हिंदी शोध संसार

बुधवार, 31 मार्च 2010

नरेंद्र मोदी ने 28-02-2002 को भाषण दिया, दूरदर्शन पर प्रसारित हुआ, इसके बावजूद हमारी छद्म-सेक्युलर सरकार और मीडिया को मोदी का बयान चाहिए

27-02-08 को गोधरा में 58 कारसेवकों को ट्रेन में जलाकर मार दिया गया. 28-02-2002 को गुजरात के मुख्यमंत्री ने प्रदेशवासियों के नाम गुजराती में संदेश दिया था, जिसका अंग्रेजी और उसका हिंदी अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूं--
अंग्रेजी संस्करण(नरेंद्र मोदी की अपील) हिंदी अनुवाद


YESTERDAY, IN GODHRA INHUMAN TRAGEDY HAS taken placem, more than 40 female and children were burnt alive and 18 males were also burnt alive. in all 58 people were mercilessly massacred in a single rail bogie by cannibals. I the history of mankind such a heinous crime can bring tears in the eyes of even the strongest of a person. The heinous crime, an act of cowardness and inhumanity has taken place in Gujrat, can’t be justified by any human society. A crime that can never be forgiven. I want to assure the people of Gujrat that anything like will never be tolerated. The culprit will be punished appropriately for the crime they have committed, not only that an example will be set so that in future, no will be ever dream to commit such a heinous act. The government of Gujrat is committed to the protection of its citizen. For the people who take the law in their hands and destroy the lives of innocent people, there is no place for the act in the civilized society.

I share the grief of the people of gujrat. This is very painful moment and can’t be defiened. But the same time, but creating disturbances, indiscipline and venting anger is not the solution. Opposing the law and defying it witho riot and act of anger, I undersatnd your feeling, but I pray you that the need of the hour is to maintain peace and self-discipline. Those who have perpetrated the crime, we are strongly committed to punish them. No one will escape the law. Can you not help in saving our state Gujrat, the peace and harmony. The government of Gujrat appeals to you for help, for peace and discipline. In the midst of your anger it is my humble request that in such testing times Gujrat expects from you, what it is best known for, maintaing peace and harmony in the most enduring times for which there are many examples.

Let us strengthen the hands of the law, let us creat a atmosphere that will ensure the most harsh punishment to the culprits of the heinuous crime and I am sure that my solmn appeal will touch your hearts. Let me assure that everyone in the goverment equally feels the shock and pain experienced by you. The level of pain is the same for all. Even the prime minister is disturbed by every development with regards to the incidents, so that the home minister of India. and the entire country has expressed solidarity with the grief of Gujrat, but it is our responsibility to maitain the peace, harmony and discipline.

We understan you anger and pain, but still for the betterment of Gujrat. For a Gujrat whose future does not get lost. For a Gujrat that does not have to carry the burden of a black moment in the history, maintain peace and harmony.

I also want to express my gratitude to you, that in the midst of so much anger of the 1800 villeges of Gujrat, only a few handfuls have expressed disturbances. More and less there has an atmosphere of peace, however the development that have taken place in the cities of the Gujrat is disturbing and it is my request, tit for tat is not a resolution. I am not here you give advice or sermons, but I can see the bright future of Gujrat and for that, I have came to seek your help.

Come forward and help the government in process of maintaining peace. GOVERMENT SEEKS YOUR HELP in creating the right atmosphere for this to happen. It is my faith that people of Gujrat will respond to my feeling and together we shall work to ensure peaceful Gujrat, that the innocent donot suffer or loose lives in our reponsibility. Come, let us together work toward establishing peace. Once agin, let me assure you that I fully understand your pain and grief, however, let us together strengthen law so as to get the highest possibe punishment to the perpetrators and set a historical example.

Once again I appeal to the people of Gujrat for peace. let us take the pathe of peace and bring to life the mantra of jai jai Gujrat.

Thank you.



गुरुवार, 25 मार्च 2010

आओ ब्लॉग(चिट्ठा) बनाएं

जो बूझे सो ज्ञानी. जिन्हें आता है उनके लिए तो ये कुछ भी नहीं है, लेकिन बहुत से ऐसे लोग हैं, जिन्हें अभी भी ब्लॉग बनाने नहीं आता है. कई वाकई पढ़े लिखे लोग हैं, जिन्हें छोटी-छोटी बातें मुश्किल सी लगती है. उनकी मुश्किल आसान करने के लिए ये पोस्ट लिखे जाएंगे.
ब्लॉग बनाने के लिए सबसे पहले-

  1. जी-मेल एकाउंट बनाना

  • एक जी-मेल एकाउंट बनाइये( अगर पहले से है तो सोने में सुहागा)- जी मेल एकाउंट बनाना आसान है. बस अपने ब्राउजर(विचरक- फायरफॉक्स, इंटरनेट एक्सप्लोरर, ओपेरा) की पते वाली जगह(यूआरएल में) WWW.GMAIL.COM टाइप कर एंटर कुंजी दबाएं.

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लाल घेरा ब्राउजर का यूआरएल है इसी में GMAIL.COM टाइप करना है. और ENTER(एंटर कुंजी दबाना है)
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एंटर दबाते ही पेज कुछ इस प्रकार खुलेगा, जिसमें लाल घेरे को चटकाएं(नहीं समझे, तो क्लिक करिए)
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नया पृष्ठ कुछ ऐसा खुलेगा, बस इस फॉर्म को भरिए, सबसे नीचे गूगल के नियम शर्तों को स्वीकार कर लीजिए बस बन जाएगा आपका जी-मेल खाता(एकाउंट). इस अकाउंट का उपयोग आप ब्लॉग बनाने के लिए करेंगे.

2. ब्लॉग बनाना

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अपने विचरक(ब्राउजर) के पते(यूआरएल) में लिखें- WWW.BLOGGER.COM और एंटर कुंजी दबाएं
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एंटर दबाते ही नया पृष्ट कुछ ऐसा खुलेगा, जिसमें अपने जी-मेल एकाउंट का यूजर नाम और पासवर्ड भर दें. और साइन-इन चटकाएं.
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साइन-इन चटकाते ही ये पृष्ठ खुलेगा. यहां आप लाल घेरे में वो नाम भरिए जो आप अपने ब्लॉग पर देखना चाहते हैं. फिर आप I accept the terms of service में क्लिक करें.  और आगे बढ़े.
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इस पृष्ठ पर Create your blog now को क्लिक करें.
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यहां आप अपने ब्लॉग का नाम रखेंगे. आपने अपने ब्लॉग के लिए जो नाम चुना है. उसको Blog address में भरिए फिर नीचे check avaibility क्लिक करिए. अगर उस नाम से नाम अनुपलब्ध है तो इसका मतलब इस नाम से पहले ही ब्लॉग बन चुका है. इसलिए कोई दूसरा नाम चुनिए इसे चेक करिए. तब तक चेक करिए जब तक वो नाम आपके लिए उपलब्ध नहीं मिल जाता.  नाम मिलते ही आप ब्लॉग शीर्षक blog title भी वही नाम भर दीजिए और CONTINUE को क्लिक करिए.
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अब इस पृष्ट में आप अपने लिए मनमुताबिक टेम्पलेट चुन लीजिए(नहीं पसंद है तो कोई बात नहीं, हम आपको एक-से बढ़कर एक टेंपलेट देंगे, फिलहाल इसी से काम चलाइये.) और जारी रहिए(CONTINUE).
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और मुबारक हो आपका ब्लॉग बन गया शुरू किए ब्लॉगिंग यानी चिट्ठाकारिता START BLOGGING को चटकाएं.
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व्यक्त करें अपनी भावना और प्रतिभा और प्रकाशित करें.
ब्लॉगिंग मुबारक हो.

