हिंदी शोध संसार

सोमवार, 30 नवंबर 2009

78000 हजार करोड़ रुपये का घोटाला?

जिसके लिए लोगों ने आंसू बहाए और जानें दीं..

प्रस्तुत संदेश कुछ रोज पहले ही प्राप्त हुई थी, जिसे विस्तृत जानकारी और विश्वस्तता की जांच किए बगैर पोस्ट नहीं करने की इच्छा थी. मगर समाचार पत्रों में खबर आ रही है कि आंध्रप्रदेश के पूर्व को मुख्यमंत्री वाईएस राजशेखर रेड्डी के पुत्र जगमोहन रेड्डी को खुश करने के लिए कांग्रेस उन्हें केंद्र में मंत्रीपद देने की तैयारी कर रही है. जगनमोहन रेड्डी पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं. ऐसे में, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह को उन्हें मंत्रीपद से उपकृत करने से पहले देश की जनता से ये साफ करना चाहिए कि भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों से घिरे जगनमोहन रेड्डी को ईमानदार प्रधानमंत्री(? लालू और कोड़ा के संरक्षक ) अपने मंत्रीमंडल में कैसे जगह देंगे?
image

                                     चार साल में 78000 करोड़ बनाए

टाटा, रिलायंस, बजाज, इन्फोसिस, विप्रो, बिड़ला ग्रुप को अरबपति बनने में दशकों लग गए लेकिन वाइएसआर एंड कंपनी को करीब 78000 करोड़ रुपये का साम्राज्य बनाने में महज साढ़े चार साल लगे.
सोचिए, 2008-09 में आंध्रप्रदेश का बजट 1,00,000 करोड़ रुपये था, जबकि वाइएसआर का साम्राज्य 78000 करोड़ रुपये का है यानी
1 परिवार=1 राज्य
23000 मेगावाट क्षमता वाली एनटीपीए के एक शेयर का दाम महज 290 रुपये है, जबकि मात्र 22.50 मेगावाट क्षमता वाली संदूर पावर(वाइएसआर की कंपनी) के एक शेयर का दाम 675 रुपये के करीब है. आर्थिक मंदी से जूझ रहे देश और दुनिया के अर्थशास्त्रियों को वाईएसआर परिवार एंड कंपनी से प्रबंधन का गुर सीखने चाहिए.
जगनमोहन की कंपनी जगती पब्लिकेशन(साक्षी समाचार पत्र और भविष्य में शुरू होने वाले इंदिरा टीवी) की बाजार पूंजी 3600 करोड़ रुपये है. है न युवराज का जादू?
7800 करोड़ रुपये के सत्यम घोटाले को देश का सबसे बड़ा कॉर्पोरेट घोटाला माना जाता है तो 78000 करोड़ रुपये के वाइएसआर फैमिली एंड कंपनी के घोटाले को आप क्या कहेंगे. है नाम देने की हिम्मत?
image

                                           78000 करोड़ का साम्राज्य

1956 में आंध्रप्रदेश की शक्ति उत्पादन क्षमता(पावर जेनरेशन कैपेसिटी) 213 मेगावाट थी जो अब 12500 मेगावाट है, बिहार की वर्तमान पावर उत्पादन क्षमता महज 4000 मेगावाट है. यानी आंध्रप्रदेश को 12500 मेगावाट शक्ति पैदा करने में तिरपन साल लगे, लेकिन महज दो साल पहले शुरू हुई वाइएसआर फैमिली एंड कंपनी अगले सात साल में 14000 मेगावाट विद्युत शक्ति पैदा करने की योजना बनाई है. यानी ऐसा करिश्मा सिर्फ वाइएसआर फैमिली एंड कंपनी ही कर सकती है.
रघुराम सिमेंट कंपनी में वाइएस जगमोहन की पूंजी 45 करोड़ रुपये थी. लेकिन कुछ सालों बाद जब यह भारती सिमेंट बन गई तो जगनमोहन की हिस्सेदारी 6500 करोड़ रुपये है.. What an Idea sir jee?
शायद यह भारतीय अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा घोटाला है.
और शायद यही वजह है कि वाईएसआर को खोजने के लिए देश का सबसे बड़ा अभियान चलाया

