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इन
पर सवाल उठाना क्या राष्ट्र
का अपमान है?
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राम ने सीता की अग्नि-परीक्षा ली। क्यों ली? क्या राम को सीता पर शक था? क्या राम को अपनी पत्नी पर ही विश्वास नहीं था? क्या औरत विश्वास करने लायक नहीं होती है? जब राम को सीता पर विश्वास था तो उन्होंने सीता की अग्नि-परीक्षा क्यों ली। आखिर लोगों को सीता पर भरोसा क्यों नहीं था। क्या सीता की अग्नि-परीक्षा महिला जाति के खिलाफ है। क्या ये पुरुष के कलुषित मानसिकता का द्योतक है। क्या इससे सीता की गरिमा घटी है? क्या इससे राम की मर्यादा पर बट्टा नहीं लगा है? आखिर हरबार नारी जाति ही क्यों परीक्षा देती रहे। आखिर व्यक्तिगत परीक्षा नारी जाति की परीक्षा क्यों बन जाती है। जब राम ने सीता की अग्नि-परीक्षा ली, इसके बाद भी उन्होंने एक धोबी की बात में आकर सीता को दोबारा वन क्यों भेज दिया। क्या परीक्षा सिर्फ औरत की होती है, क्या पुरुषों की परीक्षा नहीं होती है। पुरूषों की परीक्षा क्यों नहीं होती है। अगर कोई पुरूष की परीक्षा चाहता है तो पुरुष इसके लिए तैयार क्यों नहीं होता है। प्रश्नों की सूची और भी लंबी हो सकती है।
यहां
मैं अपने स्तर पर हर प्रश्न
का जवाब देना चाहूंगा। राम
ने सीता के सतीत्व की परीक्षा
के लिए अग्नि-परीक्षा
ली (यहां
अग्नि-परीक्षा
का अर्थ कठिन परीक्षा से है)।
राम को अपनी पत्नी पर शक नहीं
था। राम को अपनी पत्नी पर अटूट
विश्वास था, जितना
विश्वास एक मर्यादा पुरूषोत्तम
में होना चाहिए। औरत विश्वास
करने लायक होती है। राम को
अपनी भार्या सीता पर अटूट
विश्वास था फिर भी उन्होंने
लोगों का शक दूर करने के लिए
सीता की अग्नि-परीक्षा
ली। सवाल उठाना, शक
करना मानव की सहज प्रवृति है,
इसलिए लोगों
ने सीता जैसी पवित्र स्त्री
पर भी शक किया, यानी
शक किसी पर भी किया जा सकता
है, सवाल
किसी पर भी उठाया जा सकता है।
हॉं लोगों को सीता पर भरोसा
नहीं था क्योंकि ये मानव की
सहज प्रकृति और प्रवृति है।
सीता की अग्नि-परीक्षा
को नारी जाति के खिलाफ नहीं
माना जा सकता है। इंसान व्यक्ति
के सबसे अहम मानी जानी वाली
चीज पर ही सवाल उठाता है। नारी
के लिए उसका सतीत्व, उसकी
लाज, उसका
शील ही सर्वश्रेष्ठ है,
इसलिए सीता
के सतीत्व पर ही सवाल उठाया
गया। इसे पुरूष के कलुषित
मानसिकता का द्योतक नहीं माना
जा सकता है। पुरूष ही नहीं,
बल्कि खुद
महिलाएं ही महिलाओं के सतीत्व,
चालचलन,
शील और लज्जा
पर सवाल उठाती हुई देखी जा
सकती हैं। किसी पुरूष प्रधान
समाज नहीं, बल्कि
पूरी मानव जाति की ये प्रकृति
है कि वह किसी व्यक्ति की सबसे
बड़ी पूंजी या सबसे बड़ी शक्ति
पर ही सवाल उठाता है और उसे
संदेह के घरे में लाता है।
उसकी जांच कराना चाहता है।
जाहिर है कि उस अग्नि-परीक्षा
से सीता की मर्यादा कम नहीं
हुई है और ना ही राम की मर्यादा
कम हुई है।
जहां
तक बात हरबार नारी जाति की
परीक्षा की है तो परीक्षा नारी
जाती तक सीमित नहीं है। ना ही
