हिंदी शोध संसार

रविवार, 31 जुलाई 2011

राजीव गांधी के स्वीस एकाउंट में 2.2 बिलियन डॉलर का खुलासा?


अब ये समझना मुश्किल नहीं रहा कि सरकार कालेधन के खिलाफ बाबा रामदेव के आंदोलन को क्यों कुचलना चाहती है। आखिर क्यों सरकार आधी रात को रामलीला मैदान में सोए हुए लोगों पर लाठियां चलवाती है।
आखिर सरकार क्यों चाहेगी कि मिस्टर क्लीन राजीव गांधी के 2.2 अरब डॉलर की संपत्ति का खुलासा हो जाए। और देश को लूटने वाले जेल जाएं।

भडास४मीडिया ने इस बारे में एक विस्तृत रिपोर्ट छापी है।



Swiss Magazine Schweizer Illustrierte in (November 1991)

सोनिया गांधी का सच

लेखक- एस गुरुमूर्ति साभार- भारतीय पक्ष

जब श्वेजर इलस्ट्रेटे ने यह आरोप लगाया कि सोनिया गांधी ने राजीव गांधी द्वारा घूस में लिए गए पैसे को राहुल गांधी के खाते में रखा है तो मां-बेटे में से किसी ने न तो विरोध किया और न ही इस पत्रिका के खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई की।

राजनीति में राजीव गांधी ने सबसे खतरनाक गलती क्या की थी? यह बताने में दिमाग पर ज्यादा जोर नहीं पड़ना चाहिए कि उनकी सबसे बड़ी गलती खुद ईमानदार होने का दावा करते हुए अपने को मिस्टर क्लीन के तौर पर पेश करना थी। यह उनके लिए घातक साबित हुआ। इंदिरा गांधी उनसे अलग थीं। जब उनसे उनकी सरकार के भ्रष्टाचार के बारे में सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि यह तो पूरी दुनिया में चल रहा है। यह बात 1983 की है। दिल्ली उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश ने इसके बाद यह कहा था कि जब इतने उच्च पद पर बैठने वाला इसे तर्कसंगत बता रहा है तो ऐसे में आखिर भ्रष्टाचार पर काबू कैसे पाया जाएगा। इन बातों का नतीजा यह हुआ कि इंदिरा गांधी पर कभी किसी ने भ्रष्टाचार का आरोप नहीं लगाया। क्योंकि उन्होंने कभी यह दावा नहीं किया कि वह ईमानदार हैं। पर इसके उलट राजीव गांधी ने अपनी ईमानदारी के दावे कर खुद को कड़ी निगरानी में ला दिया। राजीव गांधी की ईमानदारी की पोल 1989 में बोफोर्स मामले पर खुल गई और जनता ने इसकी सजा देते हुए उन्हें और कांग्रेस को सत्ता से बेदखल कर दिया। सियासी लोगों के लिए इस घटना ने यह सीख दी कि अगर आप ईमानदार नहीं हैं तो कभी ईमानदारी के दावे मत कीजिए। पर यह सीख खुद गांधी परिवार को याद नहीं है। इस मामले में सोनिया गांधी ने इंदिरा गांधी के सुरक्षित रास्ते को न चुनकर राजीव गांधी के घातक रास्ते पर चलने का फैसला किया है। इसके नतीजे भी उनके लिए दुखदायी होने की ही उम्मीद है। तो क्या 1987 से 1989 के बीच की राजनीति का एक बार फिर दुहराव होने वाला है?

इंदिरा को भूलकर राजीव की राह चलने वाली सोनिया गांधी ने 2010 के नवंबर में इलाहाबाद में हुई पार्टी की एक रैली में भ्रष्टाचार को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करने यानि जीरो टालरेंस की बात कही थी। इसके कुछ दिनों बाद ही जब दिल्ली में कांग्रेस अधिवेशन हुआ तो सोनिया गांधी ने फिर यही बात दोहराई। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी ने कभी भी भ्रष्ट लोगों को नहीं बख्शा है क्योंकि भ्रष्टाचार से विकास बाधित होता है। इसी तरह का भाषण राजीव गांधी ने 25 साल पहले मुंबई अधिवेशन में दिया था। इस मसले पर राजीव दो मामलों में सोनिया से अलग थे। जब राजीव गांधी ने खुद को मिस्टर क्लीन कहा था उस वक्त ऐसा कोई घोटाला नहीं था जिसकी वजह से उन्हें रक्षात्मक होना पड़े। पर सोनिया ने तो राष्ट्रमंडल, आदर्श और 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले के बीच ईमानदार होने का दावा किया है। दूसरी बात यह कि राजीव ने बिल्कुल शून्य से शुरुआत की थी और उनकी मिस्टर क्लीन की छवि को खत्म करने का काम तो बोफोर्स घोटले ने किया था। इसके विपरीत सोनिया गांधी के खिलाफ घूसखोरी के तौर पर अरबों डालर लेकर स्विस बैंक खातों में जमा करने की बात पहले ही सामने आ चुकी है। इसमें बोफोर्स सौदे में क्वात्रोचि से मिले लाखों डॉलर शामिल नहीं हैं। स्विट्जरलैंड की एक प्रतिष्ठित पत्रिका और रूस के एक खोजी पत्रकार ने सोनिया गांधी के परिवार पर घूसखोरी में लिप्त होने के कई सबूत जुटाकर सबके सामने रखा है। इस बात के दो दशक बीत जाने के बाद भी सोनिया ने आरोपों का न तो खंडन किया है और न ही खुलासा करने वालों के खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की है। इसकी पृष्ठभूमि में सोनिया गांधी की वह बात ढकोसला मालूम पड़ती है जिसमें उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ने की बात कही है। दरअसल, कहानी कुछ इस प्रकार है।

2.2 अरब डॉलर से 11 अरब डॉलर!

स्विस बैंक में सोनिया गांधी के अरबों डालर जमा होने की बात खुद स्विट्जरलैंड में ही उजागर हुई। यही वह देश है जहां दुनिया भर के भ्रष्टाचारी लूट का धन रखते हैं। स्विट्जरलैंड की सबसे लोकप्रिय पत्रिका श्वेजर इलस्ट्रेटे ने अपने 19 नवंबर, 1991 के एक अंक में एक खास रिपोर्ट प्रकाशित की। इसमें विकासशील देशों के ऐसे 13 नेताओं का नाम था जिन्होंने भ्रष्ट तरीके से अर्जित किए पैसे को स्विस बैंक में जमा कर रखा था। इसमें राजीव गांधी का नाम भी था। श्वेजर इलस्ट्रेटे कोई छोटी पत्रिका नहीं है बल्कि इसकी 2.15 लाख प्रतियां बिकती हैं और इसके पाठकों की संख्या 9.17 लाख है। यह संख्या स्विट्जरलैंड की कुल वयस्क आबादी का छठा हिस्सा है। केजीबी के रिकार्ड्स का हवाला देते हुए पत्रिका ने लिखा, ”पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की विधवा सोनिया गांधी अपने नाबालिग बेटे के नाम पर एक गुप्त खाते का संचालन कर रही हैं जिसमें ढाई अरब स्विस प्रफैंक यानि 2.2 अरब डालर हैं।” राहुल गांधी 1988 के जून में बालिग हुए थे। इसलिए यह खाता निश्चित तौर पर इसके पहले ही खुला होगा। अगर इस रकम को आज के रुपए में बदला जाए तो यह 10,000 करोड़ रुपये के बराबर बैठती है। स्विस बैंक अपने ग्राहकों के पैसे को दबा कर नहीं रखता है, बल्कि इसका निवेश करता है। सुरक्षित दीर्घ अवधि वाली योजनाओं में निवेश करने पर यह रकम 2009 तक बढ़कर 9.41 अरब डालर यानी 42,345 करोड़ रुपये हो जाती है। अगर इसे अमेरिकी शेयर बाजार में लगाया गया होगा तो यह 58,365 करोड़ रुपए हो गई होगी। यदि घूस की इस रकम को आधा दीर्घावधि निवेश योजनाओं में और आधा शेयर बाजार में लगाया गया होगा, जिसकी पूरी संभावना है, तो यह रकम 50,355 करोड़ रुपए हो जाती है। अगर इस पैसे को शेयर बाजार में लगाया गया होता तो 2008 की वैश्विक आर्थिक मंदी से पहले यह रकम 83,900 करोड़ रुपए होती। किसी भी तरह से हिसाब लगाने पर 2.2 अरब डालर की वह रकम आज 43,000 करोड़ रुपए से 84,000 करोड़ रुपए के बीच ठहरती है।

