हिंदी शोध संसार

रविवार, 26 अक्टूबर 2008

देशद्रोही और लूट का माल

बीजिंग में सिर्फ एक स्वर्ण पदक ने पूरे देश को दीवाना बना दिया. उसी वक्त मेरे दिल में ख्याल आया कि भारत को एक नहीं, बल्कि किसी भी दूसरे देश के मुकाबले कम से चार गुना स्वर्ण पदक मिल सकता है. इसके लिए ज्यादा कुछ नहीं करना होगा, सिर्फ विदेशी बैंकों में जमा काले धन को प्रतियोगिता में शामिल करना होगा. स्विस बैंक में जमा काले धन में भारत की हिस्सेदारी किसी भी दूसरे देशों के मुकाबले चार गुना से ज्यादा है. दूसरे नंबर पर रूस. रूस के मुकाबले भारत का कम से कम चार गुना धन स्विस बैंक में जमा है.

दिलचस्प बात तो ये हैं कि दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक ताकत अमेरिका इस सूची में पांचवे नंबर पर भी नहीं है.

हाल में अंतर्राष्ट्रीय दबाव के आगे झुकते हुए स्वीटजरलैंड सरकार खाताधारियों के नाम बताने पर राजी हो गई, बशर्ते संबंधित देश की सरकार इसके लिए उससे अपील करे. स्वीटजरलैंड सरकार उन देशद्रोहियों और गद्दारों का नाम बताने को तैयार हैं, लेकिन भारत सरकार उसका नाम जानना नहीं चाहती है, जिनका कालाधन स्विस बैंक में जमा है. साफ है कि ये पैसा खेत में काम करने वाले मजदूरों और खेतों में खून-पसीना बहाने वाले किसानों का नहीं बल्कि ये पैसा भ्रष्ट नेताओं, नौकरशाहों, अफसरों, पूंजीपत्तियों, उद्योगपतियों, क्रिकेटरों, फिल्म अभिनेताओं, देहव्यापार से जुड़े दलालों, वन्यजीव चोरों और ड्रग स्मगलरों का है. जिन नामों का खुलासा सरकार भी करना नहीं चाहेगी.

स्वीस बैंक में जमा कालेधन को देखकर उन लोगों की जुबां पर ताला लग जाएगा, जो भारत को गरीब कहते हैं. चलिए उठाते हैं रहस्य से पर्दा,स्वीस बैंक में देशवासियों के खून-पसीने का करीब 1500 अरब डॉलर यानी पंद्रह खरब डॉलर यानी 750 खरब रुपये जमा है. यह पैसा, उस पैसे से दुगुना है, जितना अमेरिकी सरकार ने अपने सरकारी बैंकों को आर्थिक संकट से उबारने के लिए बेल आउट पैकेज के रूप में दिया है. यह पैसा उस पैसे से तेरह गुना ज्यादा जितना हमने विदेशों से कर्ज ले रखा है. ये पैसा देश के पैंतालीस करोड़ गरीबों में बांट दिया जाए तो हर गरीब को एक-एक लाख रुपये मिलेंगे. ये पैसा इतना ज्यादा है कि अगर इसे ब्याज पर लगा दिया जाय तो इसका सूद केद्र सरकार के वार्षिक बजट से भी ज्यादा होगा. अगर केंद्र सरकार सारे टैक्स हटा भी दे तो भी किसी काम के लिए पैसे की कमी नहीं रहेगी.

शेष अगले अंक में-

शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2008

सुशील प्रकरण : वेब पत्रकार संघर्ष समिति का गठन



एचटी मीडिया में शीर्ष पदों पर बैठे कुछ मठाधीशों के इशारे पर वेब पत्रकार सुशील कुमार सिंह को फर्जी मुकदमें में फंसाने और पुलिस द्वारा परेशान किए जाने के खिलाफ वेब मीडिया से जुड़े लोगों ने दिल्ली में एक आपात बैठक की। इस बैठक में हिंदी के कई वेब संपादक-संचालक, वेब पत्रकार, ब्लाग माडरेटर और सोशल-पोलिटिकिल एक्टीविस्ट मौजूद थे। अध्यक्षता मशहूर पत्रकार और डेटलाइन इंडिया के संपादक आलोक तोमर ने की। संचालन विस्फोट डाट काम के संपादक संजय तिवारी ने किया। बैठक के अंत में सर्वसम्मति से तीन सूत्रीय प्रस्ताव पारित किया गया। पहले प्रस्ताव में एचटी मीडिया के कुछ लोगों और पुलिस की मिलीभगत से वरिष्ठ पत्रकार सुशील को इरादतन परेशान करने के खिलाफ आंदोलन के लिए वेब पत्रकार संघर्ष समिति का गठन किया गया।

इस समिति का संयोजक मशहूर पत्रकार आलोक तोमर को बनाया गया। समिति के सदस्यों में बिच्छू डाट काम के संपादक अवधेश बजाज, प्रभासाक्षी डाट काम के समूह संपादक बालेंदु दाधीच, गुजरात ग्लोबल डाट काम के संपादक योगेश शर्मा, तीसरा स्वाधीनता आंदोलन के राष्ट्रीय संगठक गोपाल राय, विस्फोट डाट काम के संपादक संजय तिवारी, लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार अंबरीश कुमार, मीडिया खबर डाट काम के संपादक पुष्कर पुष्प, भड़ास4मीडिया डाट काम के संपादक यशवंत सिंह शामिल हैं। यह समिति एचटी मीडिया और पुलिस के सांठगांठ से सुशील कुमार सिंह को परेशान किए जाने के खिलाफ संघर्ष करेगी। समिति ने संघर्ष के लिए हर तरह का विकल्प खुला रखा है।

दूसरे प्रस्ताव में कहा गया है कि वेब पत्रकार सुशील कुमार सिंह को परेशान करने के खिलाफ संघर्ष समिति का प्रतिनिधिमंडल अपनी बात ज्ञापन के जरिए एचटी मीडिया समूह चेयरपर्सन शोभना भरतिया तक पहुंचाएगा। शोभना भरतिया के यहां से अगर न्याय नहीं मिलता है तो दूसरे चरण में प्रतिनिधिमंडल गृहमंत्री शिवराज पाटिल और उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती से मिलकर पूरे प्रकरण से अवगत कराते हुए वरिष्ठ पत्रकार को फंसाने की साजिश का भंडाफोड़ करेगा। तीसरे प्रस्ताव में कहा गया है कि सभी पत्रकार संगठनों से इस मामले में हस्तक्षेप करने के लिए संपर्क किया जाएगा और एचटी मीडिया में शीर्ष पदों पर बैठे कुछ मठाधीशों के खिलाफ सीधी कार्यवाही की जाएगी।

बैठक में प्रभासाक्षी डाट काम के समूह संपादक बालेन्दु दाधीच का मानना था कि मीडिया संस्थानों में डेडलाइन के दबाव में संपादकीय गलतियां होना एक आम बात है। उन्हें प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाए जाने की जरूरत नहीं है। बीबीसी, सीएनएन और ब्लूमबर्ग जैसे संस्थानों में भी हाल ही में बड़ी गलतियां हुई हैं। यदि किसी ब्लॉग या वेबसाइट पर उन्हें उजागर किया जाता है तो उसे स्पोर्ट्समैन स्पिरिट के साथ लिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि संबंधित वेब मीडिया संस्थान के पास अपनी खबर को प्रकाशित करने का पुख्ता आधार है और समाचार के प्रकाशन के पीछे कोई दुराग्रह नहीं है तो इसमें पुलिस के हस्तक्षेप की कोई गुंजाइश नहीं है। उन्होंने संबंधित प्रकाशन संस्थान से इस मामले को तूल न देने और अभिव्यक्ति के अधिकार का सम्मान करने की अपील की।

भड़ास4मीडिया डाट काम के संपादक यशवंत सिंह ने कहा कि अब समय आ गया है जब वेब माध्यमों से जुड़े लोग अपना एक संगठन बनाएं। तभी इस तरह के अलोकतांत्रिक हमलों का मुकाबला किया जा सकता है। यह किसी सुशील कुमार का मामला नहीं बल्कि यह मीडिया की आजादी पर मीडिया मठाधीशों द्वारा किए गए हमले का मामला है। ये हमले भविष्य में और बढ़ेंगे।

