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बुधवार, 30 मई 2012

आखिर क्या है अल्पसंख्यक आरक्षण


  लेखक- वेद प्रताप वैदिक

आंध्र के उच्च न्यायालय ने कमाल कर दिया। जाति के आधार पर दिए जा रहे आरक्षण से देश पहले ही बिखर रहा है, अब मजहब के आधार पर भी आरक्षण दिया जाने लगा था। इसी साल पांच राज्यों में चुनाव जीतने की बड़ी चुनौती कांग्रेस के सामने थी। उसने सोचा यदि उसे मुसलमानों के थोकबंद वोट हथियाने हैं तो वह उनके सामने आरक्षण की गाजर लटका दे।


उत्तरप्रदेश में इस हथकंडे के सफल होने की आशा सबसे ज्यादा थी। दिसंबर 2011 में केंद्र सरकार ने घोषणा कर दी कि शिक्षा और सरकारी नौकरियों में मुसलमानों को भी 4.5 प्रतिशत आरक्षण दिया जाएगा। लेकिन मुसलमान जरा भी नहीं फिसले। उन्होंने चुनावों में कांग्रेस को सबक सिखा दिया। अब आंध्र के उच्च न्यायालय ने दोहरी मार लगा दी। सांप्रदायिक आरक्षण को राजनीति और कानून दोनों ने रद्द कर दिया।


अदालत ने सरकार के इस आदेश को चलताऊ बताया है। उसका कहना है कि सरकारी वकील यह नहीं बता सके कि ‘अल्पसंख्यक’ का अर्थ क्या है? क्या ईसाई, बौद्ध, सिख, जैन, यहूदी और पारसी भी अल्पसंख्यक नहीं हैं? यदि अल्पसंख्या का आधार धर्म या मजहब ही है तो मुसलमानों के मुकाबले ये अन्य धर्मावलंबी तो कहीं ज्यादा बड़े अल्पसंख्यक हैं, क्योंकि इनकी संख्या तो बहुत कम है।


हालांकि अदालत ने यह तर्क नहीं दिया है, लेकिन तर्क तो यह भी बनता है कि यदि आरक्षण का आधार अल्पसंख्या है तो जो अत्यल्पसंख्यक हैं, उन्हें भी आरक्षण मिलना चाहिए और ज्यादा मिलना चाहिए। पहले मिलना चाहिए।


सरकारी आदेश में इसके बारे में कोई संकेत नहीं है यानी अदालत की नजर में यह आदेश जारी करते समय सरकार ने लापरवाही बरती है। अदालत की यह आलोचना जरा नरम है। उसे कहना चाहिए था कि सरकार ने लापरवाही नहीं बरती, बल्कि बड़ी चतुराई से थोकबंद वोट खींचने की साजिश की थी।


वास्तव में हमारी अदालतों को चाहिए कि वे ‘अल्पसंख्यक’ शब्द पर ही गंभीर बहस चलाएं। राजनीति में ‘अल्पसंख्यक’ कौन है? वही है, जो खुद हार जाए या जिसका उम्मीदवार हार जाए। हर चुनाव में मतदाताओं का एक हिस्सा बहुसंख्यक सिद्ध होता है और दूसरा अल्पसंख्यक! बहुसंख्या और अल्पसंख्या बदलती रहती है।


लोकतंत्र में कोई भी स्थायी रूप से अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक नहीं हो सकता। भाषा, धर्म, जाति, रंग-रूप में जरूर स्थायी अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक हो सकते हैं, लेकिन उनके नाम पर चलने वाली राजनीति क्या शुद्ध राजनीति होती है? वह भ्रष्ट राजनीति होती है। मुसलमानों के लिए 4.5 प्रतिशत आरक्षण का मकसद भला क्या था? यदि सरकार का तर्क यह है कि उसने मुसलमानों को नहीं, बल्कि मुसलमानों में जो पिछड़े हैं, सिर्फ उन्हें आरक्षण दिया है तो यह तर्क भी बड़ा लचर है। इसके विरुद्ध कई तर्क खड़े हो जाते हैं।


सबसे पहला तर्क तो यह है कि आप कैसे तय करेंगे कि मुसलमानों में पिछड़ा कौन है? यह सिर्फ जातियों के आधार पर ही तय करेंगे यानी आप कानूनी तौर पर यह मानेंगे कि इस्लाम में जातियां होती हैं। यह इस्लाम के सिद्धांतों के विरुद्ध होगा, क्योंकि इस्लाम तो इंसानी बराबरी का धर्म है। इस्लाम पर जातिवाद क्यों थोपा जा रहा है? दूसरा, मुसलमानों में जिन जातियों को आप पिछड़ा मान लेंगे, वे फायदे में रहेंगी और जिन्हें पिछड़ा नहीं मानेंगे, वे नुकसान में रहेंगी। आप धार्मिक आरक्षण के नाम पर अपना उल्लू तो सीधा कर लेंगे, लेकिन मुसलमानों को आपस में लड़वा देंगे।



तीसरा, यदि आप गरीबी के आधार पर पिछड़ापन तय करते हैं तो फिर गरीबों में भी फर्क क्यों डालते हैं? एक गरीब और दूसरे गरीब में फर्क क्या है? क्या गरीब लोग सिर्फ हिंदुओं और मुसलमानों में ही हैं, दूसरे मजहबों में नहीं हैं? सिर्फ मजहबों की ही बात नहीं है। यह बात जाति पर भी लागू होती है। कोई किसी भी जाति का हो, यदि वह गरीब है तो उसे आरक्षण क्यों नहीं मिलना चाहिए? किसी भी जाति या मजहब के अमीर व शक्तिशाली व्यक्ति को आरक्षण देना सामाजिक न्याय नहीं, सामाजिक अन्याय है।


चौथा, अनेक मुस्लिम संगठनों ने मांग की थी कि आरक्षण देना है तो सभी मुसलमानों को दें ताकि आरक्षित पदों को भरने वाले उपयुक्त लोग तो मिल सकें, क्योंकि आरक्षितों में उन पदों पर पहुंचने की इच्छा, जरूरत और न्यूनतम योग्यता भी तो होनी चाहिए। पांचवां, यह आरक्षण मुसलमानों को स्वतंत्र रूप से नहीं दिया गया था।


