माता जानकी अशोक वाटिका में आकाश के अग्निपुंजों को देख-देखकर दुख की अग्नि में जली जा रही हैं. विधाता ही विपरीत हो गए. कैसे मिटेगी ये पीड़ा. अशोक के नव पल्लव भी उन्हें अग्नि की भांति जला रहे हैं. माता जानकी की दशा को देखकर हनुमान जी स्वयं व्याकुल हो उठे. भगवान राम की भेजी मुद्रिका भूमि पर गिरा दी और राम का गुनगान करने लगे. माता जानकी के बुलाने पर हनुमान जी सामने आए. भगवान राम से दोस्ती कैसे हुई, पूरी कथा सुनाई. राम का दूत जानकर माता जानकी ने अपना सारा दुख हनुमान जी को कह सुनाया..
मन करम वचन चरण अनुरागी।
केहि अपराध नाथ हौ त्यागी।।
माता जानकी को विकल देखकर हनुमान जी बोले, हे माता, अनुज लक्ष्मण के साथ भगवान राम कुशल हैं, सिर्फ आपके दुख से वे दुखी हैं-
मातु कुशल प्रभू अनुज समेता।
तब दुख दुखी भा सुकृपा निकेता।।
जनि जननी मानहुं जिए ऊना।
तुम तें प्रेम राम कर दूना।।
कहेहु राम वियोग तब सीता।
मो कहुं सकल भए विपरीता।।
नव तरू किसलय मनहुं कृशानु।
काल निशा सम निशि शशि भानु।।
कुबलय बिपिन कुंत बन सरिसा।
बारिद तपत तेल जनु बरिसा।।
जे हित रहे करहि तेहिं पीड़ा।
उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा।।
कहहु ते कछु दुख घटि होई।
काहे कहौं यह जान न कोई।।
तत्व प्रेम का मम अरू तोरा।
जानत प्रिया एक मन मोरा।।
सो मन रहत सदा तोहि पाहीं।
जानु प्रीत रस एतनेहि माहीं।।
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शनिवार, 13 सितंबर 2008
गुरुवार, 1 नवंबर 2007
दिनकर जी के प्रति
राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर हमारे युग के महानतम क्रांतिधर्मी कवियों में से एक है। उनहोंने जन मानस में राष्ट्र चेतना निर्झरनी प्रवाहित करने की कोशिश की। वे उस प्रवृति के प्रबल विरोधी थे, जो उस समय भी शांति और शांति का मंत्र जपने में तल्लीन रहते हैं, जब राष्ट्र का सर्वस्व दाव पर लगा हो। वे कहते हैं...
स्वत्व छीनता हो कोई और तू त्याग तप से कम ले यह पाप है
पुण्य है विछिन्न कर देना उसे बढ रहा तेरी तरफ जो हाथ है ॥
दिनकर जी का मानना था कि किसी व्यक्ति या राष्ट्र का सबल होना बहुत जरुरी है। अगर व्यक्ति या राष्ट्र सबल है तभी उस नेक नीयती का लबादा अच्छा लगता है...
क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो.
उसको क्या जो दंत हीन विष हीन विनीत सरल हो..
दिनकर जी का ये साफ साफ मानना था कि जिस व्यक्ति के पास जीतने शक्ति हो, लोग उसी कि बात मानते हैं..
सच पूछो तो शर में ही बस्ती दीप्ति विनय की.
संधि वचन संपूज्य उसी की जिसमें शक्ति विजय की।
स्वत्व छीनता हो कोई और तू त्याग तप से कम ले यह पाप है
पुण्य है विछिन्न कर देना उसे बढ रहा तेरी तरफ जो हाथ है ॥
दिनकर जी का मानना था कि किसी व्यक्ति या राष्ट्र का सबल होना बहुत जरुरी है। अगर व्यक्ति या राष्ट्र सबल है तभी उस नेक नीयती का लबादा अच्छा लगता है...
क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो.
उसको क्या जो दंत हीन विष हीन विनीत सरल हो..
दिनकर जी का ये साफ साफ मानना था कि जिस व्यक्ति के पास जीतने शक्ति हो, लोग उसी कि बात मानते हैं..
सच पूछो तो शर में ही बस्ती दीप्ति विनय की.
