हिंदी शोध संसार

सोमवार, 25 अगस्त 2008

किस सांप्रदायिक शक्ति की बात कर रहे हो जी?

एनडीटीवी इंडिया पर कश्मीर से संबंधित एक रिपोर्ट दिखाई जा रही थी. इस रिपोर्ट में दिखाया गया था कि घाटी के मुसलमान भी कृष्णजन्माष्टी में शरीक हो रहे हैं. रिपोर्ट के साथ एक टैग, जो एनडीटीवी जैसे चैनलों की विशेषता है, जोड़ा गया कि जहां एक ओर सांप्रदायिक शक्तियां श्रीनगर को सुलगाने की कोशिश कर रही है.
किस सांप्रदायिक शक्ति की बात कर रहे हो जी?
क्या अपने हक की लड़ाई करना सांप्रदायिकता है, क्या सत्ता पाने के लिए तुष्टिकरण को बढ़ावा देना ही धर्म-निरपेक्षता है. अपने ही देश में अमरनाथ यात्रियों अस्थायी पड़ाव के लिए कुछ एकड़ जमीन खरीदना सांप्रदायिकता है. क्या पाकिस्तान जिंदाबाद का नारा लगानेवाले धर्मनिरपेक्ष हैं? क्या आतंकवादियों का झंडा थामने वाले धर्मनिरपेक्ष हैं? क्या आतंकवादियों को पकड़ना संप्रदाय विशेष को परेशान करना है?
गुजरात चुनाव में पद्मविभूषित पत्रकार विनोद दुआ की जुबां से जो लच्छेदार शब्द की लड़िया फूटती थी, वही धर्मनिरपेक्षता है? जब देखो तब उनकी जुबां से निकलती थी-
ये लोग विकास के साबून से गुजरात दंगों का खून धोना चाहते हैं.
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दुआ जी, आप 1984 के सिख दंगों के लिए पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी आलोचना क्यों नहीं करते, जिन्होंने कहा था, जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है.
आप पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य की आलोचना क्यों नहीं करते हैं, जिन्होंने नंदीग्राम में महीनों चले हिंसा के दौरान कहा था- हमारे लोगों ने तृणमूल कांग्रेस के लोगों को लोगों को ईंट का जवाब पत्थर से दिया था. सीपीएम के कार्यकर्ताओं के तांडव को आपका चैनल माओवादियों की करतूत साबित करने में जुटा था. आपने कामरेड सीताराम येचुरी की आलोचना क्यों नहीं की, जिन्हें बुद्धदेव भट्टाचार्य के बयान में कुछ भी गलत सुनाई नहीं दिया.
कहां थे आप असम हिंसा के दौरान, जहां कम से कम तीस लोगों को पीट-पीट कर मार डाला गया और आपका चैनल इस सत्य के उजागर में लगा रहा था कि सरकार के मुताबिक हिंसा में महज एक व्यक्ति ही मारा गया.
देश की एकता अखंडता की बात करने वाला आपको सांप्रदायिक लगने लगता है. समग्र विकास की बात करने वाला आपको सांप्रदायिक लगने लगता है और समाज को बांटने वाला धर्मनिरपेक्षता.
अलगाववादी ताकतें आपको धर्म-निरपेक्ष लगता है और अपने हक की मांग करने वाला. साप्रदायिक.
महीनों से कश्मीर जल रहा है और आपकी धर्म निरपेक्ष सरकार चुपचाप तमाशा देख रही है.
जब हम जम्मू-कश्मीर के संसाधनों का उपयोग नहीं कर सकते हैं तो कश्मीर किस काम का. हमने हजारों करोड़ रुपये घाटी को दिए, बदले में घाटी ने हमको क्या दिया- चंद अलगाववादी नेता, पाकिस्तान का झंडा बुलंद करने वाले लोग. क्यों नहीं जम्मू के लोगों को उनका हक मिलता.
हिंदू-धर्म स्वभाव से ही धर्म-निरपेक्ष है. लेकिन जब आप अल्पसंख्यक तुष्टिकरण को बढ़ावा देंगे. तो बहुसंख्यक असंतुष्ट होगा ही. आप सच बोलने का दावा करते हैं, लेकिन आपके सच की बुनियाद कहां. सवाल अभी कई और हैं मिलते हैं इस छोटे से ब्रेक के बाद.

