्वविद्यालय खोले गए हैं, और महान इतिहासकार जदुनाथ सरकार, महान कवि निराला या अज्ञेय के नाम पर एक भी नहीं! इस का तर्क उस सोवियत व्यवस्था से तनिक भी भिन्न नहीं, जिसमें पूरी शिक्षा को लेनिन-स्तालिनमय कर दिया गया था, जबकि दॉस्ताएवस्की, सोल्झेनित्सिन जैसे मनीषी पुस्तकालयों से भी बहिष्कृत थे।
ध्यान रहे, आधे-अधूरे सुधार किसी काम के नहीं होते। हमारे नए शासकों को साहस दिखाना चाहिए कि देश का स्वाभिमान हमारा आदर्श हो। चाटुकारिता, भेद-भाव और छिछोरापन इस स्वाभिमान को लज्जित करते हैं। नेहरू की सवा-शताब्दी शाही रूप से मनाई जाएगी, पिछली सरकार का यह निर्णय देश का गौरव बढ़ाने वाला नहीं, बल्कि क्षुद्र कारणों से था।
नई सरकार को इस बिंदु पर सांगोपांग और खुला विचार करना चाहिए। देश के महापुरुषों, मनीषियों की पहचान, सम्मान और उनसे सीखने का स्पष्ट और बुद्धिमत्तापूर्ण मानदंड बनाना ही स्वागत योग्य होगा। तब तक सरकार द्वारा स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री की सवा-शताब्दी ठीक वैसी ही मननी चाहिए, जैसी प्रथम राष्ट्रपति की मनी। न कम, न ज्यादा।
हालाँकि, यदि हम गाँधी-नेहरू को वही स्थान दे सकें, जो रूसी जनता ने लेनिन-स्तालिन को दे दिया है तो सब से अच्छा हो। वैसे भी, समय के साथ होगा वही। सत्ता-प्रायोजित महानता को लोग सदा माथे पर उठाए नहीं रहेंगे। चाहें तो तीन-मूर्ति भवन को सभी दिवंगत नेताओं को श्रद्धांजलि-स्मारक में बदल दें। उन्हें, उनके गुणों का स्मरण करना तो ठीक है। किन्तु उस से पहले हमें यह भी स्मरण करना चाहिए कि भारतवर्ष में अनादिकाल से मरणशील मनुष्यों, चाहे वे कितने ही महान रहे हों, का कोई स्मारक, समारोह, जयंती मनाने की परंपरा नहीं रही है। जहाँ से हमने यह परंपरा नकल कर ली है, वहाँ भी इस की एक लाज रहती है। कम से कम हम इस का भी ख्याल रखें।
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रविवार, 4 मार्च 2012

मूल चाणक्य नीति

आज से करीब 2300 साल पहले पहले पैदा हुए चाणक्य भारतीय राजनीति और अर्थशास्त्र के पहले विचारक माने जाते हैं। पाटलिपुत्र (पटना) के शक्तिशाली नंद वंश को उखाड़ फेंकने और अपने शिष्य चंदगुप्त मौर्य को बतौर राजा स्थापित करने में चाणक्य का अहम योगदान रहा। ज्ञान के केंद्र तक्षशिला विश्वविद्यालय में आचार्य रहे चाणक्य राजनीति के चतुर खिलाड़ी थे और इसी कारण उनकी नीति कोरे आदर्शवाद पर नहीं, बल्कि व्यावहारिक ज्ञान पर टिकी है। आगे दिए जा रहीं उनकी कुछ बातें भी चाणक्य नीति की इसी विशेषता के दर्शन होते हैं :

- किसी भी व्यक्ति को जरूरत से ज्यादा ईमानदार नहीं होना चाहिए। सीधे तने वाले पेड़ ही सबसे काटे जाते हैं और बहुत ज्यादा ईमानदार लोगों को ही सबसे ज्यादा कष्ट उठाने पड़ते हैं।

- अगर कोई सांप जहरीला नहीं है, तब भी उसे फुफकारना नहीं छोड़ना चाहिए। उसी तरह से कमजोर व्यक्ति को भी हर वक्त अपनी कमजोरी का प्रदर्शन नहीं करना चाहिए।

- सबसे बड़ा गुरुमंत्र : कभी भी अपने रहस्यों को किसी के साथ साझा मत करो, यह प्रवृत्ति तुम्हें बर्बाद कर देगी।

- हर मित्रता के पीछे कुछ स्वार्थ जरूर छिपा होता है। दुनिया में ऐसी कोई दोस्ती नहीं जिसके पीछे लोगों के अपने हित न छिपे हों, यह कटु सत्य है, लेकिन यही सत्य है।

