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रविवार, 15 जनवरी 2012

नीतिगत पक्षाघात की शिकार सरकार

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रविवार, 21 अगस्त 2011

कांग्रेस को अब गैर-राजनीतिक चेहरों का ही सहारा

गैर-राजनीतिक चेहरों के जरिए कांग्रेस अन्ना के आंदोलन से निपटने को तैयार

कांग्रेस के राजनीतिक दिग्गज टीम अन्ना की रणनीति के सामने औंधे मुंह गिरे हैं। कपिल सिब्बल, चिदंबरम, मनीष तिवारी, दिग्विजय सिंह, अंबिका सोनी, अभिषेक मनु सिंघवी, रेणुका चौधरी, राशिद अल्वी जैसे कांग्रेसी दिग्गजों की बोलती बंद है। खबर तो मिल रही है कि कांग्रेस ने अशालीन और अभद्र भाषा बोलने के लिए मशहूर अपने प्रवक्ता मनीष तिवारी को तरीपार कर दिया है। बड़बोले नेताओं को जुबान पर ताला लगाने को कहा गया है। जुबान खोलने पर तोल-तोल के बोलने को कहा गया है। कल तक टीम अन्ना के लिए अभद्र भाषा बोलने वाले कांग्रेसी दिग्गजों को मुंह की खानी पड़ी है। अभी तक टीम अन्ना ने उनकी हरेक चतुराई और चलाकी का मुंहतोड़ जवाब दिया है। आगे क्या होगा कहना जरा मुश्किल है। लेकिन फिलहाल जो परिस्थिति दिख रही है। उसमें टीम अन्ना सरकार पर भारी दिख रही हैं। कांग्रेस के अंदर अन्ना के मुद्दे पर फूट पड़ती दिख रही है। कांग्रेसी नेता ही अन्ना के खिलाफ कार्रवाई गलत ठहरा रहे हैं। उनकी तथाकथित कानून की दलील पर कांग्रेसी नेता ही सवाल उठा रहे हैं।

कांग्रेस ने टीम अन्ना को नीचा दिखाने की कम कोशिश नहीं की, लेकिन उन्हें टीम अन्ना से अब तक मात ही मिली है। इसमें जहां टीम अन्ना की रणनीति का योगदान है तो वहीं, अन्ना के अनशन को बिना शर्त मिल रहे मीडिया सहयोग को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। पंद्रह अगस्त की शाम की बात है। राजघाट से लौटने के बाद अन्ना हजारे दिल्ली के कंस्टीट्यूशनल क्लब में प्रेसवार्ता कर रहे थे। उस प्रेसवार्ता में मीडियाकर्मियों ने अन्ना की बात-बात पर जो तालियां बजाई उससे कांग्रेस को जबरदस्त खीझ हुई। उससे भी आगे बढ़कर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने अन्ना के अनशन का जो 24*7 लाइव कवरेज किया, वो भी कांग्रेस और सरकार की नजरों में चढ़ गया। मीडियावालों ने सरकार से कुछ ऐसे सवाल किए जिससे सरकार ना सिर्फ असहज हुई बल्कि उससे जवाब देते नहीं बना। कांग्रेस या यूपीए सरकार ने इससे पहले कभी ऐसे सवालों का सामना नहीं किया। उसे ये सोच-सोचकर परेशानी महसूस हुई कि क्या मीडिया उससे इस ढंग के सवाल भी कर सकती है। दरअसल कांग्रेस ने कभी मीडिया से इस तरह के सवालों की उम्मीद नहीं करती है, जिसका जवाब उसके पास नहीं हो।

दो रोज पहले की बात है। केंद्रीय मंत्री अंबिका सोनी ने टीम अन्ना के सदस्य अरविंद केजरीवाल की योग्यता पर सवाल खड़ा करते हुए कहा कि अरविंद केजरीवाल को कौन जानता था। हमारी सरकार ने आरटीआई लाया, इसी के कारण लोग उन्हें जानते हैं। तभी मीडियाकर्मियों ने सवाल दागा, क्या आप ने ही अरविंद केजरीवाल को मैग्सेसे अवार्ड दिलाया। क्या आप ही उन्हें आईआईटी में एडमिशन दिलाया। क्या आप ही के चलते वो आईआरएस बने। जाहिर है कि कांग्रेस कम से कम मीडिया से तो ऐसे सवालों की उम्मीद नहीं करती है। कांग्रेस के युवराज और मीडिया द्वारा बहुप्रचारित भारत के भावी प्रधानमंत्री राहुल गांधी तो अन्ना के मुद्दे पर जुबान खोलने के लिए तैयार नहीं। तेलुगु सुपरस्टार और पीआरपी प्रमुख चिरंजीवी के कांग्रेस में शामिल होने के मौके पर पत्रकारों ने राहुल से बार-बार अन्ना के मुद्दे पर कुछ बोलने के लिए कहा। लेकिन राहुल गांधी ने मीडिया को नजरअंदाज कर दिया। कांग्रेस राहुल गांधी को यूथ आइकॉन के रूप में प्रस्तुत करती है, मगर यूथ आइकॉन यूथ अन्ना के मामलों पर सवालों को टाल जाते हैं। दसअसल राहुल गांधी देश के किसी भी अहम मुद्दे पर किसी भी सवाल का जवाब देने में खुद को सक्षम नहीं पाते हैं।

