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रविवार, 7 मार्च 2010

नानाजी, जैसा हम उन्हें जानते थे

--एस गुरूमूर्ति
(इंडियन एक्सप्रेस से साभार)
-अनुवाद- सत्यजीत प्रकाश
नानाजी अब हमारे बीच नहीं रहे. नानाजी देशमुख, जो करीब छह दशकों तक राजनीतिक और सामाजिक पटल पर देदीप्तिमान नक्षत्र की तरह चमकते रहे, नानाजी के नाम से जाने जाते हैं. राजनीति और राजनीति से बाहर, जो लोग उनसे प्रभावित और प्रेरित थे, उन्हें तक महान आदर्शवादी के रूप में जानते थे. उनके प्रशंसक और मित्र उन्हें एक महान राजनीतिक रणनीतिकार मानते थे. अल्पायु में ही आरएसएस में शामिल होने वाले और संघ के पूर्णकालिक प्रचारक बनने वाले नानाजी निस्संदेह एक महान संगठनकर्ता थे. हर जगह उच्च पदों पर उनके होते थे. वे बचपन से ही अपने सांगठनिक कौशल के लिए जाने जाते थे. चाहे विनोवा भावे का भूदान आंदोलन हो या दिल्ली का राजनीतिक गलियारा नानाजी हर जगह समान रूप से सहजता महसूस करते थे. उनके विरोधी खेमों में भी उनके दोस्त होते थे. 1948 में जब जवाहरलाल नेहरू ने आरएसएस पर प्रतिबंध लगा दिया था, आरएसएसस के अन्य कार्यकर्ताओं की तरह नानाजी भी भूमिगत रहकर अपने संगठन के आंदोलन को जारी रखा. लेकिन उस दौरान वो कहां थे-

मानिए या नहीं, वो नेहरू सरकार में एक मंत्री रफी अहमद किदवई के घर में रहकर अपनी गतिविधियां चलाते थे

सबको मालूम है कि नेहरू आरएसएस को पैदाईशी दुश्मन मानते थे. उन्होंने घोषणा कर रखी थी कि आरएसएस के भगवा ध्वज को फहराने के लिए वह भारत में एक इंच भी भूमि(सूई की नोक बराबर?) नहीं देंगे. नेहरू के विश्वस्त दोस्त और उनके कैबिनेट में मंत्री किदवई को नानाजी को अपने घर में रखने और भूमिगत होकर आरएसएस की गतिविधियां चलाने देने में कोई आपत्ति नहीं थी. यह घटना स्पष्ट करता है कि युवा नानाजी के व्यक्तित्व में कैसा चुंबकत्व था.
रामनाथ गोयंका से मेरी मित्रता के साथ ही नानाजी देशमुख के साथ मेरा जुड़ाव शुरू होता है. रामनाथ गोयंका और नानाजी ना सिर्फ अच्छे दोस्त थे, बल्कि देश के बारे में दोंनों के विचार और सोच एक जैसे थे. दोनों के बीच पारस्परिक विश्वास और सम्मान किसी भी प्रकार के निजी हितों से परे, पूरी तरह से मातृभूमि के प्रति उनके प्रेम से जुड़े हुए थे. राष्ट्र की भलाई के सिवा उन दोनों के मन में कोई दूसरा विचार नहीं था. गोयंका ने दी इंडियन एक्सप्रेस को न सिर्फ एक समाचार पत्र, देश के लिए काम करने वाली सभी राष्ट्रवादी शक्तियों की सक्रिय साझेदारी, राजनीतिक और सामाजिक विमर्श का एजेंडा तय करने का माध्यम बनाया. रामनाथ गायंका ने
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शेष अगले अंक में--

रविवार, 28 फ़रवरी 2010

इस तरह मेरे औकात का पता चल गया

एक मित्र का फोन आया. उसने पूछा, यार कहां हो. मैंने जवाब दिया, घर पर हूं, कहो, क्या बात है.
उसने कहा, नानाजी देशमुख के बारे में थोड़ा विस्तार से बता सकते हो.
मैंने पूछा, कौन नानाजी देशमुख?
उसने कहा, नहीं जानते हो तो जल्दी पता करो, मुझे सिर्फ इतना पता है कि वे एक सांसद और समाजसेवी थे.
मैंने कहा, पता करना पड़ेगा, आधे घंटे बाद फोन करो तो कुछ बता सकूंगा.
उसने कहा, ठीक आधे घंटे में फोन करता हूं.
और फोन कट गया.
मैंने नेट कनेक्ट किया और नानाजी के बारे में खोज शुरू कर दिया. हिंदी विकिपीडिया पर नानाजी देशमुख सर्च मारा. पांच सात पंक्तियों में उनके बारे में जानकारी दी(उतनी ही, जितनी मेरे दोस्त ने दी थी) जो नाकाफी थे. मजबूर होकर अंग्रेजी विकिपीडिया की शरण में गया, वहां उतनी जानकारी थी, जितनी की हमें तत्काल जरूरी थी.
मैंने पूरी शिद्दत से जल्दबादी में ही सही, पूरा लेख पढ़ डाला. आधे घंटे के अंदर मेरे दोस्त का फोन आया और मैंने उसे संक्षेप में बताकर उससे धन्यवाद पाया.
अपने दोस्त का धन्यवाद पाकर भी मैं खुश नहीं था, बहुत शर्मिंदगी महसूस कर रहा था. मेरे उस दोस्त ने अंजाने में ही मुझे मेरी औकात बता दी. दरअसल मैं उस महापुरूष के बारे में नहीं जानता था, जिसके बारे में जानना चाहिए था. एक महापुरूष जिसने स्वतंत्र भारत में भारत को स्वतंत्रता का पाठ पढ़ाया, जिसने अपने सिद्धांतो पर जिया. जब राजनीति के शिखर पर थे, तब उन्होंने राजनीति छोड़ दी. वो सिर्फ इसलिए कि उसे समाज के सबसे निचले और शोषित तबके से संवाद स्थापित करना था. उसके जीवन में रोशनी लानी थी. पृष्ठभूमि से अगर वे आरएसएस के नहीं होते तो वे मीडिया में चर्चा पाते और मुझ जैसा अदना व्यक्ति भी उन्हें जानता. पर ऐसा नहीं हुआ.
अभी एक रोज पहले ही मेरे कुछ साथ चर्चा कर रहे थे कि भारत में ऐसा एक भी व्यक्ति नहीं बचा जो निस्वार्थ भाव से मानवता की सेवा करता हो. मैं यह मानने के लिए तैयार नहीं हुआ. मेरा मानना था कि ये अलग बात है कि हम उनके बारे में नहीं जानते हैं क्योंकि कलाम के अनुसार, हमारी मीडिया निगेटिव ऑब्सेस्ड है. उसे पॉजिटिव खबरों से कोई लेना देना नहीं रहता है. अगर किसी पॉजिटिव खबर की आस रहती है तो वो ईसाई मिशनरियों के पॉप और फादर की पॉजिटिव स्टोरी छपती है कि कैसे उसने फलां भाग का कायाकल्प कर दिया. अगर व्यक्ति आरएसएस से जुड़ा तो उसे अछूत करार दिया जाता है. खैर अभी मीडिया की भूमिका के बारे में ज्यादा चर्चा करना नहीं है.
मैं दिनभर नानाजी पर अंग्रेजी विकिपीडिया से लेख का अनुवाद करता रहा. शाम तक मैंने हिंदी विकिपीडिया के लिए नानाजी  देशमुख के लिए लेख पूरा कर लिया.
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नानाजी देशमुख

नानाजी देशमुख (जन्म- ११ अक्तूबर, सन् १९११- निधन- 27 फरवरी, 2010) भारत के एक प्रसिद्ध समाजसेवी थे। वे पूर्व में भारतीय जनसंघ के नेता थे। वे भारत के ऊपरी सदन राज्यसभा के सदस्य भी थे।

आरम्भिक जीवन

नानाजी का जन्म महाराष्ट्र के परभनी जिले के कदोली नामक छोटे से कस्बे में ग्यारह अक्टूबर १९११ में हुआ था। नानाजी का लंबा और घटनापूर्ण जीवन अभाव और संघर्षों में बीता. उन्होंने छोटी उम्र में ही अपने माता-पिता को खो दिया. मामा ने उनका लालन-पालन किया. बचपन अभावों में बीता। उनके पास शुल्क देने और पुस्तकें खरीदने के लिये पैसे नहीं थे किन्तु उनके अन्दर शिक्षा और ज्ञानप्राप्ति की उत्कट अभिलाषा थी। अत: इस कार्य के लिये उन्होने सब्जी बेचकर पढ़ाई के लिए पैसे जुटाते थे. वे मंदिरों में रहे और पिलानी के बिरला इंस्टीट्यूट में उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की. बाद में तीस के दशक में वे आरएसएस में शामिल हो गए. भले ही उनका जन्म महाराष्ट्र में हुआ, लेकिन उनका कार्यक्षेत्र राजस्थान और उत्तरप्रदेश में रहा. उनकी श्रद्धा देखकर आरएसएस सरसंघचालक श्री गुरू जी ने उन्हें प्रचारक के रूप में गोरखपुर भेजा. बाद में वे उत्तरप्रदेश के प्रांत प्रचारक बने.

