हिंदी शोध संसार

सोमवार, 15 मार्च 2010

सुवचन - संस्कृत साहित्य के अनमोल मोती


एकवर्णं यथा दुग्धं भिन्नवर्णासु धेनुषु ।
तथैव धर्मवैचित्र्यं तत्त्वमेकं परं स्मॄतम्।।


प्रिय वाक्य प्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तुव:
तस्मातदेव व्यक्तव्यं वचने का दरिद्रता।

मातृवत परदारेषु पर द्रव्येषु लोष्टवत
आत्मवत सर्वभुतेष य: पश्चयति स पंडित:

अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनं द्वियम्
परोपकाराय पुण्याय पापाय पडपीडनम।

उद्यमेन हि सिद्यन्ति कार्याणि न मनोरथै
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगा।

माता शत्रु पिता वैरी ये न बालो न पाठित:
ना शोभते सभा मध्य हंस मध्य वकोयथा।

उपदेशो हि मुर्खानां प्रकोपाय न शान्तये
पय: पानं भुजंगानां केवल विषवर्धनम।

काक चेष्टा वको ध्यानम स्वान निद्रा तथैव च
अल्पहारी गृह त्यागी इति विद्यार्थी पंथ लक्षणम

पापा निवारयति योज्यते हिताय
गुह्यं निगुह्यति गुणानिम प्रकटम करोति
आपद गतं ना च जहाति ददाति काले
सन्मित्र लक्ष्णनम इदं प्रवदन्ति संत।

काव्य शास्त्र विनोदेन कालो गच्छति धीमताम
व्यसनने च मुर्खानां निद्रया कलहेन वा।

अल्पानामपि वस्तुनां संहति कार्यसाधिका
तृणैर्गुणत्वमापन्नैर बध्यन्ते मत्तदन्तिन:

शैले शैले ना माणिक्यम मौक्तिकं न गजे गजे
साधवो न हि सर्वत्र चंदनं न वने वने।

सर्वं परवशं दु:खं सर्वम् आत्मवशं सुखम् ।
एतद् विद्यात् समासेन लक्षणं सुखदु:खयो:।
भावार्थ- जो चीजें अपने अधिकार में नही है वह सब दु:ख है तथा जो चीज अपने अधिकार में है वह सब सुख है। संक्षेप में सुख और दु:ख के यह लक्षण है ।

अलसस्य कुतो विद्या अविद्यस्य कुतो धनम् ।
अधनस्य कुतो मित्रम् अमित्रस्य कुतो सुखम्।।
भावार्थ- आलसी मनुष्य को ज्ञान कैसे प्राप्त होगा? यदि ज्ञान नहीं तो धन नहीं मिलेगा। यदि धन नहीं है तो अपना मित्र कौन बनेगा? और मित्र नहीं तो सुख का अनुभव कैसे मिलेगा।

आकाशात् पतितं तोयं यथा गच्छति सागरम्।
सर्वदेवनमस्कार: केशवं प्रति गच्छति।।
भावार्थ- जिस प्रकार आकाश से गिरा जल विविध नदियों के माध्यम से अंतिमत: सागर से जा मिलता है उसी प्रकार सभी देवताओं को किया हुवा नमन एक ही परमेश्वर को प्राप्त होता है।

नीरक्षीरविवेके हंस आलस्यम् त्वम् एव तनुषे चेत् ।
विश्वस्मिन् अधुना अन्य: कुलव्रतं पालयिष्यति क:।।
भावार्थ- अरे हंस यदि तुम ही पानी तथा दूध भिन्न करना छोड दोगे तो दूसरा कौन तुम्हारा यह कुलव्रत का पालन कर सकता है ? यदि बुद्धिवान तथा कुशल मनुष्य ही अपना कर्तव्य करना छोड दे तो दूसरा कौन वह काम कर सकता है ?