राजनीति के हर मोर्चे पर हार चुकी कांग्रेस अब अपने गैर राजनीतिक चेहरों को मैदान में उतार रही हैं। ये ऐसे लोग हैं जो कांग्रेस के प्रति अगुग्रहीत रहे हैं। इन चेहरों में कुछ खुद को सामाजिक कार्यकर्ता कहते हैं जो कांग्रेस के अहसानों तले दबे रहे हैं। इन सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों ने कांग्रेस को सत्ता में बनाए रखने के लिए एक समिति बनाई जिसे राष्ट्रीय सलाहकार परिषद नाम दिया गया। इस बहुप्रचारित परिषद के अध्यक्ष स्वयं यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी हैं।

अन्ना के अनशन से कांग्रेस में हाहाकार मचा हुआ है। कांग्रेसी दिग्गज हाथ जला चुके हैं। ऐसे में कांग्रेस ने अब इन अहसानमंद गैर-राजनीतिक चेहरों को मैदान में उतार दी है। इन लोगों की एक गुट ने अरुणा रॉय की अगुवाई में शनिवार को लोकपाल बिल का एक नया ड्राफ्ट पेश कर दिया और इस ड्राफ्ट को संसद की स्थायी समिति में पेश करने की बात कही जा रही है। आपको एकबार फिर याद दिला दें कि अरुणा राय यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की एक सदस्य हैं, इस परिषद में हर्षमंदर भी हैं। हर्षमंदर मजबूत लोकपाल के पक्ष में तो हैं लेकिन वो अन्ना के तरीकों से सहमत नहीं हैं। सिर्फ हर्षमंदर ही नहीं अरुणा रॉय भी अन्ना के अनशन से सहमत नहीं है। अरुणा रॉय को जनलोकपाल से भी शिकायत है। और उन्होंने लोकपाल का अपना मसौदा पेश किया है। इस मसौदे में एक दो नहीं बल्कि पांच-पांच स्तरों लोकपाल बनाने की बात कही गई है।

सरकार के इशारों पर नाचने वाली सीबीआई और सीवीसी को लोकपाल से अलग रखने की बात कही गई है। अरुणा रॉय ने ऐसे समय में लोकपाल का अपना मसौदा पेश किया जब अन्ना हजारे पांच दिनों से अनशन पर हैं। अरुणा रॉय लगातार राष्ट्रीय सलाहकार परिषद में बनी हुई हैं। उन्होंने इससे पहले कभी ऐसा बिल पेश नहीं किया। इससे पहले भी अन्ना ने अनशन किया था। अन्ना के अनशन के बाद सरकार ने एक संयुक्त प्रारूपण समिति भी बनाई थी। जिसमें टीम अन्ना और सरकार की ओर से पांच पांच सदस्य थे। उस समय भी अरुणा रॉय की टीम की ओर से कोई सलाह या सुझाव नहीं आया। जबकि वो सलाहकार परिषद में बनी हुई थी। लेकिन अब जब अन्ना हजारे छह दिनों से अनशन पर हैं और पूरा देश सड़कों पर उतर चुका.. ऐसे में अरुणा रॉय के इस मसौदे को क्या कहा जाय। ये सुझाव या सलाह नहीं बल्कि पूरा का पूरा मसौदा है। साफ है कि ये अन्ना के आंदोलन की हवा निकालने की सरकारी कोशिश है और कांग्रेस ने अपने गैर-राजनीतिक चेहरों को सामने लाकर अन्ना के आंदोलन की हवा निकालने की कोशिश की है।