आरएसएस कार्यकर्ता के रूप में

नानाजी देशमुख लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के राष्ट्रवादी विचारधारा से प्रेरित हुए. तिलक से प्रेरित होकर उन्होंने समाज सेवा और सामाजिक गतिविधियों में रूचि ली. आरएसएस के डॉ केशब बलिराम हेडगेवार से उनके पारिवारिक संबंध थे. हेडगेवार ने नानाजी में छिपी प्रतिभा को पहचान लिया और आरएसएस की शाखा में आने के लिए प्रेरित किया.
1940 में, डॉ केशव बलिराम हेडगेवार के निधन के बाद उन्हें कई युवकों को महाराष्ट्र की आरएसएस शाखा में शामिल होने के लिए प्रेरित किया. नानाजी ऐसे लोगों में से थे जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन राष्ट्र की सेवा में अर्पित करने के लिए आरएसएस से जुड़े. वे प्रचारक के रूप में उत्तरप्रदेश भेजे गए. आगरा में वे पहलीबार डॉ दीनदयाल उपाध्याय से मिले. बाद में नानाजी गोरखपुर गए जहां उन्होंने लोगों को संघ की विचारधारा के बारे में बताया. ये कार्य बिल्कुल ही आसान नहीं था, संघ के पास दैनिक खर्च के लिए भी धन नहीं थे. उन्हें धर्मशालाओं में ठहरना पड़ता था. उन्हें लगातार धर्मशाला बदलना पड़ता था, क्योंकि एक धर्मशाला में लगातार तीन दिनों से ज्यादा समय तक ठहरने नहीं दिया जाता था. अंत में बाबा राघवदास ने उन्हें इस शर्त पर ठहरने दिया कि वे उनके लिए खाना बनाएंगे. तीन साल के अंदर उनकी मेहनत ने रंग लाई और गोरखपुर के आसपास करीब 250 संघ की शाखाएं खुल गई. नानाजी ने हमेशा शिक्षा पर बहुत जोर दिया. उन्होंने 1950 में गोरखपुर में पहले सरस्वती शिशु मंदिर की स्थापना की.
1947 में, आरएसएस ने राष्ट्रधर्म और पांचजन्य नामक दो पत्रिकाओं और स्वदेश नामक पत्र की शुरूआत करने का फैसला किया. श्री अटल बिहारी वाजपेयी को संपादन और दीन दयाल उपाध्याय को मार्गदर्शन, जबकि नानाजी को प्रबंध निदेशक की जिम्मेदारी सौंपी गई. पैसे के अभाव में पत्र और पत्रिकाओं का प्रकाशन संगठन के लिए मुश्किल कार्य था, लेकिन इससे उनके उत्साह में कमी नहीं आई और सुदृढ राष्ट्रवादी सामाग्री के कारण इन प्रकाशनों को लोकप्रियता और पहचान मिली. 1948 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या के बाद आरएसएस पर प्रतिबंध लगा दिया गया, जिससे इन प्रकाशन कार्यों पर असर पड़ा. उन दिनों भूमिगत होकर इनका प्रकाशन कार्य जारी रहा.

राजनीतिक जीवन

जब आरएसएस पर से प्रतिबंध हटा तो फैसला राजनीतिक संगठन भारतीय जन संघ की स्थापना का फैसला हुआ. श्री गुरूजी ने नानाजी को उत्तरप्रदेश में भारतीय जन संघ के महासचिव का प्रभार लेने को कहा. नानाजी का जमीनी कार्य उत्तरप्रदेश में पार्टी को स्थापित करने में अहम भूमिका निभायी. 1957 तक भाजपा ने उत्तरप्रदेश के सभी जिलों में अपनी ईकाई बनाई. इस दौरान नानाजी ने पूरे उत्तरप्रदेश का दौरा किया. जल्द ही भारतीय जनसंघ उत्तरप्रदेश की प्रमुख शक्ति बन गई. 1967 में भारतीय जनसंघ संयुक्त विधायक दल का हिस्सा बन गया और चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व में सरकार में शामिल हो गई. नानाजी के चौधरी चरण सिंह और डॉ राम मनोहर लोहिया से अच्छे संबंध थे, इसलिए गधबंधन में उन्होंने अहम भूमिका निभायी. उत्तरप्रदेश की पहली गैर-कांग्रेसी सरकार के गठन में विभिन्न राजनीतिक दलों को एकजुट करने में नानाजी जी ने अहम भूमिका निभायी. उत्तरप्रदेश की बड़ी राजनीतिक हस्ती चंद्रभानु गुप्ता को नानाजी की वजह से तीन बार कड़ी चुनौती का सामाना करना पड़ा. एकबार, राज्यसभा चुनाव में कांग्रेसी नेता और चंद्रभानु के पसंदीदा उम्मीदवार को हराने के लिए उन्होंने रणनीति बनाई. 1957 में जब गुप्ता स्वयं लखनऊ से चुनाव लड़ रहे थे, तो नानाजी ने समाजवादियों से साथ गठबंधन बनाकर बाबू त्रिलोकी सिंह को बड़ी जीत दिलाई. 1957 में गुप्ता को दूसरी बार हार को मुंह देखना पड़ा. उत्तरप्रदेश में भाजपा ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय की दृष्टि, अटल बिहारी वाजपेयी के वक्तृत्व और नानाजी के संगठनात्मक कार्यों के कारण भारतीय जनसंघ महत्वपूर्ण राजनीतिक शक्ति बन गया. न सिर्फ पार्टी कार्यकर्ताओं से बल्कि विपक्षी दलों के साथ भी नानाजी के संबंध अच्छे थे. श्री चंद्रभानु गुप्ता, जिन्हें नानाजी के कारण कई बार चुनावों में हार का सामना करना पड़ा, नानाजी का खूब सम्मान करते थे और उन्हें प्यार से नाना फड़नवीस कहते थे. डॉ राम मनोहर लोहिया से उनके अच्छे संबंधों ने भारतीय राजनीति की दशा-दिशा बदल दी. एकबार नानाजी ने डॉ लोहिया को भारतीय जनसंघ कार्यकर्ता सम्मेलन में बुलाया, जहां लोहिया की मुलाकात दीन दयाल उपाध्याय से हुई. दोनों के जुड़ाव से भाजस समाजवादियों के करीब आया, दोनों ने कांग्रेस और उसके कुशासन का पर्दाफाश कर दिया. नानाजी विनोबा भावे के भूदान आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल हुए. दो महीनों तक विनोबा के साथ रहे. वे आंदोलन से प्रभावित हुए. जेपी आंदोलन में जब जयप्रकाश पर पुलिस ने लाठियां बरसाई. उस समय नानाजी ने जयप्रकाश को सुरक्षित निकाल लिया. जिसमें नानाजी को चोटें आई और इनका एक हाथ टूट गया. बाद में जयप्रकाश नारायण और पूर्व पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी ने नानाजी के साहस की भूरि-भूरि प्रशंसा की. उन्हें पुरस्कार के तौर पर उन्हें मंत्रिमंडल में बतौर उद्योग मंत्री शामिल होने का न्यौता भी दिया, लेकिन नानाजी ने इनकार कर दिया. आपातकाल हटने के बाद चुनाव हुए, जिसमें बलरामपुर लोकसभा सीट से नानाजी सांसद चुने गए. 1980 में साठ साल की उम्र में उन्होंने सक्रिय राजनीति से संन्यास लेकर आदर्श की स्थापना की. बाद में उन्होंने अपना पूरा जीवन सामाजिक और रचनात्मक कार्यों में लगा दिया. वे आश्रमों में रहे और कभी अपना प्रचार नहीं किया. जय प्रकाश नारायण के आह्वान पर उन्होंने संपूर्ण क्रांति को पूरा समर्थन दिया. जनता पार्टी से संस्थापकों में नानाजी प्रमुख थे. कांग्रेस को सत्ताच्यूत तक जनता पार्टी सत्ता में आई. नानाजी दीनदयाल शोध संस्थान की स्थापना की और उसमें सेवा दी. उन्होंने चित्रकूट में चित्रकूट ग्राम्योदय विश्वविद्यालय की स्थापना की. यह भारत का पहला ग्रामीण विश्वविद्यालय है और वे इसके पहले कुलाधिपति थे. 1999 में एनडीए सरकार ने उन्हें राज्यसभा से सांसद बनाया.
पंडित दीनदयाल उपाध्याय की हत्या उनके लिए बहुत बड़ी क्षति थी. और उन्होंने दिल्ली में अकेले दम पर दीनदयाल शोध संस्थान की स्थापना की और देश में रचनात्मक कार्य आंदोलन को समर्पित कर दिया. उन्होंने गरीबी निरोधक और न्यूनतम आवश्यकता कार्यक्रम चलाया. उन्होंने कृषि, कुटीर उद्योग, ग्रामीण स्वास्थ्य और ग्रामीण शिक्षा पर बल दिया. राजनीति से हटने के बाद उन्होंने संस्थान का अध्यक्ष पद संभाला और संस्थान की बेहतरी में अपना सारा समय अर्पित कर दिया. उन्होंने मंथन पत्रिका प्रकाशित किया जिसका कई वर्षों तक के आर मलकानी ने संपादन किया. नानाजी ने उत्तरप्रदेश और महाराष्ट्र के सबसे पिछड़े जिलों गोंडा और बीड में बहुत से सामाजिक कार्य किए. उनके द्वारा चलाई गई परियोजना का उद्देश्य था- हर हाथ को काम और हर खेत को पानी. 1969 में वे पहली बार चित्रकूट आए और अंतिम रूप से वे चित्रकूट में बस गए. उन्होंने भगवान श्रीराम की कर्मभूमि चित्रकूट की दुर्दशा देखी. वे मंदाकिनी के तट पर बैठ गए और अपने जीवन काल में चित्रकूट को बदलने का फैसला किया. अपने वनवास के काल में राम ने दलित जनों के उत्थान का कार्य किया. इससे प्रेरणा लेकर नानाजी ने चित्रकूट कोअपने सामाजिक कार्यों का केंद्र बनाया. उन्होंने सबसे गरीब व्यक्ति की सेवा शुरू की. वे अक्सर कहा करते थे कि वे राजाराम से वनवासी राम की अधिक प्रशंसा करते हैं, इसलिए वे अपना बचा हुआ जीवन चित्रकूट में बिताएंगे. ये वही स्थान है जहां राम ने अपने वनवास के चौदह में से बारह वर्ष गरीबों की सेवा में बिताए. उन्होंने अपने अंतिम क्षण तक इस प्रण का पालन किया. उनका निधन चित्रकूट में २७ फरवरी २०१० को हो गया।

दीनदयाल शोध संस्थान

पंडित दीनदयाल उपाध्याय(1916-1968) प्रणीत एकात्म मानववाद को मूर्त रूप देने के लिए नानाजी देशमुख ने 1972 में नई दिल्ली में दीनदयाल शोध संस्थान की स्थापना की. यह दर्शन समाज के प्रति मानव की समग्र दृष्टि पर आधारित है जो भारत को आत्मनिर्भर बना सकता है. नानाजी देशमुख ने एकात्म मानववाद के आधार पर ग्रामीण भारत के विकास की रूपरेखा रखी. शुरुआती प्रयोगों के बाद उत्तरप्रदेश के गोंडा और महाराष्ट्र के बीड में नानाजी ने गांवों में स्वास्थ्य, सुरक्षा, शिक्षा, कृषि, आय अर्जन, संसाधनों के संरक्षण, सामाजिक विवेक के विकास के लिए एकात्म कार्यक्रम की शुरुआत की. पूर्ण परिवर्तन कार्यक्रम का आधार, लोक सहयोग और सहकार है. चित्रकूट परियोजना या आत्म-निर्भरता के लिए अभियान की शुरूआत 26 जनवरी 2005 में चित्रकूट के आस-पास हुई. जो उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश की सीमा पर स्थित है. इस परियोजना का उद्देश्य 2005 तक इन गांवों में आत्म-निर्भरता हासिल करना था. परियोजना 2010 में पूरी हुई. परियोजना से उम्मीद जगी कि इसके आसपास के पांच सौ गांवों को आत्म-निर्भर बनाया जाए. यह भारत और दुनिया के लिए आदर्श बन सकता है.