- अपने बच्चे को पहले पांच साल दुलार के साथ पालना चाहिए। अगले पांच साल उसे डांट-फटकार के साथ निगरानी में रखना चाहिए। लेकिन जब बच्चा सोलह साल का हो जाए, तो उसके साथ दोस्त की तरह व्यवहार करना चाहिए। बड़े बच्चे आपके सबसे अच्छे दोस्त होते हैं।

- दिल में प्यार रखने वाले लोगों को दुख ही झेलने पड़ते हैं। दिल में प्यार पनपने पर बहुत सुख महसूस होता है, मगर इस सुख के साथ एक डर भी अंदर ही अंदर पनपने लगता है, खोने का डर, अधिकार कम होने का डर आदि-आदि। मगर दिल में प्यार पनपे नहीं, ऐसा तो हो नहीं सकता। तो प्यार पनपे मगर कुछ समझदारी के साथ। संक्षेप में कहें तो प्रीति में चालाकी रखने वाले ही अंतत: सुखी रहते हैं।

- ऐसा पैसा जो बहुत तकलीफ के बाद मिले, अपना धर्म-ईमान छोड़ने पर मिले या दुश्मनों की चापलूसी से, उनकी सत्ता स्वीकारने से मिले, उसे स्वीकार नहीं करना चाहिए।

- नीच प्रवृति के लोग दूसरों के दिलों को चोट पहुंचाने वाली, उनके विश्वासों को छलनी करने वाली बातें करते हैं, दूसरों की बुराई कर खुश हो जाते हैं। मगर ऐसे लोग अपनी बड़ी-बड़ी और झूठी बातों के बुने जाल में खुद भी फंस जाते हैं। जिस तरह से रेत के टीले को अपनी बांबी समझकर सांप घुस जाता है और दम घुटने से उसकी मौत हो जाती है, उसी तरह से ऐसे लोग भी अपनी बुराइयों के बोझ तले मर जाते हैं।

- जो बीत गया, सो बीत गया। अपने हाथ से कोई गलत काम हो गया हो तो उसकी फिक्र छोड़ते हुए वर्तमान को सलीके से जीकर भविष्य को संवारना चाहिए।

- असंभव शब्द का इस्तेमाल बुजदिल करते हैं। बहादुर और बुद्धिमान व्यक्ति अपना रास्ता खुद बनाते हैं।

- संकट काल के लिए धन बचाएं। परिवार पर संकट आए तो धन कुर्बान कर दें। लेकिन अपनी आत्मा की हिफाजत हमें अपने परिवार और धन को भी दांव पर लगाकर करनी चाहिए।

- भाई-बंधुओं की परख संकट के समय और अपनी स्त्री की परख धन के नष्ट हो जाने पर ही होती है।

- कष्टों से भी बड़ा कष्ट दूसरों के घर पर रहना है।

आचार्य चाणक्य एक ऐसी महान विभूति थे, जिन्होंने अपनी विद्वत्ता और क्षमताओं के बल पर भारतीय इतिहास की धारा को बदल दिया। मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चाणक्य कुशल राजनीतिज्ञ, चतुर कूटनीतिज्ञ, प्रकांड अर्थशास्त्री के रूप में भी विश्वविख्‍यात हुए। इतनी सदियाँ गुजरने के बाद आज भी यदि चाणक्य के द्वारा बताए गए सिद्धांत ‍और नीतियाँ प्रासंगिक हैं तो मात्र इसलिए क्योंकि उन्होंने अपने गहन अध्‍ययन, चिंतन और जीवानानुभवों से अर्जित अमूल्य ज्ञान को, पूरी तरह नि:स्वार्थ होकर मानवीय कल्याण के उद्‍देश्य से अभिव्यक्त किया।

वर्तमान दौर की सामाजिक संरचना, भूमंडलीकृत अर्थव्यवस्था और शासन-प्रशासन को सुचारू ढंग से बताई गई ‍नीतियाँ और सूत्र अत्यधिक कारगर सिद्ध हो सकते हैं। चाणक्य नीति के द्वितीय अध्याय से यहाँ प्रस्तुत हैं कुछ अंश -

1. जिस प्रकार सभी पर्वतों पर मणि नहीं मिलती, सभी हाथियों के मस्तक में मोती उत्पन्न नहीं होता, सभी वनों में चंदन का वृक्ष नहीं होता, उसी प्रकार सज्जन पुरुष सभी जगहों पर नहीं मिलते हैं।

