हिंदी शोध संसार

शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010

भौतिक विज्ञान के मूल सिद्धांत को चुनौती देती होम्योपैथी

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कुछ रोज पहले ब्रिटेन के संसद में कुछ सदस्यों ने होम्योपैथी को "प्लैसिबो" यानी प्रायोगिक औषध यानी बेअसर दवा करार देते हुए होम्योपैथिक शोध और चिकित्सा के लिए आवंटित की जाने वाली राशि को तत्काल बंद करने की मांग की थी. सदस्यों ने होम्योपैथी पर कई तरह के आरोप लगाए, मसलन, होम्योपैथी दवाएं रोगों पर बेअसर होती हैं, होम्योपैथी दवाएं रोगियों में भ्रम पैदा करती हैं और रोग वृहद हो जाता है, जिसका बाद में ईलाज नामुमकिन हो जाता है. होम्योपैथी, जो सबसे बड़ा आरोप लगा, वो ये कि होम्योपैथी दवाएं में मूल दवा की मात्रा बहुत ही कम यानी नहीं के बराबर या बिल्कुल नहीं होती है. यह भौतिक शास्त्र के मूल सिद्धांतों के बिल्कुल विरुद्ध है. यानी या तो होम्योपैथी असर नहीं करती.
तर्क तर्क है, जहां गलत को सही साबित किया जा सकता है और सही को उसी क्षण गलत साबित किया जा सकता है. ओशो जैसे दार्शनिक इस विद्या के महारथी रहे हैं. एकबार एक शिष्य ने पूछा कि गुरूजी एक क्षण में आप जिसे सही कहते हैं, दूसरे ही क्षण उसे गलत कह दते हैं. ये कैसे? ओशो ने कहा, मैं जो भी कहता हूं उसे साबित करता हूं. मैं बातों को इसलिए बदलता हूं कि तुम्हारी तर्क शक्ति बढ़े. कहने का मतलब है कि तर्क से गलत को सही और सही को गलत साबित किया जा सकता है और लोग अक्सर कहते रहे हैं.
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लेकिन, विज्ञान शोध का विषय है. होम्योपैथी भी शोध का विषय है. लेकिन एलोपैथी के अंधानुसरण ने होम्योपैथी, आयुर्वेदिक, यूनानी, रेकी, एक्यूप्रेशर, एक्यूपंक्चर चिकित्सा के क्षेत्रों में शोध की संभावना शून्य कर दी है. दुनियाभर की सरकारें एलोपैथी को छोड़कर चिकित्सा के क्षेत्र में किसी अन्य क्षेत्र में शोध पर पैसा खर्च करना उचित नहीं समझती है. ठीक उसी तरह, जैसे आजादी के बाद जब हिंदी को अंग्रेजी की जगह राजकाज की भाषा बनाने की बात आई तो हमारे नेता कह गए कि हिंदी अभी ये जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार नहीं है, पंद्रह सालों तक हिंदी को अंग्रेजी का अनुसरण करना होगा. आजादी के साठ साल बीत गए हैं, अब हिंदी प्रेमी सरकार और सरकारी परंपरा से नाउम्मीद हो चुके हैं. विदेशी स्कूलों से पढ़े हमारे अफसरशाह नेता अंग्रेजी जुमलों के जाल में लोगों को ऐसे उलझा रहे हैं कि देश की जनता दिग्भ्रमित हो रही है. पिछले कुछ दिनों में बक्सटोप, बक्सपास, स्वेट इक्विटी, डोजियर जैसे जुमलों ने आम जनता को खूब दिग्भ्रमित किया. नेता इन शब्दों का प्रयोग ऐसे कर रहे हैं कि जनता उनकी बात किसी तरह भी नहीं समझे, लेकिन हिंदी मीडिया अंग्रेजी के कोड को डिकोड करने में कामयाब होते दिख रही है. वह बक्सटोप, बक्सपास और स्वेट इक्विटी को समझकर उनको उन्हीं की भाषा में जवाब भी दे रही है. जहां तक हिंदी की बात है तो यह होम्योपैथी की तरह ही सरकारों की उपेक्षा का शिकार है. सत्तापक्ष और विपक्ष में इसके विरोधी भी हैं.
