हिंदी शोध संसार

गुरुवार, 27 मई 2010

क्योंकि नायक और खलनायक दोनों बदल चुके हैं-

फिल्म का नाम याद नहीं आ रहा है. उसमें दादामुनि अशोक कुमार कह रहे थे कि आखिर ये साले खलनायक समझते क्यों नहीं कि वो कितना ही शातिर, चालाक और ताकतवर क्यों ना हो, आखिकार एक कमजोर, निहत्था और साधारण बुद्धि का नायक उसे धर दबोचेगा, उसकी जमकर पिटाई करेगा और दर्शक बजाएंगे तालियां.

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ये पुरानी फिल्मों की बात है, जिन्हें आज के जमाने में हम घिसी-पिटी कह सकते हैं. भले ही उन कहानियों को सलीम-जावेद की जोड़ी ने क्यों न लिखी हो, आज वो कहानियां, आज वो फिल्में घिसी पिटी ही कहलाएगी. आज उन डायलॉग पर लोग तालियां नहीं बजाएंगे, आज खलनायक के लिए वो डायलॉग नहीं बोले जाएंगे. क्योंकि आज नायक और खलनायक दोनों बदल चुके हैं. इसलिए कहानी बदलनी पड़ी, डॉयलॉग बदलने पड़े.

युग बदल चुका है. व्यवस्थाएं बदल चुकी है. हम उदारीकरण और वैश्वीकरण के युग में जी रहे हैं. जहां पैसा और पैसा ही सबकुछ है. आप कितने भी तेज, प्रतिभावान, मेहनती, लगनशील हैं, अगर आपके पास पैसा नहीं है तो आप निठल्ले हैं, बेकार हैं, कामचोर और मुंहजोर हैं. अगर आपके पास पैसा है तो आपके अवगुण छिप जाएंगे.

दरअसल व्यवस्था कुछ इस तरह की बनाई ही गई है. व्यवस्था बनाने वाले खास हैं. उन्होंने अपने लिए व्यवस्था बनाई है. विनम्रता और ईमानदारी का चादर ओढ़े कुछ लोग भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रहे हैं. भ्रष्टाचारियों को सलाखों के पीछे खड़ा करने के पीछे उन्हें क्लीनचिट देने में जुटे हैं और उनके संरक्षण बने हुए हैं. चूंकि कानून बनाने और उसे लागू करने की जिम्मेदारी उन्हीं लोगों के हाथों में है तो उनका कौन बाल भी बांका कर सकता है. 

भारत दुनिया का सबसे अमीर देश है. लेकिन इन लुटेरों इस देश को कंगाल बना रहा है. इन लुटेरों को सत्ता-प्रतिष्ठान-मीडिया और उद्योगपतियों को समर्थन और संरक्षण मिल रहा है. क्योंकि ये लोग में इनमें आकंठ डूबे हैं या फिर इनके यहां इनको मोटी तनख्वाह वाली नौकरी मिल जाती है.

वैसे हमारा देश काफी पहले से बेईमान था, हम काफी पहले से भ्रष्ट थे लेकिन बाजारवाद, उपभोक्तावाद, वैश्विकरण, निजीकरण, भूमंडलीकरण और उदारवाद ने रही सही कर पूरी कर दी. उदारवाद के नाम पर इन्हें अपने अनुसार नियम बनाने और नियम तोड़ने की आजादी मिल गई.

लूट के माल में कौन हिस्सेदार नहीं है, ये कहना मुश्किल है. पर जो ज्यादा समय तक सत्ता प्रतिष्ठान में रहा वो सबसे ज्यादा दोषी है. बिना अनुमान लगाए इसमें कांग्रेस का नाम लेना होगा. उसने हिंदुस्तान में करीब चालीस सालों तक शासन किया, फिर जवाब उसी से पूछना मुनासिब होगा कि 1456 अरब डॉलर यानी 67976 अरब रुपये स्वीस बैंक में क्यों पहुंच गया. ये स्वीस बैंक एसोसिएशन की रिपोर्ट है.

स्वीस बैंक में इतना पैसा कैसे पहुंच गया. इसमें उसकी, उसके नेताओं की हिस्सेदारी कितनी है. जाहिर है कि कांग्रेस के ईमानदार प्रधानमंत्री गोपनीयता का हवाला देकर इन भ्रष्टों के नामों का खुलासा करने से इनकार कर रहे हैं. मगर, क्या गोपनीय इन भ्रष्टों के नाम होने चाहिए. जाहिर है कि कांग्रेस की नीयत खराब है.