2. झूठ बोलना, उतावलापन दिखाना, दुस्साहस करना, छल-कपट करना, मूर्खतापूर्ण कार्य करना, लोभ करना, अपवित्रता और निर्दयता - ये सभी स्त्रियों के स्वाभाविक दोष हैं। चाणक्य उपर्युक्त दोषों को स्त्रियों का स्वाभाविक गुण मानते हैं। हालाँकि वर्तमान दौर की शिक्षित स्त्रियों में इन दोषों का होना सही नहीं कहा जा सकता है।

3. भोजन के लिए अच्छे पदार्थों का उपलब्ध होना, उन्हें पचाने की शक्ति का होना, सुंदर स्त्री के साथ संसर्ग के लिए कामशक्ति का होना, प्रचुर धन के साथ-साथ धन देने की इच्छा होना। ये सभी सुख मनुष्य को बहुत कठिनता से प्राप्त होते हैं।

4. चाणक्य कहते हैं कि जिस व्यक्ति का पुत्र उसके नियंत्रण में रहता है, जिसकी पत्नी आज्ञा के अनुसार आचरण करती है और जो व्यक्ति अपने कमाए धन से पूरी तरह संतुष्ट रहता है। ऐसे मनुष्य के लिए यह संसार ही स्वर्ग के समान है।

5. चाणक्य का मानना है कि वही गृहस्थी सुखी है, जिसकी संतान उनकी आज्ञा का पालन करती है। पिता का भी कर्तव्य है कि वह पुत्रों का पालन-पोषण अच्छी तरह से करे। इसी प्रकार ऐसे व्यक्ति को मित्र नहीं कहा जा सकता है, जिस पर विश्वास नहीं किया जा सके और ऐसी पत्नी व्यर्थ है जिससे किसी प्रकार का सुख प्राप्त न हो।

6. जो मित्र आपके सामने चिकनी-चुपड़ी बातें करता हो और पीठ पीछे आपके कार्य को बिगाड़ देता हो, उसे त्याग देने में ही भलाई है। चाणक्य कहते हैं कि वह उस बर्तन के समान है, जिसके ऊपर के हिस्से में दूध लगा है परंतु अंदर विष भरा हुआ होता है।

7. चाणक्य कहते हैं कि जो व्यक्ति अच्छा मित्र नहीं है उस पर तो विश्वास नहीं करना चाहिए, परंतु इसके साथ ही अच्छे मित्र के संबंद में भी पूरा विश्वास नहीं करना चाहिए, क्योंकि यदि वह नाराज हो गया तो आपके सारे भेद खोल सकता है। अत: सावधानी अत्यंत आवश्यक है।

8. चाणक्य का मानना है कि व्यक्ति को कभी अपने मन का भेद नहीं खोलना चाहिए। उसे जो भी कार्य करना है, उसे अपने मन में रखे और पूरी तन्मयता के साथ समय आने पर उसे पूरा करना चाहिए।

9. चाणक्य का कहना है कि मूर्खता के समान यौवन भी दुखदायी होता है क्योंकि जवानी में व्यक्ति कामवासना के आवेग में कोई भी मूर्खतापूर्ण कार्य कर सकता है। परंतु इनसे भी अधिक कष्टदायक है दूसरों पर आश्रित रहना।

10. चाणक्य कहते हैं कि बचपन में संतान को जैसी शिक्षा दी जाती है, उनका विकास उसी प्रकार होता है। इसलिए माता-पिता का कर्तव्य है कि वे उन्हें ऐसे मार्ग पर चलाएँ, जिससे उनमें उत्तम चरित्र का विकास हो क्योंकि गुणी व्यक्तियों से ही कुल की शोभा बढ़ती है।

11. वे माता-पिता अपने बच्चों के लिए शत्रु के समान हैं, जिन्होंने बच्चों को ‍अच्छी शिक्षा नहीं दी। क्योंकि अनपढ़ बालक का विद्वानों के समूह में उसी प्रकार अपमान होता है जैसे हंसों के झुंड में बगुले की स्थिति होती है। शिक्षा विहीन मनुष्य बिना पूँछ के जानवर जैसा होता है, इसलिए माता-पिता का कर्तव्य है कि वे बच्चों को ऐसी शिक्षा दें जिससे वे समाज को सुशोभित करें।

12. चाणक्य कहते हैं कि अधिक लाड़ प्यार करने से बच्चों में अनेक दोष उत्पन्न हो जाते हैं। इसलिए यदि वे कोई गलत काम करते हैं तो उसे नजरअंदाज करके लाड़-प्यार करना उचित नहीं है। बच्चे को डाँटना भी आवश्यक है।

