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रविवार, 1 फ़रवरी 2009

ये धुआं-धुंआ क्यों है?

यानी श्रीलंका का सच
श्रीलंका में दशकों से जारी गृहयुद्ध की वजह जातीय पहचान और स्वयं को श्रेष्ठ दिखाने की होड़ है. जातीय पहचान की यह लड़ाई औपनिवेशिक काल से ही जारी है. इस लड़ाई की बीज औपनिवेशिक काल में ही बोई गई थी. बहुसंख्यक सिंहला और अल्पसंख्यक तमिलों के बीच पुरातात्विक स्थलों, पौराणिक नामों और इनका राजनीतिक उपयोग को लेकर खून बहता रहा है.
जातीय पहचान के प्रति आग्रह ईसाई मिशनरियों के श्रीलंका आगमन से ही शुरू होता है. उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में श्रीलंका में ज्यों ज्यों ईसाई मिशनरियों की गतिविधियां बढ़ी, अल्पसंख्यक तमिलों में भी धार्मिक, सांस्कृतिक और भाषाई पहचान का भाव जगने लगा और वह अभिव्यक्त भी होने लगा । अपनी पहचान बनाये रखने के लिए उन्होंने ईसाई मिशनरियों की तरह मंदिरों, स्कूलों का निर्माण, सभाओं का आयोजन और साहित्यों का प्रकाशन शुरू किया.
बात 1815 की है. ब्रिटन ने श्रीलंका पर कब्जा जमा लिया. प्रशासन का काम चलाने के लिए विधान परिषद का गठन हुआ. विधान परिषद में तीन यूरोपीय, एक सिंहला और एक तमिल को जगह मिली. साफ है कि सत्ता में सिंहलाओं और तमिलों को उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिला. सत्ता में उचित भागीदारी नहीं मिलने से दोनों ही समुदायों में असंतोष पैदा हुआ. बाद में अंग्रेजों ने इस असंतोष को हथियार के रूप में अपनाया. फूट डालो, राज करो की नीति के तहत जातीय विभाजन और सांप्रदायिकता को बढ़ावा दिया.
1948 में श्रीलंका आजाद हुआ. इसी साल सिलोन नागरिकता कानून अस्तित्व में आया. इस कानून के मुताबिक तमिल भारतीय मूल के हैं इसलिए उन्हें श्रीलंका की नागरिकता नहीं दी जा सकती है. हालांकि इस कानून को मान्यता नहीं मिली.
1956 में सिंहला को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिया गया, जिसका तमिल राष्ट्रवादी पार्टी ने विरोध किया और उसके सांसद सत्याग्रह पर बैठ गए. बाद में इस विरोध ने हिंसक रूप ले लिया. इस हिंसा में दर्जनों लोग मारे गए और हजारों तमिलों को बेघर होना पड़ा. 1958 के दंगे के बाद तमिल राष्ट्रवादी पार्टी पर प्रतिबंध लगा दिया गया.
संघर्ष का दूसरा कारण सरकार की वह नीति थी जिसके तहत बहुसंख्यक सिंहला समुदाय को पूर्वी प्रांत में बसाया गया, जो परंपरागत रूप से तमिल राष्ट्रवादी लोगों का होमलैंड समझा जाता है. संघर्ष का तात्कालिक कारण यही है.
सत्तर के दशक में भारत से तमिल पुस्तकों, पत्र-पत्रिकाओं और फिल्में के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया गया. साथ ही, श्रीलंका में उन संगठनों पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया, जिनका संबंध तमिलानाडु के राजनीतिक दलों से था. छात्रों के भारत आकर पढ़ाई करने पर रोक लगा दी गई. श्रीलंकाई तमिलों ने इन कदमों को उनकी अपनी संस्कृति से काटने की साजिश करार दिया, हालांकि सरकार ने इन कदमों को आर्थिक आत्मनिर्भरता के समाजवादी एजेंडा का हिस्सा बताया.
1973 में सरकार ने मानकीकरण की नीति लागू की. सरकार के हिसाब से इसका उद्देश्य शिक्षा में असमानता दूर करना था, लेकिन इससे सिंहलियों को ही फायदा हुआ और श्रीलंका के विश्वविद्यालयों में तमिल छात्रों की संख्या लगातार घटती गई.
इसी साल तमिल राष्ट्रवादी पार्टी यानी फेडरल पार्टी ने अलग तमिल राष्ट्र की मांग कर डाली. अपनी मांग को मजबूत करने के लिए फेडरल पार्टी ने अन्य तमिल पार्टियों को अपने साथ कर दिया और इस तरह तमिल यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट का निर्माण हुआ. फ्रंट का 1976 में एक सम्मेलन हुआ, जिसमें पार्टी ने अलग राष्ट्र की मांग की. हालांकि इस समय तक सरकार की नीतियों के भारी विरोध के बावजूद पार्टी एक राष्ट्र के सिद्धांत की बात करती थी.