सबसे खराब देश की तकदीर है क्योंकि यहां एक भ्रष्ट दूसरे भ्रष्ट को बचाने में लगा है. ये भ्रष्ट कभी खुद को बुद्ध तो कभी विनम्रता की मूर्ति साबित कर देते हैं और देश की जनता कभी नरेगा तो कभी युवराज का चेहरा देखकर खुश हो जाती है.

मंगलवार, 25 मई 2010

कैसे लिखे समाचार?

  •                                                   field-notes

  • शुद्धता


  • स्पष्टता


  • संक्षिप्तता



    शुद्धता, समाचार की आत्मा होती है यानी आप समाचार लिखते वक्त जो कुछ भी लिखे सही-सही लिखे, शब्द, वाक्य, आंकड़े, नाम आदि-आदि. अगर आप सही लिखते हैं तो आपका आधा काम हुआ समझिए. अगर आपकी लिखावट शुद्ध और मानक है तभी वह पाठकों का ध्यान आकर्षित करेगी, वर्ना पाठक को आपसे दूर ले जाएगी. वैसे शुद्धता हर तरह की लिखावट की प्रथम कसौटी है.

    सही, लिखने के साथ-साथ आप स्पष्टता और संक्षिप्तता पर भी ध्यान दें.

    खराब लिखावट बेकार लिखावट है. यह पाठक के विश्वास को खत्म करती है जो कि प्रेस की स्वतंत्रता के लिए आवश्यक है. प्रेस को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता इस बात को लेकर है कि वह लोगों को सही और निष्पक्ष जानकारी मुहैया कराती है. सही और निष्पक्ष जानकारी मत निर्धारण के लिए जरूरी है क्योंकि यह सही मत स्वस्थ लोकतंत्र के भविष्य को तय करती है.

    अगर प्रेस की सच्चाई और निष्पक्षता से जनता का भरोसा उठ जाता है तो जल्द ही लोकतंत्र से भी उसका भरोसा उठ जाएगा. इसलिए समाचार लिखते वक्त नाम, स्पेलिंग, आंकड़े, कथ्य और तथ्य की शुद्धता पर विशेष ध्यान दें. कुल मिलाकर शुद्धता और सच्चाई को प्राथमिकता दें.

    दूसरी बात है, संक्षिप्तता. लेखन में कोई बात, कोई शब्द ऐसा नहीं हो जिसका वाक्य में कोई मतलब नहीं हो हो. इस वाक्य पर ध्यान दें-

    ए ने बी के ऊपर मामला दर्ज कराया.

    को अगर हम ऐसा कहें कि-

    ए ने बी पर मामला दर्ज कराया

    तो इससे वाक्य में संक्षिप्तता की काफी गुंजाइश बचती है. संक्षिप्तता वाक्य स्तर पर हो और न्यूज स्टोरी स्तर पर भी. न्यूज स्टोरी लिखने में उल्टा पिरामिड को ध्यान में रखें. यानी सबसे अहम सबसे ऊपर और सहायक तथ्य सबसे नीचे. ध्यान रहे अहम तथ्य सबसे ज्यादा और सहायक तथ्य सबसे कम हों.

    अब बारी तीसरी बात यानी स्पष्टता की. बात स्पष्ट हो, संपूर्ण हो ताकि पाठक के सभी सवालों के जवाब मिल जाएं. अनाप-शनाप और अनर्गल, कहने का मतलब कि बेमतलब की बात मत करें.

    बात को सामान्य शब्दों में यानी बोलचाल की भाषा में व्यक्त करें ताकि एक सामान्य व्यक्ति भी आपकी बात समझ जाए. आप जितनी बातें सोच सकते हैं उतनी लिख नहीं सकते. लिखना बहुत ही मुश्किल है. आप जितना जानते हैं, उतना भी नहीं लिख सकते. कहते हैं कि व्यक्ति के पास जितना बड़ा शब्द भंडार होता है वह उसका महज एक दसवां हिस्सा ही लिख पाता है. यानी आप अपने ज्ञान का महज दस प्रतिशत प्रयोग कर सकते हैं. आप जानते हैं तो अच्छा लिख सकते हैं.

आपका उपसंपादक तय करता है कि कौन सी स्टोरी मुख्य पृष्ठ पर होगी, मगर आप अगर अच्छा लिखते हैं तो उप-संपादक को सोचना पड़ेगा कि आपकी स्टोरी मुख्य पृष्ट पर क्यों नहीं जाए. आपकी लिखावट उप-संपादक की सोच को प्रभावित करती है. उपसंपादक की सोच पर हावी होने के लिए आपमें वो गुण होने चाहिए. आपकी लिखावट में दम होनी चाहिए. आप घटना को शुद्ध-शुद्ध, स्पष्ट और संक्षेप में लिखें. मगर घटना के बारे में सबकुछ जाने, तभी आप बेहतर लिख सकते हैं. मतलब आप जितना जानते हैं उसका केवल दस प्रतिशत लिखें.