केजीबी दस्तावेज

सोनिया गांधी के खिलाफ कहीं ज्यादा गंभीर तरीके से मामले को उजागर किया रूस की खुफिया एजेंसी केजीबी ने। एजेंसी के दस्तावेजों में यह दर्ज है कि गांधी परिवार ने केजीबी से घूस के तौर पर पैसे लिए। प्रख्यात खोजी पत्रकार येवगेनिया अलबतस ने अपनी किताब ‘दि स्टेट विदिन ए स्टेट: दि केजीबी एंड इट्स होल्ड ऑन रसिया-पास्ट, प्रजेंट एंड फ्यूचर’ में लिखा है, ”एंद्रोपोव की जगह लेने वाले नए केजीबी प्रमुख विक्टर चेब्रीकोव के दस्तखत वाले 1982 के एक पत्र में लिखा है- ‘यूएसएसआर केजीबी ने भारत के प्रधानमंत्री राजीव गांधी के बेटे से संबंध बना रखे हैं। आर गांधी ने इस बात पर आभार जताया है कि सोवियत कारोबारी संगठनों के सहयोग से वह जो कंपनी चला रहे हैं, उसके कारोबारी सौदों का लाभ प्रधानमंत्री के परिवार को मिल रहा है। आर. गांधी ने बताया है कि इस चैनल के जरिए प्राप्त होने वाले पैसे का एक बड़ा हिस्सा आर गांधी की पार्टी की मदद के लिए खर्च किया जा रहा है।” (पृष्ठ 223)। अलबतस ने यह भी उजागर किया है कि दिसंबर, 2005 में केजीबी प्रमुख विक्टर चेब्रीकोव ने सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी की केन्द्रीय समिति से राजीव गांधी के परिवार को अमेरिकी डालर में भुगतान करने की अनुमति मांगी थी। राजीव गांधी के परिवार के तौर पर उन्होंने सोनिया गांधी, राहुल गांधी और सोनिया गांधी की मां पाओला मैनो का नाम दिया था। अलबतस की किताब आने से पहले ही रूस की मीडिया ने पैसे के लेनदेन के मामले को उजागर कर दिया था। इसके आधार पर 4 जुलाई 1992 को दि हिंदू में एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई जिसमें कहा गया, ”रूस की विदेशी खुफिया सेवा इस संभावना को स्वीकार करती है कि राजीव गांधी के नियंत्रण वाली कंपनी को फायदा पहुंचाने के लिए केजीबी ने उन्हें सोवियत संघ से लाभ वाले ठेके दिलवाए हों।’

भारतीय मीडिया

राजीव गांधी की हत्या की वजह से उस वक्त भारतीय मीडिया में स्विट्जरलैंड और रूस के खुलासों की चर्चा नहीं हो पाई। पर जब सोनिया गांधी ने कांग्रेस की कमान संभाली तो भारतीय मीडिया की दिलचस्पी इस मामले में बढ़ गई। जाने-माने स्तंभकार एजी नूरानी ने इन दोनों खुलासों के आधार पर 31 दिसंबर 1998 को स्टेट्समैन में लिखा था। सुब्रमण्यम स्वामी ने श्वेजर इलस्ट्रेटे और अलबतस की किताब के पन्नों को स्कैन कर अपनी जनता पार्टी की वेबसाइट पर डाला है। इसमें पत्रिका का वह ई-मेल भी शामिल है जिसमें इस बात की पुष्टि है कि पत्रिका ने 1991 के नवंबर अंक में राजीव गांधी के बारे में एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी। जब सोनिया गांधी ने 27 अप्रैल, 2009 को मैंगलोर में यह कहा कि स्विस बैंक में जमा भारतीय काले धन को वापस लाने के लिए कांग्रेस कदम उठा रही है तब मैंने 29 अप्रैल, 2009 को इन तथ्यों को शामिल करते हुए एक लेख न्यू इंडियन एक्सप्रेस में लिखा। काला धन वापस लाने के सोनिया गांधी के दावे के संदर्भ में इस लेख में उनके परिवार के भ्रष्टाचार पर सवाल उठाया गया। जाने-माने पत्रकार राजिंदर पुरी ने 15 अगस्त 2006 को केजीबी के खुलासों पर एक लेख लिखा था। इंडिया टुडे के 27 दिसंबर, 2010 के अंक में राम जेठमलानी ने स्विट्जरलैंड में हुए खुलासे की बात कहते हुए यह सवाल उठाया कि वह पैसा अब कहां है? साफ है कि भारतीय मीडिया ने इन दोनों खुलासों पर बीच-बीच में लेख प्रकाशित किया। माकपा सांसद अमल दत्ता ने 7 दिसंबर, 1991 को 2.2 अरब डालर के मसले को संसद में उठाया था, लेकिन उस वक्त लोकसभा के अध्यक्ष रहे शिवराज पाटिल ने राजीव गांधी का नाम कार्यवाही से निकलवा दिया था।

संदेह का घेरा

सवाल यह उठता है कि इन दोनों खुलासों पर सोनिया गांधी और 1988 में बालिग हुए राहुल गांधी ने क्या जवाब दिया? जवाब है कुछ नहीं। सच कहा जाए तो इन खुलासों से ज्यादा गांधी परिवार की चुप्पी ने उनकी छवि को नुकसान पहुंचाने का काम किया है। जब श्वेजर इलस्ट्रेटे ने यह आरोप लगाया कि सोनिया गांधी ने राजीव गांधी द्वारा घूस में लिए गए पैसे को राहुल गांधी के खाते में रखा है, तो मां-बेटे में से किसी ने न तो इसका विरोध किया और न ही इस पत्रिका के खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई की। मां-बेटे ने न ही 1998 में इस मामले पर लेख लिखने वाले एजी नूरानी के खिलाफ कोई कदम उठाया और न ही संबंधित दस्तावेज 2002 में अपनी वेबसाइट पर डालने वाले सुब्रमण्यम स्वामी के खिलाफ कुछ किया। न ही उन्होंने मेरे या एक्सप्रेस के खिलाफ 2009 के अप्रैल में इन तथ्यों पर आधारित लेख छापने के लिए कोई कानूनी कार्रवाई की। जब 1992 में रूस में केजीबी से संबंधित खुलासे की खबर दि हिंदू और टाइम्स आफ इंडिया ने प्रकाशित की, उस वक्त भी किसी गांधी ने कोई शिकायत नहीं की। न ही किसी गांधी ने येवगेनिया अलबतस के खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई की जिन्होंने 1994 में केजीबी और राजीव गांधी के बीच पैसे के लेनदेन के बारे में लिखा। न ही इन लोगों ने 15 अगस्त, 2006 को ऐसा लेख लिखने वाले राजिंदर पुरी के खिलाफ कोई कदम उठाया। हालांकि, 2007 में सोनिया के कुछ वफादार लोगों ने उनकी प्रतिष्ठा बचाने के लिए अमेरिका में बड़े अनमने ढंग से एक मुकद्दमा जरूर दर्ज कराया था। ऐसा तब हुआ जब वहां के कुछ प्रवासी भारतीयों ने अलबतस के खुलासों के आधार पर पूरे पन्ने का विज्ञापन न्यूयार्क टाइम्स में छपवाया। वे सोनिया गांधी की सच्चाई को अमेरिका वालों के सामने रखना चाहते थे। अमेरिकी अदालत ने इस मुकद्दमे को तुरंत खारिज कर दिया क्योंकि सोनिया गांधी खुद अपने नाम से मुकद्दमा दर्ज कराने की हिम्मत नहीं जुटा सकीं। आश्चर्य की बात यह है कि इस मुकद्दमें में भी स्विस बैंक में 2.2 अरब डालर होने की बात को चुनौती नहीं दी गई थी।

अगर मान लिया जाए कि ये दोनों खुलासे आधारहीन हैं और गांधी परिवार ईमानदार है तो ऐसे में उनकी ओर से कैसी प्रतिक्रिया होनी चाहिए थी? ईमानदार आदमी की प्रतिक्रिया वैसी ही होती है जैसी मोरारजी देसाई ने दी थी। जब पुलित्जर पुरस्कार विजेता खोजी पत्रकार सेमोर हेर्स ने अपनी किताब में यह आरोप लगाया कि भारतीय कैबिनेट में मोरारजी सीआईए एजेंट थे तो 87 साल के बूढ़े और रिटायर्ड मोरारजी देसाई ने न सिर्फ गुस्से का इजहार किया बल्कि एक मानहानि का मुकद्दमा भी दर्ज कराया। मोरारजी देसाई के मरने के पांच साल बाद अमेरिकन स्पेक्टेटर में रेल जेन आइजैक ने लिखा कि हेर्स चरित्र हनन करने में माहिर थे और हेनरी किसिंजर को नीचा दिखाने के लिए उन्होंने मोरारजी को निशाना बना लिया। जब मोरारजी के मानहानि मुकद्दमे पर सुनवाई शुरू हुई तो 93 साल की उम्र वाले मोरारजी अमेरिका जाने में सक्षम नहीं थे और उनकी जगह पर किसिंजर ने जाकर हेर्स के दावों को खारिज किया। कहने का मतलब है कि अगर कोई ईमादार होता है तो अपनी उम्र का ख्याल न करते हुए खुद पर लगाए जा रहे आरोपों पर प्रतिक्रिया देता है। संप्रग की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने अब तक इस मसले पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। यह तब जब वे पूरी तरह से सक्रिय हैं, न कि मोरारजी देसाई की तरह सेवानिवृत्त और बुजुर्ग। जब स्विस पत्रिका में यह मामला उजागर हुआ था तो उनकी उम्र महज 41 साल थी। अगर सोनिया और राहुल के बजाए इन दोनों खुलासों में भाजपा के लालकृष्ण आडवाणी और नरेंद्र मोदी का नाम होता तो भारतीय मीडिया और सोनिया गांधी की सरकार उन्हें सलाखों के पीछे भेजने के लिए क्या नहीं करती।

20.80 लाख करोड़ रुपए की लूट

स्विस बैंक में गांधी परिवार के अरबों रुपए का मामला विदेशी गुमनाम खातों में जमा भारतीय पैसे को वापस लाने से जुड़ा हुआ है। भारत को छोड़कर दुनिया के सभी देशों ने स्विस बैंक और इसकी तरह अन्य बैंकों में जमा काले धन को वापस लाने में दिलचस्पी दिखाई है। पर भारत ने इस काम में कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाई। आखिर ऐसा क्यों?