रविवार, 29 नवंबर 2009

जगदगुरु रामानंदाचार्य करेंगे गुंडी के भगवान रंगनाथ मंदिर में पूजन


आरा, 29 नवंबर। रामानंदी वैष्णव सम्प्रदाय के मुख्य आचार्य जगदगुरु रामानंदाचार्य पद प्रतिष्ठित स्वामी रामनरेशाचार्य जी महाराज भोजपुर जिले के गुंडी स्थित भगवान रंगनाथ के प्रसिद्ध मंदिर में पूजन करेंगे। इसके लिए मंदिर प्रबंधन ने विशेष तैयारियां शुरू कर दी है। बैरागी सम्प्रदाय से जुड़े संत-महात्मा और वैष्णव भक्तजन भी अपने स्तर से आचार्यश्री के स्वागत औऱ अभिनंदन की तैयारियों में जुटे हैं।
रामानंद सम्प्रदाय के मूल आचार्यपीठ, श्रीमठ , काशी के वर्तमान पीठाधीश्वर स्वामी रामनरेशाचार्यजी महाराज इसके निमित्त तीन दिनों के प्रवास पर आरा आ रहे हैं। वे 8 दिसम्बर को दोपहर तक आरा पहुंचेंगे औऱ अल्प विश्राम के बाद गुंड़ी के लिए प्रस्थान करेंगे। उनकी यात्रा की तैयारियों में जुटे सतेन्द्र पाण्डेय ने बताया कि आरा जीरो माईल पर हीं गाजे-बाजे के साथ महाराजश्री का जोरदार स्वागत किया जाएगा। फिर वे कतीरा स्थित नागरमल बगीचे में विश्राम के लिए रूकेंगे। स्थानीय भक्तगण इस दौरान उनका आरती-पूजन कर स्वागत करेंगे। अपराह्न तीन बजे से उनका काफिला गुंडी के लिए रवाना हो जाएगा। रास्ते में भी जगह-जगह उनके स्वागत की तैयारियां की जा रही है। भगवान रंगनाथ मंदिर के व्यवस्थापक डॉ. बबन सिंह ने बताया कि सरैंया बाजार पर महाराजश्री को हाथी-घोड़े ,बैण्ड-बाजे के साथ हजारो भक्त स्वागत करेंगे। वहां से शोभा यात्रा की शक्ल में वे गुंडी तक जाएंगे। शाम को प्रवचन का कार्यक्रम मंदिर परिसर में हीं निर्धारित है। दूसरे दिन सुबह वे षोडशोपचार विधि से भगवान रंगनाथ का पूजन करेंगे। काशी से पधारे वैदिक विद्वान औऱ श्रीमठ के वेदपाठी छात्र पूजन में पुरोहित का कार्य सुसम्पन्न करेंगे। शाम में पुनः स्थानीय श्रद्धालुओं को आचार्यश्री के अमृत वचन का लाभ मिल सकेगा। तीसरे दिन वे आरा होते हुए काशी के लिए प्रस्थान कर जाएंगे।
गुंडी स्थित भगवान रंगनाथ के मंदिर में रामानंदाचार्य स्वामी रामनरेशाचार्य का ये दूसरा प्रवास होगा। इससे पहले सन् 2001 में वे भगवान का दर्शन करने गुंडी गये थे। आयोजन से जुड़े लोग बताते हैं कि तभी आचार्यश्री ने दूसरी बार आकर भगवान के पूजन करने का संकल्प व्यक्त किया था। भगवान रंगनाथ का मंदिर भोजपुर जिले में