ऐसा नहीं है कि अरुणा रॉय पर ही बात समाप्त हो जाएगी। कांग्रेस के और कई गैर-राजनीतिक चेहरे सामने आएंगे। इन लोगों का अपना-अपना मसौदा होगा और इस मसौदे के जरिए वो अन्ना के आंदोलन को अप्रभावी बनाने की कोशिश करेंगे। टीम अन्ना को इसके लिए भी तैयार रहना होगा। ऐसे में जन लोकपाल का भविष्य आम जनता के समर्थन पर निर्भर करेगा।

हालांकि अन्ना पहले ही साफ कर चुके हैं कि उनकी लड़ाई किसी पार्टी के खिलाफ नहीं है बल्कि ये लड़ाई व्यवस्था के खिलाफ है। टीम अन्ना ने भाजपा की भी आलोचना की है क्योंकि भाजपा ने जो रवैया अख्तियार कर रखा है वो ना सिर्फ आश्चर्यजनक है बल्कि वो खुद भाजपा के लिए भी घातक है। अगर भाजपा अपना रुख साफ नहीं करती है तो उस पर भी भ्रष्टाचारियों को संरक्षण देने का आरोप लगेगा और चुनाव के समय पब्लिक भाजपा नेताओं का स्वागत अंडे और टमाटरों से करेगी। फिलहाल भाजपा बीज बोने के लिए तैयार नहीं है, मगर उसकी नजर फसल पर लगी हुई है।

इधर, कांग्रेस राजनीतिक रूप से असहाय तो हो ही चुकी है। गैर-राजनीतिक रूप से भी वो सीधे-सीधे सामने नहीं आ रही है। यहां भी उसका कुटिल और चालाक स्वभाव उसे ऐसा करने से रोक रही है। साफ है कि वो वो हर जंग को अपनी कुटिलता व चालाकीपन से जीतना चाहती है। लोकतांत्रिक मूल्यों की धज्जियां उड़ाने के लिए वह बात-बात में कानून, संविधान, प्रक्रिया, लोकतंत्र आदि की दुहाई देती है। मगर, अन्ना और उनकी टीम की सादगी, सरलता, बेबाकीपन और पारदर्शिता के आगे उसका हर दांव फीका पड़ता जा रहा है। और आगे भी ऐसा ही होगा। इसमें कोई संदेह नहीं।


सोमवार, 15 अगस्त 2011

Fight against neo-colonial rule part-2


IN nineties, Dr Manmohan Singh, then Finance Minister and currently Prime Minister of India, came with an imported theory of economic development, named Globalization, liberalization and reforms. Dr. Manmohan Singh, Montek Singh Ahluwalia have been the Indian face of world bank and International Monetary Fund. Western nations want to capture the vast indian market and its resources. So, they used these faces and imposed their economic policies in India through these Indian faces. Overnight, Licence and permission Raj came to end. The fate of indian economy handed over to corporates and markets, and the markets were opened to the western nations. It had been claimed that only the open economy can eradicate the poverty and bring prosperity to India. After, two decades of the open economic policy, the illusion has broken and the much hyped claim came to trivia. The economy get centralized. The governments became the tool to collect taxes and to go on foreign tour. Subsidies have been terminated. They think for corporates and their interests. They think fro four paise loss of companies but they do not think about the suicide of the farmers.
To be continues--

