वेदना के क्षण
>> Wednesday, July 1, 2009
आरती के दीप बुझ गए
आशा की कोई किरण न रही
ध्रुवतारा न उगा उस दिन
पीड़ा मेरी घनीभूत होती गई.
यानी हृदय के उद्गार
आरती के दीप बुझ गए
आशा की कोई किरण न रही
ध्रुवतारा न उगा उस दिन
पीड़ा मेरी घनीभूत होती गई.
हर तरफ मंदी का शोर है. मगर सवाल उठता है कि क्या ये मंदी वास्तविक है. अगर वास्तविक है तो मंदी है किसके लिए. सरकार के लिए या कॉर्पोरेट घरानों के लिए या फिर उनके लिए जो बदतर से बदतर जिंदगी जीने के लिए अभिशप्त हैं. प्रधानमंत्री डॉ मननोहन सिंह यूं तो कॉर्पोरेट जगत के दुलारे समझे जाते हैं, मगर एकबार जब उन्होंने कॉर्पोरेट बाबुओं की ऊंची तनख्वाह पर कुछ कहने की हिम्मत की तो पूरे कॉर्पोरेट जगत में इसका जबरदस्त विरोध हुआ. कई लोगों ने तो यहां तक कह दिया कि जब मटर के दाने डालोगे तो बंदर ही मिलेंगे न. मतलब साफ था गुरिल्ला फांसने के लिए सोने के बिस्किट डालने ही होंगे. 1991 में जब देश की चालीस करोड़ जनता को एक शाम भूखे रहना पड़ रहा था, इसके बावजूद हमारे तत्कालीन वित्तमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने ये मानने ये इनकार कर दिया था कि देश आर्थिक मंदी की दौर से गुजर रहा है. मगर, आज कुछ औद्योगिक घरानों की चीख-पुकार को सरकार ने बड़ी गंभीरता से लिया है और जनता के टैक्स के पैसे को एकमुश्त खैरात में बांटनी शुरू दी है. यही पैसा जब गरीबों के पेट की आग बुझाने के लिए दिए जाने की बात होती तो वहां कभी अल्पसंख्यक तो कभी अनुसूचित जाति और जनजाति, यानी कि वोट नजर आने लगता है. अब आइये जानते हैं कि कॉर्पोरेट घरानों में इन पैसों का इस्तेमाल कैसे होता है. सिटीग्रुप को मंदी की मार से उबारने के लिए अमेरिकी सरकार ने पैंतालिस अरब डॉलर का पैकेज दिया. इसके दूसरे ही दिन, कंपनी ने अपने अधिकारियों की आवाजाही के लिए जेट विमान का खर्चा उठा लिया. इस पर कंपनी को पांच करोड़ डॉलर की खर्च आयी. खुद को दिवालिया करार दे चुकी कंपनी मेरिल लिंच के मुख्य कार्यकारी अधिकारी ने अपने ऑफिस की सजावट पर ज्यादा नहीं, महज साढ़े बारह लाख डॉलर फूंक डाले. बीमा कंपनी एआईजी को दिवालियेपन से बचाने के लिए अमेरिकी सरकार ने पचासी अरब डॉलर की मदद दी, अगले ही दिन, कंपनी के अधिकारियों को शानदार रिजॉर्ट में पार्टी दी गई, जहां एक रात के लिए एक कमरे का किराया कम से कम एक हजार डॉलर होता है. वेल्स फॉर्गो को मंदी से उबारने के लिए, अमेरिकी सरकार ने पच्चीस अरब डॉलर का बेलआउट पैकेज दिया. बेलआउट मिलने की खुशी में अधिकारियों ने लॉस वेगास में शानदार पार्टी दी. लॉस वेगास मतलब जिंदा देवी-देवाताओं का स्वर्ग. सत्यम के पूर्व चैयरमैन रामालिंग राजू की तीन सौ से ज्यादा ज्यादा कंपनियां हैं, कम से कम तिरसठ देशों में उनका शानदार बंगला है. दर्जनों मन सोना देवी-देवता को चढ़ा चुके हैं. वो तीन सौ छब्बीस जोड़े जूते और इतना ही बेल्ट का इस्तेमाल करते हैं. कुछ रोज पहले, ओबामा ने वित्तीय संस्थानों और बैंकों द्वारा अपने अधिकारियों को भारी-भड़कम बोनस देने की कड़ी आलोचना की थी. ओबामा ने इस कृत्य को गैर-जिम्मेदाराना और बेहद शर्मनाक करार दिया था. जहां एक ओर कंपनियां, अपने कर्मचारियों के पेट पर लात मार रही है, वहीं अधिकारियों को अठारह अरब डॉलर का बोनस कोर्पोरेट चोरी नहीं है तो और क्या है. औद्योगिक घरानों की इस व्यवस्था को लोकतंत्र की तर्ज पर कोर्पोरेट चोरतंत्र नाम दिया गया है.
भौतिकवादी जीवन दर्शन भारतीय संस्कृति के लिए कोई अनोखा विषय नहीं रहा है.. लेकिन भूमंडलीकरण के बाद ही यह आमलोगों की जिंदगी का हिस्सा बन सका है. मगर, अतिशय लालचवादी सोच ने शुरुआत में इसका गला घोंट दिया. सदियों पहले की बात है. भारत में चार्वाक नाम के ऋषि पैदा हुए थे. वे जाते-जाते कह गए, जब तक जीओ, सुख से जीओ, कर्जा लेकर, घी पीओ. सदियों तक भारत की बहुसंख्यक जनता ने इसपर ध्यान ही नहीं दिया. और जिन्होंने ध्यान भी दिया, उन्हें यह चार्वाकी दर्शन हजम ही नहीं हुआ. नतीजा हुआ, वो गरीबी और बेचारगी में जीते रहे. सात समुंदर पार वालों ने शायद ये बात सुनी भी नहीं होगी, मगर वे इसका मतलब समझ गए. तभी तो कर्जा लेकर, घी ही नहीं, शराब-सिगरेट और न जाने क्या क्या पी गए. खुली बात, खुले दिमाग की तर्ज पर, मुक्त पूंजी, मुक्त श्रम और मुक्त बाजार व्यवस्था का जन्म हुआ. मुक्ति के इस रोग ने धीरे-धीरे पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले लिया. कभी एक ब्रैंड था अब ब्रैंड ही बैंड हैं. कभी मेट्रो में भी मॉल नहीं थे, अब हर चौराहे- हर नुक्कड पर मॉल दिख रहे हैं. इसका नशा इस कदर सिर चढ़कर बोला कि लोग साम्यवादी व्यवस्था को मुंह चिढ़ाने लगे. कॉर्पोरेट कल्चर और मैंनेजर संस्कृति ने पूरे बाजार या यू कहें पूरी व्यवस्था को अपनी चपेट में ले लिया. लोगों को इस व्यवस्था में मजा आने लगा. कॉर्पोरेट घरानों को हस्तक्षेप से मुक्त करने के लिए सरकार पर मध्यवर्ग का दबाव बढ़ने लगा. सरकारों ने कॉर्पोरट घरानों को हस्तक्षेप से मुक्त कर दिया. इसके बाद कॉर्पोरट घरानों को भी लगा कि उन्हें कही से किसी तरह की कोई जिम्मेदारी नहीं है. ज्यादा से ज्यादा संसाधन को अपने हिस्से में कर लेने की होड़-सी मच गई. जिसे एक प्यारा सा नाम दिया गया- प्रतिस्पर्धा. मध्यवर्ग हर स्थिति में सुख भोगने की लालसा में फंसता गया. कर्ज लेकर घी पीने का फलसफा साकार होता दिखा. प्लास्टिक कार्ड पर उधार की जिंदगी किस्तों में चलने लगी. उधार का टीवी, उधार की कार, उधार का घर, उधार का प्यार. बाजार में रौनक, रियल स्टेट में बूम. हर तरफ विकास के नारे गए जाने लगे. कही शाइनिंग इंडिया, तो कहीं भारत उदय. कहीं भारत निर्माण तो कही और कुछ. मतलब आमदनी अठन्नी, खर्चा रुपया. मगर, बालू की भीत ज्यादा देर तक नहीं टिकती मशहूर निवेशक वारेन बफेट ने ठीक ही कहा कि समुंदर में जबतक ज्वार रहता है, तक तक पता ही नहीं चलता कि उसमें कौन-कौन नंगे हैं. ज्वार की भी अपनी आयु होती है. उसके जाते ही, हमाम में सब नंगे नजर आने लगे. एक के बाद एक बैंक और वित्तीय संस्थाएं दिवालिया होने लगी. अर्थव्यवस्था गंभीर संकट में फंसती गयी. सरकारी व्यवस्था को मुंह चिढ़ाने वाली बड़ी-बड़ी कंपनियां अपने उद्धार के लिए सरकार का मुंह ताकने लगीं. एक के बाद एक भारी भरकम आर्थिक पैकेज के बावजूद अर्थव्यवस्था अपनी रीढ़ पर खड़ा होने का साहस नहीं कर पा रही है.
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दरअसल, इसमें एनआईसी का भी ज्यादा दोष नहीं है और वह तो सरकार की नीतियों के अनुसार ही काम करती है. सरकारें नहीं चाहती है कि हिंदी सशक्त बने. कुछ महीने पहले, गृहमंत्रालय ने कहा था कि जो कंपनियां आंशिक रूप से भी हिंदी में काम करती हैं, वहां हिंदी अनिवार्य कर दिया जाएगा. सबको पता है कि छोटी बड़ी तमाम कंपनियां अपने उत्पादों को बेचने के लिए किसी न किसी रूप में हिंदी का प्रयोग करती हैं. अगर, इन कंपनियों में हिंदी लागू कर दिया जाए तो हिंदी की स्थिति सुधर सकती थी. लेकिन कुछ ही दिनों बाद ये रिपोर्ट को दबा दी गई. शिवराज पाटील चले गए, चिदंबरम आए. चिदंबरम को तो दो शब्द भी हिंदी नहीं आती. वो ठहरे अर्थशास्त्री. वो अर्थशास्र अंग्रेजी में पढ़े हैं, हिंदी को वो क्यों समझने लगे.
Read more...अपने इकतीस साल के जीवन में, जाने-अनजाने मैं असंख्य लोगों, प्राणियों, जड़-चेतनों का कर्जदार रहा. मैं इन सबका आभारी भी हूं. मैं चाहकर भी, या यूं कहें कि अपने जीवन का शेष हिस्सा होम करके भी इनके कर्ज से मुक्त नहीं हो पाऊंगा. मैं ही क्या, इस धरती के कमोबेश सभी इंसानों की यही स्थिति है कि वह चाहकर भी कर्ज से मुक्त नहीं हो सकता है. दरअसल, मानवमात्र का जीवन अनेक तरह के कर्जों से उपकृत हुआ करता है. प्राचीन ग्रंथों में मातृ-ऋण, पितृ-ऋण, गुरूऋण आदि कई ऋणों की चर्चा की गई है और इन कर्जों को चुकाना हर मानव का कर्तव्य बताया गया है.