2009 में हुए लोकसभा चुनावों के दौरान भाजपा नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने यह कहा था कि अगर वे सत्ता में आते हैं तो विदेशों में जमा काले धन को वापस लाएंगे। विदेशों में भारत का 500 अरब डालर से लेकर 1400 अरब डालर के बीच काला धन जमा होने का अनुमान है। कांग्रेस ने इतनी रकम होने की बात को शुरुआत में नकार दिया था। पर जब यह मामला तूल पकड़ने लगा तो मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी ने भी यह कहा कि वे इस काले धन को वापस लाएंगे। वैश्विक स्तर पर काले धन के मसले पर काम करने वाली संस्था ग्लोबल फायनैंशियल इंटीग्रिटी (जीएफआई) ने भारत में हुई लूट के बारे में कहा है, ”1948 से लेकर 2008 के बीच भारत ने 213 अरब डालर काले धन के रूप में गंवाए हैं। यह कर चोरी, भ्रष्टाचार, घूसखोरी और आपराधिक गतिविधियों के जरिए किया गया है।” ऐसे में क्या किसी को यह बताने में बहुत मुश्किल होगी कि आखिर कैसे सोनिया के परिवार के गुप्त खाते में 2.2 अरब डॉलर आए? जीएफआई के आंकड़े में 2जी और राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन के नाम पर हुई लूट तो शामिल ही नहीं है। अब ऐसे में इस बात पर विचार करना जरूरी हो जाता है कि सोनिया गांधी के गुप्त खाते की वजह से भारत का विदेशों में जमा काला धन वापस लाने की कोशिशों पर किस तरह का असर पड़ेगा?

लूटने वाले सुरक्षित

कुछ उदाहरणों से यह बात साफ हो जाएगी कि भारत सरकार किस तरह विदेशों में जमा भारत के काले धन को वापस लाने में दिलचस्पी नहीं ले रही है। 2008 के फरवरी में जर्मनी के सरकारी अधिकारियों ने यह जानकारी जुटाई की लिशेंस्टीन बैंक में दुनिया के कई देशों के नागरिकों ने कितना काला धन जमा किया है। जर्मनी के वित्त मंत्री ने उस वक्त कहा कि अगर दुनिया की कोई और सरकार काला धन जमा करने वाले अपने नागरिकों का नाम जानना चाहती है तो वे उसे ये नाम दे देंगे। मीडिया में कुछ ऐसी खबरें आईं जिनमें कहा गया कि लिशेंस्टीन बैंक से जिन खाताधारियों के नाम मिले हैं उनमें 250 भारतीय भी हैं। जर्मनी के खुले प्रस्ताव के बावजूद संप्रग सरकार ने इन नामों को जानने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। टाइम्स आफ इंडिया में भी उस समय एक खबर प्रकाशित हुई जिसमें बताया गया कि वित्त मंत्रालय और प्रधनमंत्री कार्यालय लिशेंस्टीन के खाताधारियों के नाम जानने में दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं। इस बीच दबाव बढ़ने पर भारत सरकार ने नाम के लिए अनुरोध तो किया लेकिन खुले प्रस्ताव के बजाए जर्मनी के साथ हुए कर समझौते के तहत। आखिर दोनों में फर्क क्या है? फर्क यह है कि कर समझौते के तहत मिलने वाले नामों को गोपनीय रखा जाता है लेकिन खुले प्रस्ताव के तहत मिलने वाले नाम को सार्वजनिक किया जा सकता है। इससे साफ हो जाता है कि सरकार वैसे लोगों का नाम नहीं उजागर करना चाहती है जिन्होंने काला धन विदेशी बैंकों में जमा कर रखा है।

दूसरा सनसनीखेज मामला है हसन अली का। पुणे के इस कारोबारी के बारे में यह पाया गया कि वह 1.5 लाख करोड़ रुपए के स्विस खाते का संचालन कर रहा था। आयकर विभाग ने उस पर भारत का पैसा गलत ढंग से विदेशी खाते में रखने के लिए 71,848 करोड़ रुपए का कर लगाया। इस मामले में जानकारी हासिल करने के लिए स्विस सरकार को जो अनुरोध भेजा गया उसे इस तरह से तैयार किया गया कि सूचनाएं नहीं मिल सकें। हसन अली के साथ कई बड़े नामों के जुड़े होने की बात की जा रही है। सरकार आखिर क्यों नहीं इस मामले की गहराई से जांच करना चाहती है। हसन अली जैसे लोग ही भारत के भ्रष्ट लोगों का पैसा विदेशों में हवाला के जरिए पहुंचाते हैं। अगर हसन अली से जुड़ी सच्चाई सामने आ जाती है तो कई भ्रष्ट लोग नंगे हो जाएंगे। हमें यह भी समझना होगा कि सोनिया गांधी के अरबों डालर स्विस बैंक में होते हुए भारत के 462 अरब डालर की लूट की स्वतंत्र जांच नहीं हो सकती। सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने चुनाव लड़ते वक्त जो हलफनामा दिया था उसके मुताबिक दोनों की संयुक्त संपत्ति सिर्फ 363 लाख रुपए है। सोनिया के पास कोई कार नहीं है। 19 नवंबर 2010 को सोनिया ने कहा कि भ्रष्टाचार और लोभ भारत में बढ़ रहा है। 19 दिसंबर 2010 को राहुल गांधी ने कहा कि भ्रष्ट लोगों को कठोर सजा दी जानी चाहिए। आमीन!

अखबारी कतरन



शनिवार, 30 जुलाई 2011

प्रणब की बातों पर लोगों को क्यों नहीं हो रहा है भरोसा

प्रणब मुखर्जी देश के उन शीर्षस्थ राजनेताओं में गिने जाते हैं जो सर्वोच्च नहीं होकर भी सर्वोच्च ही माने जाते हैं। वो गुस्सा भी करते हैं तो लोगों को पसंद आता है। बांग्ला-टोन वाली उनकी अंग्रेजी लोगों को स्वदेशी भाषा लगती है। उमर भी काफी हो चुकी है। राजनीति से रिटायर्ड होने के बारे में भी विचार करते होंगे। यही वजह है कि उन्होंने अपने प्रियपुत्र को राजनीति में ला ही दिया। हमारे जैसे लाखों लोगों को लग रहा था कि जाते-जाते प्रणब मुखर्जी कुछ ऐसा करेंगे, जिसके लिए उन्होंने भारत की आने वाली पीढ़ी हमेशा याद रखेगी। लेकिन देश की राजनीति, खासकर कांग्रेस की आंतरिक राजनीति ने उन्हें पहले भी ऐसा करने का मौका नहीं दिया और शायद अब उनका हाथ और भी बंधा-बंधा नजर आ रहा है। प्रणब मुखर्जी अब चाहकर भी कुछ नहीं कर पाएंगे। यही वजह है कि प्रणब में पहले वाली बात नहीं दिख रही है।
इन दिनों प्रणब मुखर्जी देश से जो कह रहे हैं उसपर किसी को भी भरोसा नहीं हो रहा है। सुप्रीमकोर्ट को भी उन्होंने कहा था कि सरकार कालेधन को स्वदेश लाने के लिए उपाय कर रही है। लेकिन सुप्रीमकोर्ट ने उनपर भरोसा नहीं किया। सरकार ने कालेधन की जांच के लिए जो एसआईटी बनाई, सुप्रीमकोर्ट ने जस्टिस जीवन रेड्डी को उसका अध्यक्ष बना दिया। उसका उपाध्यक्ष भी सुप्रीमकोर्ट ने ही नियुक्त किया। आखिर क्यों। आखिर सुप्रीमकोर्ट को प्रणब या सरकार की बातों पर क्यों भरोसा नहीं है।
दरअसल, अपने अंतिम समय में प्रणब मुखर्जी कुछ ऐसा काम करते जा रहे हैं। जिनपर लोगों को भरोसा नहीं हो पा रहा है। ऐसा लग रहा है कि प्रणब मुखर्जी किसी को बचाने की कोशिश में ऐसा कर रहे हैं। जाहिर है कि स्वीस बैंकों में जमा काला धन उस आम आदमी का नहीं है जिसकी दुहाई दे-देकर भारत में सरकारें बनती आई है। ये पैसा नेताओं, नौकरशाहों, उद्योगपतियों, फिल्म कलाकारों, तस्करों, नशीली दवाओं के व्यापारियों का है। जाहिर है कि इस देश में ज्यादा समय तक शासन कांग्रेस पार्टी का रहा है और सबसे ज्यादा घोटाला भी इसी पार्टी ने किया है, इसलिए सबसे ज्यादा पैसा इसी पार्टी के नेताओं का होगा। इसलिए इन नेताओं को बचाना, कांग्रेस पार्टी के हर मंत्रियों का प्राथमिक कर्तव्य होगा। पैसा बीजेपी समेत दूसरी पार्टियों के नेताओं का भी होगा। इसलिए ये पार्टियां भी कांग्रेस पर ज्यादा दबाव डालना उचित नहीं समझती हैं, क्योंकि इनका भी भंडाफोड़ हो जाएगा।
तो बात प्रणब मुखर्जी की कर रहे हैं। ये बात वहां से शुरू होती है। जब सुप्रीमकोर्ट ने सरकार से उन नामों का खुलासा करने को कहा, जो उसे जर्मन सरकार से मिले थे। सरकार ने संधि का हवाला देकर इनका खुलासा करने से इनकार कर दिया। तहलका जैसी पत्रिकाओं ने इन लोगों के नाम छाप दिए, मगर सरकार ने अभी तक इन नामों का खुलासा नहीं किया। इन लोगों पर कोई कार्रवाई तक नहीं की। सरकार एक नहीं सौ बार झूठ बोलती रही। सरकार की इन बातों पर ना तो देश की जनता को भरोसा हुआ और न ही सुप्रीमकोर्ट को। आखिर कार सुप्रीमकोर्ट ने एसआईटी का गठन कर दिया।
जानकार सूत्रों की मानें तो प्रणब मुखर्जी स्वीटजरलैंड के साथ जिस संधि के होने की बात कर रहे हैं इस संधि के तहत अप्रैल २०११ के बाद स्वीस बैंक में जमा धन का ही पता चल पाएगा। आखिर सवाल उठता है कि पिछले साठ साल में स्वीस बैंक सहित दुनिया के बाकी बैंकों में जो पैसा जमा हुआ उसका क्या होगा। क्या वो पैसा क्या बेईमानों, गद्दारों और लुटेरों का ही रह जाएगा। आखिर प्रणब मुखर्जी की बातों पर भरोसा हो तो कैसे।
वो कह रहे हैं कि ५४ देशों के साथ बातचीत हो चुकी है और ७४ देशों के साथ बातचीत जारी है. आखिर उन्होंने इन देशों के साथ क्या बात की और फिलहाल क्या बात कर रहे हैं। इन बातों का जवाब उन्हें देना चाहिए।
भारतीय पक्ष में छपे एस गुरूमूर्ति के लेख "सोनिया का सच" में स्वीस बैंक में सोनिया गांधी का करीब २.२ अरब डॉलर से ११ अरब डॉलर जमा होने की बात कही गई है। विभिन्न तथ्यों और संदर्भों के हवाले से कहा गया है कि सोनिया गांधी या गांधी परिवार के किसी व्यक्ति ने इस खबर का कभी खंडन नहीं किया या किसी पर कभी कोई मुकदमा नहीं चलाया। सुब्रह्मण्यम स्वामी भी बार बार इस तरह के दावे करते रहे हैं। आखिर इस कालेधन का सच क्या है, करदाताओं और देशवासियों को पता होना चाहिए।