13. शिक्षा और अध्ययन की महत्ता बताते हुए चाणक्य कहते हैं कि मनुष्य का जन्म बहुत सौभाग्य से मिलता है, इसलिए हमें अपने अधिकाधिक समय का वे‍दादि शास्त्रों के अध्ययन में तथा दान जैसे अच्छे कार्यों में ही सदुपयोग करना चाहिए।

14. जिस प्रकार पत्नी के वियोग का दुख, अपने भाई-बंधुओं से प्राप्त अपमान का दुख असहनीय होता है, उसी प्रकार कर्ज से दबा व्यक्ति भी हर समय दुखी रहता है। दुष्ट राजा की सेवा में रहने वाला नौकर भी दुखी रहता है। निर्धनता का अभिशाप भी मनुष्य कभी नहीं भुला पाता। इनसे व्यक्ति की आत्मा अंदर ही अंदर जलती रहती है।

15. चाणक्य के अनुसार नदी के किनारे स्थित वृक्षों का जीवन अनिश्चित होता है, क्योंकि नदियाँ बाढ़ के समय अपने किनारे के पेड़ों को उजाड़ देती हैं। इसी प्रकार दूसरे के घरों में रहने वाली स्त्री भी किसी समय पतन के मार्ग पर जा सकती है। इसी तरह जिस राजा के पास अच्छी सलाह देने वाले मंत्री नहीं होते, वह भी बहुत समय तक सुरक्षित नहीं रह सकता। इसमें जरा भी संदेह नहीं करना चाहिए।

16. चाणक्य कहते हैं कि जिस तरह वेश्या धन के समाप्त होने पर पुरुष से मुँह मोड़ लेती है। उसी तरह जब राजा शक्तिहीन हो जाता है तो प्रजा उसका साथ छोड़ देती है। इसी प्रकार वृक्षों पर रहने वाले पक्षी भी तभी तक किसी वृक्ष पर बसेरा रखते हैं, जब तक वहाँ से उन्हें फल प्राप्त होते रहते हैं। अतिथि का जब पूरा स्वागत-सत्कार कर दिया जाता है तो वह भी उस घर को छोड़ देता है।

1७. बुरे चरित्र वाले, अकारण दूसरों को हानि पहुँचाने वाले तथा अशुद्ध स्थान पर रहने वाले व्यक्ति के साथ जो पुरुष मित्रता करता है, वह शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। आचार्य चाणक्य का कहना है मनुष्य को कुसंगति से बचना चाहिए। वे कहते हैं कि मनुष्य की भलाई इसी में है कि वह जितनी जल्दी हो सके, दुष्ट व्यक्ति का साथ छोड़ दे।

1८. चाणक्य कहते हैं कि मित्रता, बराबरी वाले व्यक्तियों में ही करना ठीक रहता है। सरकारी नौकरी सर्वोत्तम होती है और अच्छे व्यापार के लिए व्यवहारकुशल होना आवश्यक है। इसी तरह सुंदर व सुशील स्त्री घर में ही शोभा देती है।

