हिंदी शोध संसार

गुरुवार, 22 नवंबर 2007

राजनीती घिनौना चेहरा

शायद आप थक गए होंगे नंदीग्राम, बुद्धदेव और सीएमपी का नाम सुनते- सुनते। सीएमपी ने भी भारतीय राजनीती के गिनौने चेहरे के साथ अपना नाम जोड़ लिया। पहले कांग्रेस थी जिसने इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद सिख- विरोधी दंगे फैलाये और करीब तीन हजार सिखों के मौत के घाट उतारने में अहम भूमिका निभाई। उस समय राजीव गाँधी ने बडे फक्र से कहा कि जब विशाल पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है।
राष्ट्रीय राजनीती में कांग्रेस का लम्बा सफर रह है और उसका अस्तित्व ही अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की वजह से है सो उसने अल्पसंख्यकों को लेकर लंबी चौडी राजनीती की है।
भाजपा शुरू से ही तुष्टिकरण की नीति के खिलाफ रही है। कहीं न कहीं भाजपा के कट्टरपन कि वजह कांग्रेस और तथा कथित सेकुलर वादी लोग हैं।
भाजपा के साथ भी गुजरात नरसंहार का नाम जुड़ा। नरेन्द्र मोदी खलनायक के रुप में सामने आये। गुजरात दंगों की शुरूआत गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस में आग लगाकर अट्ठावन कार सेवकों को जलाकर मार डालने के बाद होती है। कथित रुप से मोदी ने गुजरात दंगों को गोधरा कांड की प्रतिक्रिया कहा था। सेकुलर वादियों संसद से सड़क की धूल आसमान में डाल दी।
अब राजनीती में सबसे पक-साफ कहे जाने वाले वामपंथी बुद्धिजीवियों की बारी है। सीपीएम की प्राइवेट आर्मी ने नंदीग्राम में करीब डेढ़ सौ लोगों के मौत के घाट उतारे। इसमे महिला, बच्चे और अल्पसंख्यक शामिल हैं। महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ। हजारों लोंगों को अब भी शिविरों में गुजरना पड़ रहा है। कांग्रेस की अगुवाई वाली केन्द्र सरकार, गठबंधन से ज्यादा परमाणु मुद्दे पर समर्थन जुटाने के लिए चुपचाप यह सब देखती रही। एक चोटी सी प्रतिक्रिया देने में प्रधानमत्री ने काफी देरी लगाई। कांग्रेस के प्रियरंजन दास मुंशी ने एकबार बोलने की कोशिश भी की तो वाम-विद्वानों ने उन्हें चुप रहने की नसीहत दे डाली।
बाबू बुद्धदेव ने काफी सोच-समझकर कहा- हमारे कार्यकर्ताओं ने तृणमूल की हिंसा का जवाब हिंसा से दिया। संसद भवन के सामने सीताराम येचुरी से इसी बात पर सफ़ाई मांगी तो पहले तो उन्होने यह बात मानने से इंकार कर दिया कि बुद्धदेव ने ऐसा कहा। जा ओन्न रेकॉर्ड की बात कही गयी तो उन्होने कहा- इसमे उन्होने गलत क्या कहा?
वामपंथियों का सही चेहरा अब लोगों के सामने आ गया है।
एक बात और, सिख विरोधी दंगे और नंदीग्राम दंगा किसी खास क्षेत्र में फैला था। और इसे रोका नहीं जा सका। वहीं गुजरात का दंगा पूरे गुजरात में फैला था। और पुलिस ने पहले दिन दो लोगों को गोली मारी थी। इससे वामपंथियों के इस दावे का पर्दाफास हो जाता है कि तीन दिनों तक मोदी ने पूरी छूट दे रखी थी।

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