शनिवार, 20 मार्च 2010

देयर इज अ खबर ऑफ हाथापाई इन राजस्थान विधानसभा

एक न्यूज चैनल में साक्षात्कार देने जा रहा था.
रास्ते में ऋषि अष्टावक्र मिल गए. मुंह-हाथ-पैर सहित आठ अंग टेढ़े-मेढ़े. एकाएक इनके पिता की शाप वाली बात ध्यान में आ गई.
जब ये अपनी मां की गर्भ में थे. तभी से टोका-टोकी की इनकी आदत थी. कुछ भी बर्दास्त नहीं होता था. इनके पिताजी वेद पाठी थे. वेदपाठ कर रहे थे. इन्होंने मां के गर्भ से ही कहा- असत्य पाठ, अशुद्ध पाठ. इनके वेदपाठी पिता को गुस्सा आ गया और उन्होंने इन्हें शाप दे दिया कि तुम्हारे आठ अंग टेढ़े हो जाएंगे.
उसी शाप की उत्पत्ति हैं ऋषि अष्टावक्र.
ऋषि अष्टावक्र के पूछा, कहां से आ रहे हो?
मैंने कहा, आ नहीं, जा रहा हूं,
वो बोले, ठीक है, जा रहे हो, मगर जा कहां रहे हो?
मैंने कहा, इंटरव्यू देने जा रहा हूं. एक न्यूज चैनल में.
वो बोले, अच्छी बात है, जाओ, हां, देयर इज अ खबर ऑफ हाथापाई इन राजस्थान विधानसभा.
मैं कहा, ये क्या बाबा, खबर एंड हाथापाई इन विधानसभा.
उन्होंने कहा, क्या, फिर कहो.
मैंने कहा, ये अंग्रेजी में हिंदी क्या गिटपिट कर रही है.
उन्होंने कहा, जब तुमने पौने वाक्य में तीन अंग्रेजी का बोला तो मैं तुम्हें टोकने गया. वहां हिंदी में अंग्रेजी क्यों गिटपिट कर रही है. जब तुम्हारी हिंदी में अंग्रेजी गिटपिट कर सकती है तो मेरी अंग्रेजी तुम्हारी हिंदी क्यों नहीं गिटपिट कर सकती है.
मैंने कहा, बाबा ऐसा नहीं होता है, हिंदी में अंग्रेजी शब्द खूब चलते हैं.
उन्होंने कहा, किसने चलाया, तुमने या अंग्रेजों ने.
मैं उत्तर की तलाश में था, वो बोले, अंग्रेजों ने नहीं, तुमने चलाया. जब तुम हिंदी में अंग्रेजी चला सकते हो, तो तुम अंग्रेजी में हिंदी क्यों नही चला सकते.
जब तुम्हें हिंदी सीखने के लिए अंग्रेजी सीखना पड़ता है तो अगर अंग्रेजी सीखने के लिए मुझे हिंदी सीखना पड़ रहा है तो इसमें क्या बुराई है.
मैं निरूत्तर हो गया.
साक्षात्कार में जाते जाते सोचा बाबा गलत नहीं कह रहे हैं.

गुरुवार, 18 मार्च 2010

मारिए पत्थर, पाइए ईनाम

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एक फिल्मी डॉयलॉग- स्साले, पुलिस वाले पर हाथ उठाते हो, मैं तुम्हारी जिंदगी बर्बाद करके रख दूंगा.

मैं नहीं चाहता कि कोई पुलिस वाला किसी अदना सी बात पर किसी की जिंदगी बर्बाद कर दे. अगर कोई पुलिस वाला अपनी वर्दी का नाजायज इस्तेमाल कर किसी की जिंदगी बर्बाद करता है तो उसे कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए.

लेकिन ऊपर आप जो चित्र देख रहे हैं उस चित्र ने कई पुलिस वालों की जिंदगी बर्बाद कर दी है. सारे अधिकारों को छीनकर सुरक्षा बलों के जवानों को बारोजगार पत्थरबाजों (क्योंकि पत्थर चलाना ही इनका रोजगार है) के बीच खड़ा कर दिया जाता है. इन पत्थरबाजों ने कश्मीर की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया है. ये पत्थरबाज लगातार सप्ताहों और महीनों तक पत्थरबाजी करने में माहिर होते हैं.

ये पत्थरबाज कही से आते हैं तो कही से लाए जाते हैं(भाड़े पर लाए जाने की खबर कई अखबारों में छपी है). इन पेशेवर पत्थरबाजों में बड़ी संख्या में बच्चे भी शामिल होते हैं.

कुछ दिनों पहले की बात है पत्थरबाजों की इस भीड़ को तितर-बितर करने के लिए सुरक्षाबलों ने आंसू गैस के गोले छोड़े, सुरक्षाबलों की इस कार्रवाई में इस तेरह साल के बच्चे की मौत हो गई(आंसू गैस के गोले लगने से)

सुरक्षाबलों की इस कार्रवाई के लिए जवान को निलंबित कर दिया गया, उस मुकदमे की कार्रवाई हो रही है. 

लेकिन आज खबर आई है कि स्थानीय पुलिस प्रशासन ने पत्थरबाजों के पुर्नवास और टूर पैकेज के लिए सरकार पत्र लिखा है. इस कार्यवाही से सरकार पत्थरबाजों का दिल जीतना चाहती है.

हाल ही में, पुलिस ने जम्मू में शांतिपूर्ण धरना दे रहे निर्दोष लोगों पर लाठियां बरसायी वहीं, दूसरी ओर घाटी में पत्थरबाजों पर सरकार मेहरबान है. यानी-

पत्थर मारो, ईनाम पाओ

दरअसल, ये केंद्र सरकार की हीलिंग टच नीति( वो पत्थर मारे और हम उन्हें तेल लगाकर सहलायें) है जिसने सुरक्षा बलों का नैतिक बल गिराने का काम किया है.