बुधवार, 10 फ़रवरी 2010

भारतीय किसान आंदोलन के जनकः स्वामी सहजानंद सरस्वती


डॉ देवकुमार पुखराज
भारत में संगठित किसान आंदोलन खड़ा करने का श्रेय स्वामी सहजानंद सरस्वती को जाता है. उन्होंने अंग्रेजी दासता के खिलाफ लड़ाई लड़ी और किसानों को जमींदारों के शोषण से मुक्त कराने के लिए निर्णायक संघर्ष किया. दण्डी संन्यासी होने के बावजूद सहजानंद ने रोटी को हीं भगवान कहा और किसानों को भगवान से बढ़कर बताया. स्वामीजी ने नारा दिया था-
जो अन्न-वस्त्र उपजाएगा ,अब सो कानून बनायेगा,
ये भारतवर्ष उसी का है, अब शासन वहीं चलायेगा।
ऐसे महान नेता,युगद्रष्टा और किसानों के मसीहा का जन्म उत्तरप्रदेश के गाजीपुर जिले के देवा गांव में सन् 1889 में महाशिवरात्रि के दिन हुआ था. स्वामीजी के बचपन का नाम नौरंग राय था. उनके पिता बेनी राय मामूली किसान थे. नौरंग जब छह साल के थे तभी उनकी माताजी का स्वर्गवास हो गया. चाची ने उनका लालन-पालन किया. कहते हैं पूत के पांव पलने में हीं दिखने लगते हैं. बालक नौरंग में भी महानता के गुण बचपन से हीं दिखने लगे. प्राथमिक शिक्षा के दौरान हीं उन्होंने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाना शुरू कर दिया .पढ़ाई के दौरान हीं उनका मन आध्यात्म में रमने लगा. बालक नौरंग ये देखकर हैरान थे कि कैसे भोले-भाले लोग नकली धर्माचार्यों से गुरु मंत्र ले रहे हैं. उनके बालमन में धर्म की इस विकृति के खिलाफ पहली बार विद्रोह का भाव उठा. उन्होंने इस परंपरा के खिलाफ आवाज उठाने का संकल्प लिया. धर्म के अंधानुकरण के खिलाफ उनके मन में जो भावना पली थी कालांतर में उसने सनातनी मूल्यों के प्रति उनकी आस्था को और गहरा किया. उनके मन में वैराग्य पैदा होने लगा. घर वालों ने बच्चे की ये हाल देखी तो समय से पहले हीं उनकी शादी करा दी. लेकिन जिसके सर पर समाज और देश की दशा सुधारने का भूत सवार हो वो भला पारिवारिक जीवन में कहां बंधने वाला था. संयोग ऐसा रहा कि गृहस्थ जीवन शुरू होने के पहले हीं उनकी पत्नी भगवान को प्यारी हो गयीं. ये सन् 1905 के आखिरी दिनों की बात है. हालांकि दो साल बाद हीं उन्होंने विधिवत संन्यास लेने का फैसला किया और दशनामी दीक्षा लेकर स्वामी सहजानंद सरस्वती हो गये. बाद के सात साल उन्होंने धार्मिक ग्रंथों को पढ़ने और सामाजिक-राजनीतिक स्थितियों का अध्ययन करने में बिताया. इसी दौरान उन्हें काशी में समाज की एक और कड़वी सच्चाई से रू--रू होना पड़ा. दरअसल काशी के कुछ पंड़ितों ने उनके संन्यास का ये कहकर विरोध किया कि ब्राह्मणेतर जातियों को दण्ड धारण करने का अधिकार नहीं है. स्वामी सहजानंद ने इसे चुनौती के तौर पर लिया और विभिन्न मंचों पर शास्त्रार्थ कर ये साबित किया कि भूमिहार भी ब्राह्मण हीं हैं और हर योग्य व्यक्ति संन्यास ग्रहण करने की पात्रता रखता है.बाद के दिनों में ब्रह्मर्षि वंश विस्तर और भूमिहार-ब्राह्मण परिचय जैसे ग्रंथ लिखकर उन्होंने अपनी धारण को सैद्धांतिक जामा पहनाया. वैसे स्वामीजी ने जब बिहार में किसान आंदोलन शुरू किया तो उनके निशाने पर अधिकांश भूमिहार जमींदार हीं थे जो अपने इलाके में किसानों के शोषण का पर्याय बने हुए थे.