विस्फोट डाट काम के संपादक संजय तिवारी ने कहा- ''पहली बार वेब मीडिया प्रिंट और इलेक्ट्रानिक दोनों मीडिया माध्यमों पर आलोचक की भूमिका में काम कर रहा है। इसके दूरगामी और सार्थक परिणाम निकलेंगे। इस आलोचना को स्वीकार करने की बजाय वेब माध्यमों पर इस तरह से हमला बोलना मीडिया समूहों की कुत्सित मानसिकता को उजागर करता है। उनका यह दावा भी झूठ हो जाता है कि वे अपनी आलोचना सुनने के लिए तैयार हैं।''

लखनऊ से फोन पर वरिष्ठ पत्रकार अंबरीश कुमार ने कहा कि उत्तर प्रदेश में कई पत्रकार पुलिस के निशाने पर आ चुके हैं। लखीमपुर में पत्रकार समीउद्दीन नीलू के खिलाफ तत्कालीन एसपी ने न सिर्फ फर्जी मामला दर्ज कराया बल्कि वन्य जीव संरक्षण अधिनियम के तहत उसे गिरफ्तार भी करवा दिया। इस मुद्दे को लेकर मानवाधिकार आयोग ने उत्तर प्रदेश पुलिस को आड़े हाथों लिया था। इसके अलावा मुजफ्फरनगर में वरिष्ठ पत्रकार मेहरूद्दीन खान भी साजिश के चलते जेल भेज दिए गए थे। यह मामला जब संसद में उठा तो शासन-प्रशासन की नींद खुली। वेबसाइट के गपशप जैसे कालम को लेकर अब सुशील कुमार सिंह के खिलाफ शिकायत दर्ज कराना दुर्भाग्यपूर्ण है। यह बात अलग है कि पूरे मामले में किसी का भी कहीं जिक्र नहीं किया गया है।

बिच्छू डाट के संपादक अवधेश बजाज ने भोपाल से और गुजरात ग्लोबल डाट काम के संपादक योगेश शर्मा ने अहमदाबाद से फोन पर मीटिंग में लिए गए फैसलों पर सहमति जताई। इन दोनों वरिष्ठ पत्रकारों ने सुशील कुमार सिंह को फंसाने की साजिश की निंदा की और इस साजिश को रचने वालों को बेनकाब करने की मांग की।

बैठक के अंत में मशहूर पत्रकार और डेटलाइन इंडिया के संपादक आलोक तोमर ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि सुशील कुमार सिंह को परेशान करके वेब माध्यमों से जुड़े पत्रकारों को आतंकित करने की साजिश सफल नहीं होने दी जाएगी। इस लड़ाई को अंत तक लड़ा जाएगा। जो लोग साजिशें कर रहे हैं, उनके चेहरे पर पड़े नकाब को हटाने का काम और तेज किया जाएगा क्योंकि उन्हें ये लगता है कि वे पुलिस और सत्ता के सहारे सच कहने वाले पत्रकारों को धमका लेंगे तो उनकी बड़ी भूल है। हर दौर में सच कहने वाले परेशान किए जाते रहे हैं और आज दुर्भाग्य से सच कहने वालों का गला मीडिया से जुड़े लोग ही दबोच रहे हैं। ये वो लोग हैं जो मीडिया में रहते हुए बजाय पत्रकारीय नैतिकता को मानने के, पत्रकारिता के नाम पर कई तरह के धंधे कर रहे हैं। ऐसे धंधेबाजों को अपनी हकीकत का खुलासा होने का डर सता रहा है। पर उन्हें यह नहीं पता कि वे कलम को रोकने की जितनी भी कोशिशें करेंगे, कलम में स्याही उतनी ही ज्यादा बढ़ती जाएगी। सुशील कुमार प्रकरण के बहाने वेब माध्यमों के पत्रकारों में एकजुटता के लिए आई चेतना को सकारात्मक बताते हुए आलोक तोमर ने इस मुहिम को आगे बढ़ाने पर जोर दिया।

बैठक में हिंदी ब्लागों के कई संचालक और मीडिया में कार्यरत पत्रकार साथी मौजूद थे।
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अगर आप भी कोई ब्लाग या वेबसाइट या वेब पोर्टल चलाते हैं और वेब पत्रकार संघर्ष समिति में शामिल होना चाहते हैं तो aloktomar@hotmail.com पर मेल करें। वेब माध्यमों से जुड़े लोगों का एक संगठन बनाने की प्रक्रिया शुरू की जा चुकी है। आप सबकी भागीदारी का आह्वान है।
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((इस पोस्ट को कापी करके आप अपने-अपने ब्लागों-वेबसाइटों पर प्रकाशित करें ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों तक यह संदेश पहुंचाया जा सके और वेब माध्यम के जरिए सुशील कुमार की लड़ाई को विस्तार दिया जा सके।))

गुरुवार, 23 अक्टूबर 2008

तहलका का सच(तरुण तेजपाल के नाम खुला पत्र)

तहलका संपादक के नाम खुला पत्र - साजिद राशिद

प्रिय तरूण तेजपाल जी, मैं तहलका का नियमित पाठक हूं. इसलिए पिछले दिनों जब तहलका ने सिमी पर केन्द्रित अंक निकाला तो मैंने इसे बहुत उत्सुकता से पढ़ा. लेकिन पढ़कर मैं चकित रह गया. मुझे उम्मीद थी कि तीन महीनों की खोजबीन के बाद आपने सिमी के बारे में जो जानकारी दी होगी उससे निश्चित ही मेरी समझ में बढ़ोत्तरी होगी....
यह अपेक्षा इसलिए भी थी क्योंकि तहलका पहले भी इस तरह की खोजी रपटों में हर पक्ष की गहन पड़ताल करता है और सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलुओं को सामने रखता है. लेकिन विद्वान खोजी पत्रकार अजीत साही ने तीन महीने की मेहनत और खोजबीन के बाद सिमी के बारे में जो निष्कर्ष प्रस्तुत किया है वह यह है कि सिमी के पदाधिकारी जिन्हें बम विस्फोटों और देशद्रोह के आरोप मेंगिरफ्तार किया गया है वे बेहद मासूम हैं और उनके खिलाफ कोई सबूत नहीं है. पूरी पत्रकारिता का सारयह है, क्योंकि सिमी पर प्रतिबंध का कोई ठोस आधार नहीं बनता, इसलिए उसपर प्रतिबंध नहीं होनाचाहिए.