6 टिप्‍पणियां :

  1. सत्य कड़वा होता है। उसे सही जगह पर उद्♀घाटित करने का साहस सभी में नहीं होता। खासतौर पर जब मामला सत्ता, कमाई और टी.आर.पी. का हो। वैसे भी भारतीय मीडिया अभी तक भी उपनिवेशकालीन संस्कारों से मुक्त नहीं हो पाया है। रही सही कसर उस पर वामपंथियों के प्रभाव ने पूरी कर दी है। हज यात्रियों को सब्सिडी देना जायज है और अमरनाथ यात्रियों के लिये अस्थाई प्रबंध करना नाजायज। यही विसंगति भारत को एक छद्म युद्ध में उलझाये हुए है।

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  2. आपका रोष इस लिए है की आप इनसे उम्मीद रखते है. इनके यहाँ सही बोलने वालो को चुप करवा दिया जाता है, आज ही एक ब्लॉग लिखा गया है, इस पर.

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  3. सत्य कड़वा होता है और सही जगह पर बोलने का साहस सभी में नहीं होता। खासतौर पर राजनीति और मीडिया क्योंकि मामला वोट और नोट से जा जुड़ता है। भारतीय मीडिया पर अभी तक भी उपनिवेशकालीन संस्कार तथा वामपंथी हावी हैं जो समाज को भ्रमित करने में लगे हैं। हज यात्रियों को सब्सिडी जायज है और अमरनाथ यात्रियों को सुविधा देने की मांग से साम्प्रदायिकता को बढ़ावा मिलता है जैसे जुमले कुछ दिवालिया लोगों की उपज हैं। कुछ चुके हुए लोगों को एक अच्छा रोजगार मिला हुआ है।

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  4. ये रोष उस सच के खिलाफ है, जिसे दिखाने का वह चैनल दावा करता है.

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  5. इन विसंगतियों का जब भी इस तरह से कच्चा चिठ्ठा खुलेगा, तभी हम सभी विवेक पसंद नागरीकों को इन तरह के दुष्प्रचार से सत्य का बोध होगा.

    मगर एक बात नही भूलनी चाहिये. Two wrongs do not make One right.

    यह बात हमें सामान्यतः याद रखनी ज़रूरी है.

    पर यह बात उन्हे कौन समझाये ? क्या हमीं समझदार रहें, उनकी समझदारी का जिम्मा कौन लें? वे, तथाकथित धर्म निरपेक्ष जमात के शिखंडी, जो खुद कोहनी तक उगे है, और बरगद नापनें चलें है?

    आप का कटाक्ष जिन पर है, वे यहां नही आयेंगे, क्योंकि यहां शुद्ध LOGIC and RATIONAL बातों का आदान प्रदान होता है.

    इसी तरह की मन की कुछ बाते मेरे नये ब्लॊग -मानस के अमोघ शब्द -पर करने का सोचा है.आपका स्वागत है.

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  6. हमें उन शिखंडियों को समझाने की जरूरत पड़ेगी ही नहीं अगर हम अपनी बात बेहतर तरीके से समझ लें और उसे मौके-बेमौके जोरदार तरीके से उठाये. जहां तक मैं समझता हूं, आज ऐसे लोगों को जवाब देने के लिए प्रबुद्ध लोगों को एक फौज खड़ी हो रही जो उनका मुकाबला करने के लिए तैयार है. बस इन्हें जरूरत है एक सशक्त प्लेटफॉर्म की. फिलहाल हल्दी न चूना, घाव चोखा होय करने के लिए मुफ्त का ब्लॉगर ही सर्वश्रेष्ठ माध्यम है.

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