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बुधवार, 31 अक्तूबर 2007

श्री राम

श्री राम चन्द्र कृपालु भजु मन हरण भव भय दारुणम्।
नव कंज लोचन कंज मुख कर कंज पद कन्जारुनम॥
कंदर्प अगणित अमित छवि नव नील नीरद सुन्दरम।
पट पीट मनहूँ तडित रूचि सुची नौमी जनक सुतावरम॥
भजु दिन बंधू दिनेश दानव दैत्य वंश निकंदनम।
आजानु भुज सर चाप धर संग्राम जित खर दुषणम॥
इति वदति तुलसी दास शंकर शेष मुनि मन रंजनं ।
मम ह्रदय कंज निवास करू कामादि फल दल गंजनं ॥
जय जनक नंदनी जगत वन्दनी जन आनंद श्री जानकी।
रघुवीर नयन चकोर चंद श्री वल्लभा प्रिय प्राणकी॥

1 टिप्पणी :

  1. तव कंज पद मकरंद स्वादित योगीजन मन अलिकिये|
    करी प्राण गत तन आन हिय निर्वान सुख आनत हिये||
    सुख खानी मंगल दानी अस जिय जानी शरण जो जात है|
    तव नाथ सब सुख साथ करी तेहि हाथ रीझी विकात है||
    ब्रह्मादी शिव सनकादि सुरपति आदि निज मुख भाषही|
    तव कृपा नयन कटाक्ष चितवनि दिवस निशि अभिलाषही||
    तनु पे तुम्हहि बिहाय जडमति आन मानस देवहिं|
    हत भाग्य सुरतरु त्याग करी अनुराग रेडहि सेवहिं||
    यह आस रघुबर दास की सुखराशी पूरण कीजिए |
    निज चरण कमल सनेह जनक विदेहजा वर दीजिए||
    अब नाथ करि करुना बिलोकहु देहु जो वर मांगहुं |
    जेहि जोनी जन्महूँ कर्मवस् तह राम पद अनुरागहुं||
    मनु जाही राचेउ मिलही सो वर सहज सुन्दर सांवरो |
    करुणा निधान सुजान शिलु सनेहू जानत रावरो||
    एही भांति गौरी आशीष सुनी सिय सहित हिय हरषीं अली|
    तुलसी भवानिहि पूजी पुनि पुनि मुदित मन मंदिर चलीं ||
    ||सोरठा||
    जानी गौरी अनुकूल,सिय हिंय हरषु न जाइ कही|
    मंजुल मंगल मूल,वाम अंग फरकन लगे||

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