कुल मिलाकर, आजादी से पहले जो काम अंग्रेजों ने किया, वही काम आजादी के बाद आत्मनिर्भरता के नाम पर श्रीलंका सरकार ने किया.
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श्रीलंका सरकार की गलत नीतियों और पक्षपातपूर्ण रवैये की वजह से श्रीलंका तमिलों में गहरा असंतोष पैदा हो गया.
जो तमिल पार्टियां 1973 तक राष्ट्र विभाजन के खिलाफ थी, वो भी अगल राष्ट्र की मांग करने लगीं.
सरकार की नीतियों की वजह से बहुसंख्यक सिंहला समुदाय को जहां फायदा पहुंचा, वहां अल्पसंख्यक तमिलों को नुकसान. शिक्षा से लेकर रोजगार तक, धर्म से लेकर संस्कृति तक, वाणिज्य से लेकर व्यवसाय तक.. हर जगह तमिलों को बेदखल किया गया. उन्हें उनके हक से वंचित किया गया. सत्तर और अस्सी के दशक में स्थिति ये हो गई कि तमिल युवकों का युनिवर्सिटी में दाखिला और रोजगार पाना नामुमकिन-सा हो गया. इन बेरोजगार और बेकार युवकों ने विद्रोह का रास्ता अख्तियार कर लिया. ब्लैक जुलाई की घटना से भी तमिल विद्रोह को हवा मिली. तेईस जुलाई 1983 को एलटीटीई के एक हमले में श्रीलंकाई सेना के तेरह जवान मारे गए. इस घटना के बाद भड़की हिंसा में कम से कम एक हजार तमिल मारे गए और कम से कम दस हजार घरों को आग के हवाले कर दिया गया. इस नरसंहार ने दुनियाभर के तमिलों को हिला दिया. श्रीलंका में हजारों युवकों ने सशस्त्र विद्रोह का रास्ता अपना लिया.
औपनिवेशिक काल में चाय के बगानों में काम करने के लिए मजदूरों से भारत से श्रीलंका लाया गया था. कहते हैं कि घाव कितना भी गहरा हो, समय के साथ भर जाता है, लेकिन तमिलों के साथ ऐसा नहीं हुआ. जिन तमिलों ने देश की प्रगति में हिस्सेदारी निभाई, उन्हें ने बहुसंख्यक सिंहल समुदाय अपना मानने के लिए तैयार नहीं हुआ. यही वजह है कि तमिलों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी गरीबी की जिंदगी गुजारने के लिए मजबूर होना पड़ा.
1962 में भारत और श्रीलंका के बीच एक संधि हुई जिसके तहत अगले पंद्रह सालों में छह लाख तमिलों को भारत भेजा जाना था और पौने चार लाख तमिलों को श्रीलंका की नागरिकता देनी थी. लेकिन ये तमिल श्रीलंका से भारत नहीं लौटे. बिना नागरिकता, बिना अधिकार वे श्रीलंका में ही रहते रहे. साल 2003 तक उन्हें श्रीलंका की नागरिकता नहीं मिली.
जब सिंहला को राजभाषा का दर्जा मिला तो तमिलभाषी लोगों को नौकरियों से निकाल दिया गया. एक ओर भारत से तमिल साहित्य, फिल्मों, पत्र-पत्रिकाओं के आयात पर रोक लगा दी गई. दूसरी ओर, शिक्षा नीति के मानकीकरण के नाम पर तमिलों के कॉलजों में प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया गया. 1981 के जाफना लाइब्रेरी अग्निकांड से तमिलों को बहुत ठेस पहुंची. इकतीस मई से दो जून तक बड़े ही सुनियोजित तरीके से तमिलों पर हमला किया गया. तमिल अखबार के ऑफिस और लाइब्रेरी को आग के हवाले कर दिया गया. इस अग्निकांड में लाइब्रेरी की करीब एक लाख तमिल पुस्तकें जलकर राख हो गई. इस अग्निकांड में कई पुलिसकर्मी भी शामिल थे.
श्रीलंका साल 1983 से ही गृहयुद्ध की विभीषिका झेल रहा है. इस युद्ध में आधिकारिक रूप से सत्तर हजार से भी ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं. इसे दुनिया का सबसे खतरनाक संघर्षों में से एक माना जाता है. यह युद्ध मुख्यत तमिल विद्रोही एलटीटीई और सिंहला समुदाय के प्रभाव वाली सरकार के बीच है. दुनिया के इकतीस देशों ने एलटीटीई को आतंकवादी संगठन का दर्ज दे रहा है.