प्रशंसा और सम्मान

1999 में नानाजी देशमुख को पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया. पूर्व राष्ट्र एपीजे अब्दुल कलाम ने नानाजी देशमुख और उनके संगठन दीनदयाल शोध संस्थान की प्रशंसा की. इस संस्थान की मदद से सैकड़ों गांवों को मुकदमा मुक्त विवाद सुलझाने का आदर्श बनाया गया. अब्दुल कलाम ने कहा
"चित्रकूट में मैंने नानाजी देशमुख और दीनदयाल उपाध्याय के उनके साथियों से मुलाकात की. दीन दयाल शोध संस्थान ग्रामीण विकास के प्रारूप को लागू करने वाला अनुपम संस्थान है यह प्रारूप भारत के लिए उपयुक्त है. विकास कार्यों से अलग दीनदयाल उपाध्याय संस्थान विवाद-मुक्त समाज की स्थापना में मदद करता है. मैं समझता हूं कि चित्रकूट के आसपास अस्सी गांव मुकदमा-मुक्त है. गांव के लोगों ने सर्वसम्मति से फैसला किया कि किसी विवाद का हल करने के लिए वे वे अदालत नहीं जाएंगे. तय हुआ कि विवाद आपसी सहमति से सुलझा लिए जाएंगे. नानाजी देशमुख के मुताबिक अगर लोग लड़ते झगड़ते रहेंगे तो विकास के लिए समय ही नहीं बचेगा." कलाम के मुताबिक, विकास के इस अनुपम प्रारूप को सामाजिक संगठनों, न्यायिक संगठनों और सरकार के माध्यम से देश के विभिन्न भागों में फैलाया जा सकता है. शोषितों और दलितों के उत्थान के लिए समर्पित नानाजी की प्रशंसा करते हुए कलाम ने कहा कि नानाजी चित्रकूट में जो कर रहे हैं वो अन्य लोगों के लिए आंखें खोलने वाला होना चाहिए.

निधन

नाना जी ने 95 साल की उम्र में देश के पहले ग्रामीण विश्वविद्यालय(जिसकी स्थापना उन्होंने खुद की) में 27 फरवरी 2010 को अंतिम सांस ली. वे पिछले कुछ समय से बीमार थे, लेकिन ईलाज के लिए दिल्ली जाने से मना कर दिया. नाना साहब देश के पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने अपना शरीर मेडिकल शोध के लिए दान करने की इच्छा जताई.
अंत में, सुधि जनों से निवेदन है कि वे विकिपीडिया पर इस लेख को भी संवर्धित और पूर्ण बनाने में विकि का सहयोग करें.