इसका मतलब कदापि ये नहीं समझा जाना चाहिए कि मैं कर्जखौक हूं. मैं हमेशा कर्ज लेने और उपकृत होने से बचने का प्रयास करता रहा हूं. फिर भी प्रकृति और प्रवृति के वशीभूत होकर मैं बच नहीं पाया.
युग क्रेडिटकार्ड का है यानी उधार लेकर खाने का. चार्वाकी दर्शन यानी यावत जीवेत, सुखम जीवेत, ऋणम कृत्वा, घृतम पीबेत को अपनाने का. दूसरे के पैसे पर ऐश करने का. मामू के धन से फूफा का श्राद्ध करने का. लोक-दर्शन, लगा दो आग पानी में, जवानी उसे कहते हैं. लूटा दो बाप का दौलत, जवानी उसे कहते हैं, के प्रति पूर्ण समर्पण दिखाने का. संतोषम परमं सुखम का नहीं, बल्कि दाउ आर्ट नॉट डेस्टाइन्ड टू डस्ट के कलयुगी अर्थ समझने का.
साफ है. यह समय, गदहे को बाप कहकर काम बनाने का है. जो इसका कला में जितना निपुण है, वो उतना ही सफल है. धरम की धूरी से चिपके रहने वालों की खैर नहीं. आज के युग में गांधी बनोगे तो उस खास जगह पर गुंह भी नहीं बचेगा.
मतलब, समय बदलाव है. जो आंधी का रुख देखकर ऊंट की तरह करवट नहीं बदलता है, जिसके जिस्म पर वक्त की आंधी लाखों मन तलछट जमा कर देती है, फिर वह चाहकर भी खड़ा नहीं हो सकता. यही सब सोचकर मुझे भी थोड़ा बदलतना पड़ा. भले ही, इस कर्जखोरी ने लोगों को सड़क पर ला खड़ा कर दिया है. अमेरिका में अकेले जनवरी महीने में करीब छह लाख रोज अपना रोजगार खो चुके हैं. पिछले एक साल में करीब इसकतीस लाख लोग बेरोजगार हो गए हैं. इस वक्त अमेरिका में कुल मिलाकर एक करोड़ सोलह लाख लोग बेरोजगार है. यहां भारत की बात करना भी अनुचित है, क्योंकि भारत में इस बात पर कभी जो दी हीं नहीं जाती है. अपने हठ और अभिमान में फूली भारत सरकार बड़े गर्व से कहती रही है कि वैश्विक आर्थिक संकट का असर उस पर नहीं पड़ेगा और उसका उसका आर्थिक विकास पहले की तरह बना रहेगा. लेकिन, सरकार के इस दावे में कोई दम नहीं था. आंकड़े महंगाई कम होने की बात कही गई, लेकिन महंगाई, अब भी आम लोगों को अपना ग्रास बना रही है. आखिरकार, रिजर्व बैंक को यह घोषणा करना ही पड़ा कि देश गंभीर आर्थिक संकट की दौर से गुजर रहा है.
गंभीर आर्थिक संकट के बावजूद, बुश प्रशासन झुकने के लिए तैयार नहीं था. उसका कहना था कि खुली पूंजी, खुले बाजार और खुले श्रम के विकल्प पर विचार करना अभी जल्दबाजी होगी. वर्तमान राष्ट्रपति ओबामा भले ही अर्थव्यवस्था को आर्थिक संकट के दलदल से निकालने के लिए भले ही छटपटा रहे हो. भले ही सिनेट पर उनकी त्यौरियां चढ़ी हों, भले ही वह नौ सौ बिलियन डॉलर के पैकेज को मंजूरी देने में हो रही देरी को वे सिनेट का अनुचित और गैर-जिम्मेदाराना कदम मान रहे हो.
अमेरिकी मंदी सिखाती है कि कर्जखौक बनना ठीक नहीं है. शुरुआती दिनों के अनुभव ने कुछ ऐसी सीख दी कि कर्ज मेरे लिए कभी शान नहीं बना. कभी खुद को साबित करने के लिए या शेखी बघारने के लिए कर्ज नहीं ली.
अर्थात, मैं कर्ज लेने के सख्त खिलाफ हूं, मगर ये भी समझता हूं कि वक्त की आंधी के प्रतिकूल जाकर कोई कितनी खड़ा रह सकता है. यही वजह है कि कभी कभार मैं भी कर्ज लेता हूं. वैसे कर्ज लेना कई लोगों की शान में शुमार है. वो बलपूर्वक कर्ज लेते हैं, दूसरों को दिलाते हैं या फिर लेने के लिए मजबूर करते हैं. इस कटेगरी में तथाकथित सेक्लूयर बुद्धिजीवी शामिल हैं, जिन्हें अपने देश, अपनी भाषा, अपनी विचारधारा और अपनी संस्कृति पर शर्म महसूस होती है. ये स्वयं को सेक्यूलर साबित करन के लिए कर्ज लेते हैं. कई लोगों को समाजवादी बनने का ढ़ोग रचने के लिए कर्ज लेना पड़ता है.
लेकिन मेरे लिए कर्ज लेना कभी शान नहीं रहा, कभी खुद को साबित मैंने कर्ज नहीं ली, लेकिन समय ने कई बार मुझे ऐसा करने के लिए मजबूर किया.
वैसे तो कर्जदार अक्सर बदतमीज होते हैं, लेकिन एक कर्जदार, बड़ा ही बदतमीज निकला. वक्त-बे-वक्त अपना रौब दिखाता है. सरे आम कीचड़ उछालने से नहीं हिचकता है. पता नहीं, जलील करता है या ज़लील.
ऐसा नहीं कि मैंने पहलीबार कर्ज ली हो. बचपन से ही जाने-अनजाने ही कर्ज लेता रहा. उस समय न किसी ने रोका, न टोका. उस समय किसी ने मुझे जलील नहीं किया. कभी किसी ने नहीं कहा कि मौका क्यों लिखते हो. किसी ने नहीं बताया कि हज़ार होता है, हजार नहीं. कभी किसी टेक्स्ट बुक में मौका की जगह मौक़ा लिखा नहीं देखा. कभी किसी ने ज़्यादा लिखने के लिए आग्रह नहीं किया.
लेकिन ये नुक्ते का अफसाना/अफ़साना अब मेरी तरक्की की राह में एक बड़ा रोड़ा बनकर आ खड़ा हुआ है. भाषा के शुद्धतावादी सर्थमकों ने साफ कह दिया था कि तुम एंकर नहीं बन सकते.
आखिर मेरी गलती/ग़लती कहां है. क्या जमीन बोलने वाले हमारे पूज्य गुरूजी गलत थे या मैं. कौन दोषी है. आखिर/आख़िर मेरे गुरूजी ने खुदा को ख़ुदा क्यों नहीं पढ़ाया. जब उस समय यह आग्रह नहीं था तो आज क्यों. क्यों अखबार वाले, मौका को मौक़ा नहीं लिखते. क्यों इज्जत को इज्ज़त नहीं लिखा जाता. जब अंग्रेज ने मेरी भाषा से शब्द लिया तो इस शर्त पर कि तुम जैसा बोलते हो वैसा ही मैं भी बोलूंगा. क्या मैंने अपनी भाषा में अंग्रेजी शब्द शामिल किया तो क्या इसी शर्त पर कि उस शब्द का उच्चारण जैसा अंग्रेज करते हैं, वैसा मैं भी करुं.
ये बदतमीज जब बदतमीज़ बनकर मेरे सामने आता है तो जी करता है कि इसका सिर फोड़ दूं. आखिर ये एहसान फ़रामोश कब तक यूं मेरे सपनों का गला घोंटता रहेगा. आखिर ये कब तक मुझे चिढ़ाता करेगा Read more...वितरण- फॉक्स सर्चलाइट पिक्चर्स
रिलीज- 12 नवंबर 2008(अमेरिका, सीमित)
26 दिसंबर 2008(अमेरिका, सर्वत्र)
आमदनी- आठ करोड़ इकहत्तर लाख डॉलर
इस फिल्म के गेम शो हू वॉन्ट्स टू बी ए मिलिनेयर के संचालक की भूमिका के लिए, पहले शाहरूख खान को कहा गया, उनके मना कर देने पर अनिल कपूर ने ये भूमिका निभायी. स्लमडॉग के कार्यकारी निर्माता और सीलेडर फिल्म्स के अध्यक्ष पॉल स्मिथ, हू वॉंट्स टू बी ए मिलिनेयर की मूल कृति के रचयिता है.
देव पटेल यानी जमाल मलिक- मुंबई की झुग्गी झोपड़ी में जन्मा और पला-बढ़ा एक मुस्लिम युवक. जमाल की भूमिका के लिए बॉयल ने सैंकड़ों युवकों को जांचा-परखा.
आयुष महेष खेडकर यानी छोटा जमाल
फ्रैदा पिंटो- लतिका- जमाल की प्रेमिका. पिंटो देशी मॉडल हैं, जिन्होंने इसी फिल्म से अपनी फिल्मी पारी शुरू की हैं.
माथुर मित्तल यानी सलीम यानी जमाल का बड़ा भाई
अहरुद्दीन मोहम्मद इस्माइल-छोटा सलीम
आशुतोष लोबो गाजीवाला- किशोर सलीम
अनिल कपूर यानी प्रेम कुमार- गेम शो के संचालक
सौरभ शुक्ला- कांस्टेबल श्रीनिवास
अगस्त 2007 में वार्नर इंडेपेंडेंट पिक्चर्स ने अमेरिका और पाथे ने दुनियाभर में इस फिल्म के वितरण का अधिकार प्राप्त कर लिया. वार्नर पिक्चर्स ने इस फिल्म के लिए पचास लाख डॉलर खर्च किए, मगर उसे फिल्म से ज्यादा आशाएं नहीं थी. इसलिए उसने फिल्म का अधिकार बेचने का फैसला किया. बाद में वार्नर और फॉक्स सर्च लाइट ने बराबर की साझेदारी पर फिल्म के वितरण का फैसला किया.
ब्रिटेन में यह फिल्म नौ जनवरी 2009 को रिलीज हुई. दूसरे ही सप्ताह में इसने बॉक्स ऑफिस पर कीर्तिमान स्थापित कर दिया. दूसरे सप्ताह में फिल्म देखने वालों की संख्या में सैंतालिस प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई. यह अब तक की सबसे बड़ी वृद्धि है. यह वृद्धि फिल्म को चार गोल्डन ग्लोब और ग्यारह बाफ्टा पुरस्कारों के मिलने के बाद हुई. स्लमडॉग के रिलीज होने के मात्र ग्यारह दिनों में इस फिल्म ने यहां इकसठ लाख डॉलर की कमाई की. कुछ मिलाकर इस फिल्म ने यहां बीस मिलियन डॉलर की कमाई की.