महात्मा गांधी के नेतृत्व में शुरू हुआ असहयोग आंदोलन बिहार में गति पकड़ा तो सहजानंद उसके केन्द्र में थे. घूम-घूमकर उन्होंने अंग्रेजी राज के खिलाफ लोगों को खड़ा किया. इस अभियान ने युवा संन्यासी को गांव-देहात की स्थिति को नजदीक से देखने का पर्याप्त अवसर दिया. लोग ये देखकर अचरज में पड़ जाते कि गेरूआ वस्त्रधारी ये कैसा संन्यासी है जो मठ-मंदिरों में तप साधना करने की बजाय दलितों-वंचितों की स्थिति को जानने-समझने में अपनी ऊर्जा खपा रहा है. ये वो समय था जब स्वामी जी भारत को समझ रहे थे. इस क्रम में उन्हें एक अजूबा अनुभव हुआ. स्वामीजी ने देखा कि अंग्रेजी शासन की आड़ में जमींदार गरीब किसानों पर जुल्म ढा रहे हैं. बिहार के गांवों में गरीब लोग अंग्रेजो से नहीं वरन् गोरी सत्ता के इन भूरे दलालों से आतंकित हैं. किसानों की हालत गुलामों से भी बदतर है. युवा संन्यासी का मन एक बार फिर नये संघर्ष की ओर उन्मुख होता है. वे किसानों को लामबंद करने की मुहिम में जुटतें हैं. सन् 1929 में उन्होंने बिहार प्रांतीय किसान सभा की नींव रखी. इस मंच से उन्होंने किसानों की कारुणिक स्थिति को उठाया. जमींदारों के शोषण से मुक्ति दिलाने और जमीन पर रैयतों का मालिकाना हक दिलाने की मुहिम शुरू की. इस रूप में देखें तो भारत के इतिहास में संगठित किसान आंदोलन खड़ा करने और उसका सफल नेतृत्व करने का एक मात्र श्रेय स्वामी सहजानंद सरस्वती को जाता है. कांग्रेस में रहते हुए स्वामीजी ने किसानों को जमींदारों के शोषण और आतंक से मुक्त कराने का अभियान जारी रखा. उनकी बढ़ती सक्रियता से घबड़ाकर अंग्रेजों ने उन्हें जेल में डाल दिया. कारावास के दौरान गांधीजी के कांग्रेसी चेलों की सुविधाभोगी प्रवृति को देखकर स्वामीजी हैरान रह गये. उन्होंने देखा कि जेल में बंद कांग्रेस के कार्यकर्ता और नेता सुविधापूर्वक जीने के लिए कैसे-कैसे हथकंड़े अपना रहे हैं. स्वभाव से हीं विद्रोही स्वामीजी का कांग्रेस से मोहभंग होना शुरू हो गया. जब1934 में बिहार प्रलयंकारी भूकंप से तबाह हुआ तब स्वामीजी ने बढ़-चढ़कर राहत और पुनर्वास के काम में भाग लिया. इस दौरान स्वामीजी ने देखा कि प्राकृतिक आपदा में अपना सबकुछ गंवा चुके किसानों को जमींदारों के लठैत टैक्स देने के लिए प्रताड़ित कर रहे है. उन्होंने तब पटना में कैंप कर रहे महात्मा गांधी से मिलकर किसानों की दशा बतायी और दोहरी मार से मुक्ति दिलाने के लिए प्रयास करने की मांग की. जवाब में गांधीजी ने कहा कि जमींदारों के अधिकांश मैनेजर कांग्रेस के कार्यकर्ता है .वे निश्चित तौर पर गरीबों की मदद करेंगे. गांधीजी ने दरभंगा महाराज से मिलकर भी किसानों के लिए जरूरी अन्न का बंदोबस्त करने के लिए स्वामीजी से कहा. कहते है कि गांधीजी की ऐसी बातें सुनकर स्वामी सहजानंद आग बबूला हो गये और तत्काल वहां से ये कहकर चल दिए कि किसानों का सबसे पड़ा शोषक तो दरभंगा राज हीं है. मैं उससे भीख मांगने कभी नहीं जाऊंगा.इस घटना ने कांग्रेस नेताओं की कार्यशैली से नाराज चल रहे स्वामीजी का गांधीजी से भी पूरी तरह मोहभंग कर दिया.विद्रोही सहजानंद ने एक झटके में हीं चौदह साल पुराना संबंध तोड़ दिया और किसानों को हक दिलाने के लिए संघर्ष को हीं जीवन का लक्ष्य घोषित कर दिया. उन्होंने नारा दिया -कैसे लोगे मालगुजारी,लट्ठ हमारा जिन्दाबाद. बाद में यहीं नारा किसान आंदोलन का सबसे प्रिय नारा बन गया.वे कहते थे ,अधिकार हम लड़ कर लेंगे और जमींदारी का खात्मा करके रहेंगे. उनका ओजस्वी भाषण किसानों पर गहरा असर डालता था. काफी कम समय में किसान आंदोलन पूरे बिहार में फैल गया. स्वामीजी का प्रांतीय किसान सभा संगठन के तौर पर खड़ा होने के बजाए आंदोलन बन गया. इस दौरान किसानों की सैकड़ों रैलियां और सभाएँ हुई. बड़ी संख्या में किसान स्वामीजी को सुनने आते थे. बाद के दिनों में उन्होंने कांग्रेस के समाजवादी नेताओं से हाथ मिलाया. अप्रैल,1936 में कांग्रेस के लखनऊ सम्मेलन में अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना हुई और स्वामी सहजानंद सरस्वती को उसका पहला अध्यक्ष चुना गया. एम