हिंदी शोध संसार

बुधवार, 3 मार्च 2010

पंक्तियां, जिन्होंने हिंदी साहित्य के बारे में मेरी दृष्टि बदल दी

,उस रोज ऑफिस में कुछ ज्यादा काम नहीं था. फुर्सत के क्षणों में मैं अक्सर नेट की शरण में जाता हूं. उस दिन भी नेट की शरण में गया. हिंदी विकिपीडिया पर कुछ खोजने लगा. अचानक मेरी नजर इन पंक्तियों पर पड़ गई.
नरेन्द्र कोहली का पदार्पण साहित्य में उस समय हुआ जब देश का विशाल मध्यमवर्ग आज़ादी के दौरान देखे गए सपनों के टूटने की निराशा, गरीबी और बेकारी के दौर से गुज़र रहा था. आज़ादी की लड़ाई का आदर्शवाद एवं उत्साह अब पिछले युग की कहानी बन गए थे. भय, भूख और भ्रष्टाचार का बोलबाला बढ़ रहा था. आजाद भारत के कर्णाधारों के पास कोई भी दूरगामी सोच वाली आजाद एवं भारतीय शिक्षा प्रणाली नहीं थी, इसलिए जनसामान्य के पास ऐसी स्थिति से निबटने के लिए न तो पर्याप्त नैतिक आधार था, न ही अपने जातीय अनुभवों का बल (जिन्हें साम्प्रदायिक कहकर नकार दिया गया).
इन पंक्तियों ने हिंदी साहित्य के बारे में सोचने की मेरी दृष्टि बदल दी. इन पंक्तियों ने (खासकर, जो कुछ जातीय अनुभव था उसे सांप्रदायिक कहकर नकार दिया गया) ने नरेंद्र कोहली के बारे में विस्तार से पढ़ने के लिए मुझे प्रेरित किया. कोहली जी के बारे में विकिपीडिया पर संपूर्ण लेख पढ़ने के बाद मुझे उनकी रचनाओं को पढ़ने की उत्कट इच्छा जगी. नेट पर उपलब्ध उनकी छिट-पुट रचनाओं को मनन करने लगा. साहित्य कुंज पर नरेंद्र कोहली के साहित्य बारे में चर्चा पढ़ी. इसके बाद अभिव्यक्ति पर कोहली जी की कुछ व्यंग्य रचनाएं पढ़ी.  कोहली जी की कुछेक रचनाओं को पढ़ने के बाद लगा कि
वाकई नरेंद्र कोहली हिंदी के आधुनिक साहित्यकारों की तरह कुंठाग्रस्त नहीं हैं. भले देश और समाज, सपनों को टूटने की निराशा, गरीबी और बेकारी से गुजर रहा है, भले ही आदर्शवाद बीते युगों की कहानी बन गए हों, भले ही हर जगह भय, भूख और भ्रष्टाचार का बोलबाला है, इस स्थिति में भी नरेंद्र कोहली जैसे युगद्रष्टा घुटने टेकने वालों में से नहीं हैं. उनके पास रामायण की मर्यादा पर गर्व करने के लिए वक्त है, उनके पास गीता की नीति पर युग देखने की शक्ति है, महाभारत की नीति है, उनके सामने विवेकानंद ऐसे अत्याधुनिक युवाद्रष्टा हैं. राम की मर्यादा, कृष्ण की नीति, वसुदेव जैसी जूझने की क्षमता है. फिर ऐसा मनीषी किसी भी परिस्थिति में घुटने क्यों टेके.
राजस्थान पत्रिका में नरेंद्र कोहली का महासमर धारावाहिक रूप में छप रहा है. इसके कुछ भागों को देखकर मुझे लगा इस पुस्तक को विस्तारपूर्वक पढ़नी चाहिए. समय नहीं मिला कि किताब की दुकान पर जाकर इस पुस्तक को खरीदूं(वैसे हैदराबाद में हिंदी किताबों की दुकान कम हीं है.). सोचा ऑन-लाइन खरीद लूं. पुस्तक.ऑर्ग पर गया. कोहलीजी की रचनाओं का विशाल भंडार देखा तो दिमाग चकरा गया.
  • अभ्युदय- पृष्ठ-1356, मूल्य-40 डॉलर                  6530abhuyday-set पुस्तक- अभ्युदय
  • महासमर- पृष्ठ- 3661 मूल्य-110 डॉलर
  • वसुदेव- पृष्ठ-544, मूल्य- 22 डॉलर
  • समग्र कहानियां, पृष्ठ-709, मूल्य- 24 डॉलर
  • स्वामी विवेकानंद, पृष्ठ-351, मूल्य- 10 डॉलर
  • हिंदी उपन्यास सृजन और सिद्धांत, पृष्ठ-294, मूल्य-15 डॉलर
  • हम सबका घर और अन्य कहानियां, पृष्ठ- 136, मूल्य- 7 डॉलर
  • संघर्ष की ओर, पृष्ठ-367, मूल्य- 18 डॉलर
  • राम लुभाया कहता है, पृष्ठ-367, मूल्य-20 डॉलर
  • मेरे मुहल्ले के फूल, पृष्ठ- 508, मूल्य- 20 डॉलर
  • प्रेमचंद्र, पृष्ठ-264, मूल्य-9 डॉलर
  • न भूतो न भविष्यति, पृष्ठ-692, मूल्य-32 डॉलर
  • देश के शुभचिंतक, पृष्ठ-356 मूल्य-20 डॉलर
  • त्राहि-त्राहि पृष्ठ-654, मूल्य-20 डॉलर
  • तोड़ो कारा तोड़ो, पृष्ठ- करीब 2094 मूल्य-70 डॉलर
  • जहां धर्म है वहां जय है- पृष्ठ मूल्य-224 मूल्य-10 डॉलर
सीधे सादे शब्दों में कहें तो कोहली जी का रचना-संसार करीब 25000(जी हां, पच्चीस हजार) पृष्ठों का है. शायद वेद-व्यास जी भी चकरा जाएं. कोहली जी ने अपने पांच दशक के साहित्यिक सफर में---
अगले अंकों में जारी

2 टिप्‍पणियां :

  1. नरेन्द्र कोहली जी का साहित्यिक योगदान अतुल्य है. कभी दिल्ली यात्रा पर जाये तो उनकी पुस्तकें आराम से प्राप्त कर सकते हैं.

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  2. सच है नरेंद्र कोहली जी आधुनिक युग के व्यास हैं !

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