गुरुवार, 11 अगस्त 2011

धत तेरे की। आप तो समझने के लिए तैयार ही नहीं हैं


सच में, आज मुझे बेहद अफसोस हो रहा है। मैं अपने छोटे की बात नहीं समझ पा रहा हूं। छोटा है। बहुत लिहाज करता है। मुझसे बोलता भी कम है। यूं कहें कि मुंह नहीं लगाता है। टभर-टभर नहीं करता है। एक लाइन में ही सही, मगर, आज वह अपने मन की बात निकाल ही गया।
क्या चाहते हैं आप, वो नैतिकता के नाम पर इस्तीफा दे दें।
बहुत ही खीझ थी उसके मन में। वह मेरी बात भी नहीं सुना। आगे बढ़ गया। उसकी बातों पर मन ही मन जिरह करता रहा।
आखिर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह क्यों इस्तीफा दें। आखिर उनकी गलती क्या है। भ्रष्टाचार किया तो उनके मंत्रियों ने। उसके लिए वो क्यों जिम्मेदार हों। आखिर उनकी ईमानदार छवि को इससे क्या नुकसान पहुंचता है।
छोटे की बातों में दम था। लेकिन मैं अपने मन को नहीं समझा पा रहा था कि आखिर इतना सब कुछ हो जाने के बाद भी मनमोहन सिंह ईमानदार कैसे बने हुए हैं और कैसे उनकी छवि अब भी साफ सुथरी बची हुई है।
अगर किसी व्यक्ति के सामने कोई अपराध होता है या कोई आपराधिक घटना होती है तो उससे अपेक्षा की जाती है कि वो पुलिस में उसकी रिपोर्ट दर्ज कराएगा। वो कोर्ट में इसकी गवाही देगा। मगर, अगर वो व्यक्ति उस अपराधी को बचाने की कोशिश करता है तो उसे क्या कहा जायेगा। उसे अपराधी कहा जाए या नहीं, मगर कम से कम उसे ईमानदार तो नहीं कहा जाएगा। कम से कम इस घटना के बाद उसकी छवि साफ सुथरी तो नहीं कही जाएगी।
जहां तक मुझे याद है टू-जी घोटाले पर कैग की रिपोर्ट आने के बाद प्रधानमंत्री कैग को उसका काम समझा रहे थे। मौका था कैग की १५० वर्षगांठ का। मनमोहन सिंह उस कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कह रहे थे कि कैग को गलती और जानबूझकर की गई गलती, वास्तविक गलती और परिकल्पना में अंतर को समझना चाहिए। कैग अपना काम ईमानदारी से कर रहा था मगर प्रधानमंत्री उसे वास्तविक गलती और परिकल्पना में अंतर समझाने में व्यस्त थे। अगर वो इस व्यस्तता को छोड़कर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करते तो उनकी छवि ईमानदार समझी जाती और यही काम करने के लिए सुप्रीमकोर्ट को मोर्चा नहीं संभालना पड़ा।
सरकारें अक्सर कोर्ट की अतिसक्रियता पर सवाल उठाती रही हैं मगर, कोर्ट को ऐसा होने के लिए मजबूत कौन करता है।
अगर कमजोर व्यक्ति अपराध को देखकर, उससे डरकर भाग जाता है, पुलिस में रिपोर्ट दर्ज नहीं कराता है, कोर्ट में गवाही नहीं देना चाहता है तो उसकी मजबूरी समझ में आती है मगर, देश का सबसे ताकतवर व्यक्ति अगर ऐसा करता है तो क्या वो ईमानदार या साफ सुथरी छवि का कहलाने लायक है?
अगर ये ताकतवर व्यक्ति उस अपराधी को बचाने की कोशिश में जुट जाए तो उसे क्या कहा जाएगा। क्या छोटे बाबू आप तब भी उसे ईमानदार ही कहेंगे।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने तो ऐसा ही किया।