यह पिछड़ों के 27 प्रतिशत के कोटे में से काटकर दिया गया था। यानी गांव-गांव में रहने वाले हिंदू पिछड़ों और मुस्लिम पिछड़ों में तलवारें खिंचतीं, उनमें वैमनस्य फैलता। इसका एक नतीजा यह भी हुआ कि कांग्रेस ने हिंदुओं और मुसलमानों दोनों के वोट खोए। आंध्र की अदालत ने दो-टूक फैसला देकर भारत के सांप्रदायिक सद्भाव को सबल बनाया है। छठा, अदालत ने इस सरकारी आदेश को असंवैधानिक करार दिया है, क्योंकि इसका आधार मजहब था। यह कानूनी दृष्टि है, लेकिन राजनीतिक दृष्टि से देखें तो मजहबी आरक्षण आगे जाकर पता नहीं कितने और कैसे-कैसे ‘नए पाकिस्तानों’ को खड़ा कर देगा, क्योंकि हमारे यहां तो संप्रदायों के अंदर भी अनेक उप-संप्रदाय होते हैं।


इस फैसले के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय में अपील करने के बजाय भारत सरकार को चाहिए कि वह मजहब के अलावा जाति के आधार पर दिए जाने वाले आरक्षण पर भी पुनर्विचार करे और यह भी सोचे कि आरक्षण सिर्फ शिक्षा में दिया जाए और नौकरी में बिल्कुल भी नहीं। यदि आरक्षण सिर्फ शिक्षा में दिया जाए तो देश के 80 करोड़ गरीबों की जिंदगी में नया उजाला पैदा हो जाएगा।




वे जो भी पद पाएंगे, वह किसी की कृपा से नहीं, बल्कि अपनी योग्यता से पाएंगे। उनके आरक्षण का आधार उनकी जरूरत होगी, उनकी जाति नहीं। वे लोग अपने पद पर पहुंचकर सिर्फ अपनी जाति नहीं, पूरे देश की सेवा करेंगे। भारत सबल बनेगा।

बुधवार, 31 मार्च 2010

नरेंद्र मोदी ने 28-02-2002 को भाषण दिया, दूरदर्शन पर प्रसारित हुआ, इसके बावजूद हमारी छद्म-सेक्युलर सरकार और मीडिया को मोदी का बयान चाहिए

27-02-08 को गोधरा में 58 कारसेवकों को ट्रेन में जलाकर मार दिया गया. 28-02-2002 को गुजरात के मुख्यमंत्री ने प्रदेशवासियों के नाम गुजराती में संदेश दिया था, जिसका अंग्रेजी और उसका हिंदी अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूं--
अंग्रेजी संस्करण(नरेंद्र मोदी की अपील) हिंदी अनुवाद


YESTERDAY, IN GODHRA INHUMAN TRAGEDY HAS taken placem, more than 40 female and children were burnt alive and 18 males were also burnt alive. in all 58 people were mercilessly massacred in a single rail bogie by cannibals. I the history of mankind such a heinous crime can bring tears in the eyes of even the strongest of a person. The heinous crime, an act of cowardness and inhumanity has taken place in Gujrat, can’t be justified by any human society. A crime that can never be forgiven. I want to assure the people of Gujrat that anything like will never be tolerated. The culprit will be punished appropriately for the crime they have committed, not only that an example will be set so that in future, no will be ever dream to commit such a heinous act. The government of Gujrat is committed to the protection of its citizen. For the people who take the law in their hands and destroy the lives of innocent people, there is no place for the act in the civilized society.

I share the grief of the people of gujrat. This is very painful moment and can’t be defiened. But the same time, but creating disturbances, indiscipline and venting anger is not the solution. Opposing the law and defying it witho riot and act of anger, I undersatnd your feeling, but I pray you that the need of the hour is to maintain peace and self-discipline. Those who have perpetrated the crime, we are strongly committed to punish them. No one will escape the law. Can you not help in saving our state Gujrat, the peace and harmony. The government of Gujrat appeals to you for help, for peace and discipline. In the midst of your anger it is my humble request that in such testing times Gujrat expects from you, what it is best known for, maintaing peace and harmony in the most enduring times for which there are many examples.

Let us strengthen the hands of the law, let us creat a atmosphere that will ensure the most harsh punishment to the culprits of the heinuous crime and I am sure that my solmn appeal will touch your hearts. Let me assure that everyone in the goverment equally feels the shock and pain experienced by you. The level of pain is the same for all. Even the prime minister is disturbed by every development with regards to the incidents, so that the home minister of India. and the entire country has expressed solidarity with the grief of Gujrat, but it is our responsibility to maitain the peace, harmony and discipline.

We understan you anger and pain, but still for the betterment of Gujrat. For a Gujrat whose future does not get lost. For a Gujrat that does not have to carry the burden of a black moment in the history, maintain peace and harmony.

I also want to express my gratitude to you, that in the midst of so much anger of the 1800 villeges of Gujrat, only a few handfuls have expressed disturbances. More and less there has an atmosphere of peace, however the development that have taken place in the cities of the Gujrat is disturbing and it is my request, tit for tat is not a resolution. I am not here you give advice or sermons, but I can see the bright future of Gujrat and for that, I have came to seek your help.

Come forward and help the government in process of maintaining peace. GOVERMENT SEEKS YOUR HELP in creating the right atmosphere for this to happen. It is my faith that people of Gujrat will respond to my feeling and together we shall work to ensure peaceful Gujrat, that the innocent donot suffer or loose lives in our reponsibility. Come, let us together work toward establishing peace. Once agin, let me assure you that I fully understand your pain and grief, however, let us together strengthen law so as to get the highest possibe punishment to the perpetrators and set a historical example.

Once again I appeal to the people of Gujrat for peace. let us take the pathe of peace and bring to life the mantra of jai jai Gujrat.

Thank you.