शनिवार, 20 फ़रवरी 2010

नरेंद्र कोहली- हिंदी के सर्वश्रेष्ठ रचनाकार

2009071651620401  6521Image3194चित्र- द हिंदू और पुस्तक.ऑर्ग से(साभार)
नरेंद्र कोहली आधुनिक हिंदी साहित्य के बहुचर्चित लेखकों में से एक हैं. कोहली आधुनिक हिंदी साहित्य में सांस्कृतिक पुनर्जागरण के अगुवा के रूप में पहचाने जाते हैं. उन्हें आधुनिक हिंदी गद्य साहित्य में प्राचीन महाकाव्य की पुनर्खोज का श्रेय दिया जाता है. हिंदी साहित्य में उनके योगदान की तुलना उपन्यास सम्राट प्रेमचंद से की जाती है, हालांकि उनके आलोचकों का दावा है कि नरेंद्र कोहली का साहित्य प्रेमचंद से भी ज्यादा प्रभावोत्पादक और दीर्घ-प्रभावी है. वहीं प्रकाशकों का मानना है कि उच्चस्तरीय हिंदी साहित्य में कोहली, प्रेमचंद की ही तरह, सबसे ज्यादा बिकने वाले लेखक हैं.
आधुनिक हिंदी साहित्य में नरेंद्र कोहली के लेखन से ही सांस्कृति पुनर्जागरण की शुरुआत होती है. अपने महाकाव्य लेखन में भारतीय संस्कृति और दर्शन के मूलभूत तत्वों के समग्र संश्लेषण का श्रेय नरेंद्र कोहली को दिया जाता है. नरेंद्र कोहली के सर्वश्रेष्ठ और कालजयी रचनाओं में महासमर शामिल है. उनकी रचनाओं में पाठक अनायास ही तल्लीन हो जाता है. जैसा कि धर्मवीर भारती ने कहा, “यूं ही कुतूहलवश 'दीक्षा' के कुछ पन्ने पलटे और फिर उस पुस्तक ने ऐसा जादू डाला कि दोनों दिन पूरी शाम उसे पढ़कर ही खत्म किया. चार खंडों में पूरी रामकथा एक बहुत बड़ा प्रोजेक्ट है. यदि आप आदि से अंत तक यह लय रख ले गए, तो वह बहुत बड़ा काम होगा.” आश्चर्य नहीं, कि नरेंद्र कोहली ने अभ्युदय, महासमर सहित अन्य कालजयी रचनाओं में धर्मभारती के कथनानुसार, उस लय को बरकरार रखा. कोहली जी की कलात्मक प्रस्तुति, कथा कहने की उनकी अद्भुत कला के कारण पाठक कर्मयोग जैसे भारतीय दर्शन के जटिल संकल्पनाओं को पौराणिक आख्यानों और उदाहरणों के माध्यम से, बिना तारतम्य खोये समझ जाता है. उसे ये भी नहीं लगता है कि उसे कोई शिक्षा या उपदेश दे रहा है.
उनकी सर्वश्रेष्ठ रचनाओं में उनकी कालजयी रचना, अभ्युदय, महासमर, तोड़ो कारा तोड़ो(महाकाव्य), वसुदेव, अभिज्ञान, आत्मदान(उपन्यास), पांच अबसर्ड उपन्यास, आश्रितों का विरोध(व्यंग्य), जहां है धर्म, वहीं है जय: महाभारत की अर्थप्रकृति, हिंदी उपन्यास:सृजन एवं सिद्धांत(साहित्यिक आलोचना), स्मरामि(लेख और संस्मरण), साथ सहा गया दुख, प्रीति कथा(आत्मकथापरक उपन्यास)
नरेंद्र कोहली मानवीय रिश्तों के अन्वेषण के अद्वितीय और सिद्धहस्त लेखक हैं. जटिल चरित्रों के वर्णन में- एक आम आदमी(साथ सहा गया दुख) से विध्वंसकारी( जैसे- महासमर में दुर्योधन) से मानवीय विकास के शिखर पुरूष(जैसे- राम, कृष्ण, रामकृष्ण परमहंस एवं विवेकानंद). उनके हास्य लोगों को गुदगुदाते हैं और भावनात्मक रचनाएं(साथ सहा गया दुख) पाठकों को रुलाती हैं, जबकि महाकाव्यात्मक रचनाएं पाठकों को विस्मयाभिभूत और आश्चर्यचकित करती हैं. उनकी रचनाओं ने वर्तमान जीवन का यथार्थ और अतीत का आदर्श एक साथ चलता है, जो उन्हें प्रासंगिक और पठनीय बनाती हैं.
उनकी रचनाएं देश और काल सीमाओं से परे मानवीय मस्तिष्क और व्यवहार और प्रकृति की सार्वभौमिक थाती हैं. विश्व साहित्य में नरेंद्र कोहली को रूसी साहित्यकार लियो तोल्स्टॉय के समकक्ष माना जाता है. अगर उनकी रचनाओं को विश्व की विभिन्न भाषाओं में अनुवाद कराया जाता है तो भारत का शाश्वत और सार्वभौमिक संदेश पूरे विश्व में फैलेगा.
नरेंद्र कोहली का जन्म अविभाजित भारत के पंजाब प्रांत में हुआ. 1947 में भारत विभाजन के बाद वे बिहार के जमशेदपुर में आ बसे. यहीं उनकी प्रारंभिक शिक्षा उर्दू माध्यम से हुई. उन्होंने जमशेदपुर को-ऑपरेटिव कॉलेज में हिंदी माध्यम से पढ़ाई की. 1963 में दिल्ली से रामजस कॉलेज से एमए की डिग्री ली. 1970 में दिल्ली विश्वविद्यालय से पीएचडी की. 1963 से 1965 तक दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य किया और वहीं से 1995 में स्वैच्छिक अवकाश ग्रहण किया.
हिंदी साहित्य में नरेंद्र कोहली युग प्रवर्तक माने जाते हैं. पिछले करीब पांच दशकों से हिंदी साहित्य पर कोहली जी प्रभाव है. वे अपनी प्रतिभा से हिंदी साहित्य को नई गति और दिशा प्रदान कर रहे हैं. हिंदी साहित्य में नूतन आयाम जोड़ने का श्रेय कोहली जी को जाता है. भारतेंदु हरिश्चंद्र, जयशंकर प्रसाद और प्रेमचंद की तरह ही नरेंद्र कोहली हिंदी साहित्य में पुनर्जागरण युग या कोहली युग के प्रवर्तक हैं. डॉ विजय स्नातक के अनुसार,
"डा नरेन्द्र कोहली का हिन्दी साहित्य में अपना विशिष्ट स्थान है। विगत तीस-पैंतीस वर्षों में उन्होंने जो लिखा है वह नया होने के साथ-साथ मिथकीय दृष्टि से एक नई जमीन तोड़ने जैसा है।...कोहली ने व्यंग, नाटक, समीक्षा और कहानी के क्षेत्र में भी अपनी मौलिक प्रतिभा का परिचय दिया है। मानवीय संवेदना का पारखी नरेन्द्र कोहली वर्तमान युग का प्रतिभाशाली वरिष्ठ साहित्यकार है।"
सामयिक पृष्ठभूमि- कोई भी साहित्यकार शून्य में साहित्य का सृजन नहीं कर सकता है. वह अपने युग की प्रकृति और प्रवृति से प्रभावित होता है. हिंदी साहित्य में नरेंद्र कोहली का पर्दापण उस समय हुआ जब देश का विशाल मध्यमवर्ग स्वतंत्रता संग्राम के दौरान देखे गए सपनों के टूटने की निराशा, गरीबी और बेकारी के दौर से गुज़र रहा था. स्वतंत्रता संग्राम का आदर्शवाद एवं उत्साह अब पिछले युग की कहानी बन गए थे. भय, भूख और भ्रष्टाचार का बोलबाला बढ़ रहा था. एक अंग्रेज से स्वतंत्र हुए तो दूसरा अंग्रेज हमपर शासन करने लगा. कथित रूप से अर्जित स्वतंत्रता में न तो हमारा अपना शासन था और न अपना कानून. स्वतंत्र भारत के कर्णाधारों के पास न तो कोई भी दूरगामी सोच वाली स्वतंत्र एवं भारतीय शिक्षा प्रणाली थी, और न ही जनसामान्य के पास ऐसी स्थिति से निबटने के लिए पर्याप्त नैतिक आधार था. जो कुछ जातीय अनुभव का बल था उसे सांप्रदायिक कहकर नकार दिया दिया. हम आयातित विचारधारा और आयातित बुद्धि के गुलाम बनते चले गए. छठे दशक के अंतिम दौर में जहां नवनिर्माण की धारा क्षीणतर होती जा रही थी, वहीं राजनेताओं एवं सरकारी कर्मचारियों का भ्रष्टाचार एवं नैतिक पतन निर्लज्ज रूप से सार्वजनिक होता जा रहा था. त्रस्त जनता के आक्रोश की अभिव्यक्ति उसकी अपनी कायरता एवं दायित्व बोध के अभाव के कारण किसी ठोस सामाजिक क्रांति में परिवर्तित नहीं हो सकी. इसके विपरीत विशाल बेरोजगार युवा वर्ग में कुंठाएं और हीन भावनाएं घर कर गईं. न्हीं विकृतियों से तत्कालीन साहित्यकार एवं आलोचक भी ग्रस्त रहे, जिन्हें तत्कालीन कृतियों में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है. इस युग में कविता और गद्य दोनों ही क्षेत्रों में प्रयोग एवं यथार्थ के नाम पर दुर्बल चरित्रों का चित्रण, उनकी ग्रंथियों एवं विकृतियों के नग्न चित्रण की परम्परा चल पड़ी.
जैनेन्द्र कुमार अपने अस्वभाविक चरित्रों की अस्वस्थ मनोवृत्तियों एवं कुंठाओं के खुले चित्रण के कारण प्रेमचंद के बाद सबसे चर्चित रचनाकारों में से एक रहे. इसी परम्परा में अज्ञेय, धर्मवीर भारती इत्यादि भी आते हैं, जिनके साहित्य के बारे में प्रख्यात आलोचक एवं इतिहासकार गणपतिचन्द्र गुप्त का कथन है
"यह दुर्बल व्यक्तियों की दुर्बल कहानियां हैं जो समाज में अस्वस्थता, दुर्बलता एवं रुग्णता का वातावरण उत्पन्न करने में पर्याप्त सहायक सिद्ध हो सकती हैं. नए लेखकों में जो अनाचार, पीडा एवं कुंठाओं की जो प्रबलता दृष्टिगोचर होती है वह बहुत कुछ इस वर्ग के साहित्य से प्रभावित है."
चूंकि यह समस्याएं आज भी वर्तमान हैं, इसलिए आश्चर्य नहीं की यह उच्छृंखलतावाद, भोगवाद, निराशावाद एवं अन्य पतानोन्मुखी वृत्तियाँ आज भी हिन्दी साहित्य के कई रचनाकारों एवं आलोचकों में पर्याप्त प्रबल हैं. आश्चर्य नहीं कि नरेन्द्र कोहली का निर्माणोन्मुखी एवं आदर्शवादी साहित्य उनके लिए विस्मय, उपेक्षा एवं भय का विषय है।
