हिंदी शोध संसार

मंगलवार, 16 दिसंबर 2008

इस्लाम का सही मायने

दो रोज पहले टाइम्स ऑफ इंडिया में इस्लामिक विद्वान वहीदुद्दीन का एक आलेख पढ़ रहा था. आलेख की शुरूआत उन्होंने एक सवाल से किया- आतंकवाद की समस्या का समाधान कैसे निकले. उन्होंने कहा एक ओर सत्ता अपने बल से आतंकवाद को कुचल देना चाहता है तो दूसरी ओर ऐसे भी लोग है जो इसकी निंदा करते हैं और निंदा करते रह जाते हैं. मगर दोनों ही तरीके नाकाफी साबित होते हैं, तो फिर समस्या का समाधान कैसे हो.
वहीदुद्दीन के मुताबिक, आतंकवाद भी एक विचारधारा पर आधारित है, इसलिए यह जरूरी है कि विचारधारा की लड़ाई विपरीत-विचारधारा से लड़ी जाए. आतंकवाद उस विचारधारा पर आधारित है जो इस्लाम को एक राजनीतिक व्यवस्था मानता है, और वह विचारधारा चाहता है कि पूरी दुनिया में यह व्यवस्था लागू हो जाए. कई युवा इस विचारधारा के प्रति इतने कट्टर है कि वह इस व्यवस्था को पूरी दुनिया में लागू करने के लिए कोई भी कुर्बानी देने के लिए तैयार हैं. यह विचारधारा युवाओं को बताता है कि जिहाद की राह में कुर्बान होने पर उन्हें जन्नत नसीब होगा.
वहीदुद्दीन के मुताबिक, कुरान या हदीस में कहीं भी इस्लामिक साम्राज्य की स्थापना की बात नहीं कही है. दरअसल इस्लाम का मतलब शांति का मजहब होता है. वहीदुद्दीन के हिसाब से इस्लाम की दो बाते उसकी महानता को साबित करने के लिए काफी है- पहला खुदा को अपना सृजनकर्ता मानो और उसके समक्ष खुद का आत्मसमर्पण कर दो. दूसरा, सब के साथ मिल-जुल कर रहो और सबको उसका अधिकार दिलाओ. इस्लाम में एक निर्दोष की हत्या पूरे इंसानियत के कत्ल के बराबर है.
दरअसल इस्लाम को राजनीतिक विचारधारा मानने वाले लोग इस्लाम को नहीं मानते हैं, वे अपनी विचारधारा के प्रति आग्रही होते हैं. इस्लाम का आतंकवाद का कोई लेना देना नहीं है. इस्लाम का ताल्लुक केवल शांति, स्नेह और सहिष्णुता से है.
जेहाज का मतलब शांतिपूर्ण संघर्ष है. यह संघर्ष आंतरिक बुराईयों है. अपने अंदर की बुराइयों से संघर्ष.

3 टिप्‍पणियां :

  1. यह जरूरी है कि विचारधारा की लड़ाई विपरीत-विचारधारा से लड़ी जाए. अगर यह विचारधारा बदल जाती है तब आतंकवाद के लिए काफ़ी हद तक रिक्रूट्स मिलने बंद हो जायेंगे. पर यह कुछ हद तक ही सम्भव हो सकता है और इस के लिए भी मुस्लिम विद्वानों को ही कुछ करना होगा. कोई और कुछ कहेगा तो उसे इस्लाम में दखलंदाजी मान लिया जायेगा.

    दूसरी बात यह है कि आतंकी हमलों को रोकने के लिए कानूनी कदम भी उठाने होंगे. आतंकी हमले देश और समाज के ख़िलाफ़ अपराध हैं, और अपराध की सजा देना किसी भी सरकार का कर्तव्य है.

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  2. इसमें कोई दोराय नहीं कि वहीदुद्दीन साहब बडे ही सुलझे हुये विद्वान व्यक्ति हैं, लेकिन उनकी आवाज नक्कारखाने में तूती की आवाज बनकर रह जाती है. दारुल-हरब के लिये आतंक फैलाने वालों के दिमाग में उनकी बातें घुसेंगी क्या. मात्र इतना ही फर्क हिन्दू और मुसलमानों के मध्य है, एक धार्मिक हिन्दू दूसरे को चोट पहुंचाने की बात को कभी स्वीकार कर ही नहीं सकता चाहे फिर वह शंकराचार्य क्यों न कहें, जबकि अधिकांश मुसलमानों के साथ बिलकुल उलट है.

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