हिंदी शोध संसार

सोमवार, 8 सितंबर 2008

कंधमाल हिंसा के लिए ईसाई मिशनरियां जिम्मेदार

कंधमाल में स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की नृशंसतापूर्वक हत्या के बाद हिंसा भड़की. निस्संदेह इस हिंसा में दर्जनों निर्दोषों को भी कीमत चुकानी पड़ी. मगर यह हिंसा क्यों भड़की, इस पर लीपा-पोती करने और तुष्टिकरण की नीति अपनाने से ज्यादा जरूरी है कि मसले पर गंभीरता पूर्वक विचार हो.

यह पहलीबार नहीं था जब कि स्वामी जी पर हमले हुए हों, अंतिमबार हुए हमले से पहले स्वामी पर आठ हमले और हुए थे, आठवां हमला आठ माह पहले हुआ था, जिसमें स्वामी से बाल-बाल बच गए. इस हमले के बाद कंधमाल में व्यापक हिंसा भड़क उठी थी. उस हिंसा की आग शांत हुई नहीं कि एकबार फिर स्वामीजी पर हमला हुआ और अंतिमरूप से उनकी हत्या कर दी गई. सरकार ने आनन-फानन में कह दिया कि ये हत्या माओवादी नक्सलियों ने की है. मामले की जांच किए बगैर.

स्वामीजी कंधमाल के आदिवासी बहुल क्षेत्र में शिक्षा और आदिवासियों के समग्र उत्थान की दिशा में कार्य कर रहे थे. स्वामीजी का ये कार्य ईसाई मिशनरियों को अच्छा नहीं लग रहा था. वे मिशनरियों की आंखों की किरकिरी बने हुए थे और मिशनरियां उन्हें अपने रास्ते से हटाना चाहती थी और आखिरकार हटाकर ही दम लिया.

वैसे ईसाई मिशनरियों का दंभ होता है कि वे निस्वार्थ समाज सेवा का काम कर रहे हैं, वे पिछड़े इलाकों में स्कूल, अस्पताल और सामुदायिक विकास केंद्रों का निर्माण करते हैं. मगर समाज सेवा की आड़ में ईसाई मिशनरियां व्यापक तौर पर धर्म परिवर्तन के काम में जुटी हुई हैं.

कंधमाल की ही बात करें तो छह लाख की आबादी वाले कंधमाल में एक लाख से भी ज्यादा ईसाई हैं. इनमें से करीब सत्तर हजार लोग अनुसूचित जाति से धर्मपरिवर्तन कराके ईसाई बनाए गए हैं. ईसाई मिशनरियों का अक्सर दावा होता है कि प्रभु ईशु मसीह तुमसे बहुत प्यार करते हैं, तुम्हें गले लगाना चाहता हैं. तुम्हारे सभी कष्टों और पीड़ाओं को खत्म कर देना चाहते हैं. तुम्हें गरीबी, बेकारी से छुटकारा दिलाना चाहते हैं. सच बात तो ये है कि भगवान राम की तरह स्वयं प्रभु ईशु मसीह ने भी अपने जीवन में अनेक दुख झेले, कष्टों का सामना किया, अंत में तो उन्हें सूली पर चढ़ा दी. वे स्वयं नियति प्रदत्त कष्टों से नहीं बच सके तो वे दूसरों का कष्ट कहां से हर लेंगे. यही वजह है कि ये धर्मांतरित ईसाई, मिशनरियों के लाख दावे के बाद भी गरीब हैं, ये गरीब अनपढ़ ईसाई, अनुसूचित जनजाति के तहत आरक्षण चाहते हैं. कंधमाल के कोंध(अनुसूचित जनजातियों) का मानना है कि उन्हें आरक्षण नहीं दी जा सकती है. संविधान के मुताबिक भी, अनुसूचित जाति(एससी) के जिन लोगों ने धर्मांतरण कर लिया है उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं दिया जा सकता है. कोंध जाति(एसटी) और धर्मांतरित ईसाईयों(पन्ना-एससी) के बीच इसी बात का झगड़ा है.