संधि वचन संपूज्य उसी की जिसमें शक्ति विजय की।
मैं अपराधी हीन मति, परों मोह के जाल
मम कृत दोष न मानिये तुम प्रभु दीन दयाल
तारा में शशि एक है शशि में तारा अनेक
हम सब तुमको एक हैं तुम सब हमको अनेक
श्री गुरु मंगल मुख चन्द्रमा सेवक नयन चकोर
अष्ट पहर निरखते रहो श्री गुरु चरण कि ओर
मम कृत दोष न मानिये तुम प्रभु दीन दयाल
तारा में शशि एक है शशि में तारा अनेक
हम सब तुमको एक हैं तुम सब हमको अनेक
श्री गुरु मंगल मुख चन्द्रमा सेवक नयन चकोर
अष्ट पहर निरखते रहो श्री गुरु चरण कि ओर
बुधवार, 31 अक्टूबर 2007
मो सम दीन न दीन हित, तुम समान रघुवीर।
अस विचार रघुवंश मणि हरहूँ विषम भाव भीर॥
कामी नारी प्यार जिमी लोभी के प्रिये दाम।
तुम रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहिं मोही राम॥
अस विचार रघुवंश मणि हरहूँ विषम भाव भीर॥
कामी नारी प्यार जिमी लोभी के प्रिये दाम।
तुम रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहिं मोही राम॥
तव नाथ कर करुना विलोकहूँ देहून जो वर दीजिए।
मन जाहि रचेहूँ मिलहिं सो वर सहज सुन्दर संवारो॥
करुना निधान सुजान शील स्नेह जानत रावरो॥
जानी गौरी आशीष सुनी सिया सहित हिय हर्षित आली।
तुलसी भवनिही पूजि पुनि पुनि मुदित मन मंदिर चली॥
जानी गौरी अनुकूल सिया हिय हर्ष न जाही कही ॥
मंजुल मंगल मूल बाम अंग फड्कन लगे॥
मन जाहि रचेहूँ मिलहिं सो वर सहज सुन्दर संवारो॥
करुना निधान सुजान शील स्नेह जानत रावरो॥
जानी गौरी आशीष सुनी सिया सहित हिय हर्षित आली।
तुलसी भवनिही पूजि पुनि पुनि मुदित मन मंदिर चली॥
जानी गौरी अनुकूल सिया हिय हर्ष न जाही कही ॥
मंजुल मंगल मूल बाम अंग फड्कन लगे॥
श्री राम
श्री राम चन्द्र कृपालु भजु मन हरण भव भय दारुणम्।
नव कंज लोचन कंज मुख कर कंज पद कन्जारुनम॥
कंदर्प अगणित अमित छवि नव नील नीरद सुन्दरम।
पट पीट मनहूँ तडित रूचि सुची नौमी जनक सुतावरम॥
भजु दिन बंधू दिनेश दानव दैत्य वंश निकंदनम।
आजानु भुज सर चाप धर संग्राम जित खर दुषणम॥
इति वदति तुलसी दास शंकर शेष मुनि मन रंजनं ।
मम ह्रदय कंज निवास करू कामादि फल दल गंजनं ॥
जय जनक नंदनी जगत वन्दनी जन आनंद श्री जानकी।
रघुवीर नयन चकोर चंद श्री वल्लभा प्रिय प्राणकी॥
नव कंज लोचन कंज मुख कर कंज पद कन्जारुनम॥
कंदर्प अगणित अमित छवि नव नील नीरद सुन्दरम।
पट पीट मनहूँ तडित रूचि सुची नौमी जनक सुतावरम॥
भजु दिन बंधू दिनेश दानव दैत्य वंश निकंदनम।
आजानु भुज सर चाप धर संग्राम जित खर दुषणम॥
इति वदति तुलसी दास शंकर शेष मुनि मन रंजनं ।
मम ह्रदय कंज निवास करू कामादि फल दल गंजनं ॥
जय जनक नंदनी जगत वन्दनी जन आनंद श्री जानकी।
रघुवीर नयन चकोर चंद श्री वल्लभा प्रिय प्राणकी॥
बुधवार, 24 अक्टूबर 2007
परहित सरिस धरम नहीं भाई
पर पीडा सम नही अधमाई
परोपकार के समान कोई धरम नहीं है और दूसरे को दुःख देने के समान कोई अधर्म नहीं है.
पर पीडा सम नही अधमाई
परोपकार के समान कोई धरम नहीं है और दूसरे को दुःख देने के समान कोई अधर्म नहीं है.
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