जी रंगा, ई एम एस नंबूदरीपाद, पंड़ित कार्यानंद शर्मा, पंडित यमुना कार्यजी,आचार्य नरेन्द्र देव, राहुल सांकृत्यायन, राम मनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण, पंडित यदुनंदन शर्मा, पी. सुन्दरैया और बंकिम मुखर्जी जैसे तब के कई नामी चेहरे किसान सभा से जुड़े थे. सभा ने उसी साल किसान घोषणा पत्र जारी कर जमींदारी प्रथा के समग्र उन्मूलन और किसानों के सभी तरह के कर्ज माफ करने की मांग उठाई. अक्टूबर 1937 में सभा ने लाल झंड़ा को संगठन का निशान घोषित किया.किसानों के हक की लड़ाई बड़े पैमाने पर लड़ी जाने लगी थी. दस्तावेज बताते हैं कि स्वामी सहजानंद के नेतृत्व में किसान रैलियों में जुटने वाली भीड़ कांग्रेस की सभाओं में आने वाली भीड़ से कई गुना ज्यादा होती थी.संगठन की लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 1935 में इसकी सदस्यों की संख्या अस्सी हजार थी जो 1938 में बढ़कर दो लाख पचास हजार हो गयी. शायद यहीं वजह हुआ कि इसके नेताओं की कांग्रेस से दूरियां बढ़ गयी. वैसे बिहार और संयुक्त प्रांत में कांग्रेस सरकार के साथ कई बार इनकी तीखी झड़पें भी हुई. किसान आंदोलन के संचालन के लिए पटना के समीप बिहटा में उन्होंने आश्रम स्थापित किया. वो सीताराम आश्रम आज भी है .
किसान हितों के लिए आजीवन सक्रिय रहे स्वामी सहजानंद ने नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के साथ कई रैलियां की. वे उनके फारवॉड ब्लॉक से भी निकट रहे. सीपीआई भी स्वामीजी को अपना आदर्श मानती रही. आजादी की लड़ाई के दौरान जब उनकी गिरफ्तारी हुई तो नेताजी ने 28 अप्रैलप्रैल को ऑल इंडिया स्वामी सहजानंद डे घोषित कर दिया. बिहार के प्रमुख क्रांतिकारी लोक कवि बाबा नागार्जुन भी स्वामीजी से अति प्रभावित थे. उन्होंने वैचारिक झंझावातों के दौरान बिहटा आश्रम में जाकर स्वामीजी से मार्गदर्शन प्राप्त किया था.
स्वामी सहजानंद संघर्ष के साथ हीं सृजन के भी प्रतीक पुरूष हैं. अपनी अति व्यस्त दिनचर्या के बावजूद उन्होंने कोई दो दर्जन से ज्यादा पुस्तकों की रचना की. सामाजिक व्यवस्था पर जहां उन्होंने भूमिहार ब्राह्मण परिचय, झूठा भय मिथ्या अभिमान, ब्राह्मण कौन,ब्राह्मण समाज की स्थिति जैसी पुस्तकें हिन्दी में लिखी वहीं ब्रह्मर्षि वंश विस्तर और कर्मकलाप नामक दो ग्रंथों का प्रणयन संस्कृत और हिन्दी में किया.उनकी आत्मकथा मेरा जीवन संघर्ष के नाम से प्रकाशित है. आजादी की लड़ाई और किसान आंदोलन के संघर्षों की दास्तान उनकी -किसान सभा के संस्मरण,महारुद्र का महातांडव,जंग और राष्ट्रीय आजादी, अब क्या हो,गया जिले में सवा मास आदि पुस्तकों में दर्ज हैं. उन्होंने गीता ह्रदय नामक भाष्य भी लिखा .
किसानों को शोषण मुक्त करने और जमींदारी प्रथा के खिलाफ लड़ाई लड़ते हुए स्वामी जी 26 जून ,1950 को महाप्रयाण कर गये. उनके जीते जी जमींदारी प्रथा का अंत नहीं हो सका. लेकिन उनके द्वारा प्रज्जवलित ज्योति की लौ आज भी बुझी नहीं है. आजादी मिलने के साथ हीं जमींदारी प्रथा को कानून बनाकर खत्म कर दिया गया. लेकिन प्रकारांतर से देश में किसान आज भी शोषण -दोहन के शिकार बने हुए हैं. कर्ज और भूख से परेशान किसान आत्महत्या कर रहे हैं. आज यदि स्वामीजी होते तो फिर लट्ठ उठाकर देसी हुक्मरानों के खिलाफ संघर्ष का ऐलान कर देते. लेकिन दुर्भाग्य से किसान सभा भी है. उनके नाम पर अनेक संघ और संगठन सक्रिय हैं. लेकिन स्वामीजी जैसा निर्भीक नेता दूर -दूर तक नहीं दिखता. उनके निधन के साथ हीं भारतीय किसान आंदोलन का सूर्य अस्त हो गया. राष्ट्रकवि दिनकर के शब्दों में दलितों का संन्यासी चला गया.
-पुखराज