सरकार की तेल लगाकर सहलाओं नीति केवल कट्टरपंथी इस्लामी आतंकवादियों पर लागू होती है(पाक-अधिकृत कश्मीर के आतंकवादियों को क्षमादान और पुनर्वास) की नीति, बदले में शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर लाठी बरसाई जाती है.

सरकार संसद में अपनी मंशा साफ कर चुकी है कि चरमपंथी धर्म से अभिप्रेरित होते हैं. अपने देश में कार्यरत आतंकवादियों और चरमपंथियों को गृहमंत्री चिदंबरम ने दो हिस्सों में बांटा- जिहादी आतंकवादी(इस्लामी आतंकवादी कहने से परहेज किया, भाजपा द्वारा ऐतराज जताने पर कहा, वो भाजपा के लिए अपना विचार नहीं बदल सकते हैं) और हिंदू आतंकवाद.

माओवादी आतंकवादियों को उन्होंने हिंदू आतंकवादियों की श्रेणी में रखा और सरकार हिंदू आतंकवादियों को समाप्त करने के लिए ऑपरेशन ग्रीन हंट चला रही है. वहीं जेहादी आतंकवादियों(इस्लामी आतंकवादी नहीं करना चाहें तो मत कहें)  के लिए पुनर्वास और हीलिंग टच पॉलिसी है.

यानी पत्थर मारो ईनाम पाओ

कांग्रेस पिछले साठ सालों से कश्मीर में ये पॉलिसी अपना रही है, लेकिन कश्मीर का एक बच्चा भी कहने के लिए तैयार नहीं है कि वह भारत में रहना चाहता है. हम खरबों खर्च कर और कश्मीरी पंडितों को घाटी से खदेड़कर भी कश्मीरियों से भारत का नहीं कहवा सके.

मंगलवार, 16 मार्च 2010

मित्र की कसौटी

पापा निवारयति योज्यते हिताय

गुह्यं निगुह्यति च गुणानिम् प्रकटम करोति

आपद गतं न च जहाति ददाति काले

सन्नमित्र लक्ष्णंमिदं प्रवदन्ति संत:।

अर्थ- पापा से बचाता है, हित के काम में लगाता है, छुपाने योग्य बात छुपाता है, गुण प्रकट करता है, विपत्ति के समय साथ नहीं छोड़ता है, बल्कि, तन-मन-धन से मदद करता है, संतो ने अच्छे मित्रों से यही लक्षण बताएं हैं.

गोस्वामी तुलसीदास ने कहा-
निज दुख गिरि सम रज करि जाना।
मित्र के दुख रज मेरू समाना।।




जय हिंदी जय भारत

सोमवार, 15 मार्च 2010

सुवचन - संस्कृत साहित्य के अनमोल मोती


एकवर्णं यथा दुग्धं भिन्नवर्णासु धेनुषु ।
तथैव धर्मवैचित्र्यं तत्त्वमेकं परं स्मॄतम्।।


प्रिय वाक्य प्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तुव:
तस्मातदेव व्यक्तव्यं वचने का दरिद्रता।

मातृवत परदारेषु पर द्रव्येषु लोष्टवत
आत्मवत सर्वभुतेष य: पश्चयति स पंडित:

अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनं द्वियम्
परोपकाराय पुण्याय पापाय पडपीडनम।

उद्यमेन हि सिद्यन्ति कार्याणि न मनोरथै
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगा।

माता शत्रु पिता वैरी ये न बालो न पाठित:
ना शोभते सभा मध्य हंस मध्य वकोयथा।

उपदेशो हि मुर्खानां प्रकोपाय न शान्तये
पय: पानं भुजंगानां केवल विषवर्धनम।

काक चेष्टा वको ध्यानम स्वान निद्रा तथैव च
अल्पहारी गृह त्यागी इति विद्यार्थी पंथ लक्षणम

पापा निवारयति योज्यते हिताय
गुह्यं निगुह्यति गुणानिम प्रकटम करोति
आपद गतं ना च जहाति ददाति काले
सन्मित्र लक्ष्णनम इदं प्रवदन्ति संत।

काव्य शास्त्र विनोदेन कालो गच्छति धीमताम
व्यसनने च मुर्खानां निद्रया कलहेन वा।

अल्पानामपि वस्तुनां संहति कार्यसाधिका
तृणैर्गुणत्वमापन्नैर बध्यन्ते मत्तदन्तिन:

शैले शैले ना माणिक्यम मौक्तिकं न गजे गजे
साधवो न हि सर्वत्र चंदनं न वने वने।

सर्वं परवशं दु:खं सर्वम् आत्मवशं सुखम् ।
एतद् विद्यात् समासेन लक्षणं सुखदु:खयो:।
भावार्थ- जो चीजें अपने अधिकार में नही है वह सब दु:ख है तथा जो चीज अपने अधिकार में है वह सब सुख है। संक्षेप में सुख और दु:ख के यह लक्षण है ।

अलसस्य कुतो विद्या अविद्यस्य कुतो धनम् ।
अधनस्य कुतो मित्रम् अमित्रस्य कुतो सुखम्।।
भावार्थ- आलसी मनुष्य को ज्ञान कैसे प्राप्त होगा? यदि ज्ञान नहीं तो धन नहीं मिलेगा। यदि धन नहीं है तो अपना मित्र कौन बनेगा? और मित्र नहीं तो सुख का अनुभव कैसे मिलेगा।

आकाशात् पतितं तोयं यथा गच्छति सागरम्।
सर्वदेवनमस्कार: केशवं प्रति गच्छति।।
भावार्थ- जिस प्रकार आकाश से गिरा जल विविध नदियों के माध्यम से अंतिमत: सागर से जा मिलता है उसी प्रकार सभी देवताओं को किया हुवा नमन एक ही परमेश्वर को प्राप्त होता है।

नीरक्षीरविवेके हंस आलस्यम् त्वम् एव तनुषे चेत् ।
विश्वस्मिन् अधुना अन्य: कुलव्रतं पालयिष्यति क:।।
भावार्थ- अरे हंस यदि तुम ही पानी तथा दूध भिन्न करना छोड दोगे तो दूसरा कौन तुम्हारा यह कुलव्रत का पालन कर सकता है ? यदि बुद्धिवान तथा कुशल मनुष्य ही अपना कर्तव्य करना छोड दे तो दूसरा कौन वह काम कर सकता है ?