शुक्रवार, 29 जुलाई 2011

एक श्रेष्ठ इंगलिश-इंगलिश डिक्शनरी


डिफ्निशन-ऑफ.नेट की इंगलिश-इंगलिश डिक्शनरी और अन्य भाषाओं में मौजूद डिक्शनरी भी श्रेष्ठ है। इस डिक्शनरी में संबंधित शब्दों के बारे में सारी जानकारी दी गई है। यानी ये एक पारिभाषिक शब्दकोश है जो हर दृष्टि से मददगार साबित होगा।

गुरुवार, 28 जुलाई 2011

क्या अमेरिका कंगाल हो जाएगा


अगर
अमेरिका बजट खर्च में कटौती नहीं करता है और कर्ज की सीमा नहीं बढ़ाता है तो उसकी कर्ज समस्या बहुत ही गंभीर हो जाएगी और उसे ये काम बहु जल्द करना होगा। दो अगस्त तक अगर वो कर्ज सीमा नहीं बढ़ाता है तो वो डिफाल्टर हो सकता है।
दुनियाभर की अखबारें अमेरिकी कर्ज संकट से भरा हुआ है।
अमेरिकी डेट क्लॉक के आंकडों को देखें तो अमेरिका की हालत बहुत पतली है। उसके हर नागरिक पर ४६००० डॉलर का कर्जा है।
बीबीसी के मुताबिक, पिछले साल अमेरिका का बजटीय घाटा १.५ ट्रिलियन डॉलर था और अमेरका पर १४.३ ट्रिलियन से ज्यादा कर्ज है।

२०१२ में अमेरिका का प्रस्तावित बजट ३.७ ट्रिलियन डॉलर का है। जिसमें डेढ़ ट्रिलियन डॉलर की कटौती करने की सख्त आवश्यकता महसूस की जा रही है। बजट में कटौती का मतलब अनेक योजनाओं में कटौती।
अमेरिका के कर्ज संकट पर चीन चुटकी ले रहा है और कह रहा है कि अमेरिका का कर्ज संकट लोकतंत्र को बदनाम कर रहा है और लोकतंत्र का मजाक भी उड़ा रहा है।

देश

जीडीपी के मुकाबले कर्ज का अनुपात

जीडीपी के मुकाबले बाहरी कर्ज का अनुपात

अमेरिका

134.00%

---

भारत

52.00%

21.00%

इंग्लैंड

80.00%

388.00%

चीन

17.00%

5.00%

फ्रांस

86.00%

208.00%

रूस

10.00%

32%


क्या खुले बाजार, खुली पूंजी और खुले श्रम व्यवस्था पर फिर से सोचने की जरूरत नहीं है। जिस तरह से भारत सरकार अपना बाजार खोल रही है। क्या वो संकट का संकेत नहीं है। क्या उदारवाद और भूमंडलीकरण हमें गर्त में ढकेल नहीं देगा। अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी ताकत है फिर उसे कर्ज संकट ने परेशान कर रखा है फिर हमारे क्या बिसात है। जब हमारे ऊपर संकट आएगा तो हम कहां ठहरेंगे। हमारे देश के नीति निर्माताओं को फिर से सोचने की जरूरत है।





बुधवार, 27 जुलाई 2011

सर्वश्रेष्ठ ऑनलाइन हिंदी-हिंदी डिक्शनरी यानी हिंदी-हिंदी शब्दकोश


आज ही मैंने एक श्रेष्ठ ऑनलाइन हिंदी-हिंदी डिक्शनरी यानी शब्दकोश देखा है। पहली ही दृष्टि में ये डिक्शनरी मुझे भा गई है। तीन लाख बाबन हजार दो सौ एक शब्दों का शब्दार्थ, उसकी परिभाषा, संबंधित मुहावरा प्रदान करता है। इस डिक्शनरी की सबसे बड़ी विशेषता शब्दों की व्याकरणिक श्रेणी(यथा, संग्या, सर्वनाम, लिंग आदि) है।
ये डिक्शनरी है- डेफ्निशन-ऑफ.नेट

निस्संदेह नेट पर उपलब्ध ये अब तक की सबसे अच्छी हिंदी-हिंदी डिक्शनरी है।
साइट पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, यह वेबसाइट अभी नवजात ही है(मात्र कुछ महीनों का), मगर यह दुनिया की चौबीस भाषाओं में शब्दों की परिभाषा, शब्दार्थ समेटे दुनिया का सबसे बड़ा डाटाबेस है। यहां भाषाओं की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है।
इस वेबसाइट को विकसित करने में अमेरिका, ग्रीस और रोमानिया के तीन नागरिकों ने योगदान दिया है।
कमियों को तेजी से दूर किया जा रहा है।
साथ ही, इस वेबसाइट का कोई कॉपीराइट नहीं है।
हिंदी की इतनी बढ़िया डिक्शनरी आखिर एक विदेशी ने तैयार की है। एक और सीख।

मंगलवार, 26 जुलाई 2011

क्या ये सिर्फ उपयोगी बेवकूफ हैं?

मूल लेखक- एस गुरुमूर्ति साभार- एक्प्रेसबुज.कॉम अनुवाद- सत्यजीत प्रकाश

उदारवादियों और धर्मनिरपेक्षतावादियों की सूची देखिएः- जस्टिस राजिंदर सच्चर(देश में मुसलमानों की स्थिति पर मशहूर सच्चर समिति की रिपोर्ट के लेखक), दिलीप पडगांवकर(केंद्र सरकार द्वारा कश्मीर पर गठित तीन मध्यस्थों में से एक), हरीश खरे(प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार), रीता मनचंदा(भारत-पाक शांति के लिए संघर्ष करने वाली महिलाओं के एक समूह की स्थानीय साझेदार), वेद भासिन(कश्मीर टाइम्स के संपादक), हरिंदर बावेजा(खोजी संपादक, हेडलाइन्स टुडे), गौतम नवलखा व कमल चेनॉय(मानवाधिकार कार्यकर्ता), प्रफुल्ल विदवई (मशहूर स्तंभकार)

ये लोकप्रिय भारतीय उदारवादियों की सूची है, जो भारतीय संवाद में अहम प्रभाव रखते हैं- चाहे मामला कश्मीर का हो या धर्मनिरपेक्षता का, मामला भ्रष्टाचार का हो या सांप्रदायिकता का, बात नरेंद्र मोदी की हो या सोनिया गांधी का।

लेकिन ये सूची पद्म पुरस्कारों के लिए संभावित लोगों की सूची नहीं है। ये उन लोगों की सूची है जो गुलाम नबी फाई के अतिथि बनते रहे हैं। वही, गुलाम नबी फाई जिसे आईएसआई के लिए काम करने के आरोप में अमेरिकी खुफिया एजेंसी एफबीआई ने गिरफ्तार किया है। उन्नीस जुलाई को वाशिंग्टन टाइम्स में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, फाई को जिन आरोपों में गिरफ्तार किया गया है उनमें पाकिस्तानी सरकार और पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई से लाखों डॉलर लेना, कश्मीर से भारत को निकाल बाहर करने के लिए निर्वाचित अमेरिकी अधिकारियों को प्रभावित करने के लिए इन पैसों से योजनाएं बनाना शामिल है। फाई को कश्मीर से भारत को निकाल बाहर करने के लिए योजना बनाने के जुर्म में गिरफ्तार नहीं किया गया है क्योंकि अमेरिका में ऐसा करना अपराध नहीं है। बल्कि फाई पाकिस्तानी हितों के लिए अमेरिकी अधिकारियों के प्रभाव को खरीदने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। भारतीय कानून के मुताबिक, अगर इन लोगों को पता होता कि ये फाई कौन है, तो फाई की सूची में शामिल इन भारतीय उदारवादियों पर देशद्रोह का मामला हो सकता है और अगर इनको फाई के बारे में पता नहीं था तो पूर्व संपादक आर जगनाथन के मुताबिक सिर्फ उपयोगी बेवकूफ हैं। लेकिन क्या ये सिर्फ बेवकूफ हैं।