भारत में इस फिल्म का प्रीमियर बाइस जुलाई 2009 को हुआ, जिसमें फिल्म इंडस्ट्री की नामी-गिरामी हस्ती वहां मौजूद थी. भारत में फिल्म के मूल संस्करण के साथ-साथ डब संस्करण भी रिलीज हुआ. 23 जनवरी को पूरे भारत में फिल्म की 351 प्रिंट रिलीज की गई. पहले सप्ताह में इसने बाइस लाख डॉलर की कमाई की. पहले सप्ताह में सिनेमाघरों की पच्चीस प्रतिशत सीटें भरी तो दूसरी सप्ताह पचास प्रतिशत. हालांकि भारतीय फिल्मों की लिहाज से इसे बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं माना जा सकता है, लेकिन फॉक्स फिल्म ने भारत में इस फिल्म ने अब तक सबसे ज्यादा कमाई की. कमाई के मामले में इसने फॉक्स की फिल्में स्पाइडर मैन-3 औप कैसिनो-रॉयल को भी पीछे छोड़ दिया. बॉक्स ऑफिस पर फिल्म की सफलता को लेकर भारतीय फिल्मकारों का कहना है कि भारत में ज्यादातर लोग फिल्म स्लमडॉग का मतलब भी नहीं समझते है, यही इस फिल्म के साथ दिक्कत है. दूसरी ये कि अनिल कपूर को छोड़कर इस फिल्म में कोई जाना माना कलाकार नहीं है. तीसरी ये कि झुग्गी झोपड़ी में रहने वाला लड़का अंग्रेजी बोलता है ये बात किसी को हजम नहीं हुआ. हालांकि फिल्म का हिंदी संस्करण काफी सफल रहा है.
पश्चिमी दुनिया की प्रतिक्रियाएं
आलोचकों ने स्लमडॉग को मूल रूप से विदेशी फिल्म करार दिया. रोटेन टोमैटोज ने फिल्म को सौ में से चौरानवे अंक दिया. वहीं मूवी सिटी न्यूज ने साल की तीसरी बड़ी फिल्म बताया. शिकागो सन टाइन्स ने फिल्म को फोर स्टार करार दिया. उसकी समीक्षा कुछ इस प्रकार थी, सांस रोकनेवाली, उत्तेजना भर देने वाली कहानी, दिल को दहला देने वाली. वाल स्ट्रीट जर्नल ने इस फिल्म पहली वैश्विक मास्टरपीस करार दिया है.
भारतीय आलोचकों की प्रतिक्रियाएं
भारत में इस फिल्म पर व्यापक और मिली जुली प्रतिक्रिया देखने को मिली. फिल्म समीक्षकों ने इसे खुले दिल स्वीकार किया है. टाइम्स ऑफ इंडिया में निखत काजमी ने लिखा है, परी कथा की तरह, जिसमें थोड़ा रोमांच भी है, साथ ही कलाकाल की अंतर्दृष्टि भी. वे फिल्म के आलोचकों की आलोचना करते हुए लिखते हैं कि धाराबी इर्द-गिर्द के जीवन पर वृतचित्र बनाने को कोई मतलब नहीं है. इंडियाटाइम्स में रेणुका कहती है कि यह फिल्म सचमुच में भारतीय फिल्म है. वे आगे कहती है कि यह मुंबई की जिंदगी पर आधारित और यहीं बनी अब तक सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में से एक है.
दूसरी ओर, फिल्म समीक्षक, गौतम भास्करन कहते हैं कि इस फिल्म में कुछ भी भारतीय नहीं है. उन्होंने इस फिल्म को छिछला, संवेदनहीन करार दिया. प्रसिद्ध फिल्म समीक्षक, सुभाष के झा इसे अतिमहत्वाकांक्षी, मगर निराशाजनक फिल्म बताते हैं. वे कहते हैं कि जिस पटकथा पर यह फिल्म बनी है, उस कथा पर मीरा नायर सलाम बांबे और सत्यजीत राय अपु त्रिलोजी बना चुके हैं. बीबीसी इस फिल्म पर कहता है कि यह भारतीय फिल्मों की नकल है. बीबीसी सलाह देता है कि अगर आप मुंबई की सच्चाई देखना चाहते हैं तो उठा लाइये रामगोपाल वर्मा की सत्या की डीवीडी.
अभिनेता अमीर खान ने कहा कि उन्हें नहीं लगता है कि यह भारतीय फिल्म है. आमिर ने कहा कि सर रिचर्ड एटिनबोरो की गांधी सही मायनों में एकमात्र भारतीय फिल्म थी. उन्होंने कहा कि स्लमडॉग भारत के बारे में है, लेकिन भारतीय फिल्म नहीं है. हमें आशा है कि यह फिल्म ऑस्कर में अच्छा करेगी. हमें नहीं लगता है कि यहां देशी या विदेशी से कुछ लेना-देना है. फिल्मकार प्रियदर्शन कहते हैं कि यह भारतीय व्यवसायिक सिनेमा की तरह है. चूंकि विदेशी लोग हमें गंदा, शोषित देखना पसंद करते हैं, इसमें मुंबई की खूबसूरती कहां है.
साहित्यकार सलमान रश्दी कहते हैं कि वे स्लमडॉग के बड़े फैन नहीं है. फिल्म में तीन-चार जगह स्टोरी लाइन तोड़ी गई है.
पुरस्कार और सम्मान
अखबारों और पत्र-पत्रिकाओं में फिल्म को खूब वाहवाही मिली. इस फिल्म को चार गोल्डन ग्लोब और ग्यारह बाफ्टा अवोर्ड मिले हैं. इसके साथ ही इसे ऑस्कर अवोर्ड के दस वर्गों में नामांकित किया गया है.
संगीत
स्लमडॉग के लिए संगीत दिया है ए आर रहमान ने. इस फिल्म के लिए रहमान को 2009 का गोल्डन ग्लोब बेस्ट ऑरिजिनल स्कोर अवार्ड मिला है. रहमान को ऑस्कर के तीन वर्गों में भी नामांकित किया गया है. वहीं गुलजार को जय हो के लिए ऑस्कर में नामांकित किया गया है.
फिल्म पर विवाद
छियासीवें गोल्डन ग्लोब अवॉर्ड की घोषणा के बाद, शिकागो फिल्म समालोचकों ने डैन्नी बॉयल के साथ सह-निर्देशक लवलीन टंडन को भी सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार देने के लिए ऑनलाइन आंदोलन चलाया. आंदोलनकर्ता जैन लीसा हटनर का कहना है कि जब लवलीन फिल्म निर्माण प्रक्रिया में शामिल हुई तो पुरस्कारों में इन्हें दरकिनार क्यों किया गया. बाद में लवलीन ने कहा कि वे इस तरह के आंदोलन से शर्मिदगी महसूस करती हैं और उन्हें यह पुरस्कार नहीं चाहिए.
इस फिल्म पर मेगास्टार अमिताभ बच्चन की टिप्पणी से भी भारी विवाद खड़ा हुआ. अमिताभ की टिप्पणी कई मायने में महत्वपूर्ण है. चूंकि फिल्म की शुरुआत में अमिताभ द्वारा जमाल को ऑटोग्राफ देते दिखाया जाता है, अमिताभ ही कौन बनेगा करोड़पति के संचालक थे. तेरह जनवरी 2009 को अमिताभ ने अपने ब्लॉग पर फिल्म के कुछ हिस्से पर भारी ऐतराज जताया. अमिताभ ने कहा, दुनिया में कहां गरीबी, मुखलिसी नहीं है, क्या विकसित देशों के लोग गरीब नहीं है, तो फिर विकासशील भारत की गरीबी को मजाक क्यों बनाया जाता है. आगे उन्होंने कहा कि एक भारतीय की किताब पर एक विदेशी ने फिल्म बनायी इसलिए इस फिल्म को गोल्डन ग्लोब मिल जाता है, अगर किसी विदेशी की ये फिल्म नहीं होती तो इसे यह पुरस्कार नहीं मिलता. अमिताभ की इस टिप्पणी पर भारी विवाद हुआ. बाद में अमिताभ ने अपनी टिप्पणी पर सफाई भी दी.
विरोध और कानूनी पक्ष
फिल्म के रिलीज होने के बाद इसकी व्यापक आलोचना हुआ. कई लोगों ने फिल्म के खिलाफ कोर्ट में जनहित याचिका भी दायर की. फिल्म पर देश की गरीबी को विदेशी नजरिये से देखने और दिखाने का आरोप लगाया गया. स्लम-ड्वेलर्स वेल्फेयर ग्रुप ने फिल्म के संगीतकार ए आर रहमान और अभिनेता अनिल कपूर के खिलाफ मानहानि का दावा भी ठोका. इन पर आरोप लगाया गया कि फिल्म में झुग्गी-झोपड़ी में रहनेवालों को गलत तरीके से दिखाया गया, जो मानवाधिकार का उल्लंघन है. फिल्म में स्लमडॉग शब्द के इस्तेमाल पर भी ऐतराज जताया गया. सामाजिक कार्यर्ता निकोलस अल्मैदा ने निजी फायदे के लिए गरीबों के शोषण के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया. उन्होंने स्लमडॉग शब्द को गरीबों के लिए अपमानजनक बताया.इस तरह के प्रदर्शन देश के दूसरे भागों में भी हुआ. हिंदू जन जागृति समिति ने फिल्म में राम को दिखाने पर ऐतराज जताया.
बाल कलाकार
स्लमडॉग की सफलता के बाद फिल्मकार मालामाल हो गए. लागत से दस गुना से भी ज्यादा पैसा कमाया. लेकिन इस फिल्म के बाल कलाकार आज भी उसी स्लम में रहते हैं, जहां वे पहले रहते थे. जानकर आश्चर्य होता है कि फिल्म के इन बाल कलाकारों को महज कुछ रुपयों पर फिल्म में काम कराया गया. फिल्म में रूबीना अली(लतिका) और अहरुद्दीन इस्माइल(सलीम) को एक आम मजदूर से महज तीन गुनी मजदूरी दी गई. इस्माइल के घर को स्थानीय अधिकारियों ने गिरा दिया और वो अब प्लाटिक के टेंट में रहता है. इस्माइल टीबी से गस्त है. इस बात तो निर्देशक बॉयल ने भी माना और रूबीना-इस्माइल के लिए एक ट्रस्ट बनाने की बात भी कही, लेकिन ट्रस्ट में कितना पैसा दिया गया, किसी को नहीं मालूम.
Read more...यानी श्रीलंका का सच
श्रीलंका में दशकों से जारी गृहयुद्ध की वजह जातीय पहचान और स्वयं को श्रेष्ठ दिखाने की होड़ है. जातीय पहचान की यह लड़ाई औपनिवेशिक काल से ही जारी है. इस लड़ाई की बीज औपनिवेशिक काल में ही बोई गई थी. बहुसंख्यक सिंहला और अल्पसंख्यक तमिलों के बीच पुरातात्विक स्थलों, पौराणिक नामों और इनका राजनीतिक उपयोग को लेकर खून बहता रहा है.
जातीय पहचान के प्रति आग्रह ईसाई मिशनरियों के श्रीलंका आगमन से ही शुरू होता है. उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में श्रीलंका में ज्यों ज्यों ईसाई मिशनरियों की गतिविधियां बढ़ी, अल्पसंख्यक तमिलों में भी धार्मिक, सांस्कृतिक और भाषाई पहचान का भाव जगने लगा और वह अभिव्यक्त भी होने लगा । अपनी पहचान बनाये रखने के लिए उन्होंने ईसाई मिशनरियों की तरह मंदिरों, स्कूलों का निर्माण, सभाओं का आयोजन और साहित्यों का प्रकाशन शुरू किया.