जब कैग कि रिपोर्ट आई तो विपक्ष की ओर से हमले झेल रही सरकार ने अपने महारथी, कपिल सिब्बल को मोर्चे पर उतार दिया। सिब्बल ने अपनी वकालत पेशा की बाजीगरी का इस्तेमाल करते हुए जीरो लॉस की थ्योरी गढ़ डाली। यानी टूजी स्पेक्ट्रम आवंटन से सरकार को कोई नुकसान नहीं हुआ।
जब नुकसान ही नहीं हुआ तो राजा, कनिमोझी, बेहुरा सहित दर्जन भर लोग जेल में क्यों हैं। क्यों कलानिधि मारन को इस्तीफा देना पड़ा।
छोटे बाबू क्या आप बताएंगे कि जीरो लॉस की थ्योरी गढ़ने वाले कपिल सिब्बल के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई। जहां तक हमें पता है कार्रवाई नहीं, उन्हें दो-दो मंत्रालय पर बरकरार रख कर पुरस्कृत किया गया। क्या सच पर परदा डालने वालों को पुरस्कृत करना ही मनमोहन सिंह की ईमानदारी है.
सिब्बल की बात छोड़िये। खुद प्रधानमंत्री ने कहा कि टूजी स्पेक्ट्रम आवंटन से सरकार को कोई नुकसान नहीं हुआ। उन्होंने इस घोटाले से हुए नुकसान की तुलना गरीबों को दी जाने वाली सब्सिडी से कर दी। क्या लूट सब्सिडी के बराबर है। क्या सब्सिडी देने के लिए किसी सरकार को जेल जाते सुना है। क्या कोर्ट ने सब्सिडी देने के लिए सरकार के किसी मंत्री को जेल भेजा है। क्या ईमानदारी की यही परिभाषा है।
हाल ही में प्रिंट मीडिया के पत्रकारों से बातचीत में प्रधानमंत्री ने कहा कि राष्ट्रमंडल खेल घोटाले पर तत्कालीन खेल मंत्री मणिशंकर अय्यर का विरोध आडियॉलॉजिकल यानी सैद्धांतिक था। लेकिन प्रधानमंत्री को मणिशंकर अय्यर का लिखा हुआ पत्र जो मीडिया में आया है, उससे अनुसार मणिशंकर अय्यर का विरोध सैद्धांतिक नहीं बल्कि तथ्यात्मक था। बताया गया था कि राष्ट्रमंडल खेल आयोजन समिति के अध्यक्ष सुरेश कलमाडी ने किस प्रकार खुली लूट मचा रखी थी। इससे बावजूद प्रधानमंत्री ने कोई कार्रवाई करने के बजाय उससे छुपाने का काम किया।
कैग की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, तत्कालीन खेल मंत्री सुनील दत्त के विरोध के बावजूद प्रधानमंत्री कार्यालय की सिफारिश के आधार पर सुरेश कलमाडी की नियुक्ति हुई। इतना ही नहीं, खेल सचिव अरोड़ा ने भी प्रधानमंत्री कार्यालय को पत्र लिखा था लेकिन कार्रवाई तो दूर कलमाडी की नियुक्ति कर दी गई।
छोटे, भले ही तुझे मेरी बातों पर गुस्सा आता हो, लेकिन, लेकिन मैंने तुम्हारे सामने जो तथ्य रखे हैं क्या इससे तुम्हारी सोच पर कोई असर पड़ा है। क्या अब भी तुम मुझे समझने की कोशिश करोगे या नहीं। मेरे भाई प्रधानमंत्री पद की अपनी गरिमा होती है। क्या इतना सब कुछ हो जाने के बाद भी मनमोहन सिंह के लिए इस पद पर बने रहना उचित है। क्या अब भी उनकी ईमानदारी और साफ सुथरी छवि अक्षुण्ण बनी हुई है।
झुंझलाना मत। ठंडे दिमाग से सोचना।