अपनी तरह का इकलौता मंदिर है जो दक्षिण भारतीय शैली में निर्मित है और सैकड़ो वर्ष पुराना है। मंदिर का वास्तु शिल्प देखते हीं बनता है। इसका गोपुरम् इस प्रकार से बना है कि रोज प्रातः भगवान भाष्कर की रश्मियां भगवान का अभिषेक करती हैं। कुछ साल पहले तक दक्षिण भारत के पुजारी हीं यहां की व्यवस्था और पूजा-पाठ की जिम्मेदारियां संभालते थे। इस रुप में ये मंदिर उत्तर भारत औऱ दक्षिण भारत के बीच एक सांस्कृतिक सेतु का भी काम करता है। माना जा रहा है कि रामभक्ति परंपरा के मूल आचार्य पीठ के मुख्य आचार्य के आगमन और पूजन से जनमानस के बीच मंदिर की विशेषता को लेकर चर्चा तेज होगी औऱ शासन-प्रशासन का ध्यान भी इसकी ओर जाएगा। यदि ऐसा होता है तो गुंडी को पर्यटन केन्द्र के रुप में विकसित करने की मांग फिर से जोर पकड़ेगी, जो हाल वर्षों में मंद पड़ गयी थी।
यहां उल्लेख करना जरूरी है कि जगदगुरु रामानंदाचार्य की गद्दी पर विराजमान स्वामी श्रीरामनरेशाचार्यजी महाराज का भोजपुर से गहरा सरोकार है। उनकी जन्मभूमि इसी जिले के परसियां गांव में है। ये अलग बात है कि अपने संकल्पों के चलते घर छोड़ने के बाद जन्मभूमि पर वे नहीं गये। उनके ग्रामीण औऱ श्रद्धालु भक्त बार-बार के आग्रह के बावजूद आचार्यश्री को परसियां ले जाने में असफल रहे हैं। बाल्यावस्था में हीं घर छोड़कर काशी गये स्वामीजी ने किशोरवय में हीं वैष्णवी दीक्षा ली और विरक्त संन्यासी हो गये। काशी में रहते हुए छह दर्शनों में उन्होंने सर्वोच्च उपाधियां अर्जित की औऱ न्याय शास्त्र के पारंगत विद्वान के रूप में देश भर में मान्य हुए। संस्कृत विद्वानों की पाठशाला के नाम से चर्चित हरिद्वार के कैलास आश्रम में कई वर्षों तक उन्होंने न्याय दर्शन पढ़ाया। इनसे पढ़े हुए अनेक लोग देश के कई प्रमुख विश्वविद्यालयों में संस्कृत के प्राध्यापक हैं और अनेक शिष्य मठ-मंदिरों के प्रधान के रुप सनातन धर्म की सेवा में संलग्न हैं। रामानंद सम्प्रदाय के विशिष्ठ संत-महात्माओं ने वर्ष 1988 में उन्हें श्रीमठ लाकर जगदगुरू रामानंदाचार्य पद पर प्रतिष्ठित किया, तब से लगातार भारत के कोने -कोने में फैले विशाल बैरागी समाज के संत-महात्माओं औऱ दुनिया भर के राम भक्तों का वे मार्गदर्शन कर रहे हैं। सम्प्रति वे हरिद्वार में दुनिया का सबसे बड़ा राममंदिर बनाने में संलग्न हैं .