बात 1815 की है. ब्रिटन ने श्रीलंका पर कब्जा जमा लिया. प्रशासन का काम चलाने के लिए विधान परिषद का गठन हुआ. विधान परिषद में तीन यूरोपीय, एक सिंहला और एक तमिल को जगह मिली. साफ है कि सत्ता में सिंहलाओं और तमिलों को उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिला. सत्ता में उचित भागीदारी नहीं मिलने से दोनों ही समुदायों में असंतोष पैदा हुआ. बाद में अंग्रेजों ने इस असंतोष को हथियार के रूप में अपनाया. फूट डालो, राज करो की नीति के तहत जातीय विभाजन और सांप्रदायिकता को बढ़ावा दिया.
1948 में श्रीलंका आजाद हुआ. इसी साल सिलोन नागरिकता कानून अस्तित्व में आया. इस कानून के मुताबिक तमिल भारतीय मूल के हैं इसलिए उन्हें श्रीलंका की नागरिकता नहीं दी जा सकती है. हालांकि इस कानून को मान्यता नहीं मिली.
1956 में सिंहला को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिया गया, जिसका तमिल राष्ट्रवादी पार्टी ने विरोध किया और उसके सांसद सत्याग्रह पर बैठ गए. बाद में इस विरोध ने हिंसक रूप ले लिया. इस हिंसा में दर्जनों लोग मारे गए और हजारों तमिलों को बेघर होना पड़ा. 1958 के दंगे के बाद तमिल राष्ट्रवादी पार्टी पर प्रतिबंध लगा दिया गया.
संघर्ष का दूसरा कारण सरकार की वह नीति थी जिसके तहत बहुसंख्यक सिंहला समुदाय को पूर्वी प्रांत में बसाया गया, जो परंपरागत रूप से तमिल राष्ट्रवादी लोगों का होमलैंड समझा जाता है. संघर्ष का तात्कालिक कारण यही है.
सत्तर के दशक में भारत से तमिल पुस्तकों, पत्र-पत्रिकाओं और फिल्में के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया गया. साथ ही, श्रीलंका में उन संगठनों पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया, जिनका संबंध तमिलानाडु के राजनीतिक दलों से था. छात्रों के भारत आकर पढ़ाई करने पर रोक लगा दी गई. श्रीलंकाई तमिलों ने इन कदमों को उनकी अपनी संस्कृति से काटने की साजिश करार दिया, हालांकि सरकार ने इन कदमों को आर्थिक आत्मनिर्भरता के समाजवादी एजेंडा का हिस्सा बताया.
1973 में सरकार ने मानकीकरण की नीति लागू की. सरकार के हिसाब से इसका उद्देश्य शिक्षा में असमानता दूर करना था, लेकिन इससे सिंहलियों को ही फायदा हुआ और श्रीलंका के विश्वविद्यालयों में तमिल छात्रों की संख्या लगातार घटती गई.
इसी साल तमिल राष्ट्रवादी पार्टी यानी फेडरल पार्टी ने अलग तमिल राष्ट्र की मांग कर डाली. अपनी मांग को मजबूत करने के लिए फेडरल पार्टी ने अन्य तमिल पार्टियों को अपने साथ कर दिया और इस तरह तमिल यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट का निर्माण हुआ. फ्रंट का 1976 में एक सम्मेलन हुआ, जिसमें पार्टी ने अलग राष्ट्र की मांग की. हालांकि इस समय तक सरकार की नीतियों के भारी विरोध के बावजूद पार्टी एक राष्ट्र के सिद्धांत की बात करती थी.
कुल मिलाकर, आजादी से पहले जो काम अंग्रेजों ने किया, वही काम आजादी के बाद आत्मनिर्भरता के नाम पर श्रीलंका सरकार ने किया.
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श्रीलंका सरकार की गलत नीतियों और पक्षपातपूर्ण रवैये की वजह से श्रीलंका तमिलों में गहरा असंतोष पैदा हो गया.
जो तमिल पार्टियां 1973 तक राष्ट्र विभाजन के खिलाफ थी, वो भी अगल राष्ट्र की मांग करने लगीं.
सरकार की नीतियों की वजह से बहुसंख्यक सिंहला समुदाय को जहां फायदा पहुंचा, वहां अल्पसंख्यक तमिलों को नुकसान. शिक्षा से लेकर रोजगार तक, धर्म से लेकर संस्कृति तक, वाणिज्य से लेकर व्यवसाय तक.. हर जगह तमिलों को बेदखल किया गया. उन्हें उनके हक से वंचित किया गया. सत्तर और अस्सी के दशक में स्थिति ये हो गई कि तमिल युवकों का युनिवर्सिटी में दाखिला और रोजगार पाना नामुमकिन-सा हो गया. इन बेरोजगार और बेकार युवकों ने विद्रोह का रास्ता अख्तियार कर लिया. ब्लैक जुलाई की घटना से भी तमिल विद्रोह को हवा मिली. तेईस जुलाई 1983 को एलटीटीई के एक हमले में श्रीलंकाई सेना के तेरह जवान मारे गए. इस घटना के बाद भड़की हिंसा में कम से कम एक हजार तमिल मारे गए और कम से कम दस हजार घरों को आग के हवाले कर दिया गया. इस नरसंहार ने दुनियाभर के तमिलों को हिला दिया. श्रीलंका में हजारों युवकों ने सशस्त्र विद्रोह का रास्ता अपना लिया.
औपनिवेशिक काल में चाय के बगानों में काम करने के लिए मजदूरों से भारत से श्रीलंका लाया गया था. कहते हैं कि घाव कितना भी गहरा हो, समय के साथ भर जाता है, लेकिन तमिलों के साथ ऐसा नहीं हुआ. जिन तमिलों ने देश की प्रगति में हिस्सेदारी निभाई, उन्हें ने बहुसंख्यक सिंहल समुदाय अपना मानने के लिए तैयार नहीं हुआ. यही वजह है कि तमिलों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी गरीबी की जिंदगी गुजारने के लिए मजबूर होना पड़ा.
1962 में भारत और श्रीलंका के बीच एक संधि हुई जिसके तहत अगले पंद्रह सालों में छह लाख तमिलों को भारत भेजा जाना था और पौने चार लाख तमिलों को श्रीलंका की नागरिकता देनी थी. लेकिन ये तमिल श्रीलंका से भारत नहीं लौटे. बिना नागरिकता, बिना अधिकार वे श्रीलंका में ही रहते रहे. साल 2003 तक उन्हें श्रीलंका की नागरिकता नहीं मिली.
जब सिंहला को राजभाषा का दर्जा मिला तो तमिलभाषी लोगों को नौकरियों से निकाल दिया गया. एक ओर भारत से तमिल साहित्य, फिल्मों, पत्र-पत्रिकाओं के आयात पर रोक लगा दी गई. दूसरी ओर, शिक्षा नीति के मानकीकरण के नाम पर तमिलों के कॉलजों में प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया गया. 1981 के जाफना लाइब्रेरी अग्निकांड से तमिलों को बहुत ठेस पहुंची. इकतीस मई से दो जून तक बड़े ही सुनियोजित तरीके से तमिलों पर हमला किया गया. तमिल अखबार के ऑफिस और लाइब्रेरी को आग के हवाले कर दिया गया. इस अग्निकांड में लाइब्रेरी की करीब एक लाख तमिल पुस्तकें जलकर राख हो गई. इस अग्निकांड में कई पुलिसकर्मी भी शामिल थे.
श्रीलंका साल 1983 से ही गृहयुद्ध की विभीषिका झेल रहा है. इस युद्ध में आधिकारिक रूप से सत्तर हजार से भी ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं. इसे दुनिया का सबसे खतरनाक संघर्षों में से एक माना जाता है. यह युद्ध मुख्यत तमिल विद्रोही एलटीटीई और सिंहला समुदाय के प्रभाव वाली सरकार के बीच है. दुनिया के इकतीस देशों ने एलटीटीई को आतंकवादी संगठन का दर्ज दे रहा है.
2001 युद्धविराम के बाद शांति की संभावना बनी. 2002 में दोनों पक्षों ने एक संधि पर हस्ताक्षर भी किया, लेकिन 2005 में हिंसा फिर से भड़क उठी. 2006 में सरकार ने एलटीटीई के खिलाफ मोर्चा खोल दिया और पूर्वी प्रांत से उसे बाहर खदेड़ दिया. इसके बावजूद लिट्टे ने अलग राष्ट्र की मांग को लेकर संघर्ष फिर से शुरू करने की घोषणा की. श्रीलंकाई सेना ने दावा किया कि उसने दुश्मन के सारे नौकाओं को नष्ट कर दिया है और उसने ये भी दावा किया कि आने वाले समय में वह उसे पूरी तरह नष्ट कर देगी. एलटीटीई पर सैंकड़ों बार संधि उल्लंघन का आरोप लगाते हुए उसने दो जनवरी 2008 को उसके खिलाफ युद्ध छेड़ दिया.
एक साल बाद उसने लिट्टे के गढ़ किलिनोच्ची पर कब्जा जमा लिया. इस संघर्ष की वजह से करीब दो लाख तमिलों को विस्थापित होना पड़ा.
संघर्ष के कारण
सिंहला वनली एक्ट- इस कानून के मुताबिक देश की राष्ट्रभाषा सिंहला होगी
गैर-सिंहलियों को रोजगार मिलना करीब-करीब असंभव हो गया
जो पहले से नौकरी में थे, उन्हें नौकरी से निकाला जाने लगा
प्रधानमंत्री एसडब्ल्यूआरडी भंडारनायके ने यह कानून लाया था
शिक्षा का कथित मानकीकरण
इस कानून के तहत, विश्वविद्यालयों में तमिलों का प्रवेश असंभव हो गया
नौकरियों में भी गैर-सिंहलियों के लिए कोई काम नहीं बचा
उन्हें नौकरी से निकाला जाने लगा
तमिल यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट का गठन
टीयूएलएफ ने अधिकार के लिए सशस्त्र संघर्ष का समर्थन किया
बेरोजगार और बेकार युवकों ने हथियार उठा लिया
वामदल शुरू-शुरू में सांप्रदायिक संघर्ष का समर्थन नहीं किया
बाद में, भाषा के मुद्दे पर वामदलों ने टीयूएलएफ का साथ दिया
1974 में लिबरेशन टाईगर ऑफ तमिल ईलम का गठन
एलटीटीई को राजनीतिक समर्थन
एलटीटीई का राजनीतिक और प्रशासनिक प्रतिष्ठानों पर हमला
लिट्टे का कारनामा
1977 में जाफना के महापौर अल्फ्रेड दुरैअप्पा की हत्या
1977 में स्वयं प्रभाकरन द्वारा तमिल सांसद एम कनगरत्नम की हत्या
1983 में सैनिक काफिले पर हमला, 13 सैनिकों की मौत
1984 में केंट और डॉलर फॉर्म में आम नागरिकों की सामूहिक हत्या
1985 में अनुराधापुरम में 146 नागरिकों की हत्या
1987 में एलटीटीई ने पहलीबार आत्मघाती हमले को अंजाम दिया
विस्फोटकों से भरे ट्रक को सैन्य शिविर की दीवार से टकरा दिया
इस हमले में चालीस सैनिक मारे गए
इस हमले के बाद लिट्टे ने 170 से भी ज्यादा आत्मघाती हमले को अंजाम दिया
यह संख्या दुनिया के किसी भी संगठन के आत्मघाती हमले की संख्या से ज्यादा है
आखिरकार आत्मघाती हमला एलटीटीई की पहचान बनाया.