बुधवार, 20 जनवरी 2010

मत थूकिए मानवाधिकारवादियों पर

मेरे एक मित्र बहुत ही खिन्न थे. उनका मन थूकने को कर रहा था. आप कहेंगे, थूकने का मन कर रहा तो क्या परेशानी है, अपने देश में जहां तहां थूकने पर तो प्रतिबंध नहीं है. लेकिन उनका मन जहां थूकने को कर रहा था, मैं वहां थूकने की इजाजत उन्हें कभी नहीं दे सकता. आखिर मेरी भी मजबूरी है. इस पोस्ट को पढ़िये फिर पता चल जाएगा मैं उन्हें थूकने की अनुमति क्यों नहीं देता हूं.
आज कश्मीरी पंडितों के लिए पलायन दिवस है. 1990 में आज ही के दिन से कश्मीरी पंडित छोड़कर देश के विभिन्न भागों में भागना शुरू किया था. बीस साल हो गए कश्मीरी पंडित अपने ही देश में शरणार्थियों की जिंदगी जी रहे हैं. उनकी जिंदगी बद से बदतर हो रही है. उनके बच्चों को शिक्षा और रोजगार नहीं है. नई पीढ़ी का भविष्य क्या होगा आसानी से समझा जाता है. बात साल दो साल की नहीं है, बीस सालों से ये लोग शरणार्थी की जिंदगी जीने को मजबूर हैं. इनका क्या कसूर है? इनका कसूर सिर्फ इतना है कि ये मुस्लिम बहुल राज्य जम्मू-कश्मीर में हिंदू थे. देश में अल्पसंख्यकों के लिए योजनाएं बन रही हैं. सच्चर कमिटी बनाई गई. रंगनाथ मिश्रा समिति ने मुसलमानों को आरक्षण की भी सिफारिश कर दी.
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लेकिन इन अभागे कश्मीरी पंडितों को अपने ही घरों में नहीं रहने दिया जा रहा है. अपने देश में मानवाधिकारों के लिए लड़ने वाले संगठनों की कमी नहीं है. लेकिन आज तक कहीं भी किसी भी मानवाधिकार संगठन को कश्मीरी पंडितों के मानवाधिकार के लिए संघर्ष करते नहीं देखा गया है. एक भी मानवाधिकार कार्यकर्ता कश्मीरी पंडित के पक्ष में नहीं है. उसके दुख-दर्द को सुनने वाला नहीं है. सरकारों की नाकामी का आलम ये कि बीस सालों से कोई इनकी सुधि लेने वाला नहीं है.
जब कभी ये अपनी आवाज उठाते हैं इन्हें सांप्रदायिक कहा जाता है. देश के मानवाधिकारवादी अल्पसंख्यकों की रक्षा के नाम पर तमाम तरह की लड़ाई लड़ते हैं, नारे लगाते हैं, मीडिया में प्रभाव जमाकर सरकार, प्रशासन और न्यायपालिका पर दबाव बनाते हैं. हमारे देश के मानवाधिकारवादियों की यही चाल, चरित्र और चेहरा है.
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1989 और 1990 में घाटी में कश्मीरी पंडितों को निशाना बनाकर आतंकवादी हमले किए गए. आतंकियों के आगे सरकार असहाय थी. यही कारण थे कि कश्मीरी पंडितों को घाटी छोड़कर भागना पड़ा. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक पिछली सदी के अंत तक कश्मीर में छह प्रतिशत हिंदू थे. जो 2006 में घटकर मात्र 0.1 प्रतिशत रह गए. इस्लामिक आतंकवाद में जिस तरह कश्मीरी पंडितों को निशाना बनाया गया उसमें करीब चार लाख कश्मीर पंडितों को या तो घाटी छोड़कर भागना पड़ा या उनकी हत्या कर दी गई. अमेरिकी कांग्रेस में 2006 में पारित एक प्रस्ताव में इस घटना को जातीय निर्मूलीकरण नाम देकर इसकी निंदा की गई. 2009 में भी ओरेगन विधानसभा में एक प्रस्ताव पारित हुआ जिसमें जम्मू-कस्मीर में इस्लामिक राज्य की स्थापना के लिए जातीय निर्मूलीकरण की संज्ञा दी गई. पिछले साल भी आतंकवादियों ने कश्मीरी पंडितों को धमकी दी.
भारत की धर्मनिरपेक्षता को लेकर सीना ऊंचा करने वालों के मुंह तमाचा है यह इस्लामी राज्य. उन मानवाधिकारवादियों के मुंह पर भी जो देश को इस्लामिक गणराज्य बनाने के लिए दिनरात मिहनत करते हैं.
(सभी चित्र साभार- आपत्ति होने पर सूचित करें.)

सोमवार, 20 अक्टूबर 2008

एक मुसलमान सौ बेईमान


सबसे पहले, दो घटनाओं का जिक्र करना चाहूंगा. पहली, कांग्रेस के मुस्लिम नेताओं ने शनिवार को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाकात कर उन्हें जामियानगर के बाटला हाउस मुठभेड़ कांड को लेकर अल्पसंख्यक समुदाय में उठ रही शंकाओं से अवगत कराया और इसे दूर करने के लिए तत्काल प्रभावी कदम उठाए जाने की मांग की. इस प्रतिनिधिमंडल में कांग्रेस महासचिव मोहसिना किदवई, पूर्व केंद्रीय मंत्री सी के जाफर शरीफ, सलमान खुर्शीद, राज्यसभा के उपसभापति के रहमान खान, अल्पसंख्यक विभाग के अध्यक्ष इमरान किदवई और अनीस दुर्रानी शामिल थे.

दूसरी घटना, देवबंद विचारधारा के संगठन जमीयत उलेमा--हिंद के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि शिवराज पाटिल के गृहमंत्री पद पर रहते दहशतगर्दी का खात्मा नामुमकिन है. मदनी ने केंद्र सरकार कटघरे में खड़ा करते हुए कहा कि आतंकवादी वारदातों के लिए गृहमंत्री मुसलमानों को कसूरवार मान रहे हैं. मदनी का यह तर्क गृहमंत्रालय के उस बयान पर आया है जिसमें मंत्रालय बार-बार दोहराता रहा है कि आतंकी वारदातों के पीछे अयोध्या में विवादित ढांचा तोड़े जाने और 2002 का गुजरात दंगा है.


योग्यता विस्तार- पहली घटना. दिल्ली बम धमाकों के बाद मीडिया ने टेप रिकॉर्डर छाप गृहमंत्री को पहले उनके बयानों, फिर उनके मॉडलिंग स्टाईल को लेकर खूब हंगामा किया. की मुखरता ने लामीडियालू जैसे सिमी समर्थकों की, कुछ देर के लिए ही सही, जुबान बंद करा दी. लालू आनन-फानन में प्रधानमंत्री के पास गए और गृहमंत्री की जमकर शिकायतें की. बाद में वे सोनिया से मिले. लेकिन सोनिया की विनम्रता भरी फटकार ने लालू को बयान बदलने के लिए मजबूर कर दिया. लालू, सोनिया के विनम्र फटकार पर निरुत्तर हो गए कि एक तरफ तो आप सिमी जैसे संगठनों के पक्ष में सार्वजनिक बयान देते हैं और जब बम विस्फोट होता है तो आप गृहमंत्री और खुफिया विभाग के ऊपर नाराजगी जताते हैं, ऐसा बिल्किल नहीं चलेगा.