जय हिंदी जय भारत

बुधवार, 11 नवंबर 2009

कार्यफल जानिए- रामश्लाका प्रश्नावली से

सु

प्र

बि

हो

मु

सु

नु

बि

धि

रु

सि

सि

रहिं

बस

हि

मं

अं

सुज

सो

सु

कु

धा

बे

नो

त्य

कु

जो

रि

की

हो

सं

रा

पु

सु

सी

जे

सं

रे

हो

नि

हुं

चि

हिं

तु

का

मि

मी

म्हा

जा

हू

हीं

ता

रा

रे

री

हृ

का

खा

जू

रा

पू

नि

को

जो

गो

मु

जि

यँ

ने

मनि

हि

रा

मि

री

न्मु

खि

जि

जं

सिं

नु

को

मि

निज

र्क

धु

सु

का

गु

रि

नि

ढ़

ती

ना

पु

तु

नु

वै

सि

हुं

सु

म्ह

रा

ला

धी

री

हू

हीं

खा

जू

रा



रे



श्री रामश्लाका प्रश्नावली वर्ण महिमा का अद्वितीय उदाहरण है. गोस्वामी तुलसीदास का सानिध्य पाकर इन शब्दों की गरिमा और भी बढ़ गई है. इसकी महिमा स्वयंसिद्ध है.  आप किसी कार्य के बारे में जानने के लिए उत्सुक हैं उसके परिणाम को लेकर मन में उधेरबुन है तो इस रामश्लाका प्रश्नावली से इस उधेरबुन को दूर सकते हैं. इस प्रश्नावली के किसी एक बक्से के अक्षर या अक्षरों या मात्रा(बक्से में जो कुछ हो) को पुस्तिका पर लिख लें. फिर जैसे मैंने चुना, फ(दूसरी पंक्ति में रेखांकित) अब इस फ को छोड़कर, उसके नवें अक्षर या अक्षरों या मात्रा का चुनिये. जैसे मेरे चुने हुए ये अक्षर ल आया. फिर ल को छोड़कर, उसका नौवा अक्षर. इसी तरह आगे तब तक बढ़ें जब सबसे पहले चुने अक्षर पर न पहुंच जाएं.  चुने हुए अक्षरों या मात्रा को लिखते जाए. इससे एक चौपाई बनती है. बस यही चौपाई आपके प्रश्न का उत्तर है.
जैसे मेरे चुने हुए फ से जो चौपाइ बनी-
सु फ ल म नो र थ हो हुं तु म्हा रे  रा मु ल ख नु सु नि भ ए सु खा रे
इस प्रश्नश्लाका से कुल नौ चौपाइयां बनती हैं जो इस प्रकार फलाफल देती हैं-
1. सुनु सिए सत्य असीस हमारी। पूजिहि मन कामना तुम्हारी।।
फल- ये प्रसंग श्री सीताजी के गौरी पूजन के दौरान आया है और गौरी जी ने सीता माता को आशार्वाद दिया है कि तुम्हारा मनोरथ पूरा होगा. यानी प्रश्नकर्ता का प्रश्न उत्तम है और अभीष्टकार्य सिद्ध होगा.
2. प्रबिसि नगर कीजे से काजा। हृदय राखि कौसलपुर राजा।।
फल- प्रसंग हनुमान जी के लंका में प्रवेश के समय आया है. प्रश्नकर्ता भगवान का नाम लेकर कार्य शुरू करे, कार्य सिद्ध होगा.
3. उघरहिं अंत न होइ निबाहू। कालनेमि जिमि रावन राहू।।
फल- प्रसंग बालकांड के सत्संग वर्णन प्रसंग में है. प्रश्नकर्ता जाने कि इस कार्य में भलाई नहीं है और कार्य की सफलता में संदेह है.
4. बिधि बस सुजन कुसंग परहीं। फनि मनि सम निज सुन अनुसरहीं.
फल- प्रसंग बालकांड में है. प्रश्नकर्ता से आग्रह है कि वे खोटे मनुष्य का साथ छोड़ दे और कार्य पूरा होने में संदेह है.
5. मुद मंगलमय संत समाजू। जो जग जंगम तीरथराजू।।
फल- प्रश्न उत्तम है और कार्य सिद्ध होगा.
6. गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई।।
फल- प्रश्न श्रेष्ठ है और कार्य सिद्ध होगा.
7. बरुन कुबेर सुरेश समीरा। रन सन्मुख धरि काहुं न धीरा।।
फल- कार्य पूर्ण होने में संदेह है
8. सुफल मनोरथ होहुं तुम्हारे। रामु लखनु सुनि भए सुखारे।।
फल- प्रश्न उत्तम है. कार्य सिद्ध होगा.
9. होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ाबै साखा.
फल- कार्य होने में संदेह है, इसे भगवान पर छोड़ देना अच्छा है.