1989 में जाफना विश्वविद्याल के प्रोफेसर और मानवाधिकारवादी डॉ रजनी की हत्या
1993 में लिट्टे ने एक आत्मघाती हमले में राष्ट्रपति रनसिंघे प्रेमदासा की हत्या कर दी.
1996 में कोलंबों के सेंट्रल बैंक में आत्मघाती हमला, 90 की मौत, 1400 घायल
1997 में श्रीलंकाई वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमला
1998 में बौद्धों के सबसे पवित्र मंदिरों में से एक टेंपल ऑफ टूथ पर हमला
1999 गोनागाला पर हमला, 50 सिंघलियों की मौत
2001 में भंडारनायके इंटरनेशनल हवाई अड्डे पर हमला
इस हमले में एयरफोर्स के आठ और श्रीलंकन एयरलाइन्स के चार विमान नष्ट हो गए
हमले का प्रतिरोध
1983 में सेना पर लिट्टे के हमले के बाद सिंहलियों ने तमिलों पर सुनियोजित हमले किए
इन हमलों में एक हजार से ज्यादा तमिल मारे गए
तमिलों के सिंहलियों के इलाके से भागना पड़ा
अनुराधापुरम हत्या मामले के जवाब में सेना ने कुमदिनी बोट पर हत्या कर 23 तमिलों की हत्या कर दी
1987 सेना ने ऑपरेशन लिबरेशन शुरू किया
इसका लक्ष्य जाफना को मुक्त कराना था
इस ऑपरेशन में सेना को जीत मिली, मगर प्रभाकरन भागने में कामयाब हो गया
भारतीय हस्तक्षेप
भारत ने कई कारणों से श्रीलंकाई संघर्ष में हस्तक्षेप किया. इनमें क्षेत्रीय शक्ति के रूप में खुद को प्रदर्शित करना और तमिलनाडु में आजादी की मांग को दबाना शामिल था. चूंकि तमिलनाडु के लोग सांस्कृतिक कारणों से श्रीलंकाई तमिलों के हितों के पक्षधर रहे हैं, इसलिए भारत सरकार को भी संघर्ष के दौरान श्रीलंकाई तमिलों की मदद में आगे आना पड़ा है. 80 के दशक की शुरुआत में भारतीय एजेंसियों ने कई तरह से तमिलों की मदद की.
पांच जून 1987 को जब श्रीलंका सरकार ने दावा किया कि वे जाफना पर कब्जा करने के करीब हैं, तभी भारत ने पैराशूट के जरिए जाफना में राहत सामाग्रियां गिराई. भारत की इस मदद को लिट्टे की प्रत्यक्ष मदद भी माना गया. इसके बाद 29 जुलाई, 1987 को प्रधानमंत्री राजीव गांधी और श्रीलंकाई राष्ट्रपति जयवर्द्धने के बीच एक समझौते पर हस्ताक्षर हुआ. इस समझौते के तहत तमिल को आधिकारिक दर्जा दिया गया. साथ ही, तमिलों के कई अन्य मांगें मान ली गईं. वहीं, भारतीय शांति रक्षक बलों के सामने विद्रोहियों को हथियार डालना पड़ा.
ज्यादातर विद्रोही गुटों ने भारतीय शांति रक्षक बलों के सामने हथियार डाल दिए थे, लेकिन लिट्टे इसके लिए तैयार नहीं हुआ. भारतीय शांति रक्षक सेना ने लिट्टे को तोड़ने की पूरी कोशिश की. तीन सालों तक दोनों के बीच युद्ध चला. इस दौरान शांति रक्षकों पर मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप भी लगे. उधर, सिंहलियों ने भी अपने देश में भारतीय सैनिकों की उपस्थिति का विरोध करना शुरू किया. इसके बाद श्रीलंका सरकार ने भारत से शांति रक्षकबलों को वापस बुलाने की मांग की, लेकिन राजीव गांधी ने इससे इनकार कर दिया. 1989 के संसदीय चुनाव में राजीव गांधी की हार के बाद नए प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने श्रीलंका से शांति रक्षक बलों को हटाने का आदेश दिया. इन तीन सालों में श्रीलंका में ग्यारह सौ भारतीय सैनिक मारे गए, वहीं पांच हजार श्रीलंकाई भी मारे गए.
1991 में एक आत्मघाती हमलाकर लिट्टे ने राजीव गांधी की हत्या कर दी. इसके बाद भारत ने श्रीलंकाई तमिलों की मदद बंद कर दी.
साल 2008 में जब श्रीलंकाई सेना ने लिट्टे के ठिकानों पर कब्जा करना शुरू किया तो भारत की गठबंधन सरकार हिल गई. तमिलनाडु के राजनीतिक दलों ने केंद्र सरकार से श्रीलंकाई मामले में हस्तक्षेप की मांग की. ऐसा नहीं करने पर मुख्य सहयोगी दल डीएमके ने सरकार से हटने की भी धमकी दे डाली. केंद्र सरकार पर दबाव बनाने के लिए तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम करुणानिधि ने अपने सांसदों से इस्तीफा तक ले लिया. तमिलों के मुद्दे पर तमिलनाडु की तमाम पार्टियां साथ हो गई और श्रीलंका में तुरंत युद्धविराम की मांग की. भारी दबाव के बीच विदेशमंत्री प्रणव मुखर्जी श्रीलंका गए. श्रीलंका के राष्ट्रपति ने उन्हें तमिलों की सुरक्षा का आश्वासन दिया. युद्ध में फंसे आम-नागरिकों को बाहर निकलने लिए उसने एकतरफा युद्ध विराम भी किया. अगर यही बात पहले होती तो सैंकड़ों निर्दोष लोगों की जान बच जाती.
इजरायल दुनिया का एकमात्र यहूदी देश है. अपनी आजादी से पहले भी और आजादी के बाद भी इजराइल अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा है. यूं कहे तो इजरायल का अस्तित्व संघर्ष और सिर्फ संघर्ष पर टिका है. उसका आज तक का इतिहास अत्यंत ही रक्त-रंजित रहा है. इसके बावजूद भविष्य शांतिपूर्ण होगा, इसकी सिर्फ शुभकामना ही दी जा सकती है.
इजरायल पश्चिमी एशिया का एक छोटा सा देश है. यह भूमध्यसागर के किनारे स्थित है. इसकी उत्तरी सीमा पर लेबनान, उत्तर-पूर्व में सीरिया, पूर्व में जॉर्डन और दक्षिण-पश्चिम में मिश्र स्थित है. क्षेत्रफल के हिसाब छोटा होने के बावजूद इजरायल काफी विविधतओं भरा देश है. पश्चिमी तट और गजा पट्टी इजरायल से सटा हुआ है.
इजरायल की आबादी बहत्तर लाख अस्सी हजार है. इनमें यहूदी बहुसंख्यक हैं. इजरायल दुनिया का एकमात्र यहूदी राष्ट्र है. यहूदी के अलावा यहां अरबी मुस्लिम, ईसाई और अन्य जातियां भी रहती हैं.
आधुनिक इजरायल प्राचीनकाल के यहूदी भूमि की परिकल्पना पर आधारित है. कभी समूचा इयरायल यहूदी धर्मावलंबियों का देश माना जाता था. प्रथम विश्वयुद्ध के बाद राष्ट्रसंघ ने यहूदियों के लिए एक अलग देश के रूप में इजरायल के गठन के ब्रिटेन के प्रस्ताव को मान्यता दे दी. 1947 में संयुक्त राष्ट्र ने इजरायल के विभाजन को मंजूरी दे दी. जिसके तहत यहूदियों और अरबों के लिए अलग राज्य को मंजूरी दे दी. 14 मई 1948 को यहूदी बहुल राज्य इजरायल ने अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दी. इजरायल के इस घोषणा को आस-पास के अरब राष्ट्रों ने मानने से इनकार कर दिया और इजरायल के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया.
इजरायल ने अरब राष्ट्रों के साथ एक ही समय कई मोर्चों पर युद्ध लड़ा और सभी युद्धों में जीत हासिल की. इस जीत ने अलग इजरायल की स्वतंत्रता को पुख्ता कर दिया. इतना ही नहीं, इस जीत के बाद इजरायल ने संयुक्त राष्ट्र की विभाजन योजना के बाहर भी अपनी सीमा का विस्तार किया. इसके बाद से इजरायल को अपने पड़ोसी अरब देशों से लगातार संघर्ष करना पड़ा. ये संघर्ष बड़े युद्धों और रक्तपात के अंतहीन सिलसिले के रूप में सामने आया और आज भी जारी है.
सीधे-सीधे शब्दों में कहें तो इजयराल की स्थापना और उसका अस्तित्व संघर्षों पर ही टिका है. इजरायल ने मिश्र और जॉर्डन के साथ कई शांति-संधि भी किए, लेकिन शांति के ये प्रयास इजरायल और फिलीस्तीनियों में दीर्घकालीन शांति
लाने में नाकामयाब रहे.
इजरायल में संसदीय शासन व्यवस्था है. प्रधानमंत्री सरकार का मुखिया होता है. सकलू घरेलू उत्पाद के हिसाब से इजरायल दुनिया का चौवालिसवां सबसे बड़ा देश है. मानव विकास सूचकांक, प्रेस की स्वतंत्रताऔर आर्थिक प्रतिस्पर्धा के हिसाब से मध्यपूर्व के देशों में इजरायल का स्थान सबसे ऊपर है. देश का सबसे बड़ा शहर येरूसलम इसकी राजधानी है, जबकि तेल अवीव इसकी वित्तीय राजधानी है.
इतिहास
इयरायल का इतिहास तीन हजार साल से भी पुराना है. यह इजरायलियों की धरती का प्रतीक रहा है. बाइबिल के मुताबिक देवदूत से लड़ने के बाद जैकोब का नाम इजरायल रखा गया. प्राचीनतम पुरा-तात्विक प्रमाणों के मुताबिक इजरायल किसी अन्य व्यक्ति का नाम था.
इजरायल ईसापूर्व से ही यहूदियों की पवित्र भूमि मानी जाती है. प्राचीन मान्यता के अनुसार, ईश्वर ने तीन यहूदियों को रहने के लिए ये धरती दी थी. विद्वान मानते हैं कि यह समय ईसा पूर्व दूसरी सहस्त्राब्दी की हो सकती है. यहूदी परंपरा के मुताबिक ईसापूर्व ग्यारहवी सदी में इस भूमि पर इजरायली साम्राज्य स्थापित हुआ था और इन शासकों ने करीब एक हजार साल तक इजराइल पर शासन किया था. इजरायल के ये स्थल यहूदियों के लिए सबसे पवित्र माना जाता है.