जय हिंदी जय भारत

शुक्रवार, 12 सितंबर 2008

शक्ति और क्षमा


तुलसीदासजी के रामचरित मानस में रामसेतु निर्माण से पूर्व का प्रसंग है. भगवान राम विभीषण से पूछते हैं कि नाना प्रकार के जीव-जंतुओं से भरे इस विशाल सागर को कैसे पर किया जाए. विभीषण सलाह देते हैं कि सागर(सगर) आपके पूर्व थे, आप उनसे प्रार्थना करें, वे आप पर कृपा रास्ता बतला देंगे. राम सागर की प्रार्थना के लिए तैयार हो गए, लेकिन लक्ष्मण को विभीषण की सलाह अच्छी नहीं लगी. उन्होंने कहा कि कायर ही भगवान-भगवान चिल्लाते है. भगवान राम ने लक्ष्मण को यह कहकर शांत किया कि उचित समय पर ही बल प्रयोग करेंगे और उन्होंने ऐसा ही किया. गोस्वामी तुलसी दास जी ने इस प्रसंग को बहुत ही सुंदर तरीके से रचा. इसके साथ ही, दिनकर जी की रचना का भी उल्लेख करूंगा, जिसमें उन्होंने मानव मात्र को शक्तिसंपन्न होने की बात रही. अंत में यह कहने के लालच से नहीं बच पा रहा हूं कि बचपन ही में मैंने सुंदरकांड सहित अनेकों कविताओं और संस्कृत के दर्जनों श्लोकों को कंठस्थ कर लिया था जो आज भी मुझे ललित और प्रेरक लगते हैं. हालांकि बाद में इनसे नाता टूट गया, फिर भी प्रथम प्रेरणा जीवन को प्रेरित करती रही हैं. सुन कपीस लंकापति वीरा। केहि विधि तरिए जलधि गंभीर।। संकुल मकर उरग झष जाती। अति अगाध दुस्तर सब भांति।। कह लंकेश सुनहु रघुनायक। कोटि सिंधु सोषक तब सायक।। जद्यपि तद्यपि नीति अस गाई। विनय करिए सागर संग जाई।। प्रभु तुम्हार कुल गुरू जलधि, कहिहि उपाय विचारि। बिनु प्रयास सागर तरहिं सकल भालु कपि धारि।। सखा कही तुम नीकि उपाई। करिए देव जो होहिं सहाई।। मंत्र न यह लक्ष्मण मन भावा। राम वचन सुनि अति दुख पावा।। नाथ दैव कर कवन भरोसा सोखिए सिंधु करिए मन रोसा।। कादर मन कहुं एक अधारा। दैव दैव आलसी पुकारा।। सुनत बिहस बोले रघुवीरा। ऐसेहिं करब धरहुं मन धीरा।। अस कहिं प्रभु अनुजहिं समुझाई।। सिंधु समीप गए रघुराई। प्रथम प्रणाम किंह सिरूनाई। बैठे पुनि तट दर्भ डसाई।। विनय मानत जलधि जड़ गए तीन दिन बीत। बोले राम सकोप तब भय बिन होहि न प्रीत।। लक्ष्मन बान सरासन आनू। सोषौं बारिधि बिसिख कृसानु।। सठ सन विनय कुटिल सन प्रीति। सहज कृपण सन सुंदर नीति।। क्रोधहि सम कामहिं हरि कथा।। ऊसर बीज बए फल जथा। अस कहि रघुपति चाप चढावा। यह मत लक्ष्मण कर मन भावा भगवान ने महासागर के किनारे कुश की चटाई लगाकर तीन दिनों तक प्रार्थना की, मगर सिंधु ने कोई जवाब दिया. राम क्रोधित हो उठे. बोले, लक्ष्मण धनुष बाण लाओ. मुर्खों के साथ विनय करना, कुटिल के साथ प्रीति करना, कंजूसों को नीति की बात कहना, क्रोधी से समता की बात करना और कामी स्त्री-पुरूषों के समक्ष हरिकथा कहना उतना ही बेकार है, जितना ऊसर जमीन में बीज बोना. अब राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की शक्ति और क्षमा- क्षमा दया तप त्याग मनोबल सबका लिया सहारा। पर नरव्याघ्र सुयोधन तुमसे कहो कहां कब हारा। क्षमाशील हो रिपु समक्ष तुम विनीत हुए जितना ही। दुष्ट कौरव ने तुमको कायर समझा उतना ही। क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो। उसको क्या जो दंतहीन विषहीन विनीत सरल हो। तीन दिवस तक पंथ मांगते रघुपति रहे सिंधु किनारे। बैठे बैठे छंद को पढ़ते अनुनय के प्यारे प्यारे। उत्तर से जब एक नाद भी उठा नहीं सागर से। उठी अधीर धधक पौरूष की आग राम से शर से। सिंधु देह धर त्राहि-त्राहि करता आ गिरा शरण में। चरण पूजि दासता ग्रहण की बंधा मूढ बंधन में। सच पूछो तो शर में ही बसती दीप्ति विनय की । संधि वचन संपूज्य उसी का जिसमें शक्ति विजय की। सहनशीलता क्षमा दया को तभी पूजता जग है। बल के दर्प चमकता जिसके पीछे जब जगमग है।।
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