मेरे ख्याल से आपके प्रतिनिधि अजीत साही ने तीन महीनों तक ग्यारह शहरों का कष्टदायक सफर तय करके सिमी कार्यकर्ताओं के परिजनों से मिलकर जो मालूमात हासिल की है वह तो बिल्कुल सही है क्योंकि सिमी का अपने बचाव में जो बयान है अजीत साही ने बड़ी ईमानदारी से उसे दर्ज किया है. लेकिनअफसोस सिर्फ इतना है कि उन्होंने इसे कहीं भी क्रास चेक नहीं किया है . और शहरों के बारे में तो नहीं लेकिन मुंबई में अजीत साही ने दूसरा पक्ष जानने के लिए किससे संपर्क किया? मुंबई में अंग्रेजी की वरिष्ठ पत्रकार ज्योति पुनवानी पिछले तीन सालों से मुसलमानों की समस्याओं पर इतना "सहानुभूति पूर्वक" लिखती हैं कि जमात--इस्लामी और सिमी के एक पदाधिकारी ने उन्हें मुसलमान होने का न्यौता ही दे दिया था. साल भर पहले तक ज्योति पुनवानी सिमी को इस्लाम के प्रति अति उत्साही युवाओं का संगठन बताती रही हैं. जमात-ए-इस्लामी के हुकूमत-ए-इलाहिया (दुनियाभर में अल्लाह की हुकूमत) के नजरिये में उन्हें कोई आपत्ति नजर नहीं आती. विशेष न्यायाधिकरण का सिमीसे प्रतिबंध हटाने का फैसला आने के बाद १७ अगस्त को टाईम्स आफ इंडिया में इन्हीं ज्योति पुनवानीने लिखा था हाउ माई परसेप्शन आफ सिमी चेंज्ड, और विस्तार से बताया है कि कैसे सिमी के बारे मेंउनकी धारणा बदल गयी.
तरूण तेजपाल जी, क्या साही से आपको यह नहीं पूछना चाहिए था कि उन्होंने सिमी के चरित्र का दूसरापक्ष जानने की कोशिश क्यों नहीं की? उन्होंनेअपनी पूरी रिपोर्टिंग सिमी के बचाव पक्ष के वकील के तौर पर क्यों किया ? आपने सिमी का जो प्रोफाईल दिया है उसमें उसके संस्थापक मोहम्मद अहमदुल्ला सिद्दीकी के बारे में लिखा है कि उन्होंने १९७७ में उन्होंने सिमी की स्थापना की, लेकिन पाठकों को यह बताने कीजहमत क्यों नहीं उठायी कि कुछ ही सालों बाद सिद्दीकी ने सिमी से अपना नाता तोड़ लिया था . पिछले साल इंडियन एक्सप्रेस को दिये एक साक्षात्कार में उन्होंनेकहा था उन्हें सिमी की स्थापना पर अफसोस है, क्योंकि वह इस्लाम के रास्ते से हटकर जेहाद के रास्तेपर चला गया है. इसी तरह आपनेसिमी और जमात-ए-इस्लामी के संबंध पर सिर्फ इतना लिखा गया है कि वह जमात-ए-इस्लामी का एकउपसंगठन था और वह जमात से अलग अपनी पहचान कायम करना चाहता था जबकि हकीकत यह हैकि सिमी के जेहादी तेवरों को देखने के बाद जमात ने खुद सिमी से अपना रिश्ता तोड़ लिया था . लेकिन यह भी सच है कि यह संबंध विच्छेद एक दिखावा मात्र था.
अब मैं कुछ ऐसे तथ्य रखना चाहूंगा जो अजीत शाही द्वारा ११ शहरों में खोजबीन करने के बाद भी सिमी के बारे में जुटाये नहीं जा सके. १९९६ में अफगानिस्तान में तालिबान की हुकूमत कायम होने के बादसिमी ने उसे अपना आदर्श मानते हुए भारत में नारों और पोस्टरों के जरिए जेहाद का ऐलान कर दिया. २९ अक्टूबर १९९९ को सिमी ने कानपुर में सिमी ने अखिल भारतीय सम्मेलन आयोजित किया था जिसमें देशभर के २० हजार से अधिक प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया था. इस सम्मेलन को फिलीस्तीनी जिहादी संगठन हमास के नेता शेखयासीन अहमद ने संबोधित किया था. आप जानते ही होंगे कि शेख यासीन ने ही इजरायल औरअमेरिका में आत्मघाती हमले करवाये थे. इसी सम्मेलन को फोन द्वारा जमात-ए-इस्लामी (पाक) केअध्यक्ष काजी हुसैन ने भी संबोधित किया था . यह सिमी ही था जिसने कानपुर के तमाम सिनेमघरों को बंदकराने का आदेश दिया था और वहां की लड़कियों को बुर्का पहनने की चेतावनी दी थी.

चलिए मान लेते हैं कि आपका संवावदताता कानपुर नहीं गया था इसलिए इन जानकारियों से मरहूमरह गया हो लेकिन आपको यह पता ही होगा कि सिमी के पांच उद्येश्य हैं- अल्लाह मकसद हमारा, रसूलरहबल हमारा, कुरान कानून हमारा, जिहाद रास्ता हमारा, शहादत मंजिल हमारी. सिमी के लेटरहेड परबने निशान में धरती पर कुरान रखा हुआ है और कुरान पर एके-४७ रायफल . इसलिए सिमी खुद अपने इरादों को छुपाकर नहीं रख रहा है. पृथ्वी पर कुरान और उस पवित्र किताब पर एके-४७ का अर्थ किसी को समझाने की जरूरत नहीं है. सिमी किसके खिलाफ जेहाद करना चाहता है और क्यों शहीद हो जाना चाहता है, क्या इसके पीछे छिपे मकसद को बताना होगा? एक मिनट में डेढ़ सौबुलेट दागनेवाली एके-४७ का इस्तेमाल आखिर किस लक्ष्य के लिए होता है ? हमें तो यह पता है कि इससे निकलेवाली गोलियां जान बचाती नहीं, जान लेती हैं. तरूण जी जितना आपको खाकी पैण्ट और लाठीधारियों से परहेज है उतना ही हमें भी है. छह इंच का चाकूनुमात्रिशूल बांटनेवाले बजरंगदलियों से घृणा होती है, फिर एक-४७ लेकर देहाद का इरादा रखनेवाले हमारीनजर में मासूम कैसे हो सकते हैं? "काफिर भारत" को नेस्तनाबूत कर देने की प्रतिज्ञा लेनेवाले लादेनऔर तालिबान जिनके आदर्श हों उन्हें किन मानदंडों पर आप राष्ट्रवादी साबित करेंगे? आपकी यह रिपोर्ट बहुत सारे उर्दू अखबारों ने अपने यहां छापी है. निश्चित रूप से जो सिमी को इस्लाम का सच्चा खिदमतगार मानते हैं उन्हें आपकी रिपोर्ट से बहुत बल मिला है. लेकिन आपकी इस रिपोर्ट से उन मुट्ठीभर मुस्लिम बुद्धिजीवियों को जरूर धक्का लगेगा जो सिमी की देशविरोधी गतिविधियों से अपने संप्रदाय को सचेत करते रहे हैं. काश तहलका सिमी के मुखौटे के पीछे की असली सच्चाई सामने लाने की कोशिश की होती....

आभार,
साजिद राशिद
(साजिद राशिद संजीदा पत्रकार हैं और जनसत्ता में नियमित कालम लिखते हैं.)

टिप्पणी- ये पत्र तहलका हिंदी पाक्षिक में छपे एक लेख- आतंक के मोहरे या बलि के बकरे, लेख पर छपी से प्रतिक्रिया के लिया गया है. इसका कोई व्यवसायिक उद्देश्य नहीं, साथ ही, ब्लॉग स्वामी ने अपनी को ओर इस लेख में एक शब्द भी नहीं जोड़ा है.

बुधवार, 22 अक्टूबर 2008

चंद्रयान तुझे सलाम

भारत ने स्वदेशी प्रक्षेपणयान पीएसएलवी-सी-11 से चंद्रयान-1 को चंद्रमा की कक्षा में स्थापित कर दिया. इसकेसाथ ही भारत दुनिया के उन छह चुनिंदा देशों की कतार में शामिल हो गया है, जिनके पास इतनी उच्च तकनीक है. चंद्रयान-1 पर करीब 385 करोड़ रुपये का खर्च आया है. लेकिन इससे जो फायदा हो गया वह काफी बड़ा है. वो येकि अगर हम अपने मिशन आगे बढ़ते रहे तो चांद जब आबाद होगा तो हमारी दावेदारी भी बढ़ेगी साथ ही उसकेसंसाधन पर हमारा भी बढ़-चढ़कर दावा होगा.
चंद्रयान-1 चंद्रमा की सतह पर मौजूद हीलियम-3 की मात्रा का पता लगाएगा. एक अनुमान के मुताबिक चंद्रमा परकरीब दस लाख टन हीलियम है, जबकि पृथ्वी पर महज 200 किलोग्राम.
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की कुल ऊर्जा जरूरतों को पूरी करने के लिए हरसाल महज डेढ़ टन हीलियम कीजरूरत है. अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा का कहना है कि उसे अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरी कहने के लिए हरसालमहज एक यान हीलियम की जरूरत होगी.
सबसे बड़ी बात है कि हीलियम निरापद है. यह यूरेनियम की तरह हानिकारक कचड़ा पैदा नहीं करता है. इसउपोत्पाद(बाय-प्रोडक्ट) पानी, नाइट्रोजन, हाइड्रोजन और मिथेन के रूप में निकलता है जो चांद पर जीवन और बस्ती बसाने के लिए उपयोगी साबित होगा.
फायदे का यह एक पहलू है. इसी तरह इसके बहुत सारे फायदे होंगे.