पापं प्रज्ञा नाशयति क्रियमाणं पुन: पुन:
नष्टप्रज्ञ: पापमेव नित्यमारभते नर:।।
भावार्थ-बार बार पाप करनेसे मनुष्य की विवेकबुद्धि नष्ट होती है और जिसकी विवेकबुद्धि नष्ट हो चुकी हो, ऐसी व्यक्ति हमेशा पाप ही करता है।

अधमा धनमिच्छन्ति धनं मानं च मध्यमा।
महानतो मानमिच्छन्ति मानो हि महतां धनम।।

विद्या ददाति विनयम विद्यायाति पात्रताम।
पात्रत्वा धनंमाप्नोति धन: धर्म: तत: सुखम।।

अनेकशास्त्रं बहुवेदितव्यम् अल्पश्च कालो बहवश्च विघ्ना

यत् सारभूतं तदुपासितव्यं हंसो यथा क्षीरमिवाम्भुमध्यात्

भावार्थ- पढ़ने के लिए बहुत से शास्त्र हैं और ज्ञान अपरिमित है। अपने पास समय की कमी है और बाधाएं बहुत हैं। ऐसे में जैसे हंस पानी में से दूध निकाल लेता है उसी तरह हमें उन शास्त्रों का सार समझ लेना चाहिए।

कलहान्तनि हम्र्याणि कुवाक्यानां च सौदम्

कुराजान्तानि राष्ट्राणि कुकर्मांन्तम् यशो नॄणाम्

भावार्थ- झगडोंसे परिवार टूट जाते हैं। गलत शब्द प्रयोग करने से दोस्त टूटते हैं। बुरे शासकों के कारण राष्ट्र का नाश होता है। बुरे काम करने से यश दूर भागता है।

दुर्लभं त्रयमेवैतत् देवानुग्रहहेतुकम् ।
मनुष्यत्वं मुमुक्षुत्वं महापुरूषसश्रय:।।
भावार्थ- मनुष्य जन्म, मुक्ती की इच्छा तथा महापुरूषोंका सहवास यह तीन चीजें परमेश्वर की कॄपा पर निर्भर रहते है |

सुखार्थी त्यजते विद्यां विद्यार्थी त्यजते सुखम्।
सुखार्थिन: कुतो विद्या कुतो विद्यार्थिन: सुखम्।।
भावार्थ- जो व्यक्ति सुख के पीछे भागता है उसे ज्ञान नहीं मिलेगा। तथा जिसे ज्ञान प्राप्त करना है वह व्यक्ति सुख का त्याग करता है। सुख के पीछे भागनेवाले को विद्या कहां और विद्यार्थी को सुख कहां।

दिवसेनैव तत् कुर्याद् येन रात्रौ सुखं वसेत्।
यावज्जीवं च तत्कुर्याद् येन प्रेत्य सुखं वसेत्।
भावार्थ-दिनभर ऐसा काम करो जिससे रातमें चैनकी नींद आ सके। वैसे ही जीवनभर ऐसा काम करो जिससे मॄत्यूपश्चात सुख मिले।
प्रिय वाक्य प्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः
तस्मात् तदेव वक्त्वयम वचने का दरिद्रता


प्रिय वचन सभी जीवों को ख़ुशी देती है, तब प्रिय वचन बोलने में कंजूसी कैसी?


अष्ट दश पुरानेषु व्यासस्य वचनं द्वियम

प्रोप्करय पुण्याय पपय्पद्पिदानाम

गुरुवार, 11 मार्च 2010

नानाजी, जैसा हम उन्हें जानते थे, भाग-3

पिछले अंक में हम बात कर रहे थे कि रामनाथ गोयंका जी, अच्युत पट्टवर्द्धनजी, जयप्रकाश नारायणजी, नानाजी देशमुख और राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर तिरूपति दर्शन के लिए रवाना हुए. आगे-
रामधारी सिंह दिनकर ने सबकी उपस्थिति में भगवान तिरूपति के सामने प्रार्थना की(जयप्रकाश और दूसरे लोगों को सुनाकर)-
हे भगवान तिरुपति, हमारा शेष जीवन लोकनायक जयप्रकाश नारायण को अर्पित कर दो, ताकि वो मातृभूमि की सेवा कर सकें.  
भगवान तिरुपति का दर्शन कर सभी मद्रास पहुंचे. माउंट रोड, जहां इंडियन एक्सप्रेस का ऑफिस था, रामनाथजी के घर पहुंचते ही दिनकर जी रामनाथजी की गोद में गिर गए और कुछ ही पलों में उन्होंने आखिरी सांस ली- उस समय वहां, जयप्रकाश नारायण, नानाजी देशमुख और अच्युत पट्टवर्धन उपस्थित थे. साफ था कि दिनकरजी की प्रार्थना का भगवान तिरूपति बालाजी ने उत्तर दिया. दिनकरजी के निधन के तुरंत बाद जयप्रकाश नारायण ने बिहार के छात्र आंदोलन का नेतृत्व करने का फैसला लिया. इसबार जयप्रकाश नारायण ने तनिक देरी नहीं की. मेरे बार-बार के अनुरोध के बावजूद नानाजी ने इस घटना के बारे में इंडियन एक्सप्रेस में लिखने से मना कर दिया. जब मैने पूछा कि लोग इस घटना के बारे में कैसे जानेंगे तो उन्होंने कहा कि
मैंने सारी बात अपनी डायरी में लिख दी है, मेरी मृत्यु के बाद लोग जान जाएंगे. अब नानाजी देशमुख इस दुनिया में नहीं है, इसलिए मैं उन बातों को लिखने में स्वयं को स्वतंत्र पा रहा हूं.
बाकी तो सबको मालूम है. पौरूषग्रंथि के ऑपरेशन के बाद लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने स्वतंत्र भारत के सबसे बड़े जन आंदोलन का नेतृत्व किया. यह नेतृत्व भ्रष्टाचार के खिलाफ था. इस आंदोलन के कारण इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लगा दिया. आरएसएस पर प्रतिबंध लगा दिया और सभी विरोधी नेताओं को जेल में ढूंस दिया गया. यह समय नानाजी के जीवन का सर्वोत्तम काल था. इस दौरान नानाजी देशमुख ने भूमिगत आंदोलन चलाया. नानाजी के आंदोलन ने 1977 में देश में लोकलहर खड़ा कर दिया. इंदिरा गांधी ने अपनी निरंकुशता को जारी रखने के लिए जनादेश का मार्ग चुना. लोकसभा चुनाव की घोषणा कर दी गई. नानाजी के भूमिगत आंदोलन ने वो लोकलहर पैदा कर दी कि इंदिरा गांधी की खुफिया एजेंसियां भी चकमा खा गई. नानाजी देशमुख जनता पार्टी के निर्माता थे. वो पहलीबार चुनाव लड़े और जीत हासिल की, लेकिन जब मोरारजी देसाई ने उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल होने के लिए जोर डाला, उन्होंने ऐसा करने से इनकार कर दिया.
बाद में जब जनता पार्टी में विभाजन हुआ और 1980 में भारतीय जनता पार्टी बनी, नानाजी ने सक्रिय राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा कर दी. उन्होंने घोषणा की कि वो 65 साल के हो गए हैं इसलिए सक्रिय राजनीति से संन्यास लेना पसंद करेंगे. अब नानाजी एक नई भूमिका में थे- दबे-कुचले लोगों की सामाजिक-आर्थिक बेहतरी को सुनिश्चित करने और उनकी नैतिकता और आध्यात्मिकता को संबल प्रदान करने में वे जुट गए. उन्होंने उत्तरप्रदेश के सबसे पिछड़े जिले चित्रकूट में अपना सेवा प्रकल्प शुरू किया, इसके बाद महाराष्ट्र के सूखा-प्रभावित और गरीब जिले बीड़ में सेवा प्रकल्प चलाया. अंतत: करीब पांच सौ गांवों में सामाजिक-आर्थिक उत्थान और प्रगति का व्यापक कार्य किया. तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ एपीजे अब्दुल कलाम ने नानाजी के चित्रकूट प्रकल्प का स्वयं निरीक्षण किया. कलाम ने नानाजी के कार्यों की भूरि-भूरि प्रशंसा की. उन्होंने कहा कि कि जिले के अस्सी गांव मुकदमे मुक्त हैं. 
चित्रकूट में मैंने नानाजी देशमुख और दीनदयाल उपाध्याय के उनके साथियों से मुलाकात की. दीन दयाल शोध संस्थान ग्रामीण विकास के प्रारूप को लागू करने वाला अनुपम संस्थान है यह प्रारूप भारत के लिए उपयुक्त है. विकास कार्यों से अलग दीनदयाल उपाध्याय संस्थान विवाद-मुक्त समाज की स्थापना में मदद करता है. मैं समझता हूं कि चित्रकूट के आसपास अस्सी गांव मुकदमा-मुक्त है. गांव के लोगों ने सर्वसम्मति से फैसला किया कि किसी विवाद का हल करने के लिए वे वे अदालत नहीं जाएंगे. तय हुआ कि विवाद आपसी सहमति से सुलझा लिए जाएंगे. नानाजी देशमुख के मुताबिक अगर लोग लड़ते झगड़ते रहेंगे तो विकास के लिए समय ही नहीं बचेगा." कलाम के मुताबिक, विकास के इस अनुपम प्रारूप को सामाजिक संगठनों, न्यायिक संगठनों और सरकार के माध्यम से देश के विभिन्न भागों में फैलाया जा सकता है. शोषितों और दलितों के उत्थान के लिए समर्पित नानाजी की प्रशंसा करते हुए कलाम ने कहा कि नानाजी चित्रकूट में जो कर रहे हैं वो अन्य लोगों के लिए आंखें खोलने वाला होना चाहिए.
वैसे तो पूरा देश ही उनकी कर्मभूमि थी, लेकिन अंतिम कर्मभूमि के रूप में उन्होंने चित्रकूट को नया जीवन दिया. 

