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गुरुवार, 4 सितंबर 2008

झुक जाते हैं शीश जहां

घोर व्यवसायिकता के युग में, उन गुरूओं के प्रति, जो आज भी अपनी जिम्मेदारी के प्रति सजग हैं-
वंदे बोधमयं नित्यम गुरूं शंकर रूपिणम्.
यमाश्रितो से वक्रोपि चंद्र सर्वत्र वंदते.
भाव-सद-असद का बोध कराने वाले शिव रूपी गुरू को नमन है, जिनका आश्रय पाकर टेढ़ा चद्रमा भी हर जगह पूजा जाता है.
गुरू ब्रह्मा गुरू विष्णु गुरू देवो महेश्वर:
गुरू साक्षात परब्रह्म तस्मै श्रीगुरुवे नम:
भाव- गुरू बह्मा, विष्णु और कल्याणकारी शिव के स्वरूप है. गुरू परमबह्म के तुल्य हैं, ऐसे गुरूओं को शत्-शत् नमन.
अखंड मंडलाकारं व्याप्तं येन चराचरं
तद पदं दर्शितम येन तस्मै श्रीगुरूवे नम:
भाव- अखिल विश्व के चर-अचर में व्याप्त ईश्वर का बोध कराने वाले गुरू को प्रणाम.
अज्ञान तिमिरांधस्य ज्ञानांजन शलाकया.
चक्षुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरूवे नम:
अज्ञान के अंधकार में ज्ञान का प्रकाश फैलाने वाले गुरू को शत-शत नमन.
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गुरू कुम्हार शिष्य कुंभ हैं गढ़ि-गढ़ि काटै खोंट.
अंतर हाथ सहार दे, बाहर मारै चोट.
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बंदऊं गुरू पद कंज कृपा सिंधु नर रूप हरि.
महामोह तम पुंज जासु वचन रविकर निकर.
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बंदऊं गुरू पद पदुम परागा.
सुरूचि सुवास सरस अनुरागा.
अमिय मूरिमय चूरन चारू.
शमन सकल भव रूज परिवारू.
श्री गुरू पद नख मणिगण जोति.
सुमिरत दिव्य दृष्टि हिय होती.
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2 टिप्‍पणियां :

  1. आज शिक्षा दिवस पर इस कविता से अच्छी बधाई ओर कही नही होगी, बहुत अच्छा लिखा हे आप ने,सच मे गुरु ही एक कुम्हार की तरह से शिष्य को ठोक बजा कर इस काबिल बनाता हे की कल वह अपने गुरु पर मान कर सके,
    धन्यवाद

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  2. शिक्षक दिवस पर समस्त गुरुजनों को नमन, बधाई एवं शुभकामनाऐं.

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