सिमी पर साल 2006 में प्रतिबंध लगा था, तब तक लेकर हाल के दिनों तक केंद्र सरकार उसके विरूद्ध पर्याप्त सबूत कोर्ट में पेश नहीं कर सकी. इसलिए दिल्ली हाईकोर्ट के विशेष न्यायाधिकरण ने सबूतों के अभाव में सिमी पर से प्रतिबंध हटाने का निर्देश दिया.

इसके बाद, लालू, मुलायम और रामविलास पासवान के पर निकल आए. सबने सिमी के समर्थन में जोर-जोर से चिल्लाना शुरू कर दिया. उनका कहना था कि सिमी पर प्रतिबंध लगाया जाता है तो बजरंग दल, दुर्गावाहिनी और विश्व हिंदू परिषद पर भी प्रतिबंध लगे.

केंद्र सरकार ने अपने ही सहयोगियों के इस गैर-जिम्मेदाराना हरकत पर कुछ नहीं कहा, लेकिन वो तुरंत सुप्रीमकोर्ट पहुंचकर न्यायाधिकरण के आदेश पर रोक लगाने की अपील की और कोर्ट ने उसकी बात मान भी ली. बाद में केंद्र ने हाल के दिनों में हुए बम धमाकों में सिमी के हाथ होने का सबूत कोर्ट में पेश किया. फिलहाल सिमी पर प्रतिबंध जारी है. लेकिन लालू, मुलायम और रामविलास पासवान के बयान ने खुद केंद्र सरकार को कटघरे में ला खड़ा किया.

हाल के दिनों में अहमदाबाद, बैंगलोर और दिल्ली में बम धमाके हुए. केंद्रीय गृहमंत्री शिवराज पाटील के नरम रवैये पर सवाल उठे तो लालू यहां भी शामिल हो गए और सोनिया से फटकार सुनी.

बाटला हाउस मुठभेड़ पर पहले अमर सिंह, फिर ममता बनर्जी, फिर कांग्रेसी के मुस्लिम नेताओं ने सवाल उठाए और मामले की जांच की मांग की. इस मांग में रामविलास पासवान, सीपीएम महासचिव प्रकाश करात और सीपीआई महासचिव ए बी बर्धन शामिल हो गए.

सब का एक स्वर से कहना था कि निर्दोष मुसलमानों को निशाना बनाया गया. मुठभेड़ फर्जी थी. अमर सिंह ने तो यहां तक कह दिया कि शहीद एमसी शर्मा को स्पेशल सेल से निलंबित कर दिया गया था और वह बहाली के लिए दफ्तरों का चक्कर काट रहा है. अमर सिंह ने तो बेशर्मी की हद करते हुए कहा कि किसी पुलिस वाले ने ही उसे गोली मारी थी.

इतनी बेह्याई, इतनी निर्लज्जता, महज चंद वोटों के लिए.

महज चंद वोटो के लिए, पूरे मुस्लिम समाज को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की जा रही है. महज चंद वोटों के लिए ये लोग देश के साथ गद्दारी कर रहे हैं.

जब कभी आतंकवाद से लड़ने की बात आती है, आतंकवाद से लड़ने के लिए कानून बनाने की बात आती है, तो कहते हैं कि इस कानून का दुरूपयोग होगा. साफ-साफ कहते हैं कि अल्पसंख्यकों को परेशान किया जाएगा.

देश में किस चीज का दुरूपयोग नहीं होता है. विधायिका, न्यायिका, कार्यपालिका सबका दुरूपयोग होता है. पुलिस, जज, नेता खरीदे जाते है और बिकते हैं. तो क्या संसद, विधानसभाओं, अदालतों, पुलिस मुख्यालयों को भंग कर दिया जाय.

एक समुदाय जिसे कभी राष्ट्र की मुख्यधारा में एक साजिश के तहत शामिल नहीं होने दिया गया, कभी शाहबानो तो कभी अफजल के नाम पर मुसलमानों को ठगा जाता रहा है.

इनका वोट हासिल करने के लिए सभी राष्ट्र के साथ गद्दारी में जुटे हैं.

गुरुवार, 16 अक्टूबर 2008

पोप का पाप- जलता हिंदुस्तान

मूल लेखक- एल आर फ्रांसिस, अध्यक्ष, पुअर क्रिश्चियन लिबरेशन फ्रंट (francispclm@yahoo.com)
साभार- विस्फोट

चर्च पर हिन्दू चरमपंथियों द्वारा हमला तो खबर बनती है लेकिन यह खबर कभी क्यों नहीं बनती कि चर्च के अंदर कितना शोषण, अत्याचार और दमन हो रहा है. चर्च संगठन अपने ही कर्मचारियों का शोषण करते हैं, नन्स और पादरी की संदेहास्पद हत्याओं के मामले भी प्रकाश में आये हैं, जिनमें चर्च प्रशासन से जुड़े लोग ही शामिल पाये गये हैं, फिर भी हमारा प्रबुद्ध समाज चर्च संगठनों के बीच फैली इन कुरीतियों के बारे में कभी अपनी जबान नहीं खोलता.