“क” वाची प्रश्नों के उत्तर (क्या, कब, क्यों, कैसे, कौन, कैसे) आपकी स्टोरी में जरूर होनी चाहिए. जरूरी नहीं है कि प्रथम वाक्य में ही आप सारे प्रश्नों का उत्तर दे दें.

समाचार क्या है?

मजाक में किसी ने कहा, अगर कुत्ता आदमी को काटता है तो वो समाचार नहीं है, मगर अगर आदमी कुत्ता को काट ले तो ये समाचार कहलाएगा.


सरल शब्दों में कहें तो जो कुछ नया है, रोमांचक है, आकर्षक है, अलग है, अनुपम है, उत्सुकता बढ़ाने वाला है, चर्चा के योग्य है, वो समाचार है.


मगर, आजकल समाचार के मायने बदल गए हैं. आज के संपादक कहने लगे हैं कि पाठक या दर्शक जो कुछ पढ़ना या देखना चाहता है, वही समाचार है. पाठकों या दर्शकों की रुचि जानने के लिए अखबार या टेलीविजन सर्वेक्षण कराते है, प्रतिक्रिया मंगवाते हैं, फिर दर्शक या पाठक की मर्जी से समाचार परोसते हैं.


फिर, समाचार वही है जिसकी दर्शकों को जरूरत है, जो दर्शक जानना चाहता है, जिसमें उसकी रुचि है.


समाचार की कसौटी-समाचार में इनमें से एक या एक से ज्यादा तत्व होने चाहिए. समाचार को निम्नलिखित तथ्यों की कसौटी पर कसकर देखें कि वो समाचार के लायक है नहीं-


* प्रभाव- किसी भी समाचार का प्रभाव इस बात से जाना जाता है कि वह कितने व्यक्ति को प्रभावित कर रहा है यानी समाचार का प्रभाव कितने लोगों पर हो रहा है. जितने ज्यादा लोगों पर समाचार प्रभावी है वह उतना बड़ा समाचार है.
* निकटता- कोई घटना जितनी निकट में घटती है वो उतना ही बड़ा समाचार होता है. बिहार के लोगों के लिए पटना में मुख्यमंत्री क्या बोलते हैं वो ज्यादा बड़ा समाचार है, अमेरिकी राष्ट्रपति के अमेरिका में दिए बयान के मुकाबले.
* तत्क्षणता- नयापन समाचार की आत्मा होता है. कोई समाचार एक सप्ताह बाद समाचार के लायक नहीं रह जाता है. तुरंत या तत्क्षण घटने वाली घटना बड़ी खबर है. समाचार मछली की तरह होती है, जो ताजा की अच्छी होती है. बासी कोई नहीं पसंद करता है.
* बड़प्पन- खबर जितने बड़े लोगों की होती है, खबर उतनी बड़ी होती है. अभिषेक बच्चन के बेटे की शादी की खबर बड़ी खबर है. प्रधानमंत्री अगर सबेरे उठकर टहल रहे हों तो भी बड़ी खबर है. लालू की हरेक बयान बड़ी खबर है.
* नयापन- खबर में नयापन, अनुपमता और रोमांच होना चाहिए यही इसका गुण होता है.
* संघर्ष- हिंसा, युद्ध, हमला और अपराध अपने आप में बड़ी खबर है.
* प्रासंगिकता- अगर घटना प्रासंगिक है तो समाचार है वर्ना उसे कौन पूछता है. महात्मा गांधी को हर कोई जानता है. मगर जब जेम्स ओटिस उनके कुछ सामानों की नीलामी करता है तो अखबार समाचारपत्र-टीवी महात्मा गांधी के जीवन दर्शन के बारे में बताने लगते हैं. यहां इस खबर की प्रासंगिकता है.
* उपयोगिता- उपयोगिता भी समाचार का बड़ा गुण है. हम जो सूचना दे रहे हैं वो लोगों के लिए कितनी उपयोगी है, लोगों का जीवन उससे कितना संवरता है, उनका काम कितना आसान होता है.
* रूचिपरकता- समाचार रुचिकर होना चाहिए. यह समाचार का सबसे बड़ा गुण है.