ये किसी वर्ग तक सीमित होनी
चाहिए। भले ही प्रधानमंत्री
मनमोहन सिंह खुद को बचाने के
लिए ये सामंतवादी तर्क दे रहे
हों कि सीजर की पत्नी को संदेह
से परे रखा जाना चाहिए। ये सोच
उनकी हो सकती है। मगर,
जनता को किसी
पर भी शक और सवाल करने का हक
होना चाहिए। सवाल को राष्ट्र
के अपमान से जोड़ा जाना व्यक्ति
के मौलिक अधिकारों के विरुद्ध
है। सीता की अग्नि-परीक्षा
लेने के बाद भी राम ने उन्हें
जंगल भेजा क्योंकि उनकी जनता
में से एक की शिकायत थी कि राम
ने लंका गई सीता को वापस क्यों
लाया। इस परीक्षा देना आम आदमी
के लिए संभव नहीं। राम ने ऐसा
किया और इसलिए तो राम मर्यादा
पुरुषोत्तम हैं। राम मर्यादा
पुरुषोत्तम हैं, हमारे
आदर्श पुरुष हैं, हमारे
भगवान हैं। सीता नारी जाति
की गौरव और आदर्श हैं। आखिर
ये लोग इतने श्रेष्ठ क्यों
और कैसे हैं। राम ने कभी नहीं
कहा कि उन्हें सीता के शील-स्वभाव
और सतीत्व पर पूरा भरोसा है
और वो इसकी परीक्षा नहीं कराएंगे
(जैसा
कि बार-बार
खुद प्रधानमंत्री और सरकार
के मंत्री कहते हुए देखते जा
सकते हैं)।
लाख विश्वास के बावजूद उन्होंने
ऐसा किया ताकि जनता को सीता
पर शक न रह जाए और सीता की गरिमा
और मर्यादा में अभिवृद्धि
हो।
मगर,
दुर्भाग्य
है कि आज हम खुद को ईमानदार,
साफ-छवि
कहते हुए थकते नहीं हैं,
मगर कोई
अग्नि-परीक्षा
देने(स्वतंत्र
एजेंसी से जांच) के
लिए तैयार नहीं हैं। जनता का
संदेह सवालों के जरिए सामने
आ रहे हैं। मगर प्रधानमंत्री
कह रहे हैं कि सीजर की पत्नी
को संदेह के घेरे बाहर रखा
जाना चाहिए। सरकार के मंत्री
और सिपहसलार मान हानि के मुकदमे
की धमकी देते हैं (कुछ
ऐसा ही धमकी देने वाले एक
केंद्रीय मंत्री को हाल ही
में इस्तीफा देना पड़ा।)
जनता सवाल
उठाती है तो सरकार सवाल उठाने
वालों को परेशान करने के लिए
उसके पीछे अपना सरकारी तंत्र
लगा देती है। वो राजतंत्र था
जिसमें अक्सर राजाओं ने
लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा
की, मगर
आज लोकतंत्र है जिसमें बड़े
ही सुनियोजित तरीके से लोकतंत्र
की हत्या की जाती है। इस हत्या
में लोकतंत्र का दंभ भरने वाले
राजनेता और राजनीतिक दलों के
लोग शामिल होते हैं। एकबार तो अन्ना बारह दिनों तक अनशन पर रहे। सरकार ने संसद की भावना (सेंस ऑफ पार्लियामेंट) पारित करवाया और अन्ना की तीन अहम मांगों को ज्यों का त्यों मान लेने का वादा किया। मगर, जब नया सरकारी मसौदा बना तो सरकार अपने वादे से मुकरती दिखी। सरकार के मंत्री इस लहजे में बयान देने लगे कि मुझे जैसा लगा मैंने कर दिया, आप मेरी गर्दन पर बंदूक रखकर बात नहीं मनवा सकते और सरकार ने जनता की मांग मानने से इनकार कर दिया। सरकार ने अपने मसौदे में भ्रष्टाचारियों को बचाने और इसके खिलाफ आवाज उठाने वालों को कुचलने की पूरी व्यवस्था कर दी। जहां भ्रष्टाचार के खिलाफ शिकायत करने वालों को दो साल की सजा और भ्रष्टाचारी को छह महीने की सजा का प्रावधान किया गया। भ्रष्टाचारी के लिए सरकारी वकील की व्यवस्था की गई।

जिससे देश की जनता को
लगा कि सरकार भ्रष्टाचार को
