हिंदी शोध संसार

सोमवार, 9 फ़रवरी 2009

हिंदी क्यों हमारी राष्ट्रभाषा है?





ये सभी सरकारी जाल-स्थल हैं. इन जाल-स्थलों पर जाने से शायद आपका भी भ्रम दूर हो जाए(मेरा काफी पहले हो चुका है) कि हिंदी देश की राष्ट्रभाषा है. ये सभी जालपृष्ठ अंग्रेजी में हैं. जहां कहीं हिंदी में अनुवाद की कोशिश की गई(कितना भी अनुवाद कर लो मान्य अंग्रेजी ही होगा) वो अधकचरा से ज्यादा कुछ नहीं कहा जा सकता है. गैर-हिंदी भाषी राज्यों की बात ही छोड़ दीजिए(भारत सरकार की बात ही करना बेकार है, क्योंकि उसे तो हिंदी आती ही नहीं, अंग्रेजी बोलने, समझने में ही उसका मान सम्मान है, भले ही वोट मांगने के लिए वो हिंदी का सहारा लेती हो, पर उसे हिंदी बोलते हमेशा शर्म ही आती है.), हिंदी भाषी राज्यों के जालपृष्ठ भी अंग्रेजी में ही तैयार किए गए हैं, ताकि हिंदी-भाषी लोग इन सूचनाओं का उपयोग नहीं कर सके. हिंदी भाषी इन जालपृष्ठों को देखकर भारत सरकार को भले ही शर्म नहीं आ रही हो, लेकिन देश के एक नागरिक के रूप में मेरा सिर शर्म से झुक गया था. शायद भारत दुनिया का पहला देश होगा. जिसके बारे में आधिकारिक सूचनाएं उसकी राष्ट्रभाषा में मुहैया नहीं कराई जा रही हो.
भारत सरकार के ये जालस्थल एनआईसी यानी नेशनल इंफोर्मेशन सेंटर(राष्ट्रीय सूचना केंद्र) ने तैयार किए हैं. एनआईसी भारत सरकार को संजाल पर उपस्थिति दर्ज कराने का दावा करता है. लेकिन एनआईसी को शायद इस बात का पता नहीं है कि हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा(सैद्धांतिक रुप में ही सही) है. अगर वह जानता है तो वह अपनी तकनीक में काफी पीछे है. उस पर ये आरोप लगाया जा सकता है कि वह भारत सरकार के लिए हिंदी में कार्यस्थल तैयार नहीं कर सकता है. इस आरोप के जवाब में एनआईसी का जवाब हो सकता है कि जाल पर हिंदी में लिखने-पढ़ने में फॉट की समस्या है. लेकिन एनआईसी के इस जवाब में कोई दम नहीं है. क्योंकि अगर कंप्यूटर पर फॉंट की समस्या होती तो हिंदी में सात हजार से भी ज्यादा ब्लॉग नहीं होता. हिंदी में सैंकड़ों निजी साइट्स नहीं होतीं. कंप्यूटर पर हिंदी की जबरदस्त उपस्थिति ने एनआईसी के दावे को झुठला दिया है और ये बता दिया है कि एनआईसी अभी भी अपनी तकनीक में बहुत पीछे हैं. क्या एनआईसी यूनिकोड को नहीं जानता. हाल ही में, हैदराबाद की एक संस्था ने कहा कि लोग क्षेत्रीय भाषाओं में काम करना नहीं चाहते हैं. ये कितना हास्यापद है. अगर ऐसा होता तो हिंदी साइट्स और ब्लॉग की संख्या दिन-दूनी रात चौगुनी कैसे बढ़ती.
दरअसल, इसमें एनआईसी का भी ज्यादा दोष नहीं है और वह तो सरकार की नीतियों के अनुसार ही काम करती है. सरकारें नहीं चाहती है कि हिंदी सशक्त बने. कुछ महीने पहले, गृहमंत्रालय ने कहा था कि जो कंपनियां आंशिक रूप से भी हिंदी में काम करती हैं, वहां हिंदी अनिवार्य कर दिया जाएगा. सबको पता है कि छोटी बड़ी तमाम कंपनियां अपने उत्पादों को बेचने के लिए किसी न किसी रूप में हिंदी का प्रयोग करती हैं. अगर, इन कंपनियों में हिंदी लागू कर दिया जाए तो हिंदी की स्थिति सुधर सकती थी. लेकिन कुछ ही दिनों बाद ये रिपोर्ट को दबा दी गई. शिवराज पाटील चले गए, चिदंबरम आए. चिदंबरम को तो दो शब्द भी हिंदी नहीं आती. वो ठहरे अर्थशास्त्री. वो अर्थशास्र अंग्रेजी में पढ़े हैं, हिंदी को वो क्यों समझने लगे.