सोमवार, 3 मई 2010

"मेरी जंग पेट्रो-डॉलर इस्लाम के खिलाफ है"

  • कोई भी धर्म सबसे बड़ा या ऊंचा नहीं है
  • गैर-धर्म को मानने वाले लोग नर्क नहीं जाएंगे
  • इस्लाम कोई नया धर्म नहीं है
  • इस्लाम में वही बातें हैं, जो पहले विभिन्न धर्मों में कही गई थीं
  • पूरी दुनिया में इस्लामिक साम्राज्य की स्थापना का लक्ष्य पेट्रो-डॉलर और प्रेमियों और जेहादियों का है, इस्लाम का नहीं.
मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना. अगर मजहब आपस में बैर रखना नहीं सिखाता है तो क्या सिखाता है. निस्संदेह आपस में प्रेम03052010404 03052010405 करना और सह-अस्तित्व सिखता है. लेकिन कई धर्मभीरू लोग सोचते हैं कि मेरा धर्म सबसे ऊंचा है और जो लोग इस धर्म को नहीं मानते हैं वो नर्क जाएंगे. ऐसे लोग अन्य धर्मावलंबियों को अपने धर्म के दायरे में लाना अपना धार्मिक कतर्व्य समझते हैं. ऐसे लोगों को लगता है कि ऐसा करने से उनका भगवान उन्हें स्वर्ग प्रदान करेगा.
दरअसल धार्मिक सर्वोत्कृष्टता का ये सिद्धांत ही दुनिया की अस्थिरता की वजह है. धार्मिक सर्वोत्कृष्टता की मानसिकता इस्लाम धर्म के अनुयायियों के बीच फैलायी गई है. इस सिद्धांत को फैलाने के लिए अरब देशों के पेट्रो-डॉलर का इस्तेमाल किया गया है. इस्लाम का ये नया रूप पेट्रो-डॉलर इस्लाम के नाम से जाना जाता है. इस नए इस्लाम के संस्थापकों और अनुयायियों ने पूरी दुनिया में नव प्रकल्पित इस्लामिक साम्राज्य की स्थापना के लिए बीड़ा उठा रखा है. वो आतंक के जरिए पूरी दुनिया में इस्लाम फैलाना चाहते हैं.
नव प्रकल्पित पेट्रो-डॉलर इस्लाम मूल इस्लाम के लिए खतरनाक है. यह बहु-पंथवादी, धर्मनिरपेक्षतावादी समाज के लिए खतरनाक है. यह इस्लाम, धर्म को व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मामला नहीं रहने देता है, बल्कि यह धर्म को इंसान के ऊपर थोपता है, यही वजह है कि इसने मूल इस्लाम को बदनाम कर रखा है. इसलिए मूल इस्लाम के अनुयायी इस नव प्रकल्पित इस्लाम का विरोध कर रहे हैं. नव प्रकल्पित इस्लाम का विरोध करने वालों की कमी नहीं है, लेकिन उनकी आवाज को दबाने की हर संभव कोशिश की जाती रही है. लेकिन कुछ आवाज हैं, जो तमाम झंझावातों के बावजूद मुखर होकर निकल रही हैं-
उन्हीं आवाजों में से एक आवाज है- सुल्तान शाहीन की.
सुल्तान शाहीन दिल्ली में रहते हैं. अपनी वेबसाइट www.newageislam.com के जरिए शाहीन जेहादियों और पेट्रो-डॉलर नव इस्लाम के खिलाफ जंग लड़ रहे हैं. शाहीन की जंग न सिर्फ तालिबान और उनके समर्थकों के खिलाफ है बल्कि उन इस्लामिक सर्वोच्चतावादियों के खिलाफ भी है, जो दावा करते हैं कि इस्लाम ही एक मात्र धर्म है, जो स्वर्ग तक पहुंचा सकता है. एक तरफ शाहीन जहां कट्टरवाद और सर्वोच्चतावाद के खिलाप जंग लड़ रहे हैं, वहीं, वो सहिष्णु, बहुपंथवादी इस्लाम के प्रति लोगों का रूझान बढ़ा रहे हैं.
शाहीन की वेबसाइट के पाठकों की संख्या लाखों में है. एक लाख सत्रह हजार तो केवल सब्सक्राइबर हैं(सब्सक्रिप्सन मुफ्त है). शाहीन के लेखों को पढ़ने वालों में भारतीय भी हैं और आस्ट्रेलियाई भी. अरब भी है और अमेरिकी भी. मुंबई के डॉ जाकिर नाइक इस्लाम को सबसे ऊंचा धर्म मानते हैं और उसे स्थापित करने की कोशिश भी करते हैं, यही वजह है कि वो शाहीन के आलोचक हैं. लेकिन इस्लामिक विद्वान नियाज फतेहपुरी शाहीन के विश्लेषण के कायल हैं.