पापं प्रज्ञा नाशयति क्रियमाणं पुन: पुन:
नष्टप्रज्ञ: पापमेव नित्यमारभते नर:।।
भावार्थ-बार बार पाप करनेसे मनुष्य की विवेकबुद्धि नष्ट होती है और जिसकी विवेकबुद्धि नष्ट हो चुकी हो, ऐसी व्यक्ति हमेशा पाप ही करता है।

अधमा धनमिच्छन्ति धनं मानं च मध्यमा।
महानतो मानमिच्छन्ति मानो हि महतां धनम।।

विद्या ददाति विनयम विद्यायाति पात्रताम।
पात्रत्वा धनंमाप्नोति धन: धर्म: तत: सुखम।।

अनेकशास्त्रं बहुवेदितव्यम् अल्पश्च कालो बहवश्च विघ्ना

यत् सारभूतं तदुपासितव्यं हंसो यथा क्षीरमिवाम्भुमध्यात्

भावार्थ- पढ़ने के लिए बहुत से शास्त्र हैं और ज्ञान अपरिमित है। अपने पास समय की कमी है और बाधाएं बहुत हैं। ऐसे में जैसे हंस पानी में से दूध निकाल लेता है उसी तरह हमें उन शास्त्रों का सार समझ लेना चाहिए।

कलहान्तनि हम्र्याणि कुवाक्यानां च सौदम्

कुराजान्तानि राष्ट्राणि कुकर्मांन्तम् यशो नॄणाम्

भावार्थ- झगडोंसे परिवार टूट जाते हैं। गलत शब्द प्रयोग करने से दोस्त टूटते हैं। बुरे शासकों के कारण राष्ट्र का नाश होता है। बुरे काम करने से यश दूर भागता है।

दुर्लभं त्रयमेवैतत् देवानुग्रहहेतुकम् ।
मनुष्यत्वं मुमुक्षुत्वं महापुरूषसश्रय:।।
भावार्थ- मनुष्य जन्म, मुक्ती की इच्छा तथा महापुरूषोंका सहवास यह तीन चीजें परमेश्वर की कॄपा पर निर्भर रहते है |

सुखार्थी त्यजते विद्यां विद्यार्थी त्यजते सुखम्।
सुखार्थिन: कुतो विद्या कुतो विद्यार्थिन: सुखम्।।
भावार्थ- जो व्यक्ति सुख के पीछे भागता है उसे ज्ञान नहीं मिलेगा। तथा जिसे ज्ञान प्राप्त करना है वह व्यक्ति सुख का त्याग करता है। सुख के पीछे भागनेवाले को विद्या कहां और विद्यार्थी को सुख कहां।

दिवसेनैव तत् कुर्याद् येन रात्रौ सुखं वसेत्।
यावज्जीवं च तत्कुर्याद् येन प्रेत्य सुखं वसेत्।
भावार्थ-दिनभर ऐसा काम करो जिससे रातमें चैनकी नींद आ सके। वैसे ही जीवनभर ऐसा काम करो जिससे मॄत्यूपश्चात सुख मिले।

4 टिप्‍पणियां :

  1. भाई आपने श्लोक तो उत्तम चुने हैं लेकिन अशुद्धियाँ इनमें व्यापक हैं। कृपया हलन्त वगैराह पर ध्यान दें और इसे शुद्ध करें। संस्कृत तो शुद्धा ही शोभा देती है।

    आपके प्रयास के लिये अनेक धन्यवाद और थोदे प्रयास से सोने में सुहागा लग जायेगा।

    हिमांशु

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  2. भाई आपने श्लोक तो उत्तम चुने हैं लेकिन अशुद्धियाँ इनमें व्यापक हैं। कृपया हलन्त वगैराह पर ध्यान दें और इसे शुद्ध करें। संस्कृत तो शुद्धा ही शोभा देती है।

    आपके प्रयास के लिये अनेक धन्यवाद और थोदे प्रयास से सोने में सुहागा लग जायेगा।

    हिमांशु

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    1. अशुद्धियों के प्रति ध्यानाकर्षण और उत्साह संवर्धन हेतु कोटि-कोटि धन्यवाद। मेरी अग्यानता और संस्कृत भाषा से अलगाव के कारण कतिपय अशुद्धियां रह गई हैं। जिन्हें सुधारने की चेष्टा करूंगा।

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