पिछले दिनों चर्चों से जुड़ी ऐसी कई घटनांए सामने आई हैं जिन्हें साप्रदायिकता की श्रेणी में रखा जा रहा है। अभी हाल ही में रतलाम (मध्य प्रदेश) की रेलवे कंलोनी में स्थित 85 वर्ष पुराने चर्च में आग लगा दी गई। इस घटना को सीधे हिन्दु संगठनों से जोड़ा गया। मामला तुंरत अतंराष्ट्रीय स्तर तक पंहुचाया गया। चर्च अधिकारियों और उनके विदेशी आकाओं की भकुटियां तन गई। बाद में पता चला कि उक्त घटना की तह में था उसी चर्च का चौकीदार था- नोयल पारे. नोयल पारे ने आक्रोशवश ही चर्च में आग लगाई थी।

चर्च की 86वीं वशZगांठ मनाई जाने वाली थी। बड़े समारोह की तैयारियॉ थी। किंतु उस चर्च के चौकीदार पर आठ हजार का कर्ज था। कर्ज था बनियों का। जिनसे वह पेट भरने के लिये जरुरी नून-तेल उधार लेता था। चर्च प्रशासन उसे मात्र 1000 रुपए मासिक वेतन देता था। कितना बड़ा अंतर है सरकारी नियमों में न्यूनतम मजदूरी को लेकर और चर्च प्रषासन द्वारा दी जाने वाली मजदूरी के बीच. देश की राजधानी दिल्ली में ही चर्च द्वारा चलाये जाने वाले अधिक्तर संस्थानों में भी ऐसा ही हाल है, सरकारी आदेश पोप पोषित धर्मराज्य के प्रशासकों के ठेंगे पर होते है। चर्च का गुलाम कर्मचारी 24 घंटे काम करके एक हजार रुपए महीना अर्थात 33 रुपए प्रतिदिन, ऐसी स्थिति में -क्रिया की प्रतिक्रिया - शोषण का परिणाम आक्रोश तो होगा ही. आक्रोशवश ऐसा कर्मचारी कुछ भी कर सकता है। हत्या या आत्महत्या या फिर तोड़फोड़ मारपीट अगजनी इत्यादि या चोरी चकारी, लूटपाट कुछ भी।

कुछ वर्ष पूर्व मध्य प्रदेश के ही झाबुआ में कान्वेंट की ननों (धर्म-बहनों) पर सामूहिक हमला व बलात्कार का मामला भी खूब उछाला गया। लेकिन उस समय भी बात वहीं थी बंदर की बला तबेले के सिर. हिन्दू संगठन ही बदनाम किये गये। इस मामले में भी झाबुआ के धर्मांतरित ईसाइयों का आक्रोश ही था। मलयाली-दक्षिण भारतीय ननें बनाम आदिवासी ईसाई. यहां रतलाम में चर्च जलाने की जिस घटना का जिक्र किया जा रहा है उसके मूल में भी मलयाली चर्च प्रशासन पादरी जोस मैथ्यू (मलयाली) बनाम नोयल पारे (स्थानीय मराठी मूल का आदिवासी) है. हाल ही में बिजनौर -उतर प्रदेश की एक स्थानीय अदालत ने `संत मेरी स्कूल´ की नन प्रमिला की 5 नवंबर 2007 को हुई हत्या के मामले में स्कूल के चौकीदार जॉन को उम्रकैद की सजा सुनाई है। कुछ दिन पूर्व उतराखंड के रामपुर में एक कैथोलिक पादरी एवं उसकी नौकरानी की हत्या के मामले में भी उक्त आश्रम से जुड़े कुछ लोग पकड़े गये है। आजकल उड़ीसा में एक नन के साथ हुये बलात्कार का मामला राष्ट्रीय एवं अतंरराष्ट्रीय समाचार पत्रों में छाया हुआ है.उड़ीसा पुलिस ने संदेह के आधार पर चार लोगों को हिरासत में लिया है. पीड़ित नन चर्च अधिकारियों के संरक्षण में अज्ञातवास में चली गई है. चर्च अधिकारियों के मुताबिक पीड़िता को सही समय पर सामने लाया जायेगा। किसी भी महिला के साथ बलात्कार एक घिनौना अपराध है. बलात्कारी शरीर ही नहीं पीड़िता की आत्मा की भी हत्या कर देता है. ऐसा अपराधी कोई भी हो उसे क्षमा नहीं किया जाना चाहिए परन्तु उड़ीसा मामले को लेकर कुछ चर्च अधिकारियों पर ही अगुंली उठ रही है. ऐसे में यह जरूरी है कि सच लोगों के सामने लाया जाना चाहिए।


मलयाली मूल और मंगलूर - कर्नाटक -गोवा पुर्तगाली मूल के धर्माचार्यों द्वारा भारत के ईसाई चर्च एवं अन्य संस्थान संचालित हो रहे है। भारत की स्वतंत्रता के बाद जब विदेशी मिशनरी अपने मूल देशों की और लौटे तो भारत की ईसाई संपदा चल और अचल पूंजी पर इन्हीं दक्षिण भारतीय पादरियों -बिशपों का एकाधिकार हो गया जो आज तक बना हुआ है। शेष ईसाई तो मात्र शासित और शोषित रुप में चर्च के सदस्य है.यहीं नहीं उड़ीसा में जो हो रहा है उसमें भी मलयाली मिशनरियों का बड़ा हाथ है। कटक के आर्च बिशप राइट रेव्हण रिफेल चीनथ भी मलयाली ही है। वहां इनकी गलतियों की सजा गरीब एवं सीधे साधे धर्मांतरित वंचितों को मिली। छल, फरेब, धोखाधड़ी के बलबूते अपने साम्राज्य का विस्तार करते `पोप पोषित´ यह मिशनरी हिन्दू दलितों को मतांतरित करने के बाद भी सरकारी दस्तावेजों में हिन्दू रहने के लिए प्रेरित करते है, ताकि वह इन से नहीं सरकार से अपने अधिकारों के लिए लड़ते रहे और इनकी धर्मांतरण की दुकान बिना किसी रोक-टोक के चलती रहे।

इन्हें वंचितों एवं आदिवासियों के प्रति कितनी सहनाभूति है यह उड़ीसा के कंधमाल और कर्नाटक में हुए कुछ चर्चों पर हमलों के दौरान विरोध करने के तरीके से भी समझा जा सकता है। जहां उड़ीसा के मामले में कैथोलिक चर्च अधिकारी एक औपचारिकता निभाते दिखाई दिये वहीं मंगलूर में हुई घटनाओं के बाद उन्होंने आसमान सिर पर उठा लिया। अंग्रेंजी अखबारों में दो-दो पेज तक की खबरे आनी शुरू हुई। चर्च अधिकारी और उनके राजनीतिक समर्थक ऐसे सक्रिय हुए मानों कर्नाटक में `ईसाइयत´ समाप्त होने को हो। चर्च अधिकारियों की सक्रियता और उग्र तेवरों को देखते हुए कर्नाटक के मुख्यमंत्री तुरंत मंगलूर डायसिस के बिषप के यहां सफाई देने वैसे ही पुहचें जैसे राजग के शासनकाल में केन्द्र सरकार अपनी सफाई देती थी। मंगलूर की घटनाओं के बाद चर्च अधिकारियों का उग्र होना स्भाविक था क्योंकि एक तरह से वह चर्च का मिनी वैटिकन जो ठहरा। यदि मराठियों,असामियों, बगालियों, पंजाबियों आदि को अपने अस्तित्व की चिन्ता सता सकती है तो उड़ीसा के मूल निवासियों को भी अपने अस्तित्व की रक्षा की चिन्ता होना स्भाविक है।

