हिंदी शोध संसार

सोमवार, 23 सितंबर 2013

विवादों और चुनौतियों के प्रखर पुरुष नरेंद्र मोदी

कौन कहता है कि विवादों से इन्सान का कद घट जाता है। विवाद और चुनौतियां तो वक्त के वो पैमाने हैं जिससे इंसान की ऊंचाई मापी जाती है। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में तो कम से कम यही कहा जा सकता है। खुद मोदी ने कहा था कि
लोग मुझपर पत्थर फेंकते रहे, लेकिन मैंने कभी पलटकर जवाब नहीं दिया, बल्कि उन पत्थरों को चुना और उसी से गुजरात के विकास का मार्ग बनाया।
                         17 सितंबर 2011 गुजरात सद्भावना उपवास
दरअसल, विवादों और चुनौतियों के बीच कोई इंसान कहां खड़ा रहता है, उसी से लोग उसकी ऊंचाई मापते हैं। जहां तक बात मोदी की है तो उन्होंने खुद विवादों और चुनौतियों का रास्ता चुना। एक ओर, 2002 के गुजरात दंगों को लेकर तथाकथित सेक्यूलर जमात ने संसद से सड़क और सड़कों से अदालत तक उनके खिलाफ मोर्चा खोला.. तो दूसरी ओर, सड़क बनवाने के लिए जब उन्होंने मंदिरों को गिराया तो आरएसएस और विश्व हिंदू परिषद जैसे दक्षिण पंथी संगठन उनके खिलाफ हो गए। इसी साल पंद्रह अगस्त जब उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के समांतर खड़ा होकर उनकी निष्ठा पर सवाल उठाए तो खुद उनकी ही पार्टी के वरिष्ठ नेता उनके खिलाफ हो गए। मगर, इन विरोधों और आलोचनाओं का मोदी पर कोई असर होता नहीं दिखा। वो बार-बार और हर बार अपने ही बनाये रास्तों पर चलने को तत्पर दिखे। कई लोगों को लगा कि खुद को भीड़ से अलग देखने और दिखाने का फैशन दरअसल मोदी का पैशन है। इसी फैशन और पैशन का ही तो दूसरा नाम युवावस्था है। देखते ही देखते मोदी युवा-हृदय सम्राट बन गए। मोदी आज उन युवाओं के दिलों की धड़कन बन गए जिसमें लीक से हटकर कुछ कर गुजरने का जूनुन है। ये जुनून गमले में कुकुरमु्त्ता नहीं, बल्कि कीचड़ में कमल खिलाना चाहता है। निराशा की ऊर्वर धरा से पैदा हुई ये वो घास है जो ना सिर्फ बरगद की समीक्षा करने का माद्दा रखती है, बल्कि चींटी बनकर पागल हाथी को भी घुटने टेकने के लिए मजबूर कर सकती है।
इन विवादों और चुनौतियों के बीच मोदी ने अपनी छवि एक विकास पुरुष की बनायी। चाय की दुकान से शुरू होकर प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनने तक की उनकी जीवन यात्रा में कई पड़ाव आए। विद्यार्थी परिषद और आरएसएस के रास्ते वो भारतीय जनता पार्टी से जुड़े। राजनीतिक जीवन के शुरूआती दिनों में ही मोदी ने साबित कर दिया वो औरों से अलग हैं। नरेंद्र मोदी गुजरात में 1995 और 1998 के विधानसभा चुनावों के प्रमुख रणनीतिकार रहे। यही वजह है कि 2001 में उपचुनावों में हार के बाद जब केशुभाई पटेल ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया तो पार्टी ने मोदी को गुजरात की कुर्सी सौंपने में जरा भी देर नहीं लगाई। मोदी जब एक बार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठ गए तो फिर उनके समक्ष अब तक कोई चुनौती नहीं पेश कर सका। मोदी लगातार चौथी बार गुजरात के मुख्यमंत्री पद की कुर्सी पर बने हुए हैं।
2002 में गोधरा में ट्रेन जलाए जाने की घटना के बाद प्रदेश में भड़की सांप्रदायिक हिंसा के लिएनरेंद्र मोदी की खूब आलोचना हुई, मगर मोदी के शासनकाल में गुजरात ने सतत विकास की नई ऊंचाईयों को छुआ, जिसके लिए देश विदेश में उनकी तारीफों के पुल बांधे गए।
मोदी प्रशासन की सबसे ज्यादा तारीफ गैर-सरकारी संगठनों और समुदायों की हौसला अफजाई के लिए हुई, जिनकी मदद से गुजरात में आधारभूत संरचना का जाल बुना गया, जिसने भूमिगत जल स्रोतों के संरक्षण में अहम भूमिका निभाई। एक रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2008 के अंत तक गुजरात में जिन पांच लाख ढांचे बनाए गए, उनमें एक लाख तेरह हजार सात सौ अड़तीस चेक डैम हैं। इन प्रयासों के गुजरात में कृषि क्षेत्र का कायाकल्प हुआ। मोदी के कुशल नेतृत्व का विरोधियों ने भी लोहा माना।
जहां तक बात राष्ट्रीय राजनीति की है तो 1995 में मोदी भाजपा के महासचिव और 1998 में राष्ट्रीय सचिव बनाए गए। इससे पहले नब्बे के दशक में जब लालकृष्ण आडवाणी ने रथयात्राएं की तो नरेंद्र मोदी भी उनके साथ थे।
विकास, विवाद और चुनौतियों के बीच आज जब नरेंद्र मोदी राष्ट्रीय राजनीति का नया अध्याय लिखने के लिए अग्रसर हैं तो उनपर विवाद स्वाभाविक है। भाजपा के जिस पितामह ने 2002 के गुजरात दंगों के बाद मोदी का बचाव किया, वो आज मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने के खिलाफ हैं। आखिर सवाल उठता है कि विवाद और चुनौतियां मोदी को छोड़कर जाएं तो जाएं कहां।

2 टिप्‍पणियां :

  1. मोदी ने अपनी विकास की सोच को सुदृढ किया है ।

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  2. आज मोदी विकास पुरुष का पर्याय है । आज वो प्रधानमंत्री पद के जिनके सशक्त उम्मीदवार है उतना कोई नहीं ।

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