हिंदी शोध संसार

सोमवार, 30 मई 2011

कालेधन पर सरकार दबाव में





स्वामी रामदेव
विदेशों और देश में जमा कालेधन पर योगगुरु स्वामी रामदेव और अन्ना हजारे के नेतृत्व में इंडिया अगेनस्ट करप्शन की मुहिम रंग लाती दिख रही है। योगगुरु स्वामी रामदेव के देशव्यापी आंदोलन से सरकार जबरदस्त दबाव में है। अपनी जिम्मेदारियों के बचने, लोगों को गुमराह करने, तथ्यों को छुपाने, सत्य को नकारने की सरकार की चालाकी बेधार सी होती दिख रही है। हालांकि हो सकता है कि सरकार की वर्तमान कार्रवाई भी उसी चालाकी का हिस्सा हो, मगर इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि सरकार जबरदस्त दबाव में है और उसे चालाकी का तरीका भी बदलना पड़ रहा है। कालेधन के मुद्दे पर केंद्र की पूरी

रविवार, 29 मई 2011

सोनिया का एकाउंट स्वीस बैंक में- सुब्रह्मण्यम स्वामी का खुलासा

चंडीगढ़. ‘सोनिया गांधी ऐसी विषकन्या है जो देश को धीरे-धीरे खा रही हैं। उनका एक लाख करोड़ विदेश में जमा है। ये कहां और किस बैंक में है, मुझे पता है। स्विट्जरलैंड के नियमों के मुताबिक अगर सरकार ऐलान कर दे कि इस अकाउंट में जमा पैसे का राष्ट्रीयकरण कर दिया जाए तो ये पैसा भारत को मिल सकता है। लेकिन केंद्र की सत्तारूढ़ सरकार ऐसा नहीं करेगी।’ सोनिया गांधी पर ये गंभीर आरोप लगाए जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष सुब्रमण्यम स्वामी ने।
लॉ भवन, सेक्टर 37 में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की ओर से ‘भ्रष्टाचार के विरुद्ध निर्णायक युद्ध’ विषय पर आयोजित विचार गोष्ठी में स्वामी बतौर मुख्य अतिथि मौजूद थे। उन्होंने कहा कि सोनिया गांधी केंद्रीय रक्षा मंत्री पर फ्रांस से जहाज खरीदने के लिए दबाव बना रही हैं। सिर्फ इसलिए कि फ्रांस के राष्ट्रपति की पत्नी भी इटेलियन हैं। यह मामला भी बोफोर्स घोटाले से कम नहीं है।
उन्होंने कहा कि विदेशी बैंकों में जमा पूंजी वापस लाने के लिए केंद्र सरकार को बदलना जरूरी है। उन्होंने कहा, ‘यूपीए सरकार आम आदमी के साथ होने का दावा करती है जबकि सच्चाई यह है कि देश की 70 फीसदी पूंजी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से विलासिता के प्रोडक्ट बनाने में लगी है। इस देश में भ्रष्टाचार का समाधान हिंदुत्व और सनातन धर्म को बढ़ावा देने से ही संभव है। धर्म ही हमें अच्छे और गलत की समझ और भ्रष्टाचार से दूर रहने की सीख देता है।’
साथ ही उन्होंने कहा कि इमरजेंसी के दौरान सरकार के पास शक्ति होने की वजह से लोगों का संघर्ष कामयाब होने पर संदेह था। लेकिन लोगों का काफी समर्थन मिला और इसके बाद हुए लोकसभा चुनाव में भी संघर्ष को काफी मजबूती मिली। उसी प्रकार अब भी भ्रष्टाचार के खिलाफ वैसा ही समर्थन मिल रहा है।
स्वामी ने पीएम मनमोहन सिंह को बिना रीढ़ की हड्डी का व्यक्तिबताते हुए कहा कि मनमोहन सिंह की नजर में तो सोनिया जी और राहुल जी ही 2जी हैं। पी. चिदंबरम और राहुल गांधी के उस बयान की भी उन्होंने निंदा कि जिसमें हिंदू आतंकवाद को लश्कर-ए-तैयबा से भी खतरनाक बताया गया। उन्होंने कहा कि हिंदू नाम से इतनी नफरत इस देश में बर्दाश्त नहीं की जा सकती।