जय हिंदी जय भारत

मंगलवार, 10 नवंबर 2009

जीवन विद्या का चौदहवां राष्ट्रीय सम्मेलन


जीवन विद्या का 14वां राष्ट्रीय सम्मेलन हैदराबाद में सम्पन्न
डॉ देवकुमार पुखराज
अमरकंटक से आरंभ हुआ जीवनविद्या का कारवां दक्षिण भारत तक पहुंच गया है. अक्टूबर माह के पहले सप्ताह में इसका एक विहंगम नजारा हैदराबाद में देखने को मिला. जहां जीवन विद्या से जुड़े देशभर के २३ केन्द्रों से लगभग २५० लोग एकत्र हुए. दक्षिण भारत में जीवन विद्या का ये पहला और 14 वां राष्ट्रीय अधिवेशन था. हैदराबाद से सटे तुपरान कसबे के अभ्यासा स्कूल में आयोजित यह सम्मेलन कई मामलों में दूसरे सम्मेलनों से भिन्न रहा. आजकल के सम्मेलनों के उलट न तो इसके प्रचार-प्रसार के लिए बैनर- पोस्टर लगे थे और नहीं कहीं होर्डिंग्स.यहां तक की मीडिया वालों को भी आमंत्रण नहीं था. शायद यहीं इस अभियान की खासियत भी है .इसके शिल्पी प्रचार-प्रसिद्धी से दूर रहते हुए शिक्षा के जरिये जन मानस में समझदारी विकसित करने के काम में तन्मयता से जुटे हैं. सम्मेलन में वे लोग हीं अपेक्षित थे जो जीवनविद्या के प्रबोधन, लोकव्यापीकरण और प्रचार में लगे हैं. ऐसे हीं तकरीबन ढाई सौ लोग तुपरान में जुटे जिसमें दक्षिण भारत के लगभग सभी प्रमुख शहरों के प्रतिभागी भी थे. जीवन विद्या के प्रणेता बाबा ए नागराज पूरे चार दिनों तक यहां रहे और प्रतिभागियों का मार्गदर्शन किया.
पहले दिन उदघाटन सत्र में बाबा नागराज ने अनुसन्धान की आवश्यकता पर प्रकाश डाला. उन्होंने कहा कि पृथ्वी पर मानव ज्ञानी, विज्ञानी और अज्ञानी के रूप में है. मानव ने जाने- अनजाने पृथ्वी को ना रहने लायक बना दिया है. पृथ्वी को रहने योग्य बनाना ही इस अनुसन्धान का उद्देश है. धरती पर उष्मा बढने के कारण ही धरती बीमार होती जा रही है. इस पर शोध अनुसन्धान जरुरी है. इसके लिए मानव को न्याय पूर्वक जीना होगा और स्वयं में समझ कर जीना होगा, यही समस्याओं का समाधान है. उत्पादन कार्य में संतुलन और संवेदनाओं में नियंत्रण से ही अपराध में अंकुश लग सकता है. प्रयोजन के सम्बन्ध में उन्होंने कहा कि कल्पनाशीलता और कर्म स्वतंत्रता हर मानव के पास हैं. इसके आधार पर हर मानव समझदार हो सकता है और व्यवस्था में जी सकता है. उन्होंने नर-नारी में समानता और गरीबी-अमीरी में संतुलन पर जोर दिया. इसी दिन दुसरे सत्र में मुंबई, भोपाल, इंदौर और पुणे के प्रतिनिधियो ने जीवन विद्या आधारित अभियान की समीक्षा और भावी दिशा पर विचार व्यक्त किये. मुंबई से आये डॉ. सुरेन्द्र पाठक ने मुंबई में जीवन विद्या की गतिविधियों पर विस्तार से प्रकाश डाला. उन्होंने बताया कि मुम्बई के सोमैया विद्या विहार के विभिन्न कालेजों में शिक्षको छात्रों के बीच शिविर आयोजित हो रहे हैं. ऐसे ६०० शिक्षकों के २४ छः दिवसीय शिविर विगत दो वर्षों में संपन्न हुए हैं तथा मुंबई विश्वविद्यालय के एक पाठ्यक्रम में जीवन विद्या की एक यूनिट शामिल की गई है. मुंबई के आसपास के शहरों में भी परिचय शिविर आयोजित किये जा रहे है. भोपाल से आई श्रीमती आतिषी ने मानवस्थली केंद्र की गतिविधियों से प्रतिनिधियों को अवगत कराया. इंदौर के श्री अजय दाहिमा और पुणे के श्रीराम नर्सिम्हम ने अपने इलाके में चल रही गतिविधियों की जानकारी दी. यह भी बताया गया कि उत्तरप्रदेश तकनीकी विश्वविद्यालय ने अपने सभी ५१२ कालेजो में 'वेल्यु एजूकेशन एंड प्रोफेशनल एथिक्स' जीवन विद्या आधारित फाउनडेशन कोर्से लागु किया है जिसकी टेक्स्ट बुक भी छप गई है. और विद्यार्थियों के लिए वेबसाईट बनाकर भी पाठ्य सामग्री उपलब्ध करा दी गई है. अगले सत्र में रायपुर, ग्वालियर, बस्तर, दिल्ली, बांदा, चित्रकूट आदि केंद्र ने अपनी प्रगति से अवगत कराया. रायपुर से आये श्री अंजनी भाई ने बताया की अभ्युदय संस्थान में छत्तीसगड़ राज्य के १०० शिक्षको का छः महीने का अध्ययन शिविर चल रहा है ये शिक्षक २० दिन प्रशिक्षण लेते है और १० दिन अपने-अपने क्षेत्रों में शिविर लेते हैं. राज्य में दस हजार से भी ज्यादा शिक्षको के शिविर हो चुके है. गत २९ सितम्बर को राज्य के मुख्यमंत्री श्री रमन सिंह ने अभ्भुदय संस्थान का अवलोकन किया और पूज्य बाबा नागराज जी से अभियान पर चर्चा की. वहां उन्होंने प्रशिक्षण ले रहे शिक्षको को संबोधित किया तथा प्रशिक्षण के दौरान हुए उनके अनुभवों को भी सुना. मुख्यमंत्री रमन सिंह ने घोषणा कर दी कि राज्य के आईएएस, आईपीएस और आईएफएस आधिकारियो को भी एक हफ्ते के प्रशिक्षण के लिए अभ्भुदय संस्थान भेजा जायेगा.