जाते-जाते- अण्णा हजारे को सोलह अगस्त से अनशन करना पड़ रहा है। आखिर सरकार ईमानदार बनना क्यों नहीं चाहती है। आखिर उसे एक मजबूत और कारगर लोकपाल लाने में आपत्ति क्यों है। आखिर वो भ्रष्टाचार की संस्कृति को क्यों बनाए रखना चाहती है। आखिर वो कालाधन वापस देश क्यों नहीं लाना चाहती है। एक ईमानदार व्यक्ति इस पर चुप क्यों है।


मंगलवार, 5 जुलाई 2011

अब ईमानदार नहीं रह गए हैं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह




जी हां, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अब ईमानदार नहीं रह गए हैं। हो सकता है कुछ पत्रकार जिनका प्रधानमंत्री और सरकार से निहित स्वार्थ जुड़ा हो, वो प्रधानमंत्री को अब भी ईमानदार कह सकते हैं। उन्हें क्लीनचिट दे सकते हैं। उन्हें बेदाग और साफ-सुथरी छवि का इंसान कह सकते हैं। मगर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अब ईमानदार नहीं रह गए हैं।
आश्चर्य की बात है कि देश में लाखों करोड़ का घोटाला हो जाने के बाद भी देश की सरकार की मुखिया को लोग ईमानदार बताते रहे हैं। मनमोहन को बेदाग और साफ-सुथरी छवि का नेता बताते रहे हैं। हालांकि ऐसा कहने वालों में ज्यादातर लोग कांग्रेस के हैं या कांग्रेस पोषित मीडिया के हैं। मीडिया क्यों कांग्रेस और केंद्र सरकार का गुणगान करती है और रामदेव और अन्ना हजारे जैसे लोगों का पर्दाफाश करने में जुटी रहती है। ये जानना ज्यादा मुश्किल नहीं है। अगर आपको इसकी सच्चाई जानना हो तो इस लिंक को पढ़ें । ऐसे बिके हुए मीडिया और पत्रकारों की बात करना ही बेकार है।
हाल में प्रधानमंत्री ने प्रिंट मीडिया के चुने हुए पांच वरिष्ठ संपादकों के साथ बैठक की। पत्रकारों के मुताबिक, प्रधानमंत्री आत्मविश्वास से लबरेज थे। वो बातचीत के बीच-बीत में हंसी-मजाक भी कर रहे थे। यानी साबित करने की कोशिश कर रहे थे कि वो नर्वस बिल्कुल नहीं हैं। इन्हीं पत्रकारों में से एक ने राष्ट्रमंडल खेल घोटाले के बारे में पूछा कि मणिशंकर अय्यर ने खेल घोटाले के बारे में आपको काफी पहले पत्र लिखा था। लेकिन आपने घोटाले की अनदेख की। तो प्रधानमंत्री ने कहा कि मणिशंकर अय्यर का पत्र आइडियोलॉजिकल(वैचारिक) था। प्रधानमंत्री के इस बयान के महज दो दिन बाद हेडलाइन्स टुडे ने मणिशंकर अय्यर के उस पत्र को चैनल पर दिखाया जिसमें साफ साफ कहा गया था कि राष्ट्रमंडल खेल आयोजन में बड़े पैमाने पर घोटाला हो रहा है। उनके एक नहीं बल्कि कई पत्र लिखे। इस पत्र में घोटाले के लिए साफ-साफ कलमाड़ी और उसके सहयोगियों को जिम्मेदार ठहराया गया। बताया गया कि खर्च की रकम को कई गुना बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया। मगर, प्रधानमंत्री ने समय रहते कोई कार्रवाई नहीं की। अब जब पत्रकारों ने इस घोटाले में उनकी भागीदारी के बारे में पूछा तो उन्हें मणिशंकर अय्यर के पत्र को ऑइडियोलॉजिकल पत्र करार दिया।