इस मामले में अपने ४५ पृष्ठों के शपथपत्र में एफबीआई ने फाई पर विदेशी नीतियों के एजेंट के रूप में काम करने का षडयंत्र रचने का आरोप लगाया। रिपोर्टों के मुताबिक, एफबीआई ने अपने शपथ पत्र में फाई को अमेरिकी में कश्मीरी चोले में पाकिस्तानी हितों के लिए काम करने वाला बताया। जिन्हें कश्मीरी चोले के रूप में कश्मीर अमेरिकी कौंउसिल नामक संस्था बना रखी थी। रिपोर्टों के मुताबिक, फाई पाकिस्तान में बैठे अपने आकाओं से बात-बात पर सलाह लेता था। एफबीआई ने अपने शपथ पत्र में कहा है कि हर साल ढाई करोड़ से साढ़े तीन करोड़ के हिसाब से फाई ने पाकिस्तान से कम से कम ४ मिलियन(यानी बीस करोड़ रुपये) कश्मीर मुद्दे को पाकिस्तान के पक्ष में मोड़ने के लिए लिये। लेख के शुरू में जिन लोगों का जिक्र किया गया है वो वही लोग है जो फाई की कार्ययोजना को आगे बढ़ाने में उसके पैरवीकार हैं। कश्मीर से भारत को भगाने के लिए आईएसआई के इशारे पर फाई द्वारा आयोजित विचार मंथन और बैठकों में ये लोग शामिल होते रहे हैं।

ऐसा लगता है कि फाई को पाकिस्तान में बैठे उनके आकाओं से संबंध बताने के लिए एफबीआई ने पुख्ता काम किया है। ऐसा करने के लिए एफबीआई ने फाई और उसके आकाओं के करीब चार हजार ईमेलों और फोन-कॉलों को इकट्ठा किया है। ऐसा लगता है कि फाई के एक सहयोगी ने जुर्म कबूल कर लिया है कि फाई आईएसआई का एक कारकून है और एफबीआई इस सहयोगी को बतौर गवाह इस्तेमाल करना चाहता है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार इस गवाह के मुताबिक, पाकिस्तान सरकार के लिए प्रचार करने के लिए आईएसआई ने कश्मीर अमेरिकी कौंसिल का निर्माण करवाया। चूंकि फाई एक कश्मीरी है और उसके पास अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से मास्टर की डिग्री है इसलिए वो अमेरिका को बैगर संदेह हुए वहां काम कर सकता था। रिपोर्टों के मुताबिक, आईएसआई एजेंट होने के बाद उसने पाकिस्तान और आईएसआई के निर्देश पर काम करना शुरू किया। इसके लिए पैसे उसे आईएसआई से मिलते थे। उपरोक्त गवाह के मुताबिक, फाई के भाषण का अस्सी प्रतिशत हिस्सा आईएसआई लिखकर देता था और बाकी बीस प्रतिशत पर भी उसकी स्वीकृति लेनी होती थी। इसलिए फाई सौ फीसदी आईएसआई का एजेंट था।

हमारे उपरोक्त उदारवादी और धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवी इस आईएसआई एजेंट यानी गुलाम नबी फाई द्वारा आयोजित सम्मेलनों में भारत के बतौर महत्वपूर्ण अतिथि शिरकत करते थे। इन बुद्धिजीवियों की मदद से फाई भारत के हितों को नुकसान पहुंचाने में बड़े ही प्रभावी ढ़ंग से कारगर हुआ। फाई का मुकाबला करने के लिए भारत सरकार को पिछले साल कश्मीर कैडर के एक रिटायर्ड आईएएस अधिकारी वजाहत हबीबुल्लाह को वाशिंगटन स्थित अमेरिकी दूतावास में सामुदायिक मामलों का मंत्री नियुक्त करना पड़ा।

कितनी विचित्र बात है। एक तरफ भारत को कश्मीर से भगाने के लिए प्रधानमंत्री के वर्तमान मीडिया सलाहकार हरीश खरे और कश्मीर मामलों पर सरकार के तीन मध्यस्थों में एक दिलीप पडगांवकर आईएसआई के पैसों से आयोजित समारोहों में शिरकत कर भारत के हितों को चोट पहुंचाते हैं, आहत करते हैं, नुकसान पहुंचाते हैं दूसरी तरफ, भारत सरकार को नुकसान की भरपाई के लिए कश्मीर कैडर के एक रिटायर्ड आईएएस अधिकारी को वाशिंगटन भेजना पड़ता है। नतीजा साफ है कि जो लोग फाई के जरिए आईएसआई के षडयंत्र के हिस्सा हैं वही लोग आज यूपीए सरकार के भी अंग हैं।

मगर, सवाल है कि क्या भारत को कश्मीर से बाहर करने के षडयंत्र में फाई इन महत्वपूर्ण लोगों ये जाने बगैर शामिल कर लिया कि इनके विचार उसके आकाओं के हितों को आगे बढाएगा। फाई ने किसी अरुण शौरी, किसी चो रामास्वामी, किसी एमजे अकबर, किसी अर्नब गोस्वामी को क्यों नहीं बुलाया। साफ है कि इन लोगों के विचार आईएसआई के एजेंडे और षडयंत्र को आगे नहीं बढ़ाते, बल्कि अवरुद्ध कर देते। फाई जानता था कि उसकी सूची में शामिल भारतीय उदारवादियों का जम्मू-कस्मीर पर विचार अलगाव वादियों के लिए हितकर होगा और आईएसआई के षडयंत्र को सफल बनाएगा। इसलिए इन्हें सिर्फ उपयोगी बेवकूफ मानना ठीक नहीं है, बल्कि इसे खारिज करना आसान है।


फाई की सूची के दो उदारवादी अब भी अतिउच्च पद पर हैं- एक जम्मू-कश्मीर पर केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त मध्यस्थ हैं(कैबिनेट सचिव स्तरीय वेतन और सुविधाएं) तो दूसरे प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार हैं। प्रधानमंत्री जी, ये सबूत कोई भारतीय पुलिस नहीं दे रही है। बल्कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी एफबीआई दे रही है। ये वही अमेरिका है जिसे आप सबसे ज्यादा प्यार करते हैं। आप सुन रहे हैं।


पद-टिप्पणी- इस लेख में कुलदीप नैयर का नाम शामिल नहीं है।

ए राजा, बड़े नमक हराम हो जी तुम


ए राजा, ए क्या कर रहे हो। अभी तो छह महीने भी नहीं हुए। अभी से डंक मारने लगे हो। वो उसी मधु-छत्ते को। जिसमें तुम कभी रहते थे। तुम्हें कितने प्यार से रखा जाता था। सब तुम्हारी खातिरदारी करते थे। जारी खुदाई एक तरफ, जनाब मनमोहन एक तरफ। सरकारी बनी। तुम्हारा विरोध हुआ। फिर भी मनमोहन तुम्हें अपने पाले में ही ले ही लिए। तुम्हें बचाने के लिए सेफरॉन-टेरर थ्योरी का इजाद हुआ। भले ही विफल हो गया। मगर हुआ ना। तुम्हारे लिए जीरो लॉस थ्योरी का इजाद हुआ। तुम नहीं बच सके। मगर इजाद तो हुआ न। जितना बन सका। सबने किया। तुम्हारे लिए एक महीने से ज्यादा संसद का काम कुर्बान किया। इससे ज्यादा हम क्या कर सकते हैं। बेटा बड़का कोरट को कौन समझा सकत है। तुम्ही बताओ। हम तोहार के बचावे खातिर कि-कि नैय करते हैं। मगर तु हौ कि समझवे नय करता है। ये यार अभी भी लगे हुए मगर, तुम क्या कर रहे हो। कभी प्रधानमंत्री के नाम ले रहे हो तो कभी वित्तमंत्री के औरो तो और कानून मंत्रालय को भी नय छोड़ रहे हो। यार। तुमको समझ में नय आता है कि इस प्रधानमंत्री पर आरोप लगाना सूरज पर थूकने जैसा है। ई हम नय कांग्रेस प्रवक्ता कह रहे है। अब समझो सूरज पर थुकोगे तो किस पर पड़ेगा। यार जितना बन सका किया। जितना हो सका तुमको लूटने दिया। कभी रोका। कभी कोई जीओएम बनाया। तुमने जैसा कहा वैसा होने दिया। कभी पब्लिक का, कोरट का, ख्याल किया। नय न। फिर क्यों सबको कोर्ट में घसीट रहे हो। अरे प्रधानमंत्री अकेला आदमी होता है तुम्हारे कौन-कोन से काम पर ध्यान रखेगा। कहा था जैसा लगे कर लो। और क्या चाहिए। मगर तुम सबको घिसियाय रहे हो। शरम नय आती है। बड़े नमक हराम होजी।

सोमवार, 25 जुलाई 2011

कुलदीप नैयर ने क्यों पकड़ा कान?