6 टिप्‍पणियां :

  1. सत्यजीत जी
    आपके लेख को पढ़कर बहुत अच्छा लगा , वास्तव में इन सभी जाल पृष्ठों अधिकारिक सूचनाओं इत्यादियों का हमारे देश में जिसकी रास्त्रभाषा हिन्दी हो अंग्रेजी में होना मस्तक शर्म से झुक जाता है, अभी भी वक़्त है की सरकार को तथा देशवासियों को जागरूक होना होगा की हिन्दी को किताबो की ही भाषा न बनाकर सही मायने में इसे राजभाषा की तरह कडाई से लागू करवाना होगा इसे आम लोगों की भाषा बनाना होगा अन्यथा बहुत देर हो जायेगी और हमारी आने वाली पीढी शायद अंग्रेजी को ही अपनी राष्ट्रभाषा न समझने लगे.

    सत्य नारायण प्रसाद,
    संबलपुर, ओडिशा

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  2. सत्यजीत जी
    आपके लेख को पढ़कर बहुत अच्छा लगा , वास्तव में इन सभी जाल पृष्ठों अधिकारिक सूचनाओं इत्यादियों का हमारे देश में जिसकी रास्त्रभाषा हिन्दी हो अंग्रेजी में होना मस्तक शर्म से झुक जाता है, अभी भी वक़्त है की सरकार को तथा देशवासियों को जागरूक होना होगा की हिन्दी को किताबो की ही भाषा न बनाकर सही मायने में इसे राजभाषा की तरह कडाई से लागू करवाना होगा इसे आम लोगों की भाषा बनाना होगा अन्यथा बहुत देर हो जायेगी और हमारी आने वाली पीढी शायद अंग्रेजी को ही अपनी राष्ट्रभाषा न समझने लगे.

    सत्य नारायण प्रसाद,
    संबलपुर, ओडिशा

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  3. सत्यजीत जी
    आपके लेख को पढ़कर बहुत अच्छा लगा , वास्तव में इन सभी जाल पृष्ठों अधिकारिक सूचनाओं इत्यादियों का हमारे देश में जिसकी रास्त्रभाषा हिन्दी हो अंग्रेजी में होना मस्तक शर्म से झुक जाता है, अभी भी वक़्त है की सरकार को तथा देशवासियों को जागरूक होना होगा की हिन्दी को किताबो की ही भाषा न बनाकर सही मायने में इसे राजभाषा की तरह कडाई से लागू करवाना होगा इसे आम लोगों की भाषा बनाना होगा अन्यथा बहुत देर हो जायेगी और हमारी आने वाली पीढी शायद अंग्रेजी को ही अपनी राष्ट्रभाषा न समझने लगे.

    सत्य नारायण प्रसाद,
    संबलपुर, ओडिशा

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  4. सत्यजीत जी
    आपके लेख को पढ़कर बहुत अच्छा लगा , वास्तव में इन सभी जाल पृष्ठों अधिकारिक सूचनाओं इत्यादियों का हमारे देश में जिसकी रास्त्रभाषा हिन्दी हो अंग्रेजी में होना मस्तक शर्म से झुक जाता है, अभी भी वक़्त है की सरकार को तथा देशवासियों को जागरूक होना होगा की हिन्दी को किताबो की ही भाषा न बनाकर सही मायने में इसे राजभाषा की तरह कडाई से लागू करवाना होगा इसे आम लोगों की भाषा बनाना होगा अन्यथा बहुत देर हो जायेगी और हमारी आने वाली पीढी शायद अंग्रेजी को ही अपनी राष्ट्रभाषा न समझने लगे.

    सत्य नारायण प्रसाद,
    संबलपुर, ओडिशा
    lion_goswami@aol.in

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  5. जहाँ तक मुझे पता है हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा नही है| हिन्दी का दर्जा वही है जो बाकी भाषाओं का है| संविधान में हिन्दी को भारत की ओफिसिअल भाषा बनाने पर कुछ भी नही है| अगर मैं ग़लत हूँ तो भूल सुधारें|

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  6. हिन्दी बस मात्र भाषा है.

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