इजरायली साम्राज्य और सातवीं शताब्दी में इस्लामी विजय के मध्य इजरायल पर सीरिया, बेबीलोनिया, पर्सिया, ग्रीक, रोम, ससेनिया और बायजेनटाइन का शासन रहा. 132 ईस्वी में रोमन साम्राज्य के खिलाफ बार कोखबा विद्रोह की असफलता के बाद इस क्षेत्र में यहूदियों की उपस्थिति घट गई. यहूदियों का बड़े पैमाने पर पलायन हुआ. 628-29 ईस्वी में बायजेनटाइन शासक हेराक्ल्यूस ने वृहत पैमाने पर यहूदियों का संहार किया, जिसके कारण यहूदियों को वहां से भागना पड़ा. इस घटना के बाद यहां यहूदियों की संख्या नगण्य हो गई. 1260 में इजरायल मामलुक सल्तनत का हिस्सा बन गया और 1516 में यह ओटोमन साम्राज्य का हिस्सा बन गया, जिसने बीसवीं सदी तक इस क्षेत्र पर शासन किया.
इजरायलियों को करीब पंद्रह सौ सालों तक अपनी जमीन से अलग रहना पड़ा, लेकिन सांस्कृतिक एकता ने इनके दिलों में मातृभूमि के प्रति प्रेम की लौ को जलाये रखा. बाइबिल और यहूदी प्रार्थना पुस्तिका ने इनकी आशा और विश्वास को बरकरार रखा. बारहवीं सदी की शुरुआत में कैथोलिक ईसाईयों की प्रताड़ना से पीड़ित होकर यहूदी एकबार फिर इजरायल लौटने लगे. 1492 में स्पेन ने यहूदियों को खदेड़ दिया. सोलहवी शताब्दी में इजरायल चार शहरों में यहूदियों ने जड़ें जमा ली और अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में भारी संख्या में लोग इजरायल में आ बसे.
उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में यहूदियों ने एक अलग यहूदी राष्ट्र की मांग शुरू कर दी. 1896 में हर्जल ने अपनी किताब द जेविस स्टेट में भावी यहूदी राष्ट्र की रूप रेखा रखी. अगले ही साल वर्ल्ड जियोनिस्ट कांग्रेस की स्थापना हुई, जिसकी अध्यक्षता हर्जल ने की.
1904-14 के दौरान करीब चालीस हजार यहूदी फिलीस्तीन में आकर बस गए. प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान ब्रिटेन के विदेशमंत्री आर्थर बलफोर ने एक घोषणा पत्र जारी किया, जिसे बलफोर घोषणापत्र के नाम से जाना जाता है. इस घोषणा पत्र में फिलीस्तीन के अंदर एक यहूदी राष्ट्र की बात कही गई थी. इस घोषणा पत्र में ये बात भी शामिल की गई कि कुछ भी ऐसा नहीं किया जाए जिससे फिलीस्तीन में यहूदियों के नागरिक अधिकारों के खिलाफ हो, चाहे यहूदी दुनिया के किसी भी भाग में भी क्यों न हो. यहूदी स्वयंसेवकों की मदद से जेविस लीगन नाम से सेना की बटालियन बनी, जिसने फिलीस्तीन को जीतने में ब्रिटिश सेना की मदद की. इसका अरबों ने विरोध किया और 1920 का फिलीस्तीन युद्ध हुआ.
1922 लीग ऑफ नेशन्स ने बलफोर घोषणा पत्र से मिलते जुलते ब्रिटेन के एक प्रस्ताव को मंजूरी दे दी. इस क्षेत्र में अरब मुस्लिमों की आबादी ज्यादा थी, लेकिन इस क्षेत्र का सबसे बड़ा शहर येरूसलम यहूदी बहुल था. इधर, यहूदियों का फिलीस्तीन आना जारी रहा और फिलीस्तीन में यहूदियों की आबादी एक लाख हो गई. 1930 में नाजीवाद के उदय के कारण यूरोप से भारी संख्या में यहूदियों का पलायन हुआ और फिलीस्तीन में यहूदियों की संख्या बढ़कर ढाई लाख से भी ज्यादा हो गई. यहूदियों आबादी के विस्तार ने 1936-39 के अरब क्रांति को जन्म दिया. इधर, दुनियाभर में यहूदियों के संहार का सिलसिला जारी रहा. द्वितीय विश्व आते-आते फिलीस्तीन में यहूदियों की आबादी बढ़कर तैंतीस प्रतिशत तक आ पहुंची.
इजरायल की आजादी
1945 के बाद ब्रिटेन का यहूदियों का साथ मतभेद बढ़ गया. 1947 में ब्रिटेन ने यह कहकर फिलीस्तीन शासनादेश को वापस ले लिया कि वह अरबों और यहूदियों के बीच सर्वसम्मत हल निकालने में नाकामयाब रहा. नवगठित संयुक्त राष्ट्र संघ ने 29 नवंबर, 1947 को संयुक्त राष्ट्र विभाजन प्रस्ताव(संयुक्त राष्ट्र आमसभा प्रस्ताव 181) को मंजूरी दे दी और इस प्रकार अरब और यहूदियों के लिए दो राष्ट्रों ने निर्माण हुआ. इस प्रस्ताव के तहत संघर्ष रोकने के लिए येरूसलम को अंतर्राष्ट्रीय शहर घोषित कर दिया गया और स्वयं संयुक्त राष्ट्र ने इसके प्रशासन की जिम्मेदारी संभाल ली. इस प्रस्ताव को अरब लीग और अरब उच्च समिति ने खारिज कर दिया. एक दिसंबर, 1947 से अरब उच्च समिति ने तीन दिवसीय हड़ताल शुरू की और अरब लड़ाकाओं नें यहूदियों पर हमला कर दिया. यहूदियों ने भी रक्षात्मक रुख अपनाया और अरबों को जवाब देना शुरू किया. इस तरह यहां गृहयुद्ध भड़क उठा. इस गृहयुद्ध की वजह से फिलीस्तीन-अरब अर्थव्यवस्था ढह गई और फिलीस्तीन-अरब को भागना पड़ा.
14 मई, 1948 को यहूदी एजेंसी ने इजरायल की स्वतंत्रता की घोषणा कर दी. इधर, मिस्र, सीरिया, जॉर्डन, लेबनान और इराक ने एक साथ इजरायल पर हमला कर दिया. इस युद्ध को 1948 का अरब-इजरायल युद्ध के नाम से भी जाना जाता है. इस युद्ध में अरब देशों की सहायता के लिए मोरक्को, सूडान, यमन और सऊदी अरब ने भी अपने सैनिक भेजे. यह युद्ध एक साल तक चला. और अंत में युद्धविराम की घोषणा हुई. ग्रीन-लाइन के नाम के अस्थायी सीमा रेखा पर सहमति बनी. अलग जॉर्डन को पश्चिम तट और गजा नाम दिया गया. गजा पट्टी पर मिस्र ने नियंत्रण कर लिया. 11 मई, 1949 को संयुक्त राष्ट्र ने इजरायल को अपनी सदस्यता प्रदान की. संघर्ष के दौरान अस्सी प्रतिशत अरब आबादी (7,11,000) को वहां से भागना पड़ा. इस समय फिलीस्तीन शरणार्थी की समस्या इजराइल-फिलीस्तीन संघर्ष की मुख्य वजह माना जा रहा है.
अपनी आजादी के शुरुआती सालों में इजरायल शरणार्थी समस्या से जूझना पड़ा. 1948 से 1958 के दौरान इजरायल की आबादी आठ लाख से बढ़कर बीस लाख हो गई. 1952 में दो लाख लोग टेंटों में रह रहे थे. समस्या के समाधान के लिए प्रधानमंत्री डैविड बेन-गुरियन ने जर्मनी के साथ एक समझौता किया, जिसका यहूदियों ने व्यापक विरोध किया
1950 के दशक में इजरायल पर आत्मघाती फिलीस्तीनियों का हमला शुरू हो गया. ये आत्मघाती हमलावर मिस्र के अधिकार वाले गजा पट्टी में रहते थे.
अरब देशों ने इजरायल को मान्यता देने से इनकार कर दिया और इजरायल को नष्ट करने का आह्वान किया. 1967 में मिस्र, सीरिया और जॉर्डन की सेना इजरायली सीमा पर पहुंच गई. और संयुक्त राष्ट्र शांति रक्षकों को वहां से भगा दिया. साथ ही, उन्होंने लालसागर तक इजरायल की आवाजाही पर रोक लगा दी. इजरायल ने अरबों के इस कार्रवाई का जवाब दिया और छह दिनों तक चले युद्ध में उसे निर्णायक जीत मिली. उसने पश्चिमतट, गजा पट्टी, सिनाई प्रायद्वीप और गोलन की पहाड़ियों पर कब्जा जमा लिया. 1949 में ग्रीन लाईन इजरायल और विजित क्षेत्र की प्रशासनिक सीमा बन गयी. पूर्व येरूसलम के साथ येरूसलम की सीमा में भी विस्तार हुआ. 1980 में पारित येरूसलम कानून ने इस सीमा को मंजूरी दे दी, जिसने येरूसलम की स्थिति पर विवाद खड़ा कर दिया.
1967 के युद्ध में अरबों की हार ने अरब में गैर-सरकारी तत्वों के संघर्ष को बढ़ावा दिया. फिलीस्तीन लिबरेशन ऑर्गनाइजेशन ने तो हथियार बंद संघर्ष को ही आजादी का एकमात्र रास्ता करार दिया. साठ के दशक के शुरू और सत्तर के दशक के अंत में फिलीस्तीनियों ने इजरायलियों के खिलाफ दुनियाभर में श्रृंखलाबद्ध हमले किये. 1972 के ग्रीमकालीन ओलंपिक में इजरायली खिलाड़ियों का संहार इसमें शामिल है. उधर, इजरायल ने भी इन हमलों का जवाब दिया.
6 अक्टूबर 1973 को मिस्र और सीरिया की सेना ने इजरायल पर हमला कर दिया. यह दिन यहूदियों के कैलेंडर में सबसे पवित्र दिन माना जाता है. हालांकि इस युद्ध में इजरायल को भारी नुकसान उठाना पड़ा, लेकिन उसने दुश्मनों को अपनी जमीन से खदेड़ दिया. इस युद्ध के बाद प्रधानमंत्री गोल्डा मेयर को जनाक्रोश के चलते इस्तीफा देना पड़ा.
1977 के संसदीय चुनाव के बाद मिस्र के राष्ट्रपति अनवर अल सादत ने इजरायली संसद में भाषण देते हुए कहा कि अरब देश इजरायल को पहलीबार मान्यता दे रहे हैं. बाद में एक समझौते के मुताबिक इजरायल ने सिनाई प्रायद्वीप से सेना हटा लिया और ग्रीन लाइन के पार फिलीस्तीन की स्वायत्ता पर बाचीत के लिए तैयार हो गया. हालांकि फिलीस्तीन की स्वायत्तता पर कभी बातचीत नहीं हो पाई. सरकारों ने इजरायलियों को पश्चिमी तट में बसाना शुरू किया, जिसकी वजह से फिर संघर्ष शुरू हो गया.