दूसरे दिन मानवीय शिक्षा संस्कार व्यवस्था, लोक शिक्षा योजना, शिक्षा संस्कार योजना पर बाबा नागराज जी विचार रखे .उन्होंने कहा कि हर आदमी हर आयु में समझदार होने की क्षमता रखता है. वर्त्तमान प्रणाली में पैसा बनाना ही समझदारी मान लिया गया है. मानव चेतना को सही तरीके से ना पहचाने के कारण यह गलती हुई हैं. इसके लिए उन्होंने मध्यस्थ दर्शन के आलोक में निकाले गए निष्कर्षों के बारे में बताया. इसमें मानव व्यवहार दर्शन, मानव कर्म दर्शन, अभ्यास दर्शन और अनुभव दर्शन की व्याख्या की. साथ साथ उन्होंने कहा कि चारों अवस्थाओं में संतुलन से जीने की समझ ही विचार है . यहाँ पर उन्होंने भोगोन्मादी समाजशास्त्र की जगह व्यवहारवादी समाजशात्र, लाभोंमादी अर्थशास्त्र की जगह पर आवर्तनशील अर्थशास्त्र और कमोंमादी मनोविज्ञान के स्थान पर संचेतनावादी मनोविज्ञान को, शिक्षा की वस्तु बनाये जाने की आवश्यकता को निरुपित किया. दूसरे दिन ही बिजनौर, कानपुर, जयपुर, हैदराबाद, बंगलोर, चेन्नै, कोचीन, हरिद्वार आदि केन्द्रों के प्रतिनिधियों ने अपने क्षेत्रो में चल रही गतिविधियों से वृत प्रस्तुत किया. इसी दिन एक सत्र श्री साधन भट्टाचार्य जी के संयोजकत्व में परिवार

- 2-


मूलक स्वराज व्यवस्था पर हुआ जिसमें प्रवीण सिंह, अजय दायमा, डॉ. प्रदीप रामचराल्ला ने विचार रखे . दूसरा सत्र डॉ. नव ज्योति सिंह के संयोजकत्व में शोध, अनुसन्धान, अवर्तानशील कृषि पर हुआ जिसमें बांदा के श्री प्रेम सिंह, आइआइआइटी के शोधार्थी हर्ष सत्या, मृदु आदि ने अपने विचार व्यक्त किये.

तीसरे दिन बाबा नागराज जी ने कहा कि अस्तित्व में व्यापक वस्तु ही ऊर्जा हैं. पदार्थावस्था में भौतिक-रासायनिक
क्रियायें ऊर्जा सम्पनता के कारण से हैं. ज्ञान सम्पनता होना ही सहस्तित्व में जीना है. अभी तक आहार, आवास, अलंकार, दूरगमन, दूरदर्शन, दूरश्रवण पर हीं अध्ययन हुआ है. सहस्तित्व को पकडा नहीं है, इसलिए मानव का अध्ययन नहीं हुआ. सहस्तित्व को समझने और उस में जीने से एकरूपता बनती है. बाबा कहते गये,जीवन एक गठन
पूर्ण परमाणु है, उसमे दस क्रियाएँ होती हैं. अभी तक मनुष्य साढ़े चार क्रियाओं पर हीं जीता रहा है. इसी से व्यक्तिवाद और समुदायवाद का जन्म हुआ. और इसी से संघर्ष और शोषण युद्ध होता है. उन्होंने कहा कि मानवीय समस्यओं का समाधान सहस्तित्व विधि से ही होगा. सहस्तित्व का ज्ञान होना ही लक्ष्य है. इसका ज्ञान हमें जीवन का अध्ययन , मानवीय आचरण का अध्ययन और अस्तित्व के अध्ययन से ही पूरा होगा. बाबा ने समझ के रूप में शरीर पोषण-संरक्षण के लिए आहार, आवास, अलंकार, दूरगमन, दूरदर्शन, दूरश्रवण छह आकांक्षाओं को बताया है.


