हिंदी शोध संसार

शनिवार, 13 सितंबर 2008

जान प्रीत रस एतनेहि माहि

माता जानकी अशोक वाटिका में आकाश के अग्निपुंजों को देख-देखकर दुख की अग्नि में जली जा रही हैं. विधाता ही विपरीत हो गए. कैसे मिटेगी ये पीड़ा. अशोक के नव पल्लव भी उन्हें अग्नि की भांति जला रहे हैं. माता जानकी की दशा को देखकर हनुमान जी स्वयं व्याकुल हो उठे. भगवान राम की भेजी मुद्रिका भूमि पर गिरा दी और राम का गुनगान करने लगे. माता जानकी के बुलाने पर हनुमान जी सामने आए. भगवान राम से दोस्ती कैसे हुई, पूरी कथा सुनाई. राम का दूत जानकर माता जानकी ने अपना सारा दुख हनुमान जी को कह सुनाया..

मन करम वचन चरण अनुरागी।
केहि अपराध नाथ हौ त्यागी।।

माता जानकी को विकल देखकर हनुमान जी बोले, हे माता, अनुज लक्ष्मण के साथ भगवान राम कुशल हैं, सिर्फ आपके दुख से वे दुखी हैं-

मातु कुशल प्रभू अनुज समेता।
तब दुख दुखी भा सुकृपा निकेता।।
जनि जननी मानहुं जिए ऊना।
तुम तें प्रेम राम कर दूना।।

कहेहु राम वियोग तब सीता।
मो कहुं सकल भए विपरीता।।
नव तरू किसलय मनहुं कृशानु।
काल निशा सम निशि शशि भानु।।
कुबलय बिपिन कुंत बन सरिसा।
बारिद तपत तेल जनु बरिसा।।
जे हित रहे करहि तेहिं पीड़ा।
उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा।।
कहहु ते कछु दुख घटि होई।
काहे कहौं यह जान न कोई।।
तत्व प्रेम का मम अरू तोरा।
जानत प्रिया एक मन मोरा।।
सो मन रहत सदा तोहि पाहीं।
जानु प्रीत रस एतनेहि माहीं।।

1 टिप्पणी :

  1. dhanya hai hamara maha kavya ramayan ! us ka sunder kaand , manav man ka uttam vishleshan kar..
    vipatti me manav kaisa aacharan rakhe ? yah sikhata hai .

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