मलयाली मूल और मंगलूर - कर्नाटक -गोवा पुर्तगाली मूल के धर्माचार्यों द्वारा भारत के ईसाई चर्च एवं अन्य संस्थान संचालित हो रहे है। भारत की स्वतंत्रता के बाद जब विदेशी मिशनरी अपने मूल देशों की और लौटे तो भारत की ईसाई संपदा चल और अचल पूंजी पर इन्हीं दक्षिण भारतीय पादरियों -बिशपों का एकाधिकार हो गया जो आज तक बना हुआ है। शेष ईसाई तो मात्र शासित और शोषित रुप में चर्च के सदस्य है। यह दक्षिण भारतीय पादरी - बिशप विदेशी मिशनरियों द्वारा छोड़ी गई अकूत सम्पति को अपने हाथ से निकलने न देने की फिराक में नित नयें हथकंडे अपनाते रहते है। यहां एक तथ्य और भी उल्लेखनीय है कि वास्कोडिगामा द्वारा छोड़े गये पुर्तगाली मूल के मिशनरियों के वंशज अब भी मंगलोरियन -गोअन - के रुप में उपस्थित है। उतर प्रदेश के नौ कैथोलिक डायसिसों आगरा, मेरठ, झॉसी, बिजनौर, इलाहाबाद, लखनाऊ, बनारस, गोरखपुर, बरेली - के बिशपों में से छ: बिशप पुर्तगाली मूल के है - शेष मलयाली (केरल) के है। अभी कुछ माह पूर्व केरल के आर्च बिशप ने केरल के ईसाइयों के नाम एक परिपत्र (फतवा) जारी किया था ``यह कि प्रत्येक दम्पती को चाहिये कि वे `अधिक से अधिक´ संतान उत्पन्न करें. आशय यही था कि चर्च संपदा को हथियाये रखने के लिए केरल के कर्णधारों की अवश्यकता है।

चर्च अधिकारी आज विभिन्न तरीकों से अथाह दौलत कमा रहे हैं. उनका पूरा व्यावसाय इस देश के करोड़ों वंचितों के नाम पर चल रहा है। भारत सरकार का वार्षिक बजट तो आय-व्याय के साथ घाटे के बजट के रुप में जुड़ा होता है मगर इनके घाटे का तो सवाल ही नहीं और साथ ही धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों के हित्तों की रक्षा का भार भारत की सरकार पर जिसके तहत इटली की सरकार और वैटिकन भारत के राजदूत को बुलाकर डांट लगाती है। यहीं कारण है कि चर्च अधिकारियों द्वारा शोषित आम ईसाई अनाथ सा विक्षिप्तावस्था में जा पहुंचा है जिसका भविष्य आक्रोश और विरोध की नींव पर खड़ा है.

नोट- ब्लॉग संचालक ने एक भी शब्द अपनी ओर से नहीं जोड़ा है.

सोमवार, 8 सितंबर 2008

कंधमाल हिंसा के लिए ईसाई मिशनरियां जिम्मेदार

कंधमाल में स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की नृशंसतापूर्वक हत्या के बाद हिंसा भड़की. निस्संदेह इस हिंसा में दर्जनों निर्दोषों को भी कीमत चुकानी पड़ी. मगर यह हिंसा क्यों भड़की, इस पर लीपा-पोती करने और तुष्टिकरण की नीति अपनाने से ज्यादा जरूरी है कि मसले पर गंभीरता पूर्वक विचार हो.

यह पहलीबार नहीं था जब कि स्वामी जी पर हमले हुए हों, अंतिमबार हुए हमले से पहले स्वामी पर आठ हमले और हुए थे, आठवां हमला आठ माह पहले हुआ था, जिसमें स्वामी से बाल-बाल बच गए. इस हमले के बाद कंधमाल में व्यापक हिंसा भड़क उठी थी. उस हिंसा की आग शांत हुई नहीं कि एकबार फिर स्वामीजी पर हमला हुआ और अंतिमरूप से उनकी हत्या कर दी गई. सरकार ने आनन-फानन में कह दिया कि ये हत्या माओवादी नक्सलियों ने की है. मामले की जांच किए बगैर.

स्वामीजी कंधमाल के आदिवासी बहुल क्षेत्र में शिक्षा और आदिवासियों के समग्र उत्थान की दिशा में कार्य कर रहे थे. स्वामीजी का ये कार्य ईसाई मिशनरियों को अच्छा नहीं लग रहा था. वे मिशनरियों की आंखों की किरकिरी बने हुए थे और मिशनरियां उन्हें अपने रास्ते से हटाना चाहती थी और आखिरकार हटाकर ही दम लिया.

वैसे ईसाई मिशनरियों का दंभ होता है कि वे निस्वार्थ समाज सेवा का काम कर रहे हैं, वे पिछड़े इलाकों में स्कूल, अस्पताल और सामुदायिक विकास केंद्रों का निर्माण करते हैं. मगर समाज सेवा की आड़ में ईसाई मिशनरियां व्यापक तौर पर धर्म परिवर्तन के काम में जुटी हुई हैं.