खत्म नहीं करना चाहती है।
सरकार ने भ्रष्टाचार का विरोध
करने वालों को सरकारी तंत्र
का दुरुपयोग कर सताना शुरू
किया। फिर तो टीम अन्ना इस
तथ्य की पड़ताल में लग गई कि
आखिर सरकार भ्रष्टाचार के
खिलाफ लड़ना क्यों नहीं चाहती
है। इसके लिए टीम अन्ना को
बहुत ज्यादा मेहनत नहीं करनी
पड़ी। इंटरनेट पर उपलब्ध
सामग्रियों और आरटीआई के तहत
मिले दस्तावेजों का अध्ययन
किया तो पाया कि सरकार के चौंतीस
में से पंद्रह मंत्री भ्रष्टाचार
के गंभीर आरोपों से घिरे हैं।
ऐसे में अगर जनलोकपाल जैसा
कानून अस्तित्व में आता है
तो इन मंत्रियों की जगह सरकार
में नहीं बल्कि तिहाड़ में
होगी। आखिर कौन सी सरकार अपनी
ही गर्दन पर तलवार चलाएगी।
इतना ही नहीं संसद में बैठे
162 से
ज्यादा सांसदों पर भी भ्रष्टाचार
के गंभीर आरोप हैं। आखिर ऐसे
सांसद भला ऐसा कानून क्यों
चाहेंगे, जो
उन्हें ही जेल की हवा खिलाने
लगे। यही वजह है कि संसद में
बैठे लोग और सरकार ऐसा कोई
कानून नहीं चाहती है। जनता
को बेवकूफ बनाने के लिए वह
कहने के लिए लोकपाल लाना चाहती
है और खुद को भ्रष्टाचार के
खिलाफ सबसे बड़े पैरोकार के
रूप में भी पेश करना चाहती है।
सरकार के जिन मंत्रियों पर
टीम अन्ना ने भ्रष्टाचार के
आरोप लगाए उनमें खुद प्रधानमंत्री
डॉ मनमोहन सिंह, पूर्व
वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी,
गृह मंत्री
पी चिदंबरम, विदेश
मंत्री एस एम कृष्णा,
कृषि मंत्री
शरद पवार, मानव
संसाधन मंत्री और दूरसंचार
मंत्री कपिल सिब्बल,
कानून मंत्री
सलमान खुर्शीद, शहरी
विकास मंत्री कमलनाथ,
विज्ञान और
तकनीकी मंत्री विलासराव
देशमुख, भारी
उद्योग मंत्री प्रफुल्ल पटेल,
जहाजरानी
मंत्री जी के वासन, अक्षय
ऊर्जा मंत्री फारुख अब्दुल्ला,
खाद और रसायन
मंत्री एमके अलागिरी,
ऊर्जा मंत्री
सुशील कुमार शिंदे और पूर्व
मंत्री वीरभद्र सिंह(कोर्ट
में भ्रष्टाचार के आरोप तय
होने के बाद दिया इस्तीफा)
के नाम शामिल
हैं। टीम
अन्ना ने इन मंत्रियों के
खिलाफ सबूत भी पेश करने का
दावा किया है
और सबूतों की एक-एक
प्रति प्रधानमंत्री कार्यालय
और सोनिया गांधी को भी भेजा।
टीम ने मंत्रियों के ऊपर लगे
आरोपों की जांच सुप्रीमकोर्ट
के जज की अगुवाई में किसी
स्वतंत्र जांच एजेंसी से कराने
की मांग की है, मगर
सरकार ने टीम अन्ना के आरोपों
को खारिज कर दिया।
इन
सबके बावजूद सरकार ने आरोपी
मंत्रियों के खिलाफ एसआईटी
बैठाने से साफ इनकार कर दिया।
प्रणब मुखर्जी राष्ट्रपति
बन गए। अब उनके खिलाफ जांच
नहीं हो सकती है।
जनता
की निराशा अपने चरम तक पहुंच
चुकी है। प्रणब मुखर्जी के
राष्ट्रपति बनने के बाद तो
जनता ने मान लिया कि बेशर्म
हो चुकी सरकार भ्रष्टाचार को
देश के सबसे ऊंचे पद पर प्रतिष्ठित
कर सकती है। कई लोग को भ्रष्टाचार
को वैधानिक दर्जा दिलाने की
बात करते थे, मगर
यूपीए की सरकार ने तो भ्रष्टाचार
को राष्ट्रपति पद तक पहुंचा
दिया। सरकार ने औपचारिक जांच
कराकर मामले की लीपापोती करना
भी उचित नहीं समझा और प्रणब
मुखर्जी को राष्ट्रपति बना
दिया।