सोमवार, 20 अक्टूबर 2008

एक मुसलमान सौ बेईमान


सबसे पहले, दो घटनाओं का जिक्र करना चाहूंगा. पहली, कांग्रेस के मुस्लिम नेताओं ने शनिवार को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाकात कर उन्हें जामियानगर के बाटला हाउस मुठभेड़ कांड को लेकर अल्पसंख्यक समुदाय में उठ रही शंकाओं से अवगत कराया और इसे दूर करने के लिए तत्काल प्रभावी कदम उठाए जाने की मांग की. इस प्रतिनिधिमंडल में कांग्रेस महासचिव मोहसिना किदवई, पूर्व केंद्रीय मंत्री सी के जाफर शरीफ, सलमान खुर्शीद, राज्यसभा के उपसभापति के रहमान खान, अल्पसंख्यक विभाग के अध्यक्ष इमरान किदवई और अनीस दुर्रानी शामिल थे.

दूसरी घटना, देवबंद विचारधारा के संगठन जमीयत उलेमा--हिंद के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि शिवराज पाटिल के गृहमंत्री पद पर रहते दहशतगर्दी का खात्मा नामुमकिन है. मदनी ने केंद्र सरकार कटघरे में खड़ा करते हुए कहा कि आतंकवादी वारदातों के लिए गृहमंत्री मुसलमानों को कसूरवार मान रहे हैं. मदनी का यह तर्क गृहमंत्रालय के उस बयान पर आया है जिसमें मंत्रालय बार-बार दोहराता रहा है कि आतंकी वारदातों के पीछे अयोध्या में विवादित ढांचा तोड़े जाने और 2002 का गुजरात दंगा है.


योग्यता विस्तार- पहली घटना. दिल्ली बम धमाकों के बाद मीडिया ने टेप रिकॉर्डर छाप गृहमंत्री को पहले उनके बयानों, फिर उनके मॉडलिंग स्टाईल को लेकर खूब हंगामा किया. की मुखरता ने लामीडियालू जैसे सिमी समर्थकों की, कुछ देर के लिए ही सही, जुबान बंद करा दी. लालू आनन-फानन में प्रधानमंत्री के पास गए और गृहमंत्री की जमकर शिकायतें की. बाद में वे सोनिया से मिले. लेकिन सोनिया की विनम्रता भरी फटकार ने लालू को बयान बदलने के लिए मजबूर कर दिया. लालू, सोनिया के विनम्र फटकार पर निरुत्तर हो गए कि एक तरफ तो आप सिमी जैसे संगठनों के पक्ष में सार्वजनिक बयान देते हैं और जब बम विस्फोट होता है तो आप गृहमंत्री और खुफिया विभाग के ऊपर नाराजगी जताते हैं, ऐसा बिल्किल नहीं चलेगा.

सिमी पर साल 2006 में प्रतिबंध लगा था, तब तक लेकर हाल के दिनों तक केंद्र सरकार उसके विरूद्ध पर्याप्त सबूत कोर्ट में पेश नहीं कर सकी. इसलिए दिल्ली हाईकोर्ट के विशेष न्यायाधिकरण ने सबूतों के अभाव में सिमी पर से प्रतिबंध हटाने का निर्देश दिया.

इसके बाद, लालू, मुलायम और रामविलास पासवान के पर निकल आए. सबने सिमी के समर्थन में जोर-जोर से चिल्लाना शुरू कर दिया. उनका कहना था कि सिमी पर प्रतिबंध लगाया जाता है तो बजरंग दल, दुर्गावाहिनी और विश्व हिंदू परिषद पर भी प्रतिबंध लगे.

केंद्र सरकार ने अपने ही सहयोगियों के इस गैर-जिम्मेदाराना हरकत पर कुछ नहीं कहा, लेकिन वो तुरंत सुप्रीमकोर्ट पहुंचकर न्यायाधिकरण के आदेश पर रोक लगाने की अपील की और कोर्ट ने उसकी बात मान भी ली. बाद में केंद्र ने हाल के दिनों में हुए बम धमाकों में सिमी के हाथ होने का सबूत कोर्ट में पेश किया. फिलहाल सिमी पर प्रतिबंध जारी है. लेकिन लालू, मुलायम और रामविलास पासवान के बयान ने खुद केंद्र सरकार को कटघरे में ला खड़ा किया.

हाल के दिनों में अहमदाबाद, बैंगलोर और दिल्ली में बम धमाके हुए. केंद्रीय गृहमंत्री शिवराज पाटील के नरम रवैये पर सवाल उठे तो लालू यहां भी शामिल हो गए और सोनिया से फटकार सुनी.

बाटला हाउस मुठभेड़ पर पहले अमर सिंह, फिर ममता बनर्जी, फिर कांग्रेसी के मुस्लिम नेताओं ने सवाल उठाए और मामले की जांच की मांग की. इस मांग में रामविलास पासवान, सीपीएम महासचिव प्रकाश करात और सीपीआई महासचिव ए बी बर्धन शामिल हो गए.

सब का एक स्वर से कहना था कि निर्दोष मुसलमानों को निशाना बनाया गया. मुठभेड़ फर्जी थी. अमर सिंह ने तो यहां तक कह दिया कि शहीद एमसी शर्मा को स्पेशल सेल से निलंबित कर दिया गया था और वह बहाली के लिए दफ्तरों का चक्कर काट रहा है. अमर सिंह ने तो बेशर्मी की हद करते हुए कहा कि किसी पुलिस वाले ने ही उसे गोली मारी थी.

इतनी बेह्याई, इतनी निर्लज्जता, महज चंद वोटों के लिए.

महज चंद वोटो के लिए, पूरे मुस्लिम समाज को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की जा रही है. महज चंद वोटों के लिए ये लोग देश के साथ गद्दारी कर रहे हैं.

जब कभी आतंकवाद से लड़ने की बात आती है, आतंकवाद से लड़ने के लिए कानून बनाने की बात आती है, तो कहते हैं कि इस कानून का दुरूपयोग होगा. साफ-साफ कहते हैं कि अल्पसंख्यकों को परेशान किया जाएगा.

देश में किस चीज का दुरूपयोग नहीं होता है. विधायिका, न्यायिका, कार्यपालिका सबका दुरूपयोग होता है. पुलिस, जज, नेता खरीदे जाते है और बिकते हैं. तो क्या संसद, विधानसभाओं, अदालतों, पुलिस मुख्यालयों को भंग कर दिया जाय.

एक समुदाय जिसे कभी राष्ट्र की मुख्यधारा में एक साजिश के तहत शामिल नहीं होने दिया गया, कभी शाहबानो तो कभी अफजल के नाम पर मुसलमानों को ठगा जाता रहा है.

इनका वोट हासिल करने के लिए सभी राष्ट्र के साथ गद्दारी में जुटे हैं.

शनिवार, 18 अक्टूबर 2008

अनार्थिक क्रियाओं का अर्थशास्त्र

वैश्विक आर्थिक संकट पर काफी दिनों से कुछ लिखने का मन कर रहा था. आज मौका मिला और लिख मारा. भगवान बुद्ध ने कहा था, दुनिया दुखों से भरा, इस दुख के कारण है और इसका निवारण भी है.

ये वैश्विक आर्थिक संकट की घड़ी है. अकेले इस साल अमेरिका की बारह बड़ी वित्तीय संस्थाएं दिवालिया होने की घोषणा कर चुकी है. इसके अलावा, कम से कम छह कंपनियों ने खुद को दिवालियेपन से बचाने के लिए खुद को बेच दिया है. बुश प्रशासन ने भी माना कि अमेरिका 1930 के बाद से अब तक के सबसे बड़े वित्तीय संकट से गुजर रहा है. इस वित्तीय संकट से उबारने के लिए बुश प्रशासन ने अमेरिकी कांग्रेस से 700000000000 (सात खरब डॉलर) की आर्थिक सहायत मांगी, जिसे कांग्रेस ने काफी नानुकर के बाद स्वीकार कर लिया. इस पैकेज को बेल-आउट पैकेज(मुक्ति-राशि) कहा गया. न्यूयार्क टाइम्स में छपी खबरों के मुताबिक, इस आर्थिक संकट से उबारने के लिए,

  1. वित्तीय संस्थानों की स्वायत्तता और आत्मप्रबंधन के अधिकारों को कम करना.

  2. बैंको को सरकारी एजेंट के रूप में काम करना.

  3. बैंकों के करीब आधे शेयरों को सरकार द्वारा खरीदा जाना.

  4. लघुकालिक बिकवाली पर रोक.

  5. बैंकों का राष्ट्रीयकरण जैसे प्रावधान शामिल हैं.