2001 युद्धविराम के बाद शांति की संभावना बनी. 2002 में दोनों पक्षों ने एक संधि पर हस्ताक्षर भी किया, लेकिन 2005 में हिंसा फिर से भड़क उठी. 2006 में सरकार ने एलटीटीई के खिलाफ मोर्चा खोल दिया और पूर्वी प्रांत से उसे बाहर खदेड़ दिया. इसके बावजूद लिट्टे ने अलग राष्ट्र की मांग को लेकर संघर्ष फिर से शुरू करने की घोषणा की. श्रीलंकाई सेना ने दावा किया कि उसने दुश्मन के सारे नौकाओं को नष्ट कर दिया है और उसने ये भी दावा किया कि आने वाले समय में वह उसे पूरी तरह नष्ट कर देगी. एलटीटीई पर सैंकड़ों बार संधि उल्लंघन का आरोप लगाते हुए उसने दो जनवरी 2008 को उसके खिलाफ युद्ध छेड़ दिया.
एक साल बाद उसने लिट्टे के गढ़ किलिनोच्ची पर कब्जा जमा लिया. इस संघर्ष की वजह से करीब दो लाख तमिलों को विस्थापित होना पड़ा.
संघर्ष के कारण
सिंहला वनली एक्ट- इस कानून के मुताबिक देश की राष्ट्रभाषा सिंहला होगी
गैर-सिंहलियों को रोजगार मिलना करीब-करीब असंभव हो गया
जो पहले से नौकरी में थे, उन्हें नौकरी से निकाला जाने लगा
प्रधानमंत्री एसडब्ल्यूआरडी भंडारनायके ने यह कानून लाया था
शिक्षा का कथित मानकीकरण
इस कानून के तहत, विश्वविद्यालयों में तमिलों का प्रवेश असंभव हो गया
नौकरियों में भी गैर-सिंहलियों के लिए कोई काम नहीं बचा
उन्हें नौकरी से निकाला जाने लगा
तमिल यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट का गठन
टीयूएलएफ ने अधिकार के लिए सशस्त्र संघर्ष का समर्थन किया
बेरोजगार और बेकार युवकों ने हथियार उठा लिया
वामदल शुरू-शुरू में सांप्रदायिक संघर्ष का समर्थन नहीं किया
बाद में, भाषा के मुद्दे पर वामदलों ने टीयूएलएफ का साथ दिया
1974 में लिबरेशन टाईगर ऑफ तमिल ईलम का गठन
एलटीटीई को राजनीतिक समर्थन
एलटीटीई का राजनीतिक और प्रशासनिक प्रतिष्ठानों पर हमला
लिट्टे का कारनामा
1977 में जाफना के महापौर अल्फ्रेड दुरैअप्पा की हत्या
1977 में स्वयं प्रभाकरन द्वारा तमिल सांसद एम कनगरत्नम की हत्या
1983 में सैनिक काफिले पर हमला, 13 सैनिकों की मौत
1984 में केंट और डॉलर फॉर्म में आम नागरिकों की सामूहिक हत्या
1985 में अनुराधापुरम में 146 नागरिकों की हत्या
1987 में एलटीटीई ने पहलीबार आत्मघाती हमले को अंजाम दिया
विस्फोटकों से भरे ट्रक को सैन्य शिविर की दीवार से टकरा दिया
इस हमले में चालीस सैनिक मारे गए
इस हमले के बाद लिट्टे ने 170 से भी ज्यादा आत्मघाती हमले को अंजाम दिया
यह संख्या दुनिया के किसी भी संगठन के आत्मघाती हमले की संख्या से ज्यादा है
आखिरकार आत्मघाती हमला एलटीटीई की पहचान बनाया.
1989 में जाफना विश्वविद्याल के प्रोफेसर और मानवाधिकारवादी डॉ रजनी की हत्या
1993 में लिट्टे ने एक आत्मघाती हमले में राष्ट्रपति रनसिंघे प्रेमदासा की हत्या कर दी.