जीवन के सम्बन्ध में न्याय, धर्म, सत्य को समझना जरुरी है. प्रकृति के संबंध में नियम, नियंत्रण, संतुलन के रूप में जीना समझना जरुरी है. सार रूप में सार्वाभोम व्यवस्था के लिए प्रकृति की चारों अवस्थाओं में सहस्तित्व, परस्पर पूरकता और संतुलन को समझना जरुरी है. इसी दिन के एक सत्र में श्री रणसिंह आर्य ने जन अभियान के सन्दर्भ में समाधान के लिए प्रयास पर अपने विचार व्यक्त किये. एक अन्य सत्र में आईआईआईटी ,हैदराबाद के निदेशक डॉ. राजीव सांगल, श्री सोम देव त्यागी, मृदु , सुनीता पाठक, भानुप्रताप आदि ने लोक शिक्षा और शिक्षा संस्कार व्यवस्था पर चर्चा को आगे बढाया. श्री सोम देव त्यागी ने रायपुर में हो रहे प्रयोगों पर विस्तार से प्रकाश डाला.
चौथे दिन सार्वभोम व्यवस्था पर अपने विचार व्यक्त करते बाबा नागराज ने कहा कि अध्ययन पूर्वक न्याय और व्यवस्था को समझा जा सकता है. और समझकर प्रमाणित किया जा सकता हैं. सार्वभोम व्यवस्था की समझ से ही मानव, जीव चेतना से मानव चेतना में संक्रमित होकर व्यवस्था में भागीदारी का निर्वाह जिम्मेदारी पूर्वक कर सकता है. अभी तक मानव कार्य कलाप सुविधा-संग्रह तक ही है. मानव न्याय सत्य को प्रमाणित करने में असफल रहा है. समझदारीपूर्वक जीते हु्ए मानव सुखी व भय मुक्त हो सकता है ,इसके लिए धरती पर मानव मानसिकता से संपन्न व प्रमाणित व्यतियों द्वारा शिक्षा संस्कार के द्वारा मानव मानसिता से संपन्न पीड़ी तैयार हो सकती है. जो व्यवस्था पूर्वक जीकर मानवीयता व सहस्तित्व को प्रमाणित करेगी. चौथे और अंतिम दिन आज की दशा एवं समाधान की दिशा सत्र में डॉ. प्रदीप रामचर्ल्ला, अभ्यासा स्कूल के संस्थापक विनायक कल्लेतला, राजुल अस्थाना, श्री सोमदेव, प्रोफेसर राजीव सांगल ने अपने-अपने विचार व्यक्त किये. सम्मेलन के दूसरे कई सत्रों को आई आई आई टी,हैदराबाद निदेशक डॉ राजीव सांगल, डॉ. प्रदीप रामचर्ल्ला, प्रोफेसर गणेश बागडिया, रणसिंह आर्य, श्री साधन भट्टाचार्य , श्री सोम देव, श्रीराम नरसिम्हन, सुमन, विनायक आदि ने संबोधित किया..

सम्मेलन में प्रतिनिधियो के ठहरने और खाने की व्यवस्था स्कूल प्रबंधन ने की थी. इसकी दिनचर्या भी सधी हुई थी. सुबह योग -प्राणायाम का छोटा सत्र चलता फिर नास्ते के बाद प्रतिभागी जीवनविद्या अभियान की समीक्षा और भावी योजनाओं पर चर्चा में जुट जाते. यहां तक की बाबा नागराज भी संबोधन के बाद प्रश्नोत्तरी के लिए समय देते. आपसी संवाद और समन्वय का अनोखा नजारा चार दिनों तक दिखा. अगले साल उत्तरप्रदेश के बांदा में फिर मिलने की घोषणा के साथ राष्ट्रीय सम्मेलन का समापन हो गया.
-------------------------------------






बुद्धिजीवियों की बुद्धि पर सवाल

एकबार फिर देश के तथाकथित बुद्धिजीवियों की बुद्धि पर सवाल उठ रहे हैं. ऐसा पहलीबार नहीं है कि देश के बुद्धिजीवियों पर सवाल खड़े किए जा रहे हों. देश के तथाकथित बुद्धिजीवियों पर सवाल पहले भी उठते रहे हैं. लेकिन पहले इन सवालों को खारिज कर दिया जाता था. लेकिन इसबार सवाल उठाने वाला मंच ही ऐसा है जिस
जय हिंदी जय भारत

शुक्रवार, 6 नवंबर 2009

कार्य से पहले कार्य का अभीष्ट फल जानिए, शंका दूर करिए- श्रीरामश्लाका प्रश्नावली से