सात खरब डॉलर के भारी भरकम पैकेज(यह राशि वियतनाम जैसे जैसे देशों के सकल घरेलू उत्पाद की दस गुनी है.) के बावजूद बाजार की हालत पतली है. बाजार अपनी पटरी पर नहीं लौट पाया है.

विश्व बैंक का कहना है कि वर्ष 2009 में आर्थिक संकट और भी गहरा सकता है.

उधर, यूरोपीय देशों में आर्थिक गहराया हुआ है. जर्मनी ने अपने बैंको को आर्थिक दिवालियेपन से बचाने के लिए बड़ी मुक्ति-राशि की घोषणा की. यूरोपीय संघ इस त्रासदी का हल ढूढने में नाकाम साबित हो रहा है. एशियाई बाजारों में भी मंदी के काले बादल छाए हुए हैं. तमाम एशियाई शेयर बाजारों का हाल खस्ता है. वे खुद को इस संकट से निकालने के लिए कोई रास्ता नहीं ढूढ़ पा रहे हैं.

भारतीय प्रधानमंत्री, वित्तमंत्री, योजना आयोग के उपाध्यक्ष और रिजर्व बैंक के गर्वनर बार बार लोगों को भरोसा दिला रहे हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत है. इसके बावजूद आमलोगों को बाजार पर भरोसा नहीं हो पा रहा है. लोग इतने परेशान हो गए हैं कि जिस शेयर बाजार में दुगुना-चौगुना मुनाफा कमाने के लिए धन लगाए थे, उस शेयर बाजार से एक चौथाई मूलधन निकाल रहे हैं. जनवरी महीने में बीएसई का संवेदी सूचकांक 21000 के करीब था वह इस सप्ताह दस हजार के मनोवैज्ञानिक स्तर से भी नीचे गिर गया है. यह और कितना नीचे जाएगा, कहा नहीं जा सकता है.

प्रधानमंत्री, वित्तमंत्री और योजना आयोग के उपाध्यक्ष(तीनों अर्थशास्त्री) समस्या को जितना कम करके आंक रहे हैं समस्या उससे कई गुना ज्यादा है. या तो वे लोगों को सही बताना नहीं चाहते या सही बात जानते नहीं. पिछले कई महीनों से महंगाई दर बारह प्रतिशत के इर्द-गिर्द घूम रही है. अर्थशास्त्र के तीनों दिग्गज इस समस्या को हल करना तो दूर इसे समझ तक नहीं पा रहे हैं.

कारण- आर्थिक संकट का कारण है- लालच. यावत जीवेत, सुखम जीवेत ऋणम कृत्वा घृतम पीबेत- चार्वाक का यह दर्शन अगर हर समय सही होता तो कोई वजह नहीं थी कि ऋषियों को संतोषं परमं सुखम का मंत्र सूझता.

अमेरिका में साल 2001 में रियल स्टेट (अचल संपत्ति) का बूम आया. साथ में लाया बैंकिंग सुधार. बैंकों को अधिक से अधिक स्वायत्तता दी गई. वित्तीय संस्थानों को आत्मप्रबंधन का निर्णय दिया गया. फिर क्या, बैंक बिना छान के घोड़े की तरह कूदने लगे. बैंक मनमाने तरीके से पैसे बांटने और वसूली करने लगे. बिना किसी औपचारिकता या वित्तीय स्थिति का आकलन किए बगैर लोगों को कर्ज दिया गया. कुछ समय तक यह दौर चला, लेकिन बूम जल्द बुलबुले की तरह फटने लगा. लोगों के पास इतना पैसा नहीं बचा कि वे बैंकों का कर्ज चुका पाते. बैंकों की हालत पतली होने लगे और दिवालिया घोषित करने के सिवा उनके पास कोई दूसरा चारा नहीं था.

सरकारी कामकाज और उसके प्रबंधन पर अट्टहास करने वालों की सारी हेकरी निकल गई और अब वे भी सरकारी नियंत्रण की दुहाई देने लगे. बड़ी-बड़ी कंपनियों के प्रबंधन का दिवाला निकल गया. प्रबंधन के बदौलत कुछ सालों में कई गुणा होने का दावा, महज मेहनत का नतीजा नहीं था, बल्कि इसके पीछे आम जनता को येन-केन-प्रकारेन लूटने और बेईमानी शामिल था.

भारत के संदर्भ में बात करें तो भारत सरकार भी अमेरिका की देखा-देखी आर्थिक सुधार- बैंकिंग सुधार की नीतियों को साफ साफ अपना लिया. बैंकों, बीमा कंपनियों और वित्तीय संस्थाओं को ज्यादा से ज्यादा स्वायत्तता और आत्मप्रबंधन की छूट दिए जाने की बात चलने लगी ताकि अर्थव्यवस्था दस क्या तीस प्रतिशत की दर से विकास करने लगे. आज सरकार का बाजार पर कहीं कोई नियंत्रण नहीं रह गया है. कौन कंपनी किस दर पर अपना उत्पाद बेच रही है, उसका नियंता सिर्फ वह कंपनी है, सरकार नहीं. उपभोक्ता को यह जानने का अधिकार नहीं है कि वस्तु के उत्पादन का खर्च क्या है. शायद यह उत्पादन खर्च सरकार भी नहीं जानती...

शेष द्वितीय भाग में....

गुरुवार, 16 अक्टूबर 2008

पोप का पाप- जलता हिंदुस्तान

मूल लेखक- एल आर फ्रांसिस, अध्यक्ष, पुअर क्रिश्चियन लिबरेशन फ्रंट (francispclm@yahoo.com)
साभार- विस्फोट

चर्च पर हिन्दू चरमपंथियों द्वारा हमला तो खबर बनती है लेकिन यह खबर कभी क्यों नहीं बनती कि चर्च के अंदर कितना शोषण, अत्याचार और दमन हो रहा है. चर्च संगठन अपने ही कर्मचारियों का शोषण करते हैं, नन्स और पादरी की संदेहास्पद हत्याओं के मामले भी प्रकाश में आये हैं, जिनमें चर्च प्रशासन से जुड़े लोग ही शामिल पाये गये हैं, फिर भी हमारा प्रबुद्ध समाज चर्च संगठनों के बीच फैली इन कुरीतियों के बारे में कभी अपनी जबान नहीं खोलता.

पिछले दिनों चर्चों से जुड़ी ऐसी कई घटनांए सामने आई हैं जिन्हें साप्रदायिकता की श्रेणी में रखा जा रहा है। अभी हाल ही में रतलाम (मध्य प्रदेश) की रेलवे कंलोनी में स्थित 85 वर्ष पुराने चर्च में आग लगा दी गई। इस घटना को सीधे हिन्दु संगठनों से जोड़ा गया। मामला तुंरत अतंराष्ट्रीय स्तर तक पंहुचाया गया। चर्च अधिकारियों और उनके विदेशी आकाओं की भकुटियां तन गई। बाद में पता चला कि उक्त घटना की तह में था उसी चर्च का चौकीदार था- नोयल पारे. नोयल पारे ने आक्रोशवश ही चर्च में आग लगाई थी।

चर्च की 86वीं वशZगांठ मनाई जाने वाली थी। बड़े समारोह की तैयारियॉ थी। किंतु उस चर्च के चौकीदार पर आठ हजार का कर्ज था। कर्ज था बनियों का। जिनसे वह पेट भरने के लिये जरुरी नून-तेल उधार लेता था। चर्च प्रशासन उसे मात्र 1000 रुपए मासिक वेतन देता था। कितना बड़ा अंतर है सरकारी नियमों में न्यूनतम मजदूरी को लेकर और चर्च प्रषासन द्वारा दी जाने वाली मजदूरी के बीच. देश की राजधानी दिल्ली में ही चर्च द्वारा चलाये जाने वाले अधिक्तर संस्थानों में भी ऐसा ही हाल है, सरकारी आदेश पोप पोषित धर्मराज्य के प्रशासकों के ठेंगे पर होते है। चर्च का गुलाम कर्मचारी 24 घंटे काम करके एक हजार रुपए महीना अर्थात 33 रुपए प्रतिदिन, ऐसी स्थिति में -क्रिया की प्रतिक्रिया - शोषण का परिणाम आक्रोश तो होगा ही. आक्रोशवश ऐसा कर्मचारी कुछ भी कर सकता है। हत्या या आत्महत्या या फिर तोड़फोड़ मारपीट अगजनी इत्यादि या चोरी चकारी, लूटपाट कुछ भी।