सौ- दैनिक भास्कर




कांग्रेस रे कांग्रेस तेरा जवाब नहीं


कांग्रेस के पंचस्तंभ
सचमुच कांग्रेस का कोई जवाब नहीं है। सत्ता के लिए ये कुछ भी कर सकती है। देश को जाति-धर्म के नाम पर टुकड़ों में बांट सकती है। अपने विरोधियों को कुचल सकती है। उन्हें सलाखों के अंदर डलवा सकती है। अपने विरोध में चलाए जा रहे आंदोलन को हर हाल में दबा सकती है। विरोधियों को पनपने नहीं दे सकती है। अपने स्वामी भक्तों से दूसरों के ऊपर कीचड़ उछला सकती है। मगर, त्याग की देवी सकती है कि कोई उनकी निष्ठा पर सवाल नहीं खड़ा करे। 
 
त्याग की देवी सोनिया गांधी
कांग्रेस के इतिहास को देखें तो आपको एक भी आरोप गलत नहीं लगेगा। कांग्रेस इसका खामियाजा भी भुगत चुकी है। मगर, अतीत से वो कुछ सीखने का नाम नहीं लेती है।
अयोग्य लोग गांधी-नेहरू परिवार का चमचागिरी करके ऊंचा पद और ऊंची प्रतिष्ठा पा लेते हैं। इसके लिए वो किसी हद तक गिर सकते हैं। सिब्ते रजी, बूटा सिंह, हंसराज भारद्वाज के उदाहरण किसी से छिपा हुआ नहीं है। कानून-संविधान के नाम पर संविधान की हत्या करते हैं। नियम कायदे के नाम पर नियम कायदे की धज्जियां उड़ाते हैं। लोकतंत्र के नाम पर लोकतंत्र का खून बहाने से नहीं चूकते हैं।
स्वामी रामदेव
हाल के दिनों में इसके कई उदाहरण देखने को मिले हैं। सबसे ताजा उदाहरण स्वामी रामदेव प्रकरण है। स्वामी रामदेव भ्रष्टाचार के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन चला रहे हैं। वो एक लाख किलोमीटर की देश यात्रा पूरी करने वाले हैं। चार जून से वो दिल्ली में आमरण अनशन शुरू करने वाले हैं। लेकिन कांग्रेस ने उनके आंदोलन को कुचलने की तैयारी शुरू कर दी है। कांग्रेस जयप्रकाश नारायण और अन्ना हजारे के आंदोलन को देख चुकी है। अन्ना हजारे के आंदोलन ने किस तरह इसे झुकने के लिए मजबूर कर दिया, यह किसी से छिपा हुआ नहीं है। अगर अन्ना के आंदोलन के स्वरूप और इसमें लोगों की भागीदारी के बारे में कांग्रेस को पता होता तो कांग्रेस उस आंदोलन को भी कुचल देती। मगर उसे उसकी व्यापकता के बारे में पता नहीं था। उसवक्त कांग्रेस का खुफिया ढांचा कमजोर पड़ गया और वो उसे समझने में नाकाम रही। वो समझ रहे थे कि निर्बल से लगने वाले सामाजिक कार्यकर्ता अरविंद केजरीवाल, कांग्रेस की भ्रष्ट और बेईमान राजनीति का शिकार बनी किरण बेदी, सुप्रीमकोर्ट के वकील प्रशांत भूषण आखिर कर ही क्या सकते हैं। उनके आंदोलन में कौन शामिल होगा। कौन मोमबत्तियां जलाएगा, कौन उपवास करेगा। कौन नारे लगाएगा। लेकिन, आंदोलन में अनाम अन्ना के शामिल होते ही आंदोलन ने राष्ट्रव्यापी रूप ले लिया। आखिर आंदोलनकारियों के सामने सरकार को झुकना पड़ा। बेमोल बिकने वाले चमचे जहां-तहां कहते नजर आए कि जो अन्ना चाहते हैं वही सरकार भी चाहती है। अगर सरकार भी यही चाहती है तो वो डफली क्यों बजाती फिर रही है। लुटेरे देश लूट रहे हैं और कांग्रेस पूरी सत्ता और शक्ति के साथ लुटेरों की मदद कर रही है।
तो बात कर रहे थे बाबा रामदेव की। रामदेव 4 जून से नई दिल्ली के रामलीला मैदान में अनशन शुरू करने वाले हैं। बाबा रामदेव के आंदोलन से कांग्रेस पूरी तरह डर चुकी है। कांग्रेस को खूब पता है कि बाबा रामदेव कितना बड़ा आंदोलन खड़ा सकते हैं। देश को करोड़ों लोग बाबा रामदेव के एक आह्वान पर उनके साथ आंदोलन में कूद सकते हैं। कांग्रेस पूरी तरह डर चुकी है। उसने प्रशासनिक तौर पर मीडिया में खबर दे दी कि रामलीला मैदान में चार तारीख को ज्यादा से ज्यादा दस हजार लोगों को ही इकट्ठा होने की अनुमति है। बाबा यहां सिर्फ योग शिविर चला सकते हैं। बाबा यहां कोई राजनीतिक आंदोलन नहीं कर सकते हैं। उपवास और अनशन नहीं कर सकते हैं।