देश में राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में संलिप्त लोगों को कोई कमी नहीं है। इनमें कई अपने आपको नामी-गिरामी पत्रकार और बुद्धिजीवी होने का दावा करते हैं। ऐसे लोगों पत्रकारों और बुद्धिजीवियों की दुकान चल भी रही है क्योंकि ये लोग आईएसआई जैसी भारत विरोधी गतिविधियों में संलिप्त एजेंसियों के पैसे से विदेशों की यात्रा करते हैं, उनके सेमिनार में शामिल होते हैं, जाने-अनजाने भारत विरोधी बयान देते हैं, कश्मीर की आजादी की बात करते हैं, आतंकवादियों के मानवाधिकारों की पैरवी करते हैं, राष्ट्रविरोधी ताकतों को संरक्षण देने की वकालत करते हैं, आतंकवादियों के पुनर्वास के लिए लॉबिंग करते हैं। इसके लिए ये लोग आईएसआई जैसी एजेंसियों से संरक्षण पाने वाले संगठनों से कुछ पुरस्कार, अवार्ड आदि जैसी चीजें पा जाते हैं। पुरस्कार पा जाने के बाद स्वघोषित सेक्यूलर भारतीय मीडिया संस्थानों में इन लेख संपादकीय पृष्ठों में छप जाता है, बदले में मोटी रकम की कमाई भी हो जाती है अंग्रेजी बोलने वाले इनमें कई कथित पत्रकारों और बुद्धिजीवियों को टेलीविजन का ग्लैमर पाने का वांछित मौका भी मिल जाता है। इस मौका को हासिल करते-करते इन लोगों को कुछ अंतर्राष्ट्रीय अवार्ड और कुछ राष्ट्रीय अवार्ड भी मिल जाता है और ये लोग देशी संस्कृति को मुंह चिढ़ाने लगते हैं। देश के लिए त्याग और तपस्या करने वालों को मुंह चिढ़ाते हैं। सरकार में अपनी पैठ बनाते हैं फिर योजना परियोजना पारित करते हैं। देश में मन-मुताबिक कानून बनाने के लिए लॉबिंग करते हैं।

ऐसे पत्रकारों, लेखकों और बुद्धिजीवियों पर इस तरह के आरोप काफी अर्से से लगते रहे हैं। मगर, इनकी पुष्टि जब तक अमेरिका जैसे पश्चिमी देश नहीं कर देते हैं तब तक हमारे देश में इन्हें मानने की प्रथा और परंपरा नहीं रही है। स्वामी विवेकानंद भारत भ्रमण करते रहे लेकिन उन्होंने किसी ने विद्वान या ऋषि नहीं माना। किसी ने उन्हें पूज्य नहीं समझा। अपने को साबित करने के लिए उन्हें अमेरिका जाना पड़ा, वहां जब अमेरिकी विद्वानों ने उनकी विद्वता
को
लोहा माना तो विवेकानंद रातों रात मशहूर हो गए। भारत ने उन्हें तत्काल पूज्य मान लिया। हमारे तथाकथित बुद्धिजीवियों और मानवाधिकारवादियों पर लगे आरोपो के बारे में जब अमेरिका ने आरोप लगाया तो पूरी दुनिया में, खासकर भारत के बुद्धिजीवियों में हलचल मच गई।
कुलदीप नैयर ने तो ऐसे सेमिनारों में जाने से कान ही पकड़ ली।
दरअसल, पूरा मामला गुलाम नबी फाई की गिरफ्तारी से सामने आया। फाई कश्मीरी पृथक्कतावादी बुद्धिजीवी है। जिसने पाकिस्तान के किसी विश्वविद्यालय से जनसंचार में पीएचडी की डिग्री हासिल की और इस दौरान वो पाकिस्तान खुफिया एजेंसी आईएसआई के संपर्क में आया। आईएसआई ने फाई की बुद्धि और उसकी भारत विरोधी मानसिकता का इस्तेमाल करना चाहा और उसे अमेरिका भेज दिया।
गुलाम नबी फाई अमेरिका में भारत विरोधी गतिविधियों में संलिप्त हो गया। वह अमेरिका में भारत-विरोधी जनमत तैयार करने लगा। वह कश्मीर में भारतीय सेना द्वारा कथित मानवाधिकारों के उल्लंघन और कश्मीर के आजादी के लिए अमेरिकी सांसदों दबाव बनाने लगा और ऐसे सांसदों, नेताओं और बुद्धिजीवियों का गुट तैयार करने लगा। गुलाम नबी फाई की नजर भारत के ऐसे बुद्धिजीवियों और पत्रकारों पर भी थी जो कश्मीर में मानवाधिकार के कथि उल्लंघन पर आए दिन शोर-मचाते रहते हैं और किसी न किसी रूप में कश्मीर की आजादी का गीत गाते हैं। अरुंधती राय जैसे लोगों की आवाज काफी मुखर है तो बाकी लोग अपने निजी स्वार्थों के लिए किसी न किसी रूप में इस कार्य में शामिल हैं। दुर्भाग्यवश जैसे लोग मानवाधिकार के पैरोकार समझे जाते हैं और सम्मानित भी किए जाते हैं।
जहां तक बात फाई की है तो वो कई सालों से अमेरिका में भारत विरोधी गतिविधि चला रहा था। अमेरिका में उसकी गिरफ्तारी के बाद ही इन सब बातों का खुलासा हुआ है कि अमेरिका पाकिस्तान में आतंकवाद से लड़ाई के लिए जो पैसा देता है। उसी पैसे का इस्तेमाल पाकिस्तान की आईएसआई भारत विरोधी गतिविधियों के लिए करता है। इसी पैसे का एक बड़ा हिस्सा गुलाम नबी फाई के पास भी पहुंचता है। अमेरिका द्वारा कोर्ट में दी गई जानकारी के मुताबिक, आईएसआई ने वर्ष 2010-2011 में गुलाम नबी फाई को 4 से 5 मिलियन डॉलर धन दिया। फाई इस धन का इस्तेमाल कश्मीर की आजादी के लिए अमेरिकी सांसदों को अपने पक्ष में करने, भारतीय पत्रकारों और बुद्धिजीवियों को अमेरिका बुलाकार सेमिनार कराने आदि के लिए किया करता था।
अमेरिका में गुलामनबी फाई के सम्मेलन में जाने वाले भारतीय बुद्धिजीवियों और पत्रकारों में कुलदीप नैयर, हरिंदर बवेजा और दिलीप पडगांवकर शामिल हैं।
याद रहे ये दिलीप पडगांवकर वहीं हैं तो कश्मीर समस्या के समाधान के लिए भारत सरकार द्वारा गठित तीन सदस्यीय सलाहकार समिति में शामिल हैं। जो अलगाववादियों और आतंकवादियों से बातचीत के पक्षधर रहे हैं और जिन्होंने उनसे जेलों में जाकर मुलाकात भी है। दिलीप पडगांवकर आतंकवादियों के पुनर्वास की भी पैरवी करते रहे हैं।
ये स्वनामधन्य पत्रकार थोड़े से नाम और पैसे के लिए गुलाम नबी फाई जैसे देशद्राहियों का मोहरा बनते रहे हैं। और जाने-अनजाने आईएसआई के पैसे पर देशविरोधी गतिविधियों में शामिल एजेंसियों के लिए विदेश दौरा करते रहे हैं।
यहां ध्यान देने वाली बात है कि फाई सालों से अमेरिका में रहकर आईएसआई के पैसे से भारत विरोधी गतिविधियां चला रहा था और ऐसा नहीं है कि अमेरिका को इसकी भनक नहीं लगी होगी। मगर, अमेरिका ने इसका भंडाफोड़ तब किया है जब उसे अमेरिका पर लगाम लगानी थी। पाकिस्तान के एबटाबाद में अलकायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन की हत्या के बाद पाकिस्तान के साथ अमेरिका की ठनने लगी फिर अमेरिका ने पाकिस्तान को उसकी औकात बतानी चाही और गुलाम नबी फाई की कारिस्तानियों का भंडाफोड़ किया।
अब किसी को समझने में देरी नहीं करनी चाहिए कि अरुंधती राय जैसे लोगों को बुकर पुरस्कार क्यों मिल जाता है। क्यों जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी से लाल पैगाम देने वाले अमेरिका विरोधी राग अलापते रहते हैं और ज्योंही कोई मौका मिलता है अमेरिका के लिबर्टी ऑफ स्टेच्यू से जा लिपटते हैं।

रविवार, 17 जुलाई 2011

पसंदीदा जालपृष्ठ


गुरुवार, 14 जुलाई 2011

कालेधन का पूरा सच

कालेधन का पूरा सच जानने के लिए यहां क्लिक करें।
नोट- तकनीकी कारणों से यहां से वीडियो हटा दिया गया है।

शनिवार, 9 जुलाई 2011

प्रभाष जोशी की 75वीं जयंती



ऋषि पत्रकार प्रभाष जोशी की 75वीं जयंती 15-16 जुलाई लाई को इंदौर में भाषाई पत्रकारिता महोत्सव के तौर पर मनायी जाएगी। दो दिवसीय सारस्वत समारोह का समायोजन इंदौर प्रेस क्लब और प्रभाष परम्परा न्यास ने किया है। महोत्सव का उदघाटन उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी 15 जुलाई को शाम 5 बजे करेंगे। पत्रकारिता की चुनौतियां और प्रभाष जी के सामाजिक, सांस्कृतिक सरोकारों पर कई सत्रों में चर्चा प्रस्तावित है। महोत्सव का नामकरण प्रभाष प्रसंग किया गया है।
समारोह के दौरान प्रभाष पर्व नामक पुस्तक का लोकार्पण उपराष्ट्रपति के कर-कमलों द्वारा होगा। पांच सौ पन्नों की इस किताब में प्रभाष जी के निधन के बाद उनपर लिखे गये लेखों-संस्मरणों का संग्रह है। प्रभाष जोशी की दो कहानियां और एक कविता भी पुस्तक में संकलित है, जो साठ के दशक में लिखी गयी थी। सम्मेलन में जिन विषयों पर चर्चा होनी है उसमें क्रिकेट, पत्रकारिता, जल-जंगल-जमीन और जनांदोलन शामिल है। वर्तमान समय में पत्रकारिता के समक्ष चुनौतियां विषयक सत्र में डॉ वेदप्रताप वैदिक, रामबहादुर राय, कुमार केतकर, हरिवंश, रामशरण जोशी,पुण्य प्रसून वाजपेयी, प्रांजय गुहा ठाकुरता, ओम थानवी,जैसे नामचीन पत्रकार भाग लेंगे।
सामाजिक- सांस्कृतिक विषय से जुड़े सत्रों में अनुपम मिश्र, हर्षमंदर, प्रशांत भूषण, मेधा पाटकर जैसे लोगों के विचार सुनने को मिलेंगे। प्रभाष जोशी के प्रसंदीदा विषय क्रिकेट पर भी एक सत्र होगा जिसमें नायडु से धौनी तक के सफर की चर्चा होगी। क्रिकेटर बिशन सिंह बेदी खासतौर से इस मौके पर अपना अनुभव बांटेंगे। तीसरे प्रेस आयोग की जरूरत पर एक मसौदा वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय ने तैयार किया है, उसे भी सम्मेलन के दौरान प्रस्तुत किया जाएगा।
प्रभाष प्रसंग के लिए प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष जस्टिस पी वी सांवत ने खास तौर पर एक आलेख भेजा है, जिसे प्रतिनिधियों के बीच वितरित किया जाएगा। शुभा मुद्दगल का गायन सुनने का आनंद भी प्रतिनिधि उठा सकेंगे। समापन के दिन गणेश शंकर विद्यार्थी की प्रतिमा से राजेन्द्र माथुर की प्रतिमा स्थल तक पद यात्रा भी होगी।