शाहीन का जन्म बिहार के औरंगाबाद में हुआ. वे एक मौलवी के पुत्र हैं. इनका बचपन बहुत ही मुश्किलों में बीता. कम उम्र में ही पिता चल बसे. पांच भाई-बहनों की जिम्मेदारी शाहीन के कंधों पर आ पड़ी. पटना कॉलेज में पढ़ाई करते वक्त उन्होंने एक स्थानीय उर्दू दैनिक में पार्ट-टाइम काम करना शुरू कर दिया. भारतीय मूल के आरिफ अली की साप्ताहिक पत्रिका एशिया टाइम्स के संपादन के लिए वे लंदन गए. एक दशक के लंदन प्रवास के दौरान उन्हें इस्लाम और मुसलमानों की सच्चाई के बारे में उन्हें पता चला. उन्होंने वहां एक युवक से सुना, जो मुसलमान अहले हदीस को नहीं मानते हैं, उनकी हत्या कर दी जानी चाहिए. इस युवक की बात ने उन्हें परेशान कर दिया. इस युवक का संबंध अल मुजाहिद्दीन और हिजबुल तहरीर जैसे कट्टपंथी संगठनों से था. ओमर बकरी ने वहां के हजारों मुस्लिम युवकों का ब्रेनवाश किया. शाहीन को चिंता सता रही थी कि ये कट्टपंथ भारतीय उपमहाद्वीप तक न पहुंच जाए और भारतीय युवकों को अपना ग्रास न बना लें.
जब वे भारत में आए तब उन्हें भारत में भी कट्टपंथ उस कट्टरपंथ का सामना करना पड़ा यानी वो कट्टरपंथ भारत में भी पैर जमा चुका है. नब्बे के दशक में शाहीन दिल्ली में एक पत्रिका का संपादन का काम संभाल रहे थे. ये पत्रिका कथित तौर पर प्रभावशाली, शिक्षित और प्रतिभाशाली लोगों की थी. शाहीन ने पत्रिका के संपादन का काम कुछ महीने पहले ही संभाला था कि प्रबंधक मंडल के एक सदस्य ने पूछा- तुम ने एक दशक पहले एक हिंदू लड़की से शादी की थी, तुमने उसे अभी तक मुसलमान क्यों नहीं बनाया. शाहीन ने कुरान की एक आयत का जिक्र करते हुए कहा कि
धर्म मजबूरी या जोर-जबरदस्ती की चीज नहीं है और इस्लाम धर्म स्वीकारना या नहीं स्वीकारना उसका निजी मसला है
. बात इतनी सी थी और शाहीन को नौकरी से निकाल दिया गया. नौकरी जाने से वे सदमे में आ गए. सबसे बड़ा सदमा तो उन्हें इस बात का लगा कि जिन लोगों ने उनके साथ ये दुर्व्यवहार किया वे भारतीय मुस्लिम समुदाय के मक्खन(क्रीम) समझे जाते हैं.
नौकरी जाने के बाद शाहीन स्वतंत्र पत्रकारिता करने लगे. अपने लेखों में उन्होंने कट्टपंथी मानसिकता का खुलकर विरोध किया, जिसे बहुपंथवादी-बहुसांस्कृतिक भारतीय समाज और भारतीय इस्लाम को खतरा है. यही वजह थी कि संघ परिवार और भाजपा के कई नेताओं ने उन्हें मुस्लिम समाज तक पहुंचने का उचित रास्ता समझा, लेकिन शाहीन का कहना है कि बहुत से मुसलमान ही उनसे घृणा करते हैं. इसलिए वे उस समाज तक पहुंचने का सही रास्ता नहीं बन सकते. ये लोग शाहीन को काफिर और पाखंडी तक कहते हैं.
अपनी बात लोगों तक पहुंचाने के लिए उन्होंने अंतर्जाल को अपना माध्यम बनाया, जिसने कई कठमुल्लाओं को चिढ़ा दिया. कई बार तो इनकी वेबसाइट को हैक कर लिया गया, लेकिन अब शाहीन ने अपना काम जारी रखा है. आज उनकी साइट सुपरहिट है.
शाहीन का कहना है कि

आदम, मोसा और मोहम्मद साहब की तरह राम और कृष्ण भी उनके लिए पैगंबर हैं और हजरत मोहम्मद की तरह हजरत राम और हजरत कृष्ण कहने में उन्हें कोई परहेज नहीं है.

रविवार, 2 मई 2010

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