हिंदी शोध संसार

गुरुवार, 29 नवंबर 2007

मधुशाला के अमर गायक

मिट्टी का तन
मस्ती का मन
क्षण भर जीवन
मेरा परिचय
जीवन के संबंध में इतनी सटीक और सुलझी सोच! यही कारण है है की बच्चन जी ने जीवन की जटिलताओं के बारे में सोचने की फुरसत नहीं निकाली। जीवन-दर्शन साफ था- वर्तमान को मुट्ठी में कैद करके उसे जीना ही जीवन है। उनकी पहली पत्नी श्यामा मात्र चौबीस बर्ष की आयु में चल बसी। हरिवंश राय के सामने उनका वर्तमान था। उन्होने तेजी सूरी से दूसरी शादी की। कई लोगों ने कवि के इस कदम की आलोचना की। बच्चन ने अपनी कविता के माध्यम से आलोचकों की मुँह बंद कर दी।
जो बीत गई
सो बात गई
मन वह बेहद प्यारा था।
वे अँधेरी रात को कोसने के बजाय एक दिया जला लेना बेहतर समझते थे--
है अँधेरी रात
पर दीवा जलना कब मना है?
जीवन का सच ना तो इससे ज्यादा सरल ही हो सकता है, ना ही इससे ज्यादा ज्यादा जटिल ही। हरिवंश राय बच्चन ने जीवन के सच के सरलता को समझा। हरिवंश राय बच्चन के बेटे अमिताभ अपने बाबूजी के इस जीवन दर्शन को हमेशा दुहराते हैं और हर बार जीवन की यही सच्चाई सामने आती है--
मन का हो तो अच्छा है
नहीं हो तो और भी अच्छा है।
क्योंकि हर नहीं होने में कहीं न कहीं प्राकृतिक अच्छाई छुपी रहती है।
अमिताभ के जीवन में कई बार या बार-बार चढाव-उतार आते रहे हैं। एक बार अमिताभ ने अपने पूज्य पिता से कहा पिताजी जीवन में बहुत-सी कठिनाइयाँ हैं। पिता का जवाब था-- अगर जीवन है तो कठिनाइयाँ हैं।
जीवन के सच की सरलता को हरिवंश राय बच्चन ने समझा। वहीं इस जीवन के सच की जटिलता को महादेवी वर्मा ने समझा था--
मैं नीर भरी दुःख की बदरी
परिचय इतना इतिहास यही
उमरी कल थी बह आज चली
जीवन क्या है? इसकी क्या है? किसी को पता नहीं। जीवन के रास्तों के बारे मैं कोई नहीं जानता। जीवन कोई फिल्म नहीं, ना ही इसका निर्देशक हमें यह बताता है कि हमें कैसे चलना है। हमारे रास्ते कैसे हैं। यही तो जीवन है। यही इसकी सच्चाई है। अगर सब कुछ पहले पता होता तो यह जीवन फिल्म की तरह होती। इसमे सच्चाई जैसे कोई बात नहीं होती। लोग झूठ में जीते।
जीवन के रास्तों के बारे में में डॉ बच्चन कहते हैं--
पूर्व चलने के बटोही
बाट की पहचान कर ले
पुस्तकों में है नही
छापी गई इसकी कहानी
खोल पंथी अर्थ इसका
पंथ का अनुमान कर ले
बच्चन ने जीवन को समझा। इसके आसान सच को समझा।

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