सरकारें क्यों कर रही हैं औद्योगिक घरानों की दलाली



वरिष्ठ व प्रतिष्ठित पत्रकार पी साईनाथ सरकारों को रवैये से इतने आहत है कि वो उन्हें दलाल कहने से भी परहेज नहीं कर रहे हैं।

गुरुवार, 7 जुलाई 2011

फिर बाहर आया तेलंगाना का जिन्न



डॉ देवकुमार पुखराज
तेलंगाना का जिन्न बंद बोतल से एकबार फिर बाहर निकल आया है। इलाके के जनप्रतिनिधि सामूहिक इस्तीफा दे रहे हैं। अर्से बाद अलग तेलंगाना राज्य का मुद्दा राजनीति के केन्द्र में आ गया है। इलाके में बंद और रेल- रोको जैसे आंदोलन तेज हो गये हैं। केन्द्र की कांग्रेसनीत यूपीए सरकार और आंध्रप्रदेश में एन.किरण कुमार रेड्डी की सरकार के सामने एकाएक राजनीतिक फैसले लेने की कठिन चुनौती आ खड़ी हुई है। पांच दशक पुराने तेलंगाना आंदोलन में शायद ये पहला मौका है जब इलाके के सभी जनप्रतिनिधि दलीय परिधि से ऊपर उठकर एक सूर में बोलते दिख रहे हैं।
आंध्र प्रदेश में उठे राजनीतिक संकट के बावजूद केंद्र सरकार फ़िलहाल वहां राष्ट्रपति शासन के बारे में विचार नहीं कर रही हैदिल्ली में एक संवाददाता सम्मेलन के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने साफ कर दिया है कि आंध्र प्रदेश में राष्ट्रपति शासन की कोई संभावना नहीं है। लेकिन राजनीतिक विश्ले षकों का मानना है कि अगर राज्य में राजनीतिक गतिरोध इसी तरह चलता रहा तो राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता है
दरअसल, पृथक तेलंगाना राज्य के समर्थन में अभी तक आंध्रप्रदेश के 294 में सौ विधायकों ने इस्तीफ़ा दे दिया हैइनमें से 45 कांग्रेस, 37 तेलुगु देशम पार्टी, 11 तेलंगाना राष्ट्र समिति, चार सीपीआई और 2 भाजपा के विधायक हैटीडीपी के बागी विधायक नागम जनार्दन रेड्डी ने पहले ही अपना इस्तीफ़ा दे दिया था। इस तरह तेलंगाना क्षेत्र के 119 में से 100 विधायकों ने इस्तीफ़ा दे दिया हैबाक़ी बचे 19 में से सात विधायक मजलिसे इत्तेहादुल मुसलमिन से जुड़े हैं जिसका हैदराबाद और आसपास के इलाके में खासा प्रभाव माना जाता है। लोकसत्ता पार्टी के प्रमुख और शहरी इलाके से विधायक जयप्रकाश नारायण भी इस्तीफा नहीं देने के पक्ष में हैं। एमआईएम आरंभ से हीं राज्य को दो भागों में बांटे जाने के ख़िलाफ़ है। विधायकों के साथ हीं तेलंगाना क्षेत्र से आने वाले सांसदों ने भी इस्तीफा देकर नेतृत्व के सामने परेशानी खड़ी कर दी है। तेलंगाना क्षेत्र के कई मंत्रियों ने भी इस्तीफे दे दिए हैं जिससे कांग्रेस के लिए मुश्किलें खड़ी हो गई हैं। सौ विधायकों के इस्तीफ़े के बाद विधानसभा में 194 सदस्य रह गए हैं। जानकार बताते हैं कि सदन में कांग्रेस को अभी भी बहुमत हासिल है और सरकार को तकनीकी रूप से कोई ख़तरा नहीं है। वैसे आंध्रप्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष एन. मनोहर अभी विदेश दौरे पर अमरीका में हैं। कहा जा रहा है कि स्पीकर के स्वदेश लौटने तक फ़िलहाल यथास्थिति बनी रहने की संभावना है। पृथक तेलंगाना के मसले पर तेलंगाना क्षेत्र के 17 में से 13 सांसदों ने भी इस्तीफ़ा दे दिया हैइनमें से नौ कांग्रेस, दो टीआरएस और दो टीडीपी के सांसद हैं। इनके इस्तीफ़े को लेकर भी लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने अभी तक कोई फ़ैसला नहीं लिया है। लेकिन केन्द्र की कांग्रेस सरकार के सामने समस्या गंभीर है।आंध्र प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी ग़ुलाम नबी आज़ाद, लोकसभा में कांग्रेस के नेता प्रणब मुखर्जी और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल इस्तीफ़ा देनेवाले सांसदों को मनाने की लगातार कोशिश करते रहे हैं, लेकिन गतिरोध बरकरार हैतेलंगाना क्षेत्र के सांसद और विधायक अब आर-पार की लड़ाई के मूड में हैंऐसे में इस गतिरोध के जल्दी ख़त्म होने की उम्मीद नज़र नहीं आ रही है। उधर तेलंगाना जेएसी के 48 घंटे के बंद की सफलता ने राज्य प्रशासन के सामने गंभीर स्थिति उत्पन्न कर दी है। बंद के बाद टी. जेएसी ने इलाके की रेल सेवा ठप्प करने और सड़क पर हीं खाना बनाने और खाने जैसे कार्यक्रम करने की घोषणा कर रखी है। 5-6 जुलाई को 48 घंटे की बंद के दौरान हैदराबाद सहित तेलंगाना क्षेत्र के सभी दस ज़िलों में परिवहन सेवा बुरी तरह प्रभावित रही। राज्य परिवहन निगम की 10 हज़ार से ज़्यादा बसें नहीं चली और यात्रियों को भारी परेशानी झेलनी पड़ी। ज्वाइंट एक्शन कमेटी की योजना राष्ट्रीय राजमार्गों पर अवरोध खड़े कर उन्हें जाम कर देने की है आने वाले दिनों में विरोध प्रदर्शनों का सिलसिला तेज हो सकता है।
तेलंगाना राष्ट्र समिति के अध्यक्ष के. चंद्रशेखर राव ने केंद्र सरकार को चेतावनी देते हुए इस्तीफा लोकसभा अध्यक्ष को फैक्स कर दिया है। उन्होंने कहा है कि यदि केन्द्र सरकार ने अपना वादा पूरा करते हुए अलग तेलंगाना प्रांत नहीं बनाया तो पूरे इलाके की स्थिति और खराब हो सकती है। वे याद दिलाते हैं कि नवंबर 2009 में गृहमंत्री पी. चिदम्बरम् ने आंदोलनों के दबाव में आकर हीं अलग तेलंगाना प्रांत गठित करने की प्रक्रिया शुरू करने की बात कही थी।लेकिन फिर आंध्र प्रदेश में विरोध के चलते मामला रूक गया। बाद में श्रीकृष्ण आयोग का गठन किया गया, जिसने केंद्र सरकार को कई विकल्प सुझाए लेकिन तब से सरकार उन पर विचार करने का ही भरोसा दिला रही है। वैसे केसीआर ने हैदराबाद को केन्द्र शासित प्रदेश बनाने और तेलंगाना को स्वायत परिषद बनाने के प्रस्ताव को पहले हीं खारिज कर दिया है।
केन्द्र की सरकार के साथ-साथ आंध्रप्रदेश में किरण कुमार रेड्डी को भी तेलंगाना का भूत पीछा कर रहा था। हाल तक वाईएस जगनमोहन की चुनौति झेल रहे किरण रेड्डी दल के विधायकों और मंत्रियों के बागी तेवर अपना लेने से पसोपेश में हैं। मुख्य विपक्षी पार्टी टीडीपी के मुखिया चन्द्रबाबू नायडु को भी उनके विधायको ने दो टूक कह दिया है। विधायक कहते हैं कि जनता की भावना को देखते हुए उनके पास इस्तीफा देने के अलावे कोई विकल्प नहीं बचा था। सरकार के सामने संकट ये है यदि उसने तेलंगाना को लेकर कुछ कार्रवाई आगे बढ़ाई तो तटीय आंध्र और रायलसीमा इलाके में भी आंदोलन की आग भड़क सकती है।