कंधमाल की ही बात करें तो छह लाख की आबादी वाले कंधमाल में एक लाख से भी ज्यादा ईसाई हैं. इनमें से करीब सत्तर हजार लोग अनुसूचित जाति से धर्मपरिवर्तन कराके ईसाई बनाए गए हैं. ईसाई मिशनरियों का अक्सर दावा होता है कि प्रभु ईशु मसीह तुमसे बहुत प्यार करते हैं, तुम्हें गले लगाना चाहता हैं. तुम्हारे सभी कष्टों और पीड़ाओं को खत्म कर देना चाहते हैं. तुम्हें गरीबी, बेकारी से छुटकारा दिलाना चाहते हैं. सच बात तो ये है कि भगवान राम की तरह स्वयं प्रभु ईशु मसीह ने भी अपने जीवन में अनेक दुख झेले, कष्टों का सामना किया, अंत में तो उन्हें सूली पर चढ़ा दी. वे स्वयं नियति प्रदत्त कष्टों से नहीं बच सके तो वे दूसरों का कष्ट कहां से हर लेंगे. यही वजह है कि ये धर्मांतरित ईसाई, मिशनरियों के लाख दावे के बाद भी गरीब हैं, ये गरीब अनपढ़ ईसाई, अनुसूचित जनजाति के तहत आरक्षण चाहते हैं. कंधमाल के कोंध(अनुसूचित जनजातियों) का मानना है कि उन्हें आरक्षण नहीं दी जा सकती है. संविधान के मुताबिक भी, अनुसूचित जाति(एससी) के जिन लोगों ने धर्मांतरण कर लिया है उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं दिया जा सकता है. कोंध जाति(एसटी) और धर्मांतरित ईसाईयों(पन्ना-एससी) के बीच इसी बात का झगड़ा है.

आरएसएस जैसी संस्थाओं पर अक्सर ये आरोप लगता रहा है कि वे धर्मांतरण तो रोकना चाहते हैं, लेकिन आदिवासियों के उत्थान और उसकी समस्याओं को सुलझाने के लिए उन्होंने कुछ भी नहीं कर रहे है. इसी आरोप के जवाब में आरएसएस की अनुषंगी संस्थाओं ने आदिवासी और पिछड़े इलाकों में व्यापक विकास के काम शुरू किए. मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, झारखंड के आदिवासी इलाकों में संघ के स्कूल, अस्पताल चलाए जा रहे हैं ताकि धर्म परिवर्तन को रोका जा सके. आरएसएस का काम ईसाई मिशनरियों के धर्म-परिवर्तन की राह में रोड़ा साबित हो रहा है, इसलिए वे इन्हें खत्म कर देना चाहते हैं.

उड़ीसा के कंधमाल में स्वामी लक्ष्मणानंद की हत्या इसी बात का उदाहरण है. जस्टिस एंड ट्रायल नामक स्वयंसेवी संगठन ने भी कंधमाल हिंसा के लिए ईसाई मिशनरियों को जिम्मेदार ठहराया. संगठन के अध्यक्ष और पूर्व महाधिवक्ता सरदार जीएस गिल ने एक संवाददाता सम्मेलन में कहा कि धर्म परिवर्तन निरोधक कानून के बावजूद ईसाई मिशनरियां भोले-भाले आदिवासियों का धर्म परिवर्तन करवा रही है, जिससे समय-समय पर तनाव पैदा होता रहता है. मामले की जांच के बाद संगठन के अध्यक्ष ने कहा कि लक्ष्मणानंद सरस्वती पर ईसाई मिशनरियों ने आठ बार हमले कराये और नौवे बार में स्वामी जी की मौत हो गई. समिति ने साफ साफ कहा कि इस बात की कोई ठोस वजह नहीं है कि माओवादियों स्वामी जी की हत्या कर दे. समिति ने ये भी कहा कि क्या ईसाई मिशनरियों ने माओवादियों से उनकी हत्या करायी है, इस बात की भी जांच कराई जानी चाहिए.

राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन के प्रवर्तक और प्रख्यात राष्ट्रवादी चिंतक के एन गोविंदाचार्य ने कंधमाल हिंसा के लिए सरकारों की तुष्टिकरण की नीति को जिम्मेदार ठहराया. उन्होंने कहा कि बार-बार की धमकी के बावजूद सरकार स्वामी जी जैसे महत्वपूर्ण व्यक्ति को सुरक्षा मुहैया कराने में नाकायाब रही है और उनकी हत्या के बाद उसे माओवादी का कारनामा करार दे रही है, जो अनुचित है.
देशभर में चल रहे मिशनरी की स्कूलों पर भी सवाल उठ रहा है. कंधमाल की हिंसा के विरोध ईसाई मिशनरी स्कूलों ने बंद की घोषणा कर दी. साफ है कि ईसाई मिशनरियां मुफ्त में शिक्षा नहीं देती. अंग्रेजी शिक्षा के नाम पर भारी लूट-खरोट मचाए हुए है. इसके बावजूद वो स्कूलों में ईसाई धर्म की शिक्षा देती है. ईसाई धर्म से संबंधित किताबें बांटती है या यूं कहें धर्म परिवर्तन के लिए प्रोत्साहित करती हैं. जो ईलाका पिछड़ा है, वहां वह इस काम को अपने बूते करती भी है.
ऐसे में छद्म-निरपेक्षियों का भंडाफोड़ होना स्वाभाविक है, जो हर घटना के लिए सांप्रदायिक शक्तियों को जिम्मेदार ठहराते हैं. सत्य तो ये है कि इन्हीं लोगों की वजह से समाज में जहर घुलता जा रहा है.