प्रत्येक क्रिया की प्रतिक्रिया आवश्यम्भावी है. साहित्यिक आत्मा के अभाव के कारण आत्म-कृतघ्नात्मक पतानोन्मुखी साहित्य से पाठक दूर होते चले गए. उसके फलस्वरूप साहित्यकारों की एक ऐसी पीढ़ी का उदय हुआ जो मानव-विकास के मूल तत्वों को रेखांकित कर विकासोन्मेषी साहित्य में विश्वास रखती थी. आर्ष साहित्यिक मनीषा का परिचय, आद्य भारतीय संस्कृति के शाश्वत तत्वों की पहचान एवं आध्यात्म-रूपी भारतीय आत्मा की खोज जिस साहित्य का लक्ष्य रही, वही इन साहित्यकारों में प्रधान रहा. उन्मुक्तता एवं बंधनहीनता के नाम पर अपनी संस्कृति एवं आदर्शों के लांछित करने की जो प्रवृत्ति साहित्य में प्रवेश कर चुकी थी, उसको दरकिनार करते हुए; स्वविवेक से श्रेय को स्वीकार कर एवं हेय का परित्याग कर जिन साहित्यकारों ने आस्था के मूल स्वरों को सपने के साहित्य की शक्ति बनाया, उन्हें 'सांस्कृतिक पुनरुत्थान के युग' का हिस्सा माना जा सकता है.
ऐसा नहीं है कि आस्थावादी स्वर कभी साहित्य में थे ही नहीं. पर १९४० के आस-पास छायावादी युग के अवसान के साथ यह स्वर फीके पड़ते गए. यह दिलचस्प है कि सभी युग-प्रवर्तक साहित्यकारों में आस्थावादी सांस्कृतिक विचारधारा की प्रधानता रही है. गोस्वामी तुलसीदास से लेकर भारतेंदु से 'प्रसाद', महादेवी, 'निराला' एवं पन्त, सभी भारतीय संस्कृति के विशारद थे. सभी प्रखर सांस्कृतिक दृष्टि से संपन्न थे एवं सभी ने आस्थावादी अवं आदर्शवादी मूल्यों को बल दिया है. अंध-रूढ़ियाँ तोड़ी हैं, पर निर्माण का स्वर कभी फीका नहीं पड़ने दिया.
नरेन्द्र कोहली ने साहित्य में आस्थावादी मूल्यों को स्वर दिया. सन् १९७५ में उनके रामकथा पर आधारित उपन्यास 'दीक्षा' के प्रकाशन से हिंदी साहित्य में 'सांस्कृतिक पुनरुत्थान का युग' प्रारंभ हुआ जिसे हिन्दी साहित्य में 'नरेन्द्र कोहली युग' का नाम देने का प्रस्ताव भी जोर पकड़ता जा रहा है. तात्कालिक अन्धकार, निराशा, भ्रष्टाचार एवं मूल्यहीनता के युग में नरेन्द्र कोहली ने ऐसा कालजयी पात्र चुना जो भारतीय मनीषा के रोम-रोम में स्पंदित था. युगों युगों के अन्धकार को चीरकर उन्होंने भगवान् राम को भक्तिकाल की भावुकता से निकाल कर आधुनिक यथार्थ की जमीन पर खड़ा कर दिया.
साहित्यिक एवम पाठक वर्ग चमत्कृत ही नहीं, अभिभूत हो गया। किस प्रकार एक उपेक्षित और निर्वासित राजकुमार अपने आत्मबल से शोषित, पीड़ित एवं त्रस्त जनता में नए प्राण फूँक देता है, 'अभ्युदय' में यह देखना किसी चमत्कार से कम नहीं था. युग-युगांतर से रूढ़ हो चुकी रामकथा जब आधुनिक पाठक के रुचि-संस्कार के अनुसार बिलकुल नए कलेवर में ढलकर जब सामने आयी, तो यह देखकर मन रीझे बिना नहीं रहता कि उसमें रामकथा की गरिमा एवं रामायण के जीवन-मूल्यों का लेखक ने सम्यक् निर्वाह किया है. हिंदी साहित्य का मूर्धन्य कवि शिवमंगल सिंह 'सुमन' ने कहा,
"रामकथा की ऐसी युगानुरूप व्याख्या पहले कभी नहीं पढ़ी थी. इससे राम को मानवीय धरातल पर समझने की बड़ी स्वस्थ दृष्टि मिलती है और कोरी भावुकता के स्थान पर संघर्ष की यथार्थता उभर कर सामने आती है. आपकी व्याख्या में बड़ी ताजगी है. तारीफ़ तो यह है कि आपने रामकथा की पारम्परिक गरिमा को कहीं विकृत नहीं होने दिया है. मैं तो चाहूंगा कि आप रामायण और महाभारत के अन्य पौराणिक प्रसंगों एवं पात्रों का भी उद्घाटन करें. है तो जोखिम का काम पर यदि सध गया तो आप हिन्दी कथा साहित्य में सर्वथा नयी विधा के प्रणेता होंगे."
कोहली की प्रशंसा
हिंदी साहित्य के मूर्धन्य साहित्यकारों और दिग्गजों ने नरेंद्र कोहली की मुक्त कंठ से प्रशंसा की है. कथाकार जैनेंद्र कुमार ने कहा,
मैं नहीं जानता कि उपन्यास से क्या अपेक्षा होती है और उसका शिल्प क्या होता है. प्रतीत होता है कि आपकी रचना उपन्यास के धर्म से ऊंचे उठकर कुछ शास्त्र की कक्षा तक बढ़ जाती है. मैं इसके लिए आपका कृतज्ञ होता हूँ और आपको हार्दिक बधाई देता हूँ.
भगवतीचरण वर्मा ने कहा,
मैंने आपमें वह प्रतिभा देखी है जो आपको हिन्दी के अग्रणी साहित्यकारों में ला देती है. राम कथा के आदि वाले अंश का कुछ भाग आपने ('दीक्षा' में) बड़ी कुशलता के साथ प्रस्तुत किया है. उसमें औपन्यासिकता है, कहानी की पकड़ है.
यशपाल जैसे मार्क्सवादी चिन्तक भी नरेन्द्र-कोहली की प्रतिभा के कायल हुए बिना न रहे.
"आपने राम कथा, जिसे अनेक इतिहासकार मात्र पौराणिक आख्यान या मिथ ही मानते हैं, को यथाशक्ति यथार्थवादी तर्कसंगत व्याख्या देने का प्रयत्न किया है. अहल्या की मिथ को भी कल्पना से यथार्थ का आभास देने का अच्छा प्रयास.
भारतीय संस्कृति के सजग प्रहरी हजारीप्रसाद द्विवेदी जैसे मूर्धन्य आलोचक तथा इतिहासकार ने कहा,
"रामकथा को आपने एकदम नयी दृष्टि से देखा है. 'अवसर' में राम के चरित्र को आपने नयी मानवीय दृष्टि से चित्रित किया है. इसमें सीता का जो चरित्र आपने चित्रित किया है, वह बहुत ही आकर्षक है. सीता को कभी ऐसे तेजोदृप्त रूप में चित्रित नहीं किया गया था. साथ ही सुमित्रा का चरित्र आपने बहुत तेजस्वी नारी के रूप में उकेरा है. मुझे इस बात की प्रसन्नता है कि यथा-संभव रामायण कथा की मूल घटनाओं को परिवर्तित किये बिना आपने उसकी एक मनोग्राही व्याख्या की है. ...पुस्तक आपके अध्ययन, मनन और चिंतन को उजागर करती है.
डा. नगेन्द्र जैसे आलोचक का कहना है कि-
दीक्षा में प्रौढ़ चिंतन के आधार पर रामकथा को आधुनिक सन्दर्भ प्रदान करने का साहसिक प्रयत्न किया गया है. बालकाण्ड की प्रमुख घटनाओं तथा राम और विश्वामित्र के चरित्रों का विवेक सम्मत पुनराख्यान, राम के युगपुरुष/युगावतार रूप की तर्कपुष्ट व्याख्या उपन्यास की विशेष उपलब्धियाँ हैं.
वहीं धर्मवीर भारती का ने कहा-
"यूं ही कुतूहलवश 'दीक्षा' के कुछ पन्ने पलटे और फिर उस पुस्तक ने ऐसा intrigue किया कि दोनों दिन पूरी शाम उसे पढ़कर ही ख़त्म किया. बधाई. चार खंडों में पूरी रामकथा एक बहुत बड़ा प्रोजेक्ट है. यदि आप आदि से अंत तक यह 'tempo' रख ले गए, तो वह बहुत बड़ा काम होगा. इसमें सीता और अहल्या की छवियों की पार्श्व-कथाएँ बहुत सशक्त बन पड़ी हैं.
प्रसिद्ध ललित निबंधकार रामनारायण उपाध्याय तो उनपर ऐसे न्यौछावर हुए कि उनकी आलोचना 'भक्ति' की सीमा को छूने लगी :
"मैनें डा. शान्तिकुमार नानुराम का वाल्मीकि रामायण पर शोध-प्रबंध पढ़ा है. रमेश कुंतल मेघ एवं आठवलेकर के राम को भी पढ़ा है; लेकिन (दीक्षा में) जितना सूक्ष्म, गहन, चिंतनपूर्ण विराट चित्रण आपने किया वैसा मुझे समूचे हिन्दी साहित्य में आज तक कहीं देखने को नहीं मिला. अगर मैं राजा या साधन-सम्पन्न मंत्री होता तो रामायण की जगह इसी पुस्तक को खरीदकर घर-घर बंटवाता".
पर सहज आनंद और गौरव का अनुभव किया महान उपन्यासकार अमृतलाल नागर ने, जिन्होंने न सिर्फ पीठ ठोंकी, वरन पहले उपन्यास की कमियाँ भी बताईं और खुले दिल से आगे बढ़ने का आर्शीवाद भी दिया :
"आप अपने नायक के चित्रण में सश्रद्ध भी हैं और सचेत भी. ...प्रवाह अच्छा है. कई बिम्ब अच्छे उभरे, साथ साथ निबल भी हैं, पर होता यह चलता है कि एक अच्छी झांकी झलक जाती है और उपन्यास फिर से जोर पकड़ जाता है. इस तरह रवानी आद्यांत ही मानी जायगी. इस सफलता के लिए बधाई. ... सुबह के परिश्रम से चूर तन किन्तु संतोष से भरे-पूरे मन के साथ तुम्हें बहुत काम करने और अक्षय यश सिद्ध करने का आर्शीवाद देता हूँ.
कोहली जी ने गद्य की सभी विधाओं पर इतना लिखा जितना आज तक किसी भी शीर्षस्थ रचनाकार ने नहीं लिखा था. और प्रेमचंद की ही भांति हिन्दी को वह लेखक फिर मिला जो स्पर्श मात्र से किसी भी विषय को जीवंत कर दे. कहीं भी बिखराव नहीं, कहीं भी अस्पष्टता नहीं; न जटिलता, न ठहराव. नरेन्द्र कोहली आज उस सोपान पर हैं जहां प्रेमचंद तब होते यदि उन्होंने लम्बी आयु पाई होती और अपने कृतित्व का और विकास किया होता. यदि उन्होंने अपनी प्रतिबद्धताओं को तर्कसंगत व्यापकता प्रदान की होती.
प्रसिद्ध कवि बाबा नागार्जुन लिखते हैं,
" प्रथम श्रेणी के कतिपय उपन्यासकारों में अब एक नाम और जुड़ गया-दृढ़तापूर्वक मैं अपना यह अभिमत आपतक पहुंचाना चाहता हूँ. ...रामकथा से सम्बन्धित सारे ही पात्र नए-नए रूपों में सामने आये हैं, उनकी जनाभिमुख भूमिका एक-एक पाठक-पाठिका के अन्दर (न्याय के) पक्षधरत्व को अंकुरित करेगी यह मेरा भविष्य-कथन है.
शेष अगले भागों में--