मंगलवार, 5 जुलाई 2011

अब ईमानदार नहीं रह गए हैं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह




जी हां, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अब ईमानदार नहीं रह गए हैं। हो सकता है कुछ पत्रकार जिनका प्रधानमंत्री और सरकार से निहित स्वार्थ जुड़ा हो, वो प्रधानमंत्री को अब भी ईमानदार कह सकते हैं। उन्हें क्लीनचिट दे सकते हैं। उन्हें बेदाग और साफ-सुथरी छवि का इंसान कह सकते हैं। मगर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अब ईमानदार नहीं रह गए हैं।
आश्चर्य की बात है कि देश में लाखों करोड़ का घोटाला हो जाने के बाद भी देश की सरकार की मुखिया को लोग ईमानदार बताते रहे हैं। मनमोहन को बेदाग और साफ-सुथरी छवि का नेता बताते रहे हैं। हालांकि ऐसा कहने वालों में ज्यादातर लोग कांग्रेस के हैं या कांग्रेस पोषित मीडिया के हैं। मीडिया क्यों कांग्रेस और केंद्र सरकार का गुणगान करती है और रामदेव और अन्ना हजारे जैसे लोगों का पर्दाफाश करने में जुटी रहती है। ये जानना ज्यादा मुश्किल नहीं है। अगर आपको इसकी सच्चाई जानना हो तो इस लिंक को पढ़ें । ऐसे बिके हुए मीडिया और पत्रकारों की बात करना ही बेकार है।
हाल में प्रधानमंत्री ने प्रिंट मीडिया के चुने हुए पांच वरिष्ठ संपादकों के साथ बैठक की। पत्रकारों के मुताबिक, प्रधानमंत्री आत्मविश्वास से लबरेज थे। वो बातचीत के बीच-बीत में हंसी-मजाक भी कर रहे थे। यानी साबित करने की कोशिश कर रहे थे कि वो नर्वस बिल्कुल नहीं हैं। इन्हीं पत्रकारों में से एक ने राष्ट्रमंडल खेल घोटाले के बारे में पूछा कि मणिशंकर अय्यर ने खेल घोटाले के बारे में आपको काफी पहले पत्र लिखा था। लेकिन आपने घोटाले की अनदेख की। तो प्रधानमंत्री ने कहा कि मणिशंकर अय्यर का पत्र आइडियोलॉजिकल(वैचारिक) था। प्रधानमंत्री के इस बयान के महज दो दिन बाद हेडलाइन्स टुडे ने मणिशंकर अय्यर के उस पत्र को चैनल पर दिखाया जिसमें साफ साफ कहा गया था कि राष्ट्रमंडल खेल आयोजन में बड़े पैमाने पर घोटाला हो रहा है। उनके एक नहीं बल्कि कई पत्र लिखे। इस पत्र में घोटाले के लिए साफ-साफ कलमाड़ी और उसके सहयोगियों को जिम्मेदार ठहराया गया। बताया गया कि खर्च की रकम को कई गुना बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया। मगर, प्रधानमंत्री ने समय रहते कोई कार्रवाई नहीं की। अब जब पत्रकारों ने इस घोटाले में उनकी भागीदारी के बारे में पूछा तो उन्हें मणिशंकर अय्यर के पत्र को ऑइडियोलॉजिकल पत्र करार दिया।
आखिर प्रधानमंत्री क्यों झूठ बोल रहे हैं। प्रधानमंत्री सच पर पर्दा डालकर अपनी कौन सी छवि पेश कर रहे हैं। इतना ही नहीं, खेल आयोजन की तैयारियों के दौरान खेल मंत्रालय के तात्कालीन कर्ता-धर्ताओं, मणिशंकर अय्यर, सुनील दत्त, एमएस गिल ने भी प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री पी चिदंबरम को घोटाले के बारे में बार-बार लिखा। लेकिन इन लोगों ने घोटाला होने दिया। प्रधानमंत्री ने तो मंत्रिसमूह के अनुरोधों को भी नजरअंदाज कर दिया और इसके लिए उन्होंने अजब-अनोखे तर्क भी दिए।
दूसरा मामला चालीख लाख करोड़ रुपये के कोयला घोटाले का है। इस घोटाले में प्रधानमंत्री सीधे-सीधे आरोपों के घेरे में आते हैं। 2006-10 तक कोयला मंत्रालय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के अधीन रहा है और इस दौरान 73 कोल ब्लॉक प्राइवेट कंपनियों को बिना कोई पैसा लिए दिए गए। शर्त महज इतना था कि जितना टन कोयला निकाला जाए। 100 रुपये प्रति टन के हिसाब से सरकार को भुगतान किया जाए। शायद प्रधानमंत्री को भी मालूम होगा कि बाजार में कोयला का भाव 2000 रुपये प्रति टन है, ऐसे में कंपनियां सिर्फ 100 रुपये टन क्यों भुगतान करेगी। क्या ये राष्ट्रीय संपत्ति की लूट नहीं। क्या इस घोटाले के बाद भी प्रधानमंत्री ईमानदार बनने का ढ़ोंग करते रहेंगे।
कौन नहीं जानता है कि दशकों से बिहार अंधेरे में जीने के लिए मजबूर है। नीतीश कुमार ने सड़कें तो बना दी लेकिन बिहार में बिजली नहीं है। बिहार में बिजली पैदा करने के लिए सरकार ने दो कोल ब्लॉक दिए। लेकिन बाद में उन्हें ये कहकर रद्द कर दिया गया कि तय समय-सीमा तक कोयले का खनन नहीं किया गया। इस तरह सरकारी ऊर्जा कंपनियों को दिए गए चौदह कोल ब्लॉक रद्द कर दिए गए। लेकिन निजी कंपनियों को दिए गए कोल-ब्लॉकों में से एक को भी रद्द नहीं किया गया है.. जबकि ज्यादातर कोल ब्लॉकों में कोयले का खनन अभी शुरू भी नहीं हुआ है।
टूजी स्पेक्ट्रम में ए राजा, कनिमोझी सहित दर्जन भर लोग जेल की हवा खा रहे हैं, जबकि स्पेक्ट्रम नवीकरणीय संसाधन है। आप कितना भी स्पेक्ट्रम पैदा कर सकते हैं। वहीं कोयला ऊर्जा का अनवीकरणीय स्रोत है.. जो एकबार खत्म हो जाए तो उसे दोबारा स्थापित नहीं किया जा सकता है। ब्लैक गोल्ड कहे जाने वाले कोयले की लूट के लिए जिम्मेदार एक भी व्यक्ति पर कार्रवाई नहीं हुई है। इस घोटाले में न सिर्फ कांग्रेस बल्कि भाजपा भी घेरे में है। हां भाजपा का पाप थोड़ा कम है। मगर जब दोनों घेरे में हैं, इसलिए इस घोटाले को मीडिया में सुर्खियां नहीं मिल पा रही है।
इस घोटाले के बाद भी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ईमानदार बने हुए हैं। मीडिया कांफ्रेंस कर रहे हैं खुद को ताकतवर कह रहे हैं। संदेह का लाभ दिए जाने की भी बात कर रहे हैं। ये भी कह रहे हैं कि जितना दोषी उन्हें बताया जा रहा है वो उतने बड़े दोषी या गुनहगार हैं नहीं। क्या इस खुलासे के बाद भी प्रधानमंत्री ईमानदार बने रहेंगे। शायद नहीं।

सोमवार, 4 जुलाई 2011

स्वामी रामदेव और अन्ना के पीछे कुत्तों की तरह मीडिया क्यों लगा है।

चार जून की आधी रात को स्वामी रामदेव पर भ्रष्ट सरकार के निर्देश पर पुलिसिया वर्दी में सरकार के भ्रष्ट गुंडों ने जमकर अत्याचार किया। यहां तक कि महिलाओं और बच्चों को भी नहीं छोड़ा। उनपर लाठियां बरसाई। ऑसू गैस के गोले छोड़े गए। आखिर क्यों
क्या आप जानते है मात्र एक चैनल पर सरकार खुद के विज्ञापन का कितना खर्चा करती है ?

विज्ञापन दर -
एनडीटीवी - प्रति 10 सेकेंड का रु॰ 3,810/- (साधारण दिन)
आजतक - प्रति 10 सेकेंड का रु॰ 3,720/- (साधारण दिन)
स्टार न्यूज़ - प्रति 10 सेकेंड का रु॰ 2,490/- (साधारण दिन)
IBN7 - प्रति 10 सेकेंड का रु॰ 2,250/- (साधारण दिन)

भारत निर्माण विज्ञापन
समय = 90 क्षण (सेकेंड)
प्रतिदिन (average - slots / day) - 10 प्रतिदिन (min.)

हर विज्ञापन की अनुमानित लागत -
90 X 2500/- = 2,25,000

प्रति चैनल पर प्रतिदिन विज्ञापन पर अनुमानित खर्चा
2,25,000.00 x 10 = 22,50,000.00

यह पैसा सरकार कॉंग्रेस का नहीं मेहनत लोगो द्वारा भरे गए टेक्स का पैसा है
आप टेक्स भरते है क्या इन विज्ञापनों के लिए ?

अब समझ लीजिये की चैनल क्यूँ कोंग्रेसियों के तलवे चाटते है !
चैनल किसी बॉलीवुड भांड की हरामखोरी का भी स्टिंग नहीं कराते क्यूँ की उनसे उन्हें कमाई होती है, अब प्रश्न है चैनलों को स्वामी रामदेवजी से क्या कमाई है ? कुछ नहीं

जागो भारतीयो जागो ......

*यह आकड़ें विभिन्न समाचार चैनलों की विज्ञापन कीमतों और सरकार द्वारा बुक किए गए विज्ञापनो के आकडे है