मध्यप्रदेश में राजनीतिक बाजी हार चुके और राजनीति से संन्यास लेने की घोषणा कर चुके कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह बार-बार बाबा रामदेव को धमकी दे रहे हैं कि अगर बाबा आंदोलन छेड़ते हैं तो सरकार उनके खिलाफ जांच बैठा देगी। सरकार उनके खिलाफ सीबीआई, प्रवर्तन निदेशालय, आयकर विभाग.. आदि आदि एजेंसियों को लगा लेगी। दिग्विजय सिंह के बाद कल कांग्रेस सांसद संजय निरूपम ने भी इसी अंदाज में बाबा को धमकी दी। कहा, बाबा बाबागिरी करे, योग सिखायें तो ठीक है मगर राजनीति में कूदेंगे तो बदनामी के छींटे उनके ऊपर भी पड़ेंगे। निरूपम ने भी बाबा को धमकी डे डाली कि अगर बाबा आंदोलन खड़ा करते हैं तो सरकार उनकी संपत्ति की जांच कराएंगी।
ये सिर्फ धमकी नहीं, बल्कि एक प्रकार का ब्लैकमेलिंग है।
अगर बाबा ने गलत तरीके से धन जमा किया है तो बाबा की संपत्ति की जांच पहले भी की जा सकती है। संपत्ति की जांच के लिए बाबा के आंदोलन की प्रतीक्षा क्यों की जा रही है। क्या ये ब्लैकमेलिंग नहीं है। तुम आंदोलन छोड़ो, मैं तुम्हें भ्रष्टाचार करने की छूट दूंगा। तुम आंदोलन करते हो तो मैं तुम्हें जेल भेजवाऊंगा। तुम्हें बदनाम करूंगा। तुम्हें जलील करूगा।
बाबा राजनीति में कूदते हैं तो उनकी संपत्ति की जांच होगी। क्या सरकार उस हर व्यक्ति की संपत्ति की जांच कराती है जो राजनीति में कूदता है। अगर हां तो राजनेताओं के पास करोड़ों की संपत्ति है वो कहां से आए। क्या राजनीति में आने से पहले कमाया है या राजनीति में आने के बाद। उनके संपत्तियों की जांच क्यों नहीं होती। क्योंकि मुलायम सिंह यादव, लालूप्रसाद यादव, मायावती के खिलाफ सीबीआई दो बार आगे और तीन बार पीछे होती है। क्यों नहीं इनकी संपत्ति की जांच होती है। क्यों चारा घोटाले के बाद भी लालू यूपीए सरकार में रेलमंत्री बन जाते हैं। क्योंकि मुलायम और माया वक्त-बे-वक्त यूपीए के समर्थन में पत्ते खोले बैठे रहते हैं। ये बात किसी से भी छिपी हुई नहीं है।
लोकपाल विधेयक ड्राफ्टिंग समिति के सह-अध्यक्ष शांति भूषण और प्रशांत भूषण के खिलाफ क्यों फर्जी सीडी बनाई जाती है। क्यों दिग्विजय सिंह उस सीडी के बचाव में आ खड़े होते हैं।
कथित त्याग की देवी सोनिया गांधी क्यों नहीं अपने चमचों की जुबान पर ताला लगाती है। क्यों उन्हें अनर्गल वार्तालाप करने देती है। दरअसल, इन जुबानों की निर्माता-निर्देशक सोनिया अम्मा ही है। उन्हीं के रिमोट कंट्रोल से ही ये अपने ट्यून बनते हैं। मगर, जब इनसे कोई पूछता है तो कहती हैं तो कोई उनकी निष्ठा पर सवाल ही नहीं उठाए। अगर नजर देश से इतर देश की सत्ता पर ही हो तो सवाल उठेंगे ही।
रामदेव आंदोलन करेंगे और उनका आंदोलन सफल भी होगा। क्योंकि लुटेरों और उनको सह देने वालों पर लगाम लगना जरूरी है।
आखिर क्या वजह है कि कांग्रेस ने चालीस सालों तक देश पर शासन किया मगर, देश की अस्सी प्रतिशत जनता बीस रुपये से कम पर गुजारा करने के लिए मजबूर है और उसी देश में 25 अरब डॉलर की संपत्ति विदेशों में जमा करा चुका हसन अली, ए राजा मौज कर रहा है।
कपिल सिब्बल की धूर्त मुस्कुराहत क्या-क्या नहीं कह देती है। कपिल सिब्बल के पास इस सवाल का क्या जवाब है कि जब टूजी घोटाला हुआ ही नहीं, तो पूर्व दूरसंचार मंत्री ए राजा, डीएमके सांसद कन्नीमोझी, बेहुरा, बलवा जेल में क्यों हैं। आखिर इन लोगों को बचान के आरोप में उन्हें अपना पद क्यों नहीं छोड़ना चाहिए।
मगर त्याग की देवी सोनिया अम्मा ना तो दिग्विजय सिंह से सवाल पूछ सकती है और ना ही कपिल सिब्बल से.. क्योंकि देश में लोकतंत्र है और लोकतंत्र में सबको.. जो मन है जो कहने का अधिकार है। लूटने का अधिकार है। कांग्रेस को बचाने का अधिकार है। 
फिर भी सोनिया की निष्ठा पर सवाल मत उठाइए। क्योंकि वो त्याग की देवी है। उन्हें प्रधानमंत्री पद का त्याग किया है।