1996 में कोलंबों के सेंट्रल बैंक में आत्मघाती हमला, 90 की मौत, 1400 घायल
1997 में श्रीलंकाई वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमला
1998 में बौद्धों के सबसे पवित्र मंदिरों में से एक टेंपल ऑफ टूथ पर हमला
1999 गोनागाला पर हमला, 50 सिंघलियों की मौत
2001 में भंडारनायके इंटरनेशनल हवाई अड्डे पर हमला
इस हमले में एयरफोर्स के आठ और श्रीलंकन एयरलाइन्स के चार विमान नष्ट हो गए
हमले का प्रतिरोध
1983 में सेना पर लिट्टे के हमले के बाद सिंहलियों ने तमिलों पर सुनियोजित हमले किए
इन हमलों में एक हजार से ज्यादा तमिल मारे गए
तमिलों के सिंहलियों के इलाके से भागना पड़ा
अनुराधापुरम हत्या मामले के जवाब में सेना ने कुमदिनी बोट पर हत्या कर 23 तमिलों की हत्या कर दी
1987 सेना ने ऑपरेशन लिबरेशन शुरू किया
इसका लक्ष्य जाफना को मुक्त कराना था
इस ऑपरेशन में सेना को जीत मिली, मगर प्रभाकरन भागने में कामयाब हो गया
भारतीय हस्तक्षेप
भारत ने कई कारणों से श्रीलंकाई संघर्ष में हस्तक्षेप किया. इनमें क्षेत्रीय शक्ति के रूप में खुद को प्रदर्शित करना और तमिलनाडु में आजादी की मांग को दबाना शामिल था. चूंकि तमिलनाडु के लोग सांस्कृतिक कारणों से श्रीलंकाई तमिलों के हितों के पक्षधर रहे हैं, इसलिए भारत सरकार को भी संघर्ष के दौरान श्रीलंकाई तमिलों की मदद में आगे आना पड़ा है. 80 के दशक की शुरुआत में भारतीय एजेंसियों ने कई तरह से तमिलों की मदद की.
पांच जून 1987 को जब श्रीलंका सरकार ने दावा किया कि वे जाफना पर कब्जा करने के करीब हैं, तभी भारत ने पैराशूट के जरिए जाफना में राहत सामाग्रियां गिराई. भारत की इस मदद को लिट्टे की प्रत्यक्ष मदद भी माना गया. इसके बाद 29 जुलाई, 1987 को प्रधानमंत्री राजीव गांधी और श्रीलंकाई राष्ट्रपति जयवर्द्धने के बीच एक समझौते पर हस्ताक्षर हुआ. इस समझौते के तहत तमिल को आधिकारिक दर्जा दिया गया. साथ ही, तमिलों के कई अन्य मांगें मान ली गईं. वहीं, भारतीय शांति रक्षक बलों के सामने विद्रोहियों को हथियार डालना पड़ा.
ज्यादातर विद्रोही गुटों ने भारतीय शांति रक्षक बलों के सामने हथियार डाल दिए थे, लेकिन लिट्टे इसके लिए तैयार नहीं हुआ. भारतीय शांति रक्षक सेना ने लिट्टे को तोड़ने की पूरी कोशिश की. तीन सालों तक दोनों के बीच युद्ध चला. इस दौरान शांति रक्षकों पर मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप भी लगे. उधर, सिंहलियों ने भी अपने देश में भारतीय सैनिकों की उपस्थिति का विरोध करना शुरू किया. इसके बाद श्रीलंका सरकार ने भारत से शांति रक्षकबलों को वापस बुलाने की मांग की, लेकिन राजीव गांधी ने इससे इनकार कर दिया. 1989 के संसदीय चुनाव में राजीव गांधी की हार के बाद नए प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने श्रीलंका से शांति रक्षक बलों को हटाने का आदेश दिया. इन तीन सालों में श्रीलंका में ग्यारह सौ भारतीय सैनिक मारे गए, वहीं पांच हजार श्रीलंकाई भी मारे गए.
1991 में एक आत्मघाती हमलाकर लिट्टे ने राजीव गांधी की हत्या कर दी. इसके बाद भारत ने श्रीलंकाई तमिलों की मदद बंद कर दी.
साल 2008 में जब श्रीलंकाई सेना ने लिट्टे के ठिकानों पर कब्जा करना शुरू किया तो भारत की गठबंधन सरकार हिल गई. तमिलनाडु के राजनीतिक दलों ने केंद्र सरकार से श्रीलंकाई मामले में हस्तक्षेप की मांग की. ऐसा नहीं करने पर मुख्य सहयोगी दल डीएमके ने सरकार से हटने की भी धमकी दे डाली. केंद्र सरकार पर दबाव बनाने के लिए तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम करुणानिधि ने अपने सांसदों से इस्तीफा तक ले लिया. तमिलों के मुद्दे पर तमिलनाडु की तमाम पार्टियां साथ हो गई और श्रीलंका में तुरंत युद्धविराम की मांग की. भारी दबाव के बीच विदेशमंत्री प्रणव मुखर्जी श्रीलंका गए. श्रीलंका के राष्ट्रपति ने उन्हें तमिलों की सुरक्षा का आश्वासन दिया. युद्ध में फंसे आम-नागरिकों को बाहर निकलने लिए उसने एकतरफा युद्ध विराम भी किया. अगर यही बात पहले होती तो सैंकड़ों निर्दोष लोगों की जान बच जाती.

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