आरएसएस जैसी संस्थाओं पर अक्सर ये आरोप लगता रहा है कि वे धर्मांतरण तो रोकना चाहते हैं, लेकिन आदिवासियों के उत्थान और उसकी समस्याओं को सुलझाने के लिए उन्होंने कुछ भी नहीं कर रहे है. इसी आरोप के जवाब में आरएसएस की अनुषंगी संस्थाओं ने आदिवासी और पिछड़े इलाकों में व्यापक विकास के काम शुरू किए. मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, झारखंड के आदिवासी इलाकों में संघ के स्कूल, अस्पताल चलाए जा रहे हैं ताकि धर्म परिवर्तन को रोका जा सके. आरएसएस का काम ईसाई मिशनरियों के धर्म-परिवर्तन की राह में रोड़ा साबित हो रहा है, इसलिए वे इन्हें खत्म कर देना चाहते हैं.

उड़ीसा के कंधमाल में स्वामी लक्ष्मणानंद की हत्या इसी बात का उदाहरण है. जस्टिस एंड ट्रायल नामक स्वयंसेवी संगठन ने भी कंधमाल हिंसा के लिए ईसाई मिशनरियों को जिम्मेदार ठहराया. संगठन के अध्यक्ष और पूर्व महाधिवक्ता सरदार जीएस गिल ने एक संवाददाता सम्मेलन में कहा कि धर्म परिवर्तन निरोधक कानून के बावजूद ईसाई मिशनरियां भोले-भाले आदिवासियों का धर्म परिवर्तन करवा रही है, जिससे समय-समय पर तनाव पैदा होता रहता है. मामले की जांच के बाद संगठन के अध्यक्ष ने कहा कि लक्ष्मणानंद सरस्वती पर ईसाई मिशनरियों ने आठ बार हमले कराये और नौवे बार में स्वामी जी की मौत हो गई. समिति ने साफ साफ कहा कि इस बात की कोई ठोस वजह नहीं है कि माओवादियों स्वामी जी की हत्या कर दे. समिति ने ये भी कहा कि क्या ईसाई मिशनरियों ने माओवादियों से उनकी हत्या करायी है, इस बात की भी जांच कराई जानी चाहिए.

राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन के प्रवर्तक और प्रख्यात राष्ट्रवादी चिंतक के एन गोविंदाचार्य ने कंधमाल हिंसा के लिए सरकारों की तुष्टिकरण की नीति को जिम्मेदार ठहराया. उन्होंने कहा कि बार-बार की धमकी के बावजूद सरकार स्वामी जी जैसे महत्वपूर्ण व्यक्ति को सुरक्षा मुहैया कराने में नाकायाब रही है और उनकी हत्या के बाद उसे माओवादी का कारनामा करार दे रही है, जो अनुचित है.
देशभर में चल रहे मिशनरी की स्कूलों पर भी सवाल उठ रहा है. कंधमाल की हिंसा के विरोध ईसाई मिशनरी स्कूलों ने बंद की घोषणा कर दी. साफ है कि ईसाई मिशनरियां मुफ्त में शिक्षा नहीं देती. अंग्रेजी शिक्षा के नाम पर भारी लूट-खरोट मचाए हुए है. इसके बावजूद वो स्कूलों में ईसाई धर्म की शिक्षा देती है. ईसाई धर्म से संबंधित किताबें बांटती है या यूं कहें धर्म परिवर्तन के लिए प्रोत्साहित करती हैं. जो ईलाका पिछड़ा है, वहां वह इस काम को अपने बूते करती भी है.
ऐसे में छद्म-निरपेक्षियों का भंडाफोड़ होना स्वाभाविक है, जो हर घटना के लिए सांप्रदायिक शक्तियों को जिम्मेदार ठहराते हैं. सत्य तो ये है कि इन्हीं लोगों की वजह से समाज में जहर घुलता जा रहा है.

1 टिप्पणी :

  1. इस देश मे कुछ भी ऎसा नही हो सकता जिस पर हम सब मान कर सके,"कंधमाल हिंसा के लिए ईसाई मिशनरियां जिम्मेदार" अजी नही हमारे देश के नेता लोग हे जो कुर्सी के लिये इस देश को भी बेच दे...
    धन्यवाद

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