मंगलवार, 2 सितंबर 2008

सेक्यूलर एजेंडा- फूट डालो राज करो

बिपिन चंद्रा देश के जाने-माने मार्क्सवादी इतिहासकार है. उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और आजादी के बाद के भारत पर महत्वपूर्ण पुस्तकों की रचना की, जो कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाती है. एक जून, 2008 के टाइम्स ऑफ इंडिया में उनका इंटरव्यू पढ़ा. उन्होंने सांप्रदायिकता पर बौद्धिकतापूर्ण बातें कही. उनके बौद्धिकतापूर्ण बातों को पढ़कर जो मेरे में सामान्य बातें उपजी आपके सामने रख रहा हूं-
1.बौद्धिक दृष्टिकोण- भारत जैसे विविधतापूर्ण समाज में यदि सांप्रदायिकता को नहीं रोका गया तो यह देश को टुकड़ों में तोड़ सकता है. यदि इसे नियंत्रित नहीं किया गया तो यहां लेबनान और श्रीलंका जैसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है. सांप्रदायिकता यहां जड़ें जमा चुकी है. देश की कुल आबादी के कम से कम बीस प्रतिशत लोग भाजपा को वोट देते हैं. सांप्रदायिकता, पहले मध्यमवर्गीय समाज में पाई जाती थी, लेकिन अब इसने आमलोगों को अपनी चपेट में ले लिया है. अब वनवासियों, आदिवासियों और गांवों में सांप्रदायिकता फैलने लगी है. पहले कहा जाता था कि दक्षिण भारतीय सांप्रदायिक नहीं हो सकते हैं, लेकिन आप देखेंगे कि सांप्रदायिकता कर्नाटक, केरल और आंध्रप्रदेश में भी पैदा होने लगी है.
सामान्य दृष्टिकोण- स्वाभाविक है शहरों में पढ़े लिखे लोग ज्यादा होते है. वे तथा-कथिक सेक्यूलरों(छद्म-धर्मनिरपेक्षों) की घिनौनी राजनीति समझ गए हैं(देश के विद्वान प्रधानमंत्री कहते हैं कि देश के संसाधनों पर पहला हक मुसलमानों का है, मुस्लिम बहुल जिलों की पहचान की जाती है, वहां जनता के टैक्स से 5500करोड़ रुपये दिए जाते हैं) जब सरकार मुसलमान परस्त राजनीति करेगी तो जनता हिंदु-परस्त होती है तो क्या बुराई है, इसके लिए छद्म-धर्म-निरपेक्ष लोग ही जिम्मेदार हैं. सरकार अलगाव परस्त कश्मीरियों के आगे घुटने टेक देती है तो स्वाभाविक है कि जम्मू की राष्ट्रभक्त जनता अपने जायज मांगों के लिए आवाज उठाए. शहर के बाद गांव और जंगल के लोग भी सरकार सरकार की घिनौनी राजनीति को समझ रहे हैं. जहां तक दक्षिण भारत की बात है. यहां कि जनता को उत्तरभारतीयों की अपेक्षा रूढिवादी रही है. लेकिन यहां के राजनेता उत्तरभारतीय राजनेताओं के मुकाबले कम घिनौनी किए हैं. अब आंध्रप्रदेश की कांग्रेस सरकार ने यहां व्यापक रूप से इसकी शुरूआत की है. अब यहां सांप्रदायिक जहर घुलेंगे, इससे लिए कथित छद्म-धर्मनिपरपेक्ष गुट जिम्मेदार है.
2. बौद्धिक दृष्टिकोण- सांप्रदायिकता एक विचारधारा है. इस विचारधारा के मुताबिक, हिंदुओं का सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक हित मुसलमानों के हित से अलग हैं. क्योंकि हिंदू-मुसलमान अलग-अलग हैं. सांप्रदायिक दंगे बीमारी के लक्षण मात्र हैं. यह सांप्रदायिक दंगों के बगैर भी फल-फूल सकती हैं. उदाहरण के तौर पर, तीस और चालीस के दशक में सांप्रदायिक दंगे नहीं हुए, लेकिन 1937 से 1945 के बीच सांप्रदायिकता का खूब विकास हुआ. सांप्रदायिका को बढ़ावा देने के लिए सांप्रदायिक दंगे कराए जाते हैं. 2002 के गुजरात दंगों को ही लीजिए. इस दंगे का मकसद मुसलमानों को मारना या उनकी संपत्ति को बर्बाद करना नहीं था, इसका मकसद सांप्रदायिकता को बढ़ावा देना था. एकबार यह मकसद हासिल कर लिया गया फिर देखिए हर जगह शांति है.
सामान्य दृष्टिकोण- जहां तक विचारधारा की बात है, विचारधारा तो कम्युनिष्टों की परि-संपत्ति है. जन-सामान्य के पास विचारधारा कहां होती है कि वो उसपर काम करते और उसकी लड़ाई लड़े. उसकी विचारधारा तो (कार्यकाले समुत्पन्ने) परिस्थितियों के अनुसार पैदा होती है. अगर ऐसा नहीं होता तो शैव्य-शाक्त, वैष्णव, द्वैत, अद्वैत, सगुण, निर्गुण, साकार, निरंकार जैसी विचारधाराएं पैदा नहीं होती. हजारों धर्मग्रंथ नहीं लिखे जाते. मुस्लिम धर्मावलंबियों की तरह हर किसी को कुरआन और हदीस के डंडे से ही हांकते. लेकिन देखिए कम्युनिष्टों के पास मार्क्स और लेनिन के बाद कोई विचारधारा ही पैदा नहीं हुई. शांति का अर्थ ये नहीं है कि प्रभाव कायम करके ही शांति स्थापित होती है. अगर है तो अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोपीय देशों में शांति क्यों है.
3. आतंकवाद को सांप्रदायिक विचारधारा से जोड़ा जा सकता है. उदाहरण के लिए, आज हिंदू आतंकवाद नहीं के बरावर है लेकिन हिंदू सांप्रदायिकता काफी मजबूत है. भारत के ज्यादातर मुस्लिम आतंकवाद का समर्थन नहीं करते हैं फिर भी आतंकवाद ने इस्लामिक रूप ले लिया है. यह जरूरी नहीं है कि धार्मिक रूढिवादिता का स्वरूप सांप्रदायिक हो, लेकिन यह रूढिवादिता सांप्रदायिक रूप ले सकता है, कई हिंदू और मुस्लिम रूढिवादी तो हैं, लेकिन सांप्रदायिक नहीं.
सामान्य दृष्टिकोण- हिंदू स्वभाव से सांप्रदायिक नहीं होते हैं और सह-अस्तित्व पर विश्वास करते हैं पर छद्म-निरपेक्षता ने बड़े ही सुनियोजित तरीके से इसमें सांप्रदायिकता का जहर घोला.
4. सांप्रदायिक का निदान- हमें सांप्रदायिकता को अच्छी तरह समझना होगा. मेरे छात्रों में से ही कई शुरू शुरू में सांप्रदायिक थे, लेकिन एकबार जब उन्हें पूरी बात समझाई गी तो वे बदल गए. इसलिए सांप्रदायिकता को रोकने के लिए शैक्षणिक अभियान चलाने की जरूरत है, उदाहरण के लिए, हमारी शिक्षा-व्यवस्था सांप्रदायिकता को कम करने के बजाय उसे बढावा देने का काम करती है. पाठ्यक्रम प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सांप्रदायिक विचारों का पोषण करती हैं. कभी-कभी तो लेखक भी इस बात से अनजान रहता है.
सामान्य दृष्टिकोण- मेरे विचार से सांप्रदायिकता को समाप्त करने के लिए तुष्टिकरण की राजनीति को तिलांजलि देकर समग्र समाज के विकास की बात की जाए. फूट डालो और राज करो की नीति से किसी समाज का भला होने वाला नहीं है. इससे सामाजिक विद्वेष ही पैदा होगा और समाज में जहर घुलेगा.