बुधवार, 10 फ़रवरी 2010

नरेंद्र कोहली का महासमर पढ़िए

 नरेंद्र कोहली का महासमर पढ़िए. हिंदी में विश्वस्तरीय साहित्य का अनुभव करिेए. यह पुस्तक पिछले पच्चीस सालों से हिंदी में बेस्ट सेलर(सबसे ज्यादा बिकने वाली) पुस्तक है. यह पुस्तक आपको हिंदी में सोचने का तरीका बदल देगी. वाणी प्रकाशन की नई साज-सज्जा इसे विश्वस्तरीय बनाती है.
जय हिंदी जय भारत

रविवार, 1 फ़रवरी 2009

ये धुआं-धुंआ क्यों है?

यानी श्रीलंका का सच
श्रीलंका में दशकों से जारी गृहयुद्ध की वजह जातीय पहचान और स्वयं को श्रेष्ठ दिखाने की होड़ है. जातीय पहचान की यह लड़ाई औपनिवेशिक काल से ही जारी है. इस लड़ाई की बीज औपनिवेशिक काल में ही बोई गई थी. बहुसंख्यक सिंहला और अल्पसंख्यक तमिलों के बीच पुरातात्विक स्थलों, पौराणिक नामों और इनका राजनीतिक उपयोग को लेकर खून बहता रहा है.
जातीय पहचान के प्रति आग्रह ईसाई मिशनरियों के श्रीलंका आगमन से ही शुरू होता है. उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में श्रीलंका में ज्यों ज्यों ईसाई मिशनरियों की गतिविधियां बढ़ी, अल्पसंख्यक तमिलों में भी धार्मिक, सांस्कृतिक और भाषाई पहचान का भाव जगने लगा और वह अभिव्यक्त भी होने लगा । अपनी पहचान बनाये रखने के लिए उन्होंने ईसाई मिशनरियों की तरह मंदिरों, स्कूलों का निर्माण, सभाओं का आयोजन और साहित्यों का प्रकाशन शुरू किया.
बात 1815 की है. ब्रिटन ने श्रीलंका पर कब्जा जमा लिया. प्रशासन का काम चलाने के लिए विधान परिषद का गठन हुआ. विधान परिषद में तीन यूरोपीय, एक सिंहला और एक तमिल को जगह मिली. साफ है कि सत्ता में सिंहलाओं और तमिलों को उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिला. सत्ता में उचित भागीदारी नहीं मिलने से दोनों ही समुदायों में असंतोष पैदा हुआ. बाद में अंग्रेजों ने इस असंतोष को हथियार के रूप में अपनाया. फूट डालो, राज करो की नीति के तहत जातीय विभाजन और सांप्रदायिकता को बढ़ावा दिया.
1948 में श्रीलंका आजाद हुआ. इसी साल सिलोन नागरिकता कानून अस्तित्व में आया. इस कानून के मुताबिक तमिल भारतीय मूल के हैं इसलिए उन्हें श्रीलंका की नागरिकता नहीं दी जा सकती है. हालांकि इस कानून को मान्यता नहीं मिली.
1956 में सिंहला को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिया गया, जिसका तमिल राष्ट्रवादी पार्टी ने विरोध किया और उसके सांसद सत्याग्रह पर बैठ गए. बाद में इस विरोध ने हिंसक रूप ले लिया. इस हिंसा में दर्जनों लोग मारे गए और हजारों तमिलों को बेघर होना पड़ा. 1958 के दंगे के बाद तमिल राष्ट्रवादी पार्टी पर प्रतिबंध लगा दिया गया.
संघर्ष का दूसरा कारण सरकार की वह नीति थी जिसके तहत बहुसंख्यक सिंहला समुदाय को पूर्वी प्रांत में बसाया गया, जो परंपरागत रूप से तमिल राष्ट्रवादी लोगों का होमलैंड समझा जाता है. संघर्ष का तात्कालिक कारण यही है.
सत्तर के दशक में भारत से तमिल पुस्तकों, पत्र-पत्रिकाओं और फिल्में के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया गया. साथ ही, श्रीलंका में उन संगठनों पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया, जिनका संबंध तमिलानाडु के राजनीतिक दलों से था. छात्रों के भारत आकर पढ़ाई करने पर रोक लगा दी गई. श्रीलंकाई तमिलों ने इन कदमों को उनकी अपनी संस्कृति से काटने की साजिश करार दिया, हालांकि सरकार ने इन कदमों को आर्थिक आत्मनिर्भरता के समाजवादी एजेंडा का हिस्सा बताया.
1973 में सरकार ने मानकीकरण की नीति लागू की. सरकार के हिसाब से इसका उद्देश्य शिक्षा में असमानता दूर करना था, लेकिन इससे सिंहलियों को ही फायदा हुआ और श्रीलंका के विश्वविद्यालयों में तमिल छात्रों की संख्या लगातार घटती गई.
इसी साल तमिल राष्ट्रवादी पार्टी यानी फेडरल पार्टी ने अलग तमिल राष्ट्र की मांग कर डाली. अपनी मांग को मजबूत करने के लिए फेडरल पार्टी ने अन्य तमिल पार्टियों को अपने साथ कर दिया और इस तरह तमिल यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट का निर्माण हुआ. फ्रंट का 1976 में एक सम्मेलन हुआ, जिसमें पार्टी ने अलग राष्ट्र की मांग की. हालांकि इस समय तक सरकार की नीतियों के भारी विरोध के बावजूद पार्टी एक राष्ट्र के सिद्धांत की बात करती थी.
कुल मिलाकर, आजादी से पहले जो काम अंग्रेजों ने किया, वही काम आजादी के बाद आत्मनिर्भरता के नाम पर श्रीलंका सरकार ने किया.
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श्रीलंका सरकार की गलत नीतियों और पक्षपातपूर्ण रवैये की वजह से श्रीलंका तमिलों में गहरा असंतोष पैदा हो गया.
जो तमिल पार्टियां 1973 तक राष्ट्र विभाजन के खिलाफ थी, वो भी अगल राष्ट्र की मांग करने लगीं.
सरकार की नीतियों की वजह से बहुसंख्यक सिंहला समुदाय को जहां फायदा पहुंचा, वहां अल्पसंख्यक तमिलों को नुकसान. शिक्षा से लेकर रोजगार तक, धर्म से लेकर संस्कृति तक, वाणिज्य से लेकर व्यवसाय तक.. हर जगह तमिलों को बेदखल किया गया. उन्हें उनके हक से वंचित किया गया. सत्तर और अस्सी के दशक में स्थिति ये हो गई कि तमिल युवकों का युनिवर्सिटी में दाखिला और रोजगार पाना नामुमकिन-सा हो गया. इन बेरोजगार और बेकार युवकों ने विद्रोह का रास्ता अख्तियार कर लिया. ब्लैक जुलाई की घटना से भी तमिल विद्रोह को हवा मिली. तेईस जुलाई 1983 को एलटीटीई के एक हमले में श्रीलंकाई सेना के तेरह जवान मारे गए. इस घटना के बाद भड़की हिंसा में कम से कम एक हजार तमिल मारे गए और कम से कम दस हजार घरों को आग के हवाले कर दिया गया. इस नरसंहार ने दुनियाभर के तमिलों को हिला दिया. श्रीलंका में हजारों युवकों ने सशस्त्र विद्रोह का रास्ता अपना लिया.
औपनिवेशिक काल में चाय के बगानों में काम करने के लिए मजदूरों से भारत से श्रीलंका लाया गया था. कहते हैं कि घाव कितना भी गहरा हो, समय के साथ भर जाता है, लेकिन तमिलों के साथ ऐसा नहीं हुआ. जिन तमिलों ने देश की प्रगति में हिस्सेदारी निभाई, उन्हें ने बहुसंख्यक सिंहल समुदाय अपना मानने के लिए तैयार नहीं हुआ. यही वजह है कि तमिलों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी गरीबी की जिंदगी गुजारने के लिए मजबूर होना पड़ा.
1962 में भारत और श्रीलंका के बीच एक संधि हुई जिसके तहत अगले पंद्रह सालों में छह लाख तमिलों को भारत भेजा जाना था और पौने चार लाख तमिलों को श्रीलंका की नागरिकता देनी थी. लेकिन ये तमिल श्रीलंका से भारत नहीं लौटे. बिना नागरिकता, बिना अधिकार वे श्रीलंका में ही रहते रहे. साल 2003 तक उन्हें श्रीलंका की नागरिकता नहीं मिली.
जब सिंहला को राजभाषा का दर्जा मिला तो तमिलभाषी लोगों को नौकरियों से निकाल दिया गया. एक ओर भारत से तमिल साहित्य, फिल्मों, पत्र-पत्रिकाओं के आयात पर रोक लगा दी गई. दूसरी ओर, शिक्षा नीति के मानकीकरण के नाम पर तमिलों के कॉलजों में प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया गया. 1981 के जाफना लाइब्रेरी अग्निकांड से तमिलों को बहुत ठेस पहुंची. इकतीस मई से दो जून तक बड़े ही सुनियोजित तरीके से तमिलों पर हमला किया गया. तमिल अखबार के ऑफिस और लाइब्रेरी को आग के हवाले कर दिया गया. इस अग्निकांड में लाइब्रेरी की करीब एक लाख तमिल पुस्तकें जलकर राख हो गई. इस अग्निकांड में कई पुलिसकर्मी भी शामिल थे.