सोमवार, 8 मार्च 2010

नानाजी, जैसा हम उन्हें जानते थे, भाग-2

ना हीं रामनाथ गोयंका जी और ना ही नानाजी जानते थे कि डर किस चिड़िया का नाम है. इन दोनों महापुरुषों ने अनायास ही हजारों लोगों, पत्रकारों के दिलों में सच कहने और लिखने का साहस भर दिया.
वो रामनाथ जी और नानाजी ही थे, जिन्होंने लोकनायक जयप्रकाश नारायण को  1974 में बिहार के छात्र आंदोलन का नेतृत्व करने के लिए राजी किया, इसने देश के राजनीतिक परिदृश्य को बदल दिया. बिहार का छात्र आंदोलन स्वतंत्र भारत के सबसे बड़े आंदोलनों में से था.
एक अविश्वनीय घटना जिसने गोयंकाजी और नानाजी की अपील पर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की निरंकुश सत्ता के खिलाफ विद्रोह का नेतृत्व करने के लिए जयप्रकाश नारायण को राजी कर लिया.   इस घटना के बारे में मुझे जानकारी, 1980 के अंत में मिली, जब मैंने मुंबई के इंडियन एक्सप्रेस टावर में नानाजी और रामनाथजी से पूछा कि उन्होंने जयप्रकाश नारायण को आंदोलन के लिए कैसे राजी किया. तब नानाजी वो रोमांचकारी और अविश्वनीय घटना कह सुनाई.
बात, 1973 की है. स्थान था बैंगलोर स्थित इंडियन एक्सप्रेस का गेस्ट हाउस(अतिथि गृह). इस ऐतिहासिक बैठक में रामनाथ गोयंका, नानाजी देशमुख, 1942 के भूमिगत आंदोलन के नायक अच्युत पट्टवर्द्धन और राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर शामिल थे. चारों इस बात बात पर जोर दे रहे थे कि इंदिरा गांधी की निरंकुश सत्ता के खिलाफ विद्रोह की अगुवाई जयप्रकाश को करनी चाहिए, क्योंकि इंदिरा गांधी बहुत ही निरंकुश हो चुकी थी, उन्होंने न्यायपालिका और नौकरशाही सहित लोकतंत्र के संस्थागत ढांचे को ध्वस्त करना शुरू कर दिया था. यहां एक बात ये भी सच थी कि राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर जवाहरलाल नेहरू को सबसे प्रिय दोस्तों में से एक थे और साखकर इंदिरा गांधी से उनके बहुत अच्छे संबंध थे. मगर ये दोस्ती राष्ट्र के प्रति कर्तव्यों के निर्वहन की राह में दिनकर जी के लिए कभी रोड़ा नहीं बनी. जयप्रकाश नारायण मुख्य रूप से अपने खराब स्वास्थ्य के चलते विद्रोह का नेतृत्व करने में हिचकते थे. वो मधुमेह के रोगी थे और साथ ही उन्हें पौरूषग्रंथि संबंधी जटिलताएं भी थी. जयप्रकाश नारायण ने कहा कि वे लंबे समय तक जीवित नहीं रहेंगे और उनका स्वास्थ्य इस महान कार्य को अपने हाथ में लेने की अनुमति नहीं दे रहा है. रामनाथ जी ने उन्हें भरोसा दिलाया कि वे उनके पौरूषग्रंथि का भेल्लोर में ऑपरेशन कराकर समस्या को दूर करा देंगें और बाद में उन्होंने ऐसा किया भी. लेकिन जयप्रकाश नारायण तब भी तैयार नहीं हुए.
इस स्थिति में, रामनाथ गोयंका जी, एक महान आस्थावादी होने के कारण, सभी लोगों को तिरूपति चलने की सलाह दी. गोयंका ने कहा कि वे इसके बाद मद्रास चलेंगे जहां आगे विचार विमर्श होगा. सभी तिरूपति की ओर रवाना हो गए.
आगे पढ़ेंगे, जेपी आंदोलन के लिए राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ने कैसे बलिदान दिया-  