बुधवार, 11 मई 2011

गरीबी खत्म करने का सबसे अचूक तरीका, पेटेंट धारक- भारत सरकार

सरकार को पसंद नहीं है कि कोई हिंदुस्तान का कोई भी व्यक्ति गरीब रहे। प्रधानमंत्री, वित्तमंत्री, योजना आयोग इस तरह की मंशा अक्सर जताते रहे हैं। अक्सर दावा करते हैं कि उनकी सरकार आम आदमी की सरकार है और वो हिंदुस्तान के किसी भी व्यक्ति को गरीब देखना नहीं चाहती हैं। मजे की बात है कि यूपीए अध्यक्ष और हमारे देश में एकमात्र त्याग की प्रतिमा सोनिया भी यही चाहती हैं। यही वजह कि वो राष्ट्रीय सलाहकार परिषद यानी एनएसी पर गरीबी हटाओ का राग छेड़ रही हैं। उनकी मंडली के कुशल कारीगर और महान सामाजिक कार्यकर्ता की पदवी से विभूषित मान्यवर भी यही चाहते हैं कि देश में कोई भूखा नहीं रहे।

जब इतनी सारी महान हस्तियां चाहती हैं देश में कोई भूखा नहीं रहे, कोई गरीब न रहे आखिर ये सुनिश्चित करने के लिए प्रयास क्यों नहीं होंगे?

तो आपकी जानकारी के लिए बता कि स्वयंनिर्मित अलंकारों से विभूषित ये विद्वत मंडली और कार्य कुशल ये सुजान देश से गरीबी दूर करने के लिए दिनरात एक करके मेहनत कर रहे हैं। और इन्होंने अपनी मेहनत का नमूना सुप्रीमकोर्ट में पेश किया।

ये रिपोर्ट योजना आयोग है जो इन्होंने सुप्रीमकोर्ट में पेश किया है।
रिपोर्ट के मुताबिक, जो शहरी(शहर में रहने वाला व्यक्ति) एक महीने में 578 रुपये खर्च कर लेता है वो गरीब नहीं है। यानी अर्थात आप शहर में रह रहे हैं और हर रोज उन्नीस रुपये से ज्यादा खर्च करते हैं तो सरकार आपको गरीब नहीं मानती है। जब आप गरीब नहीं हैं तो आपको गरीबों को मिलने वाली सरकारी सुविधाएं और सब्सिडीज कैसे मिलेंगी।
समझ गए न। सरकार गरीब उन्मूलन के लिए कितना काम कर रही है। उसे हम गरीबों का कितना ख्याल है। वो गरीबों का कितना बड़ा हमदर्द है। वो आम आदमी की सरकार है।

योजना आयोग ने सुप्रीमकोर्ट में कहा है कि जो शहरी हर महीने रेंट और अन्य सुविधाओं पर इकतीस रुपये, शिक्षा पर अठारह रुपये, दवा-दारू पर पच्चीस रुपये और शाक-सब्जियों पर साढ़े छत्तीस रुपये खर्च कर लेता है वो खर्च कर लेता है.. वो गरीब नहीं है।
मदें                माहवारी खर्च        रोजाना खर्च