श्रीलंका साल 1983 से ही गृहयुद्ध की विभीषिका झेल रहा है. इस युद्ध में आधिकारिक रूप से सत्तर हजार से भी ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं. इसे दुनिया का सबसे खतरनाक संघर्षों में से एक माना जाता है. यह युद्ध मुख्यत तमिल विद्रोही एलटीटीई और सिंहला समुदाय के प्रभाव वाली सरकार के बीच है. दुनिया के इकतीस देशों ने एलटीटीई को आतंकवादी संगठन का दर्ज दे रहा है.
2001 युद्धविराम के बाद शांति की संभावना बनी. 2002 में दोनों पक्षों ने एक संधि पर हस्ताक्षर भी किया, लेकिन 2005 में हिंसा फिर से भड़क उठी. 2006 में सरकार ने एलटीटीई के खिलाफ मोर्चा खोल दिया और पूर्वी प्रांत से उसे बाहर खदेड़ दिया. इसके बावजूद लिट्टे ने अलग राष्ट्र की मांग को लेकर संघर्ष फिर से शुरू करने की घोषणा की. श्रीलंकाई सेना ने दावा किया कि उसने दुश्मन के सारे नौकाओं को नष्ट कर दिया है और उसने ये भी दावा किया कि आने वाले समय में वह उसे पूरी तरह नष्ट कर देगी. एलटीटीई पर सैंकड़ों बार संधि उल्लंघन का आरोप लगाते हुए उसने दो जनवरी 2008 को उसके खिलाफ युद्ध छेड़ दिया.
एक साल बाद उसने लिट्टे के गढ़ किलिनोच्ची पर कब्जा जमा लिया. इस संघर्ष की वजह से करीब दो लाख तमिलों को विस्थापित होना पड़ा.
संघर्ष के कारण
सिंहला वनली एक्ट- इस कानून के मुताबिक देश की राष्ट्रभाषा सिंहला होगी
गैर-सिंहलियों को रोजगार मिलना करीब-करीब असंभव हो गया
जो पहले से नौकरी में थे, उन्हें नौकरी से निकाला जाने लगा
प्रधानमंत्री एसडब्ल्यूआरडी भंडारनायके ने यह कानून लाया था
शिक्षा का कथित मानकीकरण
इस कानून के तहत, विश्वविद्यालयों में तमिलों का प्रवेश असंभव हो गया
नौकरियों में भी गैर-सिंहलियों के लिए कोई काम नहीं बचा
उन्हें नौकरी से निकाला जाने लगा
तमिल यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट का गठन
टीयूएलएफ ने अधिकार के लिए सशस्त्र संघर्ष का समर्थन किया
बेरोजगार और बेकार युवकों ने हथियार उठा लिया
वामदल शुरू-शुरू में सांप्रदायिक संघर्ष का समर्थन नहीं किया
बाद में, भाषा के मुद्दे पर वामदलों ने टीयूएलएफ का साथ दिया
1974 में लिबरेशन टाईगर ऑफ तमिल ईलम का गठन
एलटीटीई को राजनीतिक समर्थन
एलटीटीई का राजनीतिक और प्रशासनिक प्रतिष्ठानों पर हमला
लिट्टे का कारनामा
1977 में जाफना के महापौर अल्फ्रेड दुरैअप्पा की हत्या
1977 में स्वयं प्रभाकरन द्वारा तमिल सांसद एम कनगरत्नम की हत्या
1983 में सैनिक काफिले पर हमला, 13 सैनिकों की मौत
1984 में केंट और डॉलर फॉर्म में आम नागरिकों की सामूहिक हत्या
1985 में अनुराधापुरम में 146 नागरिकों की हत्या
1987 में एलटीटीई ने पहलीबार आत्मघाती हमले को अंजाम दिया
विस्फोटकों से भरे ट्रक को सैन्य शिविर की दीवार से टकरा दिया
इस हमले में चालीस सैनिक मारे गए
इस हमले के बाद लिट्टे ने 170 से भी ज्यादा आत्मघाती हमले को अंजाम दिया
यह संख्या दुनिया के किसी भी संगठन के आत्मघाती हमले की संख्या से ज्यादा है
आखिरकार आत्मघाती हमला एलटीटीई की पहचान बनाया.
1989 में जाफना विश्वविद्याल के प्रोफेसर और मानवाधिकारवादी डॉ रजनी की हत्या
1993 में लिट्टे ने एक आत्मघाती हमले में राष्ट्रपति रनसिंघे प्रेमदासा की हत्या कर दी.
1996 में कोलंबों के सेंट्रल बैंक में आत्मघाती हमला, 90 की मौत, 1400 घायल
1997 में श्रीलंकाई वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमला
1998 में बौद्धों के सबसे पवित्र मंदिरों में से एक टेंपल ऑफ टूथ पर हमला
1999 गोनागाला पर हमला, 50 सिंघलियों की मौत
2001 में भंडारनायके इंटरनेशनल हवाई अड्डे पर हमला
इस हमले में एयरफोर्स के आठ और श्रीलंकन एयरलाइन्स के चार विमान नष्ट हो गए
हमले का प्रतिरोध
1983 में सेना पर लिट्टे के हमले के बाद सिंहलियों ने तमिलों पर सुनियोजित हमले किए
इन हमलों में एक हजार से ज्यादा तमिल मारे गए
तमिलों के सिंहलियों के इलाके से भागना पड़ा
अनुराधापुरम हत्या मामले के जवाब में सेना ने कुमदिनी बोट पर हत्या कर 23 तमिलों की हत्या कर दी
1987 सेना ने ऑपरेशन लिबरेशन शुरू किया
इसका लक्ष्य जाफना को मुक्त कराना था
इस ऑपरेशन में सेना को जीत मिली, मगर प्रभाकरन भागने में कामयाब हो गया
भारतीय हस्तक्षेप
भारत ने कई कारणों से श्रीलंकाई संघर्ष में हस्तक्षेप किया. इनमें क्षेत्रीय शक्ति के रूप में खुद को प्रदर्शित करना और तमिलनाडु में आजादी की मांग को दबाना शामिल था. चूंकि तमिलनाडु के लोग सांस्कृतिक कारणों से श्रीलंकाई तमिलों के हितों के पक्षधर रहे हैं, इसलिए भारत सरकार को भी संघर्ष के दौरान श्रीलंकाई तमिलों की मदद में आगे आना पड़ा है. 80 के दशक की शुरुआत में भारतीय एजेंसियों ने कई तरह से तमिलों की मदद की.
पांच जून 1987 को जब श्रीलंका सरकार ने दावा किया कि वे जाफना पर कब्जा करने के करीब हैं, तभी भारत ने पैराशूट के जरिए जाफना में राहत सामाग्रियां गिराई. भारत की इस मदद को लिट्टे की प्रत्यक्ष मदद भी माना गया. इसके बाद 29 जुलाई, 1987 को प्रधानमंत्री राजीव गांधी और श्रीलंकाई राष्ट्रपति जयवर्द्धने के बीच एक समझौते पर हस्ताक्षर हुआ. इस समझौते के तहत तमिल को आधिकारिक दर्जा दिया गया. साथ ही, तमिलों के कई अन्य मांगें मान ली गईं. वहीं, भारतीय शांति रक्षक बलों के सामने विद्रोहियों को हथियार डालना पड़ा.
ज्यादातर विद्रोही गुटों ने भारतीय शांति रक्षक बलों के सामने हथियार डाल दिए थे, लेकिन लिट्टे इसके लिए तैयार नहीं हुआ. भारतीय शांति रक्षक सेना ने लिट्टे को तोड़ने की पूरी कोशिश की. तीन सालों तक दोनों के बीच युद्ध चला. इस दौरान शांति रक्षकों पर मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप भी लगे. उधर, सिंहलियों ने भी अपने देश में भारतीय सैनिकों की उपस्थिति का विरोध करना शुरू किया. इसके बाद श्रीलंका सरकार ने भारत से शांति रक्षकबलों को वापस बुलाने की मांग की, लेकिन राजीव गांधी ने इससे इनकार कर दिया. 1989 के संसदीय चुनाव में राजीव गांधी की हार के बाद नए प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने श्रीलंका से शांति रक्षक बलों को हटाने का आदेश दिया. इन तीन सालों में श्रीलंका में ग्यारह सौ भारतीय सैनिक मारे गए, वहीं पांच हजार श्रीलंकाई भी मारे गए.
1991 में एक आत्मघाती हमलाकर लिट्टे ने राजीव गांधी की हत्या कर दी. इसके बाद भारत ने श्रीलंकाई तमिलों की मदद बंद कर दी.
साल 2008 में जब श्रीलंकाई सेना ने लिट्टे के ठिकानों पर कब्जा करना शुरू किया तो भारत की गठबंधन सरकार हिल गई. तमिलनाडु के राजनीतिक दलों ने केंद्र सरकार से श्रीलंकाई मामले में हस्तक्षेप की मांग की. ऐसा नहीं करने पर मुख्य सहयोगी दल डीएमके ने सरकार से हटने की भी धमकी दे डाली. केंद्र सरकार पर दबाव बनाने के लिए तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम करुणानिधि ने अपने सांसदों से इस्तीफा तक ले लिया. तमिलों के मुद्दे पर तमिलनाडु की तमाम पार्टियां साथ हो गई और श्रीलंका में तुरंत युद्धविराम की मांग की. भारी दबाव के बीच विदेशमंत्री प्रणव मुखर्जी श्रीलंका गए. श्रीलंका के राष्ट्रपति ने उन्हें तमिलों की सुरक्षा का आश्वासन दिया. युद्ध में फंसे आम-नागरिकों को बाहर निकलने लिए उसने एकतरफा युद्ध विराम भी किया. अगर यही बात पहले होती तो सैंकड़ों निर्दोष लोगों की जान बच जाती.

