हिंदी शोध संसार

बुधवार, 20 जनवरी 2010

मत थूकिए मानवाधिकारवादियों पर

मेरे एक मित्र बहुत ही खिन्न थे. उनका मन थूकने को कर रहा था. आप कहेंगे, थूकने का मन कर रहा तो क्या परेशानी है, अपने देश में जहां तहां थूकने पर तो प्रतिबंध नहीं है. लेकिन उनका मन जहां थूकने को कर रहा था, मैं वहां थूकने की इजाजत उन्हें कभी नहीं दे सकता. आखिर मेरी भी मजबूरी है. इस पोस्ट को पढ़िये फिर पता चल जाएगा मैं उन्हें थूकने की अनुमति क्यों नहीं देता हूं.
आज कश्मीरी पंडितों के लिए पलायन दिवस है. 1990 में आज ही के दिन से कश्मीरी पंडित छोड़कर देश के विभिन्न भागों में भागना शुरू किया था. बीस साल हो गए कश्मीरी पंडित अपने ही देश में शरणार्थियों की जिंदगी जी रहे हैं. उनकी जिंदगी बद से बदतर हो रही है. उनके बच्चों को शिक्षा और रोजगार नहीं है. नई पीढ़ी का भविष्य क्या होगा आसानी से समझा जाता है. बात साल दो साल की नहीं है, बीस सालों से ये लोग शरणार्थी की जिंदगी जीने को मजबूर हैं. इनका क्या कसूर है? इनका कसूर सिर्फ इतना है कि ये मुस्लिम बहुल राज्य जम्मू-कश्मीर में हिंदू थे. देश में अल्पसंख्यकों के लिए योजनाएं बन रही हैं. सच्चर कमिटी बनाई गई. रंगनाथ मिश्रा समिति ने मुसलमानों को आरक्षण की भी सिफारिश कर दी.
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लेकिन इन अभागे कश्मीरी पंडितों को अपने ही घरों में नहीं रहने दिया जा रहा है. अपने देश में मानवाधिकारों के लिए लड़ने वाले संगठनों की कमी नहीं है. लेकिन आज तक कहीं भी किसी भी मानवाधिकार संगठन को कश्मीरी पंडितों के मानवाधिकार के लिए संघर्ष करते नहीं देखा गया है. एक भी मानवाधिकार कार्यकर्ता कश्मीरी पंडित के पक्ष में नहीं है. उसके दुख-दर्द को सुनने वाला नहीं है. सरकारों की नाकामी का आलम ये कि बीस सालों से कोई इनकी सुधि लेने वाला नहीं है.
जब कभी ये अपनी आवाज उठाते हैं इन्हें सांप्रदायिक कहा जाता है. देश के मानवाधिकारवादी अल्पसंख्यकों की रक्षा के नाम पर तमाम तरह की लड़ाई लड़ते हैं, नारे लगाते हैं, मीडिया में प्रभाव जमाकर सरकार, प्रशासन और न्यायपालिका पर दबाव बनाते हैं. हमारे देश के मानवाधिकारवादियों की यही चाल, चरित्र और चेहरा है.
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1989 और 1990 में घाटी में कश्मीरी पंडितों को निशाना बनाकर आतंकवादी हमले किए गए. आतंकियों के आगे सरकार असहाय थी. यही कारण थे कि कश्मीरी पंडितों को घाटी छोड़कर भागना पड़ा. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक पिछली सदी के अंत तक कश्मीर में छह प्रतिशत हिंदू थे. जो 2006 में घटकर मात्र 0.1 प्रतिशत रह गए. इस्लामिक आतंकवाद में जिस तरह कश्मीरी पंडितों को निशाना बनाया गया उसमें करीब चार लाख कश्मीर पंडितों को या तो घाटी छोड़कर भागना पड़ा या उनकी हत्या कर दी गई. अमेरिकी कांग्रेस में 2006 में पारित एक प्रस्ताव में इस घटना को जातीय निर्मूलीकरण नाम देकर इसकी निंदा की गई. 2009 में भी ओरेगन विधानसभा में एक प्रस्ताव पारित हुआ जिसमें जम्मू-कस्मीर में इस्लामिक राज्य की स्थापना के लिए जातीय निर्मूलीकरण की संज्ञा दी गई. पिछले साल भी आतंकवादियों ने कश्मीरी पंडितों को धमकी दी.
भारत की धर्मनिरपेक्षता को लेकर सीना ऊंचा करने वालों के मुंह तमाचा है यह इस्लामी राज्य. उन मानवाधिकारवादियों के मुंह पर भी जो देश को इस्लामिक गणराज्य बनाने के लिए दिनरात मिहनत करते हैं.
(सभी चित्र साभार- आपत्ति होने पर सूचित करें.)

4 टिप्‍पणियां :

  1. विचारणीय आलेख ....बसंत पंचमी की शुभकामनाये और बधाई.

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  2. यह इस देश का दुर्भाग्य है कि यहाँ हिन्दुओं की बात करना ही सामम्प्रदायिकता है। ये मानवाधिकारी तो पैदा ही आंतकवादियों और देश का कानून तोड़ने वालों की पैरवी करने के लिए है। यदि इनकी फण्डिंग के स्रत्रोत मालूम हो तो पता चले इनसे बढ़कर कोई देशद्रोही नहीं है।

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  3. इस धर्मनिरपेक्ष देश का लोकतंत्र ही ऐसा है जो सिर्फ़ वोटों की गिनती से शुरू होता है और वहीं ख़त्म.

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