कुछ वर्ष पूर्व मध्य प्रदेश के ही झाबुआ में कान्वेंट की ननों (धर्म-बहनों) पर सामूहिक हमला व बलात्कार का मामला भी खूब उछाला गया। लेकिन उस समय भी बात वहीं थी बंदर की बला तबेले के सिर. हिन्दू संगठन ही बदनाम किये गये। इस मामले में भी झाबुआ के धर्मांतरित ईसाइयों का आक्रोश ही था। मलयाली-दक्षिण भारतीय ननें बनाम आदिवासी ईसाई. यहां रतलाम में चर्च जलाने की जिस घटना का जिक्र किया जा रहा है उसके मूल में भी मलयाली चर्च प्रशासन पादरी जोस मैथ्यू (मलयाली) बनाम नोयल पारे (स्थानीय मराठी मूल का आदिवासी) है. हाल ही में बिजनौर -उतर प्रदेश की एक स्थानीय अदालत ने `संत मेरी स्कूल´ की नन प्रमिला की 5 नवंबर 2007 को हुई हत्या के मामले में स्कूल के चौकीदार जॉन को उम्रकैद की सजा सुनाई है। कुछ दिन पूर्व उतराखंड के रामपुर में एक कैथोलिक पादरी एवं उसकी नौकरानी की हत्या के मामले में भी उक्त आश्रम से जुड़े कुछ लोग पकड़े गये है। आजकल उड़ीसा में एक नन के साथ हुये बलात्कार का मामला राष्ट्रीय एवं अतंरराष्ट्रीय समाचार पत्रों में छाया हुआ है.उड़ीसा पुलिस ने संदेह के आधार पर चार लोगों को हिरासत में लिया है. पीड़ित नन चर्च अधिकारियों के संरक्षण में अज्ञातवास में चली गई है. चर्च अधिकारियों के मुताबिक पीड़िता को सही समय पर सामने लाया जायेगा। किसी भी महिला के साथ बलात्कार एक घिनौना अपराध है. बलात्कारी शरीर ही नहीं पीड़िता की आत्मा की भी हत्या कर देता है. ऐसा अपराधी कोई भी हो उसे क्षमा नहीं किया जाना चाहिए परन्तु उड़ीसा मामले को लेकर कुछ चर्च अधिकारियों पर ही अगुंली उठ रही है. ऐसे में यह जरूरी है कि सच लोगों के सामने लाया जाना चाहिए।


मलयाली मूल और मंगलूर - कर्नाटक -गोवा पुर्तगाली मूल के धर्माचार्यों द्वारा भारत के ईसाई चर्च एवं अन्य संस्थान संचालित हो रहे है। भारत की स्वतंत्रता के बाद जब विदेशी मिशनरी अपने मूल देशों की और लौटे तो भारत की ईसाई संपदा चल और अचल पूंजी पर इन्हीं दक्षिण भारतीय पादरियों -बिशपों का एकाधिकार हो गया जो आज तक बना हुआ है। शेष ईसाई तो मात्र शासित और शोषित रुप में चर्च के सदस्य है.यहीं नहीं उड़ीसा में जो हो रहा है उसमें भी मलयाली मिशनरियों का बड़ा हाथ है। कटक के आर्च बिशप राइट रेव्हण रिफेल चीनथ भी मलयाली ही है। वहां इनकी गलतियों की सजा गरीब एवं सीधे साधे धर्मांतरित वंचितों को मिली। छल, फरेब, धोखाधड़ी के बलबूते अपने साम्राज्य का विस्तार करते `पोप पोषित´ यह मिशनरी हिन्दू दलितों को मतांतरित करने के बाद भी सरकारी दस्तावेजों में हिन्दू रहने के लिए प्रेरित करते है, ताकि वह इन से नहीं सरकार से अपने अधिकारों के लिए लड़ते रहे और इनकी धर्मांतरण की दुकान बिना किसी रोक-टोक के चलती रहे।

इन्हें वंचितों एवं आदिवासियों के प्रति कितनी सहनाभूति है यह उड़ीसा के कंधमाल और कर्नाटक में हुए कुछ चर्चों पर हमलों के दौरान विरोध करने के तरीके से भी समझा जा सकता है। जहां उड़ीसा के मामले में कैथोलिक चर्च अधिकारी एक औपचारिकता निभाते दिखाई दिये वहीं मंगलूर में हुई घटनाओं के बाद उन्होंने आसमान सिर पर उठा लिया। अंग्रेंजी अखबारों में दो-दो पेज तक की खबरे आनी शुरू हुई। चर्च अधिकारी और उनके राजनीतिक समर्थक ऐसे सक्रिय हुए मानों कर्नाटक में `ईसाइयत´ समाप्त होने को हो। चर्च अधिकारियों की सक्रियता और उग्र तेवरों को देखते हुए कर्नाटक के मुख्यमंत्री तुरंत मंगलूर डायसिस के बिषप के यहां सफाई देने वैसे ही पुहचें जैसे राजग के शासनकाल में केन्द्र सरकार अपनी सफाई देती थी। मंगलूर की घटनाओं के बाद चर्च अधिकारियों का उग्र होना स्भाविक था क्योंकि एक तरह से वह चर्च का मिनी वैटिकन जो ठहरा। यदि मराठियों,असामियों, बगालियों, पंजाबियों आदि को अपने अस्तित्व की चिन्ता सता सकती है तो उड़ीसा के मूल निवासियों को भी अपने अस्तित्व की रक्षा की चिन्ता होना स्भाविक है।

मलयाली मूल और मंगलूर - कर्नाटक -गोवा पुर्तगाली मूल के धर्माचार्यों द्वारा भारत के ईसाई चर्च एवं अन्य संस्थान संचालित हो रहे है। भारत की स्वतंत्रता के बाद जब विदेशी मिशनरी अपने मूल देशों की और लौटे तो भारत की ईसाई संपदा चल और अचल पूंजी पर इन्हीं दक्षिण भारतीय पादरियों -बिशपों का एकाधिकार हो गया जो आज तक बना हुआ है। शेष ईसाई तो मात्र शासित और शोषित रुप में चर्च के सदस्य है। यह दक्षिण भारतीय पादरी - बिशप विदेशी मिशनरियों द्वारा छोड़ी गई अकूत सम्पति को अपने हाथ से निकलने न देने की फिराक में नित नयें हथकंडे अपनाते रहते है। यहां एक तथ्य और भी उल्लेखनीय है कि वास्कोडिगामा द्वारा छोड़े गये पुर्तगाली मूल के मिशनरियों के वंशज अब भी मंगलोरियन -गोअन - के रुप में उपस्थित है। उतर प्रदेश के नौ कैथोलिक डायसिसों आगरा, मेरठ, झॉसी, बिजनौर, इलाहाबाद, लखनाऊ, बनारस, गोरखपुर, बरेली - के बिशपों में से छ: बिशप पुर्तगाली मूल के है - शेष मलयाली (केरल) के है। अभी कुछ माह पूर्व केरल के आर्च बिशप ने केरल के ईसाइयों के नाम एक परिपत्र (फतवा) जारी किया था ``यह कि प्रत्येक दम्पती को चाहिये कि वे `अधिक से अधिक´ संतान उत्पन्न करें. आशय यही था कि चर्च संपदा को हथियाये रखने के लिए केरल के कर्णधारों की अवश्यकता है।

चर्च अधिकारी आज विभिन्न तरीकों से अथाह दौलत कमा रहे हैं. उनका पूरा व्यावसाय इस देश के करोड़ों वंचितों के नाम पर चल रहा है। भारत सरकार का वार्षिक बजट तो आय-व्याय के साथ घाटे के बजट के रुप में जुड़ा होता है मगर इनके घाटे का तो सवाल ही नहीं और साथ ही धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों के हित्तों की रक्षा का भार भारत की सरकार पर जिसके तहत इटली की सरकार और वैटिकन भारत के राजदूत को बुलाकर डांट लगाती है। यहीं कारण है कि चर्च अधिकारियों द्वारा शोषित आम ईसाई अनाथ सा विक्षिप्तावस्था में जा पहुंचा है जिसका भविष्य आक्रोश और विरोध की नींव पर खड़ा है.

नोट- ब्लॉग संचालक ने एक भी शब्द अपनी ओर से नहीं जोड़ा है.