रविवार, 7 मार्च 2010

नानाजी, जैसा हम उन्हें जानते थे

--एस गुरूमूर्ति
(इंडियन एक्सप्रेस से साभार)
-अनुवाद- सत्यजीत प्रकाश
नानाजी अब हमारे बीच नहीं रहे. नानाजी देशमुख, जो करीब छह दशकों तक राजनीतिक और सामाजिक पटल पर देदीप्तिमान नक्षत्र की तरह चमकते रहे, नानाजी के नाम से जाने जाते हैं. राजनीति और राजनीति से बाहर, जो लोग उनसे प्रभावित और प्रेरित थे, उन्हें तक महान आदर्शवादी के रूप में जानते थे. उनके प्रशंसक और मित्र उन्हें एक महान राजनीतिक रणनीतिकार मानते थे. अल्पायु में ही आरएसएस में शामिल होने वाले और संघ के पूर्णकालिक प्रचारक बनने वाले नानाजी निस्संदेह एक महान संगठनकर्ता थे. हर जगह उच्च पदों पर उनके होते थे. वे बचपन से ही अपने सांगठनिक कौशल के लिए जाने जाते थे. चाहे विनोवा भावे का भूदान आंदोलन हो या दिल्ली का राजनीतिक गलियारा नानाजी हर जगह समान रूप से सहजता महसूस करते थे. उनके विरोधी खेमों में भी उनके दोस्त होते थे. 1948 में जब जवाहरलाल नेहरू ने आरएसएस पर प्रतिबंध लगा दिया था, आरएसएसस के अन्य कार्यकर्ताओं की तरह नानाजी भी भूमिगत रहकर अपने संगठन के आंदोलन को जारी रखा. लेकिन उस दौरान वो कहां थे-

मानिए या नहीं, वो नेहरू सरकार में एक मंत्री रफी अहमद किदवई के घर में रहकर अपनी गतिविधियां चलाते थे

सबको मालूम है कि नेहरू आरएसएस को पैदाईशी दुश्मन मानते थे. उन्होंने घोषणा कर रखी थी कि आरएसएस के भगवा ध्वज को फहराने के लिए वह भारत में एक इंच भी भूमि(सूई की नोक बराबर?) नहीं देंगे. नेहरू के विश्वस्त दोस्त और उनके कैबिनेट में मंत्री किदवई को नानाजी को अपने घर में रखने और भूमिगत होकर आरएसएस की गतिविधियां चलाने देने में कोई आपत्ति नहीं थी. यह घटना स्पष्ट करता है कि युवा नानाजी के व्यक्तित्व में कैसा चुंबकत्व था.
रामनाथ गोयंका से मेरी मित्रता के साथ ही नानाजी देशमुख के साथ मेरा जुड़ाव शुरू होता है. रामनाथ गोयंका और नानाजी ना सिर्फ अच्छे दोस्त थे, बल्कि देश के बारे में दोंनों के विचार और सोच एक जैसे थे. दोनों के बीच पारस्परिक विश्वास और सम्मान किसी भी प्रकार के निजी हितों से परे, पूरी तरह से मातृभूमि के प्रति उनके प्रेम से जुड़े हुए थे. राष्ट्र की भलाई के सिवा उन दोनों के मन में कोई दूसरा विचार नहीं था. गोयंका ने दी इंडियन एक्सप्रेस को न सिर्फ एक समाचार पत्र, देश के लिए काम करने वाली सभी राष्ट्रवादी शक्तियों की सक्रिय साझेदारी, राजनीतिक और सामाजिक विमर्श का एजेंडा तय करने का माध्यम बनाया. रामनाथ गायंका ने
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शेष अगले अंक में--

शनिवार, 6 मार्च 2010

तुझको रखे राम तुझको अल्लाह रखे

अन्याय के रास्ते में
कहीं न्याय दम न तोड़ दे
असत्य के रास्ते में कहीं
सत्य नीलाम न हो जाए
इसलिए सच दिखाते हैं हम
सत्य के स्वयंभू रक्षक इस टीवी चैनल के चाल चरित्र चेहरा और चिंतन पर आपको संदेह नहीं होना चाहिए क्योंकि सच दिखाते हैं ये. यहां स्वनाम धन्य बुद्धिजीवी पत्रकार(?) पूछते हैं-
देश के संसाधन पर किसका अधिकार है?
  • बहुसंख्यकों का
  • अल्पसंख्यकों का
  • जिसकी लाठी उसकी भैंस
आप ही बताइये आपका जवाब क्या होगा. ये लोग धर्म संप्रदाय के आधार पर देश को बांटते हैं. कुछ लोगों के प्रति पक्षपात पूर्ण रवैया अपना स्वयं को बुद्धिजीवी और सेक्युलर कहते हैं. आप ही बताइये क्या हैं ये लोग?
कल सुबह मेरी पत्नी ने टीवी का स्विच ऑन किया. ये चैनल सेक्स-स्कैंडल मामले में फंसे नित्यानंद स्वामी का संबंध नरेंद्र मोदी के साथ स्थापित करने में जुटा हुआ था.
पहले इसने कुछ चित्र दिखाए, पहले स्वामी जी, फिर नरेंद्र मोदी एक मंच पर चढ़ रहे थे.
मोदी ने हाथ जोड़ स्वामी जी को नमस्कार किया, इस नमस्कार को चैनल ने “हाथ जोड़कर नतमस्तक होना बताया”
पहले एक लाइन की खबर फिर स्वनाम धन्य बुद्धिजीवी पत्रकार की टिप्पणी, फिर फोन पर इस संबंध को पुष्टि कराने की कोशिश.
मेरा सवाल है कि क्या जब नारायण दत्त तिवारी(एनडी तिवारी) सेक्स स्कैंडल में पकड़ाए, क्या तब भी इस चैनल ने तिवारी का संबंध सोनिया गांधी, राहुल गांधी, मनमोहन सिंह और कांग्रेसी नेताओं से जोड़ने की कोशिश की?
क्या जब कोई फादर सेक्स स्कैंडल में पकड़ाते है तो क्या ये चैनल इसी निष्पक्षता(?) के साथ उसका संबंध दुनियाभर के राष्ट्राध्यक्षों के साथ जोड़ने की कोशिश करता है, जैसा कि आप सभी जानते हैं फादरों के सामने अमेरिका, ब्रिटेन, इटली, फ्रांस, स्वीडन सहित दुनियाभर के राष्ट्राध्यक्ष जुड़ते हैं?