आखिर प्रधानमंत्री क्यों झूठ बोल रहे हैं। प्रधानमंत्री सच पर पर्दा डालकर अपनी कौन सी छवि पेश कर रहे हैं। इतना ही नहीं, खेल आयोजन की तैयारियों के दौरान खेल मंत्रालय के तात्कालीन कर्ता-धर्ताओं, मणिशंकर अय्यर, सुनील दत्त, एमएस गिल ने भी प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री पी चिदंबरम को घोटाले के बारे में बार-बार लिखा। लेकिन इन लोगों ने घोटाला होने दिया। प्रधानमंत्री ने तो मंत्रिसमूह के अनुरोधों को भी नजरअंदाज कर दिया और इसके लिए उन्होंने अजब-अनोखे तर्क भी दिए।
दूसरा मामला चालीख लाख करोड़ रुपये के कोयला घोटाले का है। इस घोटाले में प्रधानमंत्री सीधे-सीधे आरोपों के घेरे में आते हैं। 2006-10 तक कोयला मंत्रालय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के अधीन रहा है और इस दौरान 73 कोल ब्लॉक प्राइवेट कंपनियों को बिना कोई पैसा लिए दिए गए। शर्त महज इतना था कि जितना टन कोयला निकाला जाए। 100 रुपये प्रति टन के हिसाब से सरकार को भुगतान किया जाए। शायद प्रधानमंत्री को भी मालूम होगा कि बाजार में कोयला का भाव 2000 रुपये प्रति टन है, ऐसे में कंपनियां सिर्फ 100 रुपये टन क्यों भुगतान करेगी। क्या ये राष्ट्रीय संपत्ति की लूट नहीं। क्या इस घोटाले के बाद भी प्रधानमंत्री ईमानदार बनने का ढ़ोंग करते रहेंगे।
कौन नहीं जानता है कि दशकों से बिहार अंधेरे में जीने के लिए मजबूर है। नीतीश कुमार ने सड़कें तो बना दी लेकिन बिहार में बिजली नहीं है। बिहार में बिजली पैदा करने के लिए सरकार ने दो कोल ब्लॉक दिए। लेकिन बाद में उन्हें ये कहकर रद्द कर दिया गया कि तय समय-सीमा तक कोयले का खनन नहीं किया गया। इस तरह सरकारी ऊर्जा कंपनियों को दिए गए चौदह कोल ब्लॉक रद्द कर दिए गए। लेकिन निजी कंपनियों को दिए गए कोल-ब्लॉकों में से एक को भी रद्द नहीं किया गया है.. जबकि ज्यादातर कोल ब्लॉकों में कोयले का खनन अभी शुरू भी नहीं हुआ है।
टूजी स्पेक्ट्रम में ए राजा, कनिमोझी सहित दर्जन भर लोग जेल की हवा खा रहे हैं, जबकि स्पेक्ट्रम नवीकरणीय संसाधन है। आप कितना भी स्पेक्ट्रम पैदा कर सकते हैं। वहीं कोयला ऊर्जा का अनवीकरणीय स्रोत है.. जो एकबार खत्म हो जाए तो उसे दोबारा स्थापित नहीं किया जा सकता है। ब्लैक गोल्ड कहे जाने वाले कोयले की लूट के लिए जिम्मेदार एक भी व्यक्ति पर कार्रवाई नहीं हुई है। इस घोटाले में न सिर्फ कांग्रेस बल्कि भाजपा भी घेरे में है। हां भाजपा का पाप थोड़ा कम है। मगर जब दोनों घेरे में हैं, इसलिए इस घोटाले को मीडिया में सुर्खियां नहीं मिल पा रही है।
इस घोटाले के बाद भी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ईमानदार बने हुए हैं। मीडिया कांफ्रेंस कर रहे हैं खुद को ताकतवर कह रहे हैं। संदेह का लाभ दिए जाने की भी बात कर रहे हैं। ये भी कह रहे हैं कि जितना दोषी उन्हें बताया जा रहा है वो उतने बड़े दोषी या गुनहगार हैं नहीं। क्या इस खुलासे के बाद भी प्रधानमंत्री ईमानदार बने रहेंगे। शायद नहीं।