शाक-सब्जी          36.50                             1.22
नमक-मसाला        14.60                              0.49
ईंधन               70.40                              2.35
फल                8.20                                0.27
कपड़े               38.30                              1.28
शिक्षा              18.50                                0.62
खाद्य तेल           29                                    0.97
दाल               19.20                               0.64
अनाज             96.50                               3.22
चप्पल-जूते          6                                    0.20
चीनी               13.10                             0 .44
मनोरंजन            6.6                               0.22

गरीब बनने के लिए शाक-सब्जियों पर रोजाना 1.22 रुपये से कम, नमक-मसाले पर .49 से कम, ईंधन पर 2.35 से कम, फल पर .27 से कम, कपड़ों पर 1.28 से कम, शिक्षा पर 0.52 से कम, खाद्य तेल पर .097 से कम, दाल पर 0.64 से कम, अनाज पर 3.22 रुपये से कम, चीनी पर .44 से कम खर्च करिए और गरीबों को मिलने वाली सारी सुविधाओं और सब्सिडियों का लाभ उठाइए।

हां, और अगर आप ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं तो आपकी आमदनी मात्र पंद्रह रुपये होने चाहिए और आप गरीबी रेखा से ऊपर जाकर अमीरों की श्रेणी में आ जाएंगे और गरीबों को मिलने वाली सुविधा आपको कतई नहीं मिलेगी।

एक साल पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने देशवासियों से वादा किया था कि हमें पंद्रह साल दीजिए हम देश से गरीबी मिटा देंगे यानी देश में एक भी गरीब नहीं बचेगा।

सुप्रीमकोर्ट में योजना आयोग के बयान से आप आसानी से समझ सकते हैं प्रधानमंत्री ने ये दावा क्यों किया था। हमारे विनम्र, हिंदुस्तानी मीडिया सम्मानित साफ-सुथरे छवि वाले ईमानदार प्रधानमंत्री के पास गरीबी कम करने के लिए पुख्ता कार्ययोजना थी और इसका नमूना उनकी सरकार ने सुप्रीमकोर्ट में पेश किया।

लेकिन ताज्जुब की बात है कि इतने सारे तिकड़में के बावजूद देश के ग्रामीण क्षेत्र की 42 प्रतिशत और शहरी क्षेत्र की सत्ताइस प्रतिशत आबादी(योजना आयोग के आंकड़ों के मुताबिक- सच्चाई से शायद आप नावाकिफ नहीं होंगे) गरीबों की जिंदगी जीने के लिए मजबूर हैं।

हम आप ज्यादा नहीं जानते हैं लेकिन आम आदमी की सरकार आम आदमी के बारे में कितना जानती है, उसके बारे में कितना फिक्रमंद है। इस रिपोर्ट को देखकर इसका आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है।

आने वाले समय में देश में खाद्य सुरक्षा बिल आएगा। मगर किसके लिए सरकार को मालूम नहीं। क्योंकि उसकी नजर में इस देश में पंद्रह-बीस रुपये खर्च करने वाला व्यक्ति गरीब नहीं रह जाता है। सरकार जनता से जोंक की तरह पैसा की जगह खून चूसती है। मगर खर्च करने के समय उसे खर्च में कटौती नजर आती है।

बेशर्मी की प्रकाष्ठा तो ये कि केंद्र सरकार पंद्रह-बीस रुपये से कम वाले को गरीब मानती है। उसका ये भी कहना है कि अगर राज्य सरकार इससे ज्यादा आमदनी वाले को भी गरीब मानती है तो उसपर वो अपनी जेब से पैसा खर्च करे।

केंद्र सरकार गरीबी कम करने पर लगातार काम कर रही है। उसकी उस मशक्कत का ही नतीजा है कि ग्रामीण इलाको में महज 42 प्रतिशत लोग गरीब रह गए हैं। अब प्रधानमंत्री और उनके सिपहसलार ताल ठोंककर कह सकते हैं कि देखो मैंने कैसे गरीबी कम कर दिया।

राहुल गांधी को भारतीय होने में शर्म आती है क्योंकि उत्तरप्रदेश में किसानों पर गोली चली है और वो अनिश्चितकालीन धरने पर बैठ जाते हैं। उन्हें यहां शर्म नहीं आती है जब सरकार ये कहती है कि तुम बीस रुपये में खर्च चलाओ और एपीएल कहलाओ।