गुरुवार, 4 मार्च 2010

भारत का जापान स्वीस बैंक में जमा है-

लोकसभा चुनाव से पहले योगगुरू स्वामी रामदेव विभिन्न मंचों से विदेशी बैंकों में जमा काले धन के बारे में आवाज उठाई थी. चूंकि ठीक इसी समय भाजपा नेता लालकृष्ठ आडवाणी, शरद यादव ने भी ये मुद्दा उठा दिया था, इसलिए ये मुद्दा भाजपाई बन गया और सत्ताधारी दलों सहित जनता ने भी इस मुद्दे को खारिज कर दिया था. लेकिन ये मुद्दा आज भी मुद्दा है. 03/03/10 को भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने एकबार फिर लोकसभा में इस मुद्दे को उठाया है.
dollars
जब देश की 78 प्रतिशत आबादी(असंगठित क्षेत्र पर बनी अर्जुन सेनगुप्ता की रिपोर्ट और एशियाई विकास बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक ) गरीबी रेखा से नीचे जीने को मजबूर है. अर्जुन सेनगुप्ता की रिपोर्ट के मुताबिक, देश के 78 प्रतिशत आबादी 20 रुपये रोजाना पर जीने के लिए मजबूर हैं, हालांकि एशियाई विकास बैंक के मुताबिक देश के अस्सी प्रतिशत लोग रोजाना 1.5 डॉलर यानी साठ रुपये से भी कम पर जीने को मजबूर हैं. ऐसे में अकेले स्वीस बैंक में जमा 1.4 ट्रिलियन डॉलर यानी 1डॉलर-46 डॉलर के हिसाब से 64.4 ट्रिलियन रुपये यानी 66976 अरब रुपये पर सवाल उठाना कोई पाप नहीं है.
पत्रकार मिलाप चोरूरिया 1976 से ही चोरी, भ्रष्टाचार और लूट के इस धन के खिलाफ अभियान चला रहे हैं, लेकिन पिछले लोकसभा चुनाव में यह राजनीतिक मुद्दा बना. लेकिन दुर्भाग्य है कि इस पैसे को देश लाने के लिए सरकारी स्तर पर कोई प्रयास नहीं किए जा रहे हैं.
http://swissprivacy.tripod.com/
http://milapchoraria.tripod.com/appeal
http://milapchoraria.tripod.com/swiss
http://mcho3.tripod.com/fast
स्वीस बैंकिग एसोसिएशन की रिपोर्ट-2006 के मुताबिक स्वीस बैंक में जमा शीर्ष देशों के धन इस प्रकार हैं-
  • भारत- 1456 बिलियन डॉलर
  • रूस- 470 बिलियन डॉलर
  • ब्रिटेन- 390 बिलियन डॉलर
  • यूक्रेन- 100 बिलियन डॉलर
  • चीन- 96 बिलियन डॉलर
संक्षेप में कहें तो स्वीस बैंक मे जमा भारत का काला धन अन्य देशों के कुल धन से भी ज्यादा है.
Swiss Banking Association report 2006
by Naman Sood on Apr 15, 2008 01:44 PM
Deposits in Banks located in the territory of Switzerland by nationals of
following countries
Top 5
India---- $1456 billion
Russia----- $470 billion
UK-------- $390 billion
Ukraine $100 billion
China------ $96 billion
Now do the math India with $1456 billion or $1.4 trillion has more money in
Swiss banks than rest of the world COMBINED.
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स्विस बैंकों में जमा धन किसका है, हमारे भ्रष्ट नेताओं, अधिकारियों, फिल्मी कलाकारों, उद्योगपतियों के जिसकी पहचान करना जरूरी है. सरकार ऐसे लोगों को बेनकाब करने से क्यों बच रही है, दिमाग पर थोड़ा भी जोर डाले तो ये समझना बहुत मुश्किल नहीं होगा.
I ma mentining all these issues because, recignisation of actual person behind
any working is necessary to promote such activities in future.
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ग्लोबल फिनान्सियल इंटेग्रिटी ने विदेशों में जमा कालेधन के खिलाफ अभियान चला रखा है. जीएफआई के मुताबिक, पश्चिमी सहायता संगठन विकासशील देशों में गरीबी खत्म करने के लिए अरबों खर्च कर रही हैं. लेकिन जितना धन सहायता के रूप में इन देशों में आता है, उससे दस गुना धन, ये देश विदेशों में हर साल जमा करते हैं. साफ है कि ऐसी स्थिति में गरीबी कभी नहीं मिटेगी. यही वजह है कि दुनिया के करीब 3 अरब लोग गरीबी रेखा के नीचे गुजर-बसर करने को मजबूर हैं.
--- On Tue, 3/2/10, Raymond Baker, Global Financial Integrity wrote:
From: Raymond Baker, Global Financial Integrity
Subject: Who Suffers? Check out our new video...
Date: Tuesday, March 2, 2010, 2:59 AM
Dear Milap,
For over half a century - western aid organizations have admirably worked to
alleviate poverty in developing countries. Despite these efforts, over 3
billion people-or half the world-live on less than $2.50 per day. Indeed, more
people live in poverty today than at any other time in human history.
Click here to watch our video
That's because for every 1 dollar in foreign aid sent to developing economies,
10 dollars is flowing out illicitly. In fact illicit financial flows from
developing economies total $1 trillion every year-10 times the amount of
foreign aid received.
But there is hope! We can curtail the devastating effects of dirty money by
urging the G20 to create financial transparency in the international banking
system.
Today, Global Financial Integrity released a video urging people to do just
that. The video, titled "Who Suffers?" explains this problem and urges people
to take action by signing the petition to the G20 at www.G20Transparency.com.
Please join us in our fight by forwarding this video to your friends and
family.
Best Wishes,
Raymond Baker
Global Financial Integrity
बनिए अभियान का हिस्सा-- www.G20Transparency.com
G20 Transparency Petition
Everyone has the right to a standard of living adequate for the health and well-being of himself and of his family, including food, clothing, housing and medical care and necessary social services
--Article 25 of the Universal Declaration of Human Rights
Research shows that developing countries are losing $1 trillion every year due to crime, government corruption, and tax evasion. These illicit monetary outflows are roughly ten times the amount of aid money going into developing countries for poverty alleviation and economic development.
The loss of money from poor economies that would otherwise go to provide health services, infrastructure, and other critical needs exacerbates poverty and leads to the deaths of millions of people. The annual loss of hundreds of billions of dollars from the world’s poorest and most vulnerable economies constitutes one of the most pressing human rights issues of the new decade.
The key to tackling this problem is transparency in the global financial system. After these stolen or otherwise ill-gotten gains exit their country of origin they vanish into an opaque financial system comprised of tax havens and secrecy jurisdictions. The most effective deterrent to criminals, corrupt officials, and tax evaders is to create a global financial system where illicit money cannot hide.
When the world’s 20 largest economies – the G20 – meet in Toronto on June 26-27, 2010 they will have an unprecedented opportunity to institute changes to create a transparent global financial system that is open, accountable, fair and beneficial for all.
Toward that end, we call on the G20 leaders to:
  • • Recognize the link between illicit outflows of capital from developing countries, absorption of those resources by tax havens and secrecy jurisdictions, and the adverse impact those flows have on poverty alleviation and economic development.
  • • Call on the Financial Action Task Force to amend its recommendations 33, 34, and VIII to provide that the beneficial ownership of all companies, trusts, foundations and charities be made a matter of public record.
  • • Instruct the International Accounting Standards Board to recommend that all multinational corporations report their income and taxes paid on a country by country basis.”
We the undersigned call upon the leadership of the G20 nations to take action on the problem of illicit capital loss in developing countries and increase transparency and accountability in the global financial system.