सोमवार, 27 जून 2011

सरकार भी करती है षडयंत्र, चरित्रहनन


आचार्य बालकृष्ण का कार्यक्रम नेशनल चैनल यानी दूरदर्शन पर चलता था, तब बालकृष्ण फर्जी व्यक्ति नहीं थे। जब चार-चार मंत्री रामदेव की अगुवाई करने गए, तब रामदेव ठग नहीं थे। प्रशांत भूषण वर्षों से सुप्रीमकोर्ट में वकालत करते हैं, तब वो दलाल नहीं थे। सालों से मंदिर में सोए रहे अन्ना आरएसएस का मुखौटा नहीं थे। उनके संपत्ति की जांच नहीं गई। लेकिन आज जब इन लोगों ने भ्रष्टचार और कालेधन के खिलाफ आवाज उठाया तो बालकृष्ण फर्जी व्यक्ति हो गए, रामदेव ठग हो गए, प्रशांतभूषण राजस्व चोर हो गए, अन्ना हजारे आरएसएस का मुखौटा हो गए। क्या ये समझना किसी अंधे-बहरे व्यक्ति के लिए भी मुश्किल है। ये सरकार लोगों को ठग बनाती है, चोर बनाती है, फर्जी बनाती है, आरएसएस का मुखौटा बनाती है। वो भी उन लोगों को जो उसके खिलाफ जबान खोलते हैं। मीडिया को खरीदकर खुलकर ईमानदार घोषित करती है। भ्रष्टाचारियों को शह देती है। ऐसे में भ्रष्टाचार मिटेगा कैसे। कैसे होगा कालेधन का खात्मा। दरअसल, इस कालेधन में सरकार के कई मंत्रियों, विपक्षी दल के नेताओं की हिस्सेदारी है, सोनिया, राहुल, राजीव गांधी का पैसा है। स्वीस पत्रिका में स्वीस बैंक में राजीव गांधी के बैंक खाते होने की बात कही थी, लेकिन गांधी-नेहरू परिवार ने इस रिपोर्ट का खंडन नही किया। आखिर क्यों। अब जब विरोधी यही आरोप उनपर लगा रहे हैं तो सरकार उनका गला घोंट देना चाहती है। उनकी जुबान बंद कर देना चाहती है। आखिर इन लोगों ने पैसा जमा करने के लिए कितने ही पापड़ बेले। अब आखिर सरकार इनकी पोल कैसे खुलने देगी। यही वजह है कि सरकार अच्छे लोगों का चरित्र हनन करती है। आनेवाले समय में भी सरकार भ्रष्ट लोगों को बचाने के लिए सारे संवैधानिक मर्यादाओं को लांघने और संवैधानिक की हत्या करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ेगी। इसलिए सरकार भ्रष्टाचार पर लगाम लगाएगी, और मनमोहन अपनी छवि सुधारेंगे यह सोचना मूर्खता है। सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया, आखिर मनमोहन सिंह अहसानफरामोश कैसे हो जाएंगे। वो सोनिया गांधी की कृतज्ञता के बोझ से दबे हुए हैं आखिर वो कृतध्न कैसे हो जाएगे। एक व्यक्ति जो एक पंचायत का चुनाव नहीं जीत सकता है वो व्यक्ति दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का प्रधानमंत्री है। वो अहसान की कीमत को चुकाएगा ही। मनमोहन वही कीमत चुका रहे हैं। कई लोग कहते हैं कि सोनिया के अहसानों का मोल चुकाने के लिए वो देश के साथ विश्वासघात कर रहे हैं। जनता को धोखा दे रहे हैं तो उसका भी जवाब है कि इस देश की जनता ने मनमोहन को वोट कहां दिया है। आखिर जनता ने मनमोहन सिंह पर कौन सा उपकार किया जो वो जनता के प्रति कृतज्ञ बनें रहेंगे। मनमोहन सिंह तो सोनिया गांधी के कर्ज तले दबे हुए हैं। वो तो उन्हीं का कर्ज उतारेंगे। इसलिए मनमोहन सिंह से अपेक्षा करना व्यर्थ है। अभी और अभी मनमोहन सिंह का सिर्फ एक और एक मात्र मकसद है और वो है येन-केन-प्रकारेन साम-दंड-भय-भेद के जरिए कुर्सी से चिपके रहना ताकि ज्यादा से ज्यादा समय तक सोनिया अम्मा की सेवा की जा सके। घोटालों से घिरे गांधी नेहरू परिवार को घोटालों से बचाया जा सके। और मनमोहन सिंह यही कर रहे हैं। इसके लिए उन्हें दिग्विजय और सिब्बल जैसे ताल-बैताल को षडयंत्र, दुष्प्रचार, प्रतिष्ठा हनन, चरित्र हनन का ठेका दे रखा है। ये ताल-बैताल अपनी भूमिका बखूबी अदा कर रहे हैं। कभी प्रशांत-भूषण के खिलाफ सीडी निकाल रहे हैं, तो कभी अन्ना और रामदेव के खिलाफ सीबीआई लगा रहे हैं, कभी रामदेव को ठग कह रहे हैं तो बालकृष्ण को फर्जी व्यक्ति करार दे रहे हैं। कपिल सिब्बल कभी रामदेव से बात करते हैं तो कभी उनकी हत्या के लिए पांच हजार पुलिस को लगा देते हैं। यानी जो कोई इनके कुकृत्यों के खिलाफ बोलेगा उनका हाल रामदेव जैसा होगा। पिग्गी सिंह तो अन्ना हजारे को भी रामदेव की तरह कार्रवाई के लिए तैयार रहने की चेतावनी दे डाली है। एक तरफ सरकार का षडयंत्र, सरकारी लठैत, बेलगाम पुलिस दूसरी तरफ निहत्थी जनता और सिविल सोसायटी के लोग। देखते हैं ये लड़ाई और कितनी लंबी चल पाती है।
लेकिन इन सबमें विपक्षी पार्टी भाजपा और कम्युनिष्टों की भूमिका कम निंदनीय नहीं है। ये पार्टियां भी आंदोलनकारियों को समर्थन करने के बजाय सरकार का हाथ मजबूत करने में लगी हैं। ये पार्टियां नहीं चाहती हैं कि कोई सशक्त लोकपाल कानून बने, विदेशों में जमा कालेधन को वापस लाने के लिए कोई पहल हो। ये पार्टियों तो सिर्फ और सिर्फ राजनीति करना जानती हैं। ये पार्टियां कभी जनता के हाथ से लड़ाई हाइजैक करना चाहती है तो कभी सरकार के सुर में सुर मिलाती है। जाहिर है कि विदेशों में जमा कालेधन में इनकी भी हिस्सेदारी है। जब चेहरे बेनकाब होंगे तो इनका चेहरा भी सबके सामने होगा। आखिर ये पार्टियां क्यों चाहेगी कि भ्रष्टाचार और कालेधन के खिलाफ कोई कानून बने। क्या इनके पास येदियुरप्पा जैसे मुख्यमंत्री नहीं हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई को ये क्यों बर्दाश्त करेंगी, क्योंकि ऐसा होने से इनके भी दर्जनों नेता जेल में होंगे। ऐसे में भ्रष्टाचार रुकेगा इसकी आशा बिल्कुल नहीं की जानी चाहिए। कालेधन पर कोई कार्रवाई होगी। इसकी उम्मीद बिल्कुल नहीं की जानी चाहिए। सरकार का षडयंत्र, दमनचक्र जारी रहेगा। और ये सिलसिला तब रुकेगा जब जनता खुलकर आंदोलन करेगी और भ्रष्टाचारियों को सबक सिखाएगी।