सु

प्र

बि

हो

मु

सु

नु

बि

धि

रु

सि

सि

रहिं

बस

हि

मं

अं

सुज

सो

सु

कु

धा

बे

नो

त्य

कु

जो

रि

की

हो

सं

रा

पु

सु

सी

जे

सं

रे

हो

नि

हुं

चि

हिं

तु

का

मि

मी

म्हा

जा

हू

हीं

ता

रा

रे

री

हृ

का

खा

जू

रा

पू

नि

को

जो

गो

मु

जि

यँ

ने

मनि

हि

रा

मि

री

न्मु

खि

जि

जं

सिं

नु

को

मि

निज

र्क

धु

सु

का

गु

रि

नि

ढ़

ती

ना

पु

तु

नु

वै

सि

हुं

सु

म्ह

रा

ला

धी

री

हू

हीं

खा

जू

रा


रे



श्री रामश्लाका प्रश्नावली वर्ण महिमा का अद्वितीय उदाहरण है. गोस्वामी तुलसीदास का सानिध्य पाकर इन शब्दों की गरिमा और भी बढ़ गई है. इसकी महिमा स्वयंसिद्ध है.  आप किसी कार्य के बारे में जानने के लिए उत्सुक हैं उसके परिणाम को लेकर मन में उधेरबुन है तो इस रामश्लाका प्रश्नावली से इस उधेरबुन को दूर सकते हैं. इस प्रश्नावली के किसी एक बक्से के अक्षर या अक्षरों या मात्रा(बक्से में जो कुछ हो) को पुस्तिका पर लिख लें. फिर जैसे मैंने चुना, फ(दूसरी पंक्ति में रेखांकित) अब इस फ को छोड़कर, उसके नवें अक्षर या अक्षरों या मात्रा का चुनिये. जैसे मेरे चुने हुए ये अक्षर ल आया. फिर ल को छोड़कर, उसका नौवा अक्षर. इसी तरह आगे तब तक बढ़ें जब सबसे पहले चुने अक्षर पर न पहुंच जाएं.  चुने हुए अक्षरों या मात्रा को लिखते जाए. इससे एक चौपाई बनती है. बस यही चौपाई आपके प्रश्न का उत्तर है.
जैसे मेरे चुने हुए फ से जो चौपाइ बनी-
सु फ ल म नो र थ हो हुं तु म्हा रे  रा मु ल ख नु सु नि भ ए सु खा रे
इस प्रश्नश्लाका से कुल नौ चौपाइयां बनती हैं जो इस प्रकार फलाफल देती हैं-
1. सुनु सिए सत्य असीस हमारी। पूजिहि मन कामना तुम्हारी।।
फल- ये प्रसंग श्री सीताजी के गौरी पूजन के दौरान आया है और गौरी जी ने सीता माता को आशार्वाद दिया है कि तुम्हारा मनोरथ पूरा होगा. यानी प्रश्नकर्ता का प्रश्न उत्तम है और अभीष्टकार्य सिद्ध होगा.
2. प्रबिसि नगर कीजे से काजा। हृदय राखि कौसलपुर राजा।।
फल- प्रसंग हनुमान जी के लंका में प्रवेश के समय आया है. प्रश्नकर्ता भगवान का नाम लेकर कार्य शुरू करे, कार्य सिद्ध होगा.
3. उघरहिं अंत न होइ निबाहू। कालनेमि जिमि रावन राहू।।
फल- प्रसंग बालकांड के सत्संग वर्णन प्रसंग में है. प्रश्नकर्ता जाने कि इस कार्य में भलाई नहीं है और कार्य की सफलता में संदेह है.
4. बिधि बस सुजन कुसंग परहीं। फनि मनि सम निज सुन अनुसरहीं.
फल- प्रसंग बालकांड में है. प्रश्नकर्ता से आग्रह है कि वे खोटे मनुष्य का साथ छोड़ दे और कार्य पूरा होने में संदेह है.
5. मुद मंगलमय संत समाजू। जो जग जंगम तीरथराजू।।
फल- प्रश्न उत्तम है और कार्य सिद्ध होगा.
6. गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई।।
फल- प्रश्न श्रेष्ठ है और कार्य सिद्ध होगा.
7. बरुन कुबेर सुरेश समीरा। रन सन्मुख धरि काहुं न धीरा।।
फल- कार्य पूर्ण होने में संदेह है
8. सुफल मनोरथ होहुं तुम्हारे। रामु लखनु सुनि भए सुखारे।।
फल- प्रश्न उत्तम है. कार्य सिद्ध होगा.
9. होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ाबै साखा.
फल- कार्य होने में संदेह है, इसे भगवान पर छोड़ देना अच्छा है.