-Your Name Here
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बुधवार, 3 मार्च 2010

पंक्तियां, जिन्होंने हिंदी साहित्य के बारे में मेरी दृष्टि बदल दी

,उस रोज ऑफिस में कुछ ज्यादा काम नहीं था. फुर्सत के क्षणों में मैं अक्सर नेट की शरण में जाता हूं. उस दिन भी नेट की शरण में गया. हिंदी विकिपीडिया पर कुछ खोजने लगा. अचानक मेरी नजर इन पंक्तियों पर पड़ गई.
नरेन्द्र कोहली का पदार्पण साहित्य में उस समय हुआ जब देश का विशाल मध्यमवर्ग आज़ादी के दौरान देखे गए सपनों के टूटने की निराशा, गरीबी और बेकारी के दौर से गुज़र रहा था. आज़ादी की लड़ाई का आदर्शवाद एवं उत्साह अब पिछले युग की कहानी बन गए थे. भय, भूख और भ्रष्टाचार का बोलबाला बढ़ रहा था. आजाद भारत के कर्णाधारों के पास कोई भी दूरगामी सोच वाली आजाद एवं भारतीय शिक्षा प्रणाली नहीं थी, इसलिए जनसामान्य के पास ऐसी स्थिति से निबटने के लिए न तो पर्याप्त नैतिक आधार था, न ही अपने जातीय अनुभवों का बल (जिन्हें साम्प्रदायिक कहकर नकार दिया गया).
इन पंक्तियों ने हिंदी साहित्य के बारे में सोचने की मेरी दृष्टि बदल दी. इन पंक्तियों ने (खासकर, जो कुछ जातीय अनुभव था उसे सांप्रदायिक कहकर नकार दिया गया) ने नरेंद्र कोहली के बारे में विस्तार से पढ़ने के लिए मुझे प्रेरित किया. कोहली जी के बारे में विकिपीडिया पर संपूर्ण लेख पढ़ने के बाद मुझे उनकी रचनाओं को पढ़ने की उत्कट इच्छा जगी. नेट पर उपलब्ध उनकी छिट-पुट रचनाओं को मनन करने लगा. साहित्य कुंज पर नरेंद्र कोहली के साहित्य बारे में चर्चा पढ़ी. इसके बाद अभिव्यक्ति पर कोहली जी की कुछ व्यंग्य रचनाएं पढ़ी.  कोहली जी की कुछेक रचनाओं को पढ़ने के बाद लगा कि
वाकई नरेंद्र कोहली हिंदी के आधुनिक साहित्यकारों की तरह कुंठाग्रस्त नहीं हैं. भले देश और समाज, सपनों को टूटने की निराशा, गरीबी और बेकारी से गुजर रहा है, भले ही आदर्शवाद बीते युगों की कहानी बन गए हों, भले ही हर जगह भय, भूख और भ्रष्टाचार का बोलबाला है, इस स्थिति में भी नरेंद्र कोहली जैसे युगद्रष्टा घुटने टेकने वालों में से नहीं हैं. उनके पास रामायण की मर्यादा पर गर्व करने के लिए वक्त है, उनके पास गीता की नीति पर युग देखने की शक्ति है, महाभारत की नीति है, उनके सामने विवेकानंद ऐसे अत्याधुनिक युवाद्रष्टा हैं. राम की मर्यादा, कृष्ण की नीति, वसुदेव जैसी जूझने की क्षमता है. फिर ऐसा मनीषी किसी भी परिस्थिति में घुटने क्यों टेके.
राजस्थान पत्रिका में नरेंद्र कोहली का महासमर धारावाहिक रूप में छप रहा है. इसके कुछ भागों को देखकर मुझे लगा इस पुस्तक को विस्तारपूर्वक पढ़नी चाहिए. समय नहीं मिला कि किताब की दुकान पर जाकर इस पुस्तक को खरीदूं(वैसे हैदराबाद में हिंदी किताबों की दुकान कम हीं है.). सोचा ऑन-लाइन खरीद लूं. पुस्तक.ऑर्ग पर गया. कोहलीजी की रचनाओं का विशाल भंडार देखा तो दिमाग चकरा गया.
  • अभ्युदय- पृष्ठ-1356, मूल्य-40 डॉलर                  6530abhuyday-set पुस्तक- अभ्युदय
  • महासमर- पृष्ठ- 3661 मूल्य-110 डॉलर
  • वसुदेव- पृष्ठ-544, मूल्य- 22 डॉलर
  • समग्र कहानियां, पृष्ठ-709, मूल्य- 24 डॉलर
  • स्वामी विवेकानंद, पृष्ठ-351, मूल्य- 10 डॉलर
  • हिंदी उपन्यास सृजन और सिद्धांत, पृष्ठ-294, मूल्य-15 डॉलर
  • हम सबका घर और अन्य कहानियां, पृष्ठ- 136, मूल्य- 7 डॉलर
  • संघर्ष की ओर, पृष्ठ-367, मूल्य- 18 डॉलर
  • राम लुभाया कहता है, पृष्ठ-367, मूल्य-20 डॉलर
  • मेरे मुहल्ले के फूल, पृष्ठ- 508, मूल्य- 20 डॉलर
  • प्रेमचंद्र, पृष्ठ-264, मूल्य-9 डॉलर
  • न भूतो न भविष्यति, पृष्ठ-692, मूल्य-32 डॉलर
  • देश के शुभचिंतक, पृष्ठ-356 मूल्य-20 डॉलर
  • त्राहि-त्राहि पृष्ठ-654, मूल्य-20 डॉलर
  • तोड़ो कारा तोड़ो, पृष्ठ- करीब 2094 मूल्य-70 डॉलर
  • जहां धर्म है वहां जय है- पृष्ठ मूल्य-224 मूल्य-10 डॉलर
सीधे सादे शब्दों में कहें तो कोहली जी का रचना-संसार करीब 25000(जी हां, पच्चीस हजार) पृष्ठों का है. शायद वेद-व्यास जी भी चकरा जाएं. कोहली जी ने अपने पांच दशक के साहित्यिक सफर में---
अगले अंकों में जारी