7 जून 1981 को इजरायल ने इराक के ओसिराक परमाणु रिएक्टर पर हमला कर दिया. इसकी वजह इजरायल का वो खुफिया रिपोर्ट है जिसमें इराक द्वारा परमाणु बम विकसित करने और इजरायल के खिलाफ प्रयोग करने की बात कही गई थी. 1982 में इजरायल ने लेबनान के गृहयुद्ध में हस्तक्षेप करते हुए कई युद्ध शिविरों को नष्ट कर दिया, जहां से फिलीस्तीनी लड़ाके इजरायल पर मिसाईल से हमले करते थे.
1987 में फिलीस्तीनियों ने एकबार फिर हिंसा भड़क उठी. छह साल तक चले इस युद्ध में एक हजार लोग मारे गए.
1993 में इजरायल की ओर से शिमॉन पैरेस और फिलीस्तीन लिबरेशन ऑर्गेनाइजेशन की ओर से महमूद अब्बास ने ओस्लो संधि पर हस्ताक्षर किया. इस संधि ने फिलीस्तीन राष्ट्रीय प्राधिकरण को पश्चिमी तट और गजा पट्टी पर स्व-शासन का अधिकार दिया. इस संधि का मकसद आतंकवाद को खत्म करना था. 1994 में इजरायल-जॉर्डन संधि अस्तित्व में आया जिसके तहत जॉर्डन ने इजरायल के साथ रिश्ते सामान्य करने की दिशा में कदम बढ़ाया. ये संधि दोनों पक्ष के लोगों को स्वीकार था. लेकिन 1995 में यहूदियों के नेता यित्जिहाक रबिन की हत्या ने शांति संधि को नुकसान पहुंचाया.
1990 के अंत में इजरायल ने बेंजामिन नेतनयाहु की अगुवाई में हेब्रॉन से अपना सैनिक हटा लिया और फिलीस्तीन राष्ट्रीय प्राधिकारण को शासन का अधिकार दे दिया.
1991 में प्रधानमंत्री यहुद बराक ने दक्षिणी लेबनान से सैन्य वापसी कर नए युग की शुरुआत की. बाद में भी उन्होंने फिलीस्तीन प्राधिकरण के अध्यक्ष यासर यराफात से बातचीत जारी रखी. जुलाई 2000 में कैंप डैविड में यासर अराफात और अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के बीच हो रहे सम्मेलन में बराक ने फिलीस्तीनी राज्य की स्थापना का प्रस्ताव दिया, जिसे अराफात ने नामंजूर कर दिया और इस तरह बातचीत भंग हो गई.
2001 में एरियल शैरॉन नए प्रधानमंत्री बने. शैरॉन ने गजा पट्टी से एकतरफा अपने सैनिकों को हटा लिया. मगर 2006 में हृदयाघात से वे कॉमा में चले गए और सत्ता यहुद ओल्मर्ट को सौंप दिया..
नवीन घटनाचक्र
जुलाई 2006 में हिजबुल्ला लड़ाकाओं ने इजरायल पर मिसाइल से हमले किए और दो इजरायलियों का अपहरण कर लिया. इससे द्वितीय लेबनान युद्ध भड़क उठा और लड़ाई महीने भर चली.
नवंबर 2007 में इजराइली प्रधानमंत्री यहुद ऑल्मर्ट और फिलीस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास सभी मुद्दों पर बातचीत के लिए राजी हो गए और दोनों ने संघर्ष विराम कर दिया.
मगर, दिसंबर 2008 के अंत में हमास ने युद्ध विराम का उल्लंघन करते हुए गजा पट्टी से इजरायल पर मिसाइल से हमले शुरू कर दिए. इजराइल ने भी जवाबी हमले किए. अठारह दिनों तक चले इस युद्ध में कम से कम ग्यारह सौ लोग मारे गए, जबकि कोई पांच हजार घायल हुए. गजा पट्टी में ढाई लाख मकान ध्वस्त हो गए.
2004 में एक अमेरिकी जर्नल में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका ओसामा के अलावा एक और शख्स से डरता है, वो है रामलिंगा राजू . वहीं, रामलिंगा राजू, जिसकी कंपनी सत्यम कंप्यूटर्स का झंडा आईटी जगत में शान से लहराता था, आज उसके सितारे गर्दिश में है. अमेरिका को डराने वाले शख्स का ऐसा हश्र होगा, इसकी कल्पना शायद ही किसी ने की होगी.
एक अमेरिकी विश्वविद्यालय से प्रबंधन में स्नातक की डिग्री लेने वाले रामलिंग राजू ने अमेरिकी कुशल कामगारों की नींद हराम कर दी थी. उन्होंने उनके काम को हथिया लिया और वो काम भारतीय कामगारों तक पहुंचाया. विजन-2020 के रोल मॉडल बन गए. आम भारतीय को मोटी तनख्वाह और आरामपसंद जिंदगी का सपना दिखाया. उनकी कंपनी सत्यम में नौकरी पाने वाले अपने आपको बड़ा भाग्यशाली समझते थे. सत्यम से जुड़ने वाले शख्स की सामाजिक हैसियत खुद-ब-खुद बढ़ जाती थी.
कभी अमेरिकी कंपनियों के लिए चुनौती पेश करने वाली आईटी कंपनी सत्यम आज पूरी दुनिया के लिए खलनायक बन बनी है. इसने करोड़ों लोगों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है. 1987 से सफर की शुरुआत करने के बाद सत्यम जल्द ही देश की चौथी सबसे बड़ी आईटी कंपनी बन गई. इस तरक्की से दुनियाभर के आईटी दिग्गजरों की आंखें चौंधिया गई और लोग सत्यम का गुणगान करने लगे. लेकिन इस तरक्की का राज सात जनवरी 2009 को लोगों के सामने आ गया. जब कंपनी के संस्थापक और चैयरमैन राजू ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया. निदेशकमंडल और सेबी को लिखे अपने पत्र में उन्होंने लिखा कि वर्षों से कंपनी की वित्तीय हालत खराब चल रही है. बाजार में कंपनी का रुतबा कायम रखने के लिए साल-दर-साल उन्होंने कंपनी को मुनाफे में दिखाया. जिसके लिए कंपनी के खातों में हेर-फेर की गई. उधर, कंपनी के शेयर में प्रोमोटरों की हिस्सेदारी लगातार घटती चली गई. जिसकी वजह से कंपनी का राज खुलने का खतरा पैदा हो गया. और इससे बचने के लिए उन्होंने अपने पुत्र की स्वामित्व वाली कंपनी मेटास के अधिग्रहण का फैसला किया. उन्होंने कहा कि सत्यम को संकट से उबारने के लिए उन्होंने हरसंभव प्रयास किया, लेकिन उनके तमाम प्रयासों के बावजूद सत्यम की हालत लगातार बिगड़ती चली गई. राजू ने कहा,
"यह बाघ की सवारी करने जैसा है, यह जाने बगैर कि उसका आहार बनने से कैसे बचा जाय"
उन्होंने लिखा कि वो गुनहगार है, खुद को कानून के हवाले करने के लिए तैयार हैं और अब वो हर परिणाम भुगतने के लिए तैयार हैं. इसके बाद जो कुछ हुआ सबके सामने है.
सत्यम के निदेशकमंडल और सेबी को इस आशय का पत्र लिखते हुए उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया. जिस समय उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दिया, उस वक्त(सात जनवरी, समय-11.30 बजे) सत्यम के एक शेयर की कीमत 188 रुपये थी. लेकिन शाम तक इसकी कीमत घटकर चालीस रुपये रह गई. दूसरे दिन यह कीमत 6.25 पैसे के न्यूनतम स्तर पर आ गई. इससे कंपनी में निवेशकों को करीब दस हजार करोड़ का नुकसान हुआ. कंपनी की हालत सबके सामने है. कंपनी पर से निवेशकों का भरोसा उठ गया. उनके कर्मचारियों को सड़क पर आने का डर सताने लगा है. उधर, विप्रो और इंफोसिस जैसे कंपनियों के खातों का हिसाब रखने वाली एजेंसी केपीएमजी का कहना है कि कंपनी में हुए इस घोटाले के लिए अकेले रामलिंग राजू जिम्मेदार नहीं हैं, कंपनी के मुख्यकार्यकारी अधिकारी रिचर्य रेकी ने कहा कि यह सब तर्क से परे है. कोई नहीं कह सकता है कि इस पत्र में जो कुछ लिखा गया है, वह सबका सब सही ही है. अभी इस बात पर भरोसा करना सही नहीं होगा कि जो कुछ भी हुआ उसके लिए अकेले राजू जिम्मेदार है. बल्कि खातों के संचालन से जुड़े तमाम लोगों को सामने लाने की जरूरत है.
दरअसल कंपनी के साथ परेशानी उस वक्त शुरू हुई जब सोलह दिसंबर 2008 को सत्यम कंप्यूटर्स के निदेशकमंडल ने एक मीटिंग बुलाई गई और बैठक में रामलिंग राजू के बेटों की स्वामित्व वाली कंपनी मेटास इंफ्रास्ट्रेक्चर और मेटास प्रोपर्टीज के अधिग्रहण का प्रस्ताव पारित किया. इस अधिग्रहण के पीछे तर्क दिया गया कि
मंदी के इस दौर में वर्तमान विकासदर बनाए रखना नामुमकिन है.
विदेशी मुद्रा के मुकाबले भारतीय मुद्रा में आई गिरावट से भारी दबाव पैदा हुआ है.
बाजार के जिन क्षेत्रों में अब तक विकास देखा जा रहा है, वो मंदी की मार से बुरी तरह प्रभावित हैं.
साथ ही, आउट-सोर्सिंग को लेकर अमेरिकी सरकार ने जो रवैया अपना रखा है, उससे आने वाले समय में परेशानी और भी बढ़ सकती है. ऐसे में आईटी के अलावा बुनियादी ढांचा, ऊर्जा, आदि क्षेत्रों में निवेश करके कंपनी के विकास दर को बरकरार रखा जा सकता है.
बैठक में बताया गया कि भारत अगले पांच सालों में अपने बुनियादी ढांचों पर पांच सौ बिलियन डॉलर, जबकि चीन साढ़े सात सौ बिलियन डॉलर खर्च करेगा. इस लिहाज से बुनियादी ढांचा क्षेत्र में निवेश करना फायदेमंद सौदा साबित हो सकती है.
इन्हीं सब तर्कों के साथ सत्यम निदेशकमंडल ने 7914.10 करोड़ रुपये में मेटास के अधिग्रहण का फैसला किया.
पहले ही मंदी की मार से जूझ रियल स्टेट में निवेश करना सत्यम के निवेशकों को नागवार गुजरा और उन्होंने सत्यम निदेशकमंडल मंडल के इस फैसले का विरोध किया. वाकई लोगों को आश्चर्य हुआ कि आखिर सत्यम ने रियल स्टेट क्षेत्र में कूदने का फैसला क्यों किया. फैसले पर इस बात को लेकर भी ऐतराज था कि आखिर सत्यम के चेयरमैन राजू के बेटे की कंपनी में ही निवेश का फैसला क्यों किया गया.