शनिवार, 24 जनवरी 2009

इजरायल का अस्तित्व

इजरायल दुनिया का एकमात्र यहूदी देश है. अपनी आजादी से पहले भी और आजादी के बाद भी इजराइल अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा है. यूं कहे तो इजरायल का अस्तित्व संघर्ष और सिर्फ संघर्ष पर टिका है. उसका आज तक का इतिहास अत्यंत ही रक्त-रंजित रहा है. इसके बावजूद भविष्य शांतिपूर्ण होगा, इसकी सिर्फ शुभकामना ही दी जा सकती है.
इजरायल पश्चिमी एशिया का एक छोटा सा देश है. यह भूमध्यसागर के किनारे स्थित है. इसकी उत्तरी सीमा पर लेबनान, उत्तर-पूर्व में सीरिया, पूर्व में जॉर्डन और दक्षिण-पश्चिम में मिश्र स्थित है. क्षेत्रफल के हिसाब छोटा होने के बावजूद इजरायल काफी विविधतओं भरा देश है. पश्चिमी तट और गजा पट्टी इजरायल से सटा हुआ है.
इजरायल की आबादी बहत्तर लाख अस्सी हजार है. इनमें यहूदी बहुसंख्यक हैं. इजरायल दुनिया का एकमात्र यहूदी राष्ट्र है. यहूदी के अलावा यहां अरबी मुस्लिम, ईसाई और अन्य जातियां भी रहती हैं.
आधुनिक इजरायल प्राचीनकाल के यहूदी भूमि की परिकल्पना पर आधारित है. कभी समूचा इयरायल यहूदी धर्मावलंबियों का देश माना जाता था. प्रथम विश्वयुद्ध के बाद राष्ट्रसंघ ने यहूदियों के लिए एक अलग देश के रूप में इजरायल के गठन के ब्रिटेन के प्रस्ताव को मान्यता दे दी. 1947 में संयुक्त राष्ट्र ने इजरायल के विभाजन को मंजूरी दे दी. जिसके तहत यहूदियों और अरबों के लिए अलग राज्य को मंजूरी दे दी. 14 मई 1948 को यहूदी बहुल राज्य इजरायल ने अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दी. इजरायल के इस घोषणा को आस-पास के अरब राष्ट्रों ने मानने से इनकार कर दिया और इजरायल के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया.
इजरायल ने अरब राष्ट्रों के साथ एक ही समय कई मोर्चों पर युद्ध लड़ा और सभी युद्धों में जीत हासिल की. इस जीत ने अलग इजरायल की स्वतंत्रता को पुख्ता कर दिया. इतना ही नहीं, इस जीत के बाद इजरायल ने संयुक्त राष्ट्र की विभाजन योजना के बाहर भी अपनी सीमा का विस्तार किया. इसके बाद से इजरायल को अपने पड़ोसी अरब देशों से लगातार संघर्ष करना पड़ा. ये संघर्ष बड़े युद्धों और रक्तपात के अंतहीन सिलसिले के रूप में सामने आया और आज भी जारी है.
सीधे-सीधे शब्दों में कहें तो इजयराल की स्थापना और उसका अस्तित्व संघर्षों पर ही टिका है. इजरायल ने मिश्र और जॉर्डन के साथ कई शांति-संधि भी किए, लेकिन शांति के ये प्रयास इजरायल और फिलीस्तीनियों में दीर्घकालीन शांति
लाने में नाकामयाब रहे.
इजरायल में संसदीय शासन व्यवस्था है. प्रधानमंत्री सरकार का मुखिया होता है. सकलू घरेलू उत्पाद के हिसाब से इजरायल दुनिया का चौवालिसवां सबसे बड़ा देश है. मानव विकास सूचकांक, प्रेस की स्वतंत्रताऔर आर्थिक प्रतिस्पर्धा के हिसाब से मध्यपूर्व के देशों में इजरायल का स्थान सबसे ऊपर है. देश का सबसे बड़ा शहर येरूसलम इसकी राजधानी है, जबकि तेल अवीव इसकी वित्तीय राजधानी है.
इतिहास
इजरायल ईसापूर्व से ही यहूदियों की पवित्र भूमि मानी जाती है. प्राचीन मान्यता के अनुसार, ईश्वर ने तीन यहूदियों को रहने के लिए ये धरती दी थी. विद्वान मानते हैं कि यह समय ईसा पूर्व दूसरी सहस्त्राब्दी की हो सकती है. यहूदी परंपरा के मुताबिक ईसापूर्व ग्यारहवी सदी में इस भूमि पर इजरायली साम्राज्य स्थापित हुआ था और इन शासकों ने करीब एक हजार साल तक इजराइल पर शासन किया था. इजरायल के ये स्थल यहूदियों के लिए सबसे पवित्र माना जाता है.
इजरायली साम्राज्य और सातवीं शताब्दी में इस्लामी विजय के मध्य इजरायल पर सीरिया, बेबीलोनिया, पर्सिया, ग्रीक, रोम, ससेनिया और बायजेनटाइन का शासन रहा. 132 ईस्वी में रोमन साम्राज्य के खिलाफ बार कोखबा विद्रोह की असफलता के बाद इस क्षेत्र में यहूदियों की उपस्थिति घट गई. यहूदियों का बड़े पैमाने पर पलायन हुआ. 628-29 ईस्वी में बायजेनटाइन शासक हेराक्ल्यूस ने वृहत पैमाने पर यहूदियों का संहार किया, जिसके कारण यहूदियों को वहां से भागना पड़ा. इस घटना के बाद यहां यहूदियों की संख्या नगण्य हो गई. 1260 में इजरायल मामलुक सल्तनत का हिस्सा बन गया और 1516 में यह ओटोमन साम्राज्य का हिस्सा बन गया, जिसने बीसवीं सदी तक इस क्षेत्र पर शासन किया.
इजरायलियों को करीब पंद्रह सौ सालों तक अपनी जमीन से अलग रहना पड़ा, लेकिन सांस्कृतिक एकता ने इनके दिलों में मातृभूमि के प्रति प्रेम की लौ को जलाये रखा. बाइबिल और यहूदी प्रार्थना पुस्तिका ने इनकी आशा और विश्वास को बरकरार रखा. बारहवीं सदी की शुरुआत में कैथोलिक ईसाईयों की प्रताड़ना से पीड़ित होकर यहूदी एकबार फिर इजरायल लौटने लगे. 1492 में स्पेन ने यहूदियों को खदेड़ दिया. सोलहवी शताब्दी में इजरायल चार शहरों में यहूदियों ने जड़ें जमा ली और अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में भारी संख्या में लोग इजरायल में आ बसे.
उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में यहूदियों ने एक अलग यहूदी राष्ट्र की मांग शुरू कर दी. 1896 में हर्जल ने अपनी किताब द जेविस स्टेट में भावी यहूदी राष्ट्र की रूप रेखा रखी. अगले ही साल वर्ल्ड जियोनिस्ट कांग्रेस की स्थापना हुई, जिसकी अध्यक्षता हर्जल ने की.
1904-14 के दौरान करीब चालीस हजार यहूदी फिलीस्तीन में आकर बस गए. प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान ब्रिटेन के विदेशमंत्री आर्थर बलफोर ने एक घोषणा पत्र जारी किया, जिसे बलफोर घोषणापत्र के नाम से जाना जाता है. इस घोषणा पत्र में फिलीस्तीन के अंदर एक यहूदी राष्ट्र की बात कही गई थी. इस घोषणा पत्र में ये बात भी शामिल की गई कि कुछ भी ऐसा नहीं किया जाए जिससे फिलीस्तीन में यहूदियों के नागरिक अधिकारों के खिलाफ हो, चाहे यहूदी दुनिया के किसी भी भाग में भी क्यों न हो. यहूदी स्वयंसेवकों की मदद से जेविस लीगन नाम से सेना की बटालियन बनी, जिसने फिलीस्तीन को जीतने में ब्रिटिश सेना की मदद की. इसका अरबों ने विरोध किया और 1920 का फिलीस्तीन युद्ध हुआ.
1922 लीग ऑफ नेशन्स ने बलफोर घोषणा पत्र से मिलते जुलते ब्रिटेन के एक प्रस्ताव को मंजूरी दे दी. इस क्षेत्र में अरब मुस्लिमों की आबादी ज्यादा थी, लेकिन इस क्षेत्र का सबसे बड़ा शहर येरूसलम यहूदी बहुल था. इधर, यहूदियों का फिलीस्तीन आना जारी रहा और फिलीस्तीन में यहूदियों की आबादी एक लाख हो गई. 1930 में नाजीवाद के उदय के कारण यूरोप से भारी संख्या में यहूदियों का पलायन हुआ और फिलीस्तीन में यहूदियों की संख्या बढ़कर ढाई लाख से भी ज्यादा हो गई. यहूदियों आबादी के विस्तार ने 1936-39 के अरब क्रांति को जन्म दिया. इधर, दुनियाभर में यहूदियों के संहार का सिलसिला जारी रहा. द्वितीय विश्व आते-आते फिलीस्तीन में यहूदियों की आबादी बढ़कर तैंतीस प्रतिशत तक आ पहुंची.
इजरायल की आजादी
1945 के बाद ब्रिटेन का यहूदियों का साथ मतभेद बढ़ गया. 1947 में ब्रिटेन ने यह कहकर फिलीस्तीन शासनादेश को वापस ले लिया कि वह अरबों और यहूदियों के बीच सर्वसम्मत हल निकालने में नाकामयाब रहा. नवगठित संयुक्त राष्ट्र संघ ने 29 नवंबर, 1947 को संयुक्त राष्ट्र विभाजन प्रस्ताव(संयुक्त राष्ट्र आमसभा प्रस्ताव 181) को मंजूरी दे दी और इस प्रकार अरब और यहूदियों के लिए दो राष्ट्रों ने निर्माण हुआ. इस प्रस्ताव के तहत संघर्ष रोकने के लिए येरूसलम को अंतर्राष्ट्रीय शहर घोषित कर दिया गया और स्वयं संयुक्त राष्ट्र ने इसके प्रशासन की जिम्मेदारी संभाल ली. इस प्रस्ताव को अरब लीग और अरब उच्च समिति ने खारिज कर दिया. एक दिसंबर, 1947 से अरब उच्च समिति ने तीन दिवसीय हड़ताल शुरू की और अरब लड़ाकाओं नें यहूदियों पर हमला कर दिया. यहूदियों ने भी रक्षात्मक रुख अपनाया और अरबों को जवाब देना शुरू किया. इस तरह यहां गृहयुद्ध भड़क उठा. इस गृहयुद्ध की वजह से फिलीस्तीन-अरब अर्थव्यवस्था ढह गई और फिलीस्तीन-अरब को भागना पड़ा.
14 मई, 1948 को यहूदी एजेंसी ने इजरायल की स्वतंत्रता की घोषणा कर दी. इधर, मिस्र, सीरिया, जॉर्डन, लेबनान और इराक ने एक साथ इजरायल पर हमला कर दिया. इस युद्ध को 1948 का अरब-इजरायल युद्ध के नाम से भी जाना जाता है. इस युद्ध में अरब देशों की सहायता के लिए मोरक्को, सूडान, यमन और सऊदी अरब ने भी अपने सैनिक भेजे. यह युद्ध एक साल तक चला. और अंत में युद्धविराम की घोषणा हुई. ग्रीन-लाइन के नाम के अस्थायी सीमा रेखा पर सहमति बनी. अलग जॉर्डन को पश्चिम तट और गजा नाम दिया गया. गजा पट्टी पर मिस्र ने नियंत्रण कर लिया. 11 मई, 1949 को संयुक्त राष्ट्र ने इजरायल को अपनी सदस्यता प्रदान की. संघर्ष के दौरान अस्सी प्रतिशत अरब आबादी (7,11,000) को वहां से भागना पड़ा. इस समय फिलीस्तीन शरणार्थी की समस्या इजराइल-फिलीस्तीन संघर्ष की मुख्य वजह माना जा रहा है.
अरब देशों ने इजरायल को मान्यता देने से इनकार कर दिया और इजरायल को नष्ट करने का आह्वान किया. 1967 में मिस्र, सीरिया और जॉर्डन की सेना इजरायली सीमा पर पहुंच गई. और संयुक्त राष्ट्र शांति रक्षकों को वहां से भगा दिया. साथ ही, उन्होंने लालसागर तक इजरायल की आवाजाही पर रोक लगा दी. इजरायल ने अरबों के इस कार्रवाई का जवाब दिया और छह दिनों तक चले युद्ध में उसे निर्णायक जीत मिली. उसने पश्चिमतट, गजा पट्टी, सिनाई प्रायद्वीप और गोलन की पहाड़ियों पर कब्जा जमा लिया. 1949 में ग्रीन लाईन इजरायल और विजित क्षेत्र की प्रशासनिक सीमा बन गयी. पूर्व येरूसलम के साथ येरूसलम की सीमा में भी विस्तार हुआ. 1980 में पारित येरूसलम कानून ने इस सीमा को मंजूरी दे दी, जिसने येरूसलम की स्थिति पर विवाद खड़ा कर दिया.
1967 के युद्ध में अरबों की हार ने अरब में गैर-सरकारी तत्वों के संघर्ष को बढ़ावा दिया. फिलीस्तीन लिबरेशन ऑर्गनाइजेशन ने तो हथियार बंद संघर्ष को ही आजादी का एकमात्र रास्ता करार दिया. साठ के दशक के शुरू और सत्तर के दशक के अंत में फिलीस्तीनियों ने इजरायलियों के खिलाफ दुनियाभर में श्रृंखलाबद्ध हमले किये. 1972 के ग्रीमकालीन ओलंपिक में इजरायली खिलाड़ियों का संहार इसमें शामिल है. उधर, इजरायल ने भी इन हमलों का जवाब दिया.
1977 के संसदीय चुनाव के बाद मिस्र के राष्ट्रपति अनवर अल सादत ने इजरायली संसद में भाषण देते हुए कहा कि अरब देश इजरायल को पहलीबार मान्यता दे रहे हैं. बाद में एक समझौते के मुताबिक इजरायल ने सिनाई प्रायद्वीप से सेना हटा लिया और ग्रीन लाइन के पार फिलीस्तीन की स्वायत्ता पर बाचीत के लिए तैयार हो गया. हालांकि फिलीस्तीन की स्वायत्तता पर कभी बातचीत नहीं हो पाई. सरकारों ने इजरायलियों को पश्चिमी तट में बसाना शुरू किया, जिसकी वजह से फिर संघर्ष शुरू हो गया.
7 जून 1981 को इजरायल ने इराक के ओसिराक परमाणु रिएक्टर पर हमला कर दिया. इसकी वजह इजरायल का वो खुफिया रिपोर्ट है जिसमें इराक द्वारा परमाणु बम विकसित करने और इजरायल के खिलाफ प्रयोग करने की बात कही गई थी. 1982 में इजरायल ने लेबनान के गृहयुद्ध में हस्तक्षेप करते हुए कई युद्ध शिविरों को नष्ट कर दिया, जहां से फिलीस्तीनी लड़ाके इजरायल पर मिसाईल से हमले करते थे.
1987 में फिलीस्तीनियों ने एकबार फिर हिंसा भड़क उठी. छह साल तक चले इस युद्ध में एक हजार लोग मारे गए.
1993 में इजरायल की ओर से शिमॉन पैरेस और फिलीस्तीन लिबरेशन ऑर्गेनाइजेशन की ओर से महमूद अब्बास ने ओस्लो संधि पर हस्ताक्षर किया. इस संधि ने फिलीस्तीन राष्ट्रीय प्राधिकरण को पश्चिमी तट और गजा पट्टी पर स्व-शासन का अधिकार दिया. इस संधि का मकसद आतंकवाद को खत्म करना था. 1994 में इजरायल-जॉर्डन संधि अस्तित्व में आया जिसके तहत जॉर्डन ने इजरायल के साथ रिश्ते सामान्य करने की दिशा में कदम बढ़ाया. ये संधि दोनों पक्ष के लोगों को स्वीकार था. लेकिन 1995 में यहूदियों के नेता यित्जिहाक रबिन की हत्या ने शांति संधि को नुकसान पहुंचाया.
1990 के अंत में इजरायल ने बेंजामिन नेतनयाहु की अगुवाई में हेब्रॉन से अपना सैनिक हटा लिया और फिलीस्तीन राष्ट्रीय प्राधिकारण को शासन का अधिकार दे दिया.
1991 में प्रधानमंत्री यहुद बराक ने दक्षिणी लेबनान से सैन्य वापसी कर नए युग की शुरुआत की. बाद में भी उन्होंने फिलीस्तीन प्राधिकरण के अध्यक्ष यासर यराफात से बातचीत जारी रखी. जुलाई 2000 में कैंप डैविड में यासर अराफात और अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के बीच हो रहे सम्मेलन में बराक ने फिलीस्तीनी राज्य की स्थापना का प्रस्ताव दिया, जिसे अराफात ने नामंजूर कर दिया और इस तरह बातचीत भंग हो गई.
2001 में एरियल शैरॉन नए प्रधानमंत्री बने. शैरॉन ने गजा पट्टी से एकतरफा अपने सैनिकों को हटा लिया. मगर 2006 में हृदयाघात से वे कॉमा में चले गए और सत्ता यहुद ओल्मर्ट को सौंप दिया..
नवीन घटनाचक्र
जुलाई 2006 में हिजबुल्ला लड़ाकाओं ने इजरायल पर मिसाइल से हमले किए और दो इजरायलियों का अपहरण कर लिया. इससे द्वितीय लेबनान युद्ध भड़क उठा और लड़ाई महीने भर चली.
नवंबर 2007 में इजराइली प्रधानमंत्री यहुद ऑल्मर्ट और फिलीस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास सभी मुद्दों पर बातचीत के लिए राजी हो गए और दोनों ने संघर्ष विराम कर दिया.
मगर, दिसंबर 2008 के अंत में हमास ने युद्ध विराम का उल्लंघन करते हुए गजा पट्टी से इजरायल पर मिसाइल से हमले शुरू कर दिए. इजराइल ने भी जवाबी हमले किए. अठारह दिनों तक चले इस युद्ध में कम से कम ग्यारह सौ लोग मारे गए, जबकि कोई पांच हजार घायल हुए. गजा पट्टी में ढाई लाख मकान ध्वस्त हो गए.