विरोधों की वजह क्या है ये आसानी से समझा जा सकता है. हमारे देश में नेता पैसे लेकर संसद में सवाल पूछते हैं. पैसे लेकर सरकार को गिराने और बचाने का काम करते हैं. दूसरे देशों में भी कमोबेश यही स्थिति है. अमेरिका में बैंकिंग और बीमा सुधार जैसे विधेयकों का विरोध होता है. हो भी क्यों नहीं, कई लोग तो बड़ी-बड़ी कंपनियों और वित्तीय संस्थानों की लॉबिग करने के लिए ही संसद में जाते हैं. ब्रिटेन में भी स्थिति ज्यादा अलग नहीं है, वहां भी कई ऐसे लोग मौजूद हैं, जो दवा बनाने वाली बड़ी-बड़ी कंपनियों की संसद में लॉबिग करते हैं.
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ऐसे लोग होम्योपैथी को प्लासिबो करार देते हैं, तर्क देते हैं कि होम्योपैथी भौतिक विज्ञान के मूल सिद्धांत के विरुद्ध है. सच है कि होम्योपैथिक दवाओं में दवा की मात्रा नहीं के बराबर(कभी कभी तो बिल्कुल नहीं होती है). भौतिक विज्ञान के मुताबिक, किसी भी चीज का असर होने के लिए, वस्तु की मात्रात्मक उपस्थिति आवश्यक है. औषधी की मात्रात्मक अनुपस्थिति के बावजूद होम्योपैथिक दवाएं काम करती हैं और खूब काम करती हैं. हां, ये सच है कि एलोपैथी के दुष्प्रभाव या प्रभुत्व के कारण होम्योपैथी के क्षेत्र में कभी उस तरह का अनुसंधान, शोध नहीं हुआ. लेकिन कस्बाई शहरों और गांव देहातों में आज भी हजारों लोगों के लिए होम्योपैथी अंतिम आशा बनी हुई है.
इसको पूर्णत: नकारने या स्वीकारने से पहले इस क्षेत्र में बहुत ही व्यापक पैमाने पर अनुसंधान की जरूरत है. आखिर क्या वजह है कि भौतिक विज्ञान को चुनौती देने के बावजूद होम्योपैथी इस वैज्ञानिक युग में भी जिंदा है और करोड़ों लोगों के लिए आशा की अंतिम किरण बनी हुई है.

3 टिप्‍पणियां :

  1. किसी भी विलयन के अतितनुकरण के उपरांत विलायक में विलेय की मात्रा अनुपस्थित हो जाए यह संभव नहीं है। अति तनुकरण पर विलायक में विलेय की स्थिति क्या रहती है। यदि किसी भाग में विलेय अनुपस्थित हो जाए तब विलायक का जीवित कोशिकाओं और शरीरों पर क्या प्रभाव रहता है इस पर गंभीर और लंबे शोध की आवश्यकता है। केवल प्लेसीबो प्रभाव का हवाला दे कर होमियोपैथी को अवैज्ञानिक करार नहीं दिया जा सकता। वस्तुतः यह ऐलौपैथिक दवा उत्पादकों के मजबूत गठबंधन का षड़यंत्र है।

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  2. मैं आपकी बात से सहमत हूं। न केवल होम्योपैथी बल्कि आयुर्वेदिक चिकित्सा पर भी बड़े पैमाने पर अनुसंधान होने चाहिए।

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  3. कल ही केतन देसाई को गिरफ्तार किया गया है जो एमसीआई के चेयरमैन हैं.... अपने आप में सबकुछ बताता है..

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