इसका जवाब राजू ने अपने पत्र में दिया कि सत्यम को खास्ताहाली से उबारने के लिए उन्होंने ऐसा किया. मेटास के अधिग्रहण से कंपनी को जो फायदा होता उससे वह अपने घाटे की भरपाई करती और मेटास की देनदारी से बाद में निपटती. लेकिन निवेशकों के विरोध ने सारा गुड़ गोबर कर दिया. और अधिग्रहण का फैसला टालना पड़ा. पूरे मामले में किरकिरी झेल रहे राजू ने आखिरकार सच को सामने लाने का फैसला किया.
सच सामने आते ही सत्यम पर शिकंजा कसने लगा. सत्यम को जेल की हवा खानी पड़ी. सेबी ने सत्यम के शेयरों पर प्रतिबंध लगा दिया. उधर, न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज में भी सत्यम के शेयरों पर प्रतिबंध लगा दिया. सत्यम पर दर्जनों मामले दर्ज कराए गए. सरकार ने सत्यम के कामकाज की देखभाल के लिए तीन सदस्यीय समिति बना डाली. समिति ने अपना कामकाज भी शुरू कर दिया.
उधर, सत्यम के खातों की जांच की जिम्मेदारी एसएफआईओ(सीरियस फ्रॉड इन्वस्टीगेशन ऑफिस) को सौंप दी गई है. विभाग को तीन माह में रिपोर्ट सौंपने को कहा गया है. यानी जब तक रिपोर्ट आएगी सरकार लोकसभा चुनाव में पूरी तरह उलझी रहेगी. पूरे रिपोर्ट का क्या हश्र होना है, एक सामान्य प्रबुद्ध नागरिक जरूर जानता है. केंद्र और राज्य में कांग्रेस की सरकार है, वह सत्यम और राजू को बचाने के लिए पूरी तरह खुलकर सामने आ गई है. तर्क ये दिया जा रहा है कि सरकार को कर्मचारियों के हितों की चिंता है. यानी सरकार हर महीने 520 करोड़ रुपये के हिसाब से तीन महीने तक कर्मचारियों को सेलरी देगी. देश में करोड़ों लोग बेरोजगार हैं, लाखों लोग रोज सड़कों पर आ रहे हैं, सरकार को इन लोगों की चिंता क्यों नहीं है. आखिर सत्यम के उन कर्मचारियों की चिंता सरकार को क्यों सताने लगी जो कम से कम पचास हजार रुपये माहवारी वेतन पाते रहे हैं. क्या इसलिए कि वो आरामपसंद जिंदगी जीने के आदि हो चुके हैं और अब मुखलिसी की जिंदगी नहीं जी सकते. उसे बिहार में फंसे चालीस लाख लोंगों की चिंता क्यों नहीं सतायी तो पूरी तरह बर्बाद हो चुके हैं. उस समय 1000 करोड़ रुपये की घोषणा करने के लिए प्रधानमंत्री को हवाई सर्वेक्षण करना पड़ा, लालू और रामविलास से वोट के गणित सुलझाने पड़े और आज दो हजार करोड़ रुपये देने में थोड़ी भी हिचक नहीं आ रही है.
हमें भी ये भी पता है कि सरकार ने उन पैसों पर भी टैक्स लिया है, जिसे सत्यम ने कभी कमाया ही नहीं, आखिर, सरकार अब तक कहां सोती रही. उसे क्यों नहीं पता चला कि सत्यम के लाभ का चिट्ठा पूरी तरह झूठ का पुलिंदा है. वह और कब तक सोती रहेगी. आर्थिक विकास के आंकड़ों में वह जनता को कब तक ठगती रहेगी. वह उद्योग घरानों के खातों की क्यों नहीं जांच करवाती है. शायद सरकार भी जानती है कि वह जिन लोगों से जांच करवाएगी वो लोग अपनी क्षमता से कम और उपहारों से ज्यादा खुश होते हैं. जो बैंकर गरीब किसानों से ऋण वसूली के लिए हर हथकंडा अपनाने से नहीं चूकते वो सत्यम को सालों-साल गलत इंट्री कैसे देते रहे. अब भी सुधरने का वक्त है. विकास के आंकड़ों से बाहर निकलकर ठोस धरातल पर कुछ करने की जरूरत है.
मीडिया इतना शोर-शराबा मचायेगी तो हमारी अर्थव्यवस्था ताश के पत्तों की तरह ढह जायेगी। हमारी अर्थव्यवस्था अमेरिकी अर्थव्यवस्था की तरह बर्बाद हो जायेगी।
आईटी कंपनी सत्यम के डूबने के बाद कई विशेषज्ञों का मानना था कि सरकार मीडिया की खबरों को सेंसर करे, सरकार उस पर रोक लगाये। किसी ने ठीक ही कहा है कि सरकार तब चैन की नींद सोती है जब मीडिया वाले ख़बरों की जगह राखी सावंत का नाच, राजू श्रीवास्तव के हंसगुल्ले, आमिर की गजनी और शाहरुख़ की रब ने बनाई जोड़ी को चौबीसों घंटे दिखाती है।
जब कभी मीडिया मुंबई हमले के बाद लोगों के आक्रोश को दिखाती है तो सरकारी फरमान आ जाता है कि लोगों को डराना बंद करो नही तो तुम पर कार्रवाई की जायेगी। यानी टीवी वालों का लिंक कट दिया जाएगा। उसकी संपत्ति जब्त कर ली जायेगी।
आखिर क्या करे टीवी वाला।
वह कभी लोगों से सच दिखाने का दावा करता है, कभी सोचने के लिए मजबूर करता है, कभी आपको आगे रखने का दावा करता है। इन्हीं घनचक्कर शब्दों के चक्कर में वह कभी कुछ दिखने की कोशिश करती है तो सरकारी फरमान उसको मजबूर करती है कि तुम रब ने बनाई जोड़ी, गजिनी का प्रमोशन दिखाओ और दिखाते रहो। तुम भी चैन से सो जाओ और हमें भी सोने दो।
टीवी चैनल वालों के लिए भी अच्छा है। न्यूज़ के नाम पर फ़िल्म का प्रमोशन दिखाकर पैसे कमाना उसके लिए उसके लिए आसन हो गया है। विज्ञापन प्रसारण के लिए उसे पैसे भी नही खर्च करना पड़ता है और कमी भी जबरदस्त हो जाती है।
दरअसल सरकार भी यही चाहती है। आज सत्यम कंपनी ने अपने निवेशकों को दिवालिया कर दिया। खुद कितनी दिवालिया हुई वह तो पीछे की बात है। सत्यम में पाँच हज़ार से दस हज़ार करोड़ रुपये के घोटाले की बात सामने आ रही है। कंपनी ने हाल के दिनों में जो भी लेनदारी-देनदारी, मुनाफा दिखाया वह सब झूठ था सब फरेब था। किसी और का नहीं, ख़ुद कंपनी के करता-धरता रामालिंगम राजू का कहना है। स्थिति यहाँ तक आ पहुँची है राजू की गिरफ्तारी भी हो सकती है।
इतना सब कुछ होने के बाद भी मीडिया अगर कुछ दिखा रही है तो साहेब लोगों का कहना है की सरकार को इस पर रोक लगना चाहिए नहीं तो देश की अर्थव्यवस्था ताश के पत्तों की तरह बिखर जायेगी।
दरअसल पैसे वाले यही चाहते है की मीडिया, लाल-फीताशाही और पेज थ्री की खबरें ही दिखाए। ज्योही उनकी हेरा-फेरी, उनकी बेईमानी, मक्कारी की ख़बर दिखने की बात होती है, उसपर सेंसर की बात कही जाने लगती है। तभी तो देश की अर्थव्यवस्था का हवाला देकर देश के सबसे बड़े कारपोरेट घोटाले की ख़बर को दिखाने पर पाबन्दी की बात कही गई।
देश में किसानों की हालत किसी से छिपी नहीं है। सरकार ने किसानों की हालत सुधारने के लिए कोई बड़ा कदम नहीं उठाया। लोकसभा चुनाव को करीब देखते हुए किसानों के हाथ कर्जमाफी का झुनझुना थमा दिया और कहा इसे तब तक बजाते रहो जब तक कोई अगली सरकार हम्हारे कर्जो को माफ़ करने के लिए तैयार न हो जाए। जब तक झुनझुना बाजते रहो ठीक है, अगर सरकार की इस नाकामी को दिखने की कोशिश की तो लिंक काट दिया जाएगा, क्योंकि हम सरकार हैं।
प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने सार्वजनिक मंच से घोषणा कर दी है कि मुंबई आतंकी हमलों में पाकिस्तान के ना सिर्फ़ नॉन-स्टेट ऐक्टर जिम्मेदार हैं, बल्कि इन हमलों में पाकिस्तान का सरकारी अमला भी जिम्मेदार है। ये बात एकाएक किसी प्रतिक्रिया के तौर पर नहीं कही गई है बल्कि पूरी जाँच और सबूत इकट्ठा करने के बाद कही गई है। अब पाकिस्तान पर यह निर्भर है कि वह क्या करता है। एक तो वह वह भारत के सबूतों को ग़लत कहकर खारिज कर देगा, दूसरा वह इस पर कार्रवाई करेगा। उसकी कार्रवाई दो रूपों में हो सकती है। एक तो वह खुद उन दहशतगर्दों के खिलाफ कार्रवाई करेगा या भारत जिन आतंकवादियों कि मांग कर रहा है, वह उसे भारत को सौप देगा।
अब यहाँ भारत के हक़ में है कि वह पाकिस्तान पर कूटनीतिक दबाव बनाकर उसे खुद कार्रवाई के लिए मजबूर करे। आतकवादियों को भारत को सौपे जाने की जिद भारत न करे इसी में भारत का फायदा है। भारत में राजनितिक हालत जितने गंदे हो जाए हैं। उसमे किसी भी स्थिति में आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं हो सकेगी। भ्रष्टाचार को छोड़ भी दे तो यहाँ अलाप्संख्यक वोट बैंक की राजनीती इतनी गन्दी हो चुकी है, किसी भी सूरत में आतंकियों को सजा नहीं दिलाई जा सकती है।
मुलायम सिंह मामले में सुप्रीम कोर्ट सीबीआई को फटकार की घूंटी पिला चुकी है। सुप्रीम कोर्ट ने भी माना है की सीबीआई जैसी संस्थाएं भी राजनितिक मोहरे की तरह इस्तेमाल हो रही है।
सरकार पर जन दबाव है। जन दबाव का ही नतीजा है की वह पाकिस्तान के खिलाफ कुछ बोलने का हिम्मत जुटा पा रही है। लेकिन क्या वह आतंकवादियों को भारत हो सौंपे जाने के बाद भी इतनी ही हिम्मत रख सकेगी। इसका सीधा सा जवाब है कभी नहीं।
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