रविवार, 12 अक्टूबर 2008

मुझे गर्व है कि मैं हिंदू हूं.

मैंने वो लेख एक प्रतिक्रिया में लिखी थी.
मैं सर्वश्रेष्ठ रहकर भी किसी को अपने से नीचा नहीं देखना चाहता हूं.
हिंदू धर्म सर्वश्रेष्ठ है, लेकिन ना तो मुस्लिम ना तो ईसाई धर्म इससे कमतर है.
हिंदू धर्म ने हमें यहीं श्रेष्ठता सिखलाई है.
जहां तक मैं हिंदू धर्म को समझ सका हूं, जान सका हूं.
मैं कोई, ज्ञानी-ध्यानी, तपस्वी-योगी नहीं हूं.
तब भी मैं दावा कर सकता हूं कि मैं हिंदू धर्म के मर्म को समझता हूं.
अच्छी तरह समझता हूं.
तुलसी की झाड़ स्वास्थ्यवर्द्धक है, तो किसी ने इसे धर्म से जोड़कर पूजनीय बना है.
न्याय के खिलाफ आवाज उठाना सही है तो कृष्ण ने पार्थ से कहा यही तुम्हारा धर्म है.
मैं गंदे नाली को साफ कर रहा था तो एक बुढिया ने कहा, बेटा, तुम धर्म का काम कर रहे हो.
एक हिंदू के रूप में मैं ग्लानि से भर जाता हूं जब कोई हिंदू किसी धर्म या उसके धर्माबलंवियों को गाली देता है या किसी अन्य धर्म को नीच दिखाने की कोशिश करता है.
क्योंकि ऐसा करना हिंदू धर्म को ही अपना करना है.
भारत में जब एक ओर संतोषं परमं सुखम का मंत्र पढ़ा जा रहा था तो चार्वाक ने कहा-
यावत जीवेत, सुखम जीवेत, ऋणम कृत्वा घृतम पिबेत.
और इस घोर भौतिकतावादी विचारधारा के प्रणेता चार्वाक को हमने ऋषि से सम्मानित किया.
चार वेद लिखे, काम नहीं चला, अठारह पुराण लिख लिए, काम नहीं चला, एक सौ आठ उपनिषद लिख लिए काम नहीं चला. स्मृतियां लिखी, रामायण लिखे, महाभारत लिखे, गीता लिखे, इनमें कौन है हिंदुओं का धर्मग्रंथ. सभी हैं और भी लिखते जाओ सबको शामिल कर लेंगे.
बाइबिल और कुरान को भी उतना ही सम्मान देंगे जितना गीता और रामायण को.
कौन को हिंदुओं के इष्टदेव, सुना था, हिंदुओं के पनपन करोड़ देवता हैं, अब बढ़कर एक बीस करोड़ के करीब हो गए हैं. पैगंबर और ईशुमसीह को भी इसमें शामिल कर लो, कोई बुराई नहीं.
कभी सप्तर्षि हुए, आज आचार्यों और ऋषियों की श्रृंखला काफी बड़ी हो गई है. अनगिनत हैं.
कितना विशाल है हिंदुधर्म.
इसलिए मेरे हिंदू होने पर मुझे गर्व है.
एक हिंदू के रूप में मुझे मुझे राम की स्तुति और राम की आलोचना दोनों सुनने की ताकत है.
सबसे बड़ी ताकत रामपर सवाल उठाने और चर्चा करने की मेरी स्वतंत्रता है.
यही वजह है कि मैं हिंदू धर्म को श्रेष्ठ मानता हूं, साथ ये भी कहता हूं कि और कोई दूसरा धर्म इससे हीन या कमतर नहीं है. श्रेष्ठ बनकर सबको श्रेष्ठ देखने की अभिलाषा हीं हिंदुत्व है.
हिंदूधर्म ने भगवान बुद्ध और महावीर को भी विष्णु का अवतार माना.
हर मत हर संप्रदाय को स्वीकारा, जो जिस रूप में आया, उसी रूप में.
यही मेरा हिंदुत्व है और इसलिए मैं हिंदू हूं. और मुझे अपने हिंदू होने का गौरव है.

एक मच्छर आदमी को हिजड़ा कैसे बना देता है..


एक मच्छर, साला एक मच्छर, आदमी को हिजड़ा बना देता है.
एक खटमल पूरी रात को अपाहिज कर देता है.
सुबह घर से निकलो, भीड़ का हिस्सा बनो.
शाम को घर जाओ, दारू पिओ, बच्चे पैदा करो और सुबह तलक फिर एकबार मर जाओ.
क्योंकि आत्मा और अंदर का इंसान मर चुका है, जीने के लिए घिनौने समझौते कर चुका है.
साला, एक मच्छर आदमी को हिजड़ा बना देता है.
ऊंची दुकान, फीका पकवान, खद्दर की लंगोटी, चांदी का पिकदान.
सौ में से अस्सी बेईमान, फिर भी मेरा देश महान.
टोपी लगाए मच्छर कहता है, देश की लोगों में समता की भावना रही है.
इसलिए तो बड़ी मछली छोटी को खा रही है.
हमारे चुने हुए कुत्ते हमें काटते है, हमारी ही बोटियां आपस में बांटते हैं.
अमानुष गंध से भरी इनकी आवाज से कांपते हैं.
कल पैदा हुए बच्चे एक सांस लेते हुए हांफते हैं.
शैतानों की नाजायज औलाद तहलका मचा रही है
और हम भगवान के चहेते जानवर इंसान, जीवन को गाली बनाए बैंठे हैं.
क्या करें, साला एक मच्छर आदमी को हिजड़ा बना देता है.
गिरो सालों, गिरो, गिरो, लेकिन गिरो तो उस झरने की तरह तो अपनी सुंदरता खोने नहीं देता.
जमीन के तह से भी मिलकर अपना अस्तित्व नष्ट नहीं होने देता.
लेकिन इतना सोचने के लिए, वक्त है किसके पास.
क्योंकि साला एक मच्छर आदमी को हिजड़ा बना देता है.
मंदिर-मस्जिद की लड़ाई में मर गए लाखों इंसान.
धर्म और मजहब के नाम पर हो गए लाखों कुर्बान.
जिसने अन्याय के विरोध में बाली को मारा, रावण को मौत के घात उतारा.
पुण्य को पाप से उबारा
आज मुझे उस राम की तलाश है.
लेकिन मुझे लगता है कि इस युग के राम को आजीवन वनवास है,
क्या करें, क्योंकि साला एक मच्छर आदमी को हिजड़ा बना देता है.
कभी शैतान आएंगे, मेरे दरवाजे पर दस्तक देंगे.
मेरे जेहन की तलाशी लेंगे, फिर चल उठेंगे.
उस वक्त मैं डरूंगा नहीं.
अपने विश्वास को ढाल, अंदर की आग को तलवार बनाऊंगा.
एक एक दिन तो तुम उस आग में कूदोगे.
करो, आज में बदनाम करो, नीलाम करो.
निलामी के लिए क्या है मेरे पास.
छलके हुए आंसुओं का एहसास.
मगर, मगर मैं तुम्हें बदला लूंगा.
तेरी आखिरी गोली पर, मेरे दो सांसों के बीच का ठहराव, तुम्हें फोकट में दूंगा

शनिवार, 11 अक्टूबर 2008

मैं हिंदू क्यों हूं

मैं घोषणा करता हूं कि मैं एक हिंदू हूं, हिंदू इसलिए कि यह हमें स्वतंत्रता देता है, हम चाहें जैसे जिए. हम चाहें ईश्वर को माने या ना माने. मंदिर जाएं या नहीं जाएं, हम शैव्य बने या शाक्त या वैष्णव. हम चाहे गीता का माने या रामायण को, चाहे बुद्ध या महावीर या महात्मा गांधी मेरे आदर्श हों, चाहे मनु को माने या चार्वाक को. यही एक धर्म है जो एक राजा को बुद्ध बनने देता है, एक राजा को महावीर, एक बनिया को महात्मा, एक मछुआरा को वेदव्यास. मुझे अभिमान है इस बात का कि मैं हिंदू हूं. लेकिन साथ ही मैं घोषणा करता हूं कि मुस्लिम धर्म और ईसाई धर्म भी मेरे लिए उतने ही आदरणीय हैं जितना हिंदू धर्म. पैगम्बर मोहम्मद और ईसा मसीह मेरे लिए उतने पूज्य हैं जितने कि राम. लेकिन मैं फिर कहना चाहूंगा कि मैं हिंदू हूं, क्योंकि हिंदू धर्म मुझे इसकी इजाजत देता है. अच्छे मुसलमान और ईसाई से मैं उतना ही प्रेम करता हूं जितना एक अच्छे हिंदू से. लेकिन एक बूरे हिंदू से मैं उतना ही दूर रहना चाहूंगा, जितना एक बूरे मुसलमान और ईसाई से. हिंदू धर्म कम से कम मुझे यही सिखाता है. इस सीख, इस समझ के लिए मैं आजीवन हिंदू धर्म का आभारी रहूंगा.
मेरा मंतव्य साफ है कि न तो सभी हिंदू बूरे और न ही सभी मुसलमान और ईसाई ही. लेकिन हमारे देश के नब्बे प्रतिशत नेता सिर्फ बूरे की श्रेणी में ही नहीं, गद्दार की श्रेणी में भी आते हैं. वे राष्ट्र द्रोही हैं और सत्ता के लिए देश को बेचने के लिए भी तैयार हैं.
इन नेताओं में ज्यादातर कांग्रेस पार्टी, कम्युनिष्ट पार्टी, समाजवादी पार्टी, लोक जनशक्तिपार्टी और राजद के नेता शामिल हैं.
धर्म-निरपेक्षता के नाम पर ये लोग अपना वोट बैंक बनाने में लगे रहते हैं.
मुसलमानों को मुख्यधारा की शिक्षा में शामिल नहीं कर उनके मदरसों के लिए फंड जारी करते हैं. वे नहीं चाहते हैं कि वे मुख्य धारा की शिक्षा में शामिल हों और देश का नागरिक बने. वे चाहते हैं कि वे सिर्फ उनका वोटबैंक बने रहें.
मुसलमानों को एक आम भारतीय नहीं मानकर, उनके लिए धर्म के आधार पर विशेष पैकेज जारी करते हैं.

शुक्रवार, 10 अक्टूबर 2008

स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती कौन थे.

Taken from my own blog- www.parindian.blogspot.com- which has been banned by the service provider accusing possible violation of service terms. I do not understand, accussing christianity is violation of service terms.
Kandhamal has been the headlines of the national as well as international media, but they failed to understand the root cause of the problem. Not only they failed to understand the real issue, but even they did not try to find out the fact. They are revolving around their self-made nucleus and casting their pseudo-secular thought. The majority of media houses, in India, either owned or promoted by churches or communists. So, they are no willing to see the problems of majority. our minority commission and human right commission understand the right of muslims and christians. they issue the notices and take stand human right violation done in Gujrat, Orissa and Karnatka. They remain deaf and blind in the matter of human right violence in Kashmir, Meghalay, Mizoram, Assam.
That's why I am writing about Swami Laxmanananda Saraswati, Who was brutually killed on 23of August of this year. No media taken a pain to find out the conspiracy in the killing of the octogenerian seer. I am talking about the media, who advance justice on the issue of Jessica Lal killing case, Rizban-ur-rahman killing case, BMW case and so on. Once Orissa goverment states (without any investigation), they understand, the government is telling truth. Rizban-ur-rahman is important for media, because he marries to a hindu girl. BMW is important, because Sanjeev Nanda, a VVIP son was involved in the case. Jessica Lal is important, because, she was page three celebrity, what is important for TRP. But what is in Swami Laxmanananda Saraswati. He did not came in the chorus of peudo-secular rhythm. Being a VHP leader made him untouchable in the secular media. For secular media, he was terrorist and should be prosecuted.
No matter, he dedicated his entire life in the the service of tribal people, in the betterment of the tribal society, in the upliftment of the downtrodden people of jungle. No matter, he was regarded as mother, father, mentor and guide of hundreds of people in the tribal area. No matter, tribal people treat him as God.
It's our pseudo-secular media, which imagine a character, make news, make pressure on police, courts and government, for which Laxmanananda was not even in its snippets. Its only because, Laxmanananda was the greatest barrier in the path of conversion. He taught hundreds of tribal children to stand their own feet. He taught hundreds of tribals to cultivate profitable crops. He helped them to live a better life, so that they need not the help of christian missionary and their go, who help only those who convert into the chritianity.
At the time of killing, 84 year old Laxmanananda, was engaged in educating the tribal students of the region. The region illiteracy and school dropout rate is very high. He managed to get them interested in studies. He managed to teach the tribal people the merits of multi-crop cultivation, animal husbandry and horticulture. This good-doer character made him the larger than life personality and respectable to everybody in the area. If anybody had any grievance, he used to be at his door in no time offering the solution and consolidation. He was like the patriarch of the area. He go huge popularity among tribals. He has a mass support base in the district for his social service. He became the ever greatest barrier in the path of conversion in the district. How could power blind church and missionary bear the person?
And at last, the obstacle has been removed with his associates. In no time Orissa goverment and police announced that naxalite had killed Swamiji. Police arrested the people involved in the violence and arsen, but failed to arrest even a single suspect killer of Swamiji. A large number of male were arrested, at last women and childred left to fight against the police. Sitation became grave due to the anger flowing out from women folk.
People also attacked media, accusing partiality in news coverage.

गुरुवार, 9 अक्टूबर 2008

कंधमाल क्यों जल रहा है.

मैने अँग्रेज़ी में एक ब्लॉग शुरू की थी. पहली पोस्ट के साथ ही स्पॅज़म ब्लॉगर का ठप्पा लग गया और कहा गया की बीस दिनों में आपका ब्लॉग मिटा दिया जाएगा. मिटने से पहले ब्लॉग के कॉन्टेंट को पद लीजिए.
Kandhmal became the name of burning and violence against Christianity. Even media never tried to investigate the root cause of the burning and violence. In the name of secularism(pseudo-secularism) media ever ignored and tried to manipulate the facts. In one hand, in India, largest number of people in the world are being killed in home grown terrorism, in the other hand, so called secular(pseudo-secular) Indian media and leaders are trying to justify the terrorism in the name of Hindu militancy. They are demanding ban on these Hindu organizations. Let leave the vote-centric leaders, our media, as if, are working for the christianity, not for whole society. they are working for ban on the Hindu organizations. Once again, they do not want to know the root cause of the kandhmal violence. Here, let us try to investigate the root cause of the violence in kandhamal-
1. Cast Conflict vs communal violence- During the recent foreign visit of Prime Minister Dr Manmohan Singh, the kandhamal became the international issue. International fraternity complained Dr Manmohan Singh and Mr. Singh asked Orissa government to restore peace in the region. Some of our television channels termed the Kandhmal violence as International Shame. Before this, our same Prime Minister termed the violence as National same.
Kandhamal is burnig for a longtime. Why Kandhamal is burning? Is it communal issue. Our ruler and their suppoters and even media projected the issue as communal violence. Each of them ignored the origin of the problem. some of them, do not know the problem and some of them do not want to know the problem. The orissa government is criticised by the pseudo-seculars media and leaders, but the goverment failed to reply properly. The goverment always said the main reason of the violence is the murder of Swami Laxmanananda Saraswati.
The continued exploitation of the kandh tribe in the region is the main cause of the violence. The kandh tribes have been opposing their right being enjoyed by the exploiters, mainly the converted christians, panna. The killing of Swami Laxmanananda Saraswati and his associates in his own Ashram made the sitation worse. kandh tribals constitute nearly 53 percent of the kandhamal districts total population. Kandh tribal are angry as their genuine and constitutional rights of reservations are being exploited by the exploiters, the converted panna christians.
The cast conflict started in the last decade of the last century. the conflict is between kandh-the scheduled tribe and the panna scheduled cast. since last two decades, panna(SC) have been accused by kandh tribal(ST) of grabbing the tribal land through illegal means taking andvantage of the innocence and the ignorance of the tribal people. The Kandh always have been opposing the demand of ST status to The panna(SC). Some of converted panna christian got ST Status and enjoying the rights of the tribal people. This is the root cause of discontent of the Kandh people.
2. Socio-Economic difference- The converted panna christian are economically and educationally far ahead than the other tribals because their church and missionary link. Once the panna work under kandh and now they are affuent. This socio-economic gap appeared as cast conflict